अपने कर्तव्य में लापरवाही बरतना वाकई खतरनाक होता है

20 अप्रैल, 2026

स्कॉट, अमेरिका

अक्टूबर 2024 में मैं विदेशी भाषा के अनुभवजन्य गवाही वीडियो संपादन का कर्तव्य निभा रहा था। एक बार वीडियो संपादन के समय मुझे पता चला कि कई शॉट्स ठीक से नहीं जुड़ रहे थे। सही फुटेज चुनने में मुझे सामान्य से तीन गुना ज्यादा समय लगता था और ऑडियो से मेल कराने के लिए मुझे लगातार अलग-अलग शॉट्स लगाकर देखने पड़ते थे। पहले तो मुझमें सावधानी से संपादन करने का धैर्य था, लेकिन सुबह होने तक मैं उसका आधा भी पूरा नहीं कर पाया था जितना मैं आमतौर पर कर लेता था। मैं अधीर महसूस करने लगा, मैंने मन ही मन सोचा, “इस वीडियो में काफी ज्यादा जटिल शॉट्स हैं। अगर मैं हर एक शॉट को इतनी बारीकी से संपादित करूँ तो यह बहुत थकाऊ होगा और इसमें बहुत समय लगेगा। यह बस थका देने वाला है! शायद इस बार मैं जैसे-तैसे निपटा लेता हूँ। बस किसी तरह मानकों पर खरा उतर जाए। वीडियो ऑनलाइन अपलोड होने के बाद दर्शक शायद इन छोटी-मोटी दिक्कतों पर ध्यान भी नहीं देंगे। कुछ ट्रांजिशन जो इतने सुचारु नहीं भी हों, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है।” यह सोचकर जब भी मेरे सामने ऐसे शॉट्स आए जिन्हें जोड़ना मुश्किल था तो मैंने बिना ज्यादा सोचे बस कुछ फुटेज उठाए और उन्हें आपस में जोड़ दिया। भले ही मैं देख सकता था कि ट्रांजिशन बहुत सुचारु नहीं थे, फिर भी मैंने यह सोचकर खुद को तसल्ली दी, “सब ठीक है। बस काम चल जाना चाहिए। दूसरे शायद इन छोटी-मोटी समस्याओं पर गौर नहीं करेंगे।” तैयार वीडियो जमा करने के बाद मुझे हैरानी हुई, भाई ब्रायन ने, जिन्होंने इसकी समीक्षा की थी, तीस से ज्यादा मुद्दे बताए जिन्हें सुधारने की जरूरत थी। पहले तो मैं यकीन ही नहीं कर पाया। मैं जानता था कि इस वीडियो के संपादन में मैंने लापरवाही बरती थी, लेकिन मुझे नहीं लगा था कि इतनी सारी समस्याएँ होंगी। मैंने उनके द्वारा बताए गए मुद्दों की ध्यान से समीक्षा की और महसूस किया कि उनकी सारी प्रतिक्रिया उचित थी। सब कुछ ठीक करने में मुझे आधा दिन लग गया। जैसे ही मैं इसे दोबारा जमा करने वाला था, मुझे फिर से चिंता होने लगी, मैंने सोचा, “मैंने भाई ब्रायन के सुझावों के मुताबिक मुद्दे ठीक कर दिए हैं, लेकिन क्या अब भी दूसरी समस्याएँ हो सकती हैं? शायद मुझे एक बार और पूरी समीक्षा कर लेना चाहिए ताकि पक्का हो जाए कि मुझसे कुछ छूटा तो नहीं है।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “आज का काम खत्म करने का समय होने ही वाला है। अगर मैं अभी पूरी समीक्षा करता हूँ तो बहुत देर हो जाएगी और मुझे आराम करने के लिए कम समय मिलेगा। रहने दो। वैसे भी भाई ब्रायन ने इसे पहले ही चेक कर लिया है, तो बस उनके द्वारा ढूँढ़ी गई समस्याओं को ठीक करना काफी होना चाहिए।” तो सुझाव के अनुसार बदलाव करने के बाद मैंने इसे सीधे जमा कर दिया। उम्मीद के उलट इस बार एक अलग व्यक्ति भाई किर्क ने इसकी समीक्षा की और उन्होंने ठीक करने के लिए सात या आठ और मुद्दे बताए। यह नतीजा देखकर मुझे एहसास हुआ कि वीडियो अपलोड में देरी मेरी वजह से हुई थी। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैंने कल थोड़ा और समय दिया होता और पूरी समीक्षा कर ली होती, तो शायद मैं इन समस्याओं को पकड़ लेता और वीडियो आज समय पर ऑनलाइन हो जाता। समय पर अपलोड न हो पाने की वजह सिर्फ यह है कि मैं लापरवाही बरत रहा था और इसे गंभीरता से नहीं ले रहा था।” यह सोचकर मुझे थोड़ा पछतावा हुआ और मैंने खुद से कहा कि इस बार मुझे लगन से सुधार करने होंगे और अब मैं और लापरवाही नहीं बरत सकता। इसलिए मुद्दों को ठीक करने के बाद मैंने पूरे वीडियो की फिर से समीक्षा की। मैंने कुछ और जगहें ढूँढ़ीं जहाँ ट्रांजिशन सुचारु नहीं थे और उन्हें ठीक किया। हालाँकि इसमें थोड़ा अतिरिक्त समय और मेहनत लगी लेकिन मुझे तसल्ली महसूस हुई। इस बार मेरे वीडियो जमा करने के बाद यह वेबसाइट पर आसानी से अपलोड हो गया।

