जेल की मुसीबत

15 जनवरी, 2021

विगत मई 2004 में एक दिन मैं कुछ भाई-बहनों के साथ एक सभा में हिस्सा ले रही थी, तभी 20 से ज्यादा पुलिस अफसरों ने धावा बोल दिया। उन्होंने बताया कि वे म्युनिसिपल नेशनल सिक्युरिटी ब्रिगेड से आए हैं और पिछले चार महीनों से मेरे सेलफोन की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे पूरे प्रांत में चल रही कानूनी कार्रवाई का हिस्सा हैं, जिसके तहत सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कई विश्वासियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। वे पूछताछ के लिए मुझे शहर के एक कम्युनिस्ट पार्टी स्कूल में ले गए। जैसे ही मैं वहाँ पहुँची, उन्होंने मुझे जूते उतारकर घुटनों के बल बैठ जाने को कहा। कुछ ही देर बाद मेरे पैर सुन्न पड़ गए, लेकिन जब भी मैं अपनी स्थिति बदलने की कोशिश करती, पुलिसवाले मुझ पर बरस पड़ते, कहते कि मुझे जरा भी हिलने-डुलने की इजाजत नहीं है। उन्होंने करीब दो घंटे तक मुझे वैसे ही घुटनों के बल बिठाए रखने के बाद अपनी पूछताछ शुरू की। "तुम्हारा अगुआ कौन है? कलीसिया का पैसा कहाँ रखा है?" मैंने कुछ नहीं कहा। उसके बाद नेशनल सिक्युरिटी ब्रिगेड का कप्तान एक जोड़ी हथकड़ी लेकर आया और दहाड़ते हुए बोला, "इसके साथ अपना समय खराब मत करो। इसे इनका मजा चखाओ!" फिर उसने मुझसे कहा, "दूसरे कमरे से आने वाली आवाज सुन रही हो?" उस कमरे से एक बहन के चीखने की आवाज आ रही थी, जिसे सुनकर मुझे घबराहट हुई और डर भी लगा, यह सोचकर कि "ये पुलिसवाले मुझे इसी तरह यातना देने वाले हैं। मैं इसे कैसे सह पाऊँगी?" फिर मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की, और उससे हिम्मत देने की विनती करते हुए कहा कि मैं उसके आगे समर्पण करने और गवाही देने के लिए तैयार हूँ। तभी कप्तान ने मुझे जमीन पर धकेल दिया, मेरे हाथों को पीछे मोड़कर हथकड़ी लगा दी और फिर ऊपर-नीचे झटके देने लगा। इसी तरह कई बार ऊपर-नीचे खींचने और झटके दिए जाने के बाद, दर्द के मारे मेरे शरीर से पसीना निकलने लगा। करीब दस मिनट तक इसी तरह करते रहने के बाद आखिरकार उन्होंने मुझे छोड़ा। यह तरीका काम न आया देख उन्होंने कोई और तरीका आजमाने का फैसला किया। वे दूसरे इलाके से कुछ और पुलिसवालों को लेकर आए, जिनमें शहर की दंगा रोकने वाली पुलिस भी शामिल थी, और वे बारी-बारी से समूह बनाकर मुझसे पूछताछ करने लगे। हर समूह में चार पुलिसवाले होते और वे दिन-रात बारी-बारी से मेरी खबर लेते रहे। वे मुझे सोने तक न देते और लगातार सताते रहते। जैसे ही मेरी आँखें नींद से बोझिल होने लगतीं और मैं सोने लगती, पुलिसवाले मेरे चेहरे पर ठंडा पानी उड़ेल देते और मेरे बाल खींचने लगते, ताकि वे मेरे दृढ़ संकल्प को तोड़ सकें और मैं अपने भाई-बहनों से गद्दारी करने और परमेश्वर को धोखा देने पर मजबूर हो जाऊँ। हर दिन मेरी हिम्मत टूटने के कगार पर पहुँच जाती, और मुझे डर लगता कि अगर मैं एक पल के लिए भी होश खो बैठी, तो कहीं मैं कलीसिया की जानकारी का खुलासा न कर बैठूँ। मन ही मन मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती रही और उन भयावह दिनों में मुझे राह दिखाने की गुहार लगाती रही। पुलिसवाले भी जान-बूझकर मुझे अपमानित करते रहे। जब मुझे शौचालय का इस्तेमाल करना होता, तो वे मुझे दरवाजा भी बंद न करने देते, यहाँ तक कि पुलिसवाले शौचालय के अंदर-बाहर आते-जाते रहते। उनमें से कुछ ने तो अंदर झाँकने का इंतजाम तक कर लिया था और कई बार वे दरवाजे पर खड़े होकर मुझे शौचालय जाते हुए देखते। 12 दिनों तक मुझसे इसी तरह पूछताछ होती रही और मुझे यातना दी जाती रही। 10 से ज्यादा दिनों तक सो न पाने और नसें खिंच जाने के कारण मुझे गंभीर कब्ज की शिकायत हो गई। उनकी यातनाओं के कारण मेरा वजन 58 किलो से घटकर 52 किलो रह गया। 12 दिन में ही मेरा वजन 6 किलो कम हो गया था।

