जब मैं संतान का फर्ज निभाने के लिए अपने पिता के पास नहीं रह सकी

13 मार्च, 2026

लैन यू, चीन

सर्दियों की दोपहर की धूप कोमल और हल्की थी, जो खिड़की से होकर पौधों से भरी देहली पर चमक रही थी, और कई गमलों में लगे फूल और पौधे उस पौष्टिक धूप का भरपूर आनंद ले रहे थे। लैन यू ने खिड़की से बाहर देखा और उसे आज़ादी का एहसास हुआ। उसे परमेश्वर में विश्वास करने के कारण तीन साल और चार महीने की सज़ा हुई थी और वह अभी-अभी रिहा हुई थी। उसकी बड़ी बहन को भी दो बार गिरफ्तार किया गया था और उसके पिता को भी गिरफ्तार करके साढ़े तीन साल की सज़ा दी गई थी। रिहाई के बाद भी वे सीसीपी सरकार की खास निगरानी में थे। वे एक-दूसरे से दस साल से भी ज़्यादा समय से अलग थे और मिल नहीं पाए थे। बाद में भाई-बहनों की मदद से लैन यू अपने पिता के संपर्क में आई और एक दशक से भी अधिक समय से दबी मिलने की तड़प अब बेकाबू हो गई थी। आखिरकार, वह अपने पिता को देख पाएगी जिन्हें वह इतने लंबे समय से याद कर रही थी! इसी उत्साह से भरकर लैन यू उस जगह पहुँची जहाँ उसका अपने पिता से पुनर्मिलन होना था। जब वह अपनी मंज़िल पर पहुँचने ही वाली थी तो गाड़ी की खिड़की से लैन यू ने दूर एक टैक्सी के बगल में एक बुज़ुर्ग आदमी को खड़े देखा, जिसका आधा चेहरा मास्क से ढका हुआ था। लैन यू उस बुज़ुर्ग आदमी को ध्यान से देखने लगी, और अचानक उसकी भौंहें तन गईं और वह आँखें फाड़कर बुज़ुर्ग को ताकने लगी—क्या वह उसी के पिता नहीं थे, जिन्हें उसने चौदह साल से नहीं देखा था? उनके टोपे के नीचे से पके हुए बाल झाँक रहे थे और उसकी यादों का वह हट्टा-कट्टा इंसान अब उतना तनकर खड़ा नहीं था। वह दुबला-पतला आदमी सड़क किनारे खड़ा था और अपने आसपास कुछ खोज रहा था। जैसे ही गाड़ी मुड़ी और रुकी, लैन यू ने उत्सुकता से गाड़ी का दरवाज़ा खोला और अपने पिता की ओर भागी। उसने आँसू रोकने की कोशिश करते हुए धीरे से पुकारा, “पिताजी!” उसके पिता ने जवाब दिया, “हाँ!” यह कहते-कहते उनकी आँखें पहले ही नम हो चुकी थीं, उन्होंने उससे आग्रह किया, “जल्दी कर, गाड़ी में बैठ। घर चलते हैं।”

सूरज पश्चिम में डूब गया और शाम की लालिमा ने कस्बे के हर कोने को रंग दिया था। सर्दियों की शाम की ठंड धीरे-धीरे बढ़ रही थी, और हवा लैन यू के चेहरे से टकरा रही थी, पर उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी। घर में दाखिल होने के बाद उसके पिता जल्दी से बिस्तर ठीक करने लगे और लैन यू से पूछा कि वह क्या खाना चाहती है, और उसे अपनेपन और खुशी का एहसास हुआ। सिर घुमाते ही उसने अचानक दीवार पर एक सीटी स्कैन टँगा हुआ देखा, और जैसे ही उसने अंदर के कमरे का दरवाज़ा खोला, उसने मेज़ पर दवाओं के थैले देखे। लैन यू ने अंदाज़ा लगाया कि उसके पिता की तबीयत ठीक नहीं है, और उसे चिंता होने लगी। रात के खाने के बाद, लैन यू और उसके पिता ने इन सालों के अपने अनुभवों के बारे में बात की, और उसे पता चला कि उसके पिता को जेल में दो बार तपेदिक हो चुका था। उनके फेफड़े बुरी तरह से खराब हो गए थे और ठंड पकड़ते ही उन्हें घरघराहट होती और खाँसी आने लगती थी। पिछले दो सालों में उन्हें पित्ताशय में पथरी का भी पता चला था। वह इसे नियंत्रित करने के लिए कुछ समय से दवा ले रहे थे; अगर यह बढ़ जाती तो उन्हें सर्जरी की ज़रूरत पड़ती। सीसीपी पुलिस के लगातार उत्पीड़न के कारण उसके पिता ने नौ साल से ज्यादा समय तक भाई-बहनों से संपर्क करने की हिम्मत नहीं की, वह कलीसियाई जीवन नहीं जी पाए थे और भाई-बहन केवल चुपके से उसके पिता को परमेश्वर के नवीनतम वचन, अनुभवजन्य गवाही के वीडियो आदि भेज पाते थे। अपने पिता के मुँह से ये चीजें सुनकर लैन यू बहुत दुखी हुई। उसके पिता ने सीसीपी के उत्पीड़न के कारण बहुत दुख झेले थे, और एक बेटी होने के नाते, उसने उनके लिए कुछ भी नहीं किया था, उसे लगा कि वह बहुत ही नालायक बेटी है। बाद में, जब लैन यू के रिश्तेदारों को पता चला कि वह जेल से रिहा हो गई है, तो उन्होंने उसे फोन किया, और बार-बार उससे आग्रह किया, “तुम्हारे पिता बूढ़े हो रहे हैं और उनकी सेहत ठीक नहीं है; उन्हें अपनी देखभाल के लिए किसी की जरूरत है। अब जब तुम वापस आ गई हो तो तुम्हें नौकरी करनी चाहिए, पैसे कमाने चाहिए और उनकी देखभाल करनी चाहिए।” रिश्तेदारों की बातें उसके दिल में गूँजने लगीं और उसने सोचा, “मेरे पिता ने मुझे पाला-पोसा और वह मुझे परमेश्वर के सामने भी लाए और मुझे जीवन में सच्चा मार्ग चुनना सिखाया। अब जब वे बूढ़े और बीमार हैं तो मुझे एक बेटी के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी चाहिए और उनके साथ रहकर उनसे बात करनी चाहिए और उनकी देखभाल करनी चाहिए ताकि वे खुशी से अपने दिन बिता सकें।” फिर लैन यू ने अपने पिता की हालत के बारे में डॉक्टरों से ऑनलाइन सलाह ली और उसने पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत की ताकि उसके पिता को दवा और इलाज के लिए पर्याप्त पैसे न होने की चिंता न करनी पड़े। लैन यू सच में अपने पिता के साथ ज़्यादा समय बिताना चाहती थी और हर बार जब वह अपने पिता के चेहरे पर मुस्कान देखती तो उसे खुशी होती थी।

