देहधारण क्या होता है

02 नवम्बर, 2021

हम सब जानते हैं कि दो हजार साल पहले, परमेश्वर ने इंसान को छुटकारा दिलाने के लिए प्रभु यीशु के रूप में देहधारण किया, और उपदेश दिया, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। उसने बहुत-से सत्य भी व्यक्त किए और छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए, इंसान की पापबलि के रूप में उसे सूली चढ़ा दिया गया। इस प्रकार उसने व्यवस्था के युग का अंत और अनुग्रह के युग की शुरुआत की। पहली बार देहधारण करके परमेश्वर ने इंसान को छुटकारा दिलाने का कार्य किया। हालाँकि यहूदी धर्म ने प्रभु यीशु की निंदा करने की बहुत कोशिश की और उसे सूली पर चढ़ाने के लिए रोमन सरकार से हाथ मिला लिया, पर दो हजार साल बाद, प्रभु यीशु का सुसमाचार पृथ्वी के कोने-कोने में फैल चुका है। इससे साबित होता है कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, एक सच्चा परमेश्वर और सृष्टिकर्ता जो देह में कार्य करने प्रकट हुआ। फिर भी बहुत से लोग प्रभु यीशु को देहधारी परमेश्वर नहीं मानते। वे प्रभु यीशु को एक साधारण व्यक्ति समझते हैं। बल्कि बहुत से पादरी तक नहीं मानते कि प्रभु यीशु परमेश्वर है, उसे मात्र परमेश्वर का प्रिय पुत्र मानते हैं। हालाँकि आज प्रभु के विश्वासियों की संख्या अनगिनत है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर है, प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सत्यों का अर्थ और मूल्य कोई नहीं जानता। तो, प्रभु के स्वागत के मामले में, बहुत से लोग आपदा में पड़ गए हैं क्योंकि वे परमेश्वर की वाणी नहीं सुन सकते। जो लोग परमेश्वर की वाणी नहीं सुन पाते, वे अटूट विश्वास रखते प्रतीत होते हैं, लेकिन अगर वे प्रभु यीशु में मनुष्य के पुत्र की छवि देखते, तो क्या वे सच में प्रभु में आस्था रखकर उसका अनुसरण कर पाते? क्या वे उसे आम इंसान समझकर उसकी निंदा करते? क्या वे कहते कि वह परमेश्वर नहीं है? अगर वे आज प्रभु यीशु को सत्य व्यक्त करते सुन लें, तो ईशनिंदा करने के कारण प्रभु यीशु का तिरस्कार कर क्या उसे फिर से सूली पर चढ़ा देंगे? फरीसियों ने जिस तरह प्रभु यीशु की निंदा की थी, उस आधार पर, हम यकीन से कह सकते हैं कि अगर आज प्रभु के विश्वासी उसे मनुष्य के पुत्र के मूल स्वरूप में देख लें, तो बहुत से लोग भाग जाएँगे, और बहुत से फरीसियों की तरह प्रभु यीशु की आलोचना और निंदा करेंगे, और फिर से उसे सूली पर चढ़ा देंगे। कुछ लोग मेरे ऐसा कहने पर आपत्ति कर सकते हैं, लेकिन मेरी हर बात तथ्य के अनुरूप है। क्योंकि इंसान बेहद भ्रष्ट चुका है और परमेश्वर में आस्था के मामले में, केवल अपनी आँखों पर भरोसा करता है, इसलिए कोई नहीं जान पाता कि देहधारी मनुष्य का पुत्र परमेश्वर का प्रकटन है। इससे पता चलता है कि देहधारण एक गूढ़ रहस्य है। हजारों वर्षों से सत्य के इस पहलू को कोई नहीं समझ पाया है। हालाँकि विश्वासी जानते हैं कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर है, लेकिन साफ तौर पर कोई नहीं बता पाया है कि देहधारण होता क्या है और हमें देहधारी परमेश्वर को कैसे समझना चाहिए।

तो, परमेश्वर ने (प्रकट होकर) कार्य करने के लिए देहधारण करने का निर्णय क्यों लिया? सही कहें, तो इंसान की भ्रष्टता के कारण परमेश्वर को उद्धार-कार्य के लिए देहधारण की जरूरत पड़ी। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर ही इंसान का पूर्ण उद्धार कर सकता है। इंसान के छुटकारे के लिए परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था और छुटकारे के काम के लिए वह दो बार आया। कुछ लोग पूछ सकते हैं, परमेश्वर ने छुटकारे के कार्य के लिए किसी इंसान का उपयोग क्यों नहीं किया? परमेश्वर ने देहधारण क्यों किया? क्योंकि हर भ्रष्ट इंसान पाप करता है, हम सब पापी हैं, यानी कोई पापबलि बनने के योग्य नहीं था। मात्र देहधारी मनुष्य का पुत्र पापरहित था, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं छुटकारे का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण किया। सिर्फ इसी से परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता