परमेश्वर अंत के दिनों में न्याय-कार्य क्यों करता है?

26 दिसम्बर, 2021

आज महामारी पूरी दुनिया में फैल रही है, आपदाएँ विकराल होती जा रही हैं। हमने भूकंप, अकाल और युद्ध देखे हैं, और सभी विश्वासी उत्सुकता से उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के आने की राह देख रहे हैं, जिनसे मिलने के लिए वे आकाश में उठा लिए जाएंगे और जल्द-से-जल्द इन आपदाओं के कष्ट से बच जाएँगे। लेकिन इतने वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद भी, उन्होंने अभी तक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु को बादलों पर उतरते हुए नहीं देखा, प्रभु से मिलने के लिए किसी को आकाश में उठाए जाते देखने की तो बात ही छोड़ो, जिससे बहुत लोग निराश हो गए हैं। लोगों को इस बात से बड़ा अचरज होता है कि यीशु के बादलों पर आगमन का स्वागत करने के बजाय वे देख रहे हैं कि चमकती पूर्वी बिजली बारम्बार गवाही दे रही है कि प्रभु यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आया है और सत्य व्यक्त करता है और न्याय-कार्य करता है। यह गवाही लोगों का ध्यान खींच लेती है, जिससे वे इसे स्पष्ट समझ लेते हैं। फिर भी, सीसीपी द्वारा अंधाधुंध दमन और गिरफ्तारियों और धार्मिक संसार की मसीह-विरोधी ताकतों द्वारा जबरदस्त ईशनिंदा और बदनामी के कारण लोगों ने सच्चे मार्ग की पड़ताल नजरअंदाज और ख़ारिज कर दिया है। सिर्फ कुछ ही वर्षों में, एकाएक मनुष्य के पुत्र ने, जिसे इतनी नीची निगाह से देखा जाता था, बहुत ज्यादा सत्य व्यक्त किया, ज्यादा-से-ज्यादा लोगों ने परमेश्वर की वाणी सुनी, और सभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने को तैयार हो गए। इस बात ने न सिर्फ धार्मिक संसार में, बल्कि पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है, वचन देह में प्रकट होता है सच्चे प्रकाश की तरह पूर्व से पश्चिम तक चमक रहा है, पूरी दुनिया को रोशन कर रहा है, और जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं परमेश्वर के प्रकटन के के लिए तरसते हैं, रोशनी के पास आ जाते हैं, परमेश्वर की वाणी सुनते हैं, और मेमने के विवाह-भोज में शामिल होते हैं। इन तथ्यों ने सभी को चकित कर दिया है : "यह किस तरह का व्यक्ति है? कहाँ से आया है? इसने इतना सशक्त कार्य कैसे किया?" बहुत-से लोगों ने पूछा है : "क्या चमकती पूर्वी बिजली वास्तव में परमेश्वर की अभिव्यक्ति और कार्य है?" "क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन इंसानों से बोलती सृजनकर्ता की वाणी हों?" उन्हें लगता है, "असंभव है," "जब प्रभु लौटकर आएगा, तो सबसे पहले वह विश्वासियों को खुद से मिलवाने के लिए आकाश में उठाएगा। वह कभी भी अपने विश्वासियों को आपदा में डूबने नहीं देगा, न ही न्याय-कार्य करने के लिए बातें करेगा। ऐसा नहीं हो सकता।" आज बहुत-से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की फ़िल्में, भजन और गवाही की वीडियो, और सबसे बढ़कर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के पाठ देख रहे हैं। सामग्री का समृद्ध सागर मौजूद है, और कनान में जीवन-यापन सच में एक अद्भुत अनुभव है। यह तथ्य लोगों को यह मानने पर मजबूर करता है कि इसे सिर्फ पवित्र आत्मा का कार्य ही हासिल कर सकता है, किसी इंसान का नहीं। परमेश्वर के प्रकटन और कार्य के बिना कोई भी ऐसी महान चीजें संपन्न नहीं कर सकता। यह प्रभु के अनेक विश्वासियों को सोचने पर मजबूर कर देता है : अंत के दिनों में परमेश्वर न्याय-कार्य क्यों करता है? हमें हमारे पापों के लिए माफ़ कर दिया गया है, परमेश्वर ने हमें धर्मी ठहराया है, तो फिर हमें न्याय और ताड़ना का अनुभव करने की क्या जरूरत है? अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का निशाना अविश्वासी होने चाहिए, तो फिर न्याय परमेश्वर के घर से क्यों शुरू होता है? आखिर हो क्या रहा है? आज की हमारी संगति इसी विषय पर केंद्रित होगी।

