एक पीड़ादायी विफलता से सीखे गए सबक

20 अप्रैल, 2026

गैब्रिएला, इटली

2014 में, मैंने कलीसिया में अभिनय का कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया। अभिनय करने और अपने हुनर को निखारने के अलावा, बाकी समय मैं अपनी मर्जी से बिताती थी, इसलिए मेरा जीवन अपेक्षाकृत स्वतंत्र और आरामदायक था। चूँकि मुझे अभिनय करना पसंद था और मैं अपने प्रदर्शन में मेहनत करने को तैयार थी, दो फिल्मों में अभिनय करने के बाद मेरा हुनर काफी निखर चुका था, इसलिए अगुआ ने मुझसे निर्देशन का कर्तव्य सीखने को कहा। उस समय मैं काफी अनिच्छुक थी, सोच रही थी, “एक निर्देशक के पास कितनी सारी जिम्मेदारियाँ होती हैं। टीम जो कुछ भी करती है, उसमें शामिल होना पड़ता है और शूटिंग के बाद फुटेज की जांच करनी पड़ती है। यह मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला है। अगर मैं हर दिन इतनी कड़ी मेहनत करूँगी, तो पूरी तरह थककर चूर और बेहाल हो जाऊँगी!” लेकिन यह सोचकर कि कर्तव्य से इनकार करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं होगा, मैंने बेमन से इसे स्वीकार कर लिया। जब बहनों को पता चला कि मुझे निर्देशन का कर्तव्य निभाने के लिए पदोन्नत किया गया है, तो वे सब मेरे लिए खुश थीं, लेकिन मैंने सोचा, “यह साफ तौर पर थका देने वाला काम है। मैं कोई बड़ा आदेश लेने का प्रयास नहीं करती, क्योंकि बोझ जितना अधिक भारी होगा, यह देह के लिए उतना ही अधिक थकाऊ होगा। मैं बस एक साधारण अभिनेता बनकर रहना चाहती हूं। जब तक मैं खाली नहीं बैठी हूं, तब तक सब ठीक है।”

जब मैंने अपनी पहली फिल्म का निर्देशन संभाला, तो समन्वयक ने हर दिन का व्यस्तता भरा कार्यक्रम तय कर दिया। हर शूट के बाद, हमें अगले दृश्य के लिए अभिनय, शॉट्स या सेट के मसलों पर चर्चा करनी पड़ती थी। फिल्मांकन के दौरान, मैं मॉनिटर के सामने बैठती रहती थी और एक सेकंड के लिए भी अपना ध्यान नहीं भटकने देती थी। अगर मेरा ध्यान भटक जाता, तो मैं यह तय नहीं कर पाती कि प्रदर्शन सटीक है या नहीं और मुझे प्लेबैक देखना पड़ता या री-शूट करना पड़ता। कभी-कभी, सेट पर शूटिंग खत्म होने और टीम के अन्य सदस्यों के चले जाने के बाद भी, मुझे अन्य कार्यों को निपटाने के लिए पीछे रुकना पड़ता था। इसके अलावा, इस फिल्म में कई नायक और खलनायक थे और मुझे अभिनेताओं को उनके दृश्य समझाने पड़ते थे, उनके साथ रिहर्सल करनी पड़ती थी, उन्हें सिखाना पड़ता था और इस सबकी निगरानी करनी पड़ती थी। हर दृश्य के लिए, मुझे पहले से ही पात्रों की गहराई में जाना पड़ता था और उन्हें अच्छी तरह समझना पड़ता था ताकि मैं परख सकूँ कि अभिनेताओं का प्रदर्शन उनके पात्रों के अनुरूप है या नहीं। भावनात्मक दृश्यों के लिए तो यह खास तौर पर सच था : जब कोई अभिनेता पात्र में ढल नहीं पाता था, तो मुझे उसे सही भावनात्मक दशा में लाने के तरीके खोजने पड़ते थे। मुझे बस यह महसूस होता था कि एक निर्देशक होना मानसिक रूप से इतना अधिक निचोड़ देने वाला है! एक अभिनेता के रूप में, मुझे बस अपना हिस्सा अच्छे से निभाना होता था और बस। वह कर्तव्य कितना ज्यादा आरामदायक था। मैं अपने दिल की गहराई से निर्देशन के कर्तव्य से नफरत करती थी। उसके बाद, मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह होने लगी। फिल्मांकन के दौरान, जब मैं अभिनेताओं को अपेक्षित प्रभाव लाने के लिए संघर्ष करते देखती थी, तो यह सोचने के बजाय कि उनके प्रदर्शन को निखारने के लिए उन्हें कैसे सिखाऊँ, मैं बस जल्दबाजी में टेक को मंजूरी दे देती थी। नतीजतन, जब अगुआ फिल्म क्लिप की समीक्षा करती थी तो वह प्रदर्शन को मानक स्तर का नहीं पाती थी और हमें फिर से फिल्मांकन करना पड़ता था। एक दूसरे मौके पर, जिस बहन के साथ मैं सहयोग कर रही थी, उसने मुझसे रिहर्सल के दौरान अभिनेताओं के प्रदर्शन में कुछ शारीरिक गतिविधियाँ जोड़ने के लिए कहा। मुझे लगा कि यह बहुत झंझट का काम है, इसलिए मैंने नहीं किया। नतीजतन, प्रदर्शन में कमी रह गई और फिल्मांकन शुरू होने से ठीक पहले, उसे अभिनेताओं को उन गतिविधियों को डालने के लिए मौके पर ही सिखाना पड़ा, जिससे शूट में देरी हो गई। उस पल मुझे अंदर से बहुत बुरा लगा, मैं जानती थी कि मैंने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई है। लेकिन उसके बाद, जब भी वास्तव में काम करने का समय आता, मुझे अभी भी लगता था कि यह कर्तव्य करना बहुत थकाऊ और मुसीबत भरा है। दो महीने पलक झपकते ही बीत गए और अभिनेताओं को लगातार अपने प्रदर्शन में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। समन्वयक ने मुझे कई बार याद दिलाया कि मैं अभिनेताओं से उनके दृश्यों की रिहर्सल और अधिक विस्तार से कराऊँ, लेकिन न केवल मैं उसकी बात नहीं सुनती थी, बल्कि प्रतिरोध भी महसूस करती थी, मैं सोचती थी, “और विस्तार में जाना कितना बड़ा झंझट होगा! ये रिहर्सलें आखिर कितना समय लेंगी?” यहाँ तक कि मैं बहस करने की कोशिश करती थी, कहती थी, “जब मैं एक अभिनेता थी, तो कोई भी मुझे इतनी बारीकी से नहीं सिखाता था। क्या अभिनय करना अभिनेता की अपनी जिम्मेदारी नहीं है?” जब रिहर्सल का समय होता, तब भी मैं अभिनेताओं को बिना किसी विवरण के केवल एक मोटी रूपरेखा दे देती थी, जिसकी वजह से बार-बार री-शूट होते और निर्माण शेड्यूल में देरी होती।

