परमेश्वर के वचनों ने मेरी रक्षात्मकता और गलतफ़हमी को दूर कर दिया
ली जिन, चीन2014 में जब मैं एक कलीसिया-अगुआ थी तो मैं अपना कर्तव्य निभाने में कुछ हद तक प्रभावी थी, मैंने कुछ अनुभव संचित किया था और मुझे...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
29 नवंबर 2023 को मुझे पाठ-आधारित कार्य का पर्यवेक्षक चुना गया था। जब मैंने यह समाचार सुना तो मैंने अपने अंदर बहुत उथल-पुथल महसूस की। मैं खुद को रोक नहीं पाई क्योंकि मेरे दिमाग में उन दिनों की यादें कौंधती रहीं जब मैं एक पर्यवेक्षक थी। जब काम में विचलन और समस्याएँ आती थीं तो जिस बहन के साथ मैं सहयोग कर रही थी वह कारण खोजने और समाधान के तरीके ढूँढ़ने में सक्रिय भूमिका निभाती थी, लेकिन मैं इन मामलों को कभी सही से नहीं संभाल पाती थी। जब भी समस्याएँ आती थीं, मुझे लगता था कि इसका कारण मेरी खराब काबिलियत और कार्यक्षमताओं की कमी है, लेकिन मैंने सामने आने वाली समस्याओं में मौजूद विचलनों और कमियों का कभी विश्लेषण नहीं किया, उन्हें ठीक और हल करने के तरीके के बारे में सोचने के प्रयास करने की बात तो दूर रही। मुझे हमेशा लगता था कि मेरे कर्तव्य में इतनी सारी समस्याओं का आना काफी अपमानजनक है और मैं खुद को नकारात्मक दशा में जीने से रोक नहीं पाती थी और लगातार अपने कर्तव्य से बचना चाहती थी। अगर अगुआ भी मेरी कमियों के बारे में बताते थे तो मैं और भी नकारात्मक हो जाती थी। चूँकि मैं लंबे समय से नकारात्मक होने और ढिलाई बरतने की दशा में जी रही थी, कार्य की बहुत सारी समस्याएँ समय पर हल नहीं हो पाईं और मैंने भाई-बहनों की वास्तविक मदद नहीं की। अगुआओं ने मेरी दशा के बारे में मेरे साथ बहुत बार संगति की, फिर भी मैं इसे बदल नहीं पाई और अंत में इससे काम पर गंभीर असर पड़ा और मुझे बर्खास्त कर दिया गया। भले ही मुझे बर्खास्त कर दिया गया था, लेकिन यह एक राहत जैसा लगा। लेकिन अब वे मुझे फिर से पर्यवेक्षक बनाना चाहते थे, क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मुझे पहले की तरह ही दर्दनाक और अपमानजनक तरीके से जीना पड़ेगा? मैं सचमुच दोबारा पर्यवेक्षक नहीं बनना चाहती थी! इसके अलावा, मुझे लगा कि मुझमें पर्यवेक्षक बनने की काबिलियत ही नहीं है। मैंने देखा था कि बहुत सारे अगुआ, कार्यकर्ता और पर्यवेक्षक अच्छी काबिलियत, मजबूत कार्यक्षमताओं और अपने कार्य में उच्च दक्षता वाले लोग थे, जबकि मुझे लगता था कि मैं ऐसी इंसान हूँ जिसकी काबिलियत और दक्षता कम है और मैं पर्यवेक्षक बनने के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं हूँ। अभी एक टीम सदस्य के रूप में मुझे अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे दिख पा रहे थे और मैं थोड़ा-सा आत्मसम्मान कायम रख पा रही थी, लेकिन पर्यवेक्षक होने का मतलब था काम का भारी बोझ उठाना और सभी पहलुओं का ध्यान रखना। अपनी औसत क्षमताओं के चलते मुझे लगा कि चाहे मैं कितनी भी कड़ी कोशिश कर लूँ, फिर भी मैं इसे अच्छी तरह से नहीं कर पाऊँगी और आखिर मुझे फिर से बर्खास्त कर दिया जाएगा। यह एक और करारी हार होगी और तब भाई-बहन मुझे कैसे देखेंगे? क्या वे कहेंगे कि मैं पूरी तरह से बेकार हूँ? जब भी मेरे मन में ये विचार आते, मैं उस कर्तव्य को अस्वीकार करना चाहती थी, लेकिन मुझे यह भी लगता था कि अपना कर्तव्य अस्वीकार करके मैं परमेश्वर को निराश करूँगी। खासकर, चूँकि इस समय पाठ-आधारित कार्य के लिए केवल एक ही पर्यवेक्षक था और काम का बोझ इतना भारी था कि एक व्यक्ति यह सब संभाल ही नहीं सकता था, अगुआ ने कहा कि काम पहले ही प्रभावित हो चुका है। चूँकि मैं बहुत वर्षों तक पाठ-आधारित कर्तव्यों का प्रशिक्षण ले चुकी थी और पहले पर्यवेक्षक रह चुकी थी, मैं कार्य के विभिन्न पहलुओं से कुछ हद तक परिचित थी, इसलिए अगर मैंने इस समय यह कर्तव्य स्वीकार नहीं किया तो मैं सचमुच परमेश्वर के घर की सदस्य कहलाने योग्य नहीं होऊँगी। लेकिन अगर मैं इसके लिए राजी हो गई और