मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर को तीन चरणों का कार्य करने की क्या जरूरत है?

26 दिसम्बर, 2021

आज हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं : मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर को तीन चरणों का कार्य करने की क्या जरूरत है? यह विषय क्यों? क्योंकि यह एक अहम सत्य है जिसे समझना होगा और यह सीधे इस सवाल से जुड़ा हुआ है कि क्या कोई व्यक्ति बचाया जा सकेगा और राज्य में प्रवेश कर सकेगा या नहीं। परमेश्वर के कार्य को न समझें तो, अपनी धारणाओं के आधार पर परमेश्वर को सीमा में बाँधकर उसका प्रतिरोध करना और उसका उद्धार खोना आसान है। इस तरह की विफलताओं के ढेरों उदाहरण हैं। हम सब जानते हैं कि 2,000 साल पहले, प्रभु यीशु ने यहूदिया में प्रकट होकर मनुष्य को छुटकारा दिलाने के लिए कार्य किया था, और प्रचार किया था "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। उसने अनेक सत्य व्यक्त किए और बहुत-से चिन्ह और चमत्कार प्रकाशित किए, जिससे यहूदिया राष्ट्र में हलचल मच गई। यहूदी धर्म के उच्च अगुआ समझ सके कि प्रभु यीशु का कार्य और वचन बहुत अधिकारपूर्ण और सामर्थ्यवान थे, और फिर उसके अनुयायियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इन अगुआओं को लगा यीशु के कार्य से उनका रुतबा खतरे में पड़ जाएगा, इसलिए उन्होंने ऐसी चीजें ढूँढ़नी शुरू कीं जिनका वे उसके खिलाफ इस्तेमाल कर सकें, ऐसी अफवाहें और झूठ गढ़ने शुरू किए जिससे यीशु की निंदा हो, और लोगों को उसका अनुसरण करने से रोका जाए। यीशु आत्मा रूप में नहीं बल्कि मनुष्य का पुत्र था इसलिए वे और भी ज्यादा ढीठ और निरंकुश हो गए। उसकी अंधाधुंध निंदा कर उसके पीछे पड़ने, और उसे सूली पर चढ़ा देने के लिए उनका बहाना था कि उसका कार्य और वचन व्यवस्था से बाहर के हैं। इससे उन्हें परमेश्वर का धिक्कार और दंड मिला, और इस्राएल राष्ट्र 2,000 साल के लिए तबाह हो गया। इस तरह यहूदी लोगों ने परमेश्वर का उद्धार खो दिया। अब अंत के दिनों में, यीशु देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस लौट आया है, वह मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर बचाने के लिए सत्य व्यक्त करते हुए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य कर रहा है। सभी संप्रदायों के जो लोग परमेश्वर के प्रकटन के लिए तरसते हैं, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर, परमेश्वर की वाणी को पहचान गए हैं, और उसकी ओर मुड़ गए हैं। लेकिन बहुत-से धार्मिक अगुआ इसे स्वीकार नहीं कर पाते। उनकी अच्छी भेड़ें झुंड को छोड़कर चली गयी हैं, उनका रुतबा और आजीविका खतरे में हैं, जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को नकारने और निंदित करने के लिए तरह-तरह के झूठ गढ़ रहे हैं, विश्वासियों को गुमराह करने और उन्हें सच्चे मार्ग की जांच-पड़ताल से दूर रखने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। वे कहते हैं कि प्रभु यीशु ने मनुष्य को छुटकारा दिला दिया है और परमेश्वर का उद्धार-कार्य पूरा हो चुका है, जब वह आएगा तो विश्वासियों को स्वर्गारोहित करेगा। अब उद्धार का कोई कार्य बाकी नहीं है। वे शोर मचाते हैं : "अगर प्रभु वापस लौट आता है और हमें राज्य में नहीं ले जाता, तो वास्तव में वह प्रभु नहीं है! न्याय-कार्य करने वाला देहधारी प्रभु वास्तव में प्रभु नहीं हो सकता! हम जिसमें विश्वास रखते हैं, वो प्रभु वही है जो हमें स्वर्गारोहित करे!" खास तौर से जब वे देखते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर आत्मा रूप में नहीं, बल्कि एक आम मनुष्य का पुत्र है, तो वे और भी ज्यादा हठी हो जाते हैं, और ज्यादा कड़ाई से उसकी निंदा और तिरस्कार करते हैं। वे सुसमाचार को साझा करने वाले विश्वासियों की गिरफ्तारी के लिए कम्युनिस्ट पार्टी से गठजोड़ भी कर लेते हैं। अपने कर्मों से उन्होंने परमेश्वर को फिर से सूली पर चढ़ा दिया है। इस बारे में सोचिए। ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को, धार्मिक संसार नकारता और निंदित करता है, उसका प्रतिरोध करता है? इसलिए क्योंकि मनुष्य को शैतान ने गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है। हर इंसान शैतानी प्रकृति का है; सत्य से घृणा करता, और उससे उकता चुका है। दूसरा कारण यह है कि लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, इसलिए वे मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य को जितना सरल समझते हैं उतना वो है नहीं। हम जानते हैं कि इस्राएली मानते थे कि परमेश्वर का व्यवस्था के युग का कार्य पूरा हो जाने के बाद, सिर्फ व्यवस्था का पालन करने से उन्हें बचा लिया जाएगा, और जब मसीहा आएगा, तो उन्हें सीधे राज्य में ले जाया जाएगा। मगर हुआ क्या? प्रभु यीशु आया और यहूदी लोगों ने उसे सूली पर चढ़वा दिया। अनुग्रह के युग के लोगों ने सोचा, कि यीशु के छुटकारे के कार्य से, उनके पाप माफ कर दिए गए हैं, और वे हमेशा के लिए बचाए जा चुके हैं, इसलिए प्रभु के वापस लौट आने पर उन्हें सीधे राज्य में ले जाया जाना चाहिए। मगर क्या हुआ? सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है, और धार्मिक संसार शैतान की सत्ता के साथ गठजोड़ कर उसे फिर से सूली पर चढ़ा रहा है। वे सोचते हैं कि जब प्रभु यीशु के अपना कार्य पूरा करने के साथ परमेश्वर का उद्धार कार्य पूरा हो गया। लेकिन क्या यह वास्तव में सच है?

दरअसल, परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य के हर नए चरण की भविष्यवाणी पहले ही हो चुकी है। जब यीशु छुटकारे के कार्य के लिए आया, तो नबियों ने उसके आगमन की भविष्यवाणी कर दी थी। "एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी" (यशायाह 7:14)। "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके काँधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्‍ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्‍वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा" (यशायाह 9:6)। और परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय-कार्य के लिए, बाइबल में बहुत-सी, कम-से-कम 200, भविष्यवाणियाँ हैं, देखिए, प्रभु यीशु ने क्या कहा था : "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। "पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है" (यूहन्ना 5:22)। और पतरस की किताब में यह कहा गया : "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। परमेश्वर के कार्य में रुचि रखने वाले बड़ी आसानी से इसका आधार पा सकते हैं, फिर वे इतनी आक्रामकता से अड़कर परमेश्वर को सूली पर चढ़ाने की जिद नहीं करते। इससे दिखता है कि मनुष्य शैतान द्वारा कितनी गहराई तक भ्रष्ट किया जा चुका है। सभी इंसान शैतानी प्रकृति के होते हैं, और यह कहना उचित होगा कि सभी इंसान परमेश्वर के दुश्मन हैं। हम सबने इस सच्चाई को देखा है : व्यवस्था के युग से, अनुग्रह के युग में यीशु के छुटकारे के कार्य तक, और अब अंत के दिनों में, इन युगों के कार्य का समापन करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के देहधारी होकर न्याय-कार्य करने से यह स्पष्ट है कि परमेश्वर का मनुष्य को बचाने का कार्य ठीक तीन चरणों का है। तो उसके उद्धार-कार्य का तीन चरणों में किया जाना क्यों जरूरी है? यह ऐसी बात है, जिसे मनुष्य नहीं समझ सकता, इस कारण बहुत-से लोग परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध और निंदा करते हैं। इसके परिणाम बहुत गंभीर हैं। इसीलिए आज हम इस मसले की खोजबीन कर रहे हैं कि परमेश्वर के तीन चरणों में कार्य करने का कारण क्या है।

अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य ने उसकी प्रबंधन योजना के सभी रहस्यों को प्रकाशित किया है। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ें, ताकि हम इसे बेहतर समझ सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबधंन-कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, वे इसलिए भी हैं, ताकि परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध कर सके। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। ... मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान को हमेशा के लिए पराजित करने हेतु उसके साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पापबलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना')। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर का उद्धार-कार्य तीन चरणों में होता है। ये हैं यहोवा परमेश्वर का व्यवस्था के युग का कार्य, प्रभु यीशु का अनुग्रह के युग का छुटकारे का कार्य, और राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय-कार्य। ये तीन चरण मिलकर परमेश्वर का संपूर्ण उद्धार-कार्य हैं, और इस तरह से परमेश्वर मनुष्य को शैतान की ताकतों से कदम-दर-कदम बचाता है, ताकि हम परमेश्वर को पूरी तरह से हासिल हो सकें। प्रत्येक चरण के पीछे का महत्व बहुत गूढ़ है। ये सब मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का जरूरी कार्य हैं, और भ्रष्ट मनुष्य को पाप और शैतान की ताकतों से बचाने की प्रक्रिया के अहम भाग हैं।

आगे, मैं परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य का उसी के वचनों के आधार पर संक्षेप में वर्णन करूँगा। आइए, मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर के कार्य के पहले चरण की बात करें : व्यवस्था के युग में कार्य। हम सभी जानते हैं कि व्यवस्था के युग के लिए परमेश्वर के कार्य करने से पहले, मनुष्य बिल्कुल अज्ञानी था। वह नहीं जानता था कि परमेश्वर की आराधना कैसे करें, या पृथ्वी पर जीवन कैसे जीएं। वह हमेशा पाप और परमेश्वर का अपमान करता रहता, यह भी नहीं जानता था कि पाप किसे कहते हैं। लोगों को पाप से दूर रखने और सही ढंग से जीने में मदद करने के लिए, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का कार्य शुरू किया। आइए, इस बारे में परमेश्वर के वचन पढ़ें। "व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा को उन इस्राएलियों तक पहुँचाने के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित कीं, जो मिस्र के बाहर उसका अनुसरण करते थे। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को दी गई थीं, उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियंत्रित करने के लिए थीं, उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। वे सब्त का पालन करते थे या नहीं, अपने माता-पिता का आदर करते थे या नहीं, मूर्तियों की आराधना करते थे या नहीं, इत्यादि—यही वे सिद्धांत थे, जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से जला दिए गए, कुछ ऐसे थे जो पत्थरों से मार डाले गए, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया, इसका निर्धारण इस बात से किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थरों से मार डाला गया। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें यहोवा की आग में जला दिया गया। जो अपने माता-पिता का आदर नहीं करते थे, उन्हें भी पत्थरों से मार डाला गया। यह सब यहोवा द्वारा कहा गया था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को इसलिए स्थापित किया था, ताकि जब वह लोगों के जीवन की अगुआई करे, तो वे उसके वचन सुनकर उनका पालन करें, उसके विरुद्ध विद्रोह न करें। उसने नवजात मानव-जाति को नियंत्रण में रखने, अपने भविष्य के कार्य की नींव को बेहतर ढंग से डालने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया। इसलिए, यहोवा द्वारा किए गए कार्य के आधार पर प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य')। व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर ने अनेक व्यवस्थाएं और आदेश जारी किए, जिनमें मनुष्य को सिखाया गया कि परमेश्वर की आराधना कैसे करें और जीवन कैसे बिताएं। जो लोग व्यवस्था का पालन करते, उन्हें परमेश्वर से रक्षा और आशीष मिलते, जबकि व्यवस्था तोड़ने वालों को अपने पापों की माफी के लिए बलि देनी पड़ती। वरना उन्हें परमेश्वर से दंड और धिक्कार मिलता। व्यवस्था के युग के लोग, खुद परमेश्वर की धार्मिकता और क्रोध, अपमान न किए जा सकने वाले स्वभाव, और उसकी कृपा और आशीष को जानते थे। इसी कारण से वे यहोवा परमेश्वर से डरते थे और उसकी व्यवस्थाओं और आदेशों का पालन करते थे। उन्हें परमेश्वर की रक्षा प्राप्त थी और वे पृथ्वी पर सही जीवन जी रहे थे। अब आइए, इस बात पर गौर करें : अगर परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का कार्य न किया होता, तो मनुष्य का क्या होता? व्यवस्थाओं की पाबंदियों या परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना, सारे लोग अराजकता में डूब जाते, और शैतान के कब्जे में चले जाते। परमेश्वर का मनुष्य को व्यवस्थाएं देना बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य था! व्यवस्था के युग के उसके कार्य ने मनुष्य को सिखाया कि पाप क्या है, धार्मिकता क्या है, और दिखाया कि पाप के परिहार के लिए एक बलि की जरूरत होती है। परमेश्वर के कार्य के पहले चरण ने मनुष्य को न सिर्फ जीवन की सही राह पर चलाया, बल्कि उसने अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य के हालात पैदा किए, उसका रास्ता तैयार किया।

व्यवस्था के युग के आखिरी दिनों में, सभी मनुष्य शैतान द्वारा इतनी गहराई तक भ्रष्ट हो चुके थे कि वे अत्यधिक पाप कर रहे थे, और व्यवस्था अब उन्हें काबू में नहीं कर पा रही थी। उनके पास अपने पापों के लिए बलि की पर्याप्त सामग्री भी नहीं थी, इसलिए वे व्यवस्था के तहत मृत्युदंड का सामना कर रहे थे, सभी दर्द के मारे परमेश्वर को पुकार रहे थे। इसलिए खुद परमेश्वर प्रभु यीशु के रूप में देहधारी हुआ और व्यवस्था का युग समाप्त कर, अनुग्रह का युग शुरू करते हुए छुटकारे का कार्य किया। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़ें। "अनुग्रह के युग में, यीशु संपूर्ण पतित मानवजाति (सिर्फ इस्राएलियों को नहीं) को छुटकारा दिलाने के लिए आया। उसने मनुष्य के प्रति दया और प्रेममयी करुणा दिखायी। मनुष्य ने अनुग्रह के युग में जिस यीशु को देखा वह मनुष्य के प्रति प्रेममयी करुणा से भरा हुआ और हमेशा ही प्रेममय था, क्योंकि वह मनुष्य को पाप से बचाने के लिए आया था। उसने मनुष्यों के पापों को क्षमा किया फिर उसके क्रूस पर चढ़ने ने मानवजाति को पूरी तरह पाप से छुटकारा दिला दिया। उस दौरान, परमेश्वर मनुष्य के सामने दया और प्रेममयी करुणा के साथ प्रकट हुआ; अर्थात्, वह मनुष्य के लिए पापबलि बना और मनुष्य के पापों के लिए सूली पर चढ़ाया गया ताकि उन्हें हमेशा के लिए माफ किया जा सके" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने')। "यीशु द्वारा छुटकारा दिलाए बिना मानवजाति हमेशा के लिए पाप में रह रही होती और पाप की संतान और दुष्टात्माओं की वंशज बन जाती। इस तरह चलते हुए समस्त पृथ्वी शैतान का निवास-स्थान, उसके रहने की जगह बन जाती। परंतु छुटकारे के कार्य के लिए मानवजाति के प्रति दया और करुणामय प्रेम दर्शाने की ज़रूरत थी; केवल इस तरीके से ही मानवजाति क्षमा प्राप्त कर सकती थी और अंतत: पूर्ण किए जाने और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का अधिकार जीत सकती थी। कार्य के इस चरण के बिना छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना आगे न बढ़ पाती। यदि यीशु को सलीब पर न चढ़ाया गया होता, यदि उसने केवल लोगों को चंगा ही किया होता और उनकी दुष्टात्माओं को निकाला ही होता, तो लोगों को उनके पापों के लिए पूर्णतः क्षमा नहीं किया जा सकता था। जो साढ़े तीन साल यीशु ने पृथ्वी पर कार्य करते हुए व्यतीत किए, उनमें उसने छुटकारे के अपने कार्य में से केवल आधा ही किया था; फिर, सलीब पर चढ़ाए जाने और पापमय देह के समान बनकर, शैतान को सौंपे जाकर उसने सलीब पर चढ़ाए जाने का काम पूरा किया और मानवजाति की नियति वश में कर ली। केवल शैतान के हाथों में सौंपे जाने के बाद ही उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया। साढ़े तैंतीस सालों तक उसने पृथ्वी पर कष्ट सहा; उसका उपहास उड़ाया गया, उसकी बदनामी की गई और उसे त्याग दिया गया, यहाँ तक कि उसके पास सिर रखने की भी जगह नहीं थी, आराम करने की कोई जगह नहीं थी और बाद में उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसका संपूर्ण अस्तित्व—एक निष्कलंक और निर्दोष शरीर—सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने हर संभव कष्ट सहे। जो सत्ता में थे, उन्होंने उसका मज़ाक उड़ाया और उसे चाबुक मारे, यहाँ तक कि सैनिकों ने उसके मुँह पर थूक भी दिया; फिर भी वह चुप रहा और अंत तक सहता रहा, बिना किसी शर्त के समर्पण करते हुए उसने मृत्यु के क्षण तक कष्ट सहा, जिसके पश्चात उसने पूरी मानवजाति को छुटकारा दिला दिया। केवल तभी उसे आराम करने की अनुमति दी गई। यीशु ने जो कार्य