27. युवा हूँ मगर अब बेपरवाह नहीं

परमेश्वर के वचन कहते है, "अगर परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए, कोई व्यक्ति एक ऐसे इंसान में परिवर्तित होना चाहता है जिसके अंदर इंसानियत हो, तो उसे परमेश्वर के वचनों के न्याय, प्रकाशन और ताड़ना से गुज़रना होगा, अंत में वह स्वयं को परिवर्तित करने में सक्षम होगा। यही एकमात्र मार्ग है। अगर कार्य ऐसा न होता, तो लोगों के पास परिवर्तन का कोई मार्ग नहीं होता। इसे इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके करना चाहिए। लोगों को न्याय, ताड़ना और निरंतर कांट-छांट और व्यवहार का अनुभव करना चाहिए। लोगों की प्रकृति में मौजूद चीज़ों को उजागर किया जाना ज़रूरी है। इन चीज़ों को उजागर किये जाने और इन्हें स्पष्ट रूप से समझने के बाद लोग सही रास्ते पर चल पाएंगे। कुछ अवधि के अनुभव और कुछ सत्य को समझने के बाद ही उन्हें डटे रहने का कुछ भरोसा मिल सकेगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानवीय स्‍वभाव में समानता और भिन्‍नता को समझना')। अब मैंने जो अनुभव किया और जो समझा, उस बारे में संगति करूंगी।

5 बरस की उम्र से ही मैंने गुझेंग का अध्ययन शुरू कर दिया था, एक संगीत अकादमी में मैंने स्नातक स्तर पर एक ख़ास विषय के रूप में गुझेंग का अध्ययन किया। परमेश्वर में आस्था रखना शुरू करने के बाद, जब मैंने देखा कि परमेश्वर के घर में कुछ ऐसे वीडियो हैं जिनमें गुझेंग का संगीत होना चाहिए, तो मुझे बड़ा जोश आ गया। मुझे लगा, "अगर किसी दिन मुझे यह काम मिल गया, तो मैं अपनी प्रतिभा का उचित इस्तेमाल कर पाऊँगी और परमेश्वर की स्तुति के लिए सुंदर संगीत रच पाऊँगी।"

मई 2019 में, आखिर मुझे यह काम मिल गया। पहले-पहल जब मैं इस समूह से जुड़ी, तो दो बहनों से मेरी मुलाक़ात हुई, और मैंने सोचा, "इन लोगों को उनकी प्रतिभा के लिए चुना गया है, मुझे यकीन है मेरा हुनर उनकी तुलना में बराबरी का होगा।" फिर, उनसे पहचान होने के बाद, मुझे पता चला कि उनमें से किसी ने भी पेशेवर संगीत सिद्धांत का अध्ययन नहीं किया है, उन दोनों ने कहा कि वे मुझसे ज़्यादा सीखना चाहती हैं। यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने सोचा, "बहुत-से भाई-बहनों में से मुझे इस समूह के लिए चुना गया है, मैं अपनी इन साझीदार बहनों से ज़्यादा जानती हूँ, इसलिए मेरा हुनर एकदम उच्च कोटि का होना चाहिए!" इसके बाद, उनमें से एक बहन ने मुझसे कहा, "कुछ दिनों में, एक और बहन समूह में शामिल होने वाली है, मैंने सुना है कि वह लेवल 10 की गुझेंग वादक है, तुम किस लेवल की हो।" मैं प्रभावित नहीं हुई, मैंने सोचा, "कोई भी लेवल हो क्या फर्क पड़ता है। यह मेरा स्नातक स्तर का ख़ास विषय था और यह मेरी पहचान का हिस्सा है। लेवल 10 का होने से क्या होता है? पेशेवर बन जाने के बाद लेवल की कोई अहमियत नहीं होती।" इसलिए, मैंने उसके सामने घमंड से ऐलान किया, "मैं एक पेशेवर हूँ।" कुछ दिनों के बाद, बहन मिंग आ गयी। उसने बताया कि लेवल 10 की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दस साल तक उसने गुझेंग को छुआ तक नहीं है। यह सुनकर मेरा दिमाग़ चलने लगा, "लगता है इस समूह में अकेली मैं ही पेशेवर हूँ। आगे, मैं तुम सबको दिखा दूंगी कि इस काम में कितनी माहिर हूँ।" इसके बाद, मैंने दो-तीन दिन में एक भजन संगीतबद्ध कर लिया, लेकिन मैंने देखा कि मेरी बहनें अभी भी मौलिक संगीत सिद्धांत ही सीख रही हैं। कभी-कभी वे पूरी तरह उलझन में पड़ जाती थीं, और लगता कि मैं उनसे बेहतर हूँ। मुझे लगता कि पेशेवर तरीके से अध्ययन करने के कारण मैं वाकई उनसे अलग हूँ। ख़ास तौर से जब मैं देखती कि वे भजनों को संगीतबद्ध नहीं कर पा रही हैं या गलतियाँ कर रही हैं, तो मुझे लगता कि मेरा एक शिक्षिका की तरह सिखाना या सीखने में उनकी मदद करना मेरे लिए स्वाभाविक है।