फिर काम का जिम्मा नहीं उठा पाई तो क्या मेरा आत्मसम्मान और रुतबा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाएंगे? इन चीजों के बारे में सोचकर मुझे बहुत घुटन और पीड़ा महसूस हुई और लगा कि मैं चक्की के दो पाटों के बीच फँस गई हूँ। मैंने अपनी असली दशा परमेश्वर के सामने रख दी : “परमेश्वर, आज एक पर्यवेक्षक के बतौर यह कर्तव्य मेरे पास आया है और मैं जानती हूँ कि यह तुम्हारी ओर से उत्थान और अनुग्रह है, लेकिन मैं यही महसूस करती जा रही हूँ कि मुझमें एक पर्यवेक्षक होने की काबिलियत का अभाव है और मुझे बहुत डर है कि फिर से पर्यवेक्षक बनने के बाद मैं तमाम तरह की मुश्किलों में पड़ जाऊँगी और एक बार फिर रुतबे और आत्मसम्मान में फँस जाऊँगी और खुद को बाहर नहीं निकाल पाऊँगी। परमेश्वर, मैं तुमसे विनती करती हूँ कि मुझे आस्था प्रदान करो और समर्पण करने का संकल्प भी।”
बाद में मैं भारी मन से एक सभा में गई। मेरी दशा जानने पर अगुआ ने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ा : “यही न कि मनुष्य के लिए परिवेशों का इंतजाम करने में परमेश्वर का उद्देश्य एक ओर लोगों को अनेक तरीकों से विभिन्न चीजों का अनुभव करने, उनसे सबक सीखने, परमेश्वर के वचनों में निहित विभिन्न सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने देना, लोगों के अनुभव समृद्ध करना और उन्हें परमेश्वर की, अपनी, अपने परिवेशों और मानव-जाति की अधिक व्यापक और बहुआयामी समझ हासिल करने में मदद करना है। दूसरी ओर, परमेश्वर लोगों के लिए कुछ विशेष परिवेश का इंतजाम करके और उनके लिए कुछ विशेष सबकों की व्यवस्था करके यह चाहता है कि वे उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाए रखें। इस ढंग से लोग बार-बार उसके सामने आते हैं, बजाय इसके कि वे परमेश्वर विहीन स्थिति में रहें और यह कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं पर कार्य उस तरह से करते हों जिसका परमेश्वर या सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, जिससे परेशानी होगी। इसलिए परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों में लोग वास्तव में स्वयं परमेश्वर द्वारा उनकी अनिच्छा से और निष्क्रिय रूप से परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं। यह परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को दर्शाता है। जितनी अधिक तुममें किसी मामले में समझ की कमी हो, उतना ही अधिक तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला और भक्तिपूर्ण हृदय होना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादे और सत्य खोजने के लिए बार-बार परमेश्वर के सामने आना चाहिए। जब तुम चीजों को नहीं समझते, तो तुम्हें परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। जब तुम्हारे सामने ऐसी चीजें आती हैं जिन्हें तुम नहीं समझते, तो तुम्हें परमेश्वर से यह कहने की आवश्यकता होती है कि वह तुम पर अधिक कार्य करे। यही परमेश्वर का श्रमसाध्य इरादा कहलाता है। जितना अधिक तुम परमेश्वर के सामने आते हो, उतना ही अधिक तुम्हारा दिल परमेश्वर के करीब होगा। और क्या यह सच नहीं कि तुम्हारा दिल परमेश्वर के जितना करीब होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर उसके भीतर रहेगा? जितना अधिक परमेश्वर व्यक्ति के दिल में रहता है, उतना ही बेहतर उसका अनुसरण, उसके चलने का मार्ग और उसके हृदय की अवस्था बनती है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। परमेश्वर चाहे जैसी भी परिस्थितियों का इंतजाम करे, वह सब इसलिए है ताकि हम सबक सीख सकें और सत्य पा सकें। अपने पर्यवेक्षक होने के दिनों के बारे में सोचती हूँ तो चूँकि मैंने अपने कर्तव्य में बहुत सारे विचलन और कमियाँ प्रकट की थीं और मेरा मिथ्याभिमान संतुष्ट नहीं हुआ, इसलिए मैं अक्सर नकारात्मक हो जाती थी। मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए कभी सत्य नहीं खोजा। मैं बस यही सोचती रहती थी