मेरे बच्चे से मेरी माँगें और उम्मीदें स्वार्थी निकलीं

21 फ़रवरी, 2026

झांग हुईशिन, चीन

जब मैं छोटी थी, तो मेरे दादाजी को ओपेरा सुनना बहुत पसंद था और वे अक्सर मुझे ओपेरा दिखाने ले जाते थे। मैंने देखा कि मंच पर कलाकार कितने मनमोहक लगते थे, उनके गीत कैसे दिल को छू जाते थे और दर्शक उन पर तालियों और जयकारों की बौछार करते थे। मैं मन ही मन उनकी बहुत प्रशंसा करती थी और यह सोचे बिना न रह पाती थी, “एक दिन, अगर मैं भी मंच पर आ सकूँ और तालियाँ और प्रशंसा पा सकूँ, तो मैं प्रसिद्धि और वैभव का जीवन जियूँगी!” मैं सच में एक नाटक मंडली में शामिल होना चाहती थी और एक ओपेरा कलाकार बनना चाहती थी। लेकिन मेरा परिवार गरीब था और हमारी आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती थी, इसलिए मंच पर जाने का मेरा सपना एक मृगतृष्णा बनकर रह गया।

मेरी शादी के बाद, मेरी एक बेटी हुई। जब मेरी बेटी ने किंडरगार्टन जाना शुरू किया, तो मैंने अपनी बेटी की उम्र के बच्चों को देखा, कुछ डांस क्लास में जा रहे थे और कुछ संगीत की क्लास में। खासकर बाल दिवस के कार्यक्रमों के दौरान, वे कई शिक्षकों और माता-पिता का ध्यान खींचते थे और उन पर तालियों की बौछार होती थी। मैंने अपनी बेटी को नृत्य सिखाने का फैसला किया, क्योंकि इससे न केवल उसका शरीर सुडौल बनेगा और उसका व्यक्तित्व निखरेगा, बल्कि उसे मंच पर प्रदर्शन करने का मौका भी मिलेगा। लेकिन वह पैर फैलाने और कमर मोड़ने जैसी कसरतों से डरती थी और मेरे कुछ भी कहने पर उसने सीखने से इनकार कर दिया। मैंने सोचा, “मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार नहीं चलूँगी। तुम्हें कोई हुनर सीखना होगा ताकि भविष्य में तुम मंच पर लोगों का ध्यान खींच सको।” 2012 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया और यह समझ गई कि हर किसी का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और लोगों के जीवन भर के सभी काम परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और व्यवस्थित हैं। हालाँकि, मैंने अपनी बेटी को मंच पर प्रदर्शन करते देखने की अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी। बाद में, मैंने सोचा कि कोई वाद्य यंत्र सीखने से भी वह मंच पर जा सकेगी, इसलिए मैं उसे एक वाद्य यंत्र चुनने के लिए संगीत की दुकान पर ले गई। लेकिन उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैंने गुस्से में अपनी बेटी से कहा, “तुम्हें एक तो चुनना ही पड़ेगा। कोई हुनर सीखकर ही तुम्हें मंच पर प्रदर्शन करने का मौका मिल सकता है और तभी तुम एक शानदार जीवन जी सकती हो। सोचो तब कितने लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे!” यह देखकर कि मैं बहुत गुस्से में हूँ, मेरी बेटी ने बेमन से गुजेंग को चुना। शुरुआत में, मेरी बेटी उसे सीखना नहीं चाहती थी, इसलिए मैंने एक अनुभवी गुजेंग शिक्षिका को ढूँढी और उसे सीखने के लिए मजबूर किया। गुजेंग में उसकी रुचि जगाने के लिए, मैं अक्सर उसे प्रोत्साहित करती थी और शिक्षिका ने भी उसकी स्वाभाविक प्रतिभा के लिए उसकी प्रशंसा की। धीरे-धीरे, मेरी बेटी को गुजेंग में दिलचस्पी होने लगी और उसने जल्दी ही कुछ धुनें सीख लीं। एक दिन, मेरी बेटी ने खुशी से मुझसे कहा, “माँ, भविष्य में, मैं परमेश्वर की स्तुति करने के लिए गुजेंग बजा सकती हूँ!” यह देखकर कि मेरी बेटी कितनी समझदार है, मुझे बहुत संतोष हुआ।

बाद में, अपनी बेटी को और अधिक मंच अनुभव दिलाने में मदद करने के लिए, जब भी मैं किसी प्रदर्शन के बारे में सुनती, तुरंत उसका नाम लिखवा देती। भले ही मुझे स्लिप्ड डिस्क की समस्या थी और मैं ज्यादा देर तक खड़ी नहीं हो सकती थी, फिर भी मैं अभ्यास के दौरान उसके साथ रहने पर जोर देती थी। उसने बहुत तेजी से सीखा और प्रदर्शन में बहुत उत्कृष्ट थी और वह हमेशा मंच के केंद्र में रहती थी। उसे शिक्षकों और जजों से भी प्रशंसा मिली और मैं बेहद खुश थी। उसके प्रदर्शनों में उसके साथ जाने के लिए, मुझे तैयारी करने के लिए सुबह लगभग 3 बजे उठना पड़ता था। उसके आस-पास दौड़ने में मैं इतनी व्यस्त रहती थी कि मेरे पास खाने का भी समय नहीं होता था। और दिन भर की भाग-दौड़ के बाद, मुझे चक्कर आते और मैं मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाती थी। लेकिन जब मैंने अपनी बेटी को मंच पर चमकते देखा, तो मैंने मन में सोचा, “भले ही मैंने मंच पर जाने का अपना सपना पूरा नहीं किया, लेकिन मैं अपनी बेटी को मंच के केंद्र में ला पाई, यह बात ही इस सारे दर्द और थकावट को सार्थक बना देती है!” प्रदर्शनों से होने वाली थकावट और पढ़ाई के दबाव के कारण, मेरी बेटी का शरीर यह सब झेल नहीं पा रहा था और वह अब गुजेंग का अभ्यास नहीं करना चाहती थी। मैंने उसे जारी रखने के लिए मनाने और फुसलाने की कोशिश की और आखिरकार, वह बेमन से मान गई। हर दिन जब वह स्कूल से घर आती, तो मैं इस बात पर जोर देती कि मेरी बेटी बिना समय गँवाए गुजेंग का अभ्यास करे। जब मेरी बेटी सप्ताहांत में बाहर जाना चाहती, तो मैं उससे बाहर जाने से पहले गुजेंग का अभ्यास खत्म करने की माँग करती। अगर वह नहीं सुनती, तो मैं उसे डाँटती, “तुम्हें क्या लगता है तुम्हारी क्लास और अभ्यास के लिए तुम्हारे पिता और मैंने मेहनत करके पैसे क्यों बचाए? क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम भविष्य में मंच पर जा सको और सफल हो सको? क्या तुम हमें थोड़ा सम्मान नहीं दिला सकती?” मुझे इतना चिंतित और गुस्से में देखकर, मेरी बेटी के पास रोते-रोते गुजेंग का अभ्यास करने जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। मिडिल स्कूल तक, उस पर पढ़ाई का भारी दबाव था और उसे विभिन्न प्रदर्शनों के लिए अक्सर अभ्यास भी करना पड़ता था, इसलिए वह फिर से गुजेंग का अभ्यास नहीं करना चाहती थी। मैंने