संगति शुरू करने से पहले, आइए हम स्पष्ट समझ लें, कि इस तथ्य की व्यवस्था, कि परमेश्वर अंत के दिनों में न्याय-कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारी होकर आएगा, परमेश्वर ने बहुत पहले कर दी थी। लोगों की धारणाएं चाहे जो हों, रुकावटें कितनी भी बड़ी हों, अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य को इंसानी इच्छा से बदला नहीं जा सकता, और कोई भी देश या ताकत इसे रोक नहीं सकती। तो कुछ लोग पूछेंगे, क्या अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य का बाइबल में कोई आधार है? बेशक, बाइबल में आधार है, और वह बहुत मजबूत है। पूरी बाइबल में "न्याय" के कम-से-कम दो सौ संदर्भ हैं, और प्रभु यीशु ने खुद भी भविष्यवाणी की थी कि अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और न्याय-कार्य करने के लिए वह देहधारी मनुष्य के पुत्र के रूप में लौटकर आएगा। अब, आइए प्रभु यीशु की भविष्यवाणी के कुछ अंश सूचीबद्ध करें। "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)। "पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है, ... वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है" (यूहन्ना 5:22, 27)। "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। साथ ही 1 पतरस 4:17 भी है, "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए।" ये वचन बहुत स्पष्ट हैं : "अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा," "न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है," "पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए," और "तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा।" हम देख सकते हैं कि अंत के दिनों में प्रभु सत्य व्यक्त करने और परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप लौटकर आएगा। यह निर्विवाद है। आज सर्वशक्तिमान परमेश्वर बहुत सत्य व्यक्त करता है, और परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय-कार्य करता है, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आने वाले सभी लोगों का न्याय कर उन्हें शुद्ध करने और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सभी सत्यों में प्रवेश कराने के लिए है। और परमेश्वर ने आपदा से पहले विजेताओं का एक समूह बनाया है। इससे हम समझ सकते हैं कि ये भविष्यवाणियाँ पूरी तरह से साकार हो गई हैं।

तो कुछ लोग पूछेंगे, हम प्रभु में विश्वास रखते हैं, इसलिए हमारे पापों को माफ किया जा चुका है, तो हमें अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने की क्या जरूरत है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य के इस रहस्य को प्रकट करते हैं, तो आइए देखें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या कहता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। ... क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ... मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने जो किया, वह छुटकारे का कार्य था। अगर हम प्रभु में विश्वास रखें, अपने पाप स्वीकार कर प्रायश्चित करें, तो हमारे पाप माफ कर दिए जाते हैं। अब हमें व्यवस्था भंग करने के लिए निंदित और दंडित नहीं किया जाता, और हम प्रभु के भरपूर अनुग्रह का आनंद उठा सकते हैं। लेकिन क्या पापों की माफी का अर्थ यह है कि हम पाप से मुक्त हैं और पवित्र बना दिए गए हैं? क्या पापों की माफी का अर्थ यह है कि हम परमेश्वर के प्रति सच्चे आज्ञाकारी हो गए हैं? बिल्कुल नहीं। हम सब स्पष्ट देखते हैं कि विश्वासी दिन में पाप करते हैं और रात में अपने पाप स्वीकार कर लेते हैं। हम इस कुचक्र में फंसे हुए जी रहे हैं, अक्सर अनजाने ही पाप करते हैं, और हम सब प्रभु से प्रार्थना करते हैं, "मैं सच में कष्ट झेल रहा हूँ, मैं पाप के बंधनों से खुद को छुड़ा क्यों नहीं पा रहा हूँ?" हम सभी सांसारिक बंधनों से खुद को छुड़ाकर प्रभु के लिए खपना चाहते हैं, हम सच्चे दिल से प्रभु से प्रेम करना चाहते हैं, अपने पड़ोसियों से खुद जैसा प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन हम जो करते हैं, वो अनचाहे कर बैठते हैं, हम अकसर झूठ बोलने की समस्या भी नहीं सुलझा पाते। ऐसा क्यों है? क्योंकि लोगों की प्रकृति पापी है, उनका स्वभाव भ्रष्ट है, और यही है पाप का मूल। अगर हम पाप के मूल को ख़त्म नहीं करते, तो हम खुद को रोकने की कोशिश करने के बावजूद अनचाहे ही पाप करते रहते हैं। हालांकि कुछ लोग प्रभु के लिए ईमानदारी से खप सकते हैं, बिना शिकायत किए कष्ट झेल सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं, लेकिन दिल की गहराई से क्या वे सच में परमेश्वर की आज्ञा मान सकते हैं? क्या वे सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं? बहुत-से लोग इस मामले को स्पष्ट नहीं समझ पाते। आशीष पाने, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और पुरस्कार पाने के लिए लोग बहुत-से नेक काम कर सकते हैं, लेकिन इन नेक कामों में कैसी अशुद्धियाँ मिली होती हैं? क्या ये सौदों और मंशाओं से दूषित नहीं होतीं? अगर आपदा आए, और हमें ऊपर न उठाया जाए, बल्कि उसमें डाल दिया जाए, तो क्या हम परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करेंगे? क्या हम परमेश्वर को दोष देंगे, उसे नकार देंगे? जब परमेश्वर का कार्य इंसानी धारणाओं के अनुरूप होता है, तो हम उसे धन्यवाद देते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं, लेकिन अगर परमेश्वर का कार्य हमारी धारणाओं और इच्छा के अनुरूप न हो, तो क्या हम उसकी आलोचना और निंदा करेंगे? उदाहरण के लिए, जब प्रभु यीशु अपने नाम पर प्रचार करने और दुष्टात्माओं को निकालने वाले लोगों से कहता है, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ" (मत्ती 7:23)। तो क्या वे लोग धारणाएं बना लेंगे और प्रभु का प्रतिरोध और निंदा करेंगे? मान लीजिए कि अगर प्रभु यीशु अभी भी यहूदी मनुष्य के पुत्र की छवि में आए, और कलीसियाओं में सत्य व्यक्त करे, तो धार्मिक संसार के कितने लोग प्रभु को नकारकर उससे दूर हो जाएंगे? कितने लोग प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सत्य को स्वीकार करेंगे, और कहेंगे कि वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर है? कितने लोग प्रभु यीशु को परमेश्वर के बजाय मनुष्य कहकर उसकी निंदा करेंगे? ये तथ्य चिंतन करने लायक हैं। यहूदी धर्म के फरीसी वे लोग थे, जिन्होंने पीढ़ियों तक परमेश्वर में विश्वास रखा था, और जो अक्सर परमेश्वर को पाप-बलि चढ़ाते थे। जब यहोवा परमेश्वर देहधारी होकर प्रभु यीशु बन गया, तो फरीसी यह क्यों नहीं जान पाए कि वह यहोवा परमेश्वर का प्रकटन है? उन्होंने सत्य व्यक्त करने वाले प्रभु यीशु की निंदा क्यों की? प्रभु यीशु को सूली पर क्यों चढ़ा दिया गया? इस समस्या का सार क्या है? फरीसी परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को क्यों नहीं जान पाए, जबकि उनके पूर्वज पीढ़ियों तक परमेश्वर में विश्वास रखते आए थे? फिर भी उन्होंने परमेश्वर की निंदा और प्रतिरोध क्यों किया? हम सबने अपनी आँखों से देखा है कि अंत के दिनों में परमेश्वर ने देहधारी मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होकर बहुत सत्य व्यक्त किया है। तो फिर धार्मिक संसार के इतने लोग क्यों सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंधाधुंध प्रतिरोध, निंदा और यहाँ तक कि ईशनिंदा तक करते हैं, अगर प्रभु यीशु लौट आता, और अभी भी उसकी छवि यहूदी मनुष्य के पुत्र जैसी होती और वह धार्मिक संसार में सत्य व्यक्त करता, तो क्या उसे कलीसिया से बाहर न भगा दिया जाता, यहाँ तक कि दंडित कर मौत के घाट न उतार दिया जाता? ये सब बहुत संभव है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की ही तरह सत्य व्यक्त करता है, और दोनों सामान्य हैं, मनुष्य के साधारण पुत्र। धाम्रिक संसार सर्वशक्तिमान परमेश्वर का इतना अंधाधुंध प्रतिरोध करता है, तो क्या वह प्रभु यीशु के मनुष्य के पुत्र की छवि में होने पर उसे ज्यादा स्वीकार करते? धाम्रिक संसार अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने वाले लोगों की आलोचना क्यों करता है, कि वे परमेश्वर के बजाय एक इंसान में विश्वास रखते हैं? अगर वे प्रभु यीशु के जमाने में पैदा हुए होते, तो क्या वे प्रभु यीशु में विश्वास रखने वालों को परमेश्वर के बजाय एक इंसान में विश्वास रखने वाले लोग नहीं मानते? तो फिर इस समस्या का सटीक सार क्या है? ऐसा इसलिए होता है कि तमाम भ्रष्ट इंसान शैतानी प्रकृति के होते हैं, और हम सभी शैतानी स्वभाव के साथ जीते हैं। इसलिए यह बिल्कुल भी अजीब नहीं है कि हम परमेश्वर का प्रतिरोध और निंदा करते हैं। बहुत-से लोग इसे साफ़ तौर पर नहीं समझते। वे सोचते हैं कि जब हमारे पाप माफ हो जाते हैं और