बाद में यह सोचकर कि कैसे मेरे लापरवाह रवैये ने अपलोड में देरी कर दी थी, मुझे काफी अपराध-बोध हुआ। अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिससे मुझे अपनी अवस्था के बारे में कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “चीजों को इतनी लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी से सँभालना भ्रष्ट स्वभावों का तत्व होता है : इसे लोग नीचता कहते हैं। वे अपने सारे काम ‘लगभग ठीक’ और ‘काफी ठीक’ की हद तक ही करते हैं; यह ‘शायद,’ ‘संभवतः,’ और ‘पाँच में से चार’ का रवैया है; वे चीजों को अनमनेपन से करते हैं, यथासंभव कम से कम और झाँसा देकर काम चलाने से संतुष्ट रहते हैं; उन्हें चीजों को गंभीरता से लेने या सावधानी बरतने में कोई मतलब नहीं दिखता और सत्य-सिद्धांतों की तलाश करने का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं। क्या यह एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर की चीज नहीं है? क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? नहीं। इसे अहंकार कहना सही है, और इसे अनैतिक कहना भी पूरी तरह से उपयुक्त है—लेकिन इसका अर्थ पूरी तरह से ग्रहण करना हो तो, एक ही शब्द उपयुक्त होगा और वह है ‘नीच।’ अधिकांश लोगों के भीतर नीचता होती है, बस उसकी मात्रा ही भिन्न होती है। सभी मामलों में, वे अनमने और लापरवाह ढंग से चीजें करना चाहते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें छल झलकता है। वे जब भी संभव हो दूसरों को धोखा देते हैं, जब भी संभव हो जैसे-तैसे काम निपटाते हैं और जब भी संभव हो समय बचाते हैं। वे मन ही मन सोचते हैं, ‘अगर मैं उजागर होने से बच सकता हूँ और कोई समस्या पैदा नहीं करता और मुझे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता है, तो मैं दिखावा करके काम चला सकता हूँ। मुझे बहुत बढ़िया काम करने की जरूरत नहीं है, इसमें बड़ी परेशानी है!’ ऐसे लोग कभी भी किसी चीज में महारत हासिल नहीं करते हैं और वे अपनी पढ़ाई में कड़ी मेहनत करने या पीड़ा सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं होते हैं। वे किसी विषय की सिर्फ सतह को खुरचना चाहते हैं और फिर यह मानते हुए कि वे इसे सीखने में सफल हो गए हैं खुद को इसमें प्रवीण कह देते हैं, और फिर वे जैसे-तैसे काम निपटाने के लिए इस पर निर्भर रहते हैं। क्या दूसरे लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति लोगों का यही रवैया नहीं होता? क्या यह अच्छा रवैया है? नहीं। सीधे शब्दों में कहें तो, यह ‘काम चलाना’ है। ऐसी नीचता तमाम भ्रष्ट मनुष्यों में मौजूद है। जिन लोगों की मानवता में नीचता होती है, वे जो कुछ भी करते हैं उसमें ‘काम चलाने’ का दृष्टिकोण और रवैया अपनाते हैं। क्या ऐसे लोग अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में सक्षम होते हैं? नहीं। तो क्या वे चीजों को सिद्धांत के साथ कर पाने में सक्षम होते हैं? इसकी संभावना और भी कम है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग दो))परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद ही मुझे समझ आया। जब लोग चीजों के प्रति हमेशा अगंभीर और गैर-जिम्मेदाराना रवैये से काम करते हैं, बस परेशानी से बचने के लिए लापरवाह और धोखेबाजी वाले तरीके अपनाते हैं, तो इसकी वजह यह है कि उनके भीतर घटियापन होता है। अपना कर्तव्य निभाते समय बस काम निपटा देने के इस लगातार रवैये से परमेश्वर घृणा करता है। परमेश्वर के वचनों ने मेरी ठीक वही अवस्था उजागर कर दी। जब मुझे संपादित किए जा रहे वीडियो के लिए फुटेज चुनने में ज्यादा समय देने की जरूरत थी, तो मुझे यह बहुत झंझट लगा और मैं बस अपनी मेहनत बचाना चाहता था, इसलिए मैं कोई भी शॉट्स उठाता और उन्हें आपस में जोड़ देता। यहाँ तक कि जब मैंने देखा कि ट्रांजिशन सुचारु नहीं थे, तब भी मैं उन्हें ठीक नहीं करना चाहता था। मुझे तो यहाँ तक उम्मीद थी कि अगर समीक्षा करने वाले भाई ने ध्यान न दिया तो मैं बच निकलूँगा। आखिरकार वीडियो में कई समस्याएँ निकलीं और बार-बार सुधार करने के कारण इसके अपलोड में देरी हुई। मैं कलीसिया के वीडियो कार्य में गड़बड़ कर रहा था और बाधा डाल रहा था! दरअसल एक संपादक का बुनियादी कर्तव्य है कि वह जितना हो सके सबसे उपयुक्त फुटेज चुने और फिर वीडियो को सुचारु बनाने के लिए कुछ खास तकनीकों का इस्तेमाल करे। कम से कम एक संपादक का रवैया और जिम्मेदारी का एहसास इतना तो होना चाहिए। लेकिन मैं हमेशा झंझट से बचना चाहता था, जैसे-तैसे काम निपटाता और चालाकी करता था और मैंने घटियापन के साथ अपना कर्तव्य किया, एक कामचलाऊ संपादन से संतुष्ट हो गया जो बस “काफी हद तक ठीक” था। अगर मैं लंबे समय तक यही करता रहता, तो न केवल मैं एक संपादक के रूप में अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहता, बल्कि वीडियो कार्य में देरी के लिए मुझे बेनकाब करके निकाल भी दिया जाता। इसके अंजाम बहुत गंभीर होते! इसका एहसास होने पर मुझे बहुत बुरा लगा और गहरा पछतावा हुआ। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, मैं चीजों को बदलने के लिए तैयार था और अब अपने घटियापन के आधार पर अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहता था।