किया, वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है; वह व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न ही वह अंत के दिनों के कार्य की जगह ले सकता है। यही अनुग्रह के युग, दूसरे युग, जिससे मानवजाति गुज़री है—छुटकारे के युग—में यीशु के कार्य का सार है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी')। जब यीशु हमारे बीच रहा, तो उसने प्रचार किया, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। उसने मनुष्य को स्वीकार करके प्रायश्चित करना, दूसरों से खुद जैसा प्रेम करना, दूसरों को सात गुना सत्तर बार माफ करना, परमेश्वर से पूरे दिल, आत्मा और दिमाग से प्रेम करना, आत्मा और सत्य से परमेश्वर की आराधना करना सिखाया, इत्यादि। यीशु के वचनों ने लोगों को समझाया कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और उन्हें उनकी आस्था में एक निश्चित लक्ष्य और दिशा दी। यह व्यवस्था की पाबंदियों और नियमों से बाहर का एक कदम था। उसने अनेक चिन्ह और चमत्कार भी दिखाए, रोगियों का इलाज किया, दुष्टात्माओं को निकाला, और पापों को क्षमा किया। उसमें भरपूर सहनशक्ति और धैर्य था। सारे लोग परमेश्वर के प्रेम और कृपा को महसूस कर सकते थे, उसकी मनोहरता निहार सकते थे, और उसके करीब आ सकते थे। अंत में, प्रभु यीशु को अनंत पाप बलि के रूप में सूली पर चढ़ा दिया गया, जिससे सदा के लिए हमारे पाप माफ हो गए। इसके बाद, लोगों को पापों की माफी के लिए सिर्फ प्रभु के सामने उन्हें स्वीकार कर प्रायश्चित करना था, फिर उन्हें व्यवस्था के तहत निंदित और दंडित नहीं किया जाता। वे प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आ सके, प्रभु द्वारा दी गई शांति, उल्लास, और आशीषों का आनंद उठा सके। स्पष्ट है कि यीशु का छुटकारे का कार्य मनुष्य के लिए एक बहुत बड़ा आशीष रहा है, जिससे हम आज तक जीवित रह और बढ़ सके हैं।

तो फिर क्या प्रभु यीशु के कार्य पूरा कर लेने और हमें शैतान के चंगुल से छुटकारा दिला देने का अर्थ यह है कि परमेश्वर का उद्धार-कार्य पूरा हो चुका है? क्या इसका अर्थ यह है कि हमें परमेश्वर का और अधिक उद्धार-कार्य नहीं चाहिए? इसका जवाब है : नहीं। परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं हुआ है। मनुष्य को परमेश्वर के उद्धार-कार्य के एक और चरण की जरूरत है। प्रभु यीशु ने मनुष्य को छुटकारा दिलाया और हमारे पाप माफ कर दिए गए, लेकिन हमारी पापी प्रकृति ठीक नहीं हुई है। हम अपनी पापी प्रकृति से चलते हैं और हमेशा भ्रष्टता के घेरे में जीते हैं। हम चौबीसों घंटे झूठ बोले बिना, पाप किए बिना नहीं रह पाते। हम प्रभु के खिलाफ विद्रोह करते और उसका प्रतिरोध करते हैं, और उसके वचनों पर अमल नहीं कर सकते। हम सब पाप के खिलाफ दर्द-भरे संघर्ष में, पाप करने, स्वीकार करने और दोबारा पाप करने के कुचक्र में जीते हैं। कोई भी इंसान पाप के बंधनों और बाध्यताओं से बच नहीं सकता। तो क्या पाप से बचकर न निकल सकने वाले लोग, सच में न्याय और शुद्धिकरण के बिना राज्य में स्वर्गारोहित किए जा सकते हैं? बिल्कुल नहीं। परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है। "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (ब्रानियों 12:14)। परमेश्वर ऐसे लोगों को कभी अपने राज्य में प्रवेश की अनुमति नहीं देगा, जो अब भी पाप और उसका प्रतिरोध कर सकते हैं। इसीलिए, प्रभु ने भविष्यवाणी की कि वह अपना छुटकारे का कार्य पूरा कर लेने के बाद दोबारा आएगा। प्रभु यीशु का वापस आना मनुष्य की पापी प्रकृति को पूरी तरह से ठीक करने के लिए, हमें पाप से बचाने के लिए है, ताकि हम पवित्र बन सकें और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकें। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17)। प्रकाशितवाक्य में भी भविष्यवाणी है : "उसने बड़े शब्द से कहा, 'परमेश्‍वर से डरो, और उसकी महिमा करो, क्योंकि उसके न्याय करने का समय आ पहुँचा है'" (प्रकाशितवाक्य 14:7)। हम देख सकते हैं कि वापस आने पर प्रभु यीशु सत्य व्यक्त करता है, न्याय-कार्य करता है, मनुष्य को सभी सत्यों में प्रवेश कराता है। यही है मनुष्य को पाप और शैतान की ताकतों से पूरी तरह से बचाना, हमें परमेश्वर के राज्य में ले जाना। यह कार्य का वह चरण है, जिसकी योजना परमेश्वर ने बहुत पहले बनाई थी, और यही उसकी प्रबंधन योजना का अंतिम चरण है। आइए, सत्य के इस पहलू को बेहतर समझने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

"पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का पूर्णतः समापन किया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

"अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

इसे पढ़ने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि परमेश्वर अंत के दिनों में न्याय-कार्य क्यों कर रहा है। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने हमें सिर्फ हमारे पापों के लिए क्षमा किया, लेकिन हमारी पापी प्रकृति अभी भी गहराई तक पैठी हुई है। हमें जरूरत है कि परमेश्वर कुछ और सत्य बोले, और मनुष्य को पूरी तरह शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय-कार्य का एक और चरण पूरा करे। यानी, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय-कार्य का रास्ता बनाया, जोकि सबसे अहम है, परमेश्वर के उद्धार-कार्य का सबसे मुख्य भाग है। यही पूर्ण उद्धार और राज्य में प्रवेश का हमारा एकमात्र मार्ग भी है। कार्य का यह चरण पूरा होने पर, मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो जाएगा, और हम पाप और परमेश्वर का प्रतिरोध करना छोड़ देंगे। हम सही मायनों में परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर उससे प्रेम करेंगे, और मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का कार्य खत्म हो जाएगा। यह होगा परमेश्वर की 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का समापन। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों में प्रकट होकर कार्य करना शुरू किया, और अनुग्रह के युग का समापन और राज्य के युग का आरंभ किया। उसने मनुष्य को शुद्ध करके पूरी तरह से बचाने के लिए जरूरी सभी सत्य व्यक्त किए हैं, न सिर्फ परमेश्वर की प्रबंधन योजना के तमाम रहस्यों को प्रकाशित किया है, बल्कि परमेश्वर का विरोध करने वाली मनुष्य की सभी शैतानी प्रकृतियों और स्वभावों का न्याय कर उन्हें उजागर किया है, परमेश्वर के बारे में हमारी तमाम धारणाओं और हमारी आस्था के गलत विचारों को प्रकाशित किया है। उसने हमें पाप से बच निकलने, पूरी तरह बचाए जाने और बहुत-कुछ पाने का रास्ता दिया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन अनमोल हैं! ये सत्य की वे वास्तविकताएं हैं, जो शुद्ध किए जाने और पूरी तरह से बचाए जाने के लिए मनुष्य के पास होनी ही चाहिए, और ये वो वचन हैं, जो परमेश्वर ने व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में कभी नहीं बोले। यह परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में, हमें अनंत जीवन के मार्ग पर लाया जाना है। परमेश्वर के बहुत-से चुने हुए लोगों ने, जो उसके न्याय से गुजर चुके हैं, अपनी भ्रष्टता और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली अपनी शैतानी प्रकृति की सच्चाई देखी है, परमेश्वर की धार्मिकता, अपमान न किए जा सकने वाले स्वभाव की सच्ची समझ हासिल की है, और उनके मन में उसके प्रति श्रद्धा जगी है। वे आखिरकार पाप की बेड़ियों से मुक्त हो गए हैं, और सच्चे इंसान के जैसे जी रहे हैं। उन सबके पास पाप से मुक्त होने और शैतान पर विजय पाने की अविश्वसनीय गवाही है। परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग जानते हैं कि परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय-कार्य, सही मायनों में मनुष्य के लिए उसका अंतिम उद्धार है! इस न्याय-कार्य के बिना, हम अपनी खुद की भ्रष्टता के सत्य को नहीं समझ सकेंगे, अपने खुद के पाप की जड़ को नहीं जान पाएंगे, और हम कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करके बदल नहीं पाएंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर विपत्तियों से पहले विजेताओं का एक समूह तैयार कर चुका है, और उसका राज्य का सुसमाचार दुनिया भर में फैल चुका है। तथ्य दिखाते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने शैतान को पूरी तरह से पराजित करके पूर्ण गौरव प्राप्त किया है, और उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना पूरी हो चुकी है। महाविपत्तियाँ शुरू हो चुकी हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले सभी दुष्कर्मी दंडित होंगे और विपत्तियों में नष्ट हो जाएंगे, और परमेश्वर न्याय पाकर शुद्ध किए गए लोगों की विपत्तियों के दौरान रक्षा करेगा। फिर एक नया स्वर्ग और पृथ्वी होगी— मसीह का राज्य पृथ्वी पर अवतरित होगा, जो लोग बच जाएंगे, वे परमेश्वर के लोग होंगे, जो सदा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे, उसके आशीषों और उसके द्वारा किए हुए वादों का आनंद उठाएंगे। यह पूरी तरह से प्रकाशितवाक्य की भविष्यवाणी को साकार करता है : "जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा" (प्रकाशितवाक्य 11:15)। "फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊँचे शब्द से यह कहते हुए सुना, 'देख, परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं'" (प्रकाशितवाक्य 21:3-4)।

इस मुकाम पर हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर के कार्य के तीन चरण कितने अनमोल और व्यावहारिक हैं! प्रत्येक चरण मनुष्य के पाप की समस्या सुलझाने और एक उद्देश्य पूरा करने के लिए है। यानी कदम-दर-कदम मनुष्य को शैतान की ताकत और पापों से बचाने के लिए है, ताकि हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकें और उसके वादे और आशीष पा सकें। प्रत्येक चरण अगले से जुड़ा हुआ है, और प्रत्येक चरण पिछले चरण की बुनियाद पर निर्मित है, प्रत्येक चरण पिछले वाले से ज्यादा गूढ़ और उन्नत है। वे करीब से जुड़े हुए और अटूट हैं, और कोई भी दूसरे के बिना सफल नहीं होगा। देखिए, व्यवस्था के युग के कार्य के बिना, कोई नहीं जान सकता था कि पाप क्या है, और हम सब पाप में जीते हुए शैतान द्वारा कुचल दिए गए होते। हमें शैतान ने दबोच कर मिटा दिया होता। अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य के बिना, मनुष्य ढेरों पाप करने के अपराध में दंड का भागी होता और हम आज तक जीवित न रहे होते। तो अगर परमेश्वर अंत के दिनों का न्याय-कार्य न करे, तो क्या होगा? इसके बिना, हम कभी भी पाप के बंधन से मुक्त नहीं हो सकेंगे, न ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के योग्य बन पाएंगे। पापों में डूबे रहने के कारण हम आखिरकार नष्ट कर दिए जाएंगे। स्पष्ट है, कार्य के इन तीन चरणों में एक भी चरण न हो, तो मनुष्य शैतान का हो जाएगा और कभी भी पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकेगा। कार्य के ये तीन चरण मिलकर, परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की पूर्ण प्रबंधन योजना बनाते हैं। प्रत्येक चरण पिछले से ज्यादा अहम है, और ये सभी मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएं हैं। ये पूरी तरह से मनुष्य के लिए परमेश्वर का अद्भुत प्रेम और उद्धार दर्शाते हैं, और हमें उसकी बुद्धिमत्ता और सर्वशक्तिमत्ता दिखाते हैं। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है, "मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। मेरे कार्य का उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता व्यक्त करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता दिखाने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता प्रकट करने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी निश्चितता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और झूठ, पवित्रता और मलिनता के बीच का अंतर बताने देने के लिए है, और यह भी कि क्या महान है और क्या हेय है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो जाएगी कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टिकर्ता—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है, जिनका मैंने सृजन किया है, और जो बाद में मेरे विरुद्ध हो गया। मेरी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है, और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरी गवाही देने, मेरी इच्छा समझ पाने, और मैं ही सत्य हूँ यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी')।

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