हिरासत में 75 दिन
झाओ लियांग, चीन सितंबर 2009 में एक दिन मैं और दो बहनें एक धार्मिक अगुआ के पास सुसमाचार का प्रचार करने गए। हालाँकि अगुआ ने इसे नकार दिया और...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मई 2011 में मेरी माँ ने मुझे अंत के दिनों के परमेश्वर का सुसमाचार सुनाया। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं, कि मानवजाति भी परमेश्वर ने बनाई है और लोगों का परमेश्वर में विश्वास रखना और उसकी आराधना करना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। कुछ समय तक जाँच-पड़ताल करने के बाद मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया। चूँकि सीसीपी परमेश्वर में विश्वास करने वालों को गिरफ्तार करती है और सताती है, इसलिए मेरे पिता, दादा और दादी ने फँसने के डर से हमेशा मेरी माँ की आस्था का विरोध किया और उन्हें सताया, इसलिए मैंने अपने परिवार को परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में बताने की हिम्मत नहीं की।
2012 के अंत में मुझे सुसमाचार का प्रचार करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया; उस समय मैं 19 साल की थी। भले ही पुलिस को मेरी आस्था का कोई सबूत नहीं मिला, फिर भी उन्होंने मुझे 32 घंटे तक गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा। मेरे परिवार द्वारा कुछ सिफारिशें लगाने के बाद ही मुझे रिहा किया गया। मेरे दादा और चाचा मुझे लेने आए। रास्ते में मेरे चाचा ने कहा, “तुम्हारे दादा-दादी ने तुम्हें पालने में बहुत मेहनत की है और उन्हें इस उम्र में भी हर समय तुम्हारी चिंता करनी पड़ती है। जैसे ही तुम्हारी दादी ने सुना कि तुम्हें गिरफ्तार कर लिया गया है, वह इतनी चिंतित हो गईं कि सो नहीं सकीं।” अपने दादा के सफेद बालों को देखकर मेरे दिल में एक टीस उठी। जब मैं घर पहुँची, तो मैंने अपनी दादी और चाचियों को आँगन में बैठे देखा। मेरी दादी ने कांपती उंगली से मेरी ओर इशारा किया और कहा, “मुझे बताओ, क्या तुम भी अपनी माँ की तरह परमेश्वर में विश्वास करने लगी हो?” मेरी चाची ने ताना मारते हुए कहा, “क्या तुम हमें चैन से नहीं जीने दे सकतीं और हमें चिंता देना बंद नहीं कर सकतीं? पुलिस सीधे तुम्हारे दरवाजे तक आ गई। भले ही तुम्हें शर्म न आए, लेकिन मुझे तुम्हारे लिए शर्म आ रही है! अब तुमने पूरे परिवार को शर्मिंदा कर दिया है। तुम हमारे बारे में इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हो?” मेरी दादी ने कांपती हुई आवाज में कहा, “इस बार तुम्हें बाहर निकालने के लिए तुम्हारी चाची और चाचा को बहुत सिफारिशें लगानी पड़ीं। वरना पुलिस तुम्हें जेल भेज देती। तुम अब परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकती!” मेरी चाचियों ने भी कुछ ऐसी बातें कहीं जो परमेश्वर की ईशनिंदा करती थीं और उसे दोषी ठहराती थीं। उनकी डाँट सुनकर मुझे लगा कि मैंने कुछ बहुत गलत किया है और मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी। मुझे बहुत बुरा भी महसूस हुआ। परमेश्वर में विश्वास करना स्पष्ट रूप से एक अच्छी बात है, लेकिन वे मुझे ऐसे डाँट रहे थे जैसे मैंने कोई भयानक अपराध किया हो। मैंने परमेश्वर से लगातार प्रार्थना की, उससे मेरे दिल की रक्षा करने को कहा। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “मानवजाति के एक सदस्य और मसीह के समर्पित अनुयायियों के रूप में अपने मन और शरीर परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए समर्पित करना हम सभी की जिम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और वह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी, जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी, जिसने हमें सब-कुछ प्रदान किया है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। मैंने मन ही मन सोचा, “यह सही है, मेरा जीवन परमेश्वर से आता है। सुसमाचार का प्रचार करना और अधिक लोगों को परमेश्वर के वचनों की गवाही देना ताकि वे परमेश्वर का उद्धार स्वीकार कर सकें—यह सभी चीजों में सबसे उचित है! लेकिन क्योंकि मुझे मेरी आस्था के लिए गिरफ्तार किया गया है और मैंने अपने परिवार के लिए चिंता और परेशानी पैदा की है, मुझे लगा कि मैं उनके लिए चिंता और शर्मिंदगी लाई हूँ, जैसे कि मैंने कुछ गलत किया हो। मैं सही और गलत में बिल्कुल भी फर्क नहीं कर रही थी! परमेश्वर में विश्वास करना और सुसमाचार का प्रचार करना सबसे उचित काम है। जब आस्था की बात आती है तो मुझे अपनी धारणाओं पर अटल रहना होगा।” जब मैंने यह सोचा, तो मैं अब और बाधित नहीं रही।
कुछ दिन बाद सीसीपी ने टीवी, प्रमुख मीडिया आउटलेट्स और ऑनलाइन पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने के लिए निराधार अफवाहें और भ्रांतियाँ फैलाना शुरू कर दिया और उन्होंने बड़े पैमाने पर कलीसिया से ईसाइयों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। ये निराधार अफवाहें सुनने के बाद मेरे परिवार ने मुझ पर नजर रखनी शुरू कर दी। वे मेरे ठिकाने की जाँच करने के लिए मुझे बार-बार फोन करते थे और अक्सर मुझे मेरे विश्वास से हटाने की कोशिश करते थे। मेरे दादा ने कहा, “क्या तुम्हें पता है कि इस बार गिरफ्तार किए गए लोगों में से कितनों को सजा हुई है? कुछ को तो दस साल से ज्यादा की सजा मिली है और इसका असर उनके परिवारों पर भी पड़ता है—बुजुर्ग अपनी सब्सिडी खो देते हैं और बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। परमेश्वर में विश्वास करने में इतना अच्छा क्या है? चाहे तुम्हारी उम्र कितनी भी हो, वे तुम्हें गिरफ्तार