मुझे याद है, एक बार जब मैं एक भजन को संगीतबद्ध कर रही थी, तो मैंने अचानक साथ वाले कमरे से गुझेंग बजाने की आवाज़ सुनी। मैं समझ गयी कि बहन मिंग अभ्यास कर रही है, लेकिन मैं अपने अंदर घृणा महसूस करने से नहीं रोक पा रही थी। मैंने सोचा, "बहन मिंग को गुझेंग बजाये बहुत लंबा अरसा बीत चुका है। वह बहुत ही खराब ..." मैंने उन स्वरों को बरदाश्त करने की कोशिश की, लेकिन थोड़ी ही देर में जब मैं बिल्कुल भी बरदाश्त नहीं कर पायी, तो मैंने उसके क़रीब जाकर कहा, "तुम्हारे सारे सुर हिले हुए हैं! तुम लेवल 10 की परीक्षा कैसे उत्तीर्ण हो गयी?" उसका चेहरा तुरंत शर्म से लाल हो गया, उसने घबरा कर मुझसे कहा, "मुझे गुझेंग बजाये हुए एक अरसा हो चुका है, मुझे अभ्यास नहीं है। क्या तुम यह धुन बजाना सिखा सकती हो?" मैंने उसे तीखी नज़रों से देखकर कहा, "तुम्हें गुझेंग बजाये बहुत लंबा अरसा बीत गया होगा!" उसने अपना सिर झुका लिया और कुछ नहीं बोली, मैंने थोड़ा दोषी महसूस किया। मैंने सोचा कि शायद मुझे अपनी बहन के साथ इस तरह पेश नहीं आना चाहिए। लेकिन मैंने साथ ही यह भी सोचा कि स्कूल के दिनों में भी मैं अपने से छोटे सहपाठियों से कितने ज़्यादा रूखेपन से बात किया करती थी, तो इसके लिए मेरा लहज़ा उतना बुरा नहीं है। इसलिए मैं बैठ गयी और उसके सामने गुझेंग बजाने लगी, फिर कहा, "ठीक मेरे ही ढंग से बजाओ, तो तुम बजा सकोगी।" फिर, जब वह बजाने बैठी, तो मैंने देखा कि उसके हाथ सख्त और उंगलियाँ अकड़ी हुई थीं, वह घबरायी हुई लग रही थी। सिर्फ कुछ ही धुनें बजाने के बाद उसने फिर ग़लती कर दी, तो मैंने उसे दो-चार बार और बजाकर दिखाया। लेकिन जब वह लगातार ग़लतियां किये जा रही थी, तो मैं उसे नापसंद करने लगी। "स्कूल में, जब मुझे दिक्कत होती और मैं अपने सहपाठियों से मदद मांगती, तो दो-तीन बार कोशिश करते ही मैं सही बजाने लगती। मैं तुम्हें कई बार दिखा चुकी हूँ, तुम क्यों नहीं कर पा रही हो? तुम बहुत बेवकूफ हो," मैंने सोचा। मैंने उससे कहा, "मेरे इतनी बार सिखाने के बावजूद अगर तुम बजा नहीं पा रही हो, फिर साफ़ कहूं तो मैं तुम्हें नहीं सिखाना चाहती।" उसने मेरी ओर देखा, मुझे उसकी आँखों में सिर्फ निराशा देखने को मिली। उसकी नज़रों ने मुझे सीधे अंदर तक छलनी कर दिया। मैं समझ गयी कि वह मेरे कारण बेबस महसूस कर रही है। मैं इस तरह कैसे पेश आ सकती थी? थोड़ा और सब्र क्यों नहीं कर पायी? फिर मैंने सोचा, "मैं सिर्फ इसकी ग़लतियाँ सुधार रही हूँ। इसे अभी तक़लीफ़ हो रही होगी, लेकिन इससे इसे जल्दी सुधार करने की प्रेरणा मिलेगी, आखिर मैं इसकी मदद ही तो कर रही हूँ।" इस एहसास के बाद मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा। लेकिन फिर मैंने देखा कि बहन मिंग को गुंझेंग बजाने का उत्साह कम होता जा रहा है, और उसने मुझसे सवाल करना भी छोड़ दिया है। जब मैंने उससे वजह पूछी, तो उसने बताया, "मुझे डर है कि तुमसे पूछूंगी तो तुम मेरी आलोचना करोगी, इसलिए जो भी मुझे नहीं आता उस बारे में तुमसे पूछने की हिम्मत नहीं करती। बजाय इसके मैं तुम्हारे अभ्यास करने का इंतज़ार करूंगी, साथ वाले कमरे से सुनूंगी, तुम्हारा बजाना सुनकर सीखूंगी, और इस तरह अपने हुनर को तराशूंगी।" जब मैंने यह सुना तो मेरा दिल सच में छलनी हो गया। मैंने वाकई कभी ये नहीं सोचा कि मैं उसे इतनी लाचार कर दूंगी कि वह मुझसे सवाल पूछने से भी डरेगी, या मैं उसका दिल इतना ज़्यादा दुखा दूंगी। मुझे बहुत बुरा लगा, मैंने सोचा, "मैं तो बस इतना ही चाहती थी कि जल्दी सीखने में उसकी मदद करूं। मामला इतना ज़्यादा कैसे बिगड़ गया? इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, अपनी समस्याओं को समझने में मेरी मदद करने के लिये कहा,

