आखिरकार मैं अपने बारे में सच जान पायी

14 नवम्बर, 2020

2018 में बहन झांग और बहन लियू के साथ मैं कलीसिया में आलेखों के अनुवाद का काम करती थी। हमारी बहुत अच्छी निभती थी। एक सभा के दौरान, हमने इस बात पर संगति की कि झूठे अगुआ को कैसे पहचाना जाता है। झूठे अगुआ के बारे में बहन लियू का आकलन यह था: "वह बिना किसी सिद्धांत के लोगों को बदल देता है। उसने बहन झांग का तबादला कर दिया लेकिन टीम में किसी दूसरी बहन को रख लिया जो अपने कर्तव्य में ख़ास चौकस या मेहनती नहीं है।" जब एक अन्य अगुआ ने भाई-बहनों को यह पढ़ कर सुनाया तो गुस्से से मेरा चेहरा तुरंत लाल हो गया। मुझे लगा कि बहन लियू के शब्द बहुत कठोर हैं। मैंने जैसे-तैसे अपना धैर्य बनाये रखा, पर मेरे अन्दर हलचल मची हुई थी। टीम में सिर्फ हम तीन ही थीं, इसलिए मुझे यकीन था कि उसने मेरा ही जिक्र किया है। मुझे लगा, सब यही सोचेंगे कि मैं काम में चौकस या मेहनती नहीं हूँ। इसके बाद में अपना सिर ऊँचा कैसे रख सकती थी? तब से बहन लियू के विरुद्ध मेरे मन में वैर-भाव पैदा हो गया और हमारे रिश्ते में दूरी आ गयी।

जल्दी ही उसे टीम-अगुआ चुन लिया गया। वह वास्तव में कर्तव्यनिष्ठ थी, मेरे किये हुए हर अनुवाद की वह बड़े ध्यान से जांच करती। आरम्भ में तो मेरा रवैया सकारात्मक रहा, मगर कुछ समय बाद उसे लेकर मेरे मन में प्रतिरोध पैदा होने लगा। मुझे लगा कि मैं तो काफी समय से वह काम कर रही हूँ, पर उसे अभी भी मुझ पर भरोसा नहीं है, मानो मेरे कौशल में कमी हो। समय-समय पर वो मुझे सुझाव भी देती इसलिए मुझे लगता वह मुझे नीचा दिखा रही है और चीज़ों को मुश्किल बना रही है। एक बात जो मैं कभी सह नहीं पायी, वह यह थी कि जब भी हम अपने काम के बारे में चर्चा करतीं, वह हमेशा प्रभारी व्यक्ति के सामने मेरी कमियों का जिक्र करती। मैं सोचती, "क्या तुम उसके सामने मुझे बुरा दिखाने की कोशिश नहीं कर रही हो?" उसके प्रति मेरी नाराज़गी बढ़ती ही गयी और मेरे मन में उसके प्रति दुर्भावना भी बढ़ती गयी। तब से साथ काम करते वक्त, उसे देखते ही मुझे घृणा और चिड़चिड़ाहट होती। उसका मेरे काम की जानकारी लेते रहना मुझे अच्छा नहीं लगता था, जब भी वह मुझे कोई सुझाव देती, मेरा चेहरा उतर जाता। कभी-कभी मैं सोचती मैं ऐसा क्या करूँ जिससे वह बुरी दिखे और उसकी छवि खराब हो जाए। उसके काम में समस्याएँ दिखने पर मैं उसकी मदद नहीं करना चाहती थी, इसके बजाय मैंने उसे दिमाग से ही निकाल दिया, और ऐसी उम्मीद करती कि उसके काम में कोई बाधा आये जो उसे सबक सिखाये। एक बार, एक सभा में बहन लियू ने खुल कर कह दिया कि हमारे साथ काम करने में वह मुझसे दबी हुई-सी महसूस करती है, मैं बहुत गर्म स्वभाव की हूँ और उसे समझ में नहीं आ रहा मेरे साथ कैसे काम करे। जैसे ही उसने यह कहा, मेरा गुस्सा भड़क गया। मैंने सोचा, "खुल कर बात करने की आड़ में क्या तुम मुझे सबके सामने उजागर करने कि कोशिश नहीं कर रही हो? अब जब सबको पता चल गया कि मेरी मनोवृत्ति तुम्हें दबाने की है, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" सोच-सोचकर