आरामपरस्ती में लिप्त होने पर चिंतन
डिंग शिन, चीनअगस्त 2022 में कलीसिया में नए विश्वासियों के सिंचन कार्य की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी। इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाने में सक्षम...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
अक्टूबर 2023 में अगुआओं ने मेरे लिए स्पेशल इफेक्ट्स बनाने के काम की व्यवस्था की। पहले तो मैंने बस कुछ बुनियादी काम सीखे और इसमें ज्यादा तकनीकी कौशल की जरूरत नहीं थी। अध्ययन करने के बाद मैंने जल्दी ही कुछ इफेक्ट्स बना लिए। बेहतर और अधिक वास्तविक स्पेशल इफेक्ट्स बनाने के लिए मुझे और तकनीकें सीखने की जरूरत थी। लेकिन मेरे मन में कुछ शंकाएँ थीं, “ये तकनीकें काफी मुश्किल हैं और मुझे पक्का नहीं है कि मैं इन्हें सीख पाऊँगा।” बाद में प्रशिक्षण सामग्री का अध्ययन करते समय कुछ काम ऐसे थे जो मुझे उस समय तो याद रहते पर बाद में भूल जाता था। कभी-कभी मैं प्रशिक्षण सामग्री में बताई गई बातें समझ नहीं पाता था, इसलिए उन्हें सीखना मुश्किल हो जाता था। कुछ समय सीखने के बाद, मुझे लगा कि इसमें बहुत माथापच्ची है, इसलिए मैं पीछे हटना चाहता था। उस समय मैंने टीम में एक भाई को ग्राफिक डिजाइन सीखते देखा और सोचा, “अगुआ ने मेरे लिए ग्राफिक डिजाइन के काम की व्यवस्था क्यों नहीं की? मैंने पहले यह काम सीखा है, अगर मैं यह काम करता तो मेरे लिए शुरू करना ज्यादा आसान होता और इस तरह मेरा काम थोड़ा आसान हो जाता।” बाद में मैंने भाई को अपने विचार बताए, लेकिन उसने कहा कि स्पेशल इफेक्ट्स के कर्तव्य के लिए लोग कम हैं, इसलिए उसने मुझे स्पेशल इफेक्ट्स सीखते रहने का सुझाव दिया। मुझे उसकी बात सही लगी, इसलिए मैंने सीखते रहने का फैसला किया। दो-तीन महीने बाद, मैंने कुछ प्रशिक्षण सामग्रियों का अध्ययन किया और ज्यादा मुश्किल स्पेशल इफेक्ट्स पर काम करना शुरू कर दिया। जब मुझे कोई मुश्किल आती तो मैं कोई खोजबीन करने की जहमत नहीं उठाता और सीधे अपने सहयोगी भाई के पास चला जाता था। भाई मुझे धैर्य से चीजें समझाता और समस्या जल्दी हल हो जाती थी। मैं मन ही मन सोचता, “अगली बार जब कोई मुश्किल आएगी तो मैं बस अपने सहयोगी से मदद माँग लूँगा। इस तरह काम बहुत आसान हो जाता है और मुझे ज्यादा सोच-विचार या चिंता नहीं करनी पड़ती है।” बाद में मैंने तकनीकी कौशल का अध्ययन करने और गहराई से सीखने पर ध्यान देना बंद कर दिया, मैं आम तौर पर बस कुछ सरल स्पेशल इफेक्ट्स बनाता था, इस वजह से मेरे कौशल में बहुत धीरे-धीरे सुधार हुआ। मार्च 2024 के अंत में, हमें एक ज्यादा जटिल स्पेशल इफेक्ट बनाना था, तो मैंने मन ही मन सोचा, “इसे बनाना थोड़ा झंझट का काम होगा। मुझे प्रशिक्षण सामग्री का अध्ययन करने में काफी मेहनत करनी पड़ेगी और कई स्रोतों से जानकारी खोजनी होगी, और यह शारीरिक तौर पर बहुत थकाऊ होगा। इससे अच्छा है कि मैं इसे अपने सहयोगी से ही करवा लूँ।” बाद में मैंने देखा कि मेरे सहयोगी ने इस स्पेशल इफेक्ट को बनाकर अपने तकनीकी कौशल में सुधार कर लिया है, जबकि मैंने कोई प्रगति नहीं की थी, इसलिए मुझे बहुत बुरा लगा और कुछ पछतावा भी हुआ। मेरे कौशल पहले से ही बहुत अच्छे नहीं थे और अगर मैंने अपने सहयोगी के साथ मिलकर कुछ जटिल स्पेशल इफेक्ट्स को गहराई से सीखा होता, तो मेरे कौशल में भी कुछ सुधार हो सकता था।