दिखायी दी, इसने शैतान को अपमानित किया और उसे परमेश्वर पर दोष लगाने लायक नहीं छोड़ा। इससे इंसान ने परमेश्वर के सच्चे प्रेम और दया को जाना। प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य समाप्त कर भविष्यवाणी की कि वह फिर आएगा। आज प्रभु यीशु लौट आया है और देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने बहुत से सत्य व्यक्त किए हैं और इंसान की भ्रष्टता को शुद्ध कर, उसे पाप और शैतान की शक्ति से बचाने के लिए, और सुंदर गंतव्य तक लाने के लिए, वह अंत के दिनों में न्याय का कार्य कर रहा है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा इतना सत्य व्यक्त करने के बावजूद, धार्मिक दुनिया की मसीह-विरोधी ताकतें अभी भी बेतहाशा उसका विरोध और निंदा करती हैं, उन्होंने सत्तारूढ़ सीसीपी से हाथ भी मिला लिया है ताकि अंत के दिनों में परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को अवरुद्ध, नष्ट और प्रतिबंधित किया जा सके। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के देहधारी स्वरूप को नकारने का पूरा प्रयास करते हैं, उसे साधारण व्यक्ति कहकर उसका तिरस्कार और उसकी निंदा भी करते हैं, इससे धार्मिक दुनिया की मसीह विरोधी ताकतों का वह बदसूरत चेहरा उजागर हो जाता है जो सत्य से घृणा और परमेश्वर का विरोध करता है। अगर हम दो हजार साल पहले की बात करें, तो हम देखते हैं कि यहूदी धर्म के मुख्य याजक, शास्त्री और फरीसी प्रभु यीशु को मसीहा मानने के बजाय मरना पसंद करते। उन्होंने प्रभु यीशु को ऐसे मामूली इंसान के रूप में चित्रित किया जो ईशनिन्दा करता था, उन्होंने प्रभु यीशु का विरोध, तिरस्कार और निन्दा करने का पूरा प्रयास किया, और अंत में उसे सूली पर चढ़ा दिया, इस जघन्य अपराध के लिए उन्हें परमेश्वर द्वारा शापित और दंडित किया गया। आज सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रकट होकर मनुष्य के पुत्र के रूप में कार्य कर रहा है। अनेक लोगों ने देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन सत्य हैं, उन्होंने परमेश्वर की वाणी सुनी है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को सहर्ष स्वीकार कर प्रभु का स्वागत किया है। लेकिन अनेक लोग देहधारी परमेश्वर से अनजान हैं, वे अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को एक मामूली इंसान समझते हैं, और उसे स्वीकारने वालों की यह कहकर आलोचना और निंदा करते हैं कि वे एक मामूली इंसान में विश्वास रखते हैं। उन्हें लगता है कि वे बाइबल समझते हैं, इसलिए सच्चे मार्ग को जाँचने से इंकार करते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की घोर निंदा और विरोध करते हैं, इस तरह परमेश्वर को फिर से सूली पर चढ़ाने का पाप कर रहे हैं। इंसान ने परमेश्वर के दोनों देहधारण की निंदा कर, उसे नकारा क्यों है? क्योंकि उसे परमेश्वर का ज्ञान नहीं है, वह सत्य नहीं समझता, और देहधारण के गूढ़ रहस्य तो वह बिल्कुल ही नहीं समझता। इसकी वजह यह भी है कि इंसान बुरी तरह से भ्रष्ट है और उसकी प्रकृति शैतानी है। उसे न केवल सत्य से घृणा और नफरत है, बल्कि वह परमेश्वर का घोर शत्रु भी है और उसे कोई भय नहीं है। कुछ ऐसे धर्मपरायण विश्वासी भी हैं जो हैवानों के सरदार सीसीपी और धार्मिक मसीह-विरोधी ताकतों से अपनी अज्ञानता के कारण धोखा खा गए हैं और वे परमेश्वर-विरोध के मार्ग पर चल पड़े हैं। उनकी नाकामी का कारण देहधारण और सत्य के बारे में उनकी अज्ञानता है, इसलिए वे परमेश्वर की वाणी नहीं सुन पाते, और देहधारी परमेश्वर को एक साधारण व्यक्ति मानकर उसका तिरस्कार और निंदा करते हैं। जाहिर है कि देहधारण के सत्य की समझ रखना महत्वपूर्ण है ताकि हम प्रभु का स्वागत करें और स्वर्ग के राज्य में उठाए जाएँ। यह हमारे अंतिम गंतव्य से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