कुछ समय बाद, भाई एलियास को निर्देशन के कर्तव्य में मेरे साथ सहयोग करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। समन्वयक ने मुझसे कहा, “ऐसा लगता है कि तुम अकेले निर्देशन का कर्तव्य निभाने में संघर्ष कर रही हो। अब से, तुम मुख्य रूप से अभिनेताओं को उनके दृश्य समझाने के लिए जिम्मेदार होगी और भाई एलियास मॉनिटर से चीजों की निगरानी करेगा।” यह सुनकर मैं वास्तव में काफी खुश थी। मैंने सोचा, “बढ़िया! अब मुझे मॉनिटर देखने और चीजों की निगरानी करने की जरूरत नहीं है। इस तरह, मेरा समय और अधिक लचीला होगा और मुझे इतनी थकान नहीं होगी।” उसके बाद, जैसे ही मैं अभिनेताओं के साथ रिहर्सल खत्म करती, मैं चली जाती और अपने निजी मामलों में लग जाती। मुझे कोई परवाह नहीं थी कि वे कैसा प्रदर्शन करते हैं और नतीजतन, वास्तविक शूट के दौरान अभिनेताओं के प्रदर्शन में हमेशा समस्याएं आती थीं। समन्वयक ने मुझसे कहा कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये की जाँच करूँ, लेकिन मैंने मन ही मन सोचा, “अगर अभिनेता अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं तो इसमें मुझे क्या जांचना है? क्या इसका दोष अब मुझ पर मढ़ा जा रहा है?” मैं जितना इस बारे में सोचती, उतना ही मुझे लगता कि यह कर्तव्य एक ऐसा काम है जिसमें कोई यश नहीं मिलता। उन दिनों, जिन कई अभिनेताओं को मैं सिखा रही थी, उन्हें फिल्मांकन के दौरान मसलों का सामना करना पड़ रहा था। समन्वयक ने मुझे एक बार फिर अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये पर चिंतन करने की याद दिलाई और तब जाकर मैंने चिंतन करना शुरू किया। पीछे मुड़कर देखूँ तो, भले ही पिछले कुछ दिनों से मेरी देह को आराम मिल रहा था, लेकिन मैं अपने दिल में एक अजीब सी बेचैनी महसूस करती थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और आत्म-चिंतन किया और मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “‘तुम्हें चालाक बनना और सुस्ती बरतना पसंद है, है न? तुम्हें आलसी होना और आराम में लिप्त होना पसंद है, है न? तो फिर ठीक है, हमेशा आराम में ही लिप्त रहो!’ परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर किसी और को देगा।” फिर मैंने वह पूरा अंश पढ़ने के लिए निकाला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से निभाते हो और इससे अनादरपूर्ण रवैये के साथ निपटते हो तो परिणाम क्या होगा? तुम उस कर्तव्य में भी अच्छा काम करने में असफल हो जाओगे जिसे तुम अच्छी तरह से निभाने में सक्षम हो—तुम्हारा प्रदर्शन मानक स्तर का नहीं होगा, और कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये से परमेश्वर बहुत असंतुष्ट होगा। यदि तुम परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हो, सत्य खोज सकते हो और अपना पूरा दिल और दिमाग उसमें लगा सकते हो, यदि तुम इस तरह से सहयोग कर सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे लिए सब कुछ पहले से तैयार कर देगा, ताकि जब तुम मामलों को सँभालो तो सब कुछ सही जगह पर आ जाए और अच्छे परिणाम मिलें। तुम्हें बहुत अधिक ऊर्जा खर्च करने की आवश्यकता नहीं होगी; जब तुम सहयोग करने की भरसक कोशिश करते हो तो परमेश्वर तुम्हारे लिए सब कुछ की व्यवस्था करता है। अगर तुम धूर्त और सुस्त हो, अगर तुम अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते और हमेशा गलत रास्ते पर चलते हो तो फिर परमेश्वर तुम में कार्य नहीं करेगा; तुम यह अवसर खो बैठोगे और परमेश्वर कहेगा, ‘तुम्हारा उपयोग करने का कोई तरीका नहीं है। जाकर एक तरफ खड़े हो जाओ। तुम्हें चालाक बनना और सुस्ती बरतना पसंद है, है न? तुम्हें आलसी होना और आराम में लिप्त होना पसंद है, है न? तो फिर ठीक है, हमेशा आराम में ही लिप्त रहो!’ परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर किसी और को देगा। तुम लोग क्या कहते हो : यह हानि है या लाभ? (हानि।) यह बहुत बड़ी हानि है!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। इसे पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि अपने कर्तव्य के प्रति व्यक्ति का रवैया बहुत अहम होता है। अगर लोग पूरे दिल और दिमाग से अपना कर्तव्य कर सकते हैं, तो परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करेगा और उनका मार्गदर्शन करेगा और वे अच्छे नतीजे हासिल करेंगे। लेकिन अगर उनका रवैया छिछोरा या लापरवाह है, तो जो कर्तव्य थोड़ी सी मेहनत से अच्छे से किया जा सकता था, वह खराब तरीके से किया जाएगा। मैंने साफ देखा कि अभिनेताओं का प्रदर्शन मानक के अनुरूप नहीं था, फिर भी खुद को परेशानी से बचाने के लिए मैं उन्हें धैर्यपूर्वक नहीं सिखाती थी और बस जल्दबाजी में टेक मंजूर कर देती थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि जब प्रदर्शन मानक पर खरे नहीं उतरे तो हमें री-शूट करने की जरूरत पड़ी। रिहर्सल करते समय मैं अभिनेताओं को बिना किसी विवरण के केवल एक मोटी रूपरेखा दे देती थी, जिसकी वजह से उनमें से कई लोगों को सेट पर अपने प्रदर्शन में समस्याओं का सामना करना पड़ता था, जिससे निरंतर री-टेक होते थे और शेड्यूल में देरी होती थी। यह सब मेरे अपने कर्तव्य में लापरवाह होने और कामचोरी करने के कारण हुआ था। समन्वयक ने मुझे कई बार याद दिलाया था कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये पर चिंतन करूँ लेकिन मैंने बस बहस की और बहाने बनाए। मैं अपने कर्तव्य में हमेशा लापरवाह रहती थी जिससे लगातार समस्याएं पैदा होती थीं, इसलिए समन्वयक ने मॉनिटर से चीजों की निगरानी करने देने से मुझे रोक दिया। लेकिन न केवल मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया, बल्कि मैं वास्तव में खुश थी क्योंकि मेरी देह को और ज्यादा आराम मिल सकता था। मैं पूरी तरह से सुन्न हो गई थी! कलीसिया ने मुझे एक अभिनेता के रूप में विकसित किया था, मुझे सीखने के बहुत सारे अवसर दिए थे। पवित्र आत्मा के प्रबोधन और मार्गदर्शन से मैंने अभिनय का कुछ अनुभव भी जुटा लिया था। अब, जब कलीसिया मुझे एक निर्देशक बनने के लिए विकसित कर रही थी और उसे जरूरत थी कि मैंने जो सीखा है उसे अपने कर्तव्य में लागू करूँ, तो मैंने प्रतिरोध किया, शिकायत की और लापरवाह बनी रही, सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझे थोड़ा समय और मेहनत लगानी पड़ती और मेरे शरीर को कष्ट सहना पड़ता। मुझमें मानवता की इतनी कमी थी, मैं परमेश्वर के लिए वास्तव में घृणित थी! खास तौर पर परमेश्वर के ये वचन पढ़ने के बाद, “तुम्हें चालाक बनना और सुस्ती बरतना पसंद है, है न?” “परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर किसी और को देगा।” मुझे एहसास हुआ कि मुझे मॉनिटर से चीजों की निगरानी करने के लिए नहीं कहे जाने की वजह यह थी कि मैं अपने कर्तव्य में कामचोरी कर रही थी और गैर-जिम्मेदार थी। मैं अब भरोसेमंद नहीं रही थी, इसलिए कर्तव्य के इस हिस्से को करने का अवसर किसी और को दे दिया गया। मैं पहले से ही एक खतरनाक कगार पर थी; अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया, तो मैं अभिनेताओं को उनके दृश्य समझाने का मौका भी खो सकती थी। तो उसके बाद, मैंने अभिनेताओं के साथ रिहर्सल को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया। जब भी मैं देखती कि किसी अभिनेता के प्रदर्शन में कमी है, तो मैं उसे तुरंत बताती थी और धैर्यपूर्वक सिखाती थी। मैं अभिनेताओं के साथ देखने के लिए कुछ संदर्भ वीडियो भी ढूँढ़ती थी। आखिरकार, उस फिल्म का फिल्मांकन सुचारु रूप से पूरा हो गया।