करेंगे और सजा देंगे। यहाँ से ठीक उत्तर में तुम्हारी उम्र के किसी व्यक्ति को तीन साल की सजा सुनाई गई। हम सब सोचते थे कि हत्या सबसे बुरा अपराध है और इसमें सबसे भारी सजा मिलती है, लेकिन परमेश्वर में विश्वास करने की सजा हत्या से भी ज्यादा कठोर है!” बाद में, जब भी मैं अपने दादा के घर जाती, तो वह समय-समय पर मुझसे कहते, “तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकतीं, क्या तुमने सुना? क्या तुमने टीवी पर नहीं देखा? वे कहते हैं कि जब कोई सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसकी तीन पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। तुम्हारी चाचियों और चाचाओं की नौकरियों पर असर पड़ेगा और जब तुम्हारे छोटे भाई और बहन विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की कोशिश करेंगे तो उन्हें परेशानी होगी। वे तुमसे नाराज कैसे नहीं होंगे? मैं यह तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूँ!” मुझे याद है कि मेरी चाची ने एक बार मुझसे कहा था, “तुम्हें नहीं पता कि बचपन में तुम्हारी देखभाल करना कितना मुश्किल था। तुम कई बार बीमार पड़ीं और लगभग मर ही गई थीं। यह तुम्हारी दादी थी जो कभी तुम्हारे पास से नहीं हटी, दिन-रात तुम्हारी देखभाल करती रही। उसने अपना तन-मन तुम पर न्योछावर कर दिया। उस समय तुम्हें गंभीर रक्ताल्पता थी और ब्लड बैंक में खून नहीं था। यह तुम्हारे दादा थे जिन्होंने तुम्हें अपना खून दिया। अब जब तुम बड़ी हो गई हो, तो क्या तुम अब भी उन्हें चिंता देने वाली हो?” मेरे दिल में एक टीस उठी। यह मेरे दादा और दादी थे जिन्होंने मुझे पाला था; उन्होंने मेरी परवाह की और मेरे लिए बलिदान दिए। अब मैं बड़ी हो गई थी और फिर भी मैं उनकी चिंता का कारण बन रही थी। मुझे अंतरात्मा की बहुत कमी महसूस हुई। एक और बार जब मैं घर गई, तो मेरे दादा ने मुझसे कहा, “‘तुम्हें यह शरीर तुम्हारे माता-पिता ने दिया था।’ भले ही तुम अपने बारे में न सोचो, तुम्हें अपने परिवार के बारे में सोचना होगा। अगर तुम्हें किसी दिन तुम्हारी आस्था के लिए गिरफ्तार कर लिया जाए और तुम्हें जेल में कष्ट सहना पड़े, तो हमारा दिल कैसे नहीं टूटेगा और हम परेशान कैसे नहीं होंगे?” उन्हें ऐसा कहते सुनकर मैं मिली-जुली भावनाओं के सैलाब में डूब गई। मुझे लगा कि मैं उन्हें बहुत चिंता में डाल रही हूँ और उनकी भावनाओं की कतई कद्र नहीं कर रही हूँ, जैसे कि मुझे पालने की उनकी सारी कोशिशें बेकार चली गईं। मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मेरा परिवार मेरे बारे में जितनी चिंता करता है, मुझे उतना ही लगता है कि मैं उनकी ऋणी हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम पर विश्वास करना अच्छा है, लेकिन मेरा दिल अभी भी बहुत दर्द में है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो!” प्रार्थना करने के बाद मैंने परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचा : “परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और इसमें एक जीवित प्राणी, मनुष्य को लेकर आया, जिसे उसने जीवन प्रदान किया। क्रमशः मनुष्य के माता-पिता और परिजन हुए और वह अकेला नहीं रहा। जब से मनुष्य ने पहली बार इस भौतिक दुनिया पर नजरें डालीं, तब से वह परमेश्वर के विधान के भीतर विद्यमान रहने के लिए नियत था। यह परमेश्वर की दी हुई जीवन की साँस ही है जो हर एक प्राणी को उसके वयस्कता में विकसित होने में सहयोग देती है। इस प्रक्रिया के दौरान किसी को भी महसूस नहीं होता कि मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में अस्तित्व में रहता है और बड़ा होता है, बल्कि वे यह मानते हैं कि मनुष्य अपने माता-पिता की परवरिश के अनुग्रह में बड़ा होता है और यह उसकी अपनी जीवन-प्रवृत्ति है जो उसके विकास को संचालित करती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि उसे जीवन किसने प्रदान किया है या यह कहाँ से आया है, और यह तो वह बिल्कुल भी नहीं जानता कि जीवन की प्रवृत्ति किस तरह से चमत्कार करती है। वह केवल इतना ही जानता है कि भोजन ही वह आधार है जिस पर उसका जीवन चलता रहता है, कि अध्यवसाय ही उसके जीवन के अस्तित्व का स्रोत है, और उसके मन का विश्वास वह पूँजी है जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर करता है। परमेश्वर के अनुग्रह और भरण-पोषण के प्रति मनुष्य पूरी तरह से बेखबर है और यही वह तरीका है जिससे वह परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया जीवन गँवा देता है...। जिन मनुष्यों की परमेश्वर दिन-रात निगरानी करता है उनमें से एक भी व्यक्ति उसकी आराधना करने की पहल नहीं करता है। परमेश्वर बस अपनी बनाई योजना के अनुसार उस मनुष्य पर कार्य करता है जिससे कोई अपेक्षा नहीं है। वह ऐसा इस आशा में करता है कि एक दिन मनुष्य अपने सपने से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्य और अर्थ को समझेगा, परमेश्वर ने उसे जो कुछ दिया है, उसके लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत और परमेश्वर की उस उत्सुकता को समझेगा जिसके साथ परमेश्वर मनुष्य के वापस अपनी ओर मुड़ने के लिए बेसब्री से लालायित रहता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि मेरा जीवन परमेश्वर से आता है। भले ही मेरे दादा और दादी ने मुझे पाला, लेकिन वह परमेश्वर ही था जो परदे के पीछे हमेशा मुझ पर नजर रखे था और मेरी रक्षा कर रहा था। एक बार जब मैं छोटी थी, तो मैंने गलती से चूहे मारने वाला जहर खा लिया था। मेरा परिवार मुझे तीन अस्पतालों में ले गया, लेकिन उनमें से कोई भी मेरा