कि मेरे भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे और क्या वे मुझे नीची नजर से देखेंगे। मैं अपने कर्तव्य से बचना चाहती रही और नकारात्मक और सुस्त हो गई, मैं कोई भी वास्तविक कार्य नहीं कर रही थी। अंत में, कार्य में देरी हो गई और मेरे जीवन का बिल्कुल भी संवर्धन नहीं हुआ। यह सब मेरे लंबे समय तक सत्य न खोजने का नतीजा था। पहले जब मैं पर्यवेक्षक नहीं थी, उस समय के बारे में सोचती हूँ तो मुझे लगता था कि मैं हर पहलू से अच्छा कर रही हूँ और मुझे अपनी कोई वास्तविक समझ नहीं थी। पर्यवेक्षक बनने के बाद से ही मेरे कर्तव्य में बहुत सारे विचलन और समस्याएँ उजागर हुए और मेरी बहुत काट-छाँट हुई। इन सबने मुझे अपनी भ्रष्टता और कमियों पर विचार करने और परमेश्वर के सामने आकर सत्य खोजने के लिए विवश किया। अगर मैं अपनी कमियों और खामियों का सामना कर पाती, परमेश्वर से और अधिक प्रार्थना करती और सत्य सिद्धांत खोजती तो मैं हर पहलू से सबक सीख पाती। यह परमेश्वर का अनुग्रह था। लेकिन मैं कृतज्ञ होना नहीं जानती थी और हमेशा अपने कर्तव्य से जी चुराना चाहती थी और गैर-जिम्मेदार थी। बर्खास्त होने के बाद भी मुझे जरा-सा भी अपराध-बोध या पछतावा नहीं हुआ। बल्कि मैंने इसे एक तरह की राहत समझा। मैंने परमेश्वर को सचमुच निराश कर दिया था! फिर भी परमेश्वर मुझे नापसंद नहीं करता था और इसके बजाय उसने मुझे अभ्यास करने का एक और अवसर दिया, वह चाहता था कि मैं खुद को सत्य से और अधिक लैस करूँ और जीवन में और तेजी से संवर्धन करूँ। लेकिन मैं सुन्न और मंदबुद्धि थी और परमेश्वर के इरादे को नहीं समझती थी। मुझे चिंता थी कि मेरी कमियाँ फिर से उजागर हो जाएँगी और दूसरे मुझे नीची नजर से देखेंगे और इसलिए मैं एक पर्यवेक्षक के रूप में अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहती थी। मैंने परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को सचमुच विफल कर दिया था। इन चीजों के बोध ने मुझे थोड़ा-सा अपराध-बोध और परमेश्वर का ऋणी होने का एहसास कराया।
मैंने परमेश्वर का इरादा थोड़ा और समझ लिया और पर्यवेक्षक का कर्तव्य स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं अभी भी खुद को चिंतित और परेशान होने से रोक नहीं पाई। मुझे डर था कि मैं अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा पाऊँगी, हर तरह से प्रतिष्ठा गँवा बैठूँगी और आखिरकार पिछली बार की तरह फिर से बर्खास्त कर दी जाऊँगी। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े। परमेश्वर कहता है : “चाहे तुम्हारी क्षमता ज्यादा हो या कम, और चाहे तुम सत्य समझते हो या नहीं, जो भी हो, तुम्हारा यह रवैया होना चाहिए : ‘चूँकि यह कार्य मुझे करने के लिए दिया गया था, इसलिए मुझे इसे गंभीरता से लेना चाहिए; मुझे इसे दिल से लेना चाहिए और इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना पूरा दिल और ताकत लगा देनी चाहिए। रही यह बात कि मैं इसे पूर्णतया अच्छी तरह से कर सकता हूँ या नहीं, तो मैं कोई गारंटी देने की कल्पना तो नहीं कर सकता, लेकिन मेरा रवैया यह है कि मैं इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना भरसक प्रयास करूँगा, और मैं यकीनन इसके बारे में लापरवाह नहीं होऊँगा। अगर काम में कोई समस्या आती है, तो मुझे जिम्मेदारी लेनी चाहिए, और सुनिश्चित करना चाहिए कि मैं इससे सबक सीखूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करूँ।’ यह सही रवैया है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ने के बाद मैं बहुत द्रवित हो गई। परमेश्वर की मुझसे माँगें ऊँची नहीं हैं। वह मुझसे मेरी काबिलियत और क्षमताओं से परे कोई बड़ा काम लेने की माँग नहीं करता है और वह केवल यह चाहता है कि मेरे पास एक सच्चा दिल हो और मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने का भरसक प्रयास करूँ। परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इतना ही काफी है। हालाँकि मैं अभी भी यह गारंटी देने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी कि मैं एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य सँभाल सकती हूँ, लेकिन कम से कम मुझमें अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए भरसक प्रयास करने का रवैया तो होना ही चाहिए था। यह मेरी पहुँच के भीतर था। मुझे एहसास हुआ कि मेरा पहले अपना कर्तव्य अच्छी तरह से न निभा पाने का कारण यह नहीं था कि मेरी काबिलियत में कमी थी, बल्कि यह था कि मैं अपने बारे में फैसला देने की दशा में जिए जा रही थी और निरंतर पीछे हटना चाहती थी। मुझे अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं था और जब समस्याएँ उत्पन्न होती थीं तो मैं चिंतन करने के लिए तुरंत परमेश्वर के सामने नहीं आती थी और मैं यह विश्लेषण नहीं करती थी कि ये विचलन और समस्याएँ क्यों उत्पन्न हुई हैं, न ही मैं यह चिंतन करती थी कि इनका समाधान करने के लिए सत्य कैसे खोजा जाए। मैं दिन-प्रतिदिन बस अपने आत्मसम्मान और रुतबे के बारे में ही सोचती रहती थी। इस तरह के रवैये के चलते मैं भला कैसे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकती थी? यह एहसास होने पर मैंने देखा कि मेरा मिथ्याभिमान, आत्मसम्मान और रुतबे की चिंता ही मेरे कर्तव्य में मेरी सबसे बड़ी बाधाएँ थीं।
इसलिए मैं विचार करने लगी, “ऐसा क्यों है कि जब भी आत्मसम्मान और रुतबे की बात आती है तो मैं खुद को एक गलत दशा में डूबने से रोक नहीं पाती हूँ?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन होते हैं और वह लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार यही होता है : ‘मेरे रुतबे का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे अच्छी प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरा रुतबा बढ़ेगा?’ यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार होता है—और इसी कारण से वे चीजों को इस तरह से देखते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, यह बात तो रहने ही दो कि ये उनके लिए ऐसी बाहरी चीजें हैं जिनके बिना उनका काम चल सकता है। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे। यूँ तो मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को परमेश्वर में आस्था के समकक्ष रखते हैं और दोनों चीजों को समान पायदान पर रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हैं तो वे प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के दिलों में, परमेश्वर में विश्वास करने में सत्य का अनुसरण ही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करना है और प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण सत्य का अनुसरण करना भी है—प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करना सत्य और जीवन हासिल करना है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को ही अपना जीवन मानते हैं और इन्हें ऐसा लक्ष्य मानते हैं जिसका वे अपने पूरे जीवन के दौरान अनुसरण करते हैं। वे चाहे कुछ भी करें या कहें, वे केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचते हैं। यही एक मसीह-विरोधी का सार है। पीछे मुड़कर सोचती हूँ तो बचपन से ही मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की तीव्र इच्छा थी और मैं हमेशा इन शैतानी जहरों के सहारे जीती थी, “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है” और “एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।” मैं इस बात की बहुत परवाह करती थी कि दूसरे मुझे कैसे देखते हैं। जब मैं चौथी कक्षा में थी, मेरी शिक्षिका ने मुझे एक गणित ओलंपियाड में भाग लेने के लिए चुना। लेकिन मेरे अंक दूसरे छात्रों जितने अच्छे नहीं आए और मैंने काफी अपमानित महसूस किया। उसके बाद मैंने एक बहाना बनाया और स्कूल छोड़ दिया। मेरी शिक्षिका ने देखा कि मेरे अंक वास्तव में उतने खराब नहीं थे और सोचा कि मेरा स्कूल छोड़ना अफसोस की बात है, इसलिए वह मुझे मनाने के लिए विशेष रूप से मेरे घर गईं। तभी मैं वापस स्कूल गई। सातवीं कक्षा में एक बार मैंने एक शिक्षक के सवाल का गलत जवाब दिया और पूरी कक्षा ठहाके लगाकर हँस पड़ी। मैंने बहुत अपमानित महसूस किया और मैं फिर कभी स्कूल नहीं गई। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी मैं वैसी ही थी। चूँकि प्रतिष्ठा और रुतबे की मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई थी, इसलिए मैं नकारात्मक दशा में जीती रही और अपना कर्तव्य छोड़ना चाहती थी। जब मैं पहले पर्यवेक्षक थी, मेरी कमियाँ बहुत सारी उजागर हुईं और मैंने बहुत ही अपमानित महसूस किया, इसलिए मैं लगातार अपने कर्तव्य से बचना चाहती थी और उन मुद्दों को हल करने में कोई प्रयास नहीं करती थी जिन्हें हल किया जा सकता था। मैंने अपने कर्तव्य में ढिलाई बरती और नकारात्मक रही और अंततः मैंने कलीसिया के कार्य में देरी कर दी और मुझे बर्खास्त कर दिया गया। इस बार भी मैं पर्यवेक्षक नहीं बनना चाहती थी क्योंकि मुझे डर था कि मैं वास्तविक कार्य नहीं कर पाऊँगी और फिर से बर्खास्त कर दी जाऊँगी और मुझे डर था कि मेरे आत्मसम्मान को एक और आघात लगेगा। नीची नजरों से देखे जाने से बचने के लिए मैं चाहती रही कि इस कर्तव्य को अस्वीकार कर दूँ। मैं निरंतर अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में विचार करती थी, मैंने कलीसिया के कार्य के बारे में जरा भी विचार नहीं किया। मैं सचमुच स्वार्थी, नीच थी और मुझमें मानवता की कमी थी! जिस व्यक्ति में मानवता होती है, वह जब किसी कर्तव्य का सामना करता है तो वह इस बात की परवाह नहीं करता कि इस कर्तव्य से उसे प्रतिष्ठा मिलेगी या उसे किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अगर यह ऐसी चीज है जो कलीसिया के कार्य की जरूरत है तो वे परमेश्वर पर निर्भर रहेंगे और अपनी भूमिका निभाने के लिए भरसक प्रयास करेंगे। लेकिन मैं हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे की चिंताओं में डूबी रहती थी और जैसे ही मुझे अपने कर्तव्य में कुछ असफलताओं या नाकामियों का सामना करना पड़ता, मैं हताशा की दशा में डूब जाती थी। मैं हमेशा अपने कर्तव्य को अस्वीकार करना और उससे जी चुराना चाहती थी। ऐसा करके क्या मैं परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही थी? मैंने देखा कि रुतबे और प्रसिद्धि का अनुसरण मुझसे परमेश्वर का प्रतिरोध और उसके स्वभाव का अपमान ही कराएगा और ऐसा करके मैं एक मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी। अगर मैं प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करती रही तो मैं अपना कर्तव्य कभी भी अच्छी तरह से नहीं निभा पाऊँगी और परमेश्वर मुझसे केवल घृणा करेगा और मुझे हटा देगा। यह सब एहसास होने पर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मेरा दिल रुतबे और प्रसिद्धि से बहुत ज्यादा भरा हुआ है। मैं अब और तुम्हारे खिलाफ विद्रोह नहीं करना चाहती हूँ। चाहे मेरी जो भी काबिलियत हो, मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए भरसक प्रयास करने को तैयार हूँ, ताकि तुम्हारे दिल को राहत मिल सके।”
मैंने खोज में पाया कि मैं हमेशा एक गलत दृष्टिकोण पाले हुई थी। मुझे लगता था कि एक पर्यवेक्षक होने के लिए व्यक्ति में अच्छी काबिलियत और कार्य दक्षता होनी चाहिए; वरना, वह पर्यवेक्षक बनने के योग्य नहीं है। लेकिन मैंने कभी यह खोज नहीं की कि क्या मेरा यह दृष्टिकोण वास्तव में सही है। बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “परमेश्वर के घर के पूरे कार्य के परिप्रेक्ष्य से इसे देखा जाए तो यकीनन अगर अच्छी काबिलियत वाले लोग और ज्यादा होते तो कलीसियाई कार्य सचमुच आसान होता। लेकिन एक आधार है : परमेश्वर के घर में परमेश्वर अपना कार्य कर रहा है और लोग निर्णायक भूमिका नहीं निभाते हैं। इसलिए चाहे लोगों की काबिलियत अच्छी हो, औसत हो या खराब