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "अहंकारी स्वभाव कैसे पैदा होता है? क्या यह किसी के तुमसे सलाह-मशविरा करने से आता है? (नहीं; यह मेरी प्रकृति से आता है।) तो फिर तुम्हारी प्रकृति तुम्हें इस प्रकार की प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति के लिए कैसे प्रेरित करती है? यह कैसे प्रकट होती है? जैसे ही कोई व्यक्ति किसी बारे में तुमसे सलाह-मशविरा करता है, तुम तुरंत अतर्कसंगत हो जाते हो, अपनी सामान्य मानवता गँवा देते हो, और अब सही निर्णय नहीं ले पाते। तुम सोचते हो, 'तुमने मुझसे इस बारे में पूछा; मैं इसे समझता हूँ! मैं इस बारे में जानता हूँ! मैं इसका अर्थ समझ सकता हूँ! यह मामला अक्सर मेरे सामने आता है और मैं इससे बहुत अच्छी तरह परिचित हूँ; मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है।' जब तुम ऐसा सोचते हो, तब तुम्हारी तर्कशक्ति सामान्य होती है या असामान्य? जब कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होता है, तब इंसान की तर्कशक्ति असामान्य हो जाती है। इसलिए तुम चाहे किसी भी समस्या का सामना करो— भले ही कोई व्यक्ति तुमसे सलाह-मशविरा करे—तब भी तुम्हें एक घमंडी रवैया नहीं अपनाना चाहिए; तुम्हारी तर्कशक्ति सामान्य ही रहनी चाहिए" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। "आत्मतुष्ट मत बनो; अपनी कमियों को दूर करने के लिए दूसरों की ताकत लो, और देखो कि दूसरे परमेश्वर के वचनों से कैसे जीते हैं; और देखो कि उनके जीवन, कार्य और बातचीत अनुकरणीय हैं या नहीं। यदि तुम दूसरों को अपने से कम मानते हो, तो तुम आत्मतुष्ट और दंभी हो और किसी के लिए भी लाभदायक नहीं हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 22')। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मैंने बहुत बुरा और दुखी महसूस किया। परमेश्वर के वचनों ने मेरी एक-एक हरकत और विचार को उजागर कर दिया था, तभी मैं यह समझ पायी कि ऐसा व्यवहार मेरे अहंकारी स्वभाव का प्रकाशन था। मेरा ख़याल था कि संगीत की शिक्षा पाने और थोड़े पेशेवर ज्ञान के कारण मैं सबसे अलग हूँ। मुझे लगता था कि मैं एक पेशेवर प्रतिभा हूँ। जब मेरी बहनों को कोई चीज़ समझ नहीं आयी और उन्होंने मुझसे पूछा, तो मुझे और भी लगने लगा कि हुनर और पेशेवर ज्ञान के मामले में, मैं सबसे अलग हूँ। मैंने खुद को ऊंचा समझकर शिक्षिका का दर्जा दे दिया, अपनी बहनों को सिखाते समय शिक्षिका का ऊंचा रवैया और लहज़ा इस्तेमाल किया। जब मैंने सुना कि बहन मिंग ज़्यादा अच्छा नहीं बजा पा रही है, तो मैंने न सिर्फ उसे नीची नज़रों से देखा, बल्कि उसी वक्त उसे फटकार भी लगा दी। मैंने उसके जज़्बात का कोई ख़याल नहीं किया। मैंने कई बार उसे बजाने का तरीका सिखाया, लेकिन फिर भी जब वह ग़लतियाँ किये जा रही थी, तो मैंने उससे इतने तीखे लहज़े में बात की कि उसने लाचार होकर आगे अभ्यास करना ही छोड़ दिया। वह इतनी डर गयी थी कि मुझसे सवाल पूछने से अच्छा खुद चुपचाप अध्ययन करना ठीक समझने लगी। मैं वाकई इतनी अहंकारी थी कि मैं पूरी तरह से सामान्य इंसानियत गँवा चुकी थी। 10 साल से भी ज़्यादा समय से न बजाने के कारण, उसके लिए यह सामान्य था कि थोड़ी बेढंगी हो, और दोबारा शुरू करने पर धीरे-धीरे सीखे। लेकिन उसका यह सच कि वह अपने काम को पूरा करने के लिए फिर से सीखने और अभ्यास की कड़ी मेहनत करने को तैयार थी, काबिले-तारीफ़ था। उसके इस इरादे को देखने के बजाय मैंने उसे नीची नज़रों से देखा और उसकी कमियों के लिए उसको छोटा दिखाया, उसकी कोशिश करने की इच्छा को दबा दिया। मैं इतनी अहंकारी और बिना इंसानियत के कैसे हो सकती थी? मैंने इस बारे में जितना सोचा, मुझे उतना ही एहसास हुआ कि मेरे स्वभाव की भ्रष्टता कितनी गंभीर है। मेरे लिए परमेश्वर के सामने प्रायश्चित करना ज़रूरी था। मैं इस तरह चलने नहीं दे सकती थी। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं अपने अहंकारी स्वभाव में फंसी जी रही हूँ, मैंने अपनी बहन को नीची नज़र से देखकर और उसे लाचार कर, उसका दिल बहुत ज़्यादा दुखाया है। अब मैं अपनी करनी समझ सकी हूँ, और तुम्हारे सामने प्रायश्चित करना चाहती हूँ। मैं तुमसे विनती भी करती हूँ कि अपने अहंकार और दंभ के स्वभाव को छोड़ देने, सत्य में प्रवेश करने और सामान्य इंसानियत के साथ जीवन बिताने में मेरा मार्गदर्शन करो।"