तेरहवें दिन पुलिस मुझे शहर के एक नजरबंदी-गृह लेकर आई। करीब एक महीने बाद वे निगरानी के लिए मुझे एक महँगे होटल में लेकर गए। वहाँ वे मेरे पति को लेकर आए और उसे मेरे साथ कमरे में अकेले छोड़ दिया, ताकि वह मुझे कलीसिया की जानकारी देने के लिए मना सके। पहले तो मैं कमजोर पड़ने लगी और सोचने लगी कि मैं जल्दी से जल्दी अपने पति के साथ इस नरक से बाहर निकल सकती हूँ। लेकिन यहाँ से निकलने के लिए मुझे परमेश्वर को धोखा देना होगा और अपने भाई-बहनों से गद्दारी करनी होगी। तभी परमेश्वर के ये वचन मेरे ध्यान में याद आए : "तुम लोगों को जागते रहना चाहिए और समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और तुम लोगों को मेरे सामने अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें शैतान की विभिन्न साजिशों और चालाक योजनाओं को पहचानना चाहिए, आत्माओं को पहचानना चाहिए, लोगों को जानना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को समझने में सक्षम होना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे याद दिलाया कि पुलिस मेरी कमजोरी का फायदा उठाने के लिए मेरे पति को लेकर आई है, ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ। वह शैतान की मक्कार साजिश थी और मैं उसके जाल में फँसने ही वाली थी। मैंने सोचा कि जब पुलिसवाले मुझसे पूछताछ कर रहे थे, तो कैसे उन्होंने कुछ भाई-बहनों के नामों और तसवीरों की सूची दिखाकर मुझसे उनकी पहचान करने के लिए कहा था, लेकिन मैंने इनकार कर दिया था। मुझे यह भी याद आया कि कैसे मेरा पति मेरी आस्था को लेकर हमेशा मेरा साथ दिया करता था। मैंने सोचा कि मैं उन भाई-बहनों को सचेत करने के लिए अपने पति को मनाकर इस मौके का फायदा उठा सकती हूँ, ताकि भाई-बहन भूमिगत होकर गिरफ्तारी से बच सकें। इसलिए मैंने अपने पति के कंधे पर सिर रखकर रोने का बहाना बनाया और धीमी आवाज में अपनी योजना उसके कानों में बता दी। वह इससे सहमत हो गया। लेकिन मैं हैरान रह गई, जब फौरन एक महिला अधिकारी दनदनाते हुए कमरे में दाखिल हुई और मेरे पति से बोली, "हम तुम्हें यहाँ अपनी मदद के लिए लाए थे। तुम क्या बातें कर रहे थे? यहाँ से निकल जाओ!" पुलिस चाहती थी कि मेरे पति मुझे इस बात के लिए मनाएँ कि मैं उन्हें कलीसिया की जानकारी देकर परमेश्वर को धोखा दे दूँ, लेकिन जब इस महिला अधिकारी ने देखा कि उनकी तरकीब काम नहीं आई, तो वह आगबबूला हो उठी और मेरे पति को फौरन निकल जाने के लिए कह दिया। यह पुलिस कितनी पापी और दुष्ट है! परमेश्वर के मार्गदर्शन ने ही मुझे शैतान की मक्कार साजिश में फँसने से बचाया।

इसके बाद पुलिस मुझे पूछताछ के लिए वापस कम्युनिस्ट पार्टी स्कूल ले गई। उन्होंने मुझे एक टाइगर-चेयर से बाँध दिया, फिर एक महिला अधिकारी दनदनाती हुई अंदर आई और प्लास्टिक की चप्पल से मेरे चेहरे पर मारने लगी। मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और मैं कुर्सी पर लुढ़क गई। उसने कहा कि मैं नाटक कर रही हूँ, इसलिए उसने गाली देते हुए मेरे बालों को जोर का झटका दिया और मुझे फिर से मारने लगी। मेरा चेहरा सूजकर बैंगनी हो गया और मेरी आँखों से खून टपकने लगा। फिर एक पुरुष अधिकारी ने आकर मुझे टाइगर-चेयर से खोला और मेरे बालों को बुरी तरह से खींचकर मुझे टाइगर-चेयर के नीचे ठूँसने की कोशिश करने लगा। मैं उसके नीचे ठुँस नहीं पाई, तो उसने लात मारकर गाली दी और कहा कि मैं कुतिया से भी बदतर हूँ। उन्होंने मुझे कुर्सी के नीचे धकेल दिया और हिलने-डुलने से मना किया, और उसके बाद मुझे वापस कुर्सी में डालकर जंजीरों से बाँध दिया। इस तरह बेरहमी से पीटे जाने और अपमानित होने से मैं बहुत ज्यादा परेशान हो गई और कमजोर पड़ने लगी। मैंने मन ही मन सोचा : "ये मुझे यातनाएँ देना बंद नहीं करेंगे। आखिर यह कब तक चलेगा?" ऐसी भयानक पीड़ा में मैं मौत माँगने लगी, लेकिन उन्होंने मुझे टाइगर-चेयर से बाँध रखा था, अत: उसकी भी गुंजाइश नहीं थी। इसलिए मैं मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना करती रही और फिर मैंने उन सभी संतों के बारे में सोचा, जिन्हें प्रभु के सुसमाचार का प्रचार करने के कारण बुरी तरह सताया गया था। कुछ संतों को घोड़ों से कुचलवाया गया, कुछ को पत्थरों से मार डाला गया और कुछ को तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया गया। उन सभी ने ऐसी यातनाएँ सहीं, जो कोई आम इंसान नहीं सह सकता और उन सबने अपने जीवन में परमेश्वर के लिए गवाही दी। और एक मैं हूँ, जो थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं सह पा रही और इससे बचने के लिए मौत माँग रही हूँ। मैं बहुत कमजोर थी और गवाही बिलकुल भी नहीं दे रही थी। इन चीजों के बारे में सोचकर मैं दुख और पछतावे से भर गई, इसलिए मैं फौरन परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना और पश्चात्ताप करने लगी। तभी मेरी नजर पास की खिड़की के बाहर बैठी छोटी-सी चिड़िया पर पड़ी। उसके पंख धूसर रंग के थे, और मुझे याद है कि उस दिन हलकी बारिश भी हो रही थी। वह चिड़िया चहचहा रही थी और मुझे लगा, जैसे वह कह रही हो, "गवाही दो, गवाही दो ...।" चिड़िया की चहचहाहट तेज होते-होते लगभग कर्कश हो गई। मुझे एहसास हुआ कि इस चिड़िया के जरिये परमेश्वर मुझे याद दिला रहा है, और मैं बहुत प्रेरित हुई। परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए मैं रो-रोकर कहने लगी, "प्रिय परमेश्वर, मैं डरपोक या कायर नहीं बनना चाहती। मैं इस तरह कमजोर और आतंकित होकर मरना नहीं चाहती। कृपा करके मुझे आस्था और शक्ति दो। मैं गवाही देकर शैतान को शर्मिंदा करना चाहती हूँ।" तभी परमेश्वर के ये वचन मेरे ध्यान में आए : "तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : 'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?')। "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसकी कृपा पर बने रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के वचनों से मुझे सुकून और हौसला मिला। इन वचनों ने मुझे दिखाया कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा मुझे सताया और नुकसान पहूँचाया जाना निश्चित है, क्योंकि वह दानव शैतान है, परमेश्वर की शत्रु है। लेकिन परमेश्वर अपनी बुद्धि का प्रयोग शैतान की मक्कार साजिशों के आधार पर करता है, और हमारी आस्था और आज्ञाकारिता को पूर्ण करने के लिए वह शैतान के जरिये उत्पीड़न और क्रूर यातनाओं का इस्तेमाल करता है, और ऐसा करके वह विजेताओं का एक समूह बनाता है। मैं सत्य को हासिल करने के लिए पीड़ा सह रही थी, और यह पीड़ा सार्थक भी थी और उपयोगी भी। तभी मुझे याद आया कि कैसे परमेश्वर हमें बचाने के लिए स्वयं देहधारी हुआ, कैसे उसे ठुकराया और बदनाम किया गया, कैसे सीसीपी ने उसका पीछा करके उसे सताया और उसे कहीं शरण नहीं मिली। परमेश्वर ने इतना अधिक अपमान और पीड़ा झेली, तो एक भ्रष्ट इंसान होने के नाते, मेरी यह थोड़ी-सी पीड़ा