मुझे लगा कि मैं थोड़ा-सा बदल चुकी हूँ, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि अगली फिल्म के फिल्मांकन के दौरान मैं फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आऊँगी। उस समय, मैं अभी भी अभिनेताओं को सिखाने के लिए जिम्मेदार थी। इस फिल्म में मुख्य अभिनेत्री बहन इसाबेल थी। उसने अभी-अभी अभिनय सीखना शुरू किया था और उसके प्रदर्शन में बहुत सारी कमियाँ थीं, जिसका मतलब था कि मुझे पहले से अधिक मानसिक ऊर्जा खपानी और कीमत चुकानी पड़नी थी। आरंभ में जब हमने शूटिंग शुरू की, तब भी मैं लगन से काम कर पा रही थी। अभिनेताओं की प्रस्तुति में जहाँ कमी होती थी मैं तुरंत इंगित कर देती थी और कभी-कभी खुद प्रदर्शन करके भी उन्हें दिखाती थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हर दृश्य के लिए अभिनेताओं को सिखाना मानसिक रूप से थका देने वाला लगने लगा। साथ ही, जिस भाई विंसेंट के साथ मैं सहयोग कर रही थी, वह अपने कर्तव्य में काफी सक्रिय था और अभिनेताओं को सिखाने के बारे में बहुत लगनशील था, इसलिए मेरा अपना बोझ धीरे-धीरे कम होता गया। मैंने दूसरे कामों के बारे में चिंता करना भी बंद कर दिया। कुछ बार मैंने देखा कि बहन इसाबेल की अपने पात्र पर अच्छी पकड़ नहीं है। शुरू में मैंने उससे बात करने के लिए रात में कुछ समय निकालने की योजना बनाई, लेकिन फिर मैंने सोचा कि दृश्यों को समझाने में दिन भर भागदौड़ करने के बाद मैं पहले ही कितनी थक चुकी होती हूँ। अगर मैं उसे रात में सिखाऊँगी, तो निश्चित रूप से अगले दिन की शूटिंग के लिए मुझमें ऊर्जा नहीं बचेगी। इसलिए मैंने बस यह सोचा, “छोड़ो भी, मैं उसे नहीं सिखाऊँगी।” नतीजतन, अगले दिन फिल्मांकन के दौरान, बहन इसाबेल के प्रदर्शन में समस्याएं आईं, जिससे हमारी प्रगति में देरी हुई। मुझे अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह न निभाने का गहरा अफसोस था, लेकिन उसके बाद, जब भी कीमत चुकाने की बारी आती, मैं अभी भी अपनी देह के लिए विचारशीलता दिखाती थी और सत्य का अभ्यास नहीं कर पाती थी। धीरे-धीरे, मुझे अभिनेताओं को सिखाना और भी मुश्किल लगने लगा, यहां तक कि मुझे अब उनके प्रदर्शन में समस्याएं भी दिखाई नहीं देती थीं। प्रदर्शन के मुद्दों के कारण, हमें बार-बार री-टेक करने पड़ते थे। यह और साथ ही कई अन्य कारकों का मतलब था कि फिल्म पूरी नहीं हो सकी और अंत में, फिल्म टीम को भंग कर दिया गया। जिस रात हमारी टीम भंग हुई, मैं पूरी रात करवटें बदलती रही और सो नहीं पाई। पीछे मुड़कर देखूँ तो, जब से मुझे निर्देशन का कर्तव्य करने के लिए कहा गया था, मैंने कभी भी वास्तव में समर्पण नहीं किया था। मुझे यह कर्तव्य बहुत ही थकाऊ होने की वजह से हमेशा से नापसंद था। मैंने ईमानदारी से खुद से पूछा, “क्या ऐसा हो सकता है कि मैं बस दैहिक सुखों में लिप्त होने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करती हूँ? क्या यह परमेश्वर के प्रति विद्रोही होना नहीं है?” एक सभा के दौरान अगुआ ने मेरी काट-छाँट की, यह कहा “परमेश्वर के घर ने तुम्हें एक निर्देशक बनने के लिए विकसित किया, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम इतनी गैर-जिम्मेदार होगी। तुम वास्तव में भरोसे के लायक नहीं हो!” उस दौरान मेरा दिल हमेशा खालीपन महसूस करता था। जैसे ही मैं यह सोचती कि अब मेरे पास सुधार करने का कोई मौका नहीं है, मेरे चेहरे से अनचाहे ही पीड़ा के आँसू बहने लगते थे। मैं अक्सर अपना कर्तव्य पूरा न करने और अपने किए गए अपराधों के लिए पीड़ा में रहती थी। मैं परमेश्वर की इतनी ऋणी महसूस करती थी कि मुझे उससे प्रार्थना करने में भी शर्म आती थी, हमेशा यह महसूस होता था कि परमेश्वर को मुझसे घिन और घृणा है, कि वह मुझसे अपना चेहरा छिपा चुका है और मेरी उपेक्षा कर रहा है। यह ऐसा था मानो मुझे परमेश्वर द्वारा दरकिनार कर दिया गया हो और मेरी आत्मा अंधकार और पीड़ा में हो। बाद में, मुझे सुसमाचार का प्रचार करने की व्यवस्था दी गई। यूँ तो मैं अभी भी एक कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन यह मामला मेरे दिल में एक अनसुलझी गाँठ की तरह रहा। उसके बाद मैंने बहुत बार प्रार्थना की और खोज की, “परमेश्वर, आखिर मुझसे कहाँ चूक हुई? कृपया मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन करो ताकि मैं खुद को जान सकूँ।”