हो, इससे परमेश्वर के कार्य के नतीजे तय नहीं होते हैं। जो अंतिम नतीजे प्राप्त किए जाने हैं, वे परमेश्वर द्वारा पूरे किए जाते हैं। हर चीज की अगुआई परमेश्वर करता है, हर चीज पवित्र आत्मा का कार्य है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (7))। “चाहे तुम्हारी काबिलियत उच्च हो या निम्न और चाहे तुममें कितनी भी प्रतिभा हो, अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं होता तो चाहे तुम्हें किसी भी पद पर रखा जाए, तुम उपयोग के लिए योग्य नहीं होगे। इसके विपरीत, अगर तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ सीमित हैं, लेकिन तुम विभिन्न सत्य सिद्धांत समझते हो, जिनमें वे सत्य सिद्धांत शामिल हैं जिन्हें तुम्हें अपने कार्य के दायरे में समझना-बूझना चाहिए, और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो गया है, तो तुम उपयोग के लिए योग्य व्यक्ति होगे” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। “कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकता है या नहीं केवल उस व्यक्ति की काबिलियत पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मुख्य रूप से अपने कर्तव्य निभाते समय उसके रवैये, उसके चरित्र, उसकी मानवता अच्छी है या बुरी, और क्या वह सत्य स्वीकार सकता है, इस पर निर्भर करता है। ये मूल मुद्दे हैं। तुम्हारा दिल अपने कर्तव्य में लगा है या नहीं, क्या तुम इसमें अपना पूरा दिल लगा रहे हो और पूरा दिल लगाकर काम कर रहे हो, अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया गंभीर और कर्तव्यनिष्ठ है या नहीं, तुम सच्चे और लगनशील इंसान हो या नहीं : परमेश्वर इन्हीं चीजों पर ध्यान देता है, और परमेश्वर हर किसी की पड़ताल करता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास कराया कि मेरा दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप बिल्कुल नहीं था, कि परमेश्वर के घर में कोई भी कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है और व्यक्ति की काबिलियत सब कुछ तय नहीं करती है। क्या हम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि कर्तव्य के प्रति हमारा रवैया क्या है, क्या हमारे पास एक गंभीर और जिम्मेदार दिल है और क्या हम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति में खूबियाँ और काबिलियत हैं, लेकिन उसे अपने कर्तव्य के प्रति कोई जिम्मेदारी या दायित्व का एहसास नहीं है, और जब भाई-बहन उसकी कमियाँ बताते हैं तो वह उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देता है और उन पर चिंतन या उनका विश्लेषण नहीं करता है, तब भले ही उसमें खूबियाँ और काबिलियत हों, वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभा सकता है और परमेश्वर उसे आशीष या मार्गदर्शन नहीं देगा। इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति की काबिलियत औसत है लेकिन उसका दिल सही जगह पर है और वह अपना कर्तव्य लगन और जिम्मेदारी से करता है, और जब भाई-बहन उसके विचलनों और कमियों की ओर इशारा करते हैं तो वह उन चीजों को स्वीकार कर सकता है और सुधार सकता है तो वह अपने कर्तव्य में फिर भी कुछ नतीजे हासिल कर सकता है। मुझे एक बहन का ख्याल आया जिसे मैं कभी जानती थी। उसकी काबिलियत औसत थी, लेकिन एक अगुआ के रूप में चुने जाने के बाद उसके पास अपने कर्तव्य में बोझ की भावना थी, उसने अपना काम गंभीरता से और व्यावहारिक रूप से किया और अपने कर्तव्य में अपेक्षाकृत अच्छे नतीजे हासिल किए और बाद में, उसे और बड़ा काम सँभालने के लिए पदोन्नत किया गया। एक और बहन भी थी जो पहले मेरे साथ सहयोग करती थी, जिसकी काबिलियत अच्छी थी, लेकिन जब अगुआ ने उसके काम में समस्याओं और विचलनों की ओर इशारा किया, तो उसने न केवल उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया बल्कि बहस भी की और समर्पण करने से मना कर दिया। नतीजतन, उसने पवित्र आत्मा का कार्य खो दिया, वह किसी भी समस्या की असलियत नहीं देख पाई और उसने अपने कर्तव्य में कोई नतीजा हासिल नहीं किया और अंततः, उसे बर्खास्त कर दिया गया। इन तथ्यों से, मैंने देखा कि कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकता है या नहीं, यह निर्णायक रूप से उसकी काबिलियत से तय नहीं होता, और कुंजी इस बात में निहित है कि क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है और अपने कर्तव्य के प्रति उसका रवैया क्या है।