मेरा गुस्सा बढ़ गया। मुझे लगा वह मेरी छवि खराब करने की कोशिश कर रही है। मेरे मन में उसके खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा हो गया, फिर सभा के बाकी समय में मैं चुपचाप बैठी रही। उसके बाद, बहन लियू ने जब मुझे थोड़ा उखड़ा हुआ देखा, तो उसने मेरे पास आकर धीरे से मुझसे कहा, "तुम परेशान लग रही हो, तुमने सभा में भी कुछ नहीं कहा। अगर तुम्हारे मन में कोई बात है, तो उस बारे में बात करने में मुझे ख़ुशी होगी। तुम भी मुझे मेरी कमियों के बारे में बता सकती हो।" लेकिन मैं उसकी मौजूदगी बर्दाश्त नहीं कर पायी, मुझे उससे नफरत हो गयी। मैने सोचा, "क्या वाकई तुम्हें मुझसे पूछने की ज़रूरत है? किसे ख़ुशी होगी तुम्हारे इस तरह 'खुल कर' बात करने से?" उसके बाद वह ठीक मेरी बगल में बैठ गयी। मैंने उसे तिरस्कार भरी नजरों से देखा, मैं यह सोच कर अपने गुस्से को काबू में नहीं कर पायी कि उसने सबके सामने मेरी निंदा की उसके दोषों और उसकी दिखाई भ्रष्टता के बारे में मैंने अपनी सारी भड़ास निकाल दी, कहा कि उसमें विवेक नहीं है, जान-बूझ कर दूसरों की छवि खराब करती है, लोगों को दबा कर रखती है, और बहुत अहंकारी है। मैं बोलती ही गयी। उसके लटके हुए चेहरे पर मायूसी देखकर मुझे बड़ी तसल्ली मिली। मैंने सारा गुस्सा और भड़ास निकाल दी जो इतने समय से मैं दबाये हुए थी। फिर बहन लियू ने मुझसे कहा, "मैंने कल्पना नहीं की थी कि मैंने तुम्हें इस कदर आहत किया है। मैं वाकई माफ़ी मांगती हूँ।" जब उसे चुपके से आँसू पोंछकर जाते देख, मेरे मन में अपराध-बोध की टीस उठी। क्या मैंने ज़्यादा ही भड़ास निकाल दी? क्या यह बात उसे नकारात्मक स्थिति में डाल देगी? मगर फिर मैंने सोचा, "मैं तो सिर्फ सच्चाई बयान कर रही थी। ताकि वह खुद को जान सके।" इस सोच से मेरा अपराध-बोध भी मिट गया। इसके बाद बहन लियू मेरे कारण और भी विवश हो गयी, अब वह मुझे सुझाव देना तो दूर, मेरे काम की जांच करने की भी हिम्मत नहीं करती थी।

कुछ दिनों बाद, हमारी कलीसिया-अगुआ ने सभी को टीम-अगुआओं का आकलन करने के लिए कहा, ताकि वह सिद्धांतों के आधार पर उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन कर सके। यह सुनकर मैं मन-ही-मन खुश हुई। मैं बहन लियू द्वारा प्रकट सारी भ्रष्टता को उजागर करने के लिए उत्सुक थी, ताकि हर कोई उसकी असलियत को जान सके, और उसका पद घटाया जा सके। मैंने पल भर के लिए बेचैनी महसूस की और मुझे एहसास हुआ कि मेरी सोच गलत है, मुझे न्याय-संगत और निष्पक्ष होना चाहिए और परमेश्वर की जांच को स्वीकार करना चाहिए। मेरा इरादा अपने आकलन में न्याय-संगत और निष्पक्ष होने का था, लेकिन जब मैंने यह सोचा कि बहन लियू किस तरह मुझे हमेशा मुश्किल में डाल देती थी, तो मैं आक्रोश से भर गयी। उसके खिलाफ अपने सारे पूर्वग्रह मैंने उस आकलन में डाल दिये इस आशा के साथ कि अगुआ उसके साथ गंभीरता से निपटान करें या हो सकता है उसका बाहर तबादला कर दें। अगर वो मेरी टीम में न हो तो मुझे ख़ुशी होगी। जल्दी ही बहन लियू को अपने पद से बर्खास्त कर दिया गया। इसे समाचार ने मुझे व्यथित कर दिया। मैंने सोचा, "कहीं इसका सम्बन्ध, मेरी लिखी हुई बातों से तो नहीं? मैंने तो सिर्फ उसकी भ्रष्टता के बारे में ही लिखा था, लेकिन उस बात से उसे बर्खास्त तो नहीं किया जाना चाहिए था, है ना?" उसके बाद मैंने बहन लियू को नकारात्मक स्थिति में देखा और मुझे दोषी होने का धुंधला-सा एहसास हुआ। मेरे अंदर काम करने का कोई जोश नहीं रहा।