एक दिन, जब मैंने आलसी लोगों को उजागर और निरूपित करने वाले परमेश्वर के वचन पढ़े, तो मैंने यह महसूस किया कि मेरे दिल को गहराई तक बेध दिया गया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे दो शब्दों में सारांशित करें तो वे बेकार लोग हैं; उनमें दोयम दर्जे की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन सार्थक कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे ऐसे कष्ट नहीं सहना चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; वे सुख-सुविधा में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के मौकों का आनंद लेना और एक मुक्त और तनावमुक्त जीवन का आनंद लेना ही जानते हैं। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। उन पर विचार करते हुए, निर्देशन का कर्तव्य निभाने के समय का एक के बाद एक दृश्य मेरे दिमाग में उभरने लगे। परमेश्वर के घर ने मेरे लिए यह व्यवस्था की थी कि मैं एक निर्देशक के रूप में अभिनेताओं को उनकी अदाकारी का प्रशिक्षण दूँ। मैंने साफ देखा था कि मुख्य अभिनेत्री के प्रदर्शन में कमियाँ थीं लेकिन खुद को ज्यादा थकने से बचाने के लिए, मैंने उसे नहीं सिखाया, अपनी सबसे बुनियादी जिम्मेदारी तक नहीं निभाई। भाई विंसेंट को इतना सक्रिय देखकर, मैंने स्थिति का फायदा उठाया और अपने काम से पल्ला झाड़ लिया। कागजों पर तो मैं भी निर्देशक थी, लेकिन असलियत में निर्देशन सिर्फ भाई विंसेंट कर रहा था। इसकी वजह से कार्य के बहुत सारे पहलू ठीक से नहीं हो रहे थे और अंत में, फिल्म पूरी नहीं हो सकी और पूरी टीम को भंग कर दिया गया। भाई-बहनों ने कई महीनों तक जो कीमत चुकाई थी और परमेश्वर के घर ने जो कुछ भी खर्च किया था, वह सब पानी में बह गया। मेरे पास निर्देशक का पद तो था लेकिन मैंने कोई वास्तविक काम नहीं किया और अपना उचित कार्य पूरा करने में विफल रही। क्या मैं सिर्फ एक नाममात्र की निर्देशक नहीं थी, जो पूरी तरह से बेकार थी? मैं आलसी और बेपरवाह थी और अपने कर्तव्य में हमेशा लापरवाह रहती थी। परमेश्वर ने मुझे बहुत बार याद दिलाने के लिए लोगों, घटनाओं और चीजों को तैयार किया था, लेकिन मैंने कभी सच्चे मन से पश्चात्ताप नहीं किया। अंत में, मैंने पवित्र आत्मा का कार्य खो दिया; मैं अपने कर्तव्य में समस्याओं की पहचान नहीं कर सकी और मेरी आत्मा को असाधारण रूप से अंधकार और पीड़ा महसूस होती थी। मैं हमेशा “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” और “चार दिन की जिंदगी है, मौज कर लो” जैसे शैतानी विचारों के सहारे जीती थी। मेरा मानना था कि व्यक्ति को अपने चंद दशकों के जीवन में खुद को इतना अधिक नहीं थकाना चाहिए; बस हर दिन आजादी और आराम से जीना ही काफी है। इस तरह की सोच के नियंत्रण में, मैं आलसी हो गई और मैंने सुधार के प्रयास करना बंद कर दिया। मुझे याद है स्कूल में, जब दूसरे लोग नंबर वन बनने के लिए कड़ी पढ़ाई करते थे, तो मुझे पढ़ाई करना बहुत थकाऊ लगता था और मैंने जल्दी ही पढ़ाई छोड़ दी। शादी करने के बाद, मुझे उन लोगों से ईर्ष्या नहीं होती थी जो कार और घर खरीदते थे क्योंकि मैं संपत्ति गिरवी रखने या कार ऋण का बोझ नहीं लेना चाहती थी और खुद को इतने अधिक दबाव में नहीं डालना चाहती थी। परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर देने के बाद मैं महत्वपूर्ण कार्य नहीं लेना चाहती थी। मैं बस एक कर्तव्य करने से ही संतुष्ट थी, यह सोचती थी कि बस खानापूरी करना और परमेश्वर का कार्य खत्म होने पर नष्ट न होने का परिणाम हासिल कर लेना काफी होगा। कलीसिया ने मुझे निर्देशक बनने के लिए विकसित किया, यह उम्मीद की कि मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए अपने हुनर का इस्तेमाल कर सकती हूँ, लेकिन मुझे यह कर्तव्य बहुत थकाऊ लगा और मैंने दिल की गहराई से इसका प्रतिरोध किया। भले ही मैंने इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन मैं हमेशा कामचोरी करती रही और लापरवाह बनी रही। मुझे बाइबल की एक पंक्ति याद आई : “क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं(इब्रानियों 10:26)। मैं अच्छी तरह जानती थी कि अपने कर्तव्य में लापरवाह होना और कामचोरी करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं था, फिर भी मैं दैहिक सुख की खातिर ऐसा करती थी, फिल्म के कार्य में देरी कर बैठती थी। क्या यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना नहीं था? शैतानी दृष्टिकोणों के सहारे जीते हुए, मैं सुख में लिप्त और अपने कर्तव्य में गैर-जिम्मेदार रही, अपने पीछे एक के बाद एक अपराध छोड़ती रही। परमेश्वर कहता है : “अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य)। शैतानी जहर के सहारे जीते हुए, मैं बरबादी और विनाश की राह पर चल रही थी। एक निर्देशक के रूप में, मुझे टीम के लिए एक मिसाल कायम करनी चाहिए थी, लेकिन मैं एक उचित मार्ग पर नहीं चली। मैं केवल अपने दैहिक सुख के बारे में और कड़ी मेहनत से बचने के बारे में सोचती थी और अपने कर्तव्य में लापरवाह थी और कामचोरी करती थी। नतीजतन, भाई-बहनों ने अपना जो महीनों का समय बिताया उसका कोई नतीजा नहीं निकला और पूरी टीम भंग हो गई। मैं वह जिम्मेदारी नहीं उठा सकी जो एक इंसान को निभानी चाहिए। मैं बस एक निकम्मी थी और निकाल दिए जाने के लायक थी! मैंने यह एहसास भी किया कि परमेश्वर का मुझे दरकिनार करना मुझ पर उसका मौन न्याय था। यह मुझ पर परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव उतरना था, यह मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम और उद्धार था। वरना, मैं अपने अनुसरण के पीछे के गलत नजरियों पर चिंतन नहीं करती। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “मनुष्य के वास्ते वह भ्रमण करता है और यहाँ-वहाँ भागता है; वह खामोशी से अपने जीवन का कतरा-कतरा दे देता है; वह अपने जीवन का हर पल और हर क्षण अर्पित कर देता है...(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। जैसे ही मैंने इस वाक्य पर सावधानी से विचार किया, “मनुष्य के वास्ते वह भ्रमण करता है और यहाँ-वहाँ भागता है,” मेरा दिल द्रवित भी हो गया और आत्म-ग्लानि से भी भर गया। मानवता को बचाने के लिए, परमेश्वर स्वर्ग से धरती पर दो बार देह में आया और उसने भारी अपमान सहा। पहली बार, उसे सूली पर चढ़ाया गया और उसने मानवता को छुटकारा दिलाने के लिए अपना जीवन दे दिया। अंत के दिनों में, परमेश्वर फिर से देहधारी हुआ है और हमें सींचने और पोषण देने के लिए इतने सारे सत्य व्यक्त कर रहा है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह लोगों को बचाने की खातिर है और वह सब उनके लिए प्रेम है। लेकिन बदले में मैंने परमेश्वर को क्या दिया? कुछ भी नहीं, सिवाय विद्रोहीपन और प्रतिरोध के। परमेश्वर का घर अभी भी मुझे कर्तव्य करने का मौका दे रहा था। यह परमेश्वर की दया थी और मेरे लिए पश्चात्ताप करने का एक मौका था। अगर मेरा पुराना स्वभाव नहीं बदला, तो जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा, मैं निश्चित रूप से विनाश की पात्र होऊँगी।