इलाज नहीं करना चाहता था; उन्होंने बस मेरे परिवार से मेरे अंतिम संस्कार की तैयारी करने को कहा। मेरे दादा एक डॉक्टर थे, लेकिन वह भी असहाय थे। आखिरकार एक अस्पताल अनिच्छा से मुझे बचाने की कोशिश करने को सहमत हो गया और जब उन्होंने मुझे आपातकालीन उपचार दिया, तो मैं चमत्कारिक रूप से बच गई। एक और बार मुझे आंतों में तीव्र रुकावट हो गई थी। डॉक्टर ने इसकी मालिश करने के खिलाफ सलाह दी और कहा कि इससे रुकावट और बढ़ जाएगी। मुझे सर्जरी की जरूरत थी, लेकिन मेरी दादी ने मेरे पेट की मालिश की और वास्तव में रुकावट को दूर करने में कामयाब रही। आज मैं जिस वजह से जीवित और स्वस्थ हूँ, वह पूरी तरह से परमेश्वर की अद्भुत सुरक्षा के कारण है। मुझे परमेश्वर के उद्धार के लिए आभारी होना चाहिए, न कि इसका पूरा श्रेय अपने दादा-दादी को देना चाहिए। एक बार जब मैं यह समझ गई, तो मैंने अब खुद को उनका ऋणी महसूस नहीं किया। एक महीने बाद मुझे पता चला कि कलीसिया को सुसमाचार कार्य में सहयोग करने के लिए लोगों की जरूरत है, इसलिए मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और खुद को इसमें झोंक दिया।
22 अक्टूबर 2013 की दोपहर को एक बुरे व्यक्ति ने एक सभा के दौरान मेरी रिपोर्ट कर दी और मुझे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे 15 दिनों के लिए हिरासत में रखा गया और मुझ पर एक हजार युआन का जुर्माना लगाया गया। मेरे पिता मुझे लेने आए। घर के रास्ते में उनका चेहरा गंभीर था और वह पूरी तरह से खामोश थे। वह जितना खामोश थे, मुझे उतना ही डर लग रहा था; यह तूफान से पहले की शांति जैसा लग रहा था। मैंने अपने दिल में प्रार्थना की, “परमेश्वर, मुझे नहीं पता कि मेरा सामना किस चीज से होने वाला है। कृपया मेरी रक्षा करो। चाहे मेरा परिवार मुझ पर कैसे भी हमला करे, मुझे तुम्हारे लिए अपनी गवाही में अडिग रहना होगा!” हमारे दादा-दादी के घर पहुँचने के बाद मेरे पिता मुझ पर चिल्लाए, “पुलिस ने मुझे बताया—जिस पर तुम विश्वास करती हो, वह सिर्फ एक इंसान है! तुम सबको धोखा दिया गया है, फिर भी तुम इतनी दीवानी हो!” उन्हें ऐसा कहते सुनकर मैं आगबबूला हो गई, इसलिए मैंने पलटकर जवाब दिया, “तुम पहले प्रभु यीशु में विश्वास करते थे। क्या वह भी बाहर से एक इंसान नहीं था? लेकिन उसमें एक दिव्य सार था और वह परमेश्वर का कार्य कर सकता था।” मेरे पिता ने मेरी ओर इशारा किया और कहा, “दीवानी! पूरी तरह से दीवानी! पुलिस ने कहा कि तुम एक संगठन हो ...” मैंने उनकी बात काटते हुए पूछा, “संगठन क्या होता है? एक संगठन लोगों द्वारा बनाया जाता है; यह एक ऐसा समूह है जो अपने उद्देश्यों और हितों के लिए व्यापार करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया परमेश्वर के कार्य के माध्यम से अस्तित्व में आई। हम बस परमेश्वर के वचन पढ़ने, परमेश्वर की आराधना करने, खुद को जानने के बारे में बात करने और परमेश्वर के इरादों पर संगति करने के लिए इकट्ठा होते हैं। इसका किसी संगठन से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर की कलीसिया को संगठन कहना बस अवधारणाओं को भ्रमित करना है। ऐसा तो कोई भ्रमित व्यक्ति ही कहेगा। एक समझदार व्यक्ति खुद इसकी जाँच-पड़ताल करेगा और आँख मूँदकर इस बकवास को नहीं सुनेगा।” लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरे दादा ने भी मेरी ओर इशारा किया और कहा, “इस गाँव में चारों तरफ देख! क्या तुम्हारे जैसा कोई और है? इतनी कम उम्र में परमेश्वर पर विश्वास करना! तुमने हमें पूरी तरह से शर्मिंदा कर दिया है!” मेरी दादी और चाचा ने भी हाँ में हाँ मिलाई और मुझे डाँटने लगे। मेरे पिता ने सवाल किया, “लगता है तुम्हें बहुत कुछ पता है। तुम कब से विश्वास करती हो? तुम्हारी सभाएँ कहाँ होती हैं?” मैंने सोचा था कि मेरे आधे महीने तक बंद रहने के बाद मेरा परिवार मेरे लिए बहुत चिंतित होगा, लेकिन मेरे सामने के दृश्य ने मुझे उदासीन बना दिया। कभी प्यार करने वाले मेरे रिश्तेदार ऐसे कैसे हो गए? घर जेल की तरह बर्फीला ठंडा लग रहा था। सिर्फ परमेश्वर में मेरे विश्वास के लिए मेरा अपना परिवार मुझे अलग-थलग कर रहा था और मेरे खिलाफ एकजुट हो रहा था। कोई मुझे नहीं समझता था और किसी को परवाह नहीं थी कि मैं कैसा महसूस कर रही हूँ। मुझे लगा कि आस्था का रास्ता बहुत कठिन है और मैं अविश्वसनीय रूप से नकारात्मक और कमजोर हो गई। मेरे पिता मुझसे शर्मिंदा होकर मुझे हर दिन मेरे कमरे में बंद कर देते थे। जब गाँव के लोगों को पता चला कि मुझे मेरी आस्था के लिए गिरफ्तार किया गया है, तो उनमें से कुछ हमारे घर के बाहर खड़े होकर मजाक उड़ाते और गपशप करते। कुछ शरारती बच्चे तो चिल्लाते भी थे, “क्या विश्वासी घर पर है? पुलिस आ गई है!” एक शाम मेरे पिता मुझे फिर से डांटने लगे, यह कहने लगे कि मेरी वजह से पूरा परिवार लोगों को मुँह नहीं दिखा सकता। बाद में वे बस कमरे में बैठे उदास होकर खामोशी में सिगरेट पीते रहे। थोड़ी देर बाद मैंने उनकी दबी हुई सिसकियाँ सुनीं। मैंने अपनी पूरी जिंदगी में अपने पिता को कभी रोते नहीं सुना था और उन्हें रोते हुए सुनकर मैं भी रो पड़ी। मैंने सोचा, “मेरी आस्था ने मेरे परिवार पर इतना नकारात्मक प्रभाव डाला है। मेरे दादा और दादी पहले से ही इतने बूढ़े हैं और उन्हें अभी भी मेरी चिंता करनी पड़ती है। इसके अलावा दूसरी बार मुझे गिरफ्तार किया गया है। अगर मैं अपने विश्वास पर अड़ी रही और मुझे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, तो मेरा परिवार इसे कैसे सहन कर पाएगा? शायद मुझे बस अपनी आस्था छोड़ देनी चाहिए, कोई नौकरी कर लेनी चाहिए