अपनी बेटी को डाँटा, “चाहे तुम कितनी भी व्यस्त क्यों न हो, तुम्हें गुजेंग का अभ्यास करते रहना होगा। अगर तुम अच्छे से अभ्यास करोगी, तो तुम मंच पर जा सकती हो और जीवन भर की प्रसिद्धि पा सकती हो!” लेकिन उसने फिर भी अभ्यास नहीं किया। मैंने गुस्से में उसकी किताबें और होल्डर जमीन पर फेंक दिए और कहा, “ठीक है। मत करो अभ्यास। बड़े होकर कचरा बीनना।” यह देखकर कि मैं सच में गुस्से में हूँ, मेरी बेटी जल्दी से अभ्यास करने चली गई। कभी-कभी, मेरी बेटी अपनी बेबसी पर रोते हुए कहती, “तुम हमेशा मेरी किस्मत पर काबू पाने की कोशिश क्यों करती हो?” मैं गुस्से में उससे कहती, “क्या मैं सब कुछ तुम्हारे लिए ही नहीं करती? तुम अपने भले की बात क्यों नहीं समझती?” मेरी बेटी गुस्से में कहती, “मुझे गुजेंग बजाना पसंद ही नहीं है! तुमने ही मुझे इसे सीखने के लिए मजबूर किया है!” हमारी बहस का अंत हमेशा कड़वाहट से होता था। जब प्रदर्शनों और सभाओं का समय आपस में टकराता, तो मैं अपनी बेटी को पहले प्रदर्शन में जाने के लिए कहती। अगर मेरी बेटी सभा में जाना चाहती, तो मैं तुरंत कहती, “सभाओं के लिए बहुत समय है, लेकिन प्रदर्शन के मौके नहीं छोड़ने चाहिए। अगर तुम ये मौके गँवा दोगी, तो तुम मंच पर चमकने का अवसर खो दोगी।” इस वजह से, मेरी बेटी ने कई सभाएँ छोड़ दीं।

बाद में, मेरी बेटी सफलतापूर्वक एक कला हाई स्कूल में प्रवेश पाने में कामयाब रही। जब भी मैं अपनी बेटी के बारे में बात करती, तो सहकर्मी और दोस्त मुझे ईर्ष्या और प्रशंसा की नजरों से देखते। मेरे मिथ्याभिमान को बहुत संतुष्टि मिली। धीरे-धीरे, मेरी बेटी अपना पूरा ध्यान पढ़ाई और गुजेंग बजाने पर लगाने लगी। अपनी पसंदीदा संगीत अकादमी में प्रवेश पाने और अपने साथियों से आगे निकलने के लिए, उसने गुजेंग का अभ्यास करने में अतिरिक्त घंटे लगाने शुरू कर दिए। मैंने भी अपनी बेटी को व्यक्तिगत रूप से सिखाने के लिए एक शिक्षक को रखने में बहुत सारा पैसा खर्च किया। यह देखकर कि गुजेंग में मेरी बेटी का कौशल पहले से बेहतर हो गया है, मुझे बहुत खुशी हुई। जब मेरी बेटी छुट्टी पर लौटी, तो मैं चाहती थी कि वह सभा में शामिल हो, लेकिन वह “मैंने अपना होमवर्क खत्म नहीं किया है” या “मैंने अभी तक गुजेंग का अभ्यास नहीं किया है” जैसे बहाने बनाती। यह देखकर कि मेरी बेटी लगभग एक साल से किसी सभा में शामिल नहीं हुई थी, मैं थोड़ी चिंतित हो गई। लेकिन उसे होमवर्क और गुजेंग के अभ्यास में बहुत व्यस्त देखकर, मैंने मन में सोचा, “क्या मुझे अपनी बेटी को सप्ताहांत में गुजेंग की क्लास छोड़कर सभाओं में जाने देना चाहिए?” लेकिन फिर मैंने सोचा, “उसने अपने कौशल को सुधारने के लिए इतनी मेहनत की है; अगर वह सप्ताहांत में अभ्यास नहीं करेगी, तो क्या वह दूसरों से पीछे नहीं रह जाएगी? वह अपने अभ्यास में ढील नहीं दे सकती। लेकिन अगर वह लंबे समय तक सभाओं में शामिल नहीं होती है, तो उसके आत्मिक जीवन को भी नुकसान पहुँचेगा।” कुछ देर सोचने के बाद, मैंने उसके साथ सभा करने के लिए समय निकालने का फैसला किया। एक दिन, मेरी बेटी ने मुझसे कहा कि वह अब स्कूल नहीं जाना चाहती। उसने कहा कि स्कूल का माहौल खराब है और वहाँ लोग धूम्रपान करते हैं, प्रेम-संबंध बनाते हैं और गुंडागर्दी में शामिल हैं। उसने कहा कि पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल है और उसका मन बहुत दबा-दबा सा रहता था। जब मैंने अपनी बेटी को यह कहते सुना कि वह स्कूल नहीं जाना चाहती, तो मैंने सोचा, “तुमने एक कला स्कूल में प्रवेश पाने के लिए इतनी मेहनत की है और अगर तुम सिर्फ दो साल और मेहनत करोगी, तो तुम एक कला अकादमी की प्रवेश परीक्षा दे सकोगी। एक बार जब तुम प्रवेश पा लोगी, तो मंच पर जाने का तुम्हारा बड़ा सपना सच हो जाएगा और तब तुम्हारे रिश्तेदार, दोस्त, शिक्षक और सहपाठी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे और तुमसे ईर्ष्या करेंगे और तुम मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर सकोगी।” इसलिए मैंने गुस्से में कहा, “तुमने आखिरकार एक कला हाई स्कूल में प्रवेश पा लिया है। अगर तुम नहीं जाओगी, तो क्या तुम्हारा इतना सुनहरा भविष्य बर्बाद नहीं हो जाएगा?” मुझे इतना चिंतित और गुस्से में देखकर, मेरी बेटी बस रोई और स्कूल चली गई। अपनी बेटी को इतना लाचार और दुखी देखकर मेरा दिल दर्द से भर गया, लेकिन अपनी बेटी को मंच पर पहुँचाने और उसे सबसे अलग दिखाने के लिए, मुझे लगा कि मेरे पास ऐसा करने के अलावा कोई चारा नहीं है।

एक सभा के दौरान, मैंने बहन ली लिंग को अपनी स्थिति के बारे में बताया और उसने मुझे पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन का एक अंश ढूँढ़कर दिया। परमेश्वर कहता है : “अगर उनके बच्चों का अपने बचपन में बुरी प्रवृत्तियों या कुछ कुतर्कों, कुविचारों और नजरियों के कारण होने वाली चीजों से सामना हो जाए, तो जिन चीजों की उन्हें समझ-बूझ नहीं है, वहाँ वे उनका अनुकरण या नकल कर सकते हैं। माता-पिता को चाहिए कि इन मसलों का जल्द पता लगाएँ और तुरंत सुधार और सही मार्गदर्शन करें। यह भी उनकी जिम्मेदारी है। संक्षेप में कहें, तो लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि उनके बच्चों को अपने विचारों, स्व-आचरण, दूसरों से बर्ताव, और विविध लोगों, घटनाओं और चीजों के बोध के लिए बुनियादी, सकारात्मक और सही दिशा मिले, ताकि वे कपटी दिशा के बजाय रचनात्मक दिशा में विकसित हो सकें। मिसाल के तौर पर, गैर-विश्वासी अक्सर कहते हैं, ‘जीवन और मृत्यु पूर्व-नियत हैं; संपत्ति और सम्मान का फैसला स्वर्ग करता है।’ किसी व्यक्ति को जीवन में जितनी मात्रा में कष्ट और आनंद का अनुभव होना चाहिए वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है, और यह मात्रा इंसानों द्वारा बदली नहीं जा सकती। एक ओर, माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को इन वस्तुपरक तथ्यों की जानकारी दें, और दूसरी ओर उन्हें सिखाएँ कि जीवन सिर्फ शारीरिक जरूरतों के बारे में नहीं है, और यह निश्चित रूप से सुख के बारे में नहीं है। लोगों के करने के लिए खाने, पीने और मनोरंजन तलाशने से ज्यादा जरूरी कुछ चीजें हैं; उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखना चाहिए, सत्य का अनुसरण करना चाहिए और परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। अगर लोग सिर्फ सुख, खाने, पीने और देह की मौज-मस्ती खोजने के लिए जिएँ, तो फिर वे चलती-फिरती लाश की तरह हैं, उनके जीवन का कोई मूल्य नहीं है। वे कोई सकारात्मक या सार्थक मूल्य नहीं रचते, और वे जीने या इंसान होने के लायक भी नहीं हैं। भले ही कोई बच्चा परमेश्वर में विश्वास न रखे, फिर भी उसे कम-से-कम एक अच्छा व्यक्ति बनने दो, कोई ऐसा जो अपना उचित कर्तव्य निभाए। बेशक, अगर वह परमेश्वर द्वारा चुना गया है, और बड़ा हो कर कलीसियाई जीवन में भाग लेना चाहता है, अपना कर्तव्य निभाना चाहता है, तो यह और भी अच्छी बात है। अगर उनके बच्चे इस तरह के हैं, तो माता-पिता को अपने कम-उम्र बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ और ज्यादा उन सिद्धांतों के आधार पर पूरी करनी चाहिए जिनके द्वारा परमेश्वर ने लोगों को आगाह किया है। अगर तुम नहीं जानते कि क्या तुम्हारे बच्चे परमेश्वर में विश्वास रखेंगे और वे परमेश्वर द्वारा चुने जाएँगे या नहीं, कम-से-कम तुम्हें अपने बच्चों के प्रारंभिक वर्षों में उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। भले ही तुम ये चीजें न जानो या इन्हें समझने में असमर्थ हो, फिर भी तुम्हें ये जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। तुम्हें जो दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करनी हैं, उन्हें तुम्हें जहाँ तक संभव हो वहाँ तक कार्यान्वित करना चाहिए, जो सकारात्मक विचार और चीजें तुम पहले से ही जानते हो उन्हें अपने बच्चों के साथ साझा करना चाहिए। कम-से-कम इतना तो सुनिश्चित करो ही कि उनका आध्यात्मिक विकास एक रचनात्मक दिशा में हो, और उनका मन स्वच्छ और स्वस्थ हो। तुम अपनी अपेक्षाओं, प्रशिक्षण या दमन के तहत उन्हें छोटी उम्र से ही हर प्रकार के कौशल और ज्ञान का अध्ययन करने पर मजबूर मत करो। और भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि कुछ माता-पिता उनके बच्चों के विविध प्रतिभा कार्यक्रमों, शैक्षणिक और एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में भाग लेते समय उनके साथ जाते हैं, तरह-तरह की सामाजिक प्रवृत्तियों के पीछे भागते हैं, संवाददाता सम्मेलनों, अनुबंधों, और अध्ययन सत्रों में जाते हैं, और हर तरह के प्रतियोगिता और स्वीकरण भाषणों, वगैरह में पहुँच जाते हैं। कम-से-कम माता-पिता के तौर पर ये चीजें खुद करके उन्हें अपने बच्चों को अपने पदचिह्नों पर नहीं चलने देना चाहिए। अगर माता-पिता अपने बच्चों को ऐसी गतिविधियों में साथ लाते हैं, तो एक ओर यह स्पष्ट है कि उन्होंने माता-पिता के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं की हैं। दूसरी ओर, वे अपने बच्चों को खुले तौर पर एक ऐसे रास्ते पर ले जा रहे हैं जहाँ से वे लौट नहीं सकते, वे उनके रचनात्मक मानसिक विकास में रुकावट पैदा कर रहे हैं। ऐसे माता-पिता अपने बच्चों को किधर ले जा रहे हैं? वे उन्हें बुरी प्रवृत्तियों की ओर ले जा रहे हैं यह ऐसी चीज है जो माता-पिता को नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा, अपने बच्चों के भविष्य के पथ और जिस करियर को वे अपनाएँगे, उसे लेकर माता-पिता को उनके मन में ऐसी चीजें नहीं बिठानी चाहिए जैसे, ‘उसे देखो, वह एक पियानोवादक है, उसने चार-पाँच वर्ष की उम्र में पियानो बजाना शुरू कर दिया। वह खेल-कूद में नहीं लगा, उसके कोई दोस्त या खिलौने नहीं थे, वह हर दिन पियानो का अभ्यास करता था। उसके माता-पिता पियानो कक्षाओं में उसके साथ जाते थे, विविध शिक्षकों से परामर्श करते थे, और उन्हें पियानो प्रतियोगिताओं में डालते थे। देखो अब वह कितना प्रसिद्ध है, अच्छा खाता-पीता है, सजता-सँवरता है, जहाँ भी जाता है प्रभामंडल और सम्मान से घिरा रहता है।’ क्या ऐसी शिक्षा से बच्चे के मानस का स्वस्थ विकास होता है? (नहीं, नहीं होता।) तो फिर यह कैसी शिक्षा है? यह दानव की शिक्षा है। इस प्रकार की शिक्षा किसी भी किशोर मन के लिए हानिकारक है। यह उनमें शोहरत की आकांक्षा, तरह-तरह के प्रभामंडल, सम्मान, पद और आनंद-उल्लास की लालसा को बढ़ावा देती है। इसके कारण वे छोटी उम्र से ही इन चीजों की लालसा रखते और उनके पीछे भागते हैं, यह उन्हें व्याकुलता, तीव्र आशंका और चिंता में झोंक देती है, और इसे पाने के लिए हर तरह की कीमत चुकाने का कारण बनती है, अपना होमवर्क करने और विभिन्न कौशल सीखने के लिए सुबह जल्दी उठने और देर रात तक काम करने को मजबूर करती है, जिससे वे बचपन के वर्ष गँवा देते हैं, और इन चीजों के लिए उन बेशकीमती वर्षों का सौदा कर देते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद, मैं आखिरकार समझ गई कि माता-पिता की सच्ची जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि उनके बच्चे बचपन में शरीर और मन दोनों से स्वस्थ और खुश रहें, उनके विचारों में सकारात्मक मार्गदर्शन देना और उन्हें अपने बचपन का आनंद लेने देना है। यह माता-पिता द्वारा अपनी उम्मीदों को अपने बच्चों पर थोपना नहीं है, न ही उन्हें प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, सम्मान, रुतबे और सुख-सुविधाओं के पीछे भागने की राह दिखाना है। मैं सोचने पर मजबूर हो गई: मेरी बेटी को बचपन से ही वाद्य यंत्र सीखना पसंद नहीं था, लेकिन उसे प्रसिद्ध और सर्वत्र सम्मानित बनाने के लिए, मैंने उसे गुजेंग सीखने