उस दौरान, मैंने बार-बार “परमेश्वर के प्रति नूह के समर्पण ने उसे स्वीकृति दिलाई” गीत गाया :

1  सभी मनुष्यों में नूह परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और परमेश्वर का आदेश पूरा करने का प्रतीक था, जो कि सर्वाधिक अनुकरणीय है; उसका परमेश्वर द्वारा अनुमोदन किया गया था, और आज परमेश्वर का अनुसरण करने वालों के लिए वह एक आदर्श होना चाहिए। और उसके बारे में सबसे अनमोल बात क्या थी? परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका केवल एक ही दृष्टिकोण था : सुनना और स्वीकारना, स्वीकारना और समर्पित होना, और मृत्युपर्यंत समर्पित होना। उसका यह रवैया ही था, जो सबसे अनमोल था, जिसने उसे परमेश्वर की स्वीकृति दिलाई। जब परमेश्वर के वचनों की बात आई तो वह लापरवाह नहीं रहा, उसने बेमन से प्रयास नहीं किया और उसने अपने दिमाग में उनकी पड़ताल, विश्लेषण, प्रतिरोध या उन्हें अस्वीकार नहीं किया और फिर अपने दिमाग में पीछे नहीं धकेला; इसके बजाय, उसने उन्हें गंभीरता से सुना, धीरे-धीरे अपने हृदय में उन्हें स्वीकार किया और फिर इस बात पर विचार किया कि बिना किसी विचलन के उन्हें कैसे उस तरह अभ्यास में लाया जाए, लागू किया जाए और उनका अभ्यास किया जाए जैसा कि मूल रूप में अभीष्ट था।

