स्कूल में सुसमाचार सुनाने का मेरा अनुभव

21 अप्रैल, 2023

जोना, म्यांमार

मैं उत्तरी म्यांमार के एक साधारण परिवार में जन्मा। दिसंबर 2018 में, मैंने अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य स्वीकार किया और पढ़ाई के दौरान सभाओं में जाने लगा। 2021 में ग्रेजुएट होने के बाद मुझे सुदूर पहाड़ी इलाके में पढ़ाने का काम सौंपा गया। मैं शिक्षक होने के साथ-साथ एक सिपाही भी था। अपने हर काम में मुझे अपने वरिष्ठों का हुक्म मानना होता था। वरना, मुझे सबसे खतरनाक और सुदूर इलाके के जंगल में सरहद पर भेज दिया जाता। अपने वरिष्ठों की बातें गाँठ बाँधकर मैं पूरी लगन से पढ़ाने लगा। मेरा अच्छा सलूक देखकर स्कूल के अगुआ ने मुझे छात्र संघ की निगरानी सौंप दी। मैं दिन भर काम में लगा रहता, लेकिन अंदर से खालीपन कचोटता था। उस इलाके में इंटरनेट कनेक्शन भी बहुत खराब था इसलिए दूसरों के साथ सभा करने का कोई तरीका नहीं था। मैं ठीक महामारी शुरू होते ही यहाँ आया था, सभी शहर और सड़कें बंद होने के कारण, पूरे सत्र के दौरान दूसरों से मेरा संपर्क टूटा रहा। मैं दूसरों के संपर्क में नहीं था, फिर भी प्रार्थना करके परमेश्वर के वचन तो पढ़ ही रहा था। एक बार परमेश्वर के वचनों के एक अंश ने मुझे सचमुच प्रेरित किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? ... क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दुःख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति को विष देकर पीड़ित किया गया है। यद्यपि मनुष्य आज तक जीवित है, लेकिन कौन यह जान सकता था कि उसे लंबे समय से दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि शिकार हुए लोगों में से तू भी एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपना सारा ज़ोर लगाने को तैयार नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धर्म-परायण, परमेश्वर-सेवी जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का संकल्प और विश्वास है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं मानवजाति को बचाने की उसकी त्वरित इच्छा को समझ गया। वह चाहता है कि और अधिक सच्चे विश्वासी उसका उद्धार हासिल कर सकें। यह उसकी सबसे जरूरी इच्छा है। विश्वासी होने के नाते, परमेश्वर का सुसमाचार फैलाना मेरा दायित्व है। सृजित प्राणी के रूप में यह मेरा कर्तव्य है। मैं करीब तीन साल से विश्वासी था, मैं परमेश्वर के वचन खा-पीकर थोड़ा-सा सत्य समझने लगा था। अपने काम और कमजोर इंटरनेट के कारण मैं सामान्य रूप से सभा नहीं कर सकता था, फिर भी सुसमाचार फैला सकता था। अंत के दिनों में परमेश्वर का उद्धार स्वीकारने के लिए मैं उसकी शरण में और ज्यादा लोगों को ला सकता था। आपदाएँ बढ़ रही हैं और महामारी पूरे जोर पर है, फिर भी इतने सारे लोग अभी तक न तो परमेश्वर की वाणी सुन पाए हैं, न उसका उद्धार पा सके हैं, जिससे परमेश्वर दुखी और परेशान है। मैं अपनी अंतरात्मा को ताक पर नहीं रख सकता। मुझे सुसमाचार साझा करने ही थे, परमेश्वर पर विश्वास करने वाले अच्छी मानवता वाले लोगों को उसकी शरण में लाना था, और उसे संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य निभाना था। लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद और सत्य की समझ, दोनों ही सीमित थे, मैं नहीं जानता था कि प्रचार कैसे करते हैं। मैं इच्छुक था पर सक्षम नहीं था। इसलिए मैंने प्रार्थना की : “हे परमेश्वर! मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मैं प्रचार करना भी नहीं जानता। सच्चे विश्वासी लोगों को तुम्हारी शरण में लाने के लिए मुझे रास्ता दिखाओ। मैं जानता हूँ, सुसमाचार का प्रचार कोई सरल काम नहीं है, लेकिन तुम्हारा मार्गदर्शन पाकर मैं उन्हें तुम्हारी शरण में ला सकता हूँ।”

उसके बाद मैंने अपने साथियों और छात्रों को सुसमाचार सुनाने की योजना बनाई। लेकिन उस समय मैं दुविधा में घिर गया। क्योंकि मेरे वरिष्ठों ने मुझसे कहा था, मैं एक शिक्षक और सिपाही हूँ, इसलिए मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जो पढ़ाने से हटकर हो, और अगर मुझे पकड़ लिया गया तो सरहद पर भेज दिया जाऊँगा, जहाँ आए दिन संघर्ष और आतंकी हमले होते रहते हैं और किसी भी पल मेरी मौत हो सकती है। मैंने यह भी सुना कि स्कूल का पिछला प्रिंसिपल एक ईसाई था और छात्रों में प्रचार करने के कारण वरिष्ठों ने उसका तबादला दूसरे स्कूल में कर दिया, उसका कद घटाकर सामान्य शिक्षक बना दिया, और अगर उसने फिर से नियम तोड़े तो सरहद पर भेज दिया जाएगा। यह सब सोचते हुए मैं थोड़ा घबराया। मैंने सोचा : “पद से हटा दिए जाने के बाद प्रिंसिपल अब भी पढ़ा ले रहा है, लेकिन मैं तो महज एक साधारण शिक्षक हूँ। उन्होंने मुझे प्रचार करते देख लिया तो सीधे सरहद पर भेज देंगे और शिक्षक बनने का दूसरा मौका नहीं देंगे। नौकरी जाने की बात तो मैं संभाल लूँगा; असली समस्या यह