क्या यह सच है कि परमेश्वर के सभी कार्य और वचन बाइबल में हैं?
उद्धारकर्ता सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में प्रकट होकर कार्य कर रहा है, उसने करोड़ों वचन व्यक्त किए हैं। वह मनुष्य को पूरी तरह से...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रकट हुआ है और अंत के दिनों में कार्य कर रहा है, उसने एक करोड़ से अधिक वचन व्यक्त किए हैं। बहुत-से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद यह महसूस करते हैं कि इन वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है और ये सत्य हैं और उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया है। कुछ कैथोलिक विश्वासी भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य हैं। हालाँकि उनका मानना है कि परमेश्वर में विश्वास करने में उन्हें कैथोलिक धर्म की परंपरा और इतिहास का सम्मान करना चाहिए और चूँकि वे कैथोलिक धर्म से जुड़ गए हैं, इसलिए वे अन्य संप्रदायों में नहीं जा सकते। वे सोचते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करना कैथोलिक धर्म से विश्वासघात करना और परमेश्वर से विश्वासघात करना है और यह एक पाप है। इसलिए वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। तो क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करना सचमुच प्रभु यीशु से विश्वासघात करना है? जब इस सवाल की बात आती है, तो हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि एक कैथोलिक के रूप में तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो या कैथोलिक धर्म में। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें कैथोलिक धर्म से बाधित नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, क्या कैथोलिक धर्म के नियम और दावे परमेश्वर द्वारा तय किए गए हैं या मनुष्य द्वारा? क्या वे परमेश्वर की ओर से आते हैं या मनुष्य की ओर से? हमें इन बातों को स्पष्ट करना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर सत्य है; कैथोलिक धर्म सत्य नहीं है, वे कैथोलिक बिशप और पादरी भी सत्य नहीं हैं और कैथोलिक धर्म परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करता। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें कैथोलिक धर्म से बाधित नहीं होना चाहिए, बिशप और पादरियों से तो बिल्कुल भी बाधित नहीं होना चाहिए। अगर तुम लगातार उनसे बाधित रहते हो, तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे। खासकर जब प्रभु के आगमन का स्वागत करने की बात आती है, अगर तुम हमेशा बिशप और पादरियों से बाधित रहते हो, तो क्या तुम फिर भी परमेश्वर का स्वागत कर सकते हो? हम सृजित प्राणी हैं और हमारे लिए सृष्टिकर्ता के वचनों का पालन करना सही है। क्या हमेशा मनुष्य की बातों और संप्रदाय के नियमों का पालन करना मूर्खता नहीं है? तुममें इन बातों का भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। अगर यह परमेश्वर की आज्ञा है, तो हमें इसका पालन करना चाहिए। लेकिन अगर यह कैथोलिक नियम है, तो हमें इसका पालन करने की कोई जरूरत नहीं है; केवल परमेश्वर के वचनों का पालन करना ही काफी है। तुम सोचते हो कि लोगों को कैथोलिक नियमों का पालन करना ही होगा और ऐसा न करना एक पाप है। यह किस पर आधारित है? क्या परमेश्वर ने कभी ऐसा कुछ कहा है? कभी नहीं। यह साबित करता है कि ये नियम परमेश्वर की ओर से नहीं आते, बल्कि कैथोलिक धर्म के उन बिशप और पादरियों द्वारा बनाए गए थे। बिशप और पादरी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करते, इसलिए उनके द्वारा बनाए गए विनियम और दावे भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करते। ऐसे में क्या हमारे लिए अभी भी उन विनियमों का पालन करना जरूरी है? क्या तुम मनुष्य द्वारा बनाए गए विनियमों का पालन करके परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हो? इसके अलावा, तुम्हें यह भेद भी पहचानना चाहिए : क्या वे कैथोलिक बिशप और पादरी ऐसे लोग हैं जिनसे परमेश्वर प्रेम करता है? क्या वे परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं? क्या वे ऐसे लोग हैं जिनकी परमेश्वर गवाही देता है? बिल्कुल नहीं। उनमें से कई लोगों ने तो बहुत बुरे काम भी किए हैं और कैथोलिक लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं। कैथोलिक धर्म में बहुत पहले से ही पवित्रात्मा का कार्य नहीं है। क्या तुम अभी भी इन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते? अगर तुम सच में इन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो तुम बहुत अधिक भ्रमित हो! तुममें भेद पहचानने की क्षमता बिल्कुल नहीं है।
उस समय जब प्रभु यीशु प्रकट हुआ था और कार्य कर रहा था, तो धार्मिक दुनिया के मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों के साथ-साथ सत्ता में बैठे लोगों ने भी प्रभु यीशु का प्रतिरोध और निंदा की थी। उन्होंने यह कहते हुए निराधार अफवाह भी फैलाई कि प्रभु यीशु बस एक साधारण व्यक्ति है, परमेश्वर नहीं। कई धार्मिक लोग गुमराह हो गए। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्य की जाँच-पड़ताल करने की हिम्मत नहीं की और नतीजतन उन्होंने प्रभु का उद्धार नहीं पाया। अब हम अंत के दिनों में हैं। अगर हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन उसका स्वागत नहीं कर सकते, तो इसके परिणाम क्या होंगे? हम आपदाओं में फँसेंगे, सजा पाएँगे और मर जाएँगे! इसलिए परमेश्वर में विश्वास करने में हमें जिस सिद्धांत का पालन करना चाहिए वह यह है कि केवल परमेश्वर के वचन सुनें, मनुष्य की बातें नहीं। किसी भी इंसान की बातें सत्य नहीं हैं; केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। अगर लोग परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण नहीं करते, तो वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं और उसका प्रतिरोध कर रहे हैं। अगर तुम हमेशा कैथोलिक नियमों और विनियमों से चिपके रहते हो और परमेश्वर के वचन नहीं सुनते हो, तो इसके क्या परिणाम होंगे? तुम्हें यह बात साफ-साफ समझ लेनी चाहिए। अगर तुम्हें पता चलता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया परमेश्वर है लेकिन तुम कैथोलिक नियमों का उल्लंघन करने के डर से उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते, तो तुम एक मूर्ख कुंवारी बन चुके हो, तुम केवल आपदाओं में फँसोगे, रोओगे और दाँत पीसोगे। कैथोलिक धर्म सर्वशक्तिमान परमेश्वर—अंत के दिनों के मसीह—का प्रतिरोध और निंदा करता है, इसलिए तुम्हें कैथोलिक धर्म के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए, इससे अलग हो जाना चाहिए और अब इससे बंधे नहीं रहना चाहिए। तभी तुम एक बुद्धिमान कुंवारी होगे, परमेश्वर का स्वागत कर पाओगे और स्वर्ग के राज्य के भोज में शामिल हो सकोगे। अगर तुम हमेशा कैथोलिक धर्म को नाराज करने से डरते हो और कैथोलिक धर्म द्वारा निष्कासित किए जाने से डरते हो, तो यह साबित करता है कि तुम कैथोलिक धर्म में विश्वास करते हो, परमेश्वर में नहीं। क्या कैथोलिक धर्म परमेश्वर का स्वागत करने में तुम्हारी अगुआई कर सकता है? क्या यह तुम्हें बचा सकता है और स्वर्ग के राज्य में ले जा सकता है? क्या यह तुम्हें सत्य और जीवन दे सकता है? क्या यह तुम्हें अनंत जीवन दिला सकता है? कैथोलिक धर्म इनमें से कुछ भी नहीं कर सकता और यह तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकता। वे कैथोलिक नियम केवल तुम्हें गुमराह कर सकते हैं और नुकसान पहुँचा सकते हैं, तो फिर तुम्हारे अभी भी उनका पालन करने का क्या फायदा? अगर तुम कैथोलिक विनियमों का पालन करने पर जोर देते हो, तो तुम एक मूर्ख कुंवारी हो।
परमेश्वर प्रकट हुआ है और मनुष्य को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। परमेश्वर चाहता है कि लोग केवल परमेश्वर को स्वीकार करें, केवल परमेश्वर की वाणी सुनें और धर्म से बाधित न हों। चाहे तुम किसी भी संप्रदाय में हो, अगर तुम परमेश्वर की वाणी सुनते हो और प्रभु का स्वागत करते हो, तो तुम्हें तुरंत धर्म से बाहर आ जाना चाहिए। यही सही काम है। तुम चाहे जो भी करो, पीछे मुड़कर मत देखना; वरना तुम लूत की पत्नी की तरह नमक का खंभा बन जाओगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का बारीकी से अनुसरण करना चाहिए; और उसे ‘जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना’ चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि ‘यहोवा परमेश्वर है’ और ‘यीशु मसीह है,’ जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करता हो, यदि मनुष्य बिना किसी संदेह के अनुसरण करता है और वह बारीकी से अनुसरण करता है, तो फिर पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को कैसे निकाला जा सकता है? परमेश्वर चाहे जो भी करे, जब तक मनुष्य निश्चित है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दंड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रुका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और अपने प्रबंधन-कार्य की पूर्णता से पहले वह सदैव व्यस्त रहा है और कभी नहीं रुकता। किंतु मनुष्य अलग है : पवित्र आत्मा के कार्य का थोड़ा-सा अंश प्राप्त करने के बाद वह उसके साथ इस तरह व्यवहार करता है मानो वह कभी नहीं बदलेगा; जरा-सा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह परमेश्वर के नए कार्य का ‘पता लगाने’ के लिए आगे नहीं बढ़ता; परमेश्वर के कार्य का थोड़ा-सा ही अंश देखने के बाद वह तुरंत ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के होने में सीमित कर देता है और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इसी छवि में बना रहेगा जिसे वह देखता है, कि यह अतीत में भी ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा; सिर्फ थोड़ा-सा सतही स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य इतना घमंडी हो जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद, परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला यह व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य उसे स्वीकार नहीं करता। इस तरह के लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते; वे बहुत रूढ़िवादी हैं और नई चीजों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, किंतु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य का मानना है कि इस्राएलियों का ‘केवल यहोवा में विश्वास करना और यीशु में विश्वास न करना’ ग़लत था, किंतु अधिकतर लोग ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, जिसमें वे ‘केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं’ और ‘मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किंतु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।’ तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं करते। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास)।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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