क्या मायने रखती है? मसीह के साथ पीड़ा सहन करने में सक्षम होना तो एक सम्मान की बात है। मैं डरकर मौत का सामना नहीं कर सकती; चाहे शैतान मुझे कितनी भी यातना दे, मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपनी आखिरी साँस तक परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए गवाही दूँगी। बाद में नेशनल सिक्युरिटी ब्रिगेड के चीफ ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "तुम बड़ी मजबूती से डटी हुई हो। हमने इस तरह तुम्हारी खातिरदारी करने की नहीं सोची थी। अगर तुम हमें सब-कुछ बता दो और सहयोग करो, तो मैं गारंटी देता हूँ, तुम्हें जल्दी ही घर जाने दिया जाएगा और तुम अपने परिवार से मिल सकोगी।" वे मुझे खिलाने के लिए चिकन और ब्रेड भी लेकर आए, लेकिन मैं जानती थी कि यह मुझे बहकाने का एक और स्वांग था, ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ। मैंने उनकी ओर देखकर पक्के इरादे से कहा, "मुझे आपका यह तरीका पसंद नहीं आया, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैं आपके लिए उस बकरे जैसी हूँ, जिसे आप जब चाहें हलाल कर सकते हैं। मुझे पता है, मैं यहाँ से जिंदा बचकर नहीं जा सकती और मैंने इसे स्वीकार भी कर लिया है, इसलिए आप जो चाहें कर सकते हैं। मैंने आपको पहले ही बता दिया है कि मुझे आपके सवालों के जवाब नहीं मालूम!" फिर उसने एक भेद भरी मुसकान के साथ कहा, "इतनी संजीदा मत बनो। थोड़ी अक्लमंदी दिखाओ। बस, हमें वह बता दो, जो हम जानना चाहते हैं, और फिर तुम घर जा सकती हो।" फिर वह मुड़कर चुपचाप निकल गया। उसके बाद पुलिस ने मुझे टाइगर-चेयर पर ही बिठाए रखा। दो हफ्ते बाद वे मुझे नजरबंदी-गृह लेकर गए। वहाँ के स्टाफ ने मेरी गंभीर चोट देखी, तो मुझे लेने से मना कर दिया। नेशनल सिक्युरिटी ब्रिगेड की पुलिस ने मुझे यह कहने को मजबूर किया कि यह चोट गिरने की वजह से लगी है, तो नजरबंदी-गृह की पुलिस के पास मुझे स्वीकार करने के सिवा कोई चारा न रहा।

एक महीने तक मैं नजरबंदी-गृह में रही, जिसके बाद पुलिस मुझे और पूछताछ के लिए वापस कम्युनिस्ट पार्टी स्कूल ले गई। उन्होंने चौबीसों घंटे मुझे टाइगर-चेयर पर बिठाए रखा, जिसमें मेरी पीठ सीधी रहती और पैरों को 90 डिग्री पर मोड दिया जाता। ऐसा एक महीने तक चला। मेरी गर्दन में असहनीय दर्द होने लगा और पैर बुरी तरह सूज गए। पुलिस लगातार मुझे मारती, परेशान करती, अपमानित करती, जिसने अंदर से मुझे कुपित कर दिया। खासकर तब, जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना कि कैसे उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से विश्वासियों को गिरफ्तार किया, पुरुष हो या महिला, बुजुर्ग हो या युवा, गिरफ्तार होने वाले हर इंसान को पहले यातना देकर डराया जाता और फिर वे अपनी बात मनवाने की कोशिश करते। यह उनका हिम्मत तोड़ देने का तरीका था। इन दानवों को इतनी बेशर्मी से डींगें हाँकते सुनकर और आत्मतुष्ट हँसी हँसते और पाशविक ठहाके लगाते देखकर मैं नफरत से दाँत पीसने लगी। उनकी बातों से पता चला कि वे मेरे भाई-बहनों को कैसी तकलीफ दे रहे थे। सीसीपी सच में ऐसे दानवों का गिरोह है, जो मजे के लिए लोगों को तकलीफ देता है। इन दानवों को धिक्कारते हुए मैंने मन ही मन प्रार्थना की। बाद में जब पुलिसवालों ने देखा कि उन्हें मुझसे अपने मतलब की जानकारी नहीं मिल रही, तो उन्होंने मुझे एक नजरबंदी-केंद्र में भेज दिया, जो दरअसल अपराधियों का नजरबंदी-केंद्र था, और उसके बाद मेरा मत-परिवर्तन करने के लिए मुझे कहीं और भेज दिया गया। आखिर में मुझे वापस शहर के नजरबंदी-गृह लाया गया, जहाँ मैं एक साल तीन महीने तक बंद रही। पुलिस ने यह सब मेरा हौसला तोड़ने और मुझे परमेश्वर को धोखा देने को मजबूर करने के लिए किया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। बाद में उन्होंने मुझ पर "कानून लागू करने के काम में दखल देने के लिए सामंती अंधविश्वास का इस्तेमाल करने" का आरोप लगाकर चार साल के लिए जेल भेज दिया।