है कि ऐसी खतरनाक जगह किसी भी पल मेरी मौत हो सकती है।” इन ख्यालों ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं स्कूल में प्रचार ही नहीं कर सका। लेकिन मैंने सोचा कि परमेश्वर का कार्य कैसे अंत के करीब है, कैसे आपदाएँ बढ़ रही हैं, और अगर मैं प्रचार करके अपने सहकर्मियों, दोस्तों और छात्रों को परमेश्वर की शरण में न लाया, तो वे एक दिन आपदा में घिर जाएँगे, दंडित होंगे और बचाए जाने का मौका खो बैठेंगे। परमेश्वर की त्वरित इच्छा यह है कि राज्य के सुसमाचार का प्रचार हो और जिन्हें बचाया जा सकता है वे बचाए जाएँ, लेकिन मैं तो बस अपने भविष्य और अपनी किस्मत को लेकर परेशान था, और इतना डरपोक था कि अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रचार नहीं कर पाया। मैं सचमुच परमेश्वर को नीचा दिखा रहा था! मैं बहुत उलझन में था। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े जिनसे मुझे आस्था मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “तुम्हें किसी भी चीज़ से भयभीत नहीं होना चाहिए; चाहे तुम्हें कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करना पड़े, तुम किसी भी चीज़ से बाधित हुए बिना, मेरे सम्मुख स्थिर रहने के काबिल हो, ताकि मेरी इच्छा बेरोक-टोक पूरी हो सके। यह तुम्हारा कर्तव्य है...। तुम्हें सबकुछ सहना होगा; मेरे लिए, तुम्हें अपनी हर चीज़ का त्याग करने को तैयार रहना होगा, और मेरा अनुसरण करने के लिए सबकुछ करना होगा, अपना सर्वस्व व्यय करने के लिए तैयार रहना होगा। अब वह समय है जब मैं तुम्हें परखूंगा : क्या तुम अपनी निष्ठा मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम ईमानदारी से मार्ग के अंत तक मेरे पीछे चलोगे? डरो मत; मेरी सहायता के होते हुए, कौन इस मार्ग में बाधा डाल सकता है? यह स्मरण रखो! इस बात को भूलो मत! जो कुछ घटित होता है वह मेरी नेक इच्छा से होता है और सबकुछ मेरी निगाह में है। क्या तुम्हारा हर शब्द व कार्य मेरे वचन के अनुसार हो सकता है? जब तुम्हारी अग्नि परीक्षा होती है, तब क्या तुम घुटने टेक कर पुकारोगे? या दुबक कर आगे बढ़ने में असमर्थ होगे?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। “परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, तुमसे जो कार्य अपेक्षित है उसे अपने पूरे दिलो-दिमाग और ताकत के साथ करना चाहिए। बाकी चीजें—संभावनाओं और भाग्य, और मानवजाति के भावी गंतव्य से संबंधित चीजें—ऐसी चीजें नहीं है जिन्हें तुम तय कर सको, वे परमेश्वर के हाथों में हैं, यह सब सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित और व्यवस्थित किया जाता है, और इसका परमेश्वर के किसी भी प्राणी के साथ कुछ लेना-देना नहीं है। ... तुम्हें एक तथ्य स्वीकार करना चाहिए : चाहे वह किसी भी तरह का वादा हो, चाहे वह अच्छा हो या साधारण, चाहे वह सुखद हो या अरुचिकर, सब सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित, व्यवस्थित और निर्धारित किया जाता है। केवल सृष्टिकर्ता द्वारा इंगित सही दिशा और मार्ग का अनुगमन और अनुसरण करना ही परमेश्वर के प्राणी का कर्तव्य और दायित्व है। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि अंततः तुम्हें क्या प्राप्त होता है, और परमेश्वर के किन वादों में से तुम्हें हिस्सा मिलता है, यह सब तुम्हारे अनुसरण पर, तुम्हारे द्वारा लिए जाने वाले मार्ग पर और सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित व्यवस्था पर आधारित है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग नौ))। परमेश्वर के वचन साफ कह रहे थे कि डरो मत, हर चीज परमेश्वर के हाथ में है। मैं शिक्षक बना रहूँगा या सरहद पर भेज दिया जाऊँगा, यह सिर्फ परमेश्वर के हाथ में है। यह प्रिंसिपल या अगुआओं के हाथ में नहीं है। मुझे परमेश्वर पर आस्था बनाए रखनी थी। जब तक परमेश्वर का साथ है, मुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं, चाहे सुसमाचार का प्रचार कितना ही कठिन हो। मैं हमेशा डरता था कि जैसे ही स्कूल को पता चलेगा कि मैं प्रचार करता हूँ, मुझे सरहद पर भेज दिया जाएगा, और मैं भयंकर खतरे में पड़ जाऊँगा, इसलिए मैंने सुसमाचार के प्रचार का साहस नहीं किया। परमेश्वर में मेरी आस्था बिल्कुल नहीं थी। इन वचनों ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया : “तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, तुमसे जो कार्य अपेक्षित है उसे अपने पूरे दिलो-दिमाग और ताकत के साथ करना चाहिए। बाकी चीजें—संभावनाओं और भाग्य, और मानवजाति के भावी गंतव्य से संबंधित चीजें—ऐसी चीजें नहीं है जिन्हें तुम तय कर सको, वे परमेश्वर के हाथों में हैं, यह सब सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित और व्यवस्थित किया जाता है, और इसका परमेश्वर के किसी भी प्राणी के साथ कुछ लेना-देना नहीं है।” इनसे मुझे काफी प्रेरणा