मैंने दो दिन बाद अपनी स्थिति के बारे मैं अगुआ से बात की, उसने मुझे बताया कि बहन लियू को ख़ास तौर पर उसकी सीमित क्षमता के कारण बर्खास्त किया गया है और वह टीम-अगुआ बनने के लायक नहीं थी। उसके बर्खास्त होने का मेरे आकलन से कोई संबंध नहीं है। लेकिन उसने यह जरूर कहा कि मैं उसकी कमियों को लेकर ज़्यादा सख्त हूँ और लोगों के साथ उचित व्यवहार नहीं कर सकती, मैं प्रतिशोधी और द्वेषपूर्ण स्वभाव की हूँ। इतना सुनते ही मेरा दिल बैठ गया। क्या "प्रतिशोधी" और "द्वेषपूर्ण स्वभाव" की बातें हम दुष्ट लोगों के बारे में नहीं करते? कुछ दिनों तक उसकी कही हुई बातों को याद कर मेरे भीतर दुख का सैलाब उमड़ता रहा। मैंने सोचा कि क्या मैं वाकई एक द्वेषपूर्ण व्यक्ति हूँ। इस पीड़ा के बीच मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, यह बहन कहती है कि मेरा स्वभाव द्वेषपूर्ण है, मगर मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे प्रबुद्ध करो ताकि मैं वास्तव में खुद को जान सकूं।"

प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "क्या तुम इसलिए लोगों को दंडित करने के कई तरीके सोचने में सक्षम हो, क्योंकि वे तुम लोगों की पसंद के अनुरूप नहीं हैं या उनका तुम्हारे साथ तालमेल नहीं बैठता? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस तरह की चीज़ें की हैं? तुमने इस तरह की कितनी चीज़ें की हैं? क्या तुमने हमेशा अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को नीचा दिखाते हुए, उनको टोकते हुए टिप्पणियां नहीं कीं और उन पर व्यंग्य के बाण नहीं चलाये? (हाँ।) जब तुम इस तरह की चीज़ें कर रहे थे, तब तुम लोगों की स्थितियाँ क्या थीं? उस समय, तुम अपनी भड़ास निकालकर खुशी महसूस करते थे; तब तुम्हारी हर बात मानी जाती थी। हालांकि, उसके बाद, तुमने आत्मचिंतन किया, 'मैंने बहुत घिनौना काम किया है। मैं परमेश्वर का भय नहीं मानता और मैंने उस व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।' अपने अंतरतम में, क्या तुमने खुद को दोषी महसूस किया? (हाँ।) हालांकि, तुम लोग परमेश्वर का भय नहीं मानते हो, लेकिन तुम्हारे अंदर ज़मीर की कुछ समझ है। तो, क्या तुम अब भी भविष्य में इस तरह की चीज़ें करने में सक्षम हो? क्या जब लोग तुम्हें नापसंद होते हैं, या जब उनसे तालमेल नहीं बैठता, या जब वे तुम्हारी बात नहीं मानते, नहीं सुनते तो तुम उनपर हमला करने और उनसे बदला लेने, उनका जीना मुहाल करने और उन्हें यह दिखा देने के बारे में सोच सकते हो कि सर्वेसर्वा तुम्हीं हो? क्या तुम ऐसा कहोगे, 'अगर तुम वैसा नहीं करोगे जैसा मैं चाहता हूँ, तो मैं तुम्हें दंडित करने का