उसके बाद मैं अपने कर्तव्य में थोड़ा और मेहनती हो गया। एक बार मैं स्लोवाक भाषा का एक वीडियो संपादित कर रहा था और मेरे जमा करने के बाद समीक्षा करने वाली बहन ने संवाद की लाइनों के बीच ठहराव में एक समस्या बताई। बाद में मुझे एक तरीका पता चला जिससे यह समस्या हल हो सकती थी, तो मैंने अपने संपादन में इसे आजमाने की कोशिश की। मुझे हैरानी हुई, जब मैंने वीडियो दोबारा जमा किया तो बहन ने कहा कि यह अच्छी तरह से संपादित है और इसका प्रवाह अच्छा है। यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और ऐसा लगा कि यह तरीका वाकई मेरे कर्तव्य के नतीजों को कुछ हद तक सुधार सकता है। हालाँकि इस तरीके को इस्तेमाल करना थोड़ा झंझट भरा था; इसमें कुछ अतिरिक्त चरणों की जरूरत थी। अगर मैं हर वीडियो को इसी तरह संपादित करता तो यह बहुत बड़ी मुसीबत होती और मुझे ज्यादा कष्ट उठाना पड़ता। इसलिए मैं संपादन के अपने पुराने तरीके पर वापस चला गया और नतीजतन, कई समस्याएँ फिर से सामने आ गईं। मुझे अच्छी तरह पता था कि अगर मैंने थोड़ी और कोशिश की होती और थोड़ा और समय दिया होता, तो इन समस्याओं से बचा जा सकता था। यह सोचकर मुझे खुद के लिए गहरा धिक्कार महसूस हुआ, “मैं अपने कर्तव्य में थोड़ी और कोशिश क्यों नहीं कर सकता और थोड़ी और कीमत क्यों नहीं चुका सकता? मैं फिर से लापरवाही क्यों बरत रहा हूँ?” मुझे याद आया कि परमेश्वर ने उजागर किया है कि जिन लोगों में सद्गुण की कमी होती है वे कोई भी कर्तव्य अच्छी तरह नहीं कर सकते, इसलिए मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों का वह अध्याय निकाला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर किस तरह के व्यक्ति को बचाता है? तुम कह सकते हो कि उन सभी में जमीर और विवेक होता है और वे सत्य स्वीकार सकते हैं, क्योंकि सिर्फ जमीर और विवेक से युक्त लोग ही सत्य स्वीकार कर उसे संजो पाते हैं, और अगर वे सत्य समझते हैं तो उसका अभ्यास कर सकते हैं। जमीर और विवेक से रहित लोग वे होते हैं, जिनमें मानवता का अभाव होता है; बोलचाल की भाषा में हम कहते हैं कि वे गुणरहित हैं। गुणरहित होने की प्रकृति क्या होती है? वह मानवता से रहित प्रकृति होती है, और ऐसी प्रकृति वाला व्यक्ति मानव कहलाने के योग्य नहीं होता। ... जिनमें सद्गुणों का अभाव है वे मानवता से रहित हैं; वे अपने कर्तव्य अच्छी तरह से कैसे निभा सकते हैं? वे कर्तव्य निभाने योग्य नहीं हैं क्योंकि वे जानवर हैं। जिन लोगों में सद्गुणों की कमी होती है वे कोई भी कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाते। ऐसे लोग इंसान कहलाने लायक नहीं हैं। वे जानवर हैं, इंसान के रूप में जानवर। केवल विवेक और अंतरात्मा वाले लोग ही मानवीय मामलों को सँभाल सकते हैं, अपनी बात के प्रति सच्चे, भरोसेमंद और ‘ईमानदार सज्जन’ कहलाने योग्य हो सकते हैं। ‘ईमानदार सज्जन’ शब्द का प्रयोग परमेश्वर के घर में नहीं किया जाता है। इसके बजाय परमेश्वर का घर लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा करता है, क्योंकि यही सत्य है। केवल ईमानदार लोग ही भरोसेमंद होते हैं, उनके पास विवेक और अंतरात्मा होती है और वे इंसान कहलाने योग्य होते हैं। यदि कोई अपने कर्तव्य निभाते हुए सत्य स्वीकार सकता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकता है, अपने कर्तव्य मानक स्तर पर निभा सकता है तो यह व्यक्ति सचमुच ईमानदार और भरोसेमंद है। और जो लोग परमेश्वर से उद्धार प्राप्त कर सकते हैं वे ईमानदार लोग हैं। एक ईमानदार और भरोसेमंद व्यक्ति होने का संबंध तुम्हारी क्षमताओं या चेहरे-मोहरे से नहीं है, तुम्हारी काबिलियत, योग्यता या प्रतिभा से तो और भी कम है। अगर तुम सत्य स्वीकारते हो, जिम्मेदारी से कार्य करते हो, तुम्हारे पास अंतरात्मा और विवेक है और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, तो यह पर्याप्त है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी व्यक्ति के पास कितनी क्षमताएँ हैं, असली चिंता यह है कि उसमें सद्गुण की कमी है कि नहीं। एक बार जब कोई सद्गुण रहित हो जाता है, तो वह मनुष्य नहीं बल्कि जानवर माना जाएगा। परमेश्वर के घर से लोग इसलिए हटा दिए जाते हैं क्योंकि उनमें मानवता और सद्गुण भी नहीं होते। इसलिए, जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें सत्य स्वीकारने में सक्षम होना चाहिए, ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, उनके पास कम-से-कम अंतरात्मा और विवेक होना चाहिए, उन्हें अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने और परमेश्वर का आदेश पूरा करने में सक्षम होना चाहिए। केवल यही लोग परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं; ये लोग ही उस पर ईमानदारी से विश्वास करते