2  और जिस समय उसने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, उसी समय उसने अपने आप से अकेले में कहा, “ये परमेश्वर के वचन हैं, ये परमेश्वर के निर्देश हैं, परमेश्वर के आदेश हैं, मैं कर्तव्यबद्ध हूँ, मुझे समर्पण करना चाहिए, मैं कुछ भी नहीं छोड़ सकता, मैं परमेश्वर की किसी भी इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता, न ही मैं उसके द्वारा कही गई बातों में से किसी चीज को नजरअंदाज कर सकता हूँ, अन्यथा मैं मानव कहलाने के योग्य नहीं हूँगा, मैं परमेश्वर के आदेश के योग्य नहीं हूँगा, और उसके द्वारा उन्नत किए जाने के योग्य नहीं हूँगा। इस जीवन में, अगर मैं वह सब पूरा करने में असफल रहता हूँ जो परमेश्वर ने मुझे बताया और सौंपा है, तो मेरे पास पछतावा ही रह जाएगा। इससे भी बढ़कर, मैं परमेश्वर के आदेश और उसके द्वारा उन्नत किए जाने के योग्य नहीं रहूँगा, और मेरा सृष्टिकर्ता के सामने लौटने का मुँह नहीं होगा।”

3  वह हर चीज जिस पर नूह ने अपने दिल में सोच और विचार कर रखा था, उसका हर दृष्टिकोण और उसका हर रवैया, हर एक ने निर्धारित किया कि वह अंततः परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने, परमेश्वर के वचनों को वास्तविकता बनाने, परमेश्वर के वचनों को फलीभूत करने और ऐसा करने में सक्षम था कि वे उसके कठिन परिश्रम के माध्यम से पूरे और संपन्न हो जाएँ और उसके माध्यम से वास्तविकता में बदल जाएँ और ताकि परमेश्वर का आदेश व्यर्थ न जाए। नूह परमेश्वर के आदेश के योग्य था, वह परमेश्वर के भरोसे का व्यक्ति था, और एक ऐसा व्यक्ति था जिस पर परमेश्वर की कृपादृष्टि थी। परमेश्वर लोगों का हर शब्द और कर्म देखता है, वह उनके विचार और मत देखता है। परमेश्वर की दृष्टि में, नूह के लिए ऐसा सोचने में सक्षम होने का अर्थ था कि उसने गलत चुनाव नहीं किया था; नूह परमेश्वर के आदेश और भरोसे को अपने कंधों पर उठा सकता था और वह परमेश्वर का आदेश पूरा करने में सक्षम था : वह पूरी मानवजाति के बीच एकमात्र विकल्प था।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग दो)

नूह अंतरात्मा और मानवता वाला इंसान था। उसने परमेश्वर के आदेश को अपने पूरे दिल और मन से लिया, उसने जहाज के निर्माण को अपने जीवन की जिम्मेदारी और मिशन के रूप में लिया। जब नूह जहाज बना रहा था, तो उसकी निगरानी करने या उस पर जोर देने वाला कोई नहीं था और उसने बहुत सारी मुश्किलों का सामना किया। लेकिन जब भी उसने सोचा कि यह परमेश्वर का आदेश और उन्नयन है, तो वह प्रेरित महसूस करता था। नूह परमेश्वर के साथ सृष्टिकर्ता मानकर पेश आता था; वह परमेश्वर के प्रति समर्पण करता था और उसके पास परमेश्वर के लिए सच्चा दिल था। फिर मैंने विचार किया, परमेश्वर कहता है : “... परमेश्वर के वचनों को फलीभूत करना और ऐसा करना कि वे उसके कठिन परिश्रम के माध्यम से पूरे और संपन्न हो जाएँ और उसके माध्यम से वास्तविकता में बदल जाएँ और ताकि परमेश्वर का आदेश व्यर्थ न जाए।” परमेश्वर नूह के वास्तविक जीवन यापन करने की बात कर रहा था। नूह को जहाज बनाने की तकनीक नहीं आती थी और उस समय तकनीक उतनी उन्नत नहीं थी जितनी आज है। यही नहीं, उसे सारा साजोसामान खुद ढूँढ़ना पड़ता था, अपनी खुद की मेहनत से थोड़ा-थोड़ा करके जहाज बनाना पड़ता था। नूह को हर तरह के जीवित प्राणियों को भी इकट्ठा करना था, विभिन्न जानवरों के लिए तरह-तरह का भोजन तैयार करना था और सावधानी से उनकी देखभाल करनी थी और लालन-पालन करना था। यह कोई आसान काम नहीं था। अगर नूह को यह बहुत थकाऊ और मेहनत वाला लगता और वह लापरवाह होता, तो जहाज कभी नहीं बन पाता और सभी जीवित प्राणियों को विलुप्त होने का सामना करना पड़ता। लेकिन इतनी सारी मुश्किलों के बावजूद, नूह जरा भी पीछे नहीं हटा। इसके बजाय, उसने बिना किसी समझौते के परमेश्वर की अपेक्षाओं का सख्ती से पालन किया और परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए 120 साल तक डटा रहा। मैंने देखा कि नूह का दिल सच्चा था; वह परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील था और उसने परमेश्वर के प्रति वफादारी और समर्पण दिखाया। इस बारे में सोचकर, मैं बहुत द्रवित हो गई और मैंने सचमुच नूह की सराहना की। इसके विपरीत खुद को देखूँ तो, परमेश्वर के इतने सारे वचन सुनने के बाद भी, मैंने उसके प्रति जरा भी समर्पण या वफादारी नहीं दिखाई। मैं जो कर्तव्य निभाती थी वह नूह के जहाज बनाने से कहीं ज्यादा आसान था, फिर भी मैं थोड़ा-सा अतिरिक्त दिमाग लगाने को तैयार नहीं थी और लापरवाह भी थी। मैंने देखा कि मुझमें मानवता की इतनी कमी थी, मैं इंसान कहलाने के लायक नहीं थी। नूह वह करने के लिए उद्विग्न था जो परमेश्वर के लिए अत्यावश्यक था और वह उसी चीज का विचार करता था जिसका परमेश्वर कर रहा था, यह सुनिश्चित कर रहा था कि परमेश्वर के इरादे उसमें बेकार न जाएँ। उसकी देह चाहे कितनी भी थकी हुई या चूर क्यों न हो, परमेश्वर के आदेश के प्रति उसका रवैया सुनने, स्वीकार करने और समर्पण करने का था। जब तक वह जीवित रहा, वह जहाज बनाता रहा, मृत्यु तक समर्पणशील रहा। नूह का यह अनमोल रवैया परमेश्वर के दिल के लिए सुकून लेकर आया। केवल नूह जैसे लोग ही वे हैं जिनमें वास्तव में मानवता होती है। मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर का घर हमसे फिल्में बनाकर सुसमाचार का प्रचार करवाता है और परमेश्वर की गवाही दिलवाता है। हालांकि इसका रूप जहाज बनाने से अलग है, लेकिन मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का इरादा वही है। एक अच्छी तरह से बनाई गई फिल्म न केवल लोगों की धारणाओं का समाधान कर सकती है, बल्कि उन लोगों का मार्गदर्शन भी कर सकती है जो सच्चे मार्ग को खोजने और जाँचने के लिए प्रभु की वापसी के लिए लालायित हैं। अच्छी फिल्में बनाना इतना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लोगों को बचाने के परमेश्वर के इरादे से जुड़ा है। मैं अब और आलसी नहीं बन सकती थी और न ही इसमें दिमाग लगाने को झंझट मान सकती थी। मुझे नूह का अनुकरण करना था, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना सीखना था और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाना था।

