कर्तव्य निभाने के लिए सत्य का अनुसरण जरूरी है

19 जुलाई, 2022

सोंग यू, नीदरलैंड

कुछ साल पहले मैंने सुसमाचार का प्रचार शुरू किया। मैं जानती थी कि परमेश्वर ने मुझे ऊंचा उठाकर इसके योग्य बनाया था। मुझे यह मौका देने के लिए मैंने परमेश्वर का दिल की गहराई से धन्यवाद किया, और यह काम अच्छे से करने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने का मन बनाया। इसलिए, मैं रोज देर तक परमेश्वर के वचन पढ़ती, सत्य समझती और सिद्धांत सीखती थी। अगर कुछ मेरी समझ में न आता तो मैं दूसरों से पूछती। जल्दी ही मैं अपना कर्तव्य खुद निभाने के योग्य हो गई, मैं परमेश्वर की कृतज्ञ थी। उस दौरान, मैं अपने काम में प्रेरणा से भरी हुई थी, और नतीजे निरंतर बेहतर होते जा रहे थे। कुछ समय बाद, मुझे टीम की अगुआ चुन लिया गया। मैं बेहद खुश थी, और सोच रही थी, "मुझे अब और कीमत चुकानी चाहिए, दुगनी मेहनत करनी चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करें। सिर्फ इसी से पता चलेगा कि मैं कितनी जिम्मेदार और असरदार हूँ, सत्य का अनुसरण करती हूँ। इस तरह, मेरे भाई-बहन जरूर मेरा समर्थन औए मेरी प्रशंसा करेंगे।"

उन कुछ महीनों में, मैं सुबह उठते ही अपने काम में जुट जाती थी। कभी-कभी तो मैं खाना-पीना भी भूल जाती थी। मैं भक्ति कार्य और परमेश्वर के वचन पढ़ना भी टालने लगी। मुझे लगता था कि इनमें जो समय लगता था, वह काम में गुजारना जरूरी था, इनसे मेरे काम पर असर पड़ता था। जब मैं सभाओं में दूसरों को परमेश्वर के वचन पढ़ते और अपने अनुभवों पर संगति करते सुनती, तो मैं अपने काम के बारे में सोचती रहती। मेरा दिल शांत कर परमेश्वर के वचनों पर ध्यान न दे पाती, दूसरों के अनुभवों को सुनना या समझना तो दूर की बात थी। धीरे-धीरे, मैं उन भ्रष्ट स्वभावों को पहचानना भी भूल गई जो मैं हर दिन उजागर कर रही थी। मैं दिनोदिन अहंकारी हो रही थी और दूसरों के साथ मिलकर काम नहीं कर पा रही थी। जब मुझे अपनी साथी का काम ठीक न लगता तो मैं उसे तिरस्कार से देखती। मुझे लगता कि वह दो साल से सुसमाचार का काम कर रही है, पर मैं नई होकर भी उससे अच्छी हूँ। अगर मैं कुछ दिन और रही, तो जरूर उससे बेहतर हो जाऊँगी। कई बार जब मुझे लगता कि मैं सही हूँ, तो मैं अपने विचार पर ही अमल करना चाहती, मैं उससे चर्चा करना या उसे सूचित करना भी नहीं चाहती थी। जब वह मेरे निरीक्षण के काम की प्रगति के बारे में जानना चाहती, तो मैं उसे यह भी बताना नहीं चाहती थी। लगता कि उसे बता दिया तो अगुआ के आने पर, वही उसे काम की प्रगति और विवरण के बारे में बताएगी, और मेरी चमक चुरा लेगी। मैं अगुआ के सामने हमेशा अपनी साथी को गैर-जिम्मेदार बताती थी। बाद में, जब अगुआओं को मेरी अवस्था का पता चला, तो उन्होंने सद्भावनापूर्ण सहयोग पर मेरे साथ संगति की, कहा कि मैं दूसरों के साथ चर्चा नहीं करती, अपनी साथी को छोटा समझती हूँ, दूसरों की कमियों पर ही ध्यान देती हूँ, जो अहंकार की अभिव्यक्ति थी। पर मैं खुद को बिल्कुल ही नहीं जानती थी। यही सोचती थी कि उसकी गैर-जिम्मेदारी की वजह से ही हमारी निभ नहीं पाती, इसलिए मैं उसे तिरस्कार से देखती थी। बाद में, अगुआओं ने देखा कि आसपास जो होता था उससे मैं कोई सबक नहीं सीखती थी, तो अहंकारी और अड़ियल होने के लिए उन्होंने मेरा निपटान किया, कहा कि इससे मेरे काम पर असर पड़ेगा, इसलिए मुझे आत्म-चिंतन करना चाहिए। मैं उस समय आहत महसूस कर रही थी, यह सोचते हुए कि मैं कितनी देर रात तक काम में लगी रहती थी, तकलीफ उठा रही थी, कीमत चुका रही थी, काम में असरदार थी। अगर मैंने थोड़ा भ्रष्ट स्वभाव दिखाया भी तो क्या? जब मैं अपने काम में इतनी असरदार थी तो मेरा इस तरह निपटान क्यों किया गया? यह सोचते हुए मैं बहुत दुखी हो गई, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसकी इच्छा को समझने के लिए मार्गदर्शन मांगा।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा, "तुम्हें कैसे मूल्यांकन करना चाहिए कि कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं? देखने वाली प्राथमिक बात यह है कि वह अपने कर्तव्यों और अपने कार्यों के दौरान क्या प्रदर्शित और प्रकट करता है। इससे तुम्हें उस व्यक्ति के स्वभाव का पता चल जाएगा। उसके स्वभाव से तुम्हें ज्ञात हो जाएगा कि उसमें कोई परिवर्तन आया है या नहीं, उसने जीवन में प्रवेश किया है या नहीं। यदि कार्य करते समय किसी व्यक्ति का केवल भ्रष्ट स्वभाव ही उजागर होता है और उसमें सत्य की कोई वास्तविकता नहीं है, तो फिर वह व्यक्ति निश्चित रूप से सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं है। क्या सत्य का अनुसरण न करने वालों को जीवन में प्रवेश मिलता है? नहीं, कदापि नहीं। ऐसा व्यक्ति दिनभर जो काम करता है, उसकी भाग-दौड़, खुद को खपाना, कष्ट उठाना, कीमत चुकाना, वह चाहे जो कुछ भी करे, सब सेवा के लिए है, वह सेवाकर्ता है। कोई व्यक्ति कितने भी वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखता रहा हो, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या वह सत्य से प्रेम करता है। कोई व्यक्ति किससे प्रेम करता है, किसका अनुसरण करता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि वह सबसे ज्यादा क्या करना पसंद करता है। यदि किसी व्यक्ति के अधिकांश कार्य सत्य के सिद्धांतों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप होते हैं, तो वह व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है और उसका अनुसरण करता है। यदि वह सत्य का अभ्यास कर सकता है, उसका रोजमर्रा का कार्य उसके कर्तव्य के लिए है, तो वह जीवन में प्रवेश करता है और उसमें सत्य की वास्तविकताएँ भी होती हैं। हो सकता है कि कुछ मामलों में उसके कार्य उपयुक्त न हों या उसने सत्य के सिद्धांतों को ठीक से न समझा हो या वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो या कभी-कभी वह अहंकारी और आत्म-तुष्ट हो जाता हो, अपने विचारों पर अड़कर सत्य न स्वीकारता हो, लेकिन अगर वह व्यक्ति बाद में प्