हैं और ईमानदारी से खुद को उसके लिए खपाते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर बचाता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया। परमेश्वर उन लोगों को बचाता है जिनके पास अंतरात्मा और विवेक है, क्योंकि केवल अंतरात्मा और विवेक वाले लोग ही सत्य स्वीकार कर सकते हैं, सत्य का अभ्यास कर सकते हैं और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकते हैं। जिन लोगों में मानवता, अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है, वे सत्य स्वीकार नहीं कर सकते; भले ही वे इसे समझ लें, वे इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। परमेश्वर की नजरों में ऐसे लोग इंसान नहीं बल्कि पशु हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा सिर्फ निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन ने मेरे दिल को भेद दिया। मैं बिल्कुल उसी तरह का व्यक्ति था जिसे परमेश्वर उजागर कर रहा था, ऐसा व्यक्ति जिसमें अंतरात्मा और विवेक नहीं है। मुझे परमेश्वर में विश्वास करते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया था और मैंने समर्पित होकर कर्तव्य निभाने और लापरवाही न बरतने के पहलू पर उसके कई वचन पढ़े थे। फिर भी अब बस अपनी देह को थोड़े कष्ट से बचाने के लिए मैं अभी भी जैसे-तैसे काम कर रहा था, चालाकी कर रहा था और काम में देरी कर रहा था। मैं ऐसा व्यक्ति बिल्कुल नहीं था जो सत्य स्वीकार करता हो, न ही मैं अंतरात्मा और विवेक वाला व्यक्ति था। असलियत यह है कि जब मेरे सामने मुश्किल वीडियो आए, तो अगर मैंने थोड़ी और कोशिश की होती और समय दिया होता तो मैं उन्हें अच्छे से संपादित कर सकता था। लेकिन मैं झंझट नहीं चाहता था। अपने शारीरिक आराम की खातिर मैं बस लापरवाही से कुछ शॉट्स चुनता और उन्हें आपस में जोड़ देता। यहाँ तक कि जब मैं देखता कि ट्रांजिशन सुचारु नहीं हैं, तो भी मैं उन्हें ठीक नहीं करता था, जिसकी वजह से वीडियो को कई बार सुधार के लिए वापस भेजना पड़ा और इसकी प्रगति में देरी हुई। मैं साफ तौर पर जानता था कि बेहतर नतीजा पाने के लिए वीडियो के मुद्दे सँभालने के बेहतर तरीके थे, लेकिन चूँकि मैं अपनी देह को कष्ट देने से डरता था, इसलिए मैंने वह तरीका चुना जिसमें सबसे कम मेहनत लगती थी, जिससे वीडियो में समस्याएँ पैदा हुईं और बार-बार के सुधारों से प्रक्रिया में देरी हुई। दरअसल एक वीडियो को अच्छे से संपादित करने के लिए किसी उन्नत तकनीकी कौशल की जरूरत नहीं होती; इसे सावधानी, लगन और थोड़ी अधिक कोशिश के साथ किया जा सकता है। लेकिन मैं इतना भी नहीं कर सका। मुझमें सचमुच बिल्कुल भी अंतरात्मा नहीं थी! मुझे केवल अपने शारीरिक आराम की परवाह थी, कलीसिया के कार्य का जरा-सा भी लिहाज नहीं था और मैंने कलीसिया के हितों की बिल्कुल भी रक्षा नहीं की। मैं कितना विश्वास के लायक नहीं था, सद्गुण से कितना खाली और मानवता से कितना रहित! अगर किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने यह वीडियो संपादित किया होता, तो यह जल्दी अपलोड हो सकता था और एक दिन पहले ही सुसमाचार फैलाने के काम में अपनी भूमिका निभाना शुरू कर सकता था। वह मैं था जिसने वीडियो के अपलोड में देरी की। मैं वीडियो कार्य में गड़बड़ कर रहा था और उसमें बाधा डाल रहा था; मैं परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा था! अगर मैंने खुद को नहीं बदला तो आखिरकार मुझे परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत किया जाएगा, बेनकाब किया जाएगा और निकाल दिया जाएगा। मैं इस तरह नहीं चल सकता था। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना था, एक ईमानदार इंसान बनने का अनुसरण करना था, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी थीं और अपनी नजर में आने वाली हर समस्या को ठीक करने की पूरी कोशिश करनी थी। मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना भी की, “हे परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रहा हूँ। मैं उन चीजों को करने में नाकाम रहा जिन्हें मैं अच्छे से कर सकता था और मैंने वीडियो के अपलोड में देरी की है। मुझमें वाकई अंतरात्मा और विवेक की कमी है और मैं विश्वास के लायक नहीं हूँ। हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने के लिए तैयार हूँ। भले ही इसका मतलब ज्यादा समय और ऊर्जा खर्च करना, ज्यादा कष्ट सहना और बड़ी कीमत चुकाना हो, जब तक इससे अच्छे नतीजे मिल सकते हैं, मैं इसे करने के लिए तैयार हूँ। अगर मैं कभी फिर से लापरवाही बरतूँ, तो तुम मुझे अनुशासित करना और ताड़ना देना।”

