परमेश्वर अंत के दिनों में न्याय-कार्य क्यों करता है?
आज महामारी पूरी दुनिया में फैल रही है, आपदाएँ विकराल होती जा रही हैं। हमने भूकंप, अकाल और युद्ध देखे हैं, और सभी विश्वासी उत्सुकता से...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
प्रभु पर विश्वास करने वाले कई लोग सोचते हैं, “प्रभु यीशु ने हमारे पाप पहले ही क्षमा कर दिए हैं और हम आस्था के द्वारा उचित ठहराए गए हैं। प्रभु हमें पापरहित मानता है, तो फिर हमें सीधे स्वर्ग के राज्य में क्यों नहीं उठाया जा सकता?” आइए अब इस सवाल पर संगति करें। यह सच है कि प्रभु में विश्वास करने से लोगों के पाप क्षमा हो जाते हैं, लेकिन पाप क्षमा होने के बाद भी वे बार-बार पाप क्यों करते हैं? भले ही वे जीवन भर प्रभु में विश्वास करें, फिर भी वे अपनी पापी प्रकृति के बंधन से मुक्त क्यों नहीं हो पाते, अभी भी पाप में क्यों जीते हैं और खुद को इससे बाहर क्यों नहीं निकाल पाते? इसके अलावा, पाप क्षमा होने के बाद भी लोग परमेश्वर की निंदा, परमेश्वर का प्रतिरोध और परमेश्वर से विश्वासघात कैसे कर पाते हैं? यहाँ समस्या क्या है? यहूदियों ने पाप करने के बाद होमबलि चढ़ाई और उनके पाप क्षमा कर दिए गए। तो फिर वे सत्य व्यक्त करने वाले प्रभु यीशु को क्रूस पर क्यों चढ़ा पाए? यह साबित करने के लिए काफी है कि किसी व्यक्ति के पाप क्षमा होने का मतलब यह नहीं है कि वह पाप से मुक्त हो गया है, पावनीकृत होना तो दूर की बात है। ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी व्यक्ति के पाप क्षमा होने के बाद भी उसके भीतर पापी प्रकृति मौजूद रहती है; यानी उसकी पाप करने की प्रकृति अभी भी मौजूद है। वह अभी भी हर दिन पाप में जीता है, पाप करने और उसे कबूल करने, पाप कबूल करने और पाप करने का जीवन जीता है। बाइबल कहती है : “पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। “इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 11:45)। तो क्या ऐसे लोग परमेश्वर के वादों और आशीषों का आनंद लेने के योग्य हैं? क्या वे स्वर्ग के राज्य में उठाए जाने के योग्य हैं? बिल्कुल नहीं।
अनुग्रह के युग में कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं देख सका कि प्रभु यीशु द्वारा किया गया कार्य केवल छुटकारे का कार्य था, मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध करने का कार्य नहीं, मानवजाति को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने का कार्य तो बिल्कुल नहीं था। प्रभु यीशु ने केवल मानवजाति के लिए पाप-बलि का काम किया। जब तक लोगों ने प्रभु यीशु के नाम पर प्रार्थना की, पाप कबूल किए और पश्चात्ताप किया, उनके पाप क्षमा कर दिए गए और उन्हें व्यवस्था द्वारा और दोषी नहीं ठहराया गया। अनुग्रह के युग में हम जिस “उद्धार” की अक्सर बात करते हैं उसका यही सच्चा अर्थ है। इस उद्धार का शुद्ध किए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से कोई लेना-देना नहीं है; यह कहा जा सकता है कि ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। इसलिए केवल प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार कर लेने का मतलब यह नहीं है कि तुम पूरी तरह से बचा लिए गए हो और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करोगे। मुझे बताओ, क्या प्रभु यीशु ने कभी कहा था कि जिन लोगों के पाप क्षमा कर दिए गए हैं वे बचा लिए गए हैं और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं? प्रभु यीशु ने ऐसा कभी नहीं कहा और न ही पवित्रात्मा ने कहा। लेकिन प्रभु यीशु ने एक बहुत ही अहम बात कही थी : “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। इन वचनों का क्या अर्थ है? ये हमें बताते हैं कि प्रभु का स्वागत करने में सबसे अहम बात सत्य के आत्मा का स्वागत करना है। सत्य का आत्मा कौन है? वह परमेश्वर है जो सत्य व्यक्त करने आता है और जो तुम्हें सभी सत्यों में प्रवेश करने का मार्ग बताएगा। अब तुम्हारे केवल पाप क्षमा हुए हैं और पावनीकृत किए जा सकने से पहले तुम्हें अभी भी परमेश्वर के कार्य के एक और चरण की जरूरत है। तुम्हें परमेश्वर का इंतजार करना होगा जो सत्य व्यक्त करने आता है—वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करेगा। इस देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को स्वीकार करके ही तुम सभी सत्यों में प्रवेश कर सकते हो, शुद्ध हो सकते हो और शैतान के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो सकते हो; तभी तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य होगे। इस भविष्यवाणी में प्रभु यीशु ने केवल यह कहा था : “जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा।” यह क्या संदेश देता है? यह कि जब प्रभु लौटेगा, तो वह न्याय का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करेगा, यानी परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य। मसीह के आसन के सामने न्याय का अनुभव करके ही तुम वास्तव में अपनी भ्रष्टता का सच जान सकते हो और अपने भ्रष्ट स्वभावों से शुद्ध हो सकते हो; तभी तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हासिल कर सकते हो और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सकते हो। यह प्रभु यीशु के वचनों को पूरा करता है : “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना 17:17)। इसका मतलब यह है कि अनुग्रह के युग में लोगों के केवल पाप क्षमा हुए थे। उन्होंने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया था और न ही उनका पावनीकरण हुआ था और परमेश्वर को उन्हें शुद्ध करने के लिए अभी भी कार्य का एक और चरण करना था। देखो, ये वचन स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के रहस्य का खुलासा करते हैं। परमेश्वर मानवजाति को पूरी तरह बचाना चाहता है, तो वह यह काम कैसे करता है? वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करता है और हमें सभी सत्यों में प्रवेश करने का मार्ग बताता है, ताकि हम अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकें और पूर्ण उद्धार पा सकें। अगर परमेश्वर हमें सभी सत्यों में प्रवेश करने का मार्ग नहीं बताता है, तो मानवजाति पूर्ण उद्धार नहीं पा सकेगी और लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे। इसलिए प्रभु ने कभी नहीं कहा कि किसी के पापों का क्षमा होना स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की शर्त है। भले ही तुम्हारे पाप क्षमा कर दिए गए हों, तुम प्रभु के लिए प्रचार और कार्य कर सकते हो और कई चमत्कार भी कर सकते हो, फिर भी तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं हो। इतना ही नहीं, बल्कि प्रभु यीशु यह भी कहेगा : “मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:23)। ये वे सभी लोग हैं जो प्रभु के नाम पर प्रचार और कार्य करते हैं, बीमारों को चंगा करते हैं, दानवों को निकालते हैं और कई चमत्कार करते हैं। प्रभु यीशु फिर भी उनसे ऐसा क्यों कहेगा, “हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ”? इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका मतलब है कि अगर तुम प्रभु की वापसी को स्वीकार नहीं करते और सत्य के आत्मा द्वारा किए जाने वाले उस कार्य को स्वीकार नहीं करते, जो तुम्हें सभी सत्यों में प्रवेश करने का मार्ग बताता है, तो भले ही तुम प्रभु यीशु के नाम पर प्रचार और कार्य करो, बीमारों को चंगा करो, दानवों को निकालो और कई चमत्कार करो, प्रभु की नजरों में तुम कुकर्म करने वाले हो। प्रभु ने तुम्हें कभी नहीं जाना है और तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं हो! प्रभु यीशु के वचनों का यही अर्थ है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने सालों तक प्रभु में विश्वास किया है—अगर तुम अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्यों को स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर की नजरों में कुकर्म करने वाले हो—तुम्हें हटा दिया जाएगा और तुम आपदा में फँस जाओगे। प्रभु यीशु ने कहा था : “वह जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है” (मत्ती 7:21)। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि केवल वे ही लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलते हैं जो प्रभु की वापसी का स्वागत कर सकते हैं, सत्य के आत्मा का स्वागत कर सकते हैं, सभी सत्यों में प्रवेश कर सकते हैं, परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार कर सकते हैं, शुद्ध हो सकते हैं और अपना मिशन पूरा करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह निभाने में सक्षम हैं। अंततः केवल ये लोग ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभाव से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद परमेश्वर देह में लौटा कि उसे नए युग में ले जाए और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)।
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