अंत के दिनों में परमेश्वर देहधारी होकर क्यों आता है, आत्मा के रूप में क्यों नहीं?

06 नवम्बर, 2021

जबसे उद्धारकर्ता सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों के अपने न्याय-कार्य के लिए सत्य व्यक्त किए हैं, बहुत लोगों ने सच्चे मार्ग की खोज और पड़ताल की है, और फिर उद्धारकर्ता की वापसी का स्वागत किया है। उन्होंने देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत अधिकारपूर्ण, शक्तिशाली और वास्तव में सत्य हैं, और पुष्टि की कि ये पवित्र आत्मा की वाणी है, कोई आम इंसान ऐसे वचन नहीं कह सकता। ईश-वाणी सुनकर उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने उठाए गए और मेमने के विवाह-भोज में शामिल हुए हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोग रोज़ उसके वचन खाते-पीते और उनका आनंद लेते हैं, जिससे उनके दिल रोशन होते हैं। परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद लेने के साथ ही वे उसके वचनों का प्रबोधन भी पाते हैं, बहुत-से सत्य सीखते और बहुत-सी चीजों को समझते हैं। वे बाइबल के अनेक रहस्य भी जान जाते हैं, जो बहुत सुखकारी है। उनमें आस्था उमड़ रही है और परमेश्वर के प्रति प्रेम गहरा हो गया है। परमेश्वर द्वारा चुने गए अनेक लोग निडरता से सीसीपी की यातना, गिरफ्तारी और दमन का सामना करते हैं। अपने परिवार छोड़, सांसारिक बंधन तोड़, वे परमेश्वर की गवाही में सुसमाचार फैलाने को कर्तव्यबद्ध रहते हैं। वे सीसीपी की क्रूर गिरफ्तारियाँ और दमन सहते हैं, फिर भी साहस और निडरता के साथ परमेश्वर का अनुसरण कर उसकी गवाही देते रहते हैं। कोई उन्हें हरा नहीं पाया है, मिटा तो बिलकुल नहीं पाया है। उन्होंने परमेश्वर की जबरदस्त गवाही दी है। अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार दुनिया के हर देश में फैल गया है, और कई देशों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया स्थापित हो चुकी है। ज्यादा से ज्यादा लोग परमेश्वर की वाणी सुन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की ऑनलाइन जांच करने वाले बढ़ रहे हैं। यह पूरी तरह प्रभु यीशु की इस भविष्यवाणी को पूरा करता है : "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हैं : "मैं पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य कर रहा हूँ, और पूरब से असंख्य गर्जनाएं निरंतर गूँज रही हैं, जो सभी राष्ट्रों और संप्रदायों को झकझोर रही हैं। यह मेरी वाणी है जो सभी मनुष्यों को वर्तमान में लाई है। मैं अपनी वाणी से सभी मनुष्यों को जीत लेता हूँ, उन्हें धारा में बहाता और अपने सामने समर्पण करवाता हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले पूरी पृथ्वी से अपनी महिमा को वापस लेकर इसे नये सिरे से पूरब में जारी किया है। भला कौन मेरी महिमा को देखने के लिए लालायित नहीं है? कौन बेसब्री से मेरे लौटने का इंतज़ार नहीं कर रहा है? किसे मेरे पुनः प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन मेरी सुंदरता को देखने के लिए तरस नहीं रहा है? कौन प्रकाश में नहीं आना चाहता? कौन कनान की समृद्धि को नहीं देखना चाहता? किसे उद्धारकर्ता के लौटने की लालसा नहीं है? कौन उसकी आराधना नहीं करता जो सामर्थ्य में महान है? मेरी वाणी पूरी पृथ्वी पर फैल जाएगी; मैं अपने चुने हुए लोगों के सामने आकर और अधिक वचन बोलूँगा। मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए और पूरी मानवजाति के लिए अपने वचन बोलता हूँ, उन शक्तिशाली गर्जनाओं की तरह जो पर्वतों और नदियों को हिला देती हैं। इस प्रकार, मेरे मुँह से निकले वचन मनुष्य का खज़ाना बन गए हैं, और सभी मनुष्य मेरे वचनों को सँजोते हैं। बिजली पूरब से चमकते हुए दूर पश्चिम तक जाती है। मेरे वचन ऐसे हैं कि मनुष्य उन्हें छोड़ना बिलकुल पसंद नहीं करता, पर साथ ही उनकी थाह भी नहीं ले पाता, लेकिन फिर भी उनमें और अधिक