मौक़ा ढूंढ लूँगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। कोई जान भी नहीं पाएगा और मैं तुम्हें अपने क़दमों पर झुका दूँगा; मैं तुम्हें अपनी ताकत दिखा दूँगा। उसके बाद, कोई भी मेरे साथ बखेड़ा करने की हिम्मत नहीं करेगा!' मुझे बताओ : जो व्यक्ति ऐसी चीज़ें करता है, उसके पास किस तरह की इंसानियत है? उसकी इंसानियत को देखा जाए तो वह व्यक्ति दुर्भावनापूर्ण है। सत्य के साथ उसे मापा जाए तो दिखेगा कि वह परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रखता" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ')। परमेश्वर के न्याय के वचन पढ़ने के बाद मैं बहुत दुखी हो गयी। उन वचनों ने मेरी वास्तविक स्थिति को प्रकट कर दिया था। बीते समय को याद करूं, तो बहन लियू और मैं पहले एक साथ बढ़िया काम करती थीं। उसको लेकर मेरे मन में दुर्भावना तब पैदा हुई जब किसी और के बारे में उसके आकलन ने मेरा हवाला दिया और अन्य लोगों के सामने मेरे स्वाभिमान को चोट पहुंचाई। टीम-अगुआ बनने के बाद उसने मेरी कमियों को दिखाना शुरू कर दिया। मुझे लगा जैसे मेरा सम्मान गया और मुझे मुश्किल में डाला जा रहा है। वह मुझे चिढ़ाने लगी थी और मैंने उसका मज़ाक बनाना चाहा था। समाधान ढूंढ़ने के लिए जब उसने अपनी दशा के बारे में खुल कर बात की, तो मुझे लगा जैसे वह सिर्फ़ मेरी कमियों को उजागर करके मुझे शर्मिंदा कर रही है, भाई-बहनों के सामने मेरी छवि खराब कर रही है। उसके खिलाफ मेरा पूर्वाग्रह बढ़ता गया, द्वेष पूर्ण स्वभाव से कार्य करते हुए, उसे नकारात्मक दिखाते हुए मैंने उसे उजागर करने के लिए उसकी समस्याओं को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया। मैंने उसके बारे में अपने आकलन को बदला लेने का हथियार बनाया। मैंने उसकी अच्छी बातों का जिक्र किये बिना सिर्फ़ उसकी कमियों और भ्रष्टता के बारे में लिखा जो मैंने देखी थीं। मैं सिर्फ यह चाहती थी कि अगुआ उस पर सोच-विचार करे और बहुत करके उसका बाहर तबादला कर दे। पहले के अपने बर्ताव के बारे में सोच कर मैं बेहद असहज हो जाती। मेरे मन में रंज इसलिए था क्योंकि बहन लियू के शब्दों ने मेरी छवि और मेरे ओहदे को ठेस पहुँचाई थी, इसीलिए मैंने उसके खिलाफ विरोधी रुख अपनाया। मैंने वही किया जो मुझे ठीक लगा। मुझे एहसास हुआ कि मुझमें परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का अभाव है, मेरी प्रकृति वाकई द्वेषपूर्ण है। मेरा ख़याल था कि भाइयों-बहनों के साथ मेरी हमेशा बहुत अच्छी निभती है और मैं तकलीफ़ों से परेशान हर किसी की मदद करने को उत्सुक रहती हूँ। मेरा ख़याल था कि मैं एक अच्छी इंसान हूँ क्योंकि मैंने कुछ अच्छे काम किये हैं। अब मुझे एहसास हुआ कि वह केवल इसलिए था कि किसी ने भी मेरे निजी हितों को नुकसान नहीं पहुँचाया था। मेरे हितों का मामला आते ही मेरे अन्दर का शैतानी स्वभाव पूरे जोश से सामने आ गया। टूट पड़ने और बदला लेने से मैं खुद को रोक नहीं पायी। मुझे एहसास हो गया कि उस स्वभाव को बदले बिना, मैं कभी भी दुष्टता कर सकती हूँ। यह बेहद खतरनाक था!