परमेश्वर हमें दोषी नहीं मानता, तो हम पवित्र हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि जब हमारे पाप माफ हो जाते हैं, तो हम नेक काम करके परमेश्वर का अनुमोदन पा सकते हैं। ये विचार बहुत गलत हैं। यह तथ्य कि फरीसियों ने प्रभु यीशु का प्रतिरोध और निंदा की, यह स्पष्ट समझाने के लिए काफी है कि लोग शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव के होते हैं, इसलिए हमें परमेश्वर में विश्वास रखे जितने भी वर्ष हो जाएं, हम बाइबल को जितना भी समझ लें, हम किसी भी युग में पैदा हुए हों, हम सब अभी भी सत्य से घृणा करते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध और निंदा करते हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। इस एकमात्र कारण से अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय-कार्य अहम है! अपनी शैतानी प्रकृति के कारण भ्रष्ट इंसान को परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार करनी चाहिए। इस न्याय और ताड़ना के बिना हम जैसे भ्रष्ट लोग हमेशा पाप और परमेश्वर का प्रतिरोध करते रहेंगे, कभी भी परमेश्वर के आज्ञाकारी या उसके अनुकूल नहीं होंगे, और हम कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने योग्य नहीं बन पाएंगे। हालांकि हम सभी जानते और समझते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, लेकिन कोई नहीं समझ सकता कि शैतान द्वारा हमारी भ्रष्टता की कैसी डरावनी हालत है, हम किस हद तक परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हैं, या सत्य व्यक्त कर सकने वाले मनुष्य के पुत्र से कितनी घृणा कर सकते हैं, अर्थात् हम किस हद तक सत्य से घृणा कर सकते हैं। लोग इनमें से किसी भी चीज स्पष्टता से नहीं समझ सकते। इसलिए हमारे मन में अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय-कार्य के बारे में हमेशा अनेक धारणाएं और शंकाएं होती हैं। सब लोग सोचते हैं कि अपने पापों के लिए माफी पाकर हम पवित्र बन जाते हैं। अगर परमेश्वर हमें पापी नहीं मानता, तो हम पवित्र हैं, परमेश्वर का उद्धार-कार्य पूरा हो गया है, परमेश्वर को न्याय-कार्य करने की जरूरत नहीं है। जब प्रभु यीशु लौटकर आएगा, तो वह हमें स्वर्ग के राज्य में ले जाएगा, और एक बार स्वर्ग पहुँच जाने के बाद इसकी गारंटी होगी कि हम हमेशा परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे, उसकी आराधना करेंगे। लेकिन क्या यह कोरी बकवास नहीं है? लोग पृथ्वी पर परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उसके अनुग्रह का आनंद लेते हैं, फिर भी वे परमेश्वर की आलोचना और निंदा करते हैं, तो फिर वे स्वर्ग में परमेश्वर की आज्ञा कैसे मानेंगे, कैसे उसकी आराधना करेंगे? यह बिल्कुल असंभव है। परमेश्वर के वचनों में कहा गया है, "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (इब्रानियों 12:14)। यह वाक्य सत्य है, और स्वर्ग का नियम है! अब हमें समझ जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर न्याय-कार्य क्यों करता है। अंतिम विश्लेषण यह है, कि परमेश्वर लोगों को पूरी तरह से बचाने, यानी हमारे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करने और बदलने, और हमें पाप और शैतान की शक्ति से बचाकर बाहर निकालने आया है। आज सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मनुष्य को शुद्ध करके बचाने के लिए जरूरी सभी सत्य व्यक्त किए हैं, और वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य कर रहा है। परमेश्वर के बहुत-से चुने हुए लोगों ने उसके न्याय का अनुभव किया है, अपने भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध किए हैं, और अब दिल की गहराई से परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता की प्रशंसा करते हैं। उन्होंने देखा है कि लोग शैतान द्वारा कितनी गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं, वे कौन-से पाप और परमेश्वर का कितना प्रतिरोध कर सकते हैं। उन्होंने अपने बारे में वास्तविक समझ हासिल की है, अपनी शैतानी भ्रष्टता की बदसूरती देखी है, और वे सब महसूस करते हैं कि अगर उन्होंने परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण का अनुभव नहीं किया, और अपने शैतानी स्वभाव में ही जीते रहे, तो वे परमेश्वर का प्रतिरोध कर उसे धोखा देते हैं, दानवों की तरह जीते हैं, परमेश्वर उन्हें नरक में भेजकर दंडित करेगा, और वे परमेश्वर के सामने जीवन जीने लायक नहीं हैं, इसलिए वे गहरा पछतावा महसूस करते हैं, खुद से घृणा करते हैं, और सच्चा प्रायश्चित और बदलाव हासिल करते हैं। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के बाद ही, हम जान पाते हैं कि परमेश्वर का न्याय-कार्य मनुष्य के लिए उसका महान उद्धार और प्रेम है।