के लिए मजबूर किया और जब उसे जजों और शिक्षकों से प्रशंसा मिली, तो मुझे लगा कि जो सपने मैं हासिल नहीं कर पाई थी, वे आखिरकार मेरी बेटी के माध्यम से साकार हो रहे हैं और इसलिए उसे काबिल बनाने का मेरा संकल्प और भी मजबूत हो गया। जब भी मैं किसी प्रदर्शन के बारे में सुनती, तो मैं उसकी सहमति के बिना उसका नाम लिखवा देती, इस डर से कि वह मंच पर चमकने का मौका गँवा देगी। जब भी मेरी बेटी खेलना चाहती, तो मैं उसे इस डर से डाँटती कि वह अपने अभ्यास में देरी कर देगी। अपनी बेटी के संगीत कौशल को बेहतर बनाने के लिए, मैंने उसे मार्गदर्शन देने के लिए एक पेशेवर शिक्षक को नियुक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, यह सब उसे प्रसिद्ध बनाने और मेरे लिए गौरव लाने के लिए था। मैंने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि मेरी बेटी का छोटा सा दिल कितना दबाव और दर्द झेल रहा था और मैंने हमेशा केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने के बारे में सोचा। मेरी शिक्षा के तहत, मेरी बेटी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को लेकर बहुत चिंतित हो गई और उसने अपने सहपाठियों से आगे निकलने के लिए देर-देर तक अभ्यास किया, जिससे उसने अपनी शुरुआती जीवंतता और मासूमियत खो दी। हमारे बीच एक दूरी बनने लगी और मेरी बेटी का मन भी परमेश्वर का वचन खाने और पीने और सभाओं में शामिल होने में नहीं लगता था और वह परमेश्वर से और भी दूर होती चली गई। इन नतीजों की वजह मैं थी। मेरी बच्ची पहले खुशी-खुशी सभाओं में जाती थी और परमेश्वर का वचन खाती-पीती थी, लेकिन मैंने उसे परमेश्वर में विश्वास करने और सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन नहीं दिया और इसके बजाय, मैंने उसे बुरी प्रवृत्तियों में फँसा दिया और प्रतिष्ठा और रुतबे का लगातार पीछा करने के लिए प्रेरित किया। मैं एक माँ की सच्ची जिम्मेदारी किस तरह से निभा रही थी? यह सोचकर, मुझे बहुत पछतावा हुआ कि शिक्षा के मेरे इस जबरदस्ती वाले तरीके ने मेरे बच्चे को इतनी गहरी चोट और पीड़ा पहुँचाई।

बाद में, मैंने परमेश्वर का वचन पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग अपने बच्चों के लिए जीते हैं; तुम कह सकते हो कि तुम ऐसा नहीं करना चाहते, लेकिन क्या तुम वाकई ऐसा कर सकते हो? कुछ लोग धन-दौलत, शोहरत और लाभ के लिए इधर-उधर भागते और व्यस्त रहते हैं। तुम कह सकते हो कि तुम इन चीजों के लिए इधर-उधर भागना नहीं चाहते, लेकिन क्या तुम वास्तव में ऐसा कर सकते हो? अनजाने में, तुम पहले ही इस राह पर चल चुके हो, और भले ही तुम जीवन जीने का एक अलग तरीका अपनाना चाहते हो, लेकिन तुम ऐसा नहीं कर सकते। तुम इस दुनिया में कैसे रहते हो यह तुम्हारे नियंत्रण से बाहर की बात है! इसका मूल क्या है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सच्चे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं और उन्होंने सत्य को पाया ही नहीं है। लोगों की आत्माओं को किसका सहारा रहता है? आध्यात्मिक सहारे के लिए वे किसकी ओर देखते हैं? आध्यात्मिक सहारे के लिए, लोग अपने परिवार के साथ रहने; विवाह संबंध का आनंद लेने; सांसारिक वस्तुओं के उपभोग; धन-संपत्ति, प्रसिद्धि, और लाभ; अपने रुतबे, अपनी भावनाओं, और अपने करियर; और अगली पीढ़ी की खुशियों की ओर देखते हैं। क्या कोई ऐसा है जो आध्यात्मिक सहारे के लिए इन चीजों की ओर नहीं देखता है? जिनकी संतानें हैं वे इसे अपनी संतानों में देखते हैं; जिनकी संतानें नहीं हैं वे इसे अपने करियर में, विवाह संबंध में, अपने सामाजिक रुतबे में, और प्रसिद्धि और लाभ में देखते हैं। इसलिए, इस प्रकार उत्पन्न हुई जीवन जीने की सभी रीतियाँ एक समान ही हैं; जो शैतान के नियंत्रण और उसके अधिकार-क्षेत्र के आधीन हैं। स्वयं के बावजूद, सब इधर-उधर भागते हैं और प्रसिद्धि, लाभ, अपनी संभावनाओं, अपने करियर, विवाह संबंधों, अपने परिवारों या अगली पीढ़ी की खातिर जीने या दैहिक सुखों के उपभोग में ही स्वयं को व्यस्त रखते हैं। क्या यही सच्चा मार्ग है? इस संसार में लोग चाहे कितनी भी व्यस्तता से भाग-दौड़ करें, वे चाहे पेशेवर तौर पर कितने भी संपन्न हो जाएँ, चाहे उनके परिवार कितने भी खुशहाल रहें, चाहे उनका परिवार कितना भी बड़ा हो, चाहे उनका रुतबा कितना भी प्रतिष्ठित हो—क्या वे मानव जीवन के सच्चे मार्ग पर चलने में समर्थ हैं? प्रसिद्धि और लाभ, संसार या अपने करियर के पीछे भागते हुए, क्या वे इस सत्य को देख पाने में समर्थ हैं कि परमेश्वर ने ही समस्त चीजों की रचना की है और वही मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता रखता है? यह संभव नहीं है। चाहे लोग किसी भी चीज का अनुसरण करें या किसी भी तरह के मार्ग पर चलें, यदि लोग इस सत्य को स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर ही मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता रखता है, तो चाहे वे किसी भी मार्ग विशेष का अनुसरण कर रहे हों, उनका चुना गया मार्ग गलत है। यह उचित मार्ग नहीं है, बल्कि विकृत मार्ग है, यह बुराई का मार्ग है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस होता है। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन के प्रकाशन के माध्यम से, मैंने महसूस किया कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने और नुकसान पहुँचाने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करता है, लोगों में “भीड़ से ऊपर उठो,” “दूसरों से ऊँचा स्थान रखो,” और “अपने पूर्वजों का नाम करो” जैसे विचारों और दृष्टिकोणों को भरता है, जिससे लोग लगातार प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागते हैं। प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने के लिए, वे और भी दुष्ट हो जाते हैं और और भी अधिक पीड़ित होते हैं। जब से मैं छोटी थी, मैंने हमेशा एक मंच अभिनेत्री बनने, मंच पर आकर सभी की प्रशंसा और ईर्ष्या पाने और रुतबा और प्रसिद्धि पाने का सपना देखा था। लेकिन जब मेरे सपने साकार नहीं हो सके, तो मैं निराशा और दर्द में डूब गई। बाद में, मैंने अपने सपनों को अपनी बेटी पर थोप दिया, उसे गुजेंग सीखने के लिए मजबूर किया। मुझे उम्मीद थी कि वह एक दिन मंच पर आएगी और चमकेगी। जब मैंने देखा कि मेरी बेटी गुजेंग नहीं सीखना चाहती, तो मैं चिंतित और क्रोधित हो गई और उस पर भड़क उठी। जब मेरी बेटी सभाओं में शामिल होना चाहती, तो मैं उसे रोक देती, क्योंकि मुझे डर था कि इससे उसके अभ्यास में देरी होगी। मैं एक माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ किस तरह से निभा रही थी? मैं तो बस बुरे काम ही कर रही थी! मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास करती थी, फिर भी मेरे अनुसरण के पीछे के दृष्टिकोण बिल्कुल नहीं बदले थे और मैं अभी भी शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार जी रही थी, अविश्वासियों की तरह ही प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भाग रही थी। अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करने के लिए मैं अपनी बेटी को परमेश्वर से दूर भटकने और उसे धोखा देने तक को तैयार थी। मैं सचमुच प्रसिद्धि और लाभ से अंधी हो गई थी और मेरे विचार उनसे धुँधले हो गए थे और मैंने खुद को भी दुख दिया और अपनी बेटी को भी नुकसान पहुँचाया। मैंने महसूस किया कि प्रसिद्धि और लाभ शैतान द्वारा मुझ पर डाली गई अदृश्य बेड़ियाँ थीं और वे हमारे लिए अंतहीन दुःख और दर्द लेकर आईं! मैंने सोचा कि कैसे कुछ मशहूर हस्तियों ने मनोरंजन उद्योग में प्रसिद्धि और लाभ हासिल किया और फिर भी आध्यात्मिक खालीपन और दर्द के कारण अवसाद में पड़ गए और कूदकर अपनी जान दे दी। मैंने देखा कि जब कोई व्यक्ति रुतबा और प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है, तो यह केवल अस्थायी रूप से उसके मिथ्याभिमान को संतुष्ट कर सकता है, लेकिन उसके आंतरिक खालीपन और दर्द को हल नहीं कर सकता। इसके बजाय, ये चीजें धीरे-धीरे उन्हें परमेश्वर से दूर ले जाती हैं और उन्हें उसका इनकार करने पर मजबूर करती हैं और इसका परिणाम यह होता है कि वे शैतान द्वारा निगल लिए जाएँगे! इसका एहसास होने पर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, यह कहते हुए कि मैं अब प्रसिद्धि और लाभ का पीछा नहीं करूँगी और मैं उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन रहने को तैयार हूँ।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “माँ-बाप अपने बच्चों के बालिग होने से पहले उनसे की गई अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए जो कुछ भी करते हैं वह अंतरात्मा, विवेक, और प्राकृतिक नियमों के विपरीत होता है। इतना ही नहीं, यह परमेश्वर के विधान और संप्रभुता के भी विपरीत होता है। भले ही बच्चों में सही-गलत के बीच भेद पहचानने या स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता नहीं होती है, फिर भी उनका भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होता है, वे उनके माँ-बाप के अधीन नहीं होते। इसलिए, अपनी चेतना में अपने बच्चों से अपेक्षाएँ रखने के अलावा, मूर्ख माँ-बाप अपने व्यवहार के संदर्भ में ज्यादा काम भी करते हैं, त्याग करते हैं और ज्यादा कीमतें चुकाते हैं, वे अपने बच्चों के लिए वह सब कुछ करते हैं जो वे चाहते हैं और जो वे करने को तैयार हैं, भले ही यह पैसा, समय, ऊर्जा, या अन्य चीजें खर्च करना ही क्यों न हो। हालाँकि माँ-बाप ये सभी काम अपनी इच्छा से करते हैं, पर ये चीजें अमानवीय हैं, और ये ऐसी जिम्मेदारियाँ नहीं हैं जो माँ-बाप को पूरी करनी चाहिए; वे पहले ही अपनी क्षमताओं और अपनी उचित जिम्मेदारियों के दायरे को पार कर चुके हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि माँ-बाप अपने बच्चों के बालिग होने से पहले ही उनके भविष्य की योजना बनाने और उन्हें काबू करने की कोशिश शुरू कर देते हैं, और अपने बच्चों का भविष्य तय करने का भी प्रयास करते हैं। क्या यह मूर्खता नहीं है? (बिल्कुल है।) उदाहरण के लिए, मान लो कि परमेश्वर ने तय किया है कि कोई आदमी एक साधारण श्रमिक होगा, और इस जीवन में, वह बस अपना पेट भरने और तन ढंकने के लिए थोड़ी-बहुत मजदूरी कमा पाएगा, पर उसके माँ-बाप उस पर एक बड़ी हस्ती, धनी व्यक्ति, और उच्च अधिकारी बनने का दबाव डालते हैं, उसके बालिग होने से पहले उसके भविष्य के लिए योजना बनाने और चीजें व्यवस्थित करने लगते हैं, कई तरह की तथाकथित कीमतें चुकाते हैं, उसके जीवन और भविष्य को काबू करने की कोशिश करते हैं। क्या यह बेवकूफी नहीं है? (बिल्कुल है।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। मैंने परमेश्वर के वचन के इस अंश को बार-बार पढ़ा और मेरे दिल में गहरी चुभन हुई और मैं बहुत बेचैन हो गई। मैंने महसूस किया कि मेरी बेटी के लिए मेरी उम्मीदें, प्रयास और बलिदान मानवता के खिलाफ थे और परमेश्वर के विधानों और संप्रभुता के विरुद्ध थे। एक बच्चे का भाग्य ऐसा कुछ नहीं है जिस पर उसके माता-पिता संप्रभुता रख सकें और मुझे अपने बच्चे की पसंद का सम्मान करना था, परमेश्वर के विधानों के अधीन रहना था और अपनी बेटी को ऐसे काम करने के लिए मजबूर नहीं करना था जो उसे पसंद नहीं थे। एक व्यक्ति जीवन में क्या करता है और वह अपनी आजीविका कैसे चलाता है, यह परमेश्वर ने पहले ही तय कर दिया है। ठीक वैसे ही जैसे मैं वास्तव में एक ओपेरा कलाकार बनना चाहती थी, लेकिन यह मेरी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ। मैं अपना भाग्य भी नहीं बदल सकी, फिर भी मैं अपनी बेटी का भाग्य बदलना चाहती थी। मैं पूरी तरह से मूर्ख थी!

फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “माँ-बाप की अपने बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाओं के सार का गहन-विश्लेषण करके हम देख सकते हैं कि ये अपेक्षाएँ स्वार्थपूर्ण हैं, ये मानवता के विरुद्ध हैं और इनका माँ-बाप की जिम्मेदारियों से कोई लेना-देना नहीं है। जब माँ-बाप अपने बच्चों पर तमाम तरह की अपेक्षाएँ और माँगें थोपते हैं तो वे उन पर बहुत ही ज्यादा अतिरिक्त दबाव डाल देते हैं—यह उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं है। तो वे कौन-सी जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को निभानी चाहिए? उन्हें कम से कम अपने बच्चों को ऐसे ईमानदार लोग होना सिखाना चाहिए जो सत्य बोलते हों और ईमानदार ढंग से चीजें करते हों और उन्हें दयालु होना और खराब चीजें न करना सिखाना चाहिए, उन्हें एक सकारात्मक दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए। ये उनकी सबसे बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं। इसके अलावा उन्हें अपने बच्चों की काबिलियत और परिस्थितियों के अनुसार उनका मार्गदर्शन व्यावहारिक ज्ञान, कौशल आदि के अध्ययन में करना चाहिए। अगर माता-पिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य को समझते हैं तो उन्हें अपने बच्चों से परमेश्वर के वचन पढ़वाने चाहिए और सत्य स्वीकार कराना चाहिए ताकि वे सृष्टिकर्ता को जान सकें और यह समझ सकें कि लोग परमेश्वर द्वारा रचे गए हैं और परमेश्वर इस ब्रह्मांड में विद्यमान है; उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचन खाने-पीने में अपने बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि वे कुछ सत्यों को समझ सकें, ताकि जब वे बड़े हों तो वे परमेश्वर में विश्वास कर लें, परमेश्वर का अनुसरण करें और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा सकें, न कि सांसारिक प्रवृत्तियों का पीछा करें, विभिन्न जटिल अंतरवैयक्तिक संबंधों में फँस जाएँ और इस संसार की विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों से बहकाए, भ्रष्ट या नष्ट किए जाएँ। वास्तव में यही वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को पूरी करनी चाहिए। माता-पिता के रूप में उन्हें ये जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए कि वे अपने बच्चों के बालिग होने से पहले उन्हें सकारात्मक मार्गदर्शन और उपयुक्त सहायता प्रदान करें, साथ ही उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के संबंध में उनकी शारीरिक देखभाल भी समय पर करें। अगर बच्चे बीमार हो जाते हैं तो उनके माता-पिता को जरूरत के अनुसार उनका इलाज करवाना चाहिए; यह सोचकर कि बच्चों के स्कूली कार्य में देरी होगी, उन्हें बच्चों को स्कूल नहीं भेजते रहने चाहिए और इलाज टालते नहीं रहना चाहिए। जब बच्चों को स्वास्थ्य लाभ करने की जरूरत हो तो उन्हें स्वास्थ्य लाभ करने देना चाहिए और जब उन्हें आराम की जरूरत हो तो उन्हें आराम करने देना चाहिए। अपने बच्चों का स्वास्थ्य सुनिश्चित करना अनिवार्य है; यदि बच्चे स्कूली कार्य में पीछे रह जाते हैं तो माता-पिता इसकी भरपाई का उपाय बाद में कर सकते हैं। ये वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को अच्छे से निभानी चाहिए। एक ओर उन्हें ठोस ज्ञान प्राप्त करने में अपने बच्चों की जरूर मदद करनी चाहिए; दूसरी ओर उन्हें अपने बच्चों का मार्गदर्शन और उन्हें शिक्षित जरूर करना चाहिए ताकि वे सही मार्ग पर चलें और उन्हें उनका मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे समाज की अस्वस्थ प्रवृत्तियों और बुरी प्रथाओं से प्रभावित न हों। साथ ही उन्हें यह भी जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे उचित रूप से व्यायाम करें ताकि उनका शारीरिक स्वास्थ्य बना रहे। यही वे चीजें हैं जो माता-पिता को करनी चाहिए, बजाय इसके कि वे अपने बच्चों पर जबरन कोई अव्यावहारिक अपेक्षाएँ या माँगें थोपें। जब यह बात आती है कि बच्चों को अपनी आत्मा के लिए भी और अपने शारीरिक जीवन में भी किन चीजों की जरूरत है तो माता-पिता को अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद, मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी होने लगी। पहले, मुझे लगता था कि अपनी बेटी को विभिन्न कौशल सिखाकर और उसे एक प्रसिद्ध मंच पर पहुँचाकर हर किसी का आदर और प्रशंसा पाने लायक मशहूर बनाकर, मैं एक माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही थी। लेकिन माता-पिता की सच्ची जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि उनके बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और खुशी बनी रहे, साथ ही वे उन्हें सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को स्थापित करने में मदद करें, उन्हें सही जीवन लक्ष्य रखने के लिए मार्गदर्शन दें, उनकी रुचियों और शौक के आधार पर उनका पालन-पोषण करें और उन्हें परमेश्वर के विधानों और संप्रभुता के अधीन रहने के लिए मार्गदर्शन दें। और दैनिक जीवन में, माता-पिता को अपने बच्चों के खान-पान और रहन-सहन जैसी बुनियादी ज़रूरतों का ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए : उन्हें बताना चाहिए कि कौन से खाद्य पदार्थ खाने के लिए स्वस्थ हैं और कौन से शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं, जब वे बीमार हों तो उनकी देखभाल करें, जरूरत पड़ने पर उन्हें दवा दें, आवश्यक होने पर उन्हें इंजेक्शन लगवाएँ और उनकी दैनिक जरूरतों का ध्यानपूर्वक ख्याल रखें। ये वे चीजें हैं जो माता-पिता को करनी चाहिए। हालांकि सतह पर मेरी भाग-दौड़ मेरी बेटी के भले के लिए लग रही थी, वास्तव में, मैं बस चाहती थी कि वह मेरे लिए