उसके बाद मैं सोचने लगा, “मैं अपने कर्तव्य में अध्ययन करने, खोजबीन करने और कठिनाइयों पर काबू पाने का प्रयास क्यों नहीं करना चाहता?” मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो ठीक मेरी दशा को संबोधित करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “दैहिक सुख-सुविधाओं की लालसा करना भी एक गंभीर मुद्दा है। तुम लोगों को क्या लगता है कि शारीरिक सुख-सुविधाओं की लालसा की कुछ अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? तुम लोगों ने निजी तौर पर जो अनुभव किए हैं, उनके आधार पर तुम लोग क्या उदाहरण दे सकते हो? क्या रुतबे के लाभों का आनंद लेना इसमें शामिल है? (हाँ।) कुछ और? (अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय कठिन के बजाय आसान कार्यों को प्राथमिकता देना और हमेशा हल्का काम करना पसंद करना।) कर्तव्य करते समय, लोग हमेशा हल्का काम चुनते हैं, ऐसा काम जो थकाए नहीं और जिसमें बाहर जाकर चीजों का सामना करना शामिल न हो। इसे आसान काम चुनना और कठिन कामों से भागना कहा जाता है, और यह दैहिक सुखों के लालच की अभिव्यक्ति है। और क्या? (अगर कर्तव्य थोड़ा कठिन, थोड़ा थका देने वाला हो, अगर उसमें कीमत चुकानी पड़े, तो हमेशा शिकायत करना।) (भोजन और वस्त्रों की चिंता और दैहिक आनंदों में लिप्त रहना।) ये सभी दैहिक सुखों के लालच की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब ऐसे लोग देखते हैं कि कोई कार्य बहुत श्रमसाध्य या जोखिम भरा है, तो वे उसे किसी और पर थोप देते हैं; खुद वे सिर्फ आसान काम करते हैं, और यह कहते हुए बहाने बनाते हैं कि उनकी काबिलियत कम है, कि उनमें उस कार्य को करने की क्षमता नहीं है और वे उस कार्य को अपने कंधे नहीं ले सकते—जबकि वास्तव में, इसका कारण यह होता है कि वे दैहिक सुखों का लालच करते हैं। वे कोई भी काम करें या कोई भी कर्तव्य निभाएँ, वे कष्ट नहीं उठाना चाहते। ... ऐसा भी होता है कि लोग अपना कर्तव्य करते समय कठिनाइयों की शिकायत करते हैं, वे मेहनत नहीं करना चाहते, जैसे ही उन्हें थोड़ा अवकाश मिलता है, वे आराम करते हैं, बेपरवाही से बकबक करते हैं, या आराम और मनोरंजन में हिस्सा लेते हैं। और जब काम बढ़ता है और वह उनके जीवन की लय और दिनचर्या भंग कर देता है, तो वे इससे नाखुश और असंतुष्ट होते हैं। वे भुनभुनाते और शिकायत करते हैं, और अपना कर्तव्य करने में अनमने हो जाते हैं। यह दैहिक सुखों का लालच करना है, है न? ... क्या दैहिक सुखों के भोग में लिप्त लोग कोई कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त होते हैं? जैसे ही कोई उनसे कर्तव्य करने या कीमत चुकाने और कष्ट सहने की बात करता है, तो वे इनकार में सिर हिलाते रहते हैं। उन्हें बहुत सारी समस्याएँ होती हैं, वे शिकायतों से भरे होते हैं, और वे नकारात्मकता से भरे होते हैं। ऐसे लोग निकम्मे होते हैं, वे अपना कर्तव्य करने की योग्यता नहीं रखते, और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (2))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हमेशा कठिनाइयों के बारे में शिकायत करना, अपने कर्तव्य में कठिनाइयाँ आने पर पीछे हट जाना और केवल आसान और सुविधाजनक काम करने के बारे में सोचना, आसान काम चुनना और दैहिक सुख में लिप्त होना है। जो लोग कोई भी कठिनाई सहना या कोई भी कीमत चुकाना नहीं चाहते, वे कोई भी वास्तविक काम करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग बेकार हैं और आखिर में हटा दिए जाएँगे। मैं बिल्कुल वैसा ही आलसी व्यक्ति था जिसे परमेश्वर ने उजागर किया। मैं अच्छी तरह से जानता था कि स्पेशल इफेक्ट्स के कर्तव्य में लोगों की कमी है, लेकिन मुझे लगा कि इस कौशल को सीखने में बहुत मेहनत लगती है और यह बहुत माथापच्ची वाला काम है, जब भी मुझे कठिनाइयाँ होतीं, तो मैं पीछे हटना चाहता था, सीखने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार नहीं था। जब मैंने टीम में एक भाई को ग्राफिक डिजाइन सीखते देखा, तो मैंने सोचा कि चूँकि मुझे इस क्षेत्र में कुछ अनुभव है और ग्राफिक डिजाइन बहुत मुश्किल नहीं है, मैं ग्राफिक डिजाइन करना और स्पेशल इफेक्ट्स के कर्तव्य से बचना चाहता था। बाद में जब और अधिक जटिल स्पेशल इफेक्ट्स बनाते समय, जब भी मेरे सामने मुश्किल तकनीकी समस्याएँ आतीं, तो मैं बस अपने सहयोगी से उन्हें हल करने के लिए कह देता, मैं सक्रिय रूप से अध्ययन या गहराई से खोजबीन नहीं करता था, इस वजह से मेरे कौशल में बहुत धीरे-धीरे सुधार हुआ। मैं वही कर्तव्य करता था