आनंदित होता है। सभी मनुष्य खुशी और आनंद से भरे होते हैं और मेरे आने की खुशी मनाते हैं, मानो किसी शिशु का जन्म हुआ हो। अपनी वाणी के माध्यम से मैं सभी मनुष्यों को अपने समक्ष ले आऊँगा। उसके बाद, मैं औपचारिक तौर पर मनुष्य जाति में प्रवेश करूँगा ताकि वे मेरी आराधना करने लगें। मुझमें से झलकती महिमा और मेरे मुँह से निकले वचनों से, मैं ऐसा करूँगा कि सभी मनुष्य मेरे समक्ष आएंगे और देखेंगे कि बिजली पूरब से चमकती है और मैं भी पूरब में 'जैतून के पर्वत' पर अवतरित हो चुका हूँ। वे देखेंगे कि मैं बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हूँ, यहूदियों के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि पूरब की बिजली के रूप में। क्योंकि बहुत पहले मेरा पुनरुत्थान हो चुका है, और मैं मनुष्यों के बीच से जा चुका हूँ, और फिर अपनी महिमा के साथ लोगों के बीच पुनः प्रकट हुआ हूँ। मैं वही हूँ जिसकी आराधना असंख्य युगों पहले की गई थी, और मैं वह शिशु भी हूँ जिसे असंख्य युगों पहले इस्राएलियों ने त्याग दिया था। इसके अलावा, मैं वर्तमान युग का संपूर्ण-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ! सभी लोग मेरे सिंहासन के सामने आएँ और मेरे महिमामयी मुखमंडल को देखें, मेरी वाणी सुनें और मेरे कर्मों को देखें। यही मेरी संपूर्ण इच्छा है; यही मेरी योजना का अंत और उसका चरमोत्कर्ष है, यही मेरे प्रबंधन का उद्देश्य भी है : कि सभी राष्ट्र मेरी आराधना करें, हर ज़बान मुझे स्वीकार करे, हर मनुष्य मुझमें आस्था रखे और सभी लोग मेरी अधीनता स्वीकार करें!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे')

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन बड़ी रोशनी की तरह पूरब से पश्चिम तक फैल चुके हैं। हर देश से परमेश्वर के चुने हुए लोग सुसमाचार का प्रचार कर उसकी गवाही देते हैं, उसके शैतान को हराकर सारी महिमा पाने का हर्ष के साथ गुणगान करते हैं। उद्धारकर्ता सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने आपदाओं से पहले प्रकट होकर काम शुरू किया, और उसने विजेताओं का एक समूह बना लिया है। उसके राज्य का सुसमाचार हर देश में फैल गया है, उसी के अनुरूप आपदाएँ भी आने लगीं। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य पहले ही बहुत सफल हो चुका है, और उसके बाद परमेश्वर विभिन्न आपदाओं द्वारा इस संसार का न्याय कर इसे ताड़ना दे रहा है। ये आपदाएं राज्य का सुसमाचार फैलाने में, पाप और शैतानी ताकतों से ज़्यादा लोगों को बचाने में मदद करती हैं। इसका दूसरा पहलू यह है कि परमेश्वर आपदाओं द्वारा इस अंधेरे, दुष्ट युग को ताड़ना देकर इसका अंत करता है, और अपना विरोध करने वाली सभी दुष्ट ताकतों को मिटा देता है। अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य यही फल देगा। उद्धारकर्ता, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अनेक सत्य व्यक्त किए हैं, और महान काम करके संसार को हिला दिया है। पर धार्मिक जगत के बहुत-से लोग अभी भी बड़े लाल अजगर, सीसीपी द्वारा गुमराह हैं, और अब भी धर्म के भीतर की मसीह-विरोधी ताकतों से बंधे हुए हैं। वे इस विचार से चिपके हुए हैं कि प्रभु को आत्मा के रूप में बादल पर आना चाहिए, उसका मनुष्य के पुत्र के रूप में देह में लौटना संभव नहीं है। इस कारण वे निश्चित हैं कि बादल पर ना आने वाला झूठा है, उसके मनुष्य का पुत्र होने की हर गवाही झूठी है। यह बस एक इंसान में आस्था रखना है। वे न सिर्फ कलीसियाओं से कहे गए पवित्र आत्मा के वचनों की खोज और पड़ताल नहीं कर पाते, परमेश्वर की वाणी खोज और सुन नहीं पाते, बल्कि धार्मिक मसीह-विरोधियों का अनुसरण भी करते हैं, और निरंतर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की आलोचना, निंदा और तिरस्कार करते हैं। तभी उन्होंने अब तक प्रभु का स्वागत नहीं किया है, बल्कि आपदाओं में पड़कर रोते और