मिली। सृजित प्राणी होने के नाते, मुझे अपना कर्तव्य दिल से निभाना चाहिए। मेरी नौकरी का चाहे जो हो, मुझे सरहद पर भेजा जाए या मौत के खतरे में डाला जाए, ये सारी चीजें सृष्टि के प्रभु के हुक्म से चलती हैं। मैं इस चिंता में रहता था कि अगर प्रचार करते पकड़ा गया तो मुझे सरहद पर भेज दिया जाएगा, क्योंकि मैं परमेश्वर की सर्वशक्तिमान संप्रभुता को नहीं समझता था, मानो अगुआ मेरी किस्मत का फैसला कर सकते हों। मैं बहुत बड़ा मूर्ख था। आपदाएँ और महामारी दोनों ही विकराल हो रही हैं और अब गँवाने के लिए वक्त नहीं बचा है। अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य हासिल करके मैं काफी खुशकिस्मत था, लेकिन अपने आस-पास इसका प्रचार नहीं कर रहा था। मैं लोगों का कर्जदार था और परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा था, मेरी अंतरात्मा को चैन नहीं मिल रहा था। इन चीजों का एहसास होने पर मुझे आस्था मिली। मैं अपनी चिंताओं को परे हटाकर कर्तव्य निभाना चाहता था—सुसमाचार का प्रचार करना और परमेश्वर की गवाही देना चाहता था।

बाद में मैंने सोचा, “सरहद पर भेजने का इतना खौफ क्यों है कि मैं अपना कर्तव्य निभाने का साहस भी नहीं कर पा रहा हूँ? आखिर मैं किस बात से बेबस हूँ?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा। “परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के बीच अपने खुद के प्रबंधन का संचालन करता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का प्रयास करता है, उसी समय कैसे वह अपनी आदर्श मंज़िल का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रच रहा होता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंज़िल कैसे प्राप्त किए जाएँ। यहाँ तक कि अगर कोई समझता भी है कि वह कितना दयनीय, घृणास्पद और दीन-हीन है, तो भी ऐसे कितने लोग अपने आदर्शों और आशाओं को तत्परता से छोड़ सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और केवल अपने बारे में सोचना बंद कर सकने में सक्षम हैं? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की ज़रूरत है, जो अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य में अर्पित कर उसके प्रति समर्पित होंगे। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है, जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं, और उनकी तो बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है, जो थोड़ा-सा देते हैं और फिर पुरस्कृत होने का इंतज़ार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है, जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है, जो उसके प्रबंधन-कार्य से नाराज़ रहते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक घृणा करता है, जो उसके द्वारा मानवजाति के बचाव के लिए किए जा रहे कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ उठाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन-कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की परवाह नहीं करते, और पूरी तरह से अपनी संभावनाओं और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से कुढ़ते हैं और इस बात में ज़रा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसकी क्या मर्ज़ी है, वे केवल वही कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा लगता है और उनका तरीका परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से अलग-थलग है। उनके व्यवहार को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है—परमेश्वर द्वारा उसे कृपापूर्वक देखे जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3: मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके मुझे एहसास हुआ कि अपनी नियति को लेकर मेरी चिंता ही प्रचार से डरने की मुख्य वजह थी। मैं डरता था कि प्रचार करते मिला तो अगुआ मुझे सरहद पर भेज देंगे, अगर ऐसा हुआ तो मैं न सभाएँ कर पाऊँगा, न परमेश्वर के वचन पढ़ पाऊँगा, यही नहीं मुझे बंदूक लेकर जंगलों की गश्त करते दिन काटने पड़ेंगे। यह इलाका संघर्ष और आतंकवाद से ग्रस्त था, अगर वहाँ कोई चूक हो गई तो मेरी मौत भी संभव है, फिर मैं अपने बचाए जाने का अवसर हमेशा के लिए खो दूँगा। मैंने देखा कि मैं आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास रखता हूँ, सत्य का अनुसरण करने या सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए नहीं। मेरा विश्वास और कर्तव्य मेरे अपने हितों की खातिर था। मैं वही चीजें करना चाहता था जिनसे मुझे आशीष मिलेगी, बाकी नहीं। यह किसी बॉस और कामगार के रिश्ते जैसा था—फायदेमंद और लेनदेन वाला, जिसमें परमेश्वर के लिए कोई प्रेम या चिंता नहीं थी। मैं बहुत स्वार्थी और घिनौना था। मैं परमेश्वर पर विश्वास करता था लेकिन रत्ती भर भी कष्ट या कठिनाई सह नहीं सकता था। मुझे लगता था कि सुकून से परमेश्वर