और बस पैसे कमाने पर ध्यान देना चाहिए और कम से कम उन्हें चैन से रहने देना चाहिए।” इस विचार से मुझे भयानक पीड़ा हुई और मैंने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं तुम पर विश्वास करना चाहती हूँ, लेकिन मेरा परिवार मुझे सताना और रुकावटें डालना बंद नहीं करेगा और मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही हूँ। परमेश्वर, कृपया मेरा मार्गदर्शन करो!” प्रार्थना करने के बाद मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर यह चाहता है कि तुम गवाही दो। हालाँकि ये बाहर से महत्त्वहीन लग सकती हैं, किंतु जब ये चीजें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे, और यदि तुम उसके प्रति प्रेम को अभ्यास में नहीं लाए हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, तुम सत्य से रहित हो, और जीवन से रहित हो, तुम भूसा हो!” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मुझे समझ आया कि ये चीजें परमेश्वर की अनुमति से मुझ पर आई हैं। यह मेरे लिए उसका परीक्षण था, यह देखने के लिए कि क्या मैं अपनी आस्था को थामे रहूँगी और अपनी गवाही में अडिग रहूँगी या शैतान के साथ समझौता करूँगी। अपने परिवार के हमलों और पड़ोसियों की गपशप के सामने और खासकर जब मैंने अपने पिता को रोते हुए सुना, तो मैंने अपने परिवार का मजाक उड़वाने और मेरी वजह से उन्हें चिंता में डालने के लिए अपनी आस्था को दोषी ठहराया था। फिर मैंने अपनी आस्था छोड़ने के बारे में सोचा—क्या वह शैतान के साथ समझौता करना नहीं था? अगर मेरे परिवार को सच में चिंता होती कि मैं किसी गलत चीज पर विश्वास कर रही हूँ, तो उन्हें इसकी जाँच करने और यह पता लगाने में मेरी मदद करनी चाहिए थी कि क्या मेरा विश्वास सच्चा मार्ग है। लेकिन उन्होंने बस अंधाधुंध मुझ पर हमला किया। सच तो यह था कि वे बस इस बात से डरे हुए थे कि मेरी आस्था के कारण वे फँस जाएँगे और उनके अपने हितों को नुकसान होगा। मैंने उनकी नीयत की असलियत नहीं जानी थी और अपने लिए उनकी तथाकथित चिंता से धोखा खा गई थी। मैं शैतान की चाल में फँसकर परमेश्वर को धोखा देने ही वाली थी—यह बहुत खतरनाक था! भविष्य में मेरा परिवार मुझे चाहे कैसे भी सताए, मुझे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहना था और अपने परिवार के हमलों के आगे घुटने नहीं टेकने थे।
14 नवंबर 2013 को मेरे पिता जबरदस्ती मुझे वहाँ ले गए जहाँ वह काम करते थे और मुझे नजरबंद कर दिया। जब वह काम पर जाते, तो मुझे दो ताले लगाकर घर में बंद कर देते थे। मैंने भागने के लिए हर संभव तरीका आजमाया, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। एक दिन मेरे पिता वापस आए, बिस्तर के किनारे बैठ गए और मुझे डाँटा, “खुद को देखो! इतनी कम उम्र में दो बार गिरफ्तार हो चुकी हो! क्या तुम्हें शर्म नहीं आती?” मैंने कहा, “परमेश्वर में विश्वास करने के नाते मैं बस परमेश्वर के वचन पढ़ती हूँ। मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है। इसमें शर्म की क्या बात है?” मैंने कभी नहीं सोचा था कि आगे वह इतना गुस्सा हो जाएँगे। वह उछलकर खड़े हो गए, मेरी गर्दन पकड़ ली, मेरे चेहरे पर लगातार थप्पड़ मारने लगे और चिल्लाए, “तुम विश्वास करना चाहती हो? मैं मार-मार कर तुम्हारा विश्वास निकाल दूँगा!” मेरी नाक से बहुत खून बह रहा था, लेकिन वह तब तक नहीं रुके जब तक कि एक पड़ोसी ने दरवाजा नहीं खटखटाया। उन्होंने मुझे घूरा और गुर्राए, “अगर तुम विश्वास करती रहोगी, तो मैं तुम्हें मारता रहूँगा! मैं तुम्हें इतना मारूँगा कि तुम हार मान लोगी!” उस समय मेरी नाक से खून बहना बंद नहीं हो रहा था। जब मैंने कूड़ेदान को खून से सने टिश्यू से भरते देखा, तो मेरे दिल में बहुत दर्द हुआ। “मेरे अपने पिता सिर्फ इसलिए इतने क्रूर हो रहे हैं क्योंकि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ। यह मेरे पिता कैसे हो सकते हैं? यह एक शैतान हैं!” मैं बिस्तर पर ओंधे मुँह लेटी रही और काफी देर तक फूट-फूट कर रोती रही, मुझे लगा कि परमेश्वर में विश्वास करना बहुत कठिन है। मैंने सोचा, “अगर मैं विश्वास करती रही, तो क्या यह उत्पीड़न कभी खत्म नहीं होगा? शायद मुझे उनसे बस कह देना चाहिए कि मैंने अपनी आस्था छोड़ दी है। मैं यहाँ नौकरी ढूँढ़ सकती हूँ और गुप्त रूप से विश्वास कर सकती हूँ। तब वह मुझे मारना बंद कर देंगे।” मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ।”
तीन दिन बाद मुझे एक पुराना मोबाइल फोन मिला, मैंने परमेश्वर के वचनों वाला एक मेमोरी कार्ड निकाला जिसे मैंने छिपाया था और उसे उसमें डाल दिया। मैंने फोन चालू किया और परमेश्वर के वचन पढ़े : “परीक्षणों से गुजरते समय लोगों का कमजोर होना या उनके भीतर नकारात्मकता आना या परमेश्वर के इरादों या अभ्यास के मार्ग के बारे में स्पष्टता का अभाव होना सामान्य बात है। लेकिन कुल मिलाकर तुम्हें परमेश्वर के कार्य पर आस्था होनी चाहिए और अय्यूब की तरह तुम्हें भी परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। यद्यपि अय्यूब कमजोर था और अपने जन्म के दिन को धिक्कारता था, उसने इस बात से इनकार नहीं किया कि जन्म के बाद लोगों के पास जो भी चीजें होती हैं वे सब यहोवा द्वारा दी जाती हैं और यहोवा ही उन्हें ले भी लेता है। उसे चाहे जिन परीक्षणों से गुजारा गया, उसने यह विश्वास बनाए रखा। ... आस्था का संदर्भ किस चीज से है? आस्था वह सच्चा विश्वास और निष्कपट हृदय है जो मनुष्यों के पास तब होना चाहिए जब वे किसी चीज को देख या छू न सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप न हो या जब