जेल में मुझे फिर से पता चला कि नरक में रहने पर कैसा महसूस होता है। मुझे एक उत्पादन-व्यवसाय में कपड़े बनाने का काम दिया गया, जहाँ हर किसी के पास करने के लिए अपना काम था। जो कोई इस प्रक्रिया का पालन नहीं कर पाता था या अपना काम खत्म नहीं कर पाता था, उसे रात को 11 बजे काम खत्म होने के बाद 30 मिनट से लेकर एक घंटे तक खड़े रहने को मजबूर किया जाता था। उस अवधि के दौरान सिवाय भोजन के, मेरा पूरा समय काम वाले कमरे में ही बीता। प्यास लगने पर मुझे पानी पीने का भी समय न मिल पाता, यहाँ तक कि मुझे शौचालय भी भागकर जाना-आना पड़ता। इससे मुझे गंभीर कब्ज की शिकायत हो गई। चूँकि मेरा पूरा दिन बैठकर काम करने में ही निकलता और वहाँ काम भी बहुत ज्यादा करना होता था, और साथ ही पुलिस के हाथों मिली यातना और दो महीने से ज्यादा समय तक टाइगर-चेयर पर बिठाए रखने के कारण, मेरी गर्दन में फिर से तेज दर्द रहने लगा और अकसर मुझे सिर-दर्द और मतली की समस्या रहने लगी। एक बार मैं शॉवर में फिसलकर गिर पड़ी और मेरा सिर जोर से जमीन पर टकराया। मेरी पीठ में भी चोट लगी और मेरी आँखें चौंधिया गईं, जिससे मैं हिल-डुल भी नहीं पा रही थी। मुझे लगा, जैसे मेरी पीठ की हड्डी टूट गई है, और उसमें बहुत दर्द होने लगा। दूसरे कैदियों ने भी कहा कि मेरा काम तमाम हो गया या अब मैं अपाहिज हो जाऊँगी। वे सभी मदद के लिए चिल्लाने लगे और अलार्म की घंटी बजा दी, लेकिन कोई नहीं आया। आखिरकार कुछ कैदियों ने मुझे बिस्तर पर पहूँचाया। मुझे लगा कि मेरा शरीर टूट गया है और मैं लगातार दर्द से रोती रही। उस रात इतना तेज दर्द हुआ कि मैं बिलकुल भी सो नहीं पाई। अगले दिन सुबह 8 बजे एक महिला गार्ड मेरे कमरे में आई। उसने अधीर होकर पूछा कि मुझे कितनी चोट लगी है। मैंने कहा, "लगता है, मेरी पीठ टूट गई है। मैं बिलकुल भी हिल-डुल नहीं सकती और सिर में बहुत दर्द हो रहा है।" लेकिन उसने मजाक उड़ाते हुए कहा, "कोई बड़ी बात नहीं। तुम्हें काम के लिए ऊपर जाना होगा, बहुत-से काम करने हैं। अगर तुम हिल-डुल नहीं सकती, तो किसी की मदद लेकर ऊपर पहुँचो। अगर कोई मदद नहीं करता, तो तुम्हें खुद ही रेंगकर वहाँ तक पहुँचना होगा!" फिर वह मुड़कर वहाँ से निकल गई। वह भयानक पीड़ा सहन करते हुए मुझे दूसरे कैदियों से धीरे-धीरे बिस्तर से उतरने में मदद करने के लिए कहना पड़ा। मुझे उठाकर बैठाने में ही 30-40 मिनट लग गए और फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियों वाली दीवार की ओर बढ़ी और सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। काम की जगह पर पहुँचना बहुत ही मुश्किल था, और मैंने बैठने की कोशिश की, लेकिन दर्जनों बार कोशिश करने के बाद भी मैं कामयाब नहीं हो पाई। आखिरकार मुझे बैठने के लिए अपनी मशीन पकड़कर और दर्द से दाँत पीसते हुए अपना पूरा जोर लगाना पड़ा। मुझे लगा कि मेरी पीठ में कुछ टूट गया है, जिससे दर्द और तेज होने लगा। डॉक्टर के आने तक दर्द सहना बहुत मुश्किल था, लेकिन उसने भी सिर्फ इतना किया कि मेरी पीठ पर थोड़ा आयोडीन लगाकर रगड़ने के बाद तीन नोटोजिनसेंग गोलियाँ खाने को दे दीं। उसने कहा कि तीनों गोलियाँ खाकर मैं वापस काम पर लग जाऊँ। शरीर