उसके बाद मैंने अपने कर्तव्य के प्रति अपने पिछले गलत रवैये को बदल दिया। हालाँकि मुझे वीडियो संपादित करने में अतिरिक्त समय और ऊर्जा लगी, लेकिन संपादित किए गए वीडियो कहीं ज्यादा सुचारु दिखे और अपलोड की प्रक्रिया थोड़ी तेज हो गई। इस तरह अपना कर्तव्य निभाकर मुझे ज्यादा तसल्ली महसूस हुई। कुछ समय बाद पर्यवेक्षक ने मुझे संदेश भेजा कि कई भाई-बहनों ने टिप्पणी की है कि मेरे संपादित वीडियो काफी सुचारु हैं और उन्होंने पूछा कि क्या मेरे पास सबके साथ साझा करने के लिए कोई अच्छे तरीके हैं। यह सुनकर मैं काफी भावुक हो गया और सोचने लगा। मैंने बस उसी का अनुसरण किया था जो परमेश्वर कहता है, अपने कर्तव्य में ज्यादा कोशिश की और ज्यादा कीमत चुकाई। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि मेरे कर्तव्य के नतीजों में इतना सुधार होगा। बाद में मैंने भाई-बहनों के साथ अपना अनुभव और संपादन का तरीका साझा किया और उन सभी को यह काफी मददगार लगा।

अपनी एक आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे लापरवाही बरतने के अंजामों के बारे में कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने के लिए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग अपनी भूमिका निभाएँ; उनकी मानसिकताएँ अहम हैं; और वे अपने विचारों और ख्यालों को कहाँ केंद्रित करते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। लोग जब अपने कर्तव्य निभाते हैं तो परमेश्वर यह पड़ताल करता है और देख सकता है कि लोगों की मानसिकताएँ कैसी हैं और वे अपने कर्तव्य में कितना दिल लगाते हैं। अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगाना अहम है, और अपनी भूमिका निभाना महत्वपूर्ण है। लोगों को यह प्रयास करना चाहिए कि उन्होंने जो कर्तव्य पूरे किए हैं और जो चीजें की हैं, उनके बारे में कोई पछतावा न हो और वे परमेश्वर के प्रति ऋणी न हों। अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगाने का यही सच्चा अर्थ है। यदि तुम अपना कर्तव्य निभाने में अपना पूरा दिल और शक्ति लगाने में लगातार असफल होते हो, यदि तुम हमेशा ही अनमने रहते हो, काम को जबरदस्त हानियाँ पहुँचाते हो और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित प्रभावों से बहुत पीछे रहते हो तो तुम्हारे साथ केवल एक ही चीज हो सकती है : तुम्हें निकाल दिया जाएगा। तो क्या तब भी पछतावे का समय होगा? नहीं होगा। ऐसे कार्यकलाप शाश्वत पछतावा, एक दाग बन जाएँगे! सदा अनमना रहना एक दाग है, यह एक गंभीर अपराध है—हाँ या न? (हाँ।) तुम्हें अपने दायित्वों को और तुम्हें जो कुछ भी करना है, उसे पूरे मनोयोग से करने का प्रयास करना चाहिए, तुम्हें अनमना नहीं होना चाहिए, या कोई पछतावा नहीं रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा कर सको तो तुम जो कर्तव्य निभाओगे, उसे परमेश्वर याद रखेगा। जिन चीजों को परमेश्वर द्वारा याद रखा जाता है वे अच्छे कर्म होते हैं। तो फिर ऐसी कौन-सी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाता? (वे अपराध और बुरे कर्म होते हैं।) ऐसा हो सकता है कि इस समय उन कार्यों का जिक्र करने पर तुम यह स्वीकार न करो कि वे बुरे कर्म हैं, लेकिन अगर ऐसा दिन आता है जब इन चीजों के गंभीर परिणाम सामने आते हैं, और वे चीजें नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती हैं, तब तुम्हें समझ आ जाएगा कि ये चीजें मात्र व्यवहार संबंधी अपराध नहीं हैं, बल्कि बुरे कर्म हैं। जब तुम्हें इसका एहसास होगा, तुम पछताओगे और सोचोगे : ‘मुझे थोड़ी-बहुत रोकथाम करनी चाहिए थी! अगर मैंने शुरू में इस पर थोड़ा और विचार और प्रयास कर लिया होता, तो इस परिणाम से बचा जा सकता था।’ कोई भी चीज तुम्हारे हृदय पर हमेशा के लिए लगे इस धब्बे को मिटा नहीं सकेगी और अगर यह तुम पर एक स्थायी ऋण बन गई, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे। इसलिए आज तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिए गए आदेश को पूरे दिल और पूरी शक्ति से निभाने का प्रयास करना चाहिए, हर कर्तव्य को स्पष्ट विवेक के साथ, बिना किसी पछतावे के इस तरह से करना चाहिए जिसे परमेश्वर याद रखे। तुम जो भी करो, अनमने मत बनो। अगर तुम आवेश में आकर कोई गलती करते हो और यह गंभीर अपराध है, तो यह कभी नहीं मिटने वाला दाग बन जाएगा। जब तुम्हें पछतावा होगा, तुम उनकी भरपाई नहीं कर पाओगे, और तुम्हें हमेशा के लिए उनका पछतावा रहेगा। इन दोनों मार्गों को स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। परमेश्वर की स्वीकृति पाने के लिए तुम्हें कौन-सा मार्ग चुनना चाहिए? बिना किसी पछतावे के, अपने पूरे दिल और ताकत के साथ अपना कर्तव्य निभाना, और