वह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। यही वह आस्था है, जिसकी मैं बात करता हूँ। लोगों में कष्ट सहने के समय और शोधन के समय आस्था होनी जरूरी है और जब उनमें आस्था होती है तो वे शोधन का सामना करते हैं—शोधन और आस्था को अलग नहीं किया जा सकता। परमेश्वर चाहे जिस तरह कार्य करे और तुम्हारा परिवेश चाहे जैसा भी हो, अगर तुम जीवन का अनुसरण कर पाते हो और सत्य खोज पाते हो, परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण करते और उसके कर्मों को जानने का प्रयास करते हो और सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ हो, तो तुम्हारे पास सच्ची आस्था है, इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर में आस्था नहीं खोई है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। “तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले पीड़ा सहने का यह संकल्प और यह सच्ची आस्था दोनों ही होने चाहिए और तुममें देह के खिलाफ विद्रोह करने का संकल्प भी होना चाहिए। परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें व्यक्तिगत रूप से पीड़ा सहने और अपने व्यक्तिगत हितों को नुकसान अनुभव करने का इच्छुक होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी सक्षम होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ थे और अब तुम खुद पछतावा कर सकते हो। तुममें इनमें से किसी भी मामले में कमी नहीं होनी चाहिए—इन्हीं चीजों के जरिए परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा। अगर तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतर सकते तो फिर तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। “क्या तुम लोगों ने कभी वे आशीष स्वीकार किए हैं जो तुम्हारे लिए तैयार किए गए थे? क्या तुम लोगों ने कभी उन वादों का पीछा किया है जो तुम लोगों के लिए किए गए थे? तुम लोग मेरे प्रकाश के मार्गदर्शन में अन्धकार की शक्तियों का शिकंजा तोड़कर बाहर आ जाओगे। तुम अंधकार के बीच प्रकाश का मार्गदर्शन नहीं खोओगे। तुम सभी चीजों के मालिक होगे। तुम शैतान के सामने विजेता होगे। तुम बड़े लाल अजगर के देश के पतन पर मेरी जीत के सबूत के रूप में अनगिनत लोगों के बीच उठ खड़े होगे। तुम लोग सिनिम की जमीन पर दृढ़ और अटल रहोगे। तुम जो कष्ट सहते हो उनके परिणामस्वरूप विरासत में मेरे आशीष प्राप्त करोगे और तुम पूरे ब्रह्माण्ड में मेरी महिमा के प्रकाश की किरणें बिखेरोगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 19)। मैंने इन अंशों को बार-बार पढ़ा। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा। अपने परीक्षणों के दौरान उसने अपनी सारी दौलत और अपने बच्चे खो दिए, उसका शरीर दर्दनाक फोड़ों से भर गया था और यहाँ तक कि उसकी पत्नी और दोस्तों ने भी उस पर हमला किया। लेकिन अय्यूब ने कभी परमेश्वर के नाम को नहीं नकारा। इसके बजाय उसने परमेश्वर के आयोजनों और प्रबंधों के प्रति समर्पण किया, यहोवा के नाम की स्तुति की और अपने परीक्षणों के बीच अपनी गवाही में अडिग रहा, शैतान को शर्मिंदा किया। मैंने तो बस अपने पिता द्वारा कैद किए जाने और पीटे जाने को सहा था—बस थोड़ा सा शारीरिक कष्ट—और मुझे पहले ही लगने लगा था कि परमेश्वर में विश्वास करना बहुत कठिन और दर्दनाक है, यहाँ तक कि मैंने अपनी आस्था छोड़ने के बारे में भी सोच लिया था। क्या यह परमेश्वर से विश्वासघात करना और शैतान के सामने झुकना नहीं था? परमेश्वर में मेरी आस्था कितनी छोटी थी! एक आरामदायक माहौल में सक्रिय रूप से सभाओं में भाग लेने और अपना कर्तव्य निभाने का मतलब यह नहीं था कि मेरे पास सच्ची आस्था है। सच्ची आस्था का मतलब है प्रतिकूल परिस्थितियों में कष्ट सहते हुए भी परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम होना। मेरे पिता मुझे इस अनजान जगह पर लाए थे, मुझे मेरे भाई-बहनों से काट दिया था और मुझे पीटा था—यह सब परमेश्वर की अनुमति से हुआ था। परमेश्वर मेरी आस्था और कष्ट सहने के मेरे संकल्प को पूर्ण करने के लिए इसका उपयोग कर रहा था। यह उसका आशीष था! जब मैंने परमेश्वर के इरादों को समझा, तो मैंने प्रार्थना की, परमेश्वर से मेरा मार्गदर्शन करने को कहा ताकि मैं अपनी गवाही में अडिग रह सकूँ। उन बीस से अधिक दिनों के दौरान जब मेरे पिता ने मुझे कैद में रखा, जब भी वह काम पर जाते, मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती। मेरा दिल परमेश्वर के और करीब होता गया और मुझे अब यह नहीं लगा कि मैं कष्ट सह रही हूँ।
बीस से थोड़े अधिक दिनों के बाद मेरे गृहनगर की पुलिस आई और मुझे वापस ले गई और हिरासत केंद्र में ले लिया। मई 2014 के अंत में सीसीपी ने मुझ पर “कानून प्रवर्तन को कमजोर करने के लिए एक ‘कल्ट’ संगठन का उपयोग करने” का आरोप लगाया और मुझे तीन साल की जेल की सजा सुनाई, जिसे चार साल के लिए परिवीक्षा पर निलंबित कर दिया गया। मेरी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए मेरे परिवार को पुलिस को एक लाख युआन से अधिक का भुगतान करना पड़ा। मेरी परिवीक्षा के दौरान मुझे हर हफ्ते स्थानीय न्यायिक कार्यालय में रिपोर्ट करना पड़ता था और हर समय संपर्क में रहना पड़ता था। अगर वे मुझसे संपर्क नहीं कर पाते, तो मुझे चेतावनी मिलती; तीन मिस्ड कॉल और मुझे सीधे जेल वापस भेज दिया जाता। भले ही मुझे रिहा कर दिया गया था, लेकिन मुझे किसी तरह की व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं थी। मेरे चाचा ने मेरी रिहाई के लिए अपनी नौकरी को गारंटी के तौर पर इस्तेमाल किया था और उसके बाद मेरे परिवार ने मुझे