दांत पीसते हैं, इस बात से अनजान कि वे जिएंगे या मरेंगे। कई लोगों का एक सवाल है। पुनरुत्थान के बाद चालीस दिनों के लिए प्रभु यीशु आत्मा के रूप में प्रकट हुआ था, इसलिए उसे आत्मा के रूप में ही वापस आना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर आत्मा के बजाय देहधारी मनुष्य के पुत्र के रूप में क्यों आयेगा? बहुत-से लोग यह सवाल पूछते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर को इसलिए अस्वीकार कर देते हैं कि वह देह के रूप में है, आत्मा के रूप में नहीं। कितनी शर्म की बात है! वे उद्धार का अपना आखिरी मौका गँवा रहे हैं, जिसके लिए वे अनंत काल तक पछताएँगे। अब मैं इस सवाल पर संगति करूंगा कि अंत के दिनों में परमेश्वर आत्मा के बजाय देह में क्यों प्रकट हुआ है?

पहले तो जहां तक अंत के दिनों में प्रभु के प्रकट होकर कार्य करने की बात है, हम पुष्टि कर सकते हैं कि प्रभु यीशु अंत के दिनों में मनुष्य के पुत्र के रूप में अपना काम करने के लिए संसार में लौटा है। यह स्वयं प्रभु यीशु द्वारा की गई अनेक भविष्यवाणियों पर आधारित है, कोई इंसानों द्वारा तय की गई चीज नहीं है। प्रभु आत्मा के रूप में लौटेगा या मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारी होकर, यह परमेश्वर ने बहुत पहले ही तय कर दिया था, इसमें इंसान की कोई मरजी नहीं है। इंसान होने के नाते हम बस समर्पण ही कर सकते हैं, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से चीजों को सीमित नहीं कर सकते। असल में, अगर परमेश्वर के प्रकट होने का तरीका इंसानी धारणा से अलग है भी, तो भी ये सबसे अच्छा है, और हमारे उद्धार के लिए सबसे सार्थक और लाभकारी है। यह गलत नहीं हो सकता। हम अपनी कल्पना के आधार पर इसके प्रति दृष्टिकोण नहीं अपना सकते। हमें बुद्धिमान कुंआरी बनना चाहिए, मूर्ख नहीं। यह प्रभु के प्रकटन के स्वागत का एकमात्र तरीका है। लोग अपने द्वारा तय की गई सीमाओं के अनुसार चलने पर अड़े रहते हैं, प्रभु के बादल पर आने के अलावा सारी बातों से इनकार करते हैं, देहधारी मनुष्य के पुत्र को अस्वीकार करते हैं। इस रवैये के क्या नतीजे होंगे? वे निश्चित रूप से आपदाओं में पड़कर दंडित होंगे, स्वयं को बरबाद करेंगे। अगर हम बुद्धिमान कुंआरियां हैं, तो हमें प्रभु की अपेक्षाएँ पूरी करनी चाहिए, उसका स्वागत करने के लिए परमेश्वर की वाणी खोजनी और सुनना चाहिनी, प्रभु चाहे जो भी रूप ले, हमें आनंद से उसे स्वीकारना और समर्पित होना चाहिए, खुद चुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वरना हम मूर्ख कुंआरियां बनकर आपदा में पड़ जाएंगे, रोएंगे और दांत पीसेंगे। तो अंत के दिनों में असल में क्या होता है? परमेश्वर आत्मा के रूप में लौटता है या मनुष्य के पुत्र के रूप में? पहले इस बारे में बात करते हैं कि परमेश्वर के आत्मा से बात करना आसान है या मनुष्य के पुत्र से। उसके लिए हमसे आत्मा के जरिये बात करना आसान है या देह के जरिये? अनेक लोग कहेंगे कि मनुष्य के पुत्र के लिए दोनों चीजें आसान हैं। यह सही है। इसीलिए अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने देह में प्रकट होकर काम किया। प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र था। वह इंसानों के बीच रहा, उसने हमारे साथ खाया, पिया और जीवन जिया। बहुत लोगों ने प्रभु का अनुसरण किया, उसके साथ संगति और बातचीत की। यह बहुत ही आसान था, इसमें किसी तरह का प्रतिबंध या बाधा नहीं थी। उन सभी ने प्रभु यीशु की मनोहरता देखी। प्रभु यीशु द्वारा सिंचन, पोषण और सहारा पाकर लोग बहुत-से सत्य जानने में समर्थ हुए। प्रभु के अनेक सत्य व्यक्त करने के बाद उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया, और वह इंसान के लिए पापबलि बन गया। कोई भी व्यक्ति प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता मानकर, उसके सामने पाप स्वीकार कर और पश्चात्ताप