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने तुम्हें जो काबिलियत, गुण और प्रतिभाएँ दी हैं, वे पहले से ही पर्याप्त हैं—बात बस इतनी है कि तुम संतुष्ट नहीं हो, अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं हो, तुम्हें कभी भी अपनी जगह पता नहीं होती है, तुम हमेशा भव्य लगने वाले विचार झाड़ने और दिखावा करने की इच्छा रखते हो जिससे अंत में तुम अपने कर्तव्यों में गड़बड़ कर देते हो। परमेश्वर ने तुम्हें जो काबिलियत, गुण और प्रतिभाएँ दी हैं, तुमने उनका उपयोग नहीं किया है, तुमने पूरा प्रयास नहीं किया है और तुमने कोई परिणाम प्राप्त नहीं किया है। हालाँकि तुम काफी व्यस्त रहते होगे, लेकिन परमेश्वर कहता है कि तुम एक विदूषक जैसे हो, ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो अपनी जगह जानता है और अपने उचित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता है। इसलिए, चाहे तुम्हारी योजनाएँ और लक्ष्य कुछ भी हों, अगर तुम अंततः परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अपने पूरे हृदय, अपने पूरे मन और अपनी पूरी शक्ति के साथ, उस अंतर्निहित काबिलियत, गुणों, प्रतिभाओं, क्षमताओं और अन्य स्थितियों के आधार पर अपना कर्तव्य नहीं निभाते जो परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं, तो परमेश्वर याद नहीं रखेगा कि तुमने क्या किया है, और तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे होगे, बल्कि तुम बुराई कर रहे होगे” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। “पहले, परमेश्वर द्वारा दिए गए अंतर्निहित और मौजूदा गुणों, क्षमताओं और शक्तियों का, और उन तकनीकी या व्यावसायिक कौशलों का भी, जिन्हें तुम प्राप्त और हासिल कर सकते हो, भरपूर इस्तेमाल करो और पीछे मत हटो। अगर तुम इन सभी बातों के संदर्भ में परमेश्वर को संतुष्ट कर चुके हो और तुम्हें लगता है कि तुम अभी और भी ऊँचाइयाँ छू सकते हो, तो जो कुछ तुम्हारी काबिलियत हासिल कर सकती है उसके दायरे में उन तकनीकी या व्यावसायिक कौशलों पर गौर करो जिनमें तुम सुधार कर सकते हो या कोई उल्लेखनीय प्रगति कर सकते हो। तुम अपनी काबिलियत से जो प्राप्त कर सकते हो, उसके आधार पर सीखना और सुधार करना जारी रख सकते हो। ... अगर तुम पूरे दिल से, पूरी शक्ति से, पूरे मन से और अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभा सकते हो और तुम्हारा दिल ईमानदार है तो परमेश्वर के सामने तुम सोने जितने बेशकीमती हो। अगर अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम कीमत नहीं चुका सकते और तुममें निष्ठा नहीं है तो अगर तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ औसत व्यक्ति से बेहतर भी हों, तो भी तुम परमेश्वर के सामने बेशकीमती नहीं हो, तुम्हारी कीमत रेत के एक कण जितनी भी नहीं है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि चाहे किसी व्यक्ति की काबिलियत कैसी भी हो, अगर वह अपनी पूरी क्षमता के दायरे में, पूरी ताकत और पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाता है और उसके पास एक सच्चा दिल है तो ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की नजरों में सोने से भी ज्यादा अनमोल है। परमेश्वर ने मुझे जो काबिलियत दी है वह असल में पर्याप्त थी और मैं लिखने-पढ़ने के काम से जुड़े कुछ सिद्धांतों को भी समझ सकती थी, और आम तौर पर, ऐसा नहीं था कि कार्य का अनुवर्तन करते समय मेरे पास कोई मार्ग ही नहीं होता था। समस्या यह थी कि मैं अपनी कमियों के साथ कभी भी सही ढंग से पेश नहीं आ पाई, मैं अपनी तुलना हमेशा बेहतर काबिलियत और गुणों वाले लोगों से करती थी और मैंने अपना दिल कभी इस पर नहीं लगाया कि अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह से निभाऊँ। अब जब मैं फिर से एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य निभा रही हूँ तो मैं इस कर्तव्य को बहुत अधिक सँजोऊँगी और इसे पूरे दिल और मन से करूँगी। मैं अब और इससे नकारात्मक ढंग से पेश नहीं आ सकती हूँ।