एक दिन लैन यू काम से लौटकर घर आई तो उसके पिता ने उसे बताया कि अगुआओं का एक पत्र आया है। पत्र में लिखा था कि चूँकि लैन यू के घर रहते पुलिस कभी भी आ सकती है और उसे परेशान कर सकती है और लैन यू यहाँ अपना कर्तव्य नहीं निभा सकती है और चूँकि कलीसिया को लिखने-पढ़ने के काम के लिए लोगों की तुरंत ज़रूरत है, इसलिए वे चाहते हैं कि वह अपना कर्तव्य करने के लिए घर छोड़ दे। पत्र पढ़ने के बाद लैन यू को खुशी भी हुई और चिंता भी। उसने कई साल से कर्तव्य नहीं निभाए थे और एक सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर की दी हुई सारी चीजों का आनंद लेते हुए उसकी अंतरात्मा असहज महसूस कर रही थी। लेकिन लैन यू अपने पिता के बारे में चिंता किए बिना नहीं रह सकती थी। हाल ही में उसके पिता की बीमारी बढ़ गई थी और उनके पित्ताशय में हर दिन दर्द होता था। अगर वह चली गई और किसी दिन उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ी तो उनकी देखभाल कौन करेगा? अगर वह अपने कर्तव्य निभाने के लिए चली गई तो उनके आसपास उन्हें पानी या दवा देने वाला कोई नहीं होगा। लैन यू को याद आया कि एक बार उसने अपने पिता को यह कहते सुना था, “तुम्हारी बहन की तलाश हो रही है और तुम्हें गिरफ्तार करके सज़ा दी गई, इस वजह से हमारे रिश्तेदार मेरी आलोचना करते थे, मेरे बारे में शिकायत करते थे और गाँव वाले मेरी अनदेखी करते थे।” उसके पिता के पास अपना दर्द बाँटने के लिए कोई नहीं था और वह इतने नकारात्मक और कमज़ोर हो गए थे कि उन्होंने अपनी जान देने का विचार तक किया था। लेकिन बाद में परमेश्वर के वचनों को याद कर वह अपनी नकारात्मकता से बाहर आ गए। लैन यू बहुत चिंतित थी, उसने सोचा, “अगर मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ देती हूँ और मेरे पिता दुख में कोई मूर्खतापूर्ण कदम उठा लें तो क्या होगा? वह बूढ़े हो रहे हैं और उन्हें अपनी देखभाल के लिए किसी की जरूरत है; अगर मैं घर छोड़ दूँगी तो मेरे रिश्तेदार और दोस्त मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे यह नहीं कहेंगे कि मैं अकर्तव्यनिष्ठ संतान हूँ और मुझमें मानवता की कमी है? लेकिन मैं घर पर अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी। जेल से रिहा होने के बाद से पुलिस मुझे थाने में रिपोर्ट करने और पश्चात्ताप पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए पहले ही कई बार फोन कर चुकी है।” पुलिस उत्पीड़न वाले एक अंतहीन भविष्य के बारे में सोचकर ही जिसमें लैन यू सभाओं में शामिल नहीं हो पाएगी या अपना कर्तव्य नहीं निभा पाएगी, उसने आखिरकार अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने का फैसला किया। लेकिन जब वह अपने सोने के कमरे से बाहर निकली और बैठक की खिड़की से अपने पिता के कमज़ोर शरीर को देखा, तो उसे ऐसा लगा जैसे वह अपने जाने के बाद अपने पिता को घर पर अकेला देख रही है, जिनके साथ कोई नहीं है। वह अपने सोने के कमरे में वापस चली गई और रोते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करने लगी, “हे परमेश्वर, मैं अपना कर्तव्य करना चाहती हूँ, लेकिन मुझे चिंता है कि मेरे पिता की देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। मेरे पिता बूढ़े हो रहे हैं, लेकिन मैं उनके पास रहकर बेटी का फर्ज़ नहीं निभा पाऊँगी। मुझे महसूस होता रहता है कि ऐसा करके मुझमें मानवता का नितांत अभाव है। हे परमेश्वर, यह फैसला बहुत मुश्किल है। कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मार्गदर्शन दो ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ।”

प्रार्थना करने के बाद लैन यू ने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अगर अपने जीवन-परिवेश और उस संदर्भ के आधार पर, जिसमें तुम खुद को पाते हो, अपने माता-पिता का सम्मान करने से परमेश्वर का आदेश पूरा करने और अपना कर्तव्य करने में कोई टकराव नहीं होता—या दूसरे शब्दों में, अगर तुम्हारे माता-पिता का सम्मान करने से तुम्हारे कर्तव्य के प्रति लगन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता—तो तुम एक ही समय में उन दोनों का अभ्यास कर सकते हो। तुम्हें अपने माता-पिता से बाहरी रूप से अलग होने, उन्हें बाहरी रूप से त्यागने या नकारने की जरूरत नहीं। यह किस स्थिति में लागू होता है? (जब अपने माता-पिता का सम्मान करना व्यक्ति के कर्तव्य निर्वहन से नहीं टकराता।) यह सही है। दूसरे शब्दों में, अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में बाधा डालने की कोशिश नहीं करते, और वे भी विश्वासी हैं, और वे वाकई तुम्हें अपना कर्तव्य लगन से करने और परमेश्वर का आदेश पूरा करने में समर्थन और प्रोत्साहन देते हैं, तो तुम्हारे माता-पिता के साथ तुम्हारा रिश्ता, सामान्य