और भी ज्यादा सताया। मुझे अपनी हर हरकत की रिपोर्ट उन्हें देनी पड़ती थी। एक बार मैं तीन घंटे से कुछ ज्यादा समय के लिए बाहर थी और मेरी चाची की 14 मिस्ड कॉल आई थीं। रात में अगर मैं थोड़ा जल्दी बिस्तर पर चली जाती, तो मेरी दादी यह जाँचने के लिए आती कि क्या मैं प्रार्थना कर रही हूँ और मुझे सोते समय दरवाजा भी बंद नहीं करने देती थीं। जब मैं अपनी चाची की दुकान पर काम करने जाती, तो वह वहाँ भी मेरे पीछे-पीछे आती। इस चौबीसों घंटे की निगरानी का सामना करते हुए मैं अविश्वसनीय रूप से कमजोर महसूस करती थी और मुझे नहीं पता था कि इसका सामना कैसे करूँ। मैं अक्सर प्रार्थना करती थी, परमेश्वर से मेरे लिए रास्ता खोलने को कहती थी। एक दिन न्यायिक कार्यालय जाते समय मैं एक बहन से मिली। उसने मुझे बताया कि भाई-बहन सभी मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं और मुझे और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर मेरा मार्गदर्शन करेगा। उसकी बातों ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। उसने चुपके से मुझे एक MP5 प्लेयर और परमेश्वर के वचनों के वीडियो वाला एक मेमोरी कार्ड भी दिया। बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुममें मेरा साहस होना चाहिए और जब उन अविश्वासी रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। लेकिन मेरी खातिर तुम्हें किसी भी अंधकार की शक्ति से हार भी नहीं माननी चाहिए। तुम्हें पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर निर्भर रहना चाहिए और शैतान के किसी भी षड्यंत्र को कामयाब नहीं होने देना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि वह इस माहौल का उपयोग मेरे साहस और आस्था को बनाने के लिए कर रहा था, ताकि मुझे शैतान की दुष्टता को स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिल सके ताकि मैं इसके प्रभाव के आगे न झुकूँ बल्कि इसे हराने के लिए बुद्धि का उपयोग कर सकूँ। वे मेरे शरीर को नियंत्रित कर सकते थे, लेकिन वे मेरे दिल को नियंत्रित नहीं कर सकते थे। वे मुझे प्रार्थना करने से रोकने के लिए लगातार मुझ पर नजर रखते थे, लेकिन मैं फिर भी अपने दिल में परमेश्वर के वचनों पर विचार कर सकती थी और परमेश्वर के करीब आने के लिए खुद को उसके सामने शांत कर सकती थी। धीरे-धीरे मेरा दिल अब हताश नहीं था।
एक मौके पर मैंने अपने परिवार से कहा कि मैं स्व-अध्ययन परीक्षा देना चाहती हूँ और अकेले रहने के लिए अपने पुराने घर वापस चली गई। इस तरह मैं आखिरकार उनकी निगरानी से बच निकली। चूँकि मुझे मेरी आस्था के लिए तीन बार गिरफ्तार किया गया था, इसलिए मेरे गाँव के लोग मुझसे दूरी बनाए रखते थे। कभी-कभी अगर कोई समूह सड़क पर बात कर रहा होता, तो मेरे वहाँ से गुजरते ही वे तितर-बितर हो जाते। दूसरे लोग मुझे दूर से ऐसे घूरते जैसे मैं कोई अजीब प्राणी हूँ, मेरे पीठ पीछे कानाफूसी करते और इशारे करते। मेरा परिवार मुझसे शर्मिंदा होकर सार्वजनिक रूप से मेरे साथ नहीं चलता था। मुझे पूरी तरह से बहिष्कृत महसूस होता था, हर किसी के द्वारा ठुकराया हुआ और मुझे बहुत अन्याय महसूस होता था। कई बार मैं अपने दिल में चिल्लाई, “मैं तो बस परमेश्वर में विश्वास और उसकी आराधना कर रही हूँ, एक अंतरात्मा और विवेक वाला व्यक्ति बनने का प्रयास कर रही हूँ। मैंने क्या गलत किया है? मेरे पास बुनियादी मानवाधिकार भी क्यों नहीं हैं? मुझे अपने परिवार से तिरस्कार और अपने पड़ोसियों से भेदभाव क्यों सहना पड़ता है?” मैं अविश्वसनीय रूप से दमित और पीड़ित महसूस करती थी। उस दौरान मैं अक्सर प्रार्थना करती थी और खोजती थी कि मुझे इस माहौल का अनुभव कैसे करना चाहिए।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला। मुझे पता चला कि इसका अनुभव कैसे करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का साढ़े तैंतीस सालों तक देहधारण करके पृथ्वी पर रहना अपने आप में एक बेहद दर्दनाक चीज थी, और कोई भी उसे समझ नहीं सका। ... वह जो मुख्य पीड़ा सहता है वह है चरम भ्रष्ट मानवता के साथ रहना; उपहास, अपमान, आलोचना, और सभी प्रकार के लोगों की निंदा सहने के साथ-साथ दुष्ट राक्षसों द्वारा पीछा किया जाना और धार्मिक दुनिया से ठुकराया जाना और उनकी शत्रुता सहना, जिससे आत्मा पर ऐसे घाव पड़े जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। यह एक दर्दनाक बात है। वह बहुत धैर्य के साथ भ्रष्ट मानवता को बचाता है, अपने घावों के बावजूद वह लोगों से प्रेम करता है, यह बेहद कष्टदायी कार्य है। मानवता के दुष्ट प्रतिरोध, निंदा और बदनामी, झूठे आरोप, उत्पीड़न, और उनके द्वारा पीछा करने और मार डाले जाने के कारण परमेश्वर का देह यह कार्य खुद पर इतना बड़ा जोखिम उठाकर करता है। जब वह यह दर्द सह रहा होता है तो उसे समझने वाला कौन है, और कौन उसे आराम दे सकता है?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मसीह का सार प्रेम है)। मैंने प्रभु यीशु के बारे में सोचा, जिसे उसके जन्म के समय से ही सरकार द्वारा सताया गया था। जब उसने अपना कार्य शुरू किया, तो उसका उपहास किया गया, निंदा की गई और ईशनिंदा की गई, अंततः फरीसियों और रोमन सरकार द्वारा उसे सूली पर चढ़ा दिया गया। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य करने और मानवता को बचाने के लिए आया है और वह भी सीसीपी सरकार द्वारा निंदित और वांछित है। हमें बचाने के लिए परमेश्वर इतना कष्ट सहता है, फिर भी कोई उसके प्रति विचारशीलता नहीं दिखाता या उसे नहीं समझता। उसके दिल को कैसा लगता होगा? मैंने नूह के बारे में भी सोचा। परमेश्वर ने उसे जहाज बनाने के लिए बुलाया। उसने इसे बनाने में अपनी सारी संपत्ति लगा दी और साथ ही यहोवा परमेश्वर का इरादा भी बताया और लोगों को उस पर चढ़ने के लिए कहा। उसके कार्य-कलापों का उपहास किया गया, लेकिन नूह इसके परिणामस्वरूप कमजोर नहीं पड़ा या उसने शिकायत नहीं की। वह परमेश्वर की इच्छा का पालन करने में अटल रहा। लेकिन यहाँ मैं परमेश्वर का अनुसरण करने पर थोड़े से भेदभाव और उपहास का सामना करने से ही इतनी नकारात्मक और दुखी हो रही थी। मैं कितनी नाजुक थी। मैं नूह के सामने कुछ भी नहीं थी! मुझे यह भी याद आया कि प्रभु यीशु ने क्या कहा था : “सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और सरल है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है; और बहुत से हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (मत्ती 7:13-14)। प्रभु यीशु ने बहुत पहले कहा था कि व्यक्ति के पास दो रास्ते होते हैं। एक चौड़े फाटक से होकर जाता है, जो दुनिया का अनुसरण करने, दैहिक सुख, प्रसिद्धि, लाभ और पैसे जैसे दिखाई देने वाले फायदे खोजने का रास्ता है; बहुत से लोग इस रास्ते पर चलते हैं। दूसरा संकरे फाटक से होकर जाता है, जो परमेश्वर में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का रास्ता है। यह कष्टों का रास्ता है, जहाँ तुम्हें उपहास, मजाक और यहाँ तक कि बदनामी और गाली-गलौज का सामना करना पड़ेगा, एक के बाद एक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। बहुत कम लोग इस रास्ते पर चल पाते हैं। मुझे अपनी इज्जत, प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत ज्यादा परवाह थी; ये सब मेरी आस्था के रास्ते में बोझ थे। मैं जानती थी कि मुझे यह सब छोड़ना होगा और आगे बढ़ते रहने और अंततः जीवन पाने के लिए परमेश्वर में सच्ची आस्था को थामे रखना होगा। इसके अलावा, इन अविश्वासियों की स्वीकृति पाना पूरी तरह से व्यर्थ और महत्वहीन है। अपनी आस्था में मुझे सत्य पाने और परमेश्वर द्वारा मूल्यवान समझे जाने का अनुसरण करना चाहिए। चाहे दूसरे मुझे कैसे भी देखें, मुझे परमेश्वर में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने में डटे रहना चाहिए। यह सोचकर मैं अब और बाधित नहीं रही।
बाद में मुझे पता चला कि मेरे पिता और दादी मेरे पीछे एक से अधिक बार मेरे कार्यस्थल पर गए थे, यह जाँचने के लिए कि क्या मैं हमेशा की तरह काम पर आ रही हूँ। मुझे लगा कि मेरी कोई निजता या मानवाधिकार नहीं है। एक बार मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने परिवार के बारे में कुछ भेद पहचाना। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जिन लोगों के पास अच्छी अंतरात्मा है परंतु वे सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे राक्षस हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने का सार है। सत्य के मार्ग को स्वीकार न करने वाले वे लोग होते हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सह लें, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुखों से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और वे सब विनाश की वस्तुएँ बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता है वह राक्षसी है और यही नहीं, वह नष्ट किया जाएगा। वे सब जिनमें आस्था है लेकिन वे सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब भी विनाश की वस्तुएँ होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं जो शोधन की पीड़ा से गुजरे हैं और अडिग रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुजरे हैं। जो कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! परमेश्वर पर विश्वास न रखने वाले प्रतिरोधियों के सिवाय भला शैतान कौन है, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। परमेश्वर के वचन पढ़ने से मुझे अपने परिवार के उन सदस्यों की याद आई जिन्होंने मेरी आस्था में बाधा डाली थी। मेरी माँ ने उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार की गवाही दी थी, लेकिन उनमें से एक ने भी न तो खोज की और न ही जाँच-पड़ताल की। जिस पल मेरी आस्था ने उनके हितों को प्रभावित किया, उन्होंने मुझे सताने और परमेश्वर में मेरे विश्वास में बाधा डालने के लिए हर तरह के तरीके अपनाए, “मेरी भलाई करने” की आड़ में मुझे डाँटा। उन्होंने मुझे नजरबंद कर दिया और मुझे परमेश्वर को धोखा देने के लिए मजबूर करने के लिए पीटा और उस दिन तक वे अभी भी मेरा पीछा कर रहे थे और मुझ पर नजर रखे हुए थे। मैंने देखा कि उनका प्रकृति सार परमेश्वर से घृणा और प्रतिरोध करने वाला है। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा, जिस पर उसके परीक्षणों के दौरान उसकी पत्नी ने हमला किया था। वह इस झाँसे में नहीं आया या नकारात्मक नहीं हुआ; इसके बजाय उसने उसे एक मूर्ख औरत कहकर फटकार लगाई। अपने परिवार के साथ व्यवहार करने और अपनी आस्था पर कायम रहने में अय्यूब के अपने सिद्धांत थे। मुझे उसके उदाहरण का अनुसरण करना था, अपने परिवार के उन सदस्यों को अस्वीकार करना था जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते थे और मेरे और उनके बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी थी।