गौरव और अभिमान लाए, यहाँ तक कि उसे उसके बचपन की खुशी से वंचित करने और उसे सभाओं में शामिल होने और परमेश्वर का वचन खाने और पीने से रोकने की कीमत पर भी। मैं सचमुच स्वार्थी थी! मुझे उसे उसकी काबिलियत, रुचियों और शौक के अनुसार मार्गदर्शन देना चाहिए था, बजाय इसके कि मैं उसे जबरदस्ती दबाऊँ और उस पर शिक्षा थोपूँ। इसके अलावा, मुझे अपने बच्चे को परमेश्वर के सामने लाने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए, उसे प्रार्थना करने, परमेश्वर का वचन खाने और पीने, उसकी आराधना करने और दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहने के लिए कहना चाहिए। परमेश्वर का इरादा समझने के बाद, मैंने अपनी बेटी को प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए ले जाना बंद कर दिया और इसके बजाय, मैंने उसे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन होने के लिए मार्गदर्शन दिया और मैंने उसके साथ परमेश्वर का वचन खाने और पीने और सभाओं में शामिल होने में अधिक समय बिताया।

बाद में, जब मेरी बेटी और मैं एक सभा में शामिल हुए, तो हमने एक मंचीय नाटक देखा, जिसका नाम था फेयरवेल, माई इनोसेंट कैंपस। इसे देखने के बाद, मेरी बेटी बहुत प्रभावित हुई और समझ गई कि शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करता है और परमेश्वर का वचन पढ़ने और मनन करने से, मेरी बेटी समझ गई कि केवल अपना कर्तव्य निभाकर ही वह जीवन में सही मार्ग पर चल सकती है। एक दिन, जब मेरी बेटी स्कूल से वापस आई, तो उसने दृढ़ता से मुझसे कहा, “माँ, मैं स्कूल में बहुत दबाव महसूस करती हूँ और मैं भाइयों और बहनों की तरह एक आज़ाद और उन्मुक्त जीवन जीना चाहती हूँ। मैं अपनी पढ़ाई छोड़ना और कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।” मैं बहुत हैरान हुई, सोचने लगी, “तुम आज जहाँ हो, वहाँ पहुँचना तुम्हारे लिए आसान नहीं रहा है। अगर तुम अपनी पढ़ाई छोड़ दोगी, तो मंच पर जाने के तुम्हारे सपने हमेशा के लिए चकनाचूर हो जाएँगे। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी पिछली सारी मेहनत बेकार चली जाएगी?” उसी क्षण, मैंने महसूस किया कि मैं अभी भी प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करना चाहती थी और मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मेरी बेटी अपनी पढ़ाई छोड़ने को तैयार है, लेकिन मैं अभी भी यह सहन नहीं कर पा रही हूँ। हे परमेश्वर, मेरे संकल्प को मजबूत कर और प्रसिद्धि और लाभ की बेड़ियों से मुक्त होने में मेरी मदद कर।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर का वचन याद आया : “माँ-बाप की अपने बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाओं के सार का गहन-विश्लेषण करके हम देख सकते हैं कि ये अपेक्षाएँ स्वार्थपूर्ण हैं, ये मानवता के विरुद्ध हैं...।(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। “परमेश्वर के घर में तुममें ऐसा कौन है जो इस समय संयोग से अपना कर्तव्य निभा रहा है? तुम अपना कर्तव्य निभाने के लिए चाहे जिस भी पृष्ठभूमि से आए, इसमें कुछ भी संयोग से नहीं हुआ है। इस कर्तव्य को बिना सोचे समझे सिर्फ कुछ विश्वासियों को खोज लेने से नहीं निभाया जा सकता; यह परमेश्वर ने युगों पहले से पूर्वनियत कर रखा था। किसी चीज के पूर्वनियत होने का क्या मतलब है? विशेष रूप से क्या? इसका मतलब यह है कि अपनी पूरी प्रबंधन योजना में, परमेश्वर ने बहुत पहले ही योजना बना ली थी कि तुम धरती पर कितनी बार आओगे, अंत के दिनों के दौरान तुम किस वंश और किस परिवार में पैदा होगे, इस परिवार की परिस्थितियाँ क्या होंगी, तुम मर्द होगे या औरत, तुम्हारी खूबियाँ क्या होंगी, तुम्हारी शिक्षा किस स्तर की होगी, तुम कितना साफ-साफ बोलने वाले होगे, तुम्हारी काबिलियत कितनी होगी और तुम कैसे दिखोगे। उसी ने यह तय किया कि तुम किस उम्र में परमेश्वर के घर में आकर अपना कर्तव्य निभाना शुरू करोगे और कब कौन-सा कर्तव्य निभाओगे। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए हर कदम पहले से पूर्वनियत कर दिया था। जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे और जब तुम अपने पिछले कई जीवनों में धरती पर आए थे तो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए पहले से ही व्यवस्था की थी कि कार्य के इस आखिरी चरण में तुम क्या कर्तव्य निभाओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन से, मैंने समझा कि किसी व्यक्ति का परमेश्वर के घर आकर अपना कर्तव्य निभाने का समय परमेश्वर ने बहुत पहले ही तय कर दिया है। परमेश्वर ने बहुत पहले ही वह समय नियत कर दिया था जब मेरी बेटी आकर अपना कर्तव्य निभाएगी और मैं अब पहले की तरह, अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए उसके जीवन में हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं कर सकती थी। चूँकि मेरी बेटी ने परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने का फैसला किया था, ये परमेश्वर के नियत विधान और व्यवस्थाएँ थीं और मुझे उसे सकारात्मक मार्गदर्शन देना था और उसे सही मार्ग पर चलने देना था। यह मेरी जिम्मेदारी थी जिसे मुझे पूरा करना था। यह सोचकर, मैं खुशी-खुशी अपनी बेटी के अनुरोध पर सहमत हो गई। कुछ ही समय बाद, मेरी बेटी ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर आ गई। अपनी बेटी के चेहरे पर पहले जैसी रौनक और मुस्कान लौट आई देखकर, मैं बहुत खुश हुई और मैंने महसूस किया कि केवल सृष्टिकर्ता के नियत विधानों और व्यवस्थाओं के अधीन होकर ही कोई व्यक्ति सहजता, स्वतंत्रता और आनंद के साथ जी सकता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कितने भी पैसे या प्रसिद्धि से नहीं बदला जा सकता!