अर्थ में, रिश्तेदारों के बीच का दैहिक रिश्ता नहीं है; बल्कि वह कलीसिया के भाई-बहनों के बीच का रिश्ता है। उस स्थिति में, उनके साथ कलीसिया के भाई-बहनों की तरह बातचीत करने के अलावा तुम्हें उनके प्रति अपनी कुछ संतानोचित जिम्मेदारियाँ भी पूरी करनी चाहिए। यह भी सही होगा कि तुम उनके प्रति थोड़ा अधिक सरोकार दिखाओ। अगर इससे तुम्हारा कर्तव्य-निर्वहन प्रभावित नहीं होता, यानी, अगर वे तुम्हारे दिल को विवश नहीं करते, तो तुम अपने माता-पिता को फोन करके उनका हालचाल पूछ सकते हो और उनके लिए थोड़ा सरोकार दिखा सकते हो, तुम उनकी कुछ कठिनाइयाँ हल करने और उनके जीवन की कुछ समस्याएँ सुलझाने में मदद कर सकते हो, तुम उनके जीवन प्रवेश के संदर्भ में उनकी कुछ कठिनाइयाँ हल करने में मदद कर सकते हो—तुम ये सभी चीजें कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में बाधा नहीं डालते, तो तुम्हें उनके साथ यह रिश्ता बनाए रखना चाहिए, और तुम्हें उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। और तुम्हें उनके लिए सरोकार क्यों दिखाना चाहिए, उनकी देखभाल क्यों करनी चाहिए और उनका हालचाल क्यों पूछना चाहिए? क्योंकि तुम उनकी संतान हो। चूँकि तुम्हारा उनके साथ यह रिश्ता है, तुम्हारी एक और तरह की जिम्मेदारी है, तुम्हें उनकी थोड़ी और खैर-खबर लेनी चाहिए और उन्हें और ज्यादा सहायता प्रदान करनी चाहिए। अगर यह तुम्हारे कर्तव्य-निर्वहन को प्रभावित नहीं करता और अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में बाधा नहीं डालते या गड़बड़ी नहीं करते, और वे तुम्हें रोकते भी नहीं, तो तुम्हारे लिए उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना स्वाभाविक और उचित है और तुम्हें इसे उस हद तक करना चाहिए, जिस हद तक तुम्हारा जमीर तुम्हें न धिक्कारे—यह सबसे न्यूनतम मानक है, जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए। अगर तुम अपनी परिस्थितियों के प्रभाव और बाधा के कारण घर पर अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर पाते, तो तुम्हें इस विनियम का पालन करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अपने आपको परमेश्वर के आयोजनों के हवाले कर देना चाहिए और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए, और तुम्हें अपने माता-पिता का सम्मान करने पर जोर देने की जरूरत नहीं है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (4))। “परमेश्वर अलग-अलग लोगों से अलग-अलग चीजों की माँग करता है; उनके लिए उसकी भिन्न अपेक्षाएँ हैं। जो लोग अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में सेवा करते हैं, उन्हें परमेश्वर ने बुलाया है, इसलिए उन्हें परमेश्वर का आदेश स्वीकारना चाहिए और उसका अनुसरण करने के लिए सब-कुछ त्याग देना चाहिए; वे अपने माता-पिता के साथ रहने और उनका सम्मान करने में सक्षम नहीं हैं। यह एक तरह की स्थिति है। साधारण अनुयायी परमेश्वर द्वारा नहीं बुलाए गए हैं, इसलिए वे अपने माता-पिता के साथ रह सकते हैं और उनका सम्मान कर सकते हैं। इसे अच्छी तरह से करने का कोई पुरस्कार नहीं है और इसके परिणामस्वरूप उन्हें कोई आशीष नहीं मिलेगा, लेकिन अगर वे संतानोचित धर्मनिष्ठा नहीं दिखाते, तो उनमें मानवता नहीं है। असल में, अपने माता-पिता का सम्मान करना सिर्फ एक तरह की जिम्मेदारी है और यह सत्य के अभ्यास से कम है। परमेश्वर के प्रति समर्पण ही सत्य का अभ्यास है, परमेश्वर का आदेश स्वीकारना ही परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की अभिव्यक्ति है, और परमेश्वर के अनुयायी वे होते हैं जो अपने कर्तव्य निभाने के लिए सब-कुछ त्याग देते हैं। संक्षेप में, सबसे महत्वपूर्ण कार्य जो तुम्हारे सामने है, वह है अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना। यही सत्य का अभ्यास है और यह परमेश्वर के प्रति समर्पण की एक अभिव्यक्ति है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (4))। लैन यू ने परमेश्वर के वचनों पर चिंतन किया और उसे एहसास हुआ कि अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना व्यक्ति की एक ऐसी जिम्मेदारी है जो उसे निभानी चाहिए और ऐसी परिस्थितियों में जहाँ इससे व्यक्ति के कर्तव्य पर असर न पड़े और स्थिति अनुमति दे तो वह अपने माता-पिता के प्रति अपनी संतानोचित जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकता है। लेकिन, अगर परिस्थितियाँ अनुमति न दें तो व्यक्ति को स्थिति और अपने कर्तव्य के आधार पर चुनाव करना होगा। ठीक वैसे ही जैसे कुछ भाई-बहन जिन्हें सीसीपी ने गिरफ्तार नहीं किया है और जो कलीसिया में महत्वपूर्ण काम नहीं सँभालते, ये लोग अपने कर्तव्य करते हुए अपने माता-पिता की देखभाल कर सकते हैं। लेकिन कुछ लोग सीसीपी द्वारा पीछा और उत्पीड़न किए जाने का सामना करते हैं और अगर वे घर नहीं छोड़ते तो वे अपने कर्तव्य नहीं निभा सकते हैं, इसलिए ऐसी स्थितियों में वे अपने