इसके बाद, मैंने एक बैठक में खुद आगे बढ़कर अपनी भ्रष्टता के इस प्रकटन के बारे में सबके सामने खुलकर बताया, फिर मैंने बहन मिंग से माफी माँगी। मैंने कहा, "पेशेवर तरीके से संगीत का अध्ययन करने के कारण मैंने समझ लिया कि मैं तुम सब लोगों से बेहतर हूँ, इसलिए मैंने जब तुम्हें बजाना सिखाया, तो मैंने तुम्हारे प्रति अपने रवैये में एक व्यंग्यात्मक, छोटा दिखाने वाला, फटकारने वाला लहज़ा अपनाया। तुम्हारा दिल दुखाने के लिए मैं तुमसे माफी मांगती हूँ। आज से मैं सामान्य इंसानियत के साथ जीवन-यापन के सत्य में प्रवेश करना चाहती हूँ। मैं नहीं चाहती कि अब तुम मेरी वजह से लाचार महसूस करो, अगर तुम मुझे कभी भ्रष्टता प्रकट करते देखो, तो मैं चाहती हूँ कि इस बारे में इशारा कर तुम मेरी मदद करो।" यह कहने के बाद, तब मुझे हैरत हुई जब बहन मिंग ने मेरे खिलाफ अपने मन में कुछ नहीं रखा, बल्कि कहा कि उसे उम्मीद है कि मैं उसका हुनर निखारने में उसकी मदद करूंगी। जब मैंने देखा कि अपनी बहन का दिल इतना दुखाने और उसे लाचार करने के बावजूद, उसने अपने मन में मेरे खिलाफ कुछ नहीं रखा है, तो मैंने और भी ज़्यादा शर्मिंदा महसूस किया। मैंने सोचा, "भविष्य में, मैं इसकी अच्छी साझीदार बनूंगी और कर्तव्य निभाने में इसकी मदद करूंगी।" इसके बाद, जब कभी मैं बहन मिंग को अपने संगीत में ग़लतियाँ करते देखती, मैं अभी भी कभी-कभार उसे नीची नज़र से देखने लगती, लेकिन फिर तुरंत समझ जाती कि मेरा अहंकारी स्वभाव प्रकट हो रहा है। तब मैं परमेश्वर से प्रार्थना कर पाती, अपने रवैये को ठीक कर पाती, एक शिक्षिका की तरह बर्ताव करना छोड़कर शांत और मित्रतापूर्ण तरीके से सीखने में उसकी मदद करती। थोड़ा वक्त गुज़र गया, मैंने महसूस किया कि उसके साथ मेरा रिश्ता काफी सामान्य हो चला था, मैं जो कुछ उसे सिखाती, वह तेज़ी से सीख लेती। कुछ भजन ऐसे थे, जिनको सीखने में स्कूल में मुझे कई महीने लग गये थे, लेकिन उसने महीने भर में ही वो सब सीख लिये। हम सभी जोश में थे और हमने परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद किया।

लेकिन उस अनुभव और इस सच के बावजूद कि मेरी दशा सुधर गयी, और बाहर से मैं पहले जैसी अहंकारी नहीं रही, फिर भी मुझे अपने अहंकारी और दंभी स्वभाव की न ज़्यादा समझ थी और न ही उससे घृणा। इसलिए अनुकूल हालात मिलते ही वही पुरानी समस्या ज़ोर–शोर से उठ खड़ी होती। इसके बाद, हमारे समूह ने अंतराल की गणना करने का अध्ययन शुरू किया। एक रात, मैंने देखा कि बहन मिंग की अंतराल की गणना बहुत धीमे हो रही थी, तो मैंने उसे एक आसान तरीका सिखाना चाहा। बहन हान और बहन शाओयू भी हमारी बात सुनने के लिए आ गयीं, जल्दी ही, बहन शाओयू और बहन मिंग ने मेरे सिखाये हुए तरीके से अंतराल की गणना कर ली। उनकी कामयाबी देखकर मैं खुद से प्रसन्न हुए बिना नहीं रह सकी। मैंने सोचा, "एक पेशेवर होने के नाते अपने स्तर की वाकई मैं अकेली ही हूँ।" मुझे लगा इन लोगों से बात करने और इन्हें पढ़ाने के सिवाय मुझे और कुछ नहीं चाहिए, लेकिन मैंने देखा कि बहन हान मेरे तरीके से गणना नहीं कर रही थी, और धीरे-धीरे कर रही थी। मैंने सोचा, "अगर तुम ये अपने तरीके से करोगी, तो एक घंटे में तुम कितने अंतरालों की गणना कर पाओगी? तुम बस समय नष्ट कर रही हो। बाकी दोनों मेरा सिखाया हुआ कर रही हैं और बहुत तेज़ी से कर रही हैं।" फिर मैंने बहन हान से कहा, "मैंने तुम्हें