एक बार पुलिस ने मुझे फोन किया, लेकिन मैंने नहीं सुना। कुछ दिन बाद मेरे दादा मेरे पास आए और कहा, “तुमने पुलिस का फोन क्यों नहीं उठाया? अपना फोन उठाना मत भूलना!” मुझे बहुत गुस्सा आया। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और सीसीपी के परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले दुष्ट सार का कुछ भेद पहचाना। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हजारों सालों से यह मलिनता की भूमि रही है। यह असहनीय रूप से गंदी और असीम दुःखों से भरी हुई है, चालें चलते और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए, निर्दयी और क्रूर बनकर इस भुतहा शहर को कुचलते हुए और लाशों से पाटते हुए प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं; सड़ांध जमीन पर छाकर हवा में व्याप्त हो गई है, और इस पर जबर्दस्त पहरेदारी है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? दानव मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, अपनी दोनों आँखों पर पर्दा डालकर, अपने होंठ मजबूती से बंद कर देता है। दानवों के राजा ने हजारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीकी से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्ते चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या वे कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद ले सके होंगे? क्या वे कभी मानव-जगत के मामलों को समझ सकते हैं? उनमें से कौन परमेश्वर के उत्कट इरादों को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारपूर्ण समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, पलक झपकते ही लोगों को मार डालने वाला दानवों का सरदार, ऐसे मनोहर, दयालु और पवित्र परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जय-जयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया के बदले घृणा देते हैं, लंबे समय पहले ही ये परमेश्वर से शत्रु की तरह पेश आने लगे थे, ये परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, ये बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, ये हमला करते हैं और लूटते हैं, इनका विवेक मर चुका है, ये अंतश्चेतना के विरुद्ध कार्य करते हैं, और लालच देकर निर्दोषों को गहन अचेतावस्था में पहुँचा देते हैं। प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुआ? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज को अँधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं!” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। परमेश्वर के वचनों से मैंने सीसीपी के राक्षसी सार को और भी स्पष्ट रूप से देखा, जो परमेश्वर का विरोधी है। ऊपर से वह धार्मिक स्वतंत्रता का झंडा लहराती है, लेकिन वास्तविकता में वह सही और गलत को तोड़ती-मरोड़ती है और अज्ञानी लोगों को गुमराह करने के लिए हर तरह के पाखंड और भ्रांतियाँ फैलाती है ताकि वे परमेश्वर पर हमला करने और उसका प्रतिरोध करने में उसका साथ दें, और ईसाइयों को सताएँ। इसका उद्देश्य है कि हर कोई परमेश्वर का प्रतिरोध करने और विनाश की ओर बढ़ने में उसका साथ दे। सीसीपी पृथ्वी पर एक शैतान है, परमेश्वर की दुश्मन है; वह पूरी तरह से नीच और दुष्ट है! आस्था के सिर्फ तीन सालों में मुझे तीन बार गिरफ्तार किया गया था। रिहाई के बाद भी मुझे कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं थी। सीसीपी ने मेरे परिवार के सदस्यों की तीन पीढ़ियों की नौकरियों और लाभों के प्रभावित होने की धमकी का इस्तेमाल मेरे परिवार को मेरी आस्था में बाधा डालने के लिए उकसाने के लिए किया। अपने हितों के लिए मेरे परिवार ने आँख मूँदकर मुझे सताया, परमेश्वर को दोषी ठहराया और उसकी ईशनिंदा की और लगातार मेरा पीछा किया और मुझ पर नजर रखी। ग्रामीणों ने भी मुझसे किनारा कर लिया और मेरे साथ भेदभाव किया क्योंकि मुझे गिरफ्तार किया गया था। यह सब सीसीपी के उत्पीड़न का परिणाम था। सीसीपी ने मेरी आस्था में बाधा डालने के लिए हर हथकंडा अपनाया, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि उसका प्रदर्शन न केवल मुझे उसके परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले सार का भेद पहचानने में मदद करेगा बल्कि मेरे परिवार के प्रकृति सार का भी। इसने परमेश्वर का अनुसरण करने की मेरी आस्था को और मजबूत ही किया। सीसीपी मेरे शरीर को नियंत्रित कर सकती थी, लेकिन वह मेरे दिल को नियंत्रित नहीं कर सकती थी। मैं अपनी आस्था या अपना कर्तव्य नहीं छोड़ूँगी।
मई 2015 के अंत में मैंने अपनी बहन को उसकी नई नौकरी के लिए विदा करने के अवसर का लाभ उठाया और आखिरकार घर छोड़ दिया और अपना कर्तव्य करने लगी। जैसे ही मैंने घर से बाहर कदम रखा, मुझे लगा जैसे मैं बेड़ियों से मुक्त हो गई हूँ; मेरा शरीर और आत्मा पूरी तरह से आजाद थे। अगर परमेश्वर के वचन मुझे आस्था न देते और सत्य समझने के लिए मुझे प्रबुद्ध न करते, तो मैं अपने परिवार के लगातार हमलों से कभी उबर नहीं पाती। यह परमेश्वर ही था जिसने मुझे मेरे “परिवार” की बेड़ियों से मुक्त होने के लिए अगुआई की और मुझे आखिरकार अपना कर्तव्य निभाने का अवसर दिया। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
झाओ लियांग, चीन सितंबर 2009 में एक दिन मैं और दो बहनें एक धार्मिक अगुआ के पास सुसमाचार का प्रचार करने गए। हालाँकि अगुआ ने इसे नकार दिया और...
मी शू, चीनमार्च 2013 में एक दिन, मैं कुछ बहनों के साथ एक सभा के बाद घर लौटी, घर में घुसते ही देखा कि सब कुछ बिखरा हुआ है। हमने अंदाज़ा...
कीझें, चीन 2 जुलाई 2009 को सुबह 5 बजे मैं सभा के लिए निकल रही थी कि मैंने सड़क के किनारे एक काली सेडान खड़ी देखी और चार पुलिसवाले अचानक उसमें...
दांग मेई, हेनान प्रांत मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ। मैं एक नीरस जीवन जीती थी। प्रकाश की लालसा रखने वाले कई लोगों की तरह, मैंने मानव-अस्तित्व...