मई 2024 में, कलीसिया ने यह व्यवस्था की कि मैं अनुभवजन्य गवाही वीडियो की समीक्षा का अंशकालिक कर्तव्य निभाऊँ। इसे लेकर मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर मुझे पश्चात्ताप करने का एक मौका दे रहा है और मैंने इसे तहेदिल से सँजोया, हर वीडियो की सावधानी से समीक्षा की। जब मेरा कर्तव्य मेरे दैनिक कार्यक्रम से टकराता था तो मैं अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करती थी और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देती थी। इस तरह अभ्यास करने पर, मुझे अब थकान महसूस नहीं होती थी। अक्टूबर में, अगुआ ने यह व्यवस्था की कि मैं अभिनेताओं को प्रशिक्षण देने के लिए फिर से फिल्म टीम में जाऊँ। यह खबर सुनकर मैं बहुत खुश हुई। ताकि रिहर्सल में देरी न हो, मैं जल्दी उठती थी और देर से सोती थी या वीडियो की समीक्षा करने के लिए अपने भोजन अवकाश का इस्तेमाल करती थी। अभिनेताओं के साथ रिहर्सल करते समय मैं उन्हें सिखाने की पूरी कोशिश करती थी और उनके साथ खूब अभ्यास करती थी। ऐसा करने से मेरा दिल सचमुच शांत और स्थिर महसूस करता था।

एक बार, मैं एक बहन से अपनी पिछली असफलता के अनुभव के बारे में बात कर रही थी और उसने मेरा मार्गदर्शन किया कि मैं अपने अनुसरण के पीछे के नजरिए पर चिंतन करूँ और इसे समझूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा : “सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीना आना चाहिए, और उनमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। लोगों को उन चीजों का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं शुद्ध प्रेम का अनुसरण जरूर करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जिसका मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी वे बिल्कुल पतरस जैसे बन पाएँगे। तुम्हें सक्रिय रूप से सकारात्मक पक्ष में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही, तुम्हें अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए निष्क्रिय नहीं हो जाना चाहिए और खुद को पीछे नहीं हटने देना चाहिए क्योंकि तुम अस्थायी आसानी से संतुष्ट हो। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें बिल्कुल जानवरों जैसे इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए और अपने जीवन से एक ऐसे खिलौने की तरह पेश नहीं आना चाहिए जो खेलने के लिए है। संकल्प रखने वाले और परमेश्वर से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं हैं और ऐसा कोई न्याय नहीं है जिस पर वह अडिग न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा मामला कोई नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है और तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए और उस मार्ग में अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर बिल्कुल पतरस जैसा संकल्प और जमीर होना चाहिए; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खेल नहीं खेलने चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा निष्कलंक, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। मैंने यह अंश पहले पढ़ा था, लेकिन मैंने कभी इस पर विचार नहीं किया था कि मेरा जीवन के प्रति नजरिया और मेरे मूल्य सही हैं कि नहीं। इसे पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि व्यक्ति को एक मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु का अनुसरण करने के बाद, पतरस ने प्रभु के मार्ग का प्रचार करते हुए हर जगह यात्रा की। उसने आरामदायक जीवन का अनुसरण नहीं किया, बल्कि केवल परमेश्वर से प्रेम और उसे संतुष्ट करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह निभाने का अनुसरण किया। अंत में, वह परमेश्वर के लिए सूली पर उल्टा चढ़ा दिया गया, उसने परमेश्वर के लिए परम प्रेम और मृत्युपर्यंत समर्पण प्राप्त किया। उसने परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त की और उसका जीवन मूल्यवान और सार्थक था। लेकिन मैं जिस चीज का अनुसरण करती थी वह आराम की जिंदगी थी, मैं हमेशा कम चिंता करना चाहती थी। ऐसा जीना अर्थहीन है; यह बस समय की बरबादी है। मैंने सोचा कि कैसे निर्देशन का कर्तव्य करने का मतलब था दूसरों से थोड़ा कम आराम करना और थोड़ा ज्यादा दिमाग लगाना और यह मेरी देह के लिए थोड़ा-सा अधिक थकाऊ था। लेकिन, इसका मतलब था कि मैं सुसमाचार कार्य में अपने हिस्से का योगदान दे सकती थी—यह कितनी मूल्यवान बात थी! अगर मैंने इसे अच्छी तरह किया होता, तो जब भी मैं इसके बारे में सोचती, मेरे दिल को शांति और सुकून मिलता। लेकिन अब, हर बार जब मैं असफलता के उस अनुभव को याद करती हूँ, तो मेरा दिल पछतावे और पीड़ा से भर जाता है। काश मैं समय को पीछे मोड़ पाती ताकि मैं अपने ऋण की भरपाई कर सकती! वह घटना मेरे जीवन में एक बड़ा अपराध और पछतावा बन गई है। मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने का अनुसरण करना था। अनुसरण करने का यही सही लक्ष्य है। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे शुद्ध किए जाने का अनुसरण नहीं करते और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, वे बस पेट भर खाना खाते हैं और सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है, तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। अगर कोई व्यक्ति दैहिक सुख में लिप्त होने के लिए ही जीता है और उसके पास अनुसरण करने का कोई लक्ष्य नहीं होता है, तो वह जानवर से अलग नहीं है। मैं इस तरह पतित होना जारी नहीं रख सकती थी। मुझे अपने दिमाग और अपनी ऊर्जा को सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने पर केंद्रित करना था। एक सच्चे इंसान की तरह जीने का यही एकमात्र तरीका है!