जो तरीका सिखाया है, उससे करने की कोशिश करो।" उसके चेहरे पर एक अजीब-सा भाव उभरा, और उसने कहा, मेरे सिखाने से पहले ही वह अंतराल की गणना करना जानती है क्योंकि उसने पहले ही एक दूसरा तरीका सीख लिया था। लेकिन मेरे सिखाये तरीके को सुनने के बाद, वह अब गणना नहीं कर पा रही है और वह बिल्कुल पशोपेश में है। मैं खुद को उससे घृणा करने से रोक नहीं पायी। मैंने सोचा, "मेरा तरीका बहुत आसान है, तुम इसे कैसे नहीं समझ पा रही हो? आज मैं तुम्हें यह तरीका सिखाऊंगी। मुझे यकीन नहीं होता कि तुम नहीं कर सकती हो!" तो, मैं एक स्टूल खींच कर उसके पास बैठ गयी, अपने हाथों के इस्तेमाल से उसे समझाने लगी कि कैसे करना है। मैंने इसे कई बार दोहराया, लेकिन उसके चेहरे पर मुझे उलझन के सिवाय कुछ नज़र नहीं आया, सो मैंने अपना गुस्सा दबाकर और आधे घंटे तक उसे समझाने की कोशिश की। मगर उसके बाद, मैंने देखा कि वह बहुत शर्मिंदा लग रही है, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने सोचा, शायद बहुत देर हो चुकी है, शायद वो इतनी थकी हुई है कि ये सब न कर सके," फिर मैंने उसे आराम करने के लिए छोड़ दिया।

आधी रात को, जब मेरी नींद खुली तो मैंने बहन हान को जाग कर अंतराल की गणना करते हुए देखा। मैं भौंचक्की हो गयी। मैंने उससे अब तक जाग कर गणना करने का कारण पूछा, उसने निराशा-भरे स्वर में कहा, "दरअसल, तुम्हारा बताया हुआ तरीका मैं अब तक नहीं समझ पायी हूँ। मैं अपने तरीके से अंतरालों की गणना कर सकती हूँ, बस वो तरीका थोड़ा धीमा है। मुझे लगता है अभी के लिए अपना तरीका ही इस्तेमाल करूं तो ठीक रहेगा।" जब मैंने अपनी बहन को आधी रात तक इतनी कड़ी मेहनत करते हुए, और मुझसे बात करते समय इतना सतर्क होते हुए देखा, तो मैंने थोड़ा दोषी महसूस किया, क्योंकि तभी मैं यह समझ पायी, "एक बार फिर, मैंने अपनी बहन को लाचार कर दिया, है न?"

इसलिए अगले दिन हमारी बैठक में, मैंने सभी से मेरी खामियों के बारे में खुल कर बोलने को कहा। इन बहनों ने कहा कि मैं हमेशा अधिकार जताकर बात करती हूँ, मैं बहुत घमंडी हूँ, और हमेशा उन्हें बेबस कर देती हूँ, हमेशा चीज़ें अपने ही तरीके से करने पर ज़ोर देती हूँ। उनमें से एक बहन ने कहा कि मैं हमेशा रूखेपन से बात करती हूँ और दूसरों को परेशान कर देती हूँ। जब मैंने अपनी बहनों को ये सब कहते सुना, तो तुरंत मेरे दिमाग पर धुंधलका-सा छा गया, और मेरे चेहरे पर बेचैनी झलकने लगी। यह सब स्वीकार कर पाना बहुत मुश्किल था। मैं खुद को व्यथित महसूस करने से रोक नहीं सकी। मैंने सोचा, "हो सकता है मैं थोड़ी अहंकारी हूँ, मगर मैं इस पर ध्यान तो दे रही हूँ। मैं इतनी बुरी तो नहीं हो सकती जितनी ये बोल रही हैं।" लेकिन मैंने इस बारे में थोड़ा और सोचा, तब मैं समझ पायी कि यह परमेश्वर की इजाज़त के कारण हो रहा है, और मुझे बहाने बनाने या बहस करने का कोई हक़ नहीं है। ऐसा करने का मतलब सत्य को स्वीकार करने से इनकार करना है। इसके अलावा, मैंने ही तो बहनों को मेरी खामियां बताने को कहा था। उन्होंने ईमानदारी से सब-कुछ बताया, और अगर मैं उन्हें स्वीकार न करूं, तो क्या यह बेवकूफ़ी नहीं होगी? एक बार यह सब समझ लेने के बाद, मैंने परमेश्वर से मन-ही-मन प्रार्थना की, मैंने विनती करते हुए कहा कि वह मुझे मेरी बहनों की बतायी बातों को स्वीकार करने और उनका पालन करने की इजाज़त दे। प्रार्थना करने के बाद मुझे थोड़ा सुकून मिला, फिर मैंने अपनी बहनों से कहा कि मैं अपनी समस्याओं पर आत्मचिंतन करूंगी।