के वचन पढ़ना और नाच-गाकर उसकी स्तुति करना काफी है, लेकिन मेरा यह विश्वास मुझे कभी भी परमेश्वर के वचनों को सचमुच अनुभव करने या समझने, अपने भ्रष्ट स्वभाव को पहचानने या उद्धार पाने की ओर नहीं ले जाता। हमारी आस्था में, परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी इच्छा का ख्याल रखें, उससे प्रेम करें और उसकी गवाही दें। हालात चाहे जो हों, हम सदा सत्य खोजें, परमेश्वर के प्रति समर्पित रहें, परमेश्वर का भय मानें और बुराई से दूर रहें, केवल तभी हम उद्धार पा सकते हैं। आशीष पाने की मेरी कोशिश परमेश्वर की इच्छा से मेल नहीं खाती थी और उसकी अपेक्षाओं से बहुत ही दूर थी। विश्वासी होने के नाते मुझे परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी आज्ञा मानने की कोशिश करनी चाहिए और अंत के दिनों में उसके कार्य की गवाही देने के लिए खुद को समर्पित कर देना चाहिए। सिर्फ यही उचित और सार्थक है। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि मैं अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचता रहूँगा। मुझे अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार के कार्य को फैलाना था और इसकी गवाही देनी थी।

मैंने सहकर्मियों के बीच प्रचार से शुरुआत की, लेकिन उन्हें परमेश्वर पर विश्वास का विरोध करते देखकर, मैं अपने छात्रों के बीच प्रचार करने लगा। मैं रोज कक्षा के बाद उन्हें परमेश्वर के वचन सुनाता, जैसे, “परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है,” “परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है,” और मैं परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य जैसी चीजों के बारे में बताता। वे वाकई उत्सुक होकर सुनते। परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण, एक महीने के भीतर ही मैंने स्कूल के 50 से ज्यादा लोगों का मत बदल दिया। इससे मेरा विश्वास और बढ़ गया। मैंने देखा कि ये छात्र, सभा करने के लिए उत्सुक थे और उनकी समझ अच्छी थी, इसलिए मैंने और भी ज्यादा भरोसे के साथ परमेश्वर का प्रचार किया और उसकी गवाही दी। अब मैं उतना घबराया या डरा हुआ नहीं रहता था क्योंकि मैं जानता था कि परमेश्वर मेरे साथ है और उसके इन वचनों का अर्थ भी अच्छे से समझता था : “तुम्हें विश्वास होना ही चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है और मनुष्य तो बस उसके साथ सहयोग भर कर रहे हैं। अगर तेरा दिल सच्चा है, तो परमेश्वर इसे देखेगा, और वह तेरे लिए सभी मार्ग खोल देगा, मुश्किलों को आसान बनाएगा। यह विश्वास तुझमें होना ही चाहिए। इसलिए, अपना कर्तव्य निभाते समय तुम लोगों को तब तक किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, जब तक तुम लोग अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करते हो और इसमें अपना पूरा दिल लगाते हो। परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन नहीं बनाएगा या तुम्हें वह करने के लिए मज़बूर नहीं करेगा जिसकी क्षमता तुममें नहीं है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है)। परमेश्वर हमें बताता है कि जब तक हम ईमानदारी से उसके साथ सहयोग करेंगे, वह हमारे लिए रास्ता खोलेगा। मुझे इतनी चिंता करने की जरूरत ही नहीं थी। मुझे बस अपना भरसक प्रयास करना था, अपना सब कुछ झोंकना था और परमेश्वर पर भरोसा रखते हुए काम करना था। परमेश्वर हमसे जो कुछ चाहता है वह हमारी पहुँच में होता है, यह हमारे आध्यात्मिक कद से परे नहीं होता।

जैसे-जैसे ज्यादा से ज्यादा छात्रों ने अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य स्वीकारा, शैतानी शक्तियाँ दखल देने लगीं। स्कूल के छात्र एक अल्पसंख्यक जाति समूह से थे जो बौद्ध धर्म में विश्वास रखते थे, इसलिए वे हमेशा से बौद्ध थे। कुछ छात्रों ने मुझे बताया कि उनके माता-पिता ने उन्हें विश्वास रखने से मना किया है। एक छात्रा ने बताया कि उसके माता-पिता ने तो उसे चेतावनी तक दे दी कि अगर उसे दुबारा परमेश्वर पर विश्वास रखते देख लिया तो उसे घर से निकाल देंगे और उसे अपनी बेटी नहीं मानेंगे। काफी छात्र नहीं जानते थे कि अब क्या करें। उस समय मुझे चिंता हुई कि कहीं वे अपने घर में अत्याचार सहकर निराश और कमजोर न हो जाएं या आस्था जारी रखने में असमर्थ होकर इसे छोड़ न दें। मैं बेहद परेशान हो गया, जानता ही नहीं था कि क्या करना चाहिए। परमेश्वर का कार्य जल्द ही खत्म हो जाएगा। अगर उन्होंने विश्वास रखना छोड़ दिया तो वे परमेश्वर का उद्धार खो बैठेंगे। मैं परमेश्वर के सामने क्या हिसाब दूँगा? मैंने अपने दिन प्रार्थना करते हुए और परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगते हुए बिताए। बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े। “जब परमेश्वर कार्य करता है, किसी की देखभाल करता है, उस पर नजर रखता है, और जब वह उस व्यक्ति पर अनुग्रह करता और उसे स्वीकृति