उसके बाद, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि अगर मैं फिर कभी अपने कर्तव्य में लापरवाह रही, तो वह मुझे आघात दे और अनुशासित करे। मैं अक्सर अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये की जांच भी करती थी। मैं जब भी लापरवाह होने के प्रति ललचाती थी तो तुरंत प्रार्थना करती थी और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करती थी। एक दोपहर, मैं एक अभिनेत्री के साथ संवादों का अभ्यास कर रही थी। उसे कई बार दुरुस्त करने के बाद भी उसमें सुधार नहीं हो रहा था। मुझे लगने लगा कि यह बहुत झंझट है और मैं उसे अब और सिखाना नहीं चाहती थी। तभी, मुझे दो दिन पहले पढ़े गए परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “जब तुम्हारा मन अनमने ढंग से काम करने, धूर्त बनने और कामचोरी करने का करे, और तुम अपना कर्तव्य करते समय परमेश्वर की जाँच-पड़ताल से बचने की कोशिश करो तो तुम्हें प्रार्थना करने और यह चिंतन करने के लिए परमेश्वर के सामने शीघ्र आना चाहिए कि क्या ऐसा करना सही है। फिर, कुछ सोच-विचार करो : ‘परमेश्वर में विश्वास करने में मेरा उद्देश्य क्या है? मेरी लापरवाही लोगों को तो मूर्ख बना सकती है, लेकिन क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बना देगी? इसके अलावा, मैं परमेश्वर में विश्वास और अपने कर्तव्य का निर्वहन इसलिए नहीं करता कि मैं धूर्त बनूँ और कामचोरी करूँ, बल्कि इसलिए करता हूँ कि मैं उद्धार पा सकूँ। इस तरह से व्यवहार करना यह दिखाता है कि मुझमें सामान्य मानवता नहीं है और यह ऐसा कुछ नहीं है जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता है। यह ठीक नहीं होगा। अगर मैं दुनिया में धूर्त होता, कामचोरी करता और अपनी ही मर्जी के अनुसार चलता तो यह एक बात होती, लेकिन अब मैं परमेश्वर के घर में हूँ, मैं परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हूँ, परमेश्वर की नजरों की जाँच-पड़ताल के अधीन हूँ और मैं एक इंसान हूँ, इसलिए मुझे अपनी अंतरात्मा और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना चाहिए, मैं अपनी मर्जी के अनुसार नहीं चल सकता, लापरवाह नहीं हो सकता या धूर्त और कामचोर नहीं हो सकता। तो मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मैं धूर्त और कामचोर न बनूँ और लापरवाही न करूँ? मुझे कुछ प्रयास करना चाहिए। अभी-अभी मुझे लगा कि उस तरह से व्यवहार करना बहुत ज्यादा मुश्किल भरा है, इसलिए मैं कठिनाई से बचना चाहता था, लेकिन अब मैं समझता हूँ : हो सकता है कि इसे इस तरह से करने में अधिक मुश्किल हो, लेकिन इससे नतीजे मिलते हैं, इसलिए मुझे यह इसी तरीके से करना चाहिए।’ जब तुम यह कर रहे हो और फिर भी कठिनाई झेलने को तैयार नहीं हो, तो ऐसे समय में तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए : ‘प्रिय परमेश्वर! मैं एक आलसी, धूर्त व्यक्ति हूँ। कृपया मुझे अनुशासित करो और मुझे फटकारो, ताकि मैं अंतरात्मा का बोध प्राप्त कर सकूँ और मुझमें शर्म की भावना हो। मैं लापरवाह नहीं रहना चाहता। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे प्रबुद्ध करो, ताकि मैं अपनी विद्रोहशीलता और अपनी कुरूपता देख सकूँ।’ जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, इस तरह आत्म-चिंतन करते हो और खुद को जानने की कोशिश करते हो, तो इससे पछतावे की भावना पैदा होगी; तुम अपनी कुरूपता से घृणा कर सकोगे और तुम्हारी गलत दशा बदलने लगेगी(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। मैंने अपने गलत विचारों और धारणाओं के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रार्थना की। फिर मैंने अभिनेत्री के साथ हर संवाद का विश्लेषण किया और पता लगाया कि उसकी समस्याएँ कहाँ थीं। उसके बाद, उसने अपने संवाद काफी बेहतर तरीके से बोले और अगले दिन का शूट बहुत सुचारु रूप से चला। इस तरीके से अभ्यास करने से मेरे दिल ने बहुत शांत और सुकून महसूस किया। बाद में, निर्देशक ने मुझसे कहा कि मैं अभिनेत्री के साथ नैरेशन रिकॉर्ड करने जाऊँ। मैंने इसे भी गंभीरता से लिया। जब हमने तड़के तक रिकॉर्डिंग की, तब भी मुझे थकान महसूस नहीं हुई। बाद में, जब फिल्म पूरी हो गई और मैंने संपादित वीडियो देखा, तो मैं बहुत द्रवित हो गई। यूँ तो मैंने इस फिल्म में सिर्फ एक छोटी-सी भूमिका निभाई थी, फिर भी मुझे महसूस हुआ कि यह कर्तव्य निभाना मूल्यवान और सार्थक था! परमेश्वर का धन्यवाद!

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