बाद में, अपने धार्मिक कार्यों के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकार और दंभ हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों में प्रकाशित अर्थ को समझा, तो आखिरकार मैं जान पायी कि मेरे द्वारा प्रकाशित अहंकार और दंभ का और अपनी बहनों को लाचार करने के मेरे रवैये का मूल कारण यह था कि मेरे अंदर अभी भी अहंकारी शैतानी प्रकृति मौजूद थी। उस अहंकारी प्रकृति के साथ जीते हुए, मैं हमेशा खुद को दूसरों से बेहतर समझती थी, इसलिए मैं चाहती थी कि हर चीज़ में मेरा ही फैसला अंतिम हो। खास तौर से जब मैंने अपने पेशेवर हुनर को दूसरों से बेहतर पाया, तो मैं खुद को सबसे ऊपर रखकर एक शिक्षिका जैसा बर्ताव करने लगी, मैंने सबसे मेरी बात सुनने और मेरी आज्ञा मानने की अपेक्षा की। हालात सही होते, तो मैं अनजाने ही अपने ज्ञान और हुनर का दिखावा करती, सबसे मेरे ही विचारों को मानक मान कर पालन करने को कहती, यहाँ तक कि इन्हें सत्य समझ लेने को कहती और अपेक्षा करती कि दूसरे पूरी तरह से इनका पालन करें। जब मैंने देखा कि बहन हान अंतरालों की गणना के लिए मेरे तरीके का इस्तेमाल नहीं कर रही है, तो मैंने तुरंत नाराज़ होकर उससे ज़बरदस्ती की। मैंने जोर देकर कहा कि वह अपने तरीके बदले और मेरी बात सुने। मैंने उसके जज़्बात की ज़रा भी कद्र नहीं की, उसकी असल दिक्कतों पर ध्यान ही नहीं दिया। मैंने बहनों को समस्याओं पर संगति या चर्चा करने का मौक़ा तक नहीं दिया। मैं इतनी अहंकारी थी कि सारी समझदारी गँवा चुकी थी। अंत में, मैंने समूह की अपनी बहनों की ज़रा भी मदद नहीं की। मैंने सिर्फ उनका दिल दुखाया और उन्हें लाचार किया, उनके कर्तव्य को निभाने में मुश्किलें खड़ी कीं, और हर किसी के काम में रोड़े अटकाये। तभी मुझे एहसास हुआ कि अहंकारी स्वभाव के साथ जीवन-यापन न सिर्फ मुझे इंसानियत के साथ जीने नहीं दे रहा था, यह दूसरों के कर्तव्यों में भी गड़बड़ी पैदा कर रहा था और कलीसिया के काम में भी रुकावट डाल रहा था। मैं कैसे कह सकती थी कि अपना कर्तव्य निभा रही हूँ? क्या मैं ज़ाहिर तौर पर दुष्टता करके परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही थी? अगर देर-सबेर मैंने प्रायश्चित नहीं किया, तो परमेश्वर मुझे ठुकरा कर हटा देगा! मेरी बहनों का इन चीज़ों की तरफ इशारा कर मेरी मदद करना परमेश्वर द्वारा मेरी रक्षा करना ही तो था। उन संकेतों के बिना मैं अपने अहंकारी स्वभाव के साथ जीती रहती, और न जाने मैं कितनी दुष्टताएं करती रहती।

फिर, अपने धार्मिक कार्यों में, मेरा ध्यान परमेश्वर के वचनों के एक और अंश पर पड़ा : "परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, उसमें जीवन का श्वास फूंका, और उसे अपनी कुछ बुद्धि, अपनी योग्यताएँ, और अपना स्वरूप भी दिया। परमेश्वर ने मनुष्य को ये सब चीज़ें दीं उसके बाद, मनुष्य आत्मनिर्भरता से कुछ चीज़ों को करने और अपने आप सोचने के योग्य हो गया। यदि मनुष्य जो सोचता है और जो करता है वह परमेश्वर की नज़रों में अच्छा है, तो परमेश्वर इसे स्वीकार करता है और हस्तक्षेप नहीं करता है। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह सही है, तो परमेश्वर उसे भलाई के लिए ऐसे ही होने देगा। अतः वह वाक्यांश 'और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया' क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के नामों में कोई भी सुधार नहीं किया था। आदम उनका जो भी नाम रखता, परमेश्वर कहता 'हाँ' और उस नाम को वैसे ही दर्ज करता है। क्या परमेश्वर ने कोई राय व्यक्त की? नहीं, यह बिलकुल निश्चित है। तो तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी और मनुष्य ने कार्यों को अंजाम देने के लिए अपनी परमेश्वर-प्रदत्त बुद्धि का उपयोग किया। यदि जो कुछ मनुष्य करता है वह परमेश्वर की नज़रों में सकारात्मक है, तो इसे बिना किसी मूल्यांकन या आलोचना के परमेश्वर के द्वारा पुष्ट, मान्य, एवं स्वीकार किया जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई व्यक्ति या दुष्ट आत्मा, या शैतान नहीं कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I')। मैंने देखा कि परमेश्वर के सार में