माता-पिता की देखभाल करने के बारे में सोच ही नहीं सकते हैं—उन्हें अपने कर्तव्यों की प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी। लैन यू यूँ तो घर पर अपने पिता की देखभाल कर सकती थी, लेकिन उसने सोचा कि कैसे सीसीपी पुलिस उसे हमेशा परेशान करती रहेगी और धमकाती रहेगी, इसलिए वह अपने कर्तव्य घर पर नहीं निभा सकती है। पाठ-आधारित कार्य के लिए लोगों की कमी थी और उसे कलीसिया के कार्य पर विचार करना था। सृजित प्राणियों के रूप में लोगों को अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के अलावा सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए और सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य अच्छे से निभाने चाहिए। लैन यू को प्रभु यीशु के वचन याद आए : “जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं(मत्ती 10:37)। परमेश्वर चाहता है कि लोग उसे संतुष्ट करने के लिए सब कुछ त्याग दें, ठीक जैसे पतरस और यूहन्ना ने किया था। वे प्रभु का अनुसरण करने और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए अपने माता-पिता और पारिवारिक स्नेह को पीछे छोड़ने का फैसला कर सके, और परमेश्वर की नज़र में, उनमें मानवता थी। लैन यू सोचा करती थी कि जो अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ नहीं हैं उनमें सबसे खराब मानवता होती है, लेकिन अब वह समझ गई कि क्या किसी व्यक्ति में मानवता है इस चीज को परमेश्वर इस आधार पर नहीं मापता है कि वह व्यक्ति अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ है, बल्कि इस बात से मापता है कि क्या उसे संतुष्ट करने के लिए वह व्यक्ति एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकता है। लैन यू ने इस बारे में सोचा कि कैसे वह अपने कर्तव्य का सामना करते हुए झिझकती थी और अति सोच-विचार करती थी, हमेशा अपने पिता के बारे में चिंतित रहती थी और अपना कर्तव्य नहीं निभा पाती थी। लेकिन भले ही वह एक ऐसी बेटी बन जाए जिसकी सब तारीफ़ करें, पर परमेश्वर के प्रति वफादार न होने के कारण परमेश्वर भी उसे स्वीकार नहीं करेगा। उसे एहसास हुआ कि इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना है, और केवल यही उसके जीवन का मूल्य है। यह सोचकर लैन यू के दिल का बोझ हल्का हो गया और वह अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने को तैयार हो गई।

लैन यू ने अपने पिता के साथ तीन महीने का मेल-मिलाप खत्म किया, और कहीं और अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ दिया। लेकिन मन की गहराई में वह अभी भी अपने पिता के लिए चिंतित और परेशान थी और उसे अपराध-बोध महसूस होता था, वह हमेशा सोचती रहती थी कि वह दोबारा मिलने कब जा पाएगी। एक बार, उसके साथ सहयोग करने वाली एक बहन किसी काम से घर गई, और जब उसने सोचा कि यह बहन अपने परिवार से मिलेगी, तो उसके दिल में उथल-पुथल मच गई। उसकी आँखें कंप्यूटर पर टिकी थीं, पर उसका दिमाग कुर्सी पर बैठे हुए उसके घर आने का इंतजार करते पिता की छवि से सराबोर था। क्या पुलिस ने उन्हें परेशान किया होगा? उनकी दशा कैसी है? क्या उनकी बीमारी बढ़ गई है? जब उसके पिता अभी भी बीमार हैं, तो उसके घर छोड़ने के बारे में उसके रिश्तेदार और दोस्त क्या कहेंगे? लैन यू के दिमाग को ये विचार खाए जा रहे थे और उसके हाथ में जो काम था उस पर वह ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थी। उसे एहसास हुआ कि उसकी दशा ठीक नहीं है, इसलिए उसने परमेश्वर से प्रार्थना की। उसने आध्यात्मिक भक्ति के दौरान परमेश्वर के ये वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “ज्यादातर लोग अपने कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने को कुछ हद तक व्यापक वस्तुपरक हालात के कारण चुनते हैं जिससे उनका अपने माता-पिता को छोड़ना जरूरी हो जाता है; वे अपने माता-पिता की देखभाल के लिए उनके साथ नहीं रह सकते; ऐसा नहीं है कि वे स्वेच्छा से अपने माता-पिता को छोड़ना चुनते हैं; यह वस्तुपरक कारण है। दूसरी ओर, व्यक्तिपरक ढंग से कहें, तो तुम अपने कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाते हो तो इसलिए नहीं कि तुम अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हो, बल्कि परमेश्वर के आह्वान की वजह से जाते हो। परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करने, उसके आह्वान स्वीकार करने और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य निभाने के लिए तुम्हारे पास अपने माता-पिता को छोड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं था; तुम उनकी देखभाल करने और उनका साथ देने के लिए उनके बगल में नहीं रह सकते थे। तुमने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें नहीं छोड़ा, सही है? अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें छोड़ देना और परमेश्वर के आह्वान का जवाब देने और अपने कर्तव्य निभाने के लिए