जो करने में आसान होते थे, मैं केवल सरल, आसान काम करना चाहता था जिनमें ज्यादा मानसिक या शारीरिक मेहनत की जरूरत न हो और जब भी मुझे कठिनाइयाँ होतीं, तो मैं अपने कर्तव्य छोड़ देना चाहता था, मुझमें चुनौतियों पर काबू पाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का कोई इरादा नहीं था। इस रवैये के साथ मैं कोई हुनर नहीं सीख सकता था, अपना कर्तव्य तो और भी नहीं कर सकता था, मैं बस बेकार हो जाता और परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाऊँगा। मैं अब और इस तरह नहीं रहना चाहता था। बाद में मैंने और अधिक जटिल स्पेशल इफेक्ट्स कौशल सीखने की पहल की और मैंने पाया कि वे उतने मुश्किल नहीं थे जितना मैंने सोचा था। कुछ समय बाद मेरे तकनीकी कौशल में काफी सुधार हुआ। जो बातें मैं शुरू में नहीं समझ पाया था, वे स्पष्ट हो गईं और मैं ज्यादातर समस्याओं को हल कर सकता था। मैं बहुत खुश था।
लेकिन कुछ समय बाद मैं फिर से मौजूदा स्थिति से संतुष्ट हो गया। कभी-कभी जब मैं अपने सहयोगी को जटिल तकनीकों में गहराई से उतरते देखता, तो मैं मन ही मन सोचता, “उन तकनीकों को सीख पाना काफी मुश्किल होगा और वे सारे अनजान कोड मेरे सिर में दर्द कर देते हैं। उन्हें सीखने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और बहुत मानसिक प्रयास करना पड़ेगा। यह बहुत थकाऊ होगा! यह काफी है कि मैं यहाँ तक पहुँच गया हूँ। खुद के लिए चीजें और मुश्किल करने की जरूरत नहीं है। मैं इन मुश्किल हुनर को अपने सहयोगी भाई को ही सीखने दूँगा और बस वही करूँगा जो मैं कर सकता हूँ।” मेरे सहयोगी ने पूछा कि क्या मैं और मुश्किल कौशल सीखना चाहता हूँ, मैंने मुँह से तो हाँ कह दिया कि अगर मेरे पास समय हुआ तो मैं उन्हें सीख लूँगा, लेकिन असल में मैंने उन चीजों को कभी नहीं सीखा। एक बार उसने देखा कि मैं अभी भी पहली वाली प्रशिक्षण सामग्री का ही अध्ययन कर रहा हूँ और उसने कहा, “तुम यह कर्तव्य 8-9 महीने से कर रहे हो; ऐसा कैसे है कि तुमने अभी तक यह सेट पूरा नहीं किया है?” उसकी बातें मुझे चुभ गईं, लेकिन वह सही कह रहा था। दरअसल अगर मैंने इस प्रशिक्षण सामग्री का ठीक से अध्ययन किया होता, तो मैं इसे 3-4 महीने में पूरा कर सकता था, लेकिन कुछ तकनीकों में महारत हासिल कर लेने के बाद मैंने इसका गंभीरता से अध्ययन करना बंद कर दिया था, इसलिए मैंने अभी तक इसे सीखना पूरा नहीं किया था। मैं इस तरह से कैसे प्रगति कर सकता था? अपने कर्तव्य के प्रति अपने इस लगातार रवैये को देखकर मुझे बहुत असहज महसूस हुआ, इसलिए मैंने प्रार्थना की, परमेश्वर से खुद को जानने और सबक सीखने में मेरा मार्गदर्शन करने को कहा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे संक्षेप में प्रस्तुत करें, तो वे बेकार लोग हैं; उनमें एक द्वितीय-श्रेणी की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन उपयोगी कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे उन कष्टों को सहना नहीं चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; उन्हें सिर्फ सुख-सुविधाओं में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के समय का आनंद लेना और एक मुक्त और शांतिपूर्ण जीवन का आनंद लेना आता है। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर उजागर करता है कि आलसी लोग बेकार, दूसरों की मेहनत पर पलने वाले और मानवता से रहित होते हैं, परमेश्वर ऐसे लोगों से सचमुच घृणा करता है। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मैंने अपने कर्तव्य में अपने व्यवहार पर चिंतन किया : मैं कठिनाइयों को झंझट मानता था, मुश्किलों का सामना करने पर पीछे हट जाता था और थोड़ा भी कष्ट नहीं सहना चाहता था। अपने सहयोगी को नई तकनीकों का अध्ययन करते और उनमें गहराई से उतरते देखकर, मुझे लगा कि वे तकनीकें बहुत मुश्किल और झंझट भरी हैं, इसलिए मैं उनका अध्ययन नहीं करना चाहता था। मुझे लगा कि मैं जिस कौशल के स्तर तक पहुँच गया हूँ, वह पहले से ही काफी अच्छा है, इसलिए लोगों को मुझसे इतनी ऊँची अपेक्षाएँ नहीं रखनी चाहिए। मैं सचमुच किसी काम का नहीं था। भले ही मैं अपना कर्तव्य कर रहा था, मैंने अपने कौशल को बेहतर बनाने में कोई प्रयास नहीं किया और नई तकनीकों में गहराई से नहीं उतरा, जिसका मतलब था कि मैं जटिल इफेक्ट्स नहीं बना सकता था। प्रशिक्षण सामग्री का एक सेट जो तीन-चार महीने में पूरा हो सकता था, उसमें मैंने नौ महीने लगा दिए। मैं परमेश्वर के घर का दिया हुआ भोजन खा रहा था और परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद ले रहा था, फिर भी मैं बस यह थोड़ा सा काम करके ही संतुष्ट था, यह सोचे बिना कि अपने पेशेवर कौशल और कार्य कुशलता को कैसे बेहतर बनाया जाए। मैं एक परजीवी का जीवन जी रहा था। मुझमें सचमुच मानवता की कमी थी, मैं बिल्कुल वैसा ही जमीर और विवेक से रहित पशु था जिसे परमेश्वर ने उजागर किया। अगर मैंने अध्ययन करने का प्रयास किया होता, तो मेरे कौशल निश्चित रूप से पहले से बेहतर होते। लेकिन मैं बस शारीरिक आराम में लिप्त रहा और कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार नहीं था। मैं हमेशा अपने आराम के दायरे में ही रहता था, मेहनत करने को तैयार नहीं था और मैं बस दूसरों की मेहनत का फल खाता था। भले ही मेरा शरीर थका नहीं, मैंने अपने कौशल में बहुत कम प्रगति की और मैं अपने कर्तव्यों में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका। यह ठीक वैसा ही था जैसा परमेश्वर ने कहा : “आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं।” जिस तरह से मैं अपना कर्तव्य कर रहा था, वह होशियारी नहीं, बल्कि मूर्खता थी!
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मुझे यह एहसास हुआ कि लापरवाह होना और अपने कर्तव्य में आसान काम चुनना बेहद खतरनाक है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अपना कर्तव्य करने में उनमें समर्पण है, ऊपरवाला जो भी व्यवस्था करता है वे उसे करते हुए लगते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, ‘क्या तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से करते हो? क्या तुम इसे सिद्धांतों के अनुसार करते हो?’ तो वे कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं, बस इतना कहते हैं, ‘मैं वैसा ही करता हूँ जैसा ऊपरवाला निर्देश देता है और बेतहाशा गलत कर्म करने की हिम्मत नहीं करता।’ जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है तो वे कहते हैं, ‘कुछ भी हो, मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए।’ देखा? अपना कर्तव्य करते समय उनका हमेशा इसी तरह का रवैया होता है—वे जल्दबाजी नहीं करते हैं, चीजों को धीरे-धीरे करते हैं और आधा-अधूरा मन लगाते हैं। तुम वाकई उनमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ सकते, लेकिन अगर तुम उनके कर्तव्य-निर्वहन को सत्य सिद्धांतों की कसौटी पर मापते हो तो तुम पाते हो कि यह अकुशल है और मानक-स्तर का नहीं है। और फिर भी, उन्हें कोई परवाह नहीं है, वे पहले की तरह ही कार्य करना जारी रखते हैं और वे अब भी वे चीजें नहीं करते हैं जिन्हें करने की उन्हें पहल करनी चाहिए—वे बिल्कुल भी नहीं बदलते हैं। क्या वे चिकने घड़े नहीं होते हैं? वे हमेशा यही रवैया बनाए रखते हैं : ‘तुम्हारे पास हजारों शानदार योजनाएँ हो सकती हैं, लेकिन मेरे अपने कुछ नियम हैं। मैं बस ऐसा ही हूँ! देखते हैं तुम मेरे साथ क्या कर सकते हो। मेरा यही रवैया है!’ उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जो अत्यंत विश्वासघाती या बुरा हो, लेकिन उन्होंने बहुत-से अच्छे कर्म भी नहीं किए हैं। तुम क्या कहोगे कि वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या परमेश्वर में अपने विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति उनका रवैया अच्छा है? (नहीं।) बाइबल में परमेश्वर यह कहता है : ‘इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ’ (प्रकाशितवाक्य 3:16)। गुनगुना होना, यानी न ठंडा होना और न ही गर्म—क्या यह रवैया अच्छा है? (नहीं।) कुछ लोग सोचते हैं, ‘अगर मैं बुराई करता हूँ और गड़बड़ियाँ पैदा करता हूँ तो मेरी फौरन निंदा की जाएगी। लेकिन अगर मैं सकारात्मक और सक्रिय रूप से चीजें करता हूँ तो मैं थक जाऊँगा और अगर मैं कुछ करते हुए गलती कर दूँ तो हो सकता है कि मेरी काट-छाँट कर दी जाए या यहाँ तक कि मुझे बर्खास्त भी कर दिया जाए, जो कितना शर्मनाक होगा! इसलिए मैं गुनगुना रहता हूँ, न ठंडा और न ही गर्म। तुम मुझसे जो भी करने को कहोगे, मैं उसे करूँगा। लेकिन अगर तुम मुझे कुछ करने को नहीं कहोगे तो मैं दखल नहीं दूँगा। इस तरह से मुझे थकान नहीं होगी और इसके अलावा, लोग मुझमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ पाएँगे। यह तरीका बढ़िया है!’ क्या आचरण करने का यह तरीका अच्छा है? (नहीं।) तुम जानते हो कि यह अच्छा नहीं है, तो तुम्हारे अभ्यास में कैसा बदलाव आना चाहिए? यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने का प्रयास कभी नहीं करते और फिर भी शैतान के फलसफों के अनुसार जीते रहते हो, तो तुम्हारे उद्धार पाने की कोई आशा न होना तय है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर उजागर करता है कि लोग अपने कर्तव्यों में केवल सतही काम करते हैं, वे सक्रिय रूप से और आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाते। यह अपने कर्तव्यों को आधे-अधूरे, उदासीन तरीके से करना है और ऐसे लोग अंततः परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाएँगे। मुझे लगा कि मेरी दशा बहुत खतरनाक है। मुझमें अपने कर्तव्य में सक्रिय रूप से और आगे बढ़कर काम करने वाले रवैये की कमी थी। मैं हमेशा बस यंत्रवत काम करता रहता था, न तो जोशपूर्ण था और न ही कामचोर, मैं तब तक संतुष्ट था जब तक मैं बिना किसी गड़बड़ी या बाधा के काम चला सकता था। मैं अपने कर्तव्यों में बहुत कम प्रगति कर रहा था, बस सरल काम करता और जैसे-तैसे काम चलाता था। अपने कर्तव्यों को उदासीन तरीके से करके, मैं ठीक वैसा ही बेशर्म और जिद्दी बन रहा था जैसा परमेश्वर उजागर करता है, शारीरिक कष्ट नहीं सहना चाहता था और बस लापरवाही से थोड़ी सी मेहनत करके ऐसा परिणाम पाना चाहता था जिससे कि मैं बस बचा रह सकूँ। मैं खुद को धोखा दे सकता था, लेकिन परमेश्वर को नहीं और अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया तो अंततः मुझे हटा दिया जाएगा।
बाद में मैंने सोचा, “मैं इतना आलसी क्यों हूँ और मैं आराम में क्यों लिप्त रहता हूँ? इस समस्या का मूल कारण क्या है?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “बहुत सालों से जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदय को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। उनमें न केवल इच्छा-शक्ति और संकल्प का अभाव है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और स्वेच्छाचारी भी बन गए हैं। उनमें खुद से ऊपर उठने के संकल्प का सर्वथा अभाव है, यही नहीं, उनमें इन अंधेरे प्रभावों की बाध्यताओं से पीछा छुड़ाने की लेशमात्र भी हिम्मत नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़े हुए हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में उनके दृष्टिकोण अभी भी बेहद वीभत्स हैं। यहाँ तक कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास के बारे में अपना दृष्टिकोण बताते हैं तो इसे सुनना मात्र ही असहनीय होता है। सभी लोग कायर, अक्षम, नीच और दुर्बल हैं। उन्हें अंधेरे की शक्तियों के प्रति क्रोध नहीं आता, उनके अंदर प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम पैदा नहीं होता; बल्कि, वे उन्हें बाहर निकालने का पूरा प्रयास करते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?)। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद लोग “जीवन सिर्फ अच्छा खाने और सुंदर कपड़े पहनने के बारे में है,” “ज़िंदगी छोटी है, तो जब तक है मौज करो” और “खुद से अच्छे से पेश आओ” जैसे शैतानी जहरों के सहारे जीते हैं। वे शारीरिक आनंद के पीछे भागने को अपना लक्ष्य बनाते हैं; वे सोचते हैं कि एक आसान और लापरवाह जीवन जीना ही खुशी है और जीवन का आनंद लेने का यही मतलब है, इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें कष्ट सहना या कीमत चुकाना नहीं चाहते। पीछे मुड़कर देखूँ तो जब मैं एक छोटे शहर में धीमी गति से काम करता था, तो काम अपेक्षाकृत आसान था, मुझे उस तरह का धीमा और आरामदायक जीवन पसंद था। भले ही वेतन थोड़ा कम था, मगर मुझे परवाह नहीं थी। मुझे लगता था कि जब तक मैं किफायत से काम चलाता हूँ, तब तक ठीक है। परमेश्वर को पाने के बाद भी मैं वैसा ही था। मैं प्रगति के लिए प्रयास किए बिना अपने कर्तव्य करता था और मैं हमेशा उदासीन और मौजूदा स्थिति से संतुष्ट रहता था। जब मैंने देखा कि स्पेशल इफेक्ट्स में मेरे कर्तव्य के लिए मुश्किल तकनीकें सीखने की जरूरत है, तो मैं प्रगति के लिए प्रयास किए बिना बस अपनी मुश्किलों में ही डूबा रहा, मैं उन तकनीकों को सीखना नहीं चाहता था, भले ही मैं कीमत चुकाकर उनमें महारत हासिल कर सकता था। मैं बस जैसे-तैसे काम चलाने और मौजूदा स्थिति बनाए रखने से संतुष्ट था, मुझमें परमेश्वर को संतुष्ट करने या उसके प्रति विचारशील होने की कोई इच्छा नहीं थी। परमेश्वर ने मुझे कर्तव्य करने का अवसर देकर मुझ पर अनुग्रह किया, इस इरादे से कि अपने कर्तव्यों के दौरान, मैं सत्य का अनुसरण करूँगा, अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग दूँगा और अपने कर्तव्य पूरे करूँगा। लेकिन मैं हमेशा शारीरिक आराम में लिप्त रहा और अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए कष्ट सहने या कीमत चुकाने को तैयार नहीं था। इतने सालों तक अपने कर्तव्य करने के बाद भी मैंने अभी तक किसी भी पेशेवर कौशल में महारत हासिल नहीं की थी और मैंने कोई तकनीक नहीं सीखी थी। मैं अपने दम पर कुछ भी सँभालने में असमर्थ था और मैं पूरी तरह से एक निकम्मा इंसान था। मैंने देखा कि मैं शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों के सहारे, बिना किसी गरिमा या ईमानदारी के जी रहा था, मैं न केवल अपने कर्तव्य पूरे करने में असफल रहा, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं सत्य प्राप्त नहीं कर सका और परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जाऊँगा। शैतानी जहर नकारात्मक चीजें हैं और वे लोगों को गुमराह करती हैं, जिससे वे भ्रष्टता में गिर जाते हैं। मैं अब और इस तरह से नहीं जीना चाहता था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, अपने कर्तव्यों के प्रति अपने रवैये को बदलने, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और पूरे दिल से अपना कर्तव्य करने को तैयार था।
बाद में मैंने परमेश्वर के आदेश के प्रति नूह के व्यवहार के बारे में परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे अभ्यास के कुछ मार्ग मिले। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तमाम तरह की परेशानियों, कठिन स्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए, नूह कभी पीछे नहीं हटा। जब उसके कुछ चुनौतीपूर्ण और जटिल कार्य अक्सर नाकाम हो जाते थे और नुकसान हो जाता था तो भले ही नूह अपने दिल में परेशान और चिंतित महसूस करता था, फिर भी जब वह परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचता, जब उसे परमेश्वर के आदेश के तमाम वचन याद आते, यह याद आता कि कैसे परमेश्वर ने उसे ऊँचा उठाया है तो अक्सर उसके अंदर प्रेरणा और स्फूर्ति भर जाती : ‘मैं हार नहीं मान सकता, परमेश्वर ने मुझे जो आज्ञा दी है और जो कार्य मुझे सौंपा है, मैं उसे छोड़ नहीं सकता; यह परमेश्वर का आदेश है और चूँकि मैंने इसे स्वीकार किया है, मैंने परमेश्वर के वचन और उसकी वाणी सुनी है, चूँकि मैंने इसे परमेश्वर से स्वीकार किया है, तो मुझे पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए और यही वह है जिसे मनुष्य को हासिल करना चाहिए।’ इसलिए चाहे उसे कैसी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किसी भी तरह के उपहास या बदनामी का सामना करना पड़ा, उसका शरीर कितना भी कमजोर हुआ, कितना भी थका, लेकिन उसने परमेश्वर द्वारा सौंपा गया काम नहीं छोड़ा, उसने परमेश्वर की कही हर बात और आज्ञा को लगातार दिलो-दिमाग में रखा। चाहे उसके परिवेश जैसे भी बदले, चाहे उसने कैसी भी भयंकर कठिनाइयों का सामना किया, उसे भरोसा था कि इनमें से कुछ भी हमेशा नहीं रहेगा, कि केवल परमेश्वर के वचन ही कभी भी समाप्त नहीं होंगे और केवल वही जो परमेश्वर ने करने की आज्ञा दी है, निश्चित रूप से पूरा होगा। नूह को परमेश्वर में सच्ची आस्था थी और उसमें वह समर्पण था जो उसमें होना चाहिए था, उसने वह नाव बनाना जारी रखा जिसके निर्माण के लिए परमेश्वर ने उसे आदेश दिया था। दिन गुजरते गए, साल गुजरते गए और नूह बूढ़ा हो गया, लेकिन उसका विश्वास कम नहीं हुआ, परमेश्वर का आदेश पूरा करने के उसके रवैये और दृढ़-संकल्प में कोई बदलाव नहीं आया। यद्यपि ऐसा भी समय आया जब उसका शरीर थकने लगा, उसे कमजोरी महसूस होने लगी और वह बीमार पड़ गया, दिल से वह कमजोर हो गया, लेकिन परमेश्वर के आदेश को पूरा करने और उसके वचनों के प्रति समर्पण करने का उसका संकल्प और दृढ़ता कम नहीं हुई। जिन वर्षों में नूह ने नाव बनाई, उनमें वह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को सुनने और उनके प्रति समर्पण करने का अभ्यास कर रहा था, और वह परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए जरूरी एक सृजित प्राणी और साधारण व्यक्ति के एक महत्वपूर्ण सत्य का अभ्यास भी कर रहा था” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग दो))। इस बारे में सोचूँ तो जहाज बनाने में नूह को चाहे कितनी भी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा हो, उसने कभी शिकायत नहीं की, पीछे हटना तो दूर की बात है। वह कभी परमेश्वर का आदेश नहीं भूला, 120 साल तक लगा रहा और अंत में जहाज बनाकर परमेश्वर का आदेश पूरा किया। परमेश्वर का आदेश पूरा करने और परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने के नूह के दृढ़-संकल्प और लगन को परमेश्वर की स्वीकृति मिली। तब मैंने खुद को फिर से देखा। अपने कर्तव्यों में थोड़ी सी कठिनाइयों का सामना करने पर मैं पीछे हटना चाहता था, मुझमें कष्ट सहने और कीमत चुकाने का संकल्प और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य अच्छी तरह से करने की इच्छा की कमी थी। दरअसल मेरे पास तकनीकें सीखने के लिए तैयार प्रशिक्षण सामग्री थी और मैं अपने सहयोगी से भी सलाह ले सकता था, इसलिए मैं इन चीजों को सीखने में असमर्थ नहीं था, लेकिन क्योंकि मुझे कष्ट सहना पड़ता और कीमत चुकानी पड़ती, इसलिए मैं इसका अध्ययन करना नहीं चाहता था। मैंने देखा कि मुझमें अपने कर्तव्यों के प्रति जरा-सी भी निष्ठा नहीं थी, अगर मैं जहाज बनाने में शामिल होता, तो मैं बहुत पहले ही भाग गया होता और जहाज कभी पूरा नहीं होता। परमेश्वर ने नूह के उदाहरण पर इतनी विस्तार से संगति की, इस उम्मीद में कि हम परमेश्वर के आदेश के प्रति नूह के रवैये का अनुकरण कर सकें। भविष्य में अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों का सामना करते समय मुझे फिर से बचना या पीछे हटना नहीं चाहिए, मुझे बस आसान काम करने और शारीरिक आराम में लिप्त रहने की चाह को छोड़ना होगा और मुझे वे जिम्मेदारियाँ पूरी करनी होंगी जो मुझे निभानी चाहिए। साथ ही, मुझे पेशेवर कौशल सीखने और अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए और अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