ज़रा-सा भी अहंकार, खुदगर्ज़ी, या दंभ नहीं था। आदम द्वारा सभी प्राणियों को नाम दिये जाने के बाद, परमेश्वर ने बिना किसी मतभेद के स्वीकृति देकर उनका प्रयोग शुरू कर दिया। परमेश्वर सृजनकर्ता है, उसकी बुद्धिमत्ता की तुलना इंसान से नहीं की जा सकती, फिर भी परमेश्वर कभी दिखावा नहीं करता या दूसरों से ज़ोर-जबरदस्ती नहीं करता कि वे उसकी बात सुनें। इसके बजाय, वह लोगों को मोहलत और आज़ादी देता है, अगर हम सकारात्मक काम करते रहें, तो वह दखल नहीं देता। जब मैंने इस पर गौर किया, तो मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। परमेश्वर की दृष्टि में मेरी अहमियत एक तिनके से भी कम की है, फिर भी मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये हुए पेशेवर ज्ञान और प्रतिभा का फायदा उठाना चाहती थी, और मैं खुद को हर किसी से ऊपर रखती थी, दिखावा करती थी, और दूसरों को नीची नज़र से देखती थी। मैं इस हद तक दूसरों पर दबाव डालती कि वे मेरी बात मानें, यहां तक कि मेरा लहज़ा तक बदल जाता था। मैं वाकई बहुत ज़्यादा अहंकारी थी। मेरी बहन अपने ज्ञात तरीके से अपना काम अच्छे से पूरा कर सकती थी, लेकिन मैंने उससे मेरा ही तरीका इस्तेमाल करने की ज़बरदस्ती की और उसे आज़ादी से सोचने का कोई मौक़ा नहीं दिया। मैं बहुत महत्वाकांक्षी और दबंग थी। मैं इतनी ज़्यादा नासमझ कैसे हो सकती थी? मैं पूरी तरह से शैतानी स्वभाव में जी रही थी, और यह सचमुच में घिनौना था। मैंने महसूस किया कि मैं चाहे जितनी गुणवान या प्रतिभाशाली रहूँ, अगर मैंने सत्य का अभ्यास नहीं किया या देर-सबेर अपने शैतानी स्वभाव को नहीं बदला, तो मैं परमेश्वर द्वारा ठुकराकर हटा दी जाऊंगी। यह सोचकर मुझे थोड़ा डर लगा, और मैं खुद से नफ़रत भी करने लगी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, यह कहकर कि मैं प्रायश्चित कर सत्य का अभ्यास करूंगी, और मैं अब अहंकारी स्वभाव के साथ नहीं जियूंगी।

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े जिनसे मुझे अहम को छोड़ने और अपने अहंकारी स्वभाव को निकाल फेंकने का रास्ता मिला। "रोब मत जमाओ। भले ही तुम व्यावसायिक रूप से सबसे ज़्यादा माहिर हो, या तुम्हें लगता हो कि तुम्हारी गुणवत्ता यहाँ के सभी लोगों से उत्तम है, तो भी क्या तुम अकेले काम कर सकते हो? तुम्हारे पास सबसे ऊंचा रुतबा हो, तो भी क्या तुम अकेले काम कर सकते हो? हर किसी की मदद के बिना, तुम बिल्कुल नहीं कर सकते। इसलिए, किसी को भी घमंडी नहीं होना चाहिए और किसी को भी अपनी ही मर्ज़ी से कर्म करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए; इंसान को अपना घमंड दबा देना चाहिए, अपने विचारों और नज़रिये को छोड़ देना चाहिए, और सबके साथ एकजुट होकर काम करना चाहिए। ऐसे ही लोग सत्य का अभ्यास करते हैं और इन्हीं में इंसानियत होती है। ऐसे ही लोगों से परमेश्वर प्रेम करता है, और ऐसे ही लोग अपना कर्तव्य निभाने के प्रति समर्पित होते हैं। सिर्फ यही होती है समर्पण की अभिव्यक्ति" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। "परमेश्वर इंसान को गुण प्रदान करता है, उन्हें विशेष हुनर और साथ ही विवेक और बुद्धि देता है। इंसान को इन गुणों का इस्तेमाल किस प्रकार से करना चाहिए? तुम्हें अपने विशेष हुनर, गुणों, विवेक और बुद्धि को अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित करना चाहिए। तुम्हें अपने ज्ञान की हर बात, जो भी तुम समझते हो, तुम्हारे द्वारा हासिल की जा सकने वाली हर चीज़ और जो कुछ भी सोच सको, उसे अपने कर्तव्य में इस्तेमाल करने के लिए अपना दिल और दिमाग़ लगा देना चाहिए। ऐसा करके तुम धन्य हो जाओगे" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने से मुझे समझ आया कि परमेश्वर ने मुझे प्रतिभा दी और मेरे भाग्य में संगीत के पेशेवर ज्ञान का