बहुत से लोग पूछते हैं, चूँकि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर है, उसने छुटकारे का कार्य किया है, इंसान को पहले ही बचाया जा चुका है, वह परमेश्वर की शरण में आ चुका है, तो फिर इंसान को बचाने की खातिर न्याय-कार्य करने के लिए परमेश्वर को अंत के दिनों में देहधारण करने की क्या जरूरत? इसका बहुत गहरा अर्थ है। सीधे शब्दों में, इंसान को छुटकारा दिलाने, हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए परमेश्वर का दो बार देहधारण करना परमेश्वर द्वारा सृष्टि के निर्माण से बहुत पहले ही तय कर दिया गया था। बाइबल में परमेश्वर के मनुष्य के पुत्र के रूप में दो बार देहधारण करने की कई भविष्यवाणियाँ हैं। पहली बार, पापबलि के रूप में सूली पर चढ़कर उसने छुटकारे का काम पूरा किया, ताकि लोगों के पाप क्षमा हो जाएँ, लेकिन लोग पाप से बचकर पवित्रता प्राप्त नहीं कर पाए। दूसरी बार, वह सत्य व्यक्त करके न्याय-कार्य द्वारा इंसान को पूरी तरह शुद्ध करेगा, इंसान को पाप और शैतान के प्रभाव से बचाएगा, युग का अंत करके इंसान को एक सुंदर गंतव्य पर ले जाएगा। इसलिए, दो देहधारण इंसान को छुटकारा दिलाने फिर बचाने के लिए हैं। परमेश्वर इंसान को बचाने की अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करने के लिए दो बार देहधारण करता है। आज अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय-कार्य ने लोगों के एक समूह को जीतकर, पूर्ण कर उसे विजेता बना दिया है, परमेश्वर ने शैतान को हराकर महिमा प्राप्त कर ली है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने अपना महान कार्य पूरा कर लिया है। ये ऐसे काम हैं जिन्हें परमेश्वर पहले ही कर चुका है। अब हम अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारण की असाधारण सार्थकता देख सकते हैं। एक ओर, इसने पुराने युग, अनुग्रह के युग का अंत किया, और एक नए युग, राज्य के युग की शुरुआत की। दूसरी ओर, यह इंसान को शुद्ध कर बचाता है और उसे एक सुंदर गंतव्य तक लाता है। देहधारी परमेश्वर छुटकारे का कार्य और न्याय-कार्य दोनों पूरे करता है, तो परमेश्वर के दोनों देहधारण बेहद मायने रखते हैं। आज, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इतने सत्य व्यक्त किए हैं और (हमारी दुनिया में) ऐसे महान कार्य किए हैं, तो भी इतने लोग परमेश्वर के कार्य से अनजान क्यों हैं? बहुत से लोग अब भी नहीं मानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है, वे धार्मिक धारणाओं से चिपके हुए हैं, मानते हैं कि केवल प्रभु यीशु ही परमेश्वर है, और कहते हैं कि बाइबल का पालन करके ही हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। क्या बेवकूफी और नासमझी की बात है! ऐसे मूर्ख लोग परमेश्वर की वाणी कैसे सुन सकते हैं? और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों की खोज कैसे कर सकते हैं? अंततः, इसका कारण यह है कि लोगों को देहधारी परमेश्वर के बारे में ज्ञान नहीं है और वे परमेश्वर की वाणी को पहचान नहीं पाते, इसलिए उन्हें परमेश्वर के सिंहासन के सामने नहीं उठाया जा सकता। ये अज्ञानी लोग, ये मूर्ख कुँवारियाँ, चाहे कितने वर्ष भी आस्था रख लें, परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकते। (स्पष्ट रूप से,) अगर आप प्रभु का स्वागत करना चाहते हैं, तो देहधारी परमेश्वर का ज्ञान और देहधारण के सत्य की समझ महत्वपूर्ण है! तो, वास्तव में देहधारण है क्या? और हमें देहधारण को कैसे समझना चाहिए? हम सच्चे और झूठे मसीह में अंतर कैसे कर सकते हैं? हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर समझ सकते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'देहधारण' परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, परमेश्वर को देहधारी होने के लिए, सबसे पहले देह बनना होता है, सामान्य मानवता वाला देह; यह सबसे मौलिक आवश्यकता है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रह कर कार्य करता है, परमेश्वर अपने वास्तविक सार में देहधारी बन जाता है, वह मनुष्य बन जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार')। "देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है; वह आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण दिव्यता दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियां बनाए रखती है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य अभ्यास में लाती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है')। "देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए वह मसीह जो लोगों को सत्य दे सकता है परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर का सार धारण करता है, और अपने कार्य में परमेश्वर का स्वभाव और बुद्धि धारण करता है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। वे जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते हैं, धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर मनुष्य के बीच रहकर अपना कार्य करता और पूरा करता है। यह देह किसी भी आम मनुष्य द्वारा उसके बदले धारण नहीं की जा सकती है, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पर्याप्त रूप से संभाल सकती है और परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, और परमेश्वर का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व कर सकती है, और मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')। परमेश्वर के वचन साफ तौर पर बताते हैं कि देहधारण, देह में परमेश्वर के आत्मा का साकार होना है, यानी परमेश्वर का आत्मा एक आम इंसान बनने के लिए देह धारण करता है, और फिर प्रकट होकर मानव-संसार में कार्य करता है। यानी परमेश्वर का आत्मा शरीर धारण कर मनुष्य का पुत्र बन जाता है। देखने में तो, देहधारी परमेश्वर एक सीधा-सादा, सामान्य व्यक्ति है, जिसमें कुछ भी विशिष्ट या असाधारण नहीं, जो आम लोगों की तरह ही खाता-पीता, पहनता, चलता-फिरता है और एक सामान्य जीवन जीता है। उसे भूख भी लगती है, थक जाने पर नींद भी आती है, आम लोगों की तरह उसमें भी भावनाएँ होती हैं, वह वास्तव में लोगों के बीच ही रहता है, और कोई नहीं देख पाता कि वह देहधारी व्यावहारिक परमेश्वर है। मगर एक मामूली इंसान होते हुए भी, उसमें और सृजित मनुष्यों में एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। वह परमेश्वर का देहधारण है, उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा है। उसमें सामान्य मानवता तो है, पर पूर्ण दिव्यता भी है, जिसे देखा और छुआ जा सकता है। यह मुख्यत: इस ढंग से अभिव्यक्त होता है कि वह कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त कर रहस्य प्रकट कर सकता है। वह परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को, उसके मन और विचार को, उसके प्रेम, सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को व्यक्त कर उसकी गवाही दे सकता है, ताकि लोग परमेश्वर को जान सकें, समझ सकें। वह बाइबल के सभी रहस्यों को भी प्रकट कर सकता है, यानी वह सूचीपत्र खोल सकता है जिसकी भविष्यवाणी प्रकाशितवाक्य में की गयी है। यह उसकी पूर्ण दिव्यता को सिद्ध करता है। देखने में मसीह एक साधारण व्यक्ति है, लेकिन वह सत्य व्यक्त कर सकता है, लोगों को जगा सकता है, भ्रष्ट इंसान को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है। परमेश्वर के आत्मा के बिना कोई ऐसे काम कैसे कर सकता है? यकीनन कोई मशहूर हस्ती या महापुरुष ऐसे काम नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे लोग सत्य व्यक्त नहीं कर सकते। उनमें सत्य नहीं होता। वे खुद को ही नहीं बचा सकते, तो पूरी मानवजाति को क्या बचाएँगे? देहधारी परमेश्वर सत्य व्यक्त कर सकता है इंसान को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय-कार्य कर सकता है, ऐसी योग्यता किसी इंसान में नहीं होती। वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक अंत के दिनों में परमेश्वर का कथन है, और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य की गवाही है। चूँकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों ने अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य का अनुभव किया है, स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सिंचन और चरवाही को स्वीकारा है, इसलिए उन्होंने देहधारी परमेश्वर के कार्य की गहरी