उसके बाद मैंने नए कौशल सीखने के लिए समय निर्धारित किया। 2024 के अक्टूबर की शुरुआत में हमें एक नया स्पेशल इफेक्ट बनाना था। इस तरह का इफेक्ट हमेशा मेरा सहयोगी ही बनाता था, तो मैंने सोचा कि अगर इसे मैं बनाऊँगा और अगर कोई मुश्किल आई, मुझे उन पर सोच-विचार करने में बहुत समय लगेगा और मानसिक प्रयास करना पड़ेगा और यह बहुत झंझट का काम होगा। मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपनी देह के बारे में विचार कर रहा था, तो मुझे लगा कि इस बार, मैं सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हट सकता क्योंकि यह झंझट भरा लग रहा था। तब मैंने कहा, “यह स्पेशल इफेक्ट मैं बनाऊँगा।” मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अगर तुमने परमेश्वर से प्रार्थना की होती, सत्य खोजा होता, इसमें अपना पूरा दिल और दिमाग लगाया होता, अगर तुमने इस तरीके से सहयोग किया होता तो फिर परमेश्वर पहले ही तुम्हारे लिए हर चीज तैयार करके रखता ताकि जब तुम मामलों को सँभालने लगो तो हर चीज दुरुस्त रहे और तुम्हें अच्छे नतीजे प्राप्त हों। तुम्हें बहुत ज्यादा ताकत झोंकने की जरूरत न पड़ती; तुम हर संभव सहयोग करते तो परमेश्वर तुम्हारे लिए पहले ही हर चीज की व्यवस्था करके रखता” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर कर्तव्यों के प्रति लोगों का रवैया देखता है। अगर लोगों के दिल में साथ देने की नीयत हो, तो परमेश्वर उनके लिए रास्ता खोलेगा, इसलिए भले ही मैंने पहले कभी इस तरह का स्पेशल इफेक्ट नहीं बनाया था, मुझे परमेश्वर पर भरोसा करके मिलकर काम करना होगा। बाद में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसका मार्गदर्शन माँगा, फिर काम करते समय मैंने जानकारी खोजी और जल्दी ही मुझे कुछ विचार सूझ गए। भले ही बाद में स्पेशल इफेक्ट्स बनाने की प्रक्रिया के दौरान मुझे कुछ कठिनाइयाँ भी हुईं, लेकिन अध्ययन और खोजबीन के जरिए आखिर में समस्याएँ हल हो गईं और मेरे मन को बड़ी तसल्ली मिली। साथ ही मेरे कौशल में भी कुछ सुधार हुआ।
दिसंबर में, मैं स्पेशल इफेक्ट्स बनाने के लिए एक नए तरीके पर खोजबीन करना चाहता था। अगर यह तरीका काम कर जाता, तो इससे दक्षता बढ़ जाती। शुरू में तो सब कुछ काफी आसानी से हो गया, लेकिन बीच में मुझे एक तकनीकी चुनौती का सामना करना पड़ा। मैंने हर तरह के तरीके आजमाए, लेकिन मैं उसे हल नहीं कर सका। मेरा सहयोगी भी इस मामले में मेरी मदद करने आया, लेकिन हम कोई अच्छा समाधान नहीं सोच पाए। मैंने मन ही मन सोचा, “यह समस्या मेरी मौजूदा तकनीकों से हल नहीं हो सकती, तो शायद मुझे इस पर तब वापस आना चाहिए जब मेरे कौशल में सुधार हो जाएगा।” लेकिन फिर मैंने सोचा कि कैसे अतीत में अपने कर्तव्य करते समय मैं हमेशा मुश्किल देखते ही पीछे हट जाता था, इसलिए अब मैं आसानी से हार नहीं मानना चाहता था और मैंने मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। अगले दिन मैंने अपनी खोजबीन जारी रखी, और बार-बार परीक्षण करने के बाद अप्रत्याशित रूप से समस्या हल हो गई। मैं बहुत खुश हुआ और मैंने परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद किया। मैंने महसूस किया कि अगर हम दिल लगाकर अपने कर्तव्य निभाएँ और कीमत चुकाएँ, तो हम उन्हें अच्छी तरह से पूरा कर सकते हैं और जब तक हम परमेश्वर के साथ सहयोग करने को तैयार हैं, परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करेगा। अब भी मेरे तकनीकी कौशल में बहुत सी कमियाँ हैं, इसलिए मैंने और अधिक मुश्किल तकनीकें सीखनी शुरू कर दी हैं। नई तकनीकें सीखते समय मैं अब मुश्किलों में डूबा नहीं रहता, बल्कि अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए प्रार्थना करता हूँ और परमेश्वर पर भरोसा करता हूँ। मुझे लगता है कि परमेश्वर के मार्गदर्शन से इस तरह अपने कर्तव्य करना सचमुच बहुत अच्छा है! परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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