उन्हें छोड़ना—क्या इन दोनों बातों की प्रकृतियाँ अलग नहीं हैं? (बिल्कुल।) तुम्हारे हृदय में तुम्हारे माता-पिता के प्रति भावनात्मक लगाव और विचार जरूर होते हैं; तुम्हारी भावनाएँ खोखली नहीं हैं। अगर वस्तुपरक हालात अनुमति दें, और तुम अपने कर्तव्य निभाते हुए भी उनके साथ रह पाओ, तो तुम उनके साथ रहने को तैयार होगे, नियमित रूप से उनकी देखभाल करोगे और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करोगे। लेकिन वस्तुपरक हालात के कारण तुम्हें उनको छोड़ना पड़ता है; तुम उनके साथ नहीं रह सकते। ऐसा नहीं है कि तुम उनके बच्चे के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते हो, बल्कि तुम नहीं निभा सकते हो। ... दरअसल, तुम असंतानोचित नहीं हो। ऐसा नहीं है कि तुम मानवता का अभाव होने के उस मुकाम पर पहुँच चुके हो जहाँ तुम अपने माता-पिता की परवाह भी नहीं करना चाहते हो या उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते हो। यह विभिन्न वस्तुपरक कारणों से है कि तुम अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे हो, इसलिए तुम असंतानोचित नहीं हो(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (16))। परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट थे। जब लोग परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण अपने कर्तव्य निभाने के लिए माता-पिता को छोड़ देते हैं तो यह अकर्तव्यनिष्ठ होना नहीं है, क्योंकि उनका इरादा ज़िम्मेदारी से बचना नहीं है, बल्कि एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग के वे मसीही, पूरी दुनिया में परमेश्वर के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए अपने माता-पिता और बच्चों को छोड़ गए, जो इंसानों के बीच सबसे नेक काम था। लैन यू भी अपने पिता के सामने कर्तव्यनिष्ठ होना चाहती थी और उम्मीद करती थी कि वह अपने पिता के साथ रहेगी और बुढ़ापे के दिन शांतिपूर्वक बिताने में उनकी मदद करेगी। वह यह भी चाहती थी कि उनका पूरा परिवार इकट्ठा हो, परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी अनुभवजन्य समझ को साझा करे। लेकिन चूँकि वह एक नास्तिक देश में रहती थी जहाँ कोई धार्मिक स्वतंत्रता नहीं थी, सीसीपी लोगों को परमेश्वर में विश्वास नहीं करने देती थी और सच्चे मार्ग पर नहीं चलने देती थी और अगर वह अपने पिता के पास रहती तो वह अपना कर्तव्य नहीं निभा पाती। इसके अलावा, परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है, महा विनाश पहले ही शुरू हो चुके हैं और अभी भी बहुत से लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर के अंत के दिनों के काम को स्वीकार नहीं किया है। परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार करना और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उसके सामने लाना उसका कर्तव्य था, और वह उन लोगों से अलग थी जो अपनी ज़िम्मेदारियों से बचते थे और अपने माता-पिता का फर्ज़ नहीं निभाना चाहते थे। इन बातों को समझने के बाद, उसका दिल अब उतना परेशान नहीं था और न ही वह खुद को किसी बंधन में महसूस कर रही थी। बाद में अपने कर्तव्य निभाने के बाद मिले खाली समय में लैन यू अपने पिता को अपनी दशा बताने के लिए पत्र लिखती थी। कुछ समय बाद उसे अपने पिता का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि उसकी चचेरी बहन ने पित्त की पथरी के इलाज का एक नुस्खा खोज लिया था और वह अब दवा का दूसरा दौर शुरू कर चुके हैं। उनके पित्ताशय में पथरियाँ पहले से छोटी हो चुकी थीं; उन्हें पहले जितना दर्द नहीं होता था और उनकी दशा बहुत सुधर चुकी थी। यह पढ़कर लैन यू भाव-विह्वल होकर रो पड़ी और उसने परमेश्वर की दया और आशीष को महसूस किया।

एक बार, लैन यू एक मेज़बान बहन से बात कर रही थी, और उस बहन ने कहा कि उसके बच्चे उसे हर कुछ समय में पैसे भेजते हैं, और जब वे उससे मिलने आते हैं, तो वे उसके लिए चीज़ें खरीदते हैं। लैन यू ने सोचा कि उसे घर से दूर हुए लगभग एक साल हो गया है, लेकिन सीसीपी के उत्पीड़न के कारण वह अपने पिता को फोन करने या उनके लिए कपड़े या पौष्टिक चीज़ें खरीदने की हिम्मत नहीं कर पाती। बड़ी हो चुकने के बावजूद उसने एक बेटी के नाते अपने पिता के लिए कभी कुछ नहीं किया था। वह हमेशा अपने पिता की ऋणी महसूस करती थी और उसके दिल में बेचैनी की भावना थी। बाद में उसने यह सोचते हुए खोज की कि उसे क्यों हमेशा ऐसा लगता है कि वह अपने पिता की ऋणी है। उसने परमेश्वर के वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “चीनी परंपरागत संस्कृति के अनुकूलन के कारण चीनी लोगों की परंपरागत धारणाओं में यह माना जाता है कि व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा रखनी चाहिए और जो भी संतानोचित निष्ठा का पालन नहीं करता है वह विद्रोही बच्चा होता है। ये विचार बचपन से ही लोगों के मन में बिठाए गए हैं, और ये लगभग हर घर में, साथ ही हर स्कूल में और आम तौर पर समाज में सिखाए जाते हैं। जब किसी व्यक्ति का दिमाग इस तरह की चीजों से भर जाता है, तो वह सोचता है, ‘संतानोचित निष्ठा किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मैं संतानोचित न रहा तो मैं एक अच्छा इंसान नहीं हूँगा—मैं एक विद्रोही बच्चा हूँगा, जनमत द्वारा मेरी निंदा की जाएगी। मैं ऐसा व्यक्ति हूँगा जिसमें कोई जमीर नहीं है।’ क्या यह नजरिया सही है? लोगों ने परमेश्वर द्वारा व्यक्त इतने अधिक सत्य देखे हैं—क्या परमेश्वर ने अपेक्षा की है कि व्यक्ति अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाए? क्या यह कोई ऐसा सत्य है, जिसे परमेश्वर के विश्वासियों को समझना ही चाहिए? नहीं, यह ऐसा सत्य नहीं है। परमेश्वर ने केवल कुछ सिद्धांतों की संगति की है। परमेश्वर के वचन किस सिद्धांत द्वारा लोगों से दूसरों के साथ व्यवहार किए जाने की अपेक्षा करते हैं? परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो। यही वह सिद्धांत है जिसका लोगों को पालन करना चाहिए। परमेश्वर सत्य का अनुसरण करने और उसकी इच्छा का पालन कर सकने वालों से प्रेम करता है; हमें भी ऐसे लोगों से प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा का पालन नहीं कर सकते, जो परमेश्वर से नफरत और विद्रोह करते हैं—परमेश्वर ऐसे लोगों का तिरस्कार करता है, और हमें भी उनका तिरस्कार करना चाहिए। परमेश्वर इंसान से यही अपेक्षा करता है। ... शैतान इन पारंपरिक संस्कृतियों और नैतिकता की इन धारणाओं का उपयोग तुम्हारे हृदय और मन को बाँधने के लिए करता है, चीजों पर तुम्हारे विचारों को बेहूदा बना देता है और तुमसे अपने हृदय में परमेश्वर का नकार और प्रतिरोध करवाता है, इस प्रकार तुम्हें परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में असमर्थ बना देता है; तुम शैतान की इन चीजों के वश में हो गए हो, और परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम बना दिए गए हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहते हो, तो ये चीजें तुम्हारे भीतर सक्रिय हो जाएँगी और विघ्न डालेंगी, और तुमसे सत्य और परमेश्वर की माँगों का प्रतिरोध कराएंगी। भले ही तुम पारंपरिक संस्कृति के जुए से खुद को छुटकारा दिलाना चाहो, तुम ऐसा करने में शक्तिहीन होगे। कुछ समय संघर्ष करने के बाद, तुम समझौता कर लोगे। तुम मान लोगे कि नैतिकता की पारंपरिक धारणाएँ सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं, और इसलिए तुम परमेश्वर के वचनों को नकार दोगे या उन पर संदेह करोगे, परमेश्वर के वचनों को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करोगे, और इस बात की परवाह नहीं करोगे कि क्या तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो, यह महसूस करोगे कि आखिरकार तुम अभी भी इसी दुनिया में रहते हो, और इन चीजों पर निर्भर रहकर ही जीवन में आगे बढ़ सकते हो। जनमत की निंदा को सहन करने में असमर्थ होकर तुम सत्य और परमेश्वर के वचनों को छोड़ने का विकल्प चुनोगे और इसके बजाय पारंपरिक संस्कृति की नैतिकता की धारणाओं से चिपके रहोगे, शैतान के पक्ष में जाओगे और शैतान के साथ खड़े होओगे, सत्य को स्वीकार करने के बजाय परमेश्वर को नाराज करना पसंद करोगे। मुझे बताओ, क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों से उसे यह एहसास हुआ कि बचपन से ही वह इन पारंपरिक विचारों से प्रभावित रही है कि “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” और “बचपन में माँ-बाप पालते हैं, तो बुढ़ापे में सहारा देना बच्चों का फर्ज़ है।” वह सोचती थी कि चूँकि उसके माता-पिता ने उसे पालने में इतने साल मेहनत की है, इसलिए उसे उनके प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए और जब वे बूढ़े हो जाएँ तो उसे उनकी देखभाल करनी चाहिए और अंत में उन्हें विदा करना चाहिए, उसे लगता था कि अंतरात्मा होने का यही अर्थ है। इसलिए वह घर छोड़ने और अपना कर्तव्य निभाने में झिझक रही थी, उसे डर था कि उसे अकर्तव्यनिष्ठ संतान और अकृतज्ञ के रूप में कोसा जाएगा। अपनी सहयोगी को माता-पिता से मिलने घर लौटते देख लैन यू को ईर्ष्या हुई और अपने पिता के प्रति ऋणी होने की भावनाओं में डूबे रहने के कारण वह अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकी। उसे एहसास हुआ कि शैतान लोगों को गुमराह करने और नियंत्रित करने के लिए ठीक इन्हीं ऊपरी तौर पर सही लगने वाले विचारों और धारणाओं का उपयोग करता है, जिससे लोग केवल अपने माता-पिता की दया का एहसान चुकाने के बारे में सोचते हैं और सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य पूरे नहीं करते हैं। अगर वह इन पारंपरिक विचारों को पकड़े रहती, तो वह बस शैतान द्वारा मूर्ख बनाई जाती और नुकसान उठाती, और अंत में, वह परमेश्वर से दूर हो जाती, परमेश्वर को धोखा देती, और आखिरकार परमेश्वर द्वारा त्याग दी जाती। शैतान सचमुच बहुत ही कपटी और दुर्भावनापूर्ण है!