अच्छे कर्मों की तैयारी करना और उन्हें जमा करना। तुम जो भी करो, ऐसा बुरा काम मत करो जो दूसरों के अपना कर्तव्य निभाने में बाधा डाले, ऐसा कुछ मत करो जो सत्य के खिलाफ जाता हो और परमेश्वर का प्रतिरोध करता हो, और जिससे जीवन भर पछताना पड़े। क्या होता है जब कोई व्यक्ति बहुत सारे अपराध कर देता है? वह परमेश्वर की उपस्थिति में ही अपने प्रति उसके क्रोध को धीरे-धीरे जमा कर रहा है! अगर तुम और ज्यादा अपराध करते हो, और तुम्हारे प्रति परमेश्वर का क्रोध और ज्यादा बढ़ जाता है, तो अंततः, तुम्हें दंड मिलेगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं बेहद भावुक हो गया। मैंने इन वचनों पर बार-बार विचार किया “सदा अनमना रहना एक दाग है, यह एक गंभीर अपराध है” और मुझे एहसास हुआ कि अपने कर्तव्य में हमेशा लापरवाही बरतकर, न केवल मैं कोई अच्छे कर्म तैयार करने में नाकाम रहा था, बल्कि मैं असल में बुरे कर्म इकट्ठे कर रहा था। अगर एक दिन इसके गंभीर अंजाम हुए, तो मुझे पूरी तरह बेनकाब करके निकाल दिया जाएगा। अगर मेरे संपादित वीडियो बिना किसी के जाँच किए सीधे ऑनलाइन हो जाते, तो उनमें मौजूद सारी समस्याएँ परमेश्वर के लिए भारी अपमान का कारण बनतीं! मैंने परमेश्वर से सत्य का इतना सिंचन और पोषण पाया है, इसलिए मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए और वीडियो को अच्छे से संपादित करना चाहिए। फिर भी मैं लापरवाह और गैर-जिम्मेदार था। क्या मुझमें और व्यवस्था के युग के उन लोगों में कोई फर्क था जो परमेश्वर को लंगड़े और अंधे बैल, भेड़ और कबूतर चढ़ाते थे? मैं परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने का सोचे बिना उसके अनुग्रह और आशीषों का आनंद ले रहा था और जो मैंने चढ़ाई, वह सबसे घटिया भेंट थी। यह खुल्लम-खुल्ला परमेश्वर को मूर्ख बनाना और धोखा देना था; यह परमेश्वर के क्रोध को इकट्ठा करना था! अगर मैं बिना पश्चात्ताप किए चलता रहता, तो कम से कम मुझसे कर्तव्य करने का अवसर छीन लिया जाता और अगर मामला गंभीर होता, तो मुझे परमेश्वर के दंड का सामना करना पड़ता। मैंने मटियास नाम के किसी व्यक्ति के बारे में सोचा, जो अपने कर्तव्य में लगातार लापरवाह रहा था। हर काम में वह बस उसे निपटाने की कोशिश करता था और दूसरों को लगातार उसकी गलतियाँ सुधारनी पड़ती थीं और उसकी फैलाई गंदगी साफ करनी पड़ती थी, जिससे कलीसिया के कार्य में गंभीर गड़बड़ी और बाधा पैदा होती थी। कई बार काट-छाँट होने के बाद भी उसने पश्चात्ताप नहीं किया और उसे एक साधारण कलीसिया में भेज दिया गया। बाद में मैंने सुना कि वहाँ भी उसने खुद को नहीं बदला; यहाँ तक कि उसने कर्तव्य करना भी बंद कर दिया और अंत में उसे कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया। दूसरों की नाकामियों के बारे में सोचकर मुझे डर लगने लगा। मुझे यह अनुभव भी हुआ कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव कोई अपमान बर्दाश्त नहीं करता। यह हकीकत कि मैं अभी भी कलीसिया में कर्तव्य कर सकता था, परमेश्वर की दया थी और मेरे लिए पश्चात्ताप करने का एक मौका था। मुझे अपने कर्तव्य में लापरवाह होने की समस्या हल करने के लिए जल्दी से सत्य खोजने की जरूरत थी।

बाद में मुझे परमेश्वर के वचनों में अपने लापरवाह रवैये को हल करने का रास्ता मिल गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तो तुम दरअसल वही करते हो जो तुम्हें करना चाहिए। अगर तुम उसे परमेश्वर के सामने करते हो, अगर तुम अपना कर्तव्य ईमानदारी के रवैये से और दिल से निभाते हो और परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो, तो क्या यह रवैया कहीं ज्यादा सही नहीं होगा? तो तुम इस रवैये को अपने वास्तविक जीवन में कैसे व्यवहार में ला सकते हो? तुम्हें ‘दिल से और ईमानदारी से परमेश्वर की आराधना’ को अपनी वास्तविकता बनाना होगा। जब कभी भी तुम अनमने होना चाहते हो, जब कभी भी तुम धूर्तता से काम करना और आलसी बनना चाहते हो, और जब कभी तुम्हारा ध्यान बँट जाता है या तुम मौज-मस्ती करना चाहते हो, तो तुम्हें विचार करना चाहिए : ‘इस तरह व्यवहार करके, क्या मैं गैर-भरोसेमंद बन रहा हूँ? क्या यह कर्तव्य निर्वहन में अपना मन लगाना है? यह करके क्या मैं समर्पित होने में नाकाम रह रहा हूँ? ऐसा करने में, क्या मैं परमेश्वर के सौंपे आदेश पर खरा उतरने में विफल हो रहा हूँ?’ तुम्हें इसी तरह आत्म-चिंतन करना चाहिए। अगर तुम्हें पता चलता है कि तुम अपने कर्तव्य में हमेशा अनमने रहते हो, कि तुम समर्पित नहीं हो और यह भी कि तुमने परमेश्वर को चोट पहुँचाई है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, ‘उस समय मुझे लगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है, लेकिन मैंने इसे समस्या नहीं माना; मैंने इसे बस लापरवाही से नजरअंदाज कर दिया। मुझे अब तक इस बात का एहसास नहीं हुआ था कि मैं वास्तव में अनमना रहता था और मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की थी। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक की कमी है!’ तुमने समस्या का पता लगा लिया है और अपने बारे में थोड़ा जान लिया है—तो अब तुम्हें खुद को बदलना होगा! अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा रवैया गलत था। तुमने इसे एक अतिरिक्त नौकरी माना और बस सतही प्रयास किया; तुमने इसमें अपना दिल नहीं लगाया। अगर तुम फिर इस तरह अनमने रहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसे तुम्हें अनुशासित करने और ताड़ना देने देना चाहिए। केवल अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा ऐसा संकल्प होने पर ही तुम सच्चा पश्चात्ताप कर सकते हो। जब तुम्हारी अंतरात्मा साफ होगी और अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा रवैया बदल गया होगा, तभी तुमने खुद को बदल लिया होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल परमेश्वर के वचन बार-बार पढ़ने और सत्य पर चिंतन-मनन करने से ही अनुसरण का मार्ग मिल सकता है)। “चूँकि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए वे अपने कर्तव्य निभाते समय अक्सर अनमने रहते हैं। यह सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। अगर लोगों को अपने कर्तव्य ठीक से निभाने हैं, तो उन्हें सबसे पहले अनमनेपन की यह समस्या सुलझानी चाहिए। अगर उनका रवैया अनमना होगा, तो वे अपने कर्तव्य उचित ढंग से नहीं निभा पाएँगे, जिसका अर्थ है कि अनमनेपन की समस्या हल करना बेहद जरूरी है। तो उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? पहले, उन्हें अपनी मनोदशा की समस्या का समाधान करना चाहिए; उन्हें अपने कर्तव्यों को सही तरह से लेना चाहिए, और चीजों को गंभीरता और जिम्मेदारी की भावना के साथ करना चाहिए। उन्हें धोखेबाजी या अनमनेपन का इरादा नहीं रखना चाहिए। कर्तव्य परमेश्वर के लिए निभाया जाता है, किसी व्यक्ति के लिए नहीं; यदि लोग परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकारने में सक्षम होते हैं, तो उनकी मनोदशा सही होगी। इसके अलावा, कोई कार्य करने के बाद, लोगों को उसे जाँचना चाहिए, और उस पर चिंतन करना चाहिए, और अगर उन्हें दिल में थोड़ी बेचैनी महसूस हो, और विस्तृत निरीक्षण के बाद उन्हें पता चले कि वास्तव में कोई समस्या है, तो उन्हें बदलाव करने चाहिए; ये बदलाव होने के बाद उन्हें अपने दिल में चैन का एहसास होगा। जब लोगों को बेचैनी महसूस होती है, तो यह साबित करता है कि कोई समस्या है, और उन्हें, विशेष रूप से महत्वपूर्ण चरणों पर, जो कुछ भी उन्होंने किया है, उसकी पूरी लगन से जाँच करनी चाहिए। यह अपने कर्तव्य निभाने के प्रति एक जिम्मेदार रवैया है। यदि कोई लगनशील हो सकता है, जिम्मेदारी ले सकता है और अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगा सकता है तो कार्य अच्छी तरह से हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को रोशन कर दिया। मैं जानता था कि मुझे कर्तव्य करने के अवसर की कद्र करनी चाहिए और इसे करते समय परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए। जब भी मैंने लापरवाह होने के बारे में सोचा, तो मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी थी, खुद के खिलाफ विद्रोह करना था और अपने कर्तव्य में बेहतरीन नतीजे पाने की कोशिश करनी थी। इसके अलावा मुझे हर काम में मेहनत करनी थी और गंभीर होना था और अच्छे नतीजे पाने के लिए मुसीबत या कष्ट से पीछे नहीं हटना था। उसके बाद मैंने अपने कर्तव्य में परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास किया और हर वीडियो को सावधानी से संपादित किया। जब मेरा सामना मुश्किल वीडियो से हुआ जिनके लिए फुटेज चुनने में बहुत समय लगता था और मुझे लगा कि यह बहुत झंझट है, तो मैं अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने के लिए सचेत रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करता, उसे मिलाने के लिए अच्छी फुटेज ढूँढ़ने की पूरी कोशिश करता। संपादन खत्म करने के बाद मैं इसे दो बार चेक करता, हर उस समस्या को ठीक और बेहतर करता जो मुझे मिल सकती थी। मैं अक्सर अपने कर्तव्य में आने वाले मुद्दों का सार भी तैयार करता और अगर कुछ ऐसा होता जो मैं नहीं सँभाल सकता था, तो मैं उस भाई से पूछता जिसके साथ मैं सहयोग कर रहा था। समय के साथ मेरे तकनीकी कौशल में थोड़ा सुधार हुआ, मेरे वीडियो की समीक्षा करने वाले भाई ने कम समस्याएँ बताईं और कई वीडियो सिर्फ एक समीक्षा के बाद सीधे अपलोड हो गए। यह नतीजे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैं सुकून में था।