देता है, तब शैतान करीब से उसका पीछा करता है, उस व्यक्ति को धोखा देने और नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है। अगर परमेश्वर इस व्यक्ति को पाना चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को भ्रमित, बाधित और खराब करने के लिए विभिन्न बुरे हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; परमेश्वर जिन्हें पाना चाहता है, वह उनकी संपत्ति छीन लेना चाहता है, वह उन पर नियंत्रण करना, उनको अपने अधिकार में लेना चाहता है, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है? ... परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का उद्देश्य उस समस्त कार्य को नष्ट करना है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है; उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है; उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। यदि वे मिटाए नहीं जाते, तो वे शैतान द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV)। परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार कर मैंने समझा कि जब वह इंसान को बचाने का कार्य करता है, तो पीछे-पीछे शैतान इंसान को भ्रष्ट बनाकर और नुकसान पहुँचाकर परमेश्वर का कार्य बिगाड़ता रहता है। यह शैतान के बुरे सार से तय होता है। हम लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर का प्रचार कर उसकी गवाही देते हैं, लेकिन शैतान को यह बर्दाश्त नहीं होता। शैतान परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने के इरादे से हमें रोकने और परेशान करने की कोशिश करता रहता है, जिससे हम परमेश्वर से दूर होकर उसके साथ विश्वासघात करते हैं। तब हम उसका उद्धार खो देते हैं, और शैतान के साथ नरक में चले जाते हैं। मुझे शैतान की चालें समझकर उसके जाल में फँसने से बचना था। इन बातों का बोध होने पर मैंने भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचन पढ़े ताकि उन्हें सत्य समझा सकूँ और शैतानी चालें दिखा सकूँ। मैंने उनके साथ संगति की : “क्या तुम जानते हो कि जब हम परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं तो इतनी बाधाएँ क्यों आती हैं? क्योंकि हम हमेशा से शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहते आए हैं, लेकिन अब जबकि हम परमेश्वर पर विश्वास रख उसका उद्धार स्वीकारते हैं, और उसके वचन सुनते हैं, तो हम शैतान की पूजा नहीं करते हैं। शैतान नहीं चाहता कि परमेश्वर हमें बचाए, इसलिए वह हमारे आस-पास के लोगों का इस्तेमाल कर हमें सताता है, हमें सच्चे परमेश्वर पर विश्वास रखने से रोकना, हमें दुबारा अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर भ्रष्ट करना, और नुकसान पहुँचाना चाहता है, ताकि हम परमेश्वर के हाथों बचाए जाने का मौका खो दें। इसलिए हम शैतान की चालों में नहीं आ सकते।” मैंने बाद में उनके साथ इन सच्चाइयों पर संगति की “सच्चे और नकली परमेश्वरों में अंतर,” “बौद्ध धर्म कहाँ से आता है,” और “केवल एक ही सच्चा परमेश्वर है।” मेरी संगति के बाद एक भाई ने कहा : “मैं अब समझा कि जैसे ही हम परमेश्वर पर विश्वास रख उसका कार्य स्वीकारते हैं, तो शैतान की पूजा न करने के कारण वह हमें रोकता और सताता है और हमें परमेश्वर पर विश्वास रखने और सही रास्ते पर चलने से रोकने की भरसक कोशिश करता है। हममें विवेक होना चाहिए, हम शैतान के जाल में हरगिज नहीं फँस सकते।” एक बहन ने कहा : “अब मैं समझ गई हूँ कि कौन सच्चा परमेश्वर है और कौन नकली परमेश्वर हैं। केवल सच्चा परमेश्वर ही स्वर्ग, धरती, सभी चीजों और मानवजाति को रचने में सक्षम है। उसने सब कुछ रचा ही नहीं है; बल्कि इन पर शासन भी करता है। वह हमें भरपूर दो जून की रोटी भी देता है। कोई झूठा परमेश्वर छोटी-सी चींटी भी नहीं बना सकता, स्वर्ग-धरती और बाकी चीजें तो छोड़ ही दें, इसलिए हमें उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए।” भाई-बहनों के मुँह से यह सुनकर मैं वाकई भावुक हो गया। शैतान के खिलाफ आध्यात्मिक लड़ाई में, वे परमेश्वर के वचनों के जरिए सत्य समझ चुके थे और शैतानी चालें भी पहचान चुके थे। उनमें से किसी को कोई भ्रम नहीं था। बल्कि, वे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए मन और भी पक्का कर चुके थे। यह सब परमेश्वर के वचन से हासिल हुआ। तब परमेश्वर पर मेरा विश्वास और भी गहरा हो गया।