और सीने में हो रहे तेज दर्द के कारण मुझे ऐसा लगा कि अब मेरा बचना मुश्किल है। इस तरह अमानवीय ढंग से पेश आने पर मुझे उन पुलिसवालों से बहुत नफरत हो गई। उनकी नजरों में कैदी कुत्तों से भी बदतर थे—हम उनके लिए बस पैसे कमाने की मशीन थे। मैंने सोचा कि जेल में तो अभी एक साल भी नहीं बीता है, जबकि मुझे चार साल की सजा मिली है। इतने लंबे समय मैं जिंदा कैसे रह पाऊँगी? मैं नहीं जानती थी कि यहाँ से बचकर निकल पाऊँगी भी या नहीं। यह सोचकर मैंने खुद को बहुत अकेली और अलग-थलग महसूस किया। अनजाने ही मैं परमेश्वर के वचनों का अपना पसंदीदा भजन गुनगुनाने लगी : "जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीजों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'पूर्ण कैसे किए जाएँ')। मैंने चुपचाप यह भजन गाया, और जितना अधिक मैं इसे गाती, मुझे उतनी ही अधिक प्रेरणा मिलती। मुझे अपने भीतर कुछ ताकत आती दिखी और महसूस हुआ कि हालाँकि मैं इस शैतान की माँद में अपनी कमजोर हालत में काफी तकलीफ उठा रही हूँ, लेकिन परमेश्वर के वचन अभी भी मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं, और मुझे विश्वास और हिम्मत दे रहे हैं। परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं छोड़ा और परमेश्वर के वचनों के साथ, मैं अकेली नहीं रहूँगी। यह सोचकर मुझे काफी सुकून मिला और पीड़ा सहन करने का संकल्प न होने पर मुझे काफी पछतावा हुआ। इन मुश्किलों और परीक्षणों का सामना करके मैं निराश हो गई थी और मैंने परमेश्वर का दिल दुखाया था। मैंने विचार किया कि अपनी गिरफ्तारी के बाद से अब तक मैंने क्या कुछ नहीं झेला। पुलिस ने मुझे लंबे समय तक नुकसान पहूँचाया और यातना दी, और अगर परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन न होता और परमेश्वर मेरी देखभाल न कर रहा होता, तो अब तक मैं कई बार मर चुकी होती। अब एक बार फिर इस अमानवीय यातना को सहते हुए, मुझे यह विश्वास था कि अगर मेरा भरोसा परमेश्वर पर बना रहा, तो मैं इस नरक से भी निकल जाऊँगी। परमेश्वर मेरी आस्था को पूर्ण करने के लिए इन हालात का इस्तेमाल कर रहा था। मैं जानती थी कि मैं उसका दिल और नहीं दुखा सकती; मुझे उस पर भरोसा करना होगा और मजबूत बनना होगा, और ज़िंदा रहकर उसके लिए गवाही देनी होगी। इन बातों को सोचकर मेरी निराशा खत्म होने लगी। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से ही मैं उस दौरान शैतान द्वारा पहूँचाई गई चोट और यातना सहन कर पाई। आखिरकार मेरी सजा पूरी हुई और मैं उस नरक से बाहर निकल पाने तक जिंदा रह पाई।

जब मैं वापस घर पहुँची, तो मैंने सुना कि पुलिस यह कहकर अफवाहें फैलाने में जुटी है कि मैंने धोखाधड़ी की है। इन अफवाहों और पड़ोसियों के उलाहनों से बचने के लिए मेरे पति को दूसरी जगह जाकर काम ढूँढ़ना पड़ा था और अब वह मुझसे तलाक लेना चाहता था। मुझे जेल भेजे जाने को लेकर उसकी माँ को इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि वह मुझे देखना भी नहीं चाहती थी। मेरी बेटी का भी शिक्षकों और सहपाठियों, दोनों के द्वारा लगातार इस कदर उपहास उड़ाया गया कि गाँव का एक भी बच्चा उसके साथ खेलना नहीं चाहता था। जो कुछ भी हुआ, उसे देखकर मैं अपने आँसू नहीं रोक पाई। हमारा परिवार बड़ा ही खुशहाल था, लेकिन सीसीपी के अत्याचार के कारण अब इस हाल में आ पहूँचा था। मेरी रग-रग में सीसीपी के प्रति नफरत भर गई! परमेश्वर के वचनों का एक अंश मेरे ध्यान में आया : सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुवा? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीजको अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने की चालें हैं! ... परमेश्वर के कार्य में ऐसी अभेद्य बाधा क्यों खड़ी की जाए? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चली जाएँ? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के लोगों को छलने के लिए धोखेभरी योजनाओं का उपयोग क्यों किया जाए? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों किया जाए? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए, जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह भी न रहे? मनुष्यों की गर्मजोशी कहाँ है? लोगों की स्वागत की भावना कहाँ है? परमेश्वर में ऐसी तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेवर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने पर मजबूर क्यों किया जाए? इस अंधकारपूर्ण समाज में इसके घटिया रक्षक कुत्ते परमेश्वर को उसकी बनायी दुनिया में स्वतंत्रता से आने-जाने क्यों नहीं देते" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, तो मैं सीसीपी की कुरूपता को अच्छी तरह समझ गई। बाहर से वह धार्मिक होने का दिखावा करती है, "धार्मिक आस्था की आजादी देने", "लोगों के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने" और "लोगों की देखभाल करने" की बातें करती है। वह मूल्य और नैतिकता के बारे में सारी सही बातें करती है, लेकिन गुप्त रूप से विश्वासियों को गिरफ्तार करके सताने और अफवाहें फैलाने के लिए किसी भी हद तक जाती है, जिसकी वजह से असंख्य ईसाइयों को जेल में डाल दिया गया, वे घर भी नहीं लौट पाए और उनके परिवार बिखर गए। मैंने सीसीपी का यह चेहरा पहले कभी नहीं देखा था, मैं तो उसकी पूजा करती थी। लेकिन उसका अत्याचार सहने के बाद आखिरकार मुझे समझ आ गया कि सीसीपी मुख्य दानव है, जो लोगों को नुकसान पहूँचाती है। अपने सार में वह परमेश्वर और सत्य की दुश्मन है, और शैतानों का सबसे दुष्ट, सबसे प्रतिक्रियावादी गिरोह है।

मेरे जेल से छूटने के बाद भी पुलिस ने मेरी निगरानी करना कभी नहीं छोड़ा। हमारे स्थानीय थाने की पुलिस हमेशा मुझसे पूछती रहती कि क्या मैं अभी भी परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, और जब मैं घर में परमेश्वर के वचन पढ़ती, तो मुझे सामने का दरवाजा मजबूती से बंद रखना पड़ता। परमेश्वर के वचनों की किताब मुझे सबसे गुप्त जगह पर छिपाकर रखनी पड़ती, और किसी सभा में जाते वक्त या सुसमाचार का प्रचार करते हुए मुझे बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती। मार्च 2013 में एक दिन मेरी जिम्मेदारी वाली कलीसिया के एक अगुआ और दो उपयाजकों को गिरफ्तार कर लिया गया, और मुझे फौरन कलीसिया की कुछ चीजें छिपाने का इंतजाम करना पड़ा, और कुछ भाई-बहनों को मैंने बिलकुल सचेत रहने की सूचना दी। जब मैं यह सब इंतजाम कर रही थी, तभी मैंने एक बहन को यह कहते सुना, "जिस अगुआ को गिरफ्तार किया गया है, उसके पास भाई-बहनों की एक सूची है, जिसका मतलब है कि वह सूची अब पुलिस के पास है।" उसने कहा कि पुलिस ने अजनबियों को ढूँढ़ने के लिए सभी निगरानी-वीडियो खँगाले हैं, और वे लोग विश्वासियों की खोज में घर-घर जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने यह धमकी भी दी है : "किसी एक को जाल से निकल जाने देने से हजारों लोगों को गलत तरीके से गिरफ्तार करना बेहतर है!" यह सुनकर मुझे काफी डर और घबराहट महसूस हुई। चूँकि मुझे पहले गिरफ्तार किया जा चुका था, इसलिए उनके पास मेरी फाइल मौजूद थी। अगर पुलिस ने चेहरे की पहचान करने वाली