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन के दो अंश पढ़े और मैं मानव जीवन के मूल्य और अर्थ के बारे में और अधिक समझ गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर में विश्वास रखने, सत्य का अनुसरण करने और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने के अलावा मनुष्य के जीवन में सब कुछ खोखला है और याद न रखने योग्य है। भले ही तुमने धरती को हिला देने वाला कारनामा किया हो, भले ही तुम अंतरिक्ष में गए हो और चंद्रमा तक जा चुके हो; भले ही तुमने ऐसी वैज्ञानिक प्रगति की हो जिससे मानवजाति को कुछ लाभ या मदद मिली हो, इनका कोई मूल्य नहीं है और ये सभी चीजें नष्ट हो जाएँगी। ऐसी एकमात्र चीज कौन-सी है जो कभी नष्ट नहीं होगी? (परमेश्वर के वचन।) केवल परमेश्वर के वचन, परमेश्वर की गवाहियाँ, वे सभी गवाहियाँ और कार्य जो सृष्टिकर्ता की गवाही देते हैं और लोगों के अच्छे कर्म नष्ट नहीं होंगे। ये चीजें हमेशा रहेंगी और ये बहुत मूल्यवान हैं। इसलिए अपनी सभी सीमाएँ तोड़ दो, इस महान प्रयास को अंजाम दो और खुद को किसी भी व्यक्ति, घटनाओं और चीजों से बाधित मत होने दो; ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के लिए खपाओ, और अपनी सारी ऊर्जा और हृदय का रक्त अपने कर्तव्य निभाने में लगाओ। यही वह चीज है जिसे परमेश्वर सबसे अधिक आशीष देता है और इसके लिए किसी भी हद तक कष्ट उठाना सार्थक है!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सृजित प्राणी का कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में ही जीने का मूल्य है)। “आज तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, उसके वचन सुनते हो और सृष्टिकर्ता का आदेश स्वीकारते हो। कभी-कभी यह थोड़ा कठिन और थकाऊ होता है और कभी-कभी तुम्हारा थोड़ा अपमान और शोधन होता है; लेकिन ये अच्छी चीजें हैं, न कि खराब चीजें। अंत में तुम्हें क्या हासिल होगा? तुम्हें सत्य और जीवन प्राप्त होगा और आखिरकार तुम्हें सृष्टिकर्ता की मान्यता और स्वीकृति मिलेगी। परमेश्वर कहता है, ‘तुम मेरा अनुसरण करो और मैं तुम्हें कृपा की दृष्टि से देखता हूँ और तुमसे प्रसन्न हूँ।’ यदि परमेश्वर इसके अलावा कुछ नहीं कहता कि तुम उसकी नजरों में एक सृजित प्राणी हो तो तुम व्यर्थ में नहीं जी रहे हो और तुम उपयोगी हो। परमेश्वर से स्वीकृति पाना अद्भुत है और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यदि लोग शैतान का अनुसरण करेंगे तो उन्हें क्या हासिल होगा? (विनाश।) लोगों का विनाश होने से पहले वे क्या बन जाएँगे? (वे राक्षस बन जाएँगे।) वे लोग राक्षस बन जाएँगे। लोग चाहे कितने भी कौशल हासिल कर लें, कितने भी पैसे कमा लें, उन्हें कितनी भी शोहरत और लाभ मिल जाए, वे कितने भी सांसारिक सुखों का आनंद उठाएँ, या लौकिक संसार में उनका दर्जा चाहे कितना भी ऊँचा हो, अंदर से वे अधिक से अधिक भ्रष्ट, अधिक से अधिक दुष्ट और गंदे, और अधिक से अधिक विद्रोही और पाखंडी बन जाएँगे और आखिरकार वे जीते-जागते राक्षस बन जाएँगे—वे अमानुष बन जाएँगे। ऐसे लोग सृष्टिकर्ता की नजरों में कैसे माने जाते हैं? बस ‘अमानुष,’ और कुछ नहीं? ऐसे व्यक्ति के प्रति सृष्टिकर्ता का दृष्टिकोण और रवैया क्या है? यह विमुखता, घृणा, बेइंतहा नफरत, परित्याग और आखिरकार अभिशाप, दंड और विनाश का दृष्टिकोण और रवैया है। लोग अलग-अलग मार्ग पर चलते हैं और अंत में अलग-अलग परिणाम पाते हैं। तुम लोग कौन-सा मार्ग चुनते हो? (परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करने का मार्ग।) परमेश्वर का अनुसरण करने का विकल्प चुनना सही मार्ग चुनना है : यह रोशनी के मार्ग पर चलना है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सृजित प्राणी का कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में ही जीने का मूल्य है)। परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि केवल परमेश्वर में विश्वास करने, सत्य का अनुसरण करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने से ही कोई व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है और एक सच्चे इंसान की तरह जी सकता है। प्रतिष्ठा और रुतबे का पीछा करना शैतान का अनुसरण करना है और भले ही किसी व्यक्ति को दूसरों से उच्च सम्मान मिल जाए, यह अस्थायी है और वे अभी भी विनाश के मार्ग पर हैं। अब, मेरी बेटी और मैं दोनों अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, और हमने खुद को विभिन्न प्रलोभनों और समाज की बुरी प्रवृत्तियों के प्रभाव से दूर कर लिया है। मेरी बेटी अब दबाव या दर्द महसूस नहीं करती और मेरा दिल भी शांत और मुक्त हो गया है। जब मेरी बेटी को अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो भाई-बहन प्रेम से उसकी मदद करते हैं और हर कोई उसके साथ सच्चे दिल से व्यवहार करता है। मेरी बेटी में बुरी आदतें थीं और बहनों ने धैर्यपूर्वक उन्हें बताया और उसकी मदद की और आधे साल से भी कम समय में, मेरी बेटी ने अपनी कई बुरी आदतों को सुधार लिया। कभी-कभी, मेरी बेटी मेरी समस्याओं को देखती है और मुझसे सत्य पर संगति करने की पहल करती है। अपनी बेटी को सही मार्ग पर चलते और प्रगति और बदलाव करते देखकर, मैं दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ! अगर हमें मार्गदर्शन देने के लिए परमेश्वर का वचन नहीं होता, तो मेरी बेटी और मैं अभी भी शैतान द्वारा दिए गए कष्टों में जी रहे होते और हम बस परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते रहते और उससे और भी दूर होते चले जाते और अंत में, हम शैतान के साथ ही नष्ट हो जाते। हमें बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

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