एक बार तो प्रिंसिपल मुझ पर टूट ही पड़ा। उसने कहा : “जोना, मेरी बात सुनो। तुम्हें तीसरी बार बुलाना पड़ा है। तुम सब कुछ जानते हो, मुझे दोहराने को मजबूर मत करो। तुम काफी मशहूर हो गए हो। मीलों दूर के लोग भी जानते हैं कि तुम स्कूल में प्रचार कर रहे हो! हमसे शिक्षक होने और छात्रों को ज्ञान बाँटने की अपेक्षा की जाती है, तो फिर तुम परमेश्वर का विश्वास क्यों बाँट रहे हो? यहाँ सारे गाँव वाले बौद्ध हैं। हमें उनके रीति-रिवाजों के अनुसार चलना है और उन्हें उन्हीं की आस्था पढ़ानी है। तुम्हारे इस तरह प्रचार करने से हमारे स्कूल पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है—क्या तुम हमारी इज्जत धूल में मिलाने पर तुले हो? क्या तुम चाहते हो कि छात्र और उनके परिवार वाले तुम्हें अवमानना का दोषी ठहराएँ? तुम जो कर रहे हो वह गैर-पेशेवर और अनैतिक है! तुम शिक्षक होने लायक नहीं हो! अगर तुम अब भी नहीं जागे तो सत्र के अंत में तुम्हारा तबादला कर दिया जाएगा!” मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं जानता था कि ये शब्द उस राक्षस शैतान के हैं। वह लोगों को अपना पिछलग्गू बनाना चाहता था, उन्हें परमेश्वर की आराधना करने नहीं देना चाहता था। परमेश्वर में आस्था सबसे धार्मिक चीज है, लेकिन उसकी नजरों में यह बुराई थी। मैंने देखा कि ये राक्षस तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर बताते हैं और सही-गलत का भेद नहीं कर सकते। डॉर्मिटरी में लौटकर मैं बहुत परेशान रहा। मैं नहीं जानता था कि आगे क्या होगा और अवचेतन में मैं अपने भविष्य को लेकर दुबारा सोचने लगा। अगर वाकई मेरा तबादला हो गया तो क्या होगा? क्या मुझे सरहद पर भेज दिया जाएगा? मैं सरहद पर भयंकर स्थिति का सामना कैसे करूँगा? मैं परमेश्वर पर विश्वास कैसे रख पाऊँगा? क्या मैं अब भी बचाया जा सकता हूँ? ... इन ख्यालों से मेरी आँखें भर आईं। उस रात नींद बिल्कुल नहीं आई। सारी रात मेज के पास बैठा रहा, बार-बार प्रार्थना करता रहा : “हे परमेश्वर, इस स्थिति में मैं डर क्यों रहा हूँ?” मैंने लोगों को भ्रष्ट करने वाले उन शैतानी तरीकों के बारे में सोचा जो परमेश्वर के वचनों में बताए गए हैं। परमेश्वर कहते हैं, “पहला है नियंत्रण और जोर-जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियंत्रित करने के लिए शैतान हर संभव कार्य करता है। ‘जोर-जबरदस्ती’ का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपनी बात मनवाने के लिए धमकी और बल की युक्तियों का इस्तेमाल करना, और बात न मानने के परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम डर जाते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते, इसलिए उसके आगे समर्पण कर देते हो(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों के बारे में सोच-विचार कर, मुझे शैतान के कुरूप चेहरे की कुछ और समझ मिली। शैतान जानता था कि मैं सरहद पर भेजे जाने से डरता था, जहाँ मैं हमेशा मौत के साये में रहूँगा। मौत का यह डर मेरा घातक दोष था, मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी। शैतान मुझे परेशान करने के लिए प्रिंसिपल का और धमकाने के लिए तबादले की संभावना का इस्तेमाल कर रहा था, ताकि मैं शैतान के आगे घुटने टेककर समझौता कर लूँ और अपना कर्तव्य छोड़ कर कभी परमेश्वर की गवाही न दूँ। ऐसा लगा कि प्रिंसिपल मेरे भले के लिए सबसे अच्छा सोच रहा था, लेकिन हकीकत में वह प्रचार से रोकने के लिए मुझे डरा रहा था ताकि अपनी प्रतिष्ठा बचा सके। वह मुझे परमेश्वर का उद्धार का सुसमाचार फैलाने नहीं दे रहा था और चाहता था कि मैं शैतान के तरीकों का प्रचार कर उसके साथ मिल जाऊँ। मैंने प्रिंसिपल का निहायत दुष्ट चेहरा देखा। मैं अच्छे-बुरे का भेद समझकर जान चुका था कि ये शैतानी चालें हैं। मैं जानता था कि प्रचार के दौरान मैं खुद को इतना बेबस क्यों पाता था। इसकी वजह यह है कि मैं मौत से बहुत डरता था। मैं डरता था कि अगर सीमा की सुरक्षा करने के लिए सरहद पर भेज दिया गया तो किसी भी पल मारा जा सकता हूँ, उससे भी ज्यादा यह डर था कि मौत के बाद परमेश्वर पर विश्वास रखने या बचा लिए जाने का उपाय नहीं बचेगा, लिहाजा मैंने निराश होकर कदम पीछे खींच लिए।

इसके बाद मैंने परमेश्वर के सामने प्रार्थना में अपनी स्थिति बयान की और उससे मृत्यु के भय से उबरने के लिए मार्गदर्शन माँगा। मैंने बाद में परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ा। “प्रभु यीशु के उन अनुयायियों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे अनुयायी थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—हर प्रकार की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या उन्हें उनके अपराधों के लिए कानूनी तौर पर फाँसी दी गई थी? नहीं। उनकी भर्त्सना की गई, पीटा गया, डाँटा-फटकारा गया और मार डाला गया, क्योंकि उन्होंने प्रभु का सुसमाचार फैलाया था और उन्हें इस संसार के लोगों ने ठुकरा दिया था—इस तरह वे शहीद हुए। ... उनकी मृत्यु और प्रस्थान का माध्यम चाहे जैसा रहा हो, यह वैसा नहीं था जैसे परमेश्वर ने उनके जीवन को, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम को परिभाषित किया था। तुम्हें यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, उन्होंने इस संसार की भर्त्सना करने और परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए ठीक उन्हीं साधनों का उपयोग किया। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए उपयोग किया, और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है, और परमेश्वर का देहधारी शरीर है; यहां तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं छोड़ा। क्या यह इस संसार के ऊपर न्याय का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग किया, संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए, मानव प्राणियों के समक्ष यह पुष्टि करने के लिए कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है, समस्त मानवजाति के लिए उसने जो छुटकारे का कार्य गढ़ा, उसी के कारण मानवता जीवित है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार को फैलाने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपने कर्तव्य का पालन किया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई। परिवार, सम्पदा, और इस जीवन की भौतिक वस्तुएँ, सभी बाहरी उपादान हैं; अंतर्मन की एकमात्र चीज जीवन है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के लिए, जीवन सर्वाधिक सहेजने योग्य है, सर्वाधिक बहुमूल्य है, और असल में कहा जाए तो ये लोग मानव-जाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम की पुष्टि और गवाही के रूप में, अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य चीज अर्पित कर पाए, और वह चीज है—जीवन। अपनी मृत्यु के दिन तक उन्होंने परमेश्वर का नाम नहीं छोड़ा, न ही परमेश्वर के कार्य को नकारा, और उन्होंने जीवन के अपने अंतिम क्षण का उपयोग इस तथ्य के अस्तित्व की गवाही देने के लिए किया—क्या यह गवाही का सर्वोच्च रूप नहीं है? यह अपना कर्तव्य निभाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है; अपना उत्तरदायित्व इसी तरह पूरा किया जाता है। जब शैतान ने उन्हें धमकाया और आतंकित किया, और अंत में, यहां तक कि जब उसने उनसे अपने जीवन की कीमत अदा करवाई, तब भी उन्होंने अपने उत्तरदायित्व से हाथ पीछे नहीं खींचे। यह उनके कर्तव्य-निर्वहन की पराकाष्ठा है। इससे मेरा क्या आशय है? क्या मेरा आशय यह है कि तुम लोग भी परमेश्वर की गवाही देने और सुसमाचार फैलाने के लिए इसी तरीके का उपयोग करो? तुम्हें हूबहू ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु तुम्हें समझना होगा कि यह तुम्हारा दायित्व है, यदि परमेश्वर ऐसा चाहे, तो तुम्हें इसे नैतिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए। आज लोगों के मन में भय और चिंता व्याप्त है, किंतु ये अनुभूतियां किस काम की हैं? यदि परमेश्वर तुमसे ऐसा करने के लिए न कहे, तो इसके बारे में चिंता करने का क्या लाभ है? यदि परमेश्वर को तुमसे ऐसा कराना है, तो तुम्हें इस उत्तरदायित्व से न तो मुँह मोड़ना चाहिए और न ही इसे ठुकराना चाहिए। तुम्हें आगे बढ़कर सहयोग करना और निश्चिंत होकर इसे स्वीकारना चाहिए। मृत्यु चाहे जैसे हो, किंतु उन्हें शैतान के सामने, उसके हाथों में नहीं मरना चाहिए। यदि मरना ही है, तो उन्हें परमेश्वर के हाथों में मरना चाहिए। लोग परमेश्वर से आए हैं, और उन्हें परमेश्वर के पास ही लौटना है—यही समझ और प्रवृत्ति सृजित प्राणियों की होनी चाहिए। यही अंतिम सत्य है, जिसे सुसमाचार फैलाने और अपने कर्तव्य के निर्वहन में हर किसी को समझना चाहिए—देहधारी परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने और मानवजाति को बचाने के सुसमाचार को फैलाने और उसकी गवाही देने के लिए इंसान को अपने जीवन की कीमत चुकानी ही होगी। यदि तुम्हारे मन में यह अभिलाषा है, यदि तुम इस तरह गवाही दे सकते हो, तो बहुत अच्छी बात है। यदि तुम्हारे मन में अभी तक इस प्रकार की अभिलाषा नहीं है, तो तुम्हें इतना तो करना ही चाहिए कि अपने सामने उपस्थित इस दायित्व और कर्तव्य को अच्छी तरह पूरा करो, और परमेश्वर को विश्राम दो। शायद तब, ज्यों-ज्यों महीने और वर्ष बीतेंगे और तुम्हारे अनुभव और आयु में बढ़ोतरी होगी, और सत्य की तुम्हारी समझ गहरी होती जाएगी, तो तुम्हें अहसास होगा कि तुम्हारे जीवन की अंतिम साँस तक भी, परमेश्वर के सुसमाचार को फैलाने के कार्य के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देना तुम्हारा अनिवार्य कर्तव्य और उत्तरदायित्व है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार करने पर प्रभु यीशु के अनुयायियों को भला-बुरा कहकर सताया गया, लेकिन वे चाहे जिस तरह या तरीके से मारे गए हों, इनसे उनका अंतिम परिणाम तय नहीं हुआ। इंसान की देह के जीवन-मरण से यह संकेत नहीं मिलता कि उनका परिणाम अच्छा रहेगा या बुरा। प्रभु यीशु के अनुयायियों पर घातक जुल्म भले ही बुरी चीज लगें, लेकिन हकीकत में, वे परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए शहीद हुए और परमेश्वर इसे याद रखता है। शैतान की दुष्ट ताकतों का सामना करते हुए उन्होंने अपनी जिंदगी या सुरक्षा की फिक्र किए बिना परमेश्वर के कार्य की गवाही दी। इससे उनकी गवाही और भी पुख्ता हो गई और शैतान चारों खाने चित हो गया। इंसान के लिए जान सबसे प्यारी होती है, लेकिन उन्होंने परमेश्वर की गवाही देने के लिए अपनी सबसे कीमती जिंदगी कुर्बान कर दी और दुनिया को परमेश्वर के कार्य से वाकिफ करवाया। यही सबसे महान गवाही है। परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार करने के बाद मैंने अपमानित और लज्जित महसूस किया। जब प्रिंसिपल ने चेतावनी दी कि दुबारा प्रचार करने पर मेरा तबादला कर दिया जाएगा तो मैं बहुत डर गया था। मैं सरहद पर जाने से डर गया था, और सोचता था कि मेरे मरते ही सब कुछ खत्म हो जाएगा और मुझे बचाया नहीं जा सकेगा। मैं अपनी जिंदगी को बहुत ज्यादा महत्व देता था और मेरे पास न तो साहस था, न ही गवाही। प्रेरितों के सामने तो मैं कहीं भी नहीं ठहरता था। मैंने इस बारे में सोचा कि मेरा जीवन कहाँ से आया, कैसे यह परमेश्वर ने दिया है। परमेश्वर हमारी मृत्यु तय करता है, हम उससे एक मिनट भी ज्यादा नहीं जी सकते। अगर परमेश्वर किसी व्यक्ति की हिफाजत कर उसे मरने नहीं देना चाहे, तो सबसे खतरनाक जगह में होकर भी वह मरेगा नहीं। इंसान का अपने जीवन-मरण पर कोई नियंत्रण नहीं है, अपना अंतिम परिणाम तय करना तो बहुत दूर की बात है। यह तो और भी मजबूती से परमेश्वर के हाथ में है। प्रभु यीशु ने कहा था, “क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा(मत्ती 16:25)। प्रचार करने और परमेश्वर की गवाही देने में हम बहुत अधिक उत्पीड़न और विपत्ति का सामना करते हैं। प्रभु यीशु के अनुयायियों की तरह, हो सकता है कि कुछ लोगों को परमेश्वर का प्रचार करने और उसकी गवाही देने पर इतना सताया जाए कि उनकी मौत हो जाए, लेकिन तब भी उनकी आत्मा परमेश्वर के हाथ में रहती है। भले ही उनके शरीर मृत हों, इसका मतलब यह नहीं कि उनका कोई अंतिम परिणाम नहीं होगा। सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है, सारी व्यवस्था उसी की है। अगर मैंने जीने की लालसा और मौत के डर से अपना कर्तव्य नहीं निभाया या सुसमाचार का प्रचार नहीं किया, तो भले ही मुझे सरहद पर या मौत के खतरे वाली जगह न भेजा जाए, परमेश्वर की नजर में मैं एक चलती-फिरती लाश ही रहता, एक मुर्दा इंसान जिसे अंत में निकाल ही दिया जाएगा। परमेश्वर का अनुसरण और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए मुझे सब कुछ दाँव पर लगा देना चाहिए, अपना जीवन भी। अगर मुझे वाकई सरहद पर भेज दिया गया तो मुझे परमेश्वर की व्यवस्था के आगे समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर की शरण में और अधिक लोगों को लाने के लिए मैं सरहद पर सैनिकों के बीच भी प्रचार कर सकता हूँ। परमेश्वर का प्रचार करने और उसकी गवाही देने के कारण अगर किसी दिन मुझे सता कर मार भी डाला गया, तो इसमें भी परमेश्वर की मंजूरी होगी और मुझे समर्पण करना चाहिए। इस बारे में सोचते हुए मैंने परमेश्वर के सामने प्रण किया कि मैं उसका प्रचार करता रहूँगा, उसकी गवाही देता रहूँगा और किसी के सामने बेबस नहीं रहूँगा।

इसके बाद मैंने रोज प्रार्थना की और परमेश्वर का प्रचार और उसके वचनों पर दूसरों के साथ संगति करता रहा। मैंने उनके पाठों की समीक्षा की अगुआई भी की, छुट्टियों के दौरान उनके लिए सभाओं की व्यवस्था की और वे पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय हो गए। परीक्षाओं के बाद मैंने देखा कि इन भाई-बहनों को काफी अच्छे ग्रेड मिले और हर विषय में औसत अंक 76 से 98 के बीच थे। कोई भी फेल नहीं हुआ। मैं दंग रह गया! प्रिंसिपल ने मेरी कक्षा के अच्छे ग्रेड देखकर मुझसे कहा : “तुम्हारी कक्षा को पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा अंक मिले हैं, इसलिए हमने तुम्हें अगले सत्र में भी उनका क्लास टीचर बनाए रखने का फैसला किया है। अगले सत्र के लिए सबको शुभकामनाएँ।” यह सुनकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा क्योंकि यह मेरी उम्मीदों से बिल्कुल परे था। इससे मुझे बाइबल में नीतिवचन की पुस्तक का एक वाक्यांश याद आ गया : “राजा का मन नालियों के जल के समान यहोवा के हाथ में रहता है, जिधर वह चाहता उधर उसको मोड़ देता है” (नीतिवचन 21:1)। सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है, वही हम सबकी नियति तय करता है। अगर मैं उस पर विश्वास रखूँगा और सच्चे मन से उसका सहयोग करूँगा, तो वह मेरे लिए रास्ता खोलेगा। मैं अब भी कैंपस में सुसमाचार का प्रचार कर रहा हूँ, भाई-बहनों को सभाओं में ले जाता हूँ और काफी सारे लोग अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकार चुके हैं। प्रचार के इन दिनों के बारे में पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे बहुत कुछ हासिल हुआ और मैं जानता हूँ कि यह सब परमेश्वर का मार्गदर्शन है।

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