मेरा रवैया बदलने के साथ, अगली बार जब मैंने अपना कर्तव्य किया, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मेरे दिल को उसके सामने शांत रखे। उपदेशों की सावधानीपूर्वक समीक्षा करते समय मैं कुछ समस्याएँ ढूँढ़ पाई और भाई-बहनों के साथ मिलकर पेशेवर कौशलों का अध्ययन करते हुए मैं कुछ लाभ अर्जित कर पाई। जब कार्य में विचलन और समस्याएँ सामने आईं, जिससे मेरी कई कमियाँ उजागर हुईं तो मैं अभी भी शर्मिंदा और कुछ-कुछ नकारात्मक महसूस करती थी और यहाँ तक कि पीछे हटने के बारे में भी सोचती थी और ऐसे समय में, मैं अपनी पिछली असफलताओं के बारे में सोचती थी। पहले, मैं हमेशा आत्मसम्मान और रुतबे की चिंताओं में डूबी रहती थी और जब समस्याएँ सामने आती थीं तो मैं विचलनों और कमियों का विश्लेषण करने में सक्रिय नहीं होती थी, हमेशा नकारात्मक महसूस करती और पीछे हट जाती थी, और नतीजतन, मैंने पवित्र आत्मा का कार्य खो दिया। मैं फिर से हताशा की दशा में नहीं पड़ना चाहती थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे विनती की कि वह मुझे नकारात्मकता से बाहर आने में मदद करे। साथ ही मैंने अपनी दशा के बारे में अगुआओं और भाई-बहनों को भी खुलकर बताया और उन सभी ने मेरे साथ संगति की और मुझे प्रोत्साहित किया। अगुआओं ने भी मेरी मदद की और मुझे सहारा दिया और मेरे कर्तव्य निभाने के तरीके में जो समस्याएँ थीं, उन्हें इंगित किया। मैंने ये समस्याएँ उत्पन्न होने के कारणों पर चिंतन किया और पाया कि कुछ मेरे लापरवाह रवैये के कारण हुईं और कुछ इसलिए हुईं क्योंकि मैं सिद्धांतों को भली-भाँति नहीं समझती थी, इसलिए मैंने इन समस्याओं का विश्लेषण किया और उन्हें सुधारा। कभी-कभी, जब मेरे लिए सँभालने को बहुत सारी चीजें होती थीं तो अगुआ मुझे पत्र लिखते और प्राथमिकता तय करना सीखने में मेरी मदद करते थे और इस तरह से अपना समय उचित रूप से व्यवस्थित करने के बाद मैं अपना कर्तव्य सामान्य रूप से करने में सक्षम हो गई। कुछ समय बाद, पाठ-आधारित कार्य के नतीजों में भी कुछ सुधार हुआ। अब मुझे पर्यवेक्षक बने हुए छह महीने से ज्यादा समय हो चुका है और यूँ तो मुझमें बहुत सारी कमियाँ और अपर्याप्तताएँ हैं और काम में अभी भी बहुत सारी समस्याएँ हैं, लेकिन इस बार मैंने जो अनुभव किया उसके माध्यम से मैं सचमुच महसूस करती हूँ कि परमेश्वर के घर का कार्य पवित्र आत्मा द्वारा कायम रखा जाता है। जब मैं व्यक्तिगत हितों को छोड़ देती हूँ और लगन से अपना कर्तव्य करती हूँ, तो मैं पवित्र आत्मा का कार्य और मार्गदर्शन पा सकती हूँ और मैं अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे भी हासिल कर सकती हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
ली जिन, चीन2014 में जब मैं एक कलीसिया-अगुआ थी तो मैं अपना कर्तव्य निभाने में कुछ हद तक प्रभावी थी, मैंने कुछ अनुभव संचित किया था और मुझे...
युचेन, चीनमार्च 2023 में मैं कलीसिया में एक प्रचारक का अपना कर्तव्य निभा रही थी। चूँकि मैंने अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे हासिल किए थे,...
कुछ समय पहले, कलीसिया के फिल्मांकन कार्य के लिए हमें कुछ चित्र बनाने थे। मेरे सहयोगी भाई साइमन ने एक चित्र बनाकर समीक्षा के लिए दिया। अगुआ...
लोरेन, दक्षिण कोरियाकुछ साल पहले मैं कलीसिया के लिए वीडियो बनाती थी। एक ऐसा भी समय था जब मैं अपना कर्तव्य ठीक-से नहीं निभाती थी, मेरे बनाए...