व्यावहारिकता को महसूस किया है। परमेश्वर सच में लोगों के बीच रहता है, हमें समर्थन और आपूर्ति देने के लिए हमारी (वास्तविक) स्थिति के आधार पर सत्य व्यक्त करता है, परमेश्वर में हमारी आस्था के भटकाव, भ्रमित अनुसरण और दृष्टिकोण को, और हमारे अंदर हर तरह के शैतानी स्वभाव को उजागर करता है, ताकि हम ज्ञान पाकर बदल सकें। परमेश्वर हमें इंसानों से अपनी इच्छाएँ और अपेक्षाएँ भी बताता है, हमें अनुसरण के लिए व्यावहारिक और सटीक लक्ष्य और अभ्यास करने के लिए सिद्धांत देता है, ताकि हम सत्य की वास्तविकताओं में प्रवेश कर सकें, परमेश्वर द्वारा उद्धार और शैतान की अंधेरी शक्तियों से निजात पा सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अनुयायी (गहराई से) अनुभव करते हैं कि अगर देहधारी परमेश्वर लोगों का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने के लिए सत्य व्यक्त न करे, तो वे कभी अपनी पापी प्रकृति को पहचान न पाते, और न ही पाप के बंधनों और विवशताओं से निजात पाते। उन्हें यह भी एहसास होता है कि परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर ही उनका भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकता है, उसके धार्मिक स्वभाव के ज्ञान से ही वे उसका भय मानकर बुराई से दूर रह सकते हैं, और उसके वचनों को जीवन में उतारकर ही वे सच्चे इंसान की तरह जी सकते हैं, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ और आशीष पाने योग्य होकर, स्वर्ग के राज्य में लाए जा सकते हैं। इस पर विचार करो : अगर अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर आकर सत्य व्यक्त न करता, तो क्या बचाए जाने का ऐसा अवसर जीवन में फिर कभी मिल पाता? क्या हम परमेश्वर का न्याय और ताड़ना पाकर उसकी आशीष का भरपूर आनंद ले पाते? अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारण के बिना, सारी मानवता का विनाश निश्चित हो जाता, और किसी को उद्धार प्राप्त न हो पाता। यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन जैसा ही है, "इस बार, परमेश्वर कार्य करने आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। इसके अलावा, यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण का देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में तुम ऐसा कुछ नहीं देख सकते जो इसे दूसरों से अलग करता हो, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में पहले कभी नहीं सुना गया। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य के वचनों का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के काम की ज़िम्मेदारी लेता है, और मनुष्यों के समझने के लिये परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को अभिव्यक्त करता है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा—वो रहस्य जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, और नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है। ऐसी साधारण देह अनेक अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। उसके कार्य तुम्हारे लिए गूढ़ हो सकते हैं, परंतु उसके कार्य का संपूर्ण लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते-से लगते हैं, यद्यपि उसकी आग की लपटों जैसी आँखें नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन नहीं पा सकते, तुम उसके वचनों से सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित है, और जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है; तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर को जानें, उसकी आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करें। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटकर आया है। यद्यपि आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर मनुष्यों के ही समान है, उसकी एक नाक और दो आँखें हैं और वह एक साधारण परमेश्वर है, अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह मनुष्य नहीं होता तो स्वर्ग और पृथ्वी एक अभूतपूर्व बदलाव से होकर गुज़रते; अगर यह मनुष्य नहीं होता तो, स्वर्ग मद्धिम हो जाता, पृथ्वी पर उथल-पुथल हो जाती, समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जीती। परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि यदि अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए नहीं आया होता तो परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सदैव ही कट्टर पापी होते, और तुम हमेशा के लिए लाश बन जाते। तुम सबको यह जानना चाहिये कि यदि यह देह नहीं होता तो समस्त मानवजाति को एक अवश्यंभावी संकट का सामना करना होता, और अंत के दिनों में मानवजाति के लिये परमेश्वर के कठोर दण्ड से बच पाना कठिन होता। यदि इस साधारण शरीर का जन्म नहीं होता तो तुम सबकी दशा ऐसी होती जिसमें तुम लोग जीने में सक्षम न होते हुए जीवन की भीख माँगते और मृत्यु के लिए प्रार्थना करते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सत्य को नहीं पा सकते थे और न ही आज परमेश्वर के सिंहासन के पास आ पाते, बल्कि तुम लोग परमेश्वर से दण्ड पाते क्योंकि तुमने जघन्य पाप किये हैं। क्या तुम सब जानते हो, यदि परमेश्वर वापस देह में लौटा न होता, तो किसी को भी उद्धार का अवसर नहीं मिलता; और यदि इस देह का आगमन न होता, तो परमेश्वर ने बहुत पहले पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? अब जबकि यह स्पष्ट है, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरी बार के देहधारण को नकार सकते हो? जब तुम लोग इस साधारण मनुष्य से इतने सारे लाभ प्राप्त कर सकते हो, तो तुम लोग उसे प्रसन्नतापर्वूक स्वीकार क्यों नहीं करते हो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')।

इस मौके पर, कुछ लोग पूछ सकते हैं, देहधारी परमेश्वर का रूप-रंग तो साधारण है, और उसकी दिव्यता भी उसके शरीर में छिपी है, अगर परमेश्वर आ भी गया है, तो हम उसे देहधारी परमेश्वर के रूप में कैसे पहचानेंगे? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हमें मार्ग दिखाते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। इसे ऐसे कहें, व्यक्ति को इस बात का निश्चय कि यह देहधारी परमेश्वर है या नहीं और कि यह सही मार्ग है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी कि यह देहधारी परमेश्वर की देह है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')। परमेश्वर के वचन से हम देख सकते हैं कि देहधारी परमेश्वर की पहचान उसके प्रकटन पर आधारित नहीं है, न ही इस पर आधारित है कि वह किस परिवार में पैदा हुआ, उसके पास पद और शक्ति है या नहीं, या धार्मिक दुनिया में उसकी प्रतिष्ठा है या नहीं। यह इन बातों पर आधारित नहीं है। यह इस पर आधारित है कि क्या उसमें परमेश्वर का सार है, क्या वह सत्य व्यक्त करके स्वयं परमेश्वर का कार्य कर सकता है। यह सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। अगर वह सत्य व्यक्त करके इंसान को बचाने का कार्य कर सकता है, तो फिर भले ही वह एक साधारण परिवार में पैदा हुआ हो, समाज में उसके पास पद और शक्ति न हो, वह परमेश्वर ही है। ठीक अनुग्रह के युग की तरह, जब प्रभु यीशु काम करने आया, तो उसका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, दुनिया में वह एक चरनी में आया, वह लंबा-चौड़ा नहीं था, उसके पास न पद था, न शक्ति थी, तो भी वह सत्य व्यक्त कर सकता था, लोगों को पश्चाताप का मार्ग दे सकता था, लोगों के पाप क्षमा कर सकता था। पतरस और यूहन्ना जैसे उसके अनुयायी, जिन्हें सत्य से प्रेम था, उन्होंने प्रभु यीशु के कार्य और उसके द्वारा व्यक्त सत्य में देखा कि उसके पास परमेश्वर का सामर्थ्य और अधिकार है, उन्होंने पहचान लिया कि प्रभु यीशु मसीहा है, उन्होंने उसका अनुसरण किया और प्रभु का उद्धार प्राप्त किया। आज फिर परमेश्वर ने मानव-जगत में देहधारण किया है, भले ही वह देखने में एक साधारण व्यक्ति लगे, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर बहुत से सत्य व्यक्त कर सकता है और अंत के दिनों में न्याय-कार्य करता है। सभी देशों और स्थानों के अनेक लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य