फिर लैन यू ने परमेश्वर के और वचन पढ़े और उसे अभ्यास के मार्ग मिल गए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “किसी भी स्थिति में, तुम्हें पाल-पोसकर तुम्हारे माता-पिता एक जिम्मेदारी और एक दायित्व निभा रहे हैं। तुम्हें पाल-पोस कर वयस्क बनाना उनका दायित्व और जिम्मेदारी है, और इसे दयालुता नहीं कहा जा सकता। चूँकि इसे दयालुता नहीं कहा जा सकता, तो क्या यह कहा जा सकता है कि यह कुछ ऐसी चीज है जिसका तुम्हें आनंद लेना चाहिए? (यह कहा जा सकता है।) यह एक प्रकार का अधिकार है जिसका तुम्हें आनंद लेना चाहिए। तुम्हें अपने माता-पिता द्वारा पाल-पोस कर बड़ा किया जाना चाहिए, क्योंकि वयस्क होने से पहले तुम्हारी भूमिका एक पाले-पोसे जा रहे बच्चे की होती है। इसलिए, तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे प्रति सिर्फ एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, और तुम बस इसे प्राप्त कर रहे हो, लेकिन निश्चित रूप से तुम उनसे अनुग्रह या दयालुता प्राप्त नहीं कर रहे हो। किसी भी जीवित प्राणी के लिए बच्चों को जन्म देकर उनकी देखभाल करना, प्रजनन करना और अगली पीढ़ी को बड़ा करना एक किस्म की जिम्मेदारी है। उदाहरण के लिए, पक्षी, गायें, भेड़ें और यहाँ तक कि बाघ भी प्रजनन के बाद अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। ऐसा कोई भी जीवित प्राणी नहीं है जो अपनी संतान को पाल-पोस कर बड़ा न करता हो। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वे हमारे लिए अज्ञात बने हुए हैं। जीवित प्राणियों के अस्तित्व में यह एक कुदरती घटना है, जीवित प्राणियों की यह सहजप्रवृत्ति है और इसका श्रेय दयालुता को नहीं दिया जा सकता है। वे बस उस विधि का पालन कर रहे हैं जो सृष्टिकर्ता ने जानवरों और मानवजाति के लिए स्थापित की है। इसलिए, तुम्हारे माता-पिता का तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा करना किसी प्रकार की दयालुता नहीं है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लेनदार नहीं हैं। वे तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं। वे तुम्हारे लिए अपने दिल का चाहे कितना ही खून खपाएँ और तुम पर कितना ही पैसा खर्च करें, उन्हें तुमसे इसकी भरपाई करने को नहीं कहना चाहिए, क्योंकि माता-पिता के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी है। चूँकि यह एक जिम्मेदारी और एक दायित्व है, यह निःशुल्क होना चाहिए और उन्हें तुमसे इसे चुकाने के लिए नहीं कहना चाहिए। तुम्हारा पालन-पोषण करके, तुम्हारे माता-पिता केवल अपनी जिम्मेदारी और दायित्व पूरा कर रहे हैं; यह निःशुल्क किया जाना चाहिए, लेन-देन के रूप में नहीं। इसलिए, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ पेश आने या अपने और उनके बीच के संबंध को सँभालने में एहसान चुकाने की मानसिकता रखने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम ऐसी मानसिकता के साथ अपने माता-पिता के साथ पेश आते हो, उन्हें प्रतिफल चुकाते हो और अपने और उनके बीच के संबंध को सँभालते हो, तो यह वास्तव में अमानवीय है। साथ ही, ऐसा करने से तुम अपनी दैहिक भावनाओं द्वारा नियंत्रित और बँधने के प्रति प्रवृत्त हो जाओगे और तुम्हारे लिए इन उलझनों से बाहर निकलना कठिन होगा, इस हद तक कि तुम अपना मार्ग भी खो सकते हो(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, वह समझ गई कि बच्चों को पालना माता-पिता की ज़िम्मेदारी का हिस्सा है और यह परमेश्वर द्वारा लोगों के लिए बनाया गया एक नियम और सिद्धांत है। उसके पिता ने उसे पाला-पोसा और उसे परमेश्वर के सामने लाए, और यह परमेश्वर द्वारा उन्हें दी गई ज़िम्मेदारी थी। उसे अपने माता-पिता के पालन-पोषण और शिक्षा को एक एहसान के रूप में नहीं देखना चाहिए, न ही उसे लगातार इसे चुकाने की कोशिश के बारे में सोचना चाहिए, बल्कि उसे इससे सटीक ढंग से पेश आना चाहिए। उसे यह भी एहसास हुआ कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसके माता-पिता और परिवार की व्यवस्था की थी, और यह परमेश्वर ही था जो उसकी देखभाल और सुरक्षा कर रहा था। उसने उन दिनों के बारे में सोचा जब वह 18 साल की थी। एक बार, काम के बाद घर जाते समय, उसकी मोटरसाइकिल सड़क किनारे मिट्टी के एक बड़े ढेर से टकरा गई। वह हवा में पूरी तरह पलटी खा बैठी और सड़क के बीच पीठ के बल गिरी, ठीक उसी समय एक बड़ा ट्रक आ रहा था। ड्राइवर ने पुरजोर ब्रेक लगाए और इससे पहले कि उसे कुचल पाता उससे चंद फुट पहले गाड़ी रोक दी। उस जीवन और मृत्यु के क्षण में, भले ही उसके