फिर मैंने आत्मचिंतन किया। अगर मैं ऐसी दुष्टता कर रही हूँ, तो कौन-से विचार मुझे नियंत्रित कर रहे हैं? मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है')। "लोग इस प्रकार सोचते हैं : 'यदि तुम दयालु नहीं होओगे, तो मैं न्यायी नहीं होऊँगा! यदि तुम मेरे प्रति अशिष्ट होओगे, तो मैं भी तुम्हारे प्रति अशिष्ट होऊँगा! यदि तुम मेरे साथ इज़्ज़त से पेश नहीं आओगे, तो मैं भला तुम्हारे साथ इज़्ज़त से क्यों पेश आऊँगा?' यह कैसी सोच है? क्या यह बदले की सोच नहीं है? किसी साधारण व्यक्ति के विचार में क्या ऐसा नज़रिया व्यवहार्य नहीं है? 'आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत'; 'जैसे को तैसा'—अविश्वासियों के बीच ये सभी तर्क मान्य और पूरी तरह इंसानी धारणाओं के अनुरूप हैं। लेकिन, परमेश्वर में विश्वास करने वाले किसी व्यक्ति के रूप में—सत्य को समझने का प्रयास करने वाले और स्वभाव में बदलाव चाहने वाले किसी व्यक्ति के रूप में—तुम ऐसे कथनों को सही कहोगे या गलत? इन्हें परखने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? ऐसी चीज़ें कहाँ से आती हैं? ये शैतान की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति से आती हैं; इनमें विष होता है, और इनमें शैतान का असली चेहरा अपनी पूर्ण दुर्भावना तथा कुरूपता के साथ होता है। इनमें उस प्रकृति का वास्तविक सार होता है। इस प्रकृति के सार वाले नज़रिये, सोच, अभिव्यक्तियों, वाणी और कर्मों का चरित्र क्या होता है? क्या ये शैतान के नहीं हैं? क्या शैतान के ये पहलू इंसानियत के अनुरूप हैं? क्या ये सत्य के या सत्य की वास्तविकता के अनुरूप हैं? क्या ये ऐसे कार्य हैं, जो परमेश्वर के अनुयायियों को करने चाहिए, और क्या उनकी ऐसी सोच और दृष्टिकोण होने चाहिए? (नहीं।)" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करके ही तुम निराशाजनक अवस्‍था से मुक्त हो सकते हो')। मुझे एहसास हो गया कि शैतान की भ्रष्टता के कारण ही लोग इतने भ्रष्ट और दुष्ट हो चुके हैं। औपचारिक शिक्षा और सामाजिक प्रभावों के जरिये, शैतान हम सबको अपने शैतानी ज़हर में डुबा देता है, जैसे कि "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये," "मैं तब तक हमला नहीं करूँगा जब तक मुझ पर हमला नहीं किया जाता; यदि मुझ पर हमला किया जाता है, तो मैं निश्चित रूप से जवाबी हमला करूँगा," "जैसे को तैसा," और "एक सज्जन कभी भी अपना बदला ले सकता है।" लोग इसे समझे बिना ही ज़िंदा रहने की अपनी व्यवस्था के रूप में ले लेते हैं। वे और अधिक अहंकारी, कपटी, स्वार्थी और द्वेषपूर्ण बन जाते हैं। लोग वास्तव में परवाह करने वाले या क्षमाशील नहीं होते, और कोई वास्तविक प्रेम भी नहीं होता। जब भी कोई बात उनके निजी हितों को चोट पहुँचाती है, तो वे अपमानित महसूस कर दूरी बना लेते हैं। हो सकता है वे दुश्मन भी बना लें या बदला लें। लोग ज़्यादा उदासीन होकर दूरियां बना लेते हैं, सामान्य इंसानियत की भावना खो देते हैं। बचपन से ही ऐसी सोच मेरे दिमाग़ में बिठा दी गयी थी। मैं इसी सोच के साथ जीती आयी हूँ। जब कोई दूसरा मेरे निजी हितों को निशाना बनाता है, तो मैं उससे घृणा किये बिना और बदला लिये बिना नहीं रह पाती। मैंने बहन लियू के साथ जो समय बिताया, उसमें उसने ऐसी बातें कहीं और कीं, जिनसे मेरे हितों को नुकसान पहुंचा, इस वजह से मैं चिढ़ गयी और