देखा है, उसकी वाणी को पहचाना है, उसे स्वीकार किया है और परमेश्वर के सिंहासन के सामने उन्नत हुए हैं। उन्होंने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना शुरू कर दिया है, थोड़ा सत्य भी समझ लिया है। उन सभी के पास कमाल का अनुभव और गवाही है, वे पूरे दिल से सुसमाचार का प्रचार करते और परमेश्वर की गवाही देते हैं, तथ्यों से साबित होता है कि वही व्यक्ति मसीह और देहधारी परमेश्वर हो सकता है जो सत्य व्यक्त करे, लोगों का न्याय कर उन्हें शुद्ध करे, और (पूरी तरह से) इंसान को बचाए। इसमें कोई शक नहीं है। अगर कोई सत्य व्यक्त न कर पाए, केवल संकेत और चमत्कार दिखाकर लोगों को धोखा दे, तो यह किसी दुष्ट आत्मा का काम है। अगर वे स्वयं को परमेश्वर कहते हैं, तो वे परमेश्वर के वेश में झूठे मसीह हैं। देहधारी परमेश्वर को जानने के लिए, हमें इस बारे में निश्चित होना चाहिए : केवल देहधारी परमेश्वर ही सत्य व्यक्त कर सकता है, अंत के दिनों में न्याय-कार्य कर सकता है, और इंसान को शैतान की ताकतों से बचा सकता है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों में (बहुत अधिक) सत्य व्यक्त किया है और इतना महान कार्य किया है, फिर भी बहुत से लोग उसे अनदेखा करते हैं, और बस प्रभु यीशु के बादलों पर खुलेआम आने की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे लोग आपदा में विनाश के समय रोएँगे और अपने दाँत पीसेंगे। यह प्रकाशितवाक्य की भविष्यवाणी को पूरा करता है : "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर यह भी कहता है, "जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा।" अंत में, आइए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जो लोग जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं सदा के लिए परमेश्वर उनसे घृणा करेगा। मसीह अंत के दिनों के दौरान राज्य में जाने के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है, और ऐसा कोई नहीं जो उससे कन्नी काटकर जा सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन का पोषण स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम केवल आशीष प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वह उसमें सच्चा विश्वास करने वाले सभी लोगों को जीवन प्रदान कर सके। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और उसका कार्य वह मार्ग है जिसे उन सभी लोगों को अपनाना चाहिए जो नए युग में प्रवेश करेंगे। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और इसकी बजाय उसकी भर्त्सना, निंदा, या यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर करने के लिए अपना कार्य सौंपा है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते हो जो अंत के दिनों के मसीह के द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को जो प्रतिशोध सहना होगा वह सभी के लिए स्वत: स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करोगे, यदि तुम अंत के दिनों के मसीह को ठुकराओगे, तो तुम्हारी ओर से परिणाम भुगतने वाला कोई अन्य नहीं होगा। इतना ही नहीं, इस दिन के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का दूसरा अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने प्रायश्चित का प्रयास भी करते हो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देखोगे। क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, तुम जिसे ठुकरा रहे हो वह कोई अदना प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या परिणाम होंगे? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं, बल्कि एक जघन्य अपराध किया होगा। और इसलिए मैं सभी को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने जहरीले दाँत मत दिखाओ, या छिछोरी आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने नहीं दे सकता, और न ही तुम्हें दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने दे सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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