कर अपने पाप क्षमा करवा सकता था। फिर वे पाप क्षमा होने के आनंद, शांति और परमेश्वर के अनुग्रह का सुख ले सकते थे। प्रभु के क्रूस पर चढ़ाए जाने, फिर जी उठने और स्वर्ग जाने के बाद, ज्यादा से ज्यादा लोग उसका सुसमाचार साझा करने लगे, और परमेश्वर के प्रकटन और उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह की गवाही देने लगे। प्रभु यीशु का सुसमाचार बहुत पहले ही दुनिया के हर देश में फैल चुका है। इससे साबित होता है कि इंसान को छुटकारा दिलाने और बचाने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर का देह बनना सबसे प्रभावकारी है। लोग परमेश्वर के आत्मा को देख या छू नहीं सकते—वे इस तरह उससे बात नहीं कर सकते। हम परमेश्वर के आत्मा से बात नहीं कर सकते। जब परमेश्वर का आत्मा बोलता है, सभी भय से काँपते हैं। इस तरह बात कैसे की जा सकती है? साथ ही, परमेश्वर के आत्मा को क्रूस पर भी नहीं चढ़ाया जा सकता। जिसे लोग देख या छू ही नहीं सकते, उसे क्रूस पर कैसे चढ़ा सकते हैं, है ना? ये दिखाता है कि परमेश्वर के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में काम करना सबसे उत्तम है। जब प्रभु यीशु ने इंसान को छुड़ाने का अपना काम पूरा कर लिया, तो परमेश्वर महिमा-मंडित हुआ। इसे सभी स्पष्ट देख सकते हैं। प्रभु यीशु के कार्य के तथ्यों से हम निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर के इंसान को बचाने के कार्य में, चाहे वह छुटकारे का काम हो या अंत के दिनों का न्याय-कार्य, मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण सबसे उपयुक्त है। इससे सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं। साथ ही, अंत के दिनों में परमेश्वर का मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण करना प्रभु यीशु की इस भविष्यवाणी को भी पूरा करता है: "मनुष्य के पुत्र का भी आना," "मनुष्य का पुत्र आ जाएगा," और "मनुष्य का पुत्र अपने दिन में प्रगट होगा।" जिन्होंने बाइबल अच्छे से पढ़ी है, वे देख सकते हैं कि प्रभु के वचन पूरे हो गए हैं। तो क्यों इतने सारे लोग मनुष्य के पुत्र के प्रकट होने और कार्य करने को लेकर धारणाओं से चिपके रहते है? अभी भी कई लोग इस बात पर क्यों जोर देते हैं कि प्रभु बादल पर आत्मा के रूप में आएगा? ऐसा करना बेवकूफी और नादानी है। परमेश्वर मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होकर विनम्रता से और छिपकर काम करता है, केवल इसलिए नहीं कि यह सबसे प्रभावकारी है, बल्कि इसलिए भी कि हम उसके स्वभाव के साथ-साथ यह देख सकें कि उसकी विनम्रता, उसका छिपाव कितना मनोहर है। मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर सीधे इंसान के सामने आता है, हमसे रूबरू होता है, हमारे साथ खाता-पीता और जीता है, हमारा सिंचन और चरवाही करने और हमें बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता है। ये परमेश्वर का महान प्रेम है! लोगों को यह दिखाई क्यों नहीं देता? जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : "परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सीधे पवित्रात्मा की पद्धति और पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं बचाया जाता, क्योंकि उसके पवित्रात्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न ही देखा जा सकता है, और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। यदि उसने पवित्रात्मा के दृष्टिकोण के उपयोग द्वारा सीधे तौर पर मनुष्य को बचाने का प्रयास किया होता, तो मनुष्य उसके उद्धार को प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता, तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उस तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं है, बहुत हद तक वैसे ही जैसे कोई मनुष्य यहोवा के बादल के पास नहीं जा सकता था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, अर्थात् अपने वचन को उस देह में, जो वह बनने वाला है, रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में ढाल सकता है, जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को देख और सुन सकता है, और इससे भी बढ़कर, उसके वचन को ग्रहण कर सकता है, और इसके माध्यम से पूरी तरह से बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देह नहीं बना होता, तो कोई भी देह और रक्त से युक्त मनुष्य ऐसे बड़े उद्धार को प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया गया होता। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों के बीच सीधे तौर पर काम करता, तो पूरी मानवजाति खत्म हो जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाकर ले जाई गई होती। ... केवल देह बनकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के दुःख का अनुभव कर सकता है, और एक सामान्य देह में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह मनुष्यों को उस व्यावहारिक मार्ग की आपूर्ति कर सकता है, जिसकी उन्हें एक सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य के शरीर और रक्त का होने के कारण, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, और उस तक पहुँचने का उपाय तो बिलकुल भी नहीं है। मनुष्य केवल परमेश्वर के देहधारी स्वरूप के संपर्क में ही आ सकता है, और केवल इस माध्यम से ही सभी मार्गों और सभी सत्यों को समझने में सक्षम हो सकता है, और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')। "भ्रष्ट मनुष्य के लिए सबसे अधिक मूल्य रखने वाला कार्य वो है जो सटीक वचन, अनुसरण के लिए स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जिसे देखा या स्पर्श किया जा सके। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल वास्तविक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और दूषित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पूर्व के भ्रष्ट और पथभ्रष्ट स्वभाव से बचा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन एकदम स्पष्ट हैं। अंत के दिनों के न्याय-कार्य के लिए देह बनकर ही परमेश्वर इंसान को पूरी तरह शुद्ध करके बचा सकता है, और हमें एक सुंदर मंजिल की ओर ले जा सकता है। हमने खुद सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अपने बीच, अपने साथ जीते हुए देखा है, वो सदा सत्य पर संगति करने और व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए मौजूद रहता है। वो इंसान की भ्रष्टता देखता है, अपने वचन लिखता और हमें सत्य प्रदान करता है। हम सच में उसके वचनों का आनंद लेते हैं और हमारी आत्माएँ मुक्त हो जाती हैं। जब वो हमारे साथ सत्य पर संगति करता है, तो हम उससे सवाल पूछ सकते हैं, वो धैर्य से उनका जवाब देता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे बीच रहता और हमारे साथ संगति और बातचीत करता है। हमारा हर शब्द, हाव-भाव और विचार परमेश्वर के समक्ष बिल्कुल स्पष्ट है, उसकी आंखों के सामने है। वह कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकता है, हमारे शैतानी स्वभाव, अपने बारे में हमारी धारणाओं और कल्पनाओं को सामने ला सकता है, हमारी आस्था की त्रुटियाँ और अनुसरण के गलत दृष्टिकोण सुधार सकता है। इस तरह देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से हमारा सिंचन और चरवाही करता है, रूबरू होकर हमें सिखाता और सहारा देता है। हमारे लिए यह एक अद्भुत, दिल को छू लेने वाला अनुभव है। परमेश्वर अत्यंत प्यारा और सुलभ है। हम परमेश्वर के असंख्य प्यारे पहलू देखते हैं और दिल से उसे प्यार करते हैं। मसीह बहुत-से सत्य व्यक्त करता है और बड़ा ही महान काम कर रहा है, पर वह विनम्र और छिपा हुआ है, कभी परमेश्वर होने का दिखावा या प्रदर्शन नहीं करता। हमारे साथ वो बड़े आराम और गर्मजोशी से बात करता है, कभी किसी पर जोर नहीं डालता कि वे उसकी सुनें। मसीह में थोड़ा-सा भी अहंकार या घमंड नहीं है। मसीह के वचन विश्वासयोग्य हैं, उनमें झूठ, दिखावा या चालबाजी नहीं है। वह हमसे परिवार के सदस्यों की तरह व्यवहार करता है, सच्चाई से हमसे बातचीत करता है। ये हमारे दिलों को छू लेता है। हम देख सकते हैं कि मसीह की मानवता में कोई भ्रष्टता नहीं है। उसमें सामान्य मानवता है—दयालु और पवित्र मानवता। हमारा पोषण कर हमें सहारा और मार्गदर्शन देने के लिए मसीह कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकता है। इससे हमें और विश्वास हो गया है कि मसीह में केवल सामान्य मानवता नहीं, बल्कि दिव्य सार भी है। वो सच में परमेश्वर का प्रकटन है, देह में व्यावहारिक परमेश्वर। अब तक मसीह का अनुसरण कर हम जान गए हैं कि मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। उसके अलावा कोई भी प्रसिद्ध या महान व्यक्ति सत्य व्यक्त कर इंसान को नहीं बचा सकता। परमेश्वर के देहधारी रूप में हम उसके स्वरूप को बहुत अच्छे से देख पाते हैं। हम मसीह का दिव्य सार देखते हैं,और हम देखते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव पवित्र और धार्मिक है। हम ये भी देखते हैं कि परमेश्वर कितना विनम्र और छिपा हुआ है, वो बहुत ही दयालु और सुंदर है। ये हमें परमेश्वर के करीब लाता है, जिससे हम उसे समर्पित होकर प्रेम कर पाते हैं। देहधारी होकर इंसान को बचाने का परमेश्वर का कार्य बहुत सार्थक है। यह न सिर्फ परमेश्वर और इंसान के बीच की दूरी कम करता है, बल्कि हमें परमेश्वर के बारे में व्यावहारिक ज्ञान और समझ भी देता है परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य से ही हम धीरे-धीरे सत्य को समझकर वास्तविकता में प्रवेश कर पाते हैं, अहंकार और कपट जैसे भ्रष्ट स्वभावों से खुद को छुड़ा पाते हैं। हम सच्चे इंसान की तरह जीते हैं और परमेश्वर के उद्धार का अनुग्रह पाते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य से हम महसूस करते हैं कि देह में परमेश्वर का कार्य कितना व्यावहारिक और सच्चा है! अगर परमेश्वर देहधारण ना करता, तो हम परमेश्वर से इतना वास्तविक सिंचन और पोषण कभी नहीं पाते, सत्य को समझने और पाने, पाप से मुक्त होने और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह बचाए जाने की तो बात ही छोड़ो। ये परमेश्वर द्वारा देह में अपना न्याय-कार्य करने से ही संभव है।

तो अब सभी को स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर ने सत्य व्यक्त करने और न्याय-कार्य करने के लिए देहधारण किया है, जो पूरी तरह इंसान को शुद्ध करने और बचाने के लिए है। अगर परमेश्वर आत्मा के रूप में प्रकट होकर कार्य करता, तो हम भ्रष्ट लोगों को सत्य को समझने और पाने का मौका नहीं मिलता, हम कभी भी अपनी भ्रष्टता छोड़कर परमेश्वर द्वारा बचाए नहीं जाते। इसमें ज़रा-भी शक नहीं है। लेकिन धार्मिक जगत के बहुत-से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अनेक सत्य व्यक्त करते तो देखते हैं, उसके वचनों के अधिकार और सामर्थ्य को स्वीकारते भी हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि वो आम रंग-रूप वाला मनुष्य का पुत्र है, वे यह कहकर उसकी आलोचना और निंदा करते हैं कि वो इंसान है, परमेश्वर नहीं। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकटन और कार्यों का पागलों की तरह विरोध, तिरस्कार और निंदा तक करते हैं। इसे देखकर 2000 साल पहले का समय याद आता है, जब प्रभु यीशु कार्य करने आया था। चूँकि प्रभु यीशु देखने में बिल्कुल सामान्य था, इसलिए फरीसियों ने उसे एक आम इंसान समझा और यह कहकर उसकी आलोचना की, "क्या यह नाजरी नहीं है?" "क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है?" उसके बहुत सत्य व्यक्त करने और बड़े-बड़े चमत्कार दिखाने के बाद भी फरीसियों ने कोई खोज नहीं की और उसे स्वीकार नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने प्रभु यीशु की यह कहते हुए आलोचना और निंदा की कि वह हैवानों के राजा की मदद से दुष्ट आत्माओं को निकालता है, और अंतत: उन्होंने सबसे जघन्य पाप करते हुए उसे क्रूस पर चढ़ा दिया। उन्हें परमेश्वर का शाप और दंड मिला। परमेश्वर ने अब दूसरी बार मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होकर कार्य किया है। फिर लोग क्यों मसीह को पहचानने के बजाय उसका विरोध और निंदा करते हुए उसे अस्वीकार करते हैं? उनसे कहां गलती हो रही है? उनकी गलती है कि वे बस बाहर से देखते हैं कि मसीह आम इंसान दिखता है। वे जांच नहीं करते, और मसीह द्वारा व्यक्त सभी सत्य नहीं पहचानते। वे मसीह का दिव्य सार नहीं देखते, बल्कि अपनी इंसानी धारणाओं के कारण उससे लड़ते और उसकी निंदा करते हैं। इसलिए उन्हें इसके कारण दंड और शाप मिलता है। प्रभु यीशु ने कहा था, "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है" (यूहन्ना 3:36)। जो कोई भी सत्य व्यक्त करने वाले मनुष्य के पुत्र की निंदा और विरोध करता है, वह पवित्र आत्मा की निंदा करने का पाप करता है, और उसे न इस दुनिया में क्षमा किया जा सकता है, न अगली दुनिया में। बुद्धिमान कुंआरियों को परमेश्वर की वाणी सुनना और सत्य खोजना सीखना चाहिए। अंत के दिनों में प्रभु मनुष्य के पुत्र के रूप में बोलते और कार्य करते हुए वापस आया है। जो उसे स्वीकारते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं। जो मनुष्य के पुत्र को अस्वीकार कर उसका विरोध और निंदा करते हैं, वे सत्य से घृणा करते हैं। मनुष्य के पुत्र के प्रकटन और कार्य द्वारा परमेश्वर सभी की सच्चाई उजागर करता है। यह परमेश्वर की बुद्धि है, और यह उसकी सर्वशक्तिमत्ता दिखाता है।

अंत में हम परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश देखते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस बार, परमेश्वर कार्य करने आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। इसके अलावा, यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण का देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में तुम ऐसा कुछ नहीं देख सकते जो इसे दूसरों से अलग करता हो, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में पहले कभी नहीं सुना गया। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य के वचनों का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के काम की ज़िम्मेदारी लेता है, और मनुष्यों के समझने के लिये परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को अभिव्यक्त करता है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा—वो रहस्य जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, और नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है। ऐसी साधारण देह अनेक अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। उसके कार्य तुम्हारे लिए गूढ़ हो सकते हैं, परंतु उसके कार्य का संपूर्ण लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते-से लगते हैं, यद्यपि उसकी आग की लपटों जैसी आँखें नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन नहीं पा सकते, तुम उसके वचनों से सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित है, और जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है; तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर को जानें, उसकी आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करें। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटकर आया है। यद्यपि आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर मनुष्यों के ही समान है, उसकी एक नाक और दो आँखें हैं और वह एक साधारण परमेश्वर है, अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह मनुष्य नहीं होता तो स्वर्ग और पृथ्वी एक अभूतपूर्व बदलाव से होकर गुज़रते; अगर यह मनुष्य नहीं होता तो, स्वर्ग मद्धिम हो जाता, पृथ्वी पर उथल-पुथल हो जाती, समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जीती। परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि यदि अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए नहीं आया होता तो परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सदैव ही कट्टर पापी होते, और तुम हमेशा के लिए लाश बन जाते। तुम सबको यह जानना चाहिये कि यदि यह देह नहीं होता तो समस्त मानवजाति को एक अवश्यंभावी संकट का सामना करना होता, और अंत के दिनों में मानवजाति के लिये परमेश्वर के कठोर दण्ड से बच पाना कठिन होता। यदि इस साधारण शरीर का जन्म नहीं होता तो तुम सबकी दशा ऐसी होती जिसमें तुम लोग जीने में सक्षम न होते हुए जीवन की भीख माँगते और मृत्यु के लिए प्रार्थना करते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सत्य को नहीं पा सकते थे और न ही आज परमेश्वर के सिंहासन के पास आ पाते, बल्कि तुम लोग परमेश्वर से दण्ड पाते क्योंकि तुमने जघन्य पाप किये हैं। क्या तुम सब जानते हो, यदि परमेश्वर वापस देह में लौटा न होता, तो किसी को भी उद्धार का अवसर नहीं मिलता; और यदि इस देह का आगमन न होता, तो परमेश्वर ने बहुत पहले पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? अब जबकि यह स्पष्ट है, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरी बार के देहधारण को नकार सकते हो? जब तुम लोग इस साधारण मनुष्य से इतने सारे लाभ प्राप्त कर सकते हो, तो तुम लोग उसे प्रसन्नतापर्वूक स्वीकार क्यों नहीं करते हो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')

"अंत के दिनों में परमेश्वर के सभी काम इस साधारण मनुष्य के द्वारा किये जाते हैं। वह तुम्हें सब कुछ प्रदान करेगा और वह तुमसे जुड़ी हर बात तय कर सकेगा। क्या ऐसा व्यक्ति वैसा हो सकता है जैसा तुम लोग सोचते हो : एक ऐसा व्यक्ति जो इतना अधिक साधारण है कि वह उल्लेख करने योग्य भी नहीं है? क्या उसका सत्य तुम लोगों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? क्या उसके कार्य की गवाही तुम लोगों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करने योग्य नहीं है? या फिर वह मार्ग जिसे वह लाता है, इस योग्य नहीं है कि तुम लोग उसका अनुसरण करो? सबकुछ कहने करने के बाद वह कौन-सी बात है जिसके कारण तुम लोग उससे घृणा करते हो और उसे अपने आप से दूर रखते हो और उससे बचकर रहते हो? यही व्यक्ति सत्य की अभिव्यक्ति करता है, यह वही व्यक्ति है जो सत्य प्रदान करता है, और यह वही व्यक्ति है जो तुम लोगों को अनुसरण करने का मार्ग प्रदान करता है। क्या अब भी तुम लोगों को इन सत्यों के भीतर परमेश्वर के कार्य के संकेत नहीं मिल पा रहे? यीशु के कार्य के बिना मानवजाति सूली से उतर नहीं सकती थी, परन्तु बिना आज के देहधारण के वे लोग कभी परमेश्वर की सराहना नहीं पा सकते या नये युग में प्रवेश नहीं कर सकते जो सूली से उतर गए हैं। इस साधारण मनुष्य के आगमन के बिना, तुम लोगों को कभी भी यह अवसर नहीं मिलता या तुम लोग कभी भी इस योग्य नहीं हो सकते थे कि परमेश्वर के सच्चे मुखमंडल का दर्शन कर सको, क्योंकि तुम लोग ऐसी वस्तु हो जिसे बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। परमेश्वर के द्वितीय देहधारण के आगमन के कारण, परमेश्वर ने तुम लोगों को क्षमा कर दिया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर, मैं अंत में इन वचनों के साथ तुम लोगों से विदा लेना चाहता हूँ : यह साधारण मनुष्य जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। यही वह सबसे बड़ा काम है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले ही कर दिया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')

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