मौक़ा मिलते ही उस पर हल्ला बोल दिया। मैं चाहती थी कि वो यह देख ले, मैं किस मिटटी की बनी हूँ, ताकि वह फिर से मुझे अपमानित करने की हिम्मत न करे। मैं तो उसे बाहर भी खदेड़ना चाहती थी। मेरा व्यवहार कलीसिया से निष्कासित उन मसीह-विरोधियों और दुष्ट लोगों से अलग कैसे था? वे लोग तो सिर्फ़ दूसरों की स्वीकृति और प्रशंसा चाहते थे, लेकिन उनकी भ्रष्टता को उजागर करने वाली किसी भी बेबाक बात को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वे उन सभी के खिलाफ़ मोर्चा खोल देते जिन्होंने उन्हें अपमानित करने के लिए उनके खिलाफ़ कुछ कहा हो या किया हो। अपनी सारी बुराई के साथ, आखिर उन्होंने परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित कर दिया, उन्होंने दूसरों को क्रोधित कर दिया, और उन्हें कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया। उन्होंने उद्धार पाने का मौक़ा हमेशा के लिए खो दिया। और मैं बहन लियू की आलोचना सिर्फ इसलिए कर रही थी क्योंकि उसके शब्दों ने मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचायी थी। मैंने उसे चोट पहुँचाने के अलावा कुछ नहीं किया। मैं दुष्टता कर रही थी! मैंने देखा कि मेरी इंसानियत कितनी भयावह है, मेरी भी प्रकृति और सार मसीह-विरोधी, कुकर्मी लोगों जैसी है, जो कि परमेश्वर को अप्रिय है। अगर मैंने तुरंत पश्चाताप नहीं किया, तो मैं बुराई में डूब जाऊंगी और एक मसीह-विरोधी, एक कुकर्मी की तरह मुझे भी परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाएगा! इस बारे में सोच कर मैं और भी ज्यादा डर गयी। परमेश्वर से प्रार्थना करने लगी : "हे परमेश्वर, मुझमें इंसानियत की बड़ी कमी है। अपने भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीते हुए, मैंने अपनी भड़ास बहन पर निकाली। मैं इंसान जैसी बिल्कुल भी नहीं हूं। मुझसे निपटने के लिए अगर आपने यह स्थिति नहीं पैदा की होती, तो मैं कभी भी आत्मचिंतन नहीं करती। मैं उस बहन के साथ बुराई करती रहती और उसे ठेस पहुँचाती रहती। हे परमेश्वर, मैं प्रायश्चित करना चाहती हूँ। मैं अब शैतानी ज़हर के साथ और नहीं जीना चाहती। मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं एक कर्तव्यनिष्ठ, विवेकी व्यक्ति बन सकूँ, जिसमें इंसानियत हो।"

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "प्रेम और नफ़रत ऐसे गुण हैं जो एक सामान्य इंसान में होने चाहिए, लेकिन तुम्हें साफ़ तौर पर यह भेद पता होना चाहिए कि तुम किन चीज़ों से प्रेम करते हो और किनसे नफ़रत। अपने दिल में, तुम्हें परमेश्वर से, सत्य से, सकारात्मक चीज़ों और अपने भाई-बहनों से प्रेम करना चाहिए, जबकि दानव शैतान से, नकारात्मक चीज़ों से, मसीह-विरोधियों से और दुष्ट लोगों से नफ़रत करनी चाहिए। अगर तुम अपने भाई-बहनों के लिए दिल में नफ़रत रखोगे, तो तुम उनको दबाने और उनसे बदला लेने की ओर प्रवृत होगे; यह बहुत भयावह होगा। कुछ लोगों के पास सिर्फ़ नफ़रत और दुष्टता के विचार होते हैं। कुछ समय के बाद, अगर ऐसे लोग उस व्यक्ति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते जिनसे वे नफ़रत करते हैं, तो वे उनसे दूरी बनाना शुरू कर देंगे। हालांकि, वे इसका असर अपने कर्तव्यों पर नहीं पड़ने देते या अपने सामान्य पारस्परिक संबंधों को प्रभावित नहीं होने देते, क्योंकि उनके दिलों में परमेश्वर होता है और वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। वे परमेश्वर का अपमान नहीं करना चाहते और ऐसा करने से डरते हैं। हालांकि ऐसे लोगों का किसी इंसान के प्रति कुछ अलग नज़रिया हो सकता है, लेकिन वे उन विचारों को अमल में नहीं लाते या एक भी अनुचित शब्द नहीं बोलते, परमेश्वर का अपमान भी नहीं करना चाहते। यह किस तरह का व्यवहार है? यह खुद के आचरण को नियंत्रित करने और चीज़ों को सिद्धांत और निष्पक्षता के साथ संभालने का एक उदाहरण है। हो सकता है कि तुम किसी के व्यक्तित्व के साथ तालमेल नहीं बिठा पाओ और तुम उसे नापसंद भी कर सकते हो, लेकिन जब तुम उसके साथ मिलकर काम करते हो, तो तुम निष्पक्ष रहते हो और अपना कर्तव्य निभाने में अपनी भड़ास नहीं निकालते, अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करते या परमेश्वर के परिवार के हितों पर अपनी चिढ़ नहीं दिखाते। तुम सिद्धांत के अनुसार चीजें कर सकते हो; क्योंकि, तुम परमेश्वर के प्रति बुनियादी श्रद्धा रखते हो। अगर तुम्हारे पास इससे थोड़ा अधिक है, तो जब तुम देखते हो कि किसी व्यक्ति में कोई दोष या कमज़ोरी है—भले ही उसने तुम्हें नाराज़ किया हो या तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचाया हो—फिर भी तुम्हारे भीतर उसकी मदद करने की इच्छा होती है। ऐसा करना और भी बेहतर होगा; इसका अर्थ यह होगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें इंसानियत, सत्य की वास्तविकता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ')। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि जो लोग परमेश्वर का भय मानते हैं, वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार दूसरों के साथ पेश आ सकते हैं। हो सकता है कभी-कभार उनके मन में भाई-बहनों के खिलाफ पूर्वाग्रह हो मगर आपसी बातचीत में वे दुराग्रही नहीं होते, वे कभी भी ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे परमेश्वर अपमानित हो या दूसरों का दिल दुखे। जो लोग परमेश्वर का भय नहीं मानते, वे अपने दुष्ट दिल की इच्छा के मुताबिक़ कुछ भी कर जाते हैं, यही पाप करना है जिसकी परमेश्वर निंदा करता है। बहन लियू की बात बिल्कुल बेबाक और सीधी थी, मगर उसने मेरे बारे में जो भी कहा वह निष्कपट था। मुझे निशाना बनाने के लिए नहीं था। वह अपने कर्तव्य को गंभीरता और जिम्मेदारी से निभाती थी उसके द्वारा दिये गये ज़्यादातर सुझाव हमारे कार्य के लिए लाभदायक थे। मुझे जानबूझ कर उसके लिए मुश्किल नहीं खड़ी करनी चाहिए थी। मैंने अपनी भ्रष्टता के बारे में उसे खुल कर बताया और माफी मांगी। बहन लियू ने कहा कि उसने इन चीज़ों को कभी भी महत्त्व नहीं दिया, फिर उसने मेरी मदद के लिए कुछ सत्य के बारे में संगति की। मैंने शर्मिंदगी महसूस की और खुद से और भी ज्यादा नफरत करने लगी। मैं अब अपने भ्रष्ट स्वभाव के साथ ज़िंदगी नहीं बिताना चाहती थी। उसके बाद से, जब कभी बहन लियू मुझे कुछ सुझाव आदि देती या उसकी किसी बात या काम से मेरे अहंकार को चोट पहुँचती, तो मैं इसे सही ढंग से संभाल पाती, और सत्य की खोज और आत्म-चिंतन पर ध्यान दे पाती। अब हम फिर से मिल-जुल कर काम कर पा रहे थे। इससे मुझे बड़ी राहत मिली। मैं परमेश्वर के न्याय के लिए उसका धन्यवाद करती हूँ जिसने इस छोटे-से रूप में मुझे बदल दिया।

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