माता-पिता उसके पास होते, वे उसकी रक्षा नहीं कर पाते। पर्दे के पीछे से, यह परमेश्वर ही था जिसने उसे सुरक्षित रखा, जिससे वह बच सकी। उसने जेल में बिताए सालों के बारे में भी सोचा। उसके पिता केवल उसके लिए चिंता कर सकते थे, लेकिन वह कुछ भी करने में असहाय थे। जब भी वह नकारात्मक और कमज़ोर महसूस करती तो वह परमेश्वर के वचनों के भजनों को याद करती थी और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के जरिए उसने परमेश्वर के इरादों को समझा और आस्था प्राप्त की। उसने अनुभव किया कि एकमात्र परमेश्वर ही उसका सच्चा सहारा है और वह जिस एक की सर्वाधिक ऋणी है वह परमेश्वर है और उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का एहसान चुकाने के लिए अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए। अगर वह अपना कर्तव्य निभाए बिना केवल अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने के बारे में सोचेगी तो यह एक ऐसे व्यक्ति का व्यवहार होगा जिसमें मानवता का अभाव है। ये चीजें समझने के बाद उसे अभ्यास का एक स्पष्ट मार्ग मिल गया और वह परमेश्वर के दिल को दिलासा देने के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने को तैयार हो गई।

देखते ही देखते, उसे अपने पिता को देखे हुए लगभग दो साल बीत चुके थे। उसे कभी-कभी उनके पत्र मिलते थे, जिनमें वह बताते थे कि पुलिस अभी भी उन्हें परेशान कर रही है, कि वह बीमार थे और दवा ले रहे थे और कभी-कभी वह नकारात्मक, खोया हुआ और अकेला महसूस करते थे। ये चीजें पढ़कर वह अपने पिता को लेकर थोड़ी-सी परेशान और चिंतित हो जाती थी, लेकिन तब वह परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचती थी : “तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर के हाथों में हैं, तो फिर अभी भी चिंता करने के लिए क्या रह गया है? किसी को जो भी चिंताएँ हों, अनावश्यक हैं। प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के अनुसार अंत तक सुगम जीवन जिएगा, बिना किसी भटकाव के अपने पथ के अंत तक पहुँचेगा। इसलिए लोगों को अब इस मामले में चिंता करते रहने की कोई जरूरत नहीं है। तुम संतानोचित हो या नहीं, तुमने अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हों या नहीं, या क्या तुम्हें अपने माता-पिता की दयालुता का कर्ज चुकाना चाहिए—ये वे चीजें नहीं हैं जिनके बारे में तुम्हें सोचना चाहिए; ये वे चीजें हैं जिन्हें तुम्हें त्याग देना चाहिए(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (16))। वह समझ गई कि उसके पिता भी परमेश्वर के हाथों में हैं, कि उन्हें जिन भी परिस्थितियों का अनुभव करना है उन सबकी व्यवस्था परमेश्वर द्वारा की गई है और परमेश्वर जिस चीज की व्यवस्था करता है वह हमेशा उपयुक्त होती है। लैन यू ने सोचा कि कैसे जब वह घर पर थी तो उसके पिता पित्ताशय के गंभीर दर्द से पीड़ित थे, लेकिन दुखी महसूस करने के बावजूद वह मदद के लिए कुछ भी नहीं कर पाई। वह केवल अपने पिता को दवा लेने की याद दिला पाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाई। उसने यह भी सोचा कि कैसे उसके पिता नकारात्मक और कमज़ोर थे, यहाँ तक कि आत्महत्या करना चाहते थे, और जब वह उनके पास नहीं थी, तो यह परमेश्वर ही था जिसने उन्हें प्रबुद्ध किया और परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए उनका मार्गदर्शन किया। परमेश्वर के वचनों ने ही उनका मार्गदर्शन किया और उन्हें इन परिस्थितियों का सामना करने की आस्था दी। उसने देखा कि परमेश्वर हमेशा पर्दे के पीछे से लोगों की देखभाल और सुरक्षा कर रहा है, कि उसकी अपनी चिंताएँ अनावश्यक थीं और उसे अपने पिता को परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और बस अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जब उसने इस तरीके से सोचा तो वह अपने पिता को लेकर अपनी चिंताएँ और परेशानियाँ त्याग पाई। जब भी उसके पास समय होता, वह अपने पिता को पत्र लिखती, अपनी दशा के बारे में बात करती, अपनी नई अंतर्दृष्टियों और लाभों को साझा करती थी और जब उसके पिता की दशा खराब होती तो वह उनके साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति करती थी। लैन यू अब अपने पिता के प्रति ऋणी महसूस करने की दशा में नहीं डूबी रहती थी; वह अपने दिल को शांत करने और अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम थी। उसने दिल की गहराइयों से परमेश्वर को उसके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद दिया!

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