निगरानी शुरू की, तो मुझे जरूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा। अगर मुझे फिर से गिरफ्तार किया गया, तो यकीनन मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं रह जाएगी। यह सोचकर मैंने महसूस किया कि मुझे जल्दी से जल्दी यहाँ से निकलना होगा। हालाँकि जब मैं दूसरी कलीसिया पहुँची, तब भी मेरा मन शांत नहीं हुआ और मुझ पर बेहोशी का दौरा पड़ गया। उस कलीसिया में बहुत सारा काम ऐसा था, जिसका तत्काल इंतजाम करना जरूरी था, लेकिन मैंने अपनी जिंदगी सुरक्षित करने के लिए अपना काम छोड़ दिया। अगर मैं अभी चली जाती हूँ, तो मैं परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं कर रही हूँगी! मेरी अंतरात्मा और इंसानियत कहाँ थी? क्या मैं एक डरपोक और कायर इंसान की तरह काम नहीं कर रही थी? परमेश्वर में मेरा विश्वास सच्चा नहीं था—मेरी गवाही कहाँ थी? इन बातों को सोचकर मैं प्रार्थना करने के लिए तुरंत परमेश्वर के सामने गई और उससे गुहार लगाई कि वह मुझे आस्था और हिम्मत दे और मेरी रक्षा करे, ताकि मैं उसकी गवाही दे सकूँ।

फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो हर चीज तुच्छ हो जाती है, और कोई उन्हें हरा नहीं सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में आगे कुछ करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। हालाँकि, 'देह' की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा दूषित है, लेकिन अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते, तो कोई भी उन्हें मात नहीं दे सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 36')। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके मैं समझ गई कि यह स्थिति परमेश्वर की परीक्षा थी, और कि आध्यात्मिक जगत में एक युद्ध चल रहा था। मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के साथ खड़ी होकर शैतान को शर्मिंदा करने के लिए अपना जीवन भेंट करना होगा और परमेश्वर के लिए गवाही देनी होगी; ऐसे अहम मौके पर मैं यहाँ से भागकर पीठ नहीं दिखा सकती! मुझे परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करनी होगी, एक समझदार और इंसानियत-पसंद व्यक्ति को यही करना चाहिए। मैं धार्मिकता को बचाने के लिए अत्याचार सह रही थी, अगर मैं मर भी गई तो मेरी मौत सार्थक होगी। अगर मैं नीच बनकर ज़िंदा रही और शैतान के आगे समर्पण कर दिया, तो मेरा शरीर भले ही जिंदा रहेगा, लेकिन मैं चलती-फिरती लाश बनकर रह जाऊँगी। यह सोचकर मैंने खुद को मुक्त महसूस किया, फिर मैं भागकर उस कलीसिया में पहुँची और भाई-बहनों को साथ लेकर परमेश्वर के वचनों की सभी किताबें हटाने में जुट गई और उन सभी से छिपकर रहने के लिए कहा। कलीसिया का सारा काम बहुत जल्दी निपट गया और मैंने परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद किया!

20 से भी ज्यादा सालों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हुए और लगातार सीसीपी का उत्पीड़न और दमन सहते हुए हालाँकि मैंने थोड़ी पीड़ा सही होगी, लेकिन परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से मैंने कुछ सत्यों को समझा है, और सही और गलत में, धार्मिकता और दुष्टता में भेद करना सीखा है। ऐसे असाधारण हालात के जरिये मैंने परमेश्वर पर भरोसा करना भी सीखा। परमेश्वर के वचनों में मुझे वाकई अधिकार महसूस होता है और परमेश्वर में मेरी आस्था बढ़ गई है। यह सब परमेश्वर का अनुग्रह है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

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