बाद में कुछ ऐसा हुआ जो मुझे अपने लिए एक परीक्षा लगा। मैं एक संपादित किया हुआ वीडियो पहले ही जमा कर चुका था, लेकिन उम्मीद के विपरीत दो दिन बाद एक बहन ने अचानक मुझे एक दोबारा रिकॉर्ड की हुई ऑडियो फाइल भेजी। उसने कहा कि पिछली रिकॉर्डिंग में कुछ तकनीकी समस्याएँ थीं, इसलिए साउंड क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी और इसे दोबारा रिकॉर्ड किया गया था। मुझे नए ऑडियो से मेल कराने के लिए वीडियो को दोबारा संपादित करने की जरूरत थी। पहले तो मैं यह खबर स्वीकार नहीं कर सका, मैंने सोचा, “ऐसा कैसे हो सकता है? फिर से संपादन करूँ? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा पिछला ज्यादातर काम बेकार गया?” सुधार पर आधा दिन और लगाने के ख्याल से मेरा इसे करने का मन नहीं हुआ; यह बहुत झंझट भरा लग रहा था। फिर मैं पर्यवेक्षक से पूछने गया और उसने कहा कि हालाँकि पिछले ऑडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन यह अभी भी स्वीकार्य दायरे में थी, इसलिए इसे न बदलना भी ठीक रहेगा। उसकी बात सुनकर मैंने मन ही मन सोचा, “यह तो बहुत बढ़िया है! इस तरह मुझे दोबारा संपादन के झंझट से नहीं गुजरना पड़ेगा।” बाद में मैंने बहन द्वारा भेजे गए नए ऑडियो की पुराने वाले से तुलना की और पाया कि नया ऑडियो वाकई काफी बेहतर था। उस पल मैं हिचकिचाया, “क्या मुझे ऑडियो बदलना चाहिए या नहीं? अगर मैं नहीं बदलता, तो मैं झंझट से बच जाऊँगा और वीडियो तब भी सामान्य रूप से अपलोड हो जाएगा, लेकिन गुणवत्ता से समझौता होगा। बहन ने ऑडियो पहले ही फिर से रिकॉर्ड कर दिया है और पुराने की जगह इसे लगाने से वीडियो के नतीजे बेहतर होंगे। क्या मुझे ऑडियो बदलने और वीडियो दोबारा संपादित करने में कुछ समय नहीं बिताना चाहिए?” तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “तुम्हें अपने दायित्वों को और तुम्हें जो कुछ भी करना है, उसे पूरे मनोयोग से करने का प्रयास करना चाहिए, तुम्हें अनमना नहीं होना चाहिए, या कोई पछतावा नहीं रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा कर सको तो तुम जो कर्तव्य निभाओगे, उसे परमेश्वर याद रखेगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन मेरे लिए समय पर याद दिलाने वाले थे। इस वीडियो को सुधारने के लिए थोड़ा अतिरिक्त समय देने से इसका नतीजा बेहतर होगा और यह कुछ ऐसा है जो सार्थक और कीमती है। इसके अलावा ये अनुभवजन्य गवाही वीडियो हमेशा के लिए सँजोकर रखे जाने हैं। अगर मैं इस वीडियो को बेहतर बनाने के लिए अभी थोड़ा और समय दे सकता हूँ, तो मुझे इसे जितना हो सके अच्छा बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। अपनी जिम्मेदारी निभाने और कोई पछतावा न छोड़ने का यही मतलब है। यह सोचकर मैंने पर्यवेक्षक से कहा, “दोबारा रिकॉर्ड किया गया ऑडियो वास्तव में बेहतर है। ऑडियो बदलने से वीडियो के नतीजों में सुधार होगा, इसलिए इसे संपादित करने के लिए अतिरिक्त समय लगाना सार्थक है।” पर्यवेक्षक सहमत हो गई। जब मैंने नए ऑडियो के साथ फिर से संपादित करने के बाद वीडियो जमा किया, तो मुझे एक खास सुकून और आनंद महसूस हुआ। हालाँकि ऑडियो बदलने और फिर संपादन में कुछ समय और ऊर्जा लगी, लेकिन अनुभवजन्य गवाही वीडियो के नतीजों को बेहतर बनाने ने इसे सार्थक और महत्वपूर्ण बना दिया।

मैंने उन सभी पलों के बारे में सोचा जब मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह रहा था, कैसे पल भर के शारीरिक आराम के लालच में मैंने इतने सारे वीडियो के सामान्य अपलोड में देरी की थी और कई अपराध किए थे। मुझे पछतावा हुआ और खुद को मैंने ऋणी महसूस किया। अब से मैं अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये में और लापरवाही नहीं बरत सकता; मुझे अपना पूरा दिल और पूरी ताकत समर्पित करनी होगी। बाद में मैं अपने कर्तव्य में अपने रवैये की जाँच करने पर ध्यान देने लगा। कभी-कभी जब मेरा सामना मुश्किल वीडियो से होता, तो यह बहुत झंझट है और मैं कष्ट नहीं सहना चाहता, ऐसे ख्याल फिर भी आते। लेकिन तब मैं सोचता कि यह मेरा कर्तव्य है, मेरी जिम्मेदारी है और मुझे नतीजों को प्राथमिकता देनी होगी और झंझट से नहीं डरना होगा। धीरे-धीरे मैं इन विचारों के खिलाफ विद्रोह कर पाया और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर पाया। परमेश्वर का धन्यवाद!

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