अध्ययन करना लिखा, इसलिए मुझे इनका इस्तेमाल अहंकारी और घमंडी होने की पूंजी की तरह नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य को निभाने के लिए करना चाहिए। मैंने महसूस किया कि हर किसी में अपनी खूबियाँ और खामियां दोनों होती हैं, और मैं संगीत में कितनी भी माहिर क्यों न रहूँ, कभी भी हर चीज़ में सबसे अच्छी नहीं हो सकती, न ही इसका अर्थ यह है कि मुझे सत्य की वास्तविकता हासिल है। मुझे एहसास हो गया कि मुझे भाई-बहनों के साथ काम करना चाहिए, ताकि हम एक-दूसरे की कमियों की भरपाई कर सकें, एकजुट होकर परमेश्वर की गवाही देनेवाली रचनाएं रच सकें। ऐसा करना ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगा।

फिर, जब मैंने गुझेंग बजाया और अपनी बहनों के साथ हुनर सीखे, तो जहां कहीं मुझे लगता कि उन्हें सुधार करने की ज़रूरत है, मैं सचेतन होकर परमेश्वर से प्रार्थना करती, कि वह मुझे अपने अहम को त्यागने, उन्हें सब्र के साथ सिखाने, और उनकी खूबियों से सीखने की शक्ति दे। इसके बाद, अब उन्हें मेरी वजह से लाचारी महसूस नहीं होती थी, वे अपने कामों में अपनी प्रतिभाओं का इस्तेमाल कर पाते, और वक्त बीतने के साथ वे ज़्यादा-से-ज़्यादा आज़ादी महसूस करते। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से, हम लोग पहले से बहुत ज़्यादा तेज़ी से संगीत रचनाएं तैयार करने लगे, और उनकी गुणवत्ता सुधरती गयी। फिर, एक युवा बहन हमारे समूह में शामिल हुई, जिसने कभी भी संगीत के सिद्धांतों का अध्ययन नहीं किया था, इसलिए अधिक-से-अधिक तेज़ी से सीखने और महारत हासिल करने में उसकी मदद करने के लिए, मैंने उसके लिए एक पाठ्यक्रम तैयार किया जिसमें मौलिक विषयों से लेकर उच्च श्रेणी तक के विषय शामिल थे। मैंने सोचा, अगर वह मेरे पाठ्यक्रम का पालन करेगी तो बहुत जल्दी सब-कुछ सीख सकेगी। लेकिन एक दिन वह किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछने आयी जो वह नहीं समझ पायी थी, तब मैंने देखा कि उसका सवाल मेरे तैयार किये गये पाठ्यक्रम में नहीं था, मैं असहज महसूस करने लगी, मैंने सोचा, "मैंने तुम्हारे लिए इतना बढ़िया पाठ्यक्रम तैयार किया और तुम उसका पालन नहीं कर रही हो, बल्कि दूसरी चीज़ें देख रही हो। अगर तुम इस तरह पढ़ोगी, तो कब सुधार कर पाओगी? क्या तुम्हें मेरे पेशेवर ज्ञान पर शक है?" जब मेरे ख़याल इस मुकाम पर पहुँच गये, तो मैंने तुरंत पहचान लिया कि मेरा अहंकारी स्वभाव फिर से सिर उठा रहा है, इसलिए मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की और अपने अहम को त्याग दिया। मैंने सोचा कि पहले मैं किस तरह अपने अहंकारी स्वभाव के भरोसे काम किया करती थी, और अपने समूह की बहनों की बेबसी का कारण बन रही थी। इस बार, मैं जानती थी कि मुझे उसके विचारों की कद्र करनी चाहिए। मैंने फैसला किया कि मैं उसे उसकी ही गति और तरीके से अध्ययन करने दूंगी, मेरी समझ से जो उत्तम है उसी तरीके से सीखने की ज़बरदस्ती नहीं करूंगी। फिर, जब हम दोनों एक संगीत रचना पर साथ काम करने लगे, तो जब भी किन्हीं स्थानों पर हमारे विचार या ख़याल अलग होते, मैं सचेतन होकर अपने अहम को त्याग देती और उसके साथ उन समस्याओं पर चर्चा करती, आखिर, एक हफ़्ते बाद, हमारी संगीत रचना पूरी हो गयी, मुझे मालूम था कि यह सचमुच में परमेश्वर के मार्गदर्शन और आशीष से हो सका है। ठीक उसी तरह जैसे कि परमेश्वर अपने वचनों में कहता है, "जितना अधिक तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को धारण किए रहोगे; जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे भीतर रहेगा; और जितना अधिक तुम सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर की आशीष तुम पर होगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे')।

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