बहुत-से लोग अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य का महत्व नहीं समझते, और सोचते हैं कि प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे का कार्य पूरा हो जाने के बाद मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया गया था और परमेश्वर का मनुष्य को बचाने का कार्य पूरा हो गया था, लेकिन यह बहुत गंभीर गलती है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')। "अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय-कार्य ने अनुग्रह का युग समाप्त कर दिया। साथ ही उसने राज्य का युग शुरू किया। अंत के दिनों में न्याय का एक पहलू लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करना और बचाना, पाप और शैतान की शक्ति से मुक्त करना, और हमें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त करने देना है। इसका दूसरा पहलू हर किस्म के लोगों को उजागर कर उन्हें उनकी किस्म के अनुसार अलग करना, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली तमाम दुष्ट ताकतों को नष्ट करना, और इस अंधेरे और दुष्ट पुराने युग को ख़त्म करना है। अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय-कार्य का यही महत्व है। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ें। "युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, ताकि वह सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय कर सके और उन लोगों को पूर्ण बना सके, जो सच्चे दिल से उसे प्यार करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ें उनके प्रकार के अनुसार अलग की जाएँगी और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाएँगी। यही वह क्षण है, जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को उजागर करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाता है, जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और समस्त मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार अलग किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँ। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपांतरित कर सकता है और उसे पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित कर सकता है। ... अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार पृथक् कर सकता है और उन्हें एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')। अंत के दिनों में परमेश्वर सत्य व्यक्त करके न्याय-कार्य करता है, जो सत्य और परमेश्वर के प्रति हर किस्म के लोगों के रवैये को प्रकट करता है। जो लोग सत्य और परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे परमेश्वर के उद्धार और पूर्णता के लक्ष्य होते हैं। वे परमेश्वर की वाणी सुनते हैं, उसके सिंहासन के सामने लौटते हैं, हर दिन परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, उसके न्याय, ताड़ना, परीक्षणों और शोधन का अनुभव करते हैं, अंतत: पाप के बंधन और नियंत्रण से मुक्त हो जाते हैं, शुद्धिकरण और अपने भ्रष्ट स्वभाव में बदलाव हासिल करते हैं, और फिर परमेश्वर द्वारा पूर्ण होकर विजेता बन जाते हैं, यानी कि प्रथम फल। लेकिन जो लोग सत्य से घृणा और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, वे परमेश्वर द्वारा त्यागे और हटा दिए जाने के लक्ष्य बन जाते हैं। वे हठपूर्वक बाइबल की इबारत से चिपके रहते हैं, और केवल प्रभु के बादलों पर आने की प्रतीक्षा करते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंधाधुंध प्रतिरोध और निंदा करते हैं। ऐसा करके वे आपदा से पहले ऊपर उठाये जाने का अपना मौक़ा गँवा देते हैं, वे तबाही में डूबेंगे, रोएँगे और अपने दांत पीसेंगे। ऐसे भी लोग हैं जो सिर्फ आशीष चाहते हैं, और आपदाओं से बचने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अनिच्छा से स्वीकारते हैं। वे सिर्फ वचन में विश्वास रखते हैं, और उनकी प्रकृति सत्य से घृणा करने की होती है। वे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, लेकिन सत्य का अभ्यास कभी नहीं करते, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, काँट-छाँट और निपटान को स्वीकारने या मानने से इनकार करते हैं, और उनका भ्रष्ट स्वभाव ज़रा-भी नहीं बदलता। ऐसे लोग गैर-विश्वासी और दुष्कर्मी होते हैं, जो परमेश्वर के घर में घुल-मिल गए हैं, उन सबको उजागर करके हटा दिया जाएगा। यह दर्शाता है कि अंत के दिनों का न्याय-कार्य हर किस्म के इंसान को पहले ही प्रकट कर चुका है। बुद्धिमान कुआँरियाँ और मूर्ख कुआँरियाँ, सत्य से प्रेम करने वाले और सिर्फ रोटी खाकर अपना पेट भरने की कोशिश करने वाले, गेहूँ और जंगली बीज, बकरियाँ और भेड़ें, सभी को अलग-अलग श्रेणियों में बाँट दिया गया है। अंतत: परमेश्वर सज्जनों को पुरस्कृत करेगा और दुर्जनों को दंड देगा, और हर किसी को उसके कर्म के अनुसार प्रतिफल देगा। यह पूरी तरह से परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को दर्शाता है, और प्रकाशितवाक्य की इन भविष्यवाणियों को पूरा करता है, "जो अन्याय करता है, वह अन्याय ही करता रहे; और जो मलिन है, वह मलिन बना रहे; और जो धर्मी है, वह धर्मी बना रहे; और जो पवित्र है; वह पवित्र बना रहे" (प्रकाशितवाक्य 22:11)। "देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ; और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिये प्रतिफल मेरे पास है" (प्रकाशितवाक्य 22:12)।

आज सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपदा से पहले ही विजेताओं का एक समूह बना चुका है, और परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय-कार्य ने महान सफलता हासिल कर ली है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पृथ्वी के सभी राष्ट्रों तक फ़ैल गए हैं, और उन्होंने दुनिया हिला दी है, और साबित कर दिया है कि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर गौरव प्राप्त कर लिया है। इसके बाद, परमेश्वर तबाही लाएगा, और सभी राष्ट्रों और लोगों का न्याय करना शुरू करेगा। तबाही आना परमेश्वर का इस दुष्ट युग के साथ न्याय है, और वह मनुष्य को बचाने के लिए भी है। परमेश्वर लोगों को सच्चे मार्ग को खोजकर उसकी पड़ताल करने, उद्धारकर्ता के प्रकटन और कार्य का पता लगाने, परमेश्वर के पास आने और उसका उद्धार स्वीकार करने के लिए मजबूर करने हेतु आपदा का उपयोग करता है। साथ ही, वह आपदा का प्रयोग परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली तमाम दुष्ट ताकतों और दुष्कर्मियों को मिटाने और शैतान की सत्ता वाले इस बुरे युग को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए करता है। अंत में, जिन सभी लोगों ने परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है और जिन्हें शुद्ध किया गया है, उन्हें आपदा के बीच परमेश्वर द्वारा बचाया जाएगा, जिसके बाद वह उन्हें एक सुंदर गंतव्य तक ले जाएगा। परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय-कार्य इसी तरह संपन्न होगा। इसके बाद, एक नई दुनिया में, पृथ्वी पर मसीह का राज्य पूरी तरह से साकार हो जाएगा।

आखिर में, आइए देखें परमेश्वर के वचनों का एक वीडियो-पाठ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की संगति में पड़ जाएँ, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जिनके द्वारा प्रदान की गई सेवा मानक स्तर की नहीं होती। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; वैसे, वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवा भी दी थी। हालाँकि जब अंतिम दिन आएगा, तो भी उन्हें अपनी दुष्टता के कारण और अवज्ञा एवं छुटकारा न पाने की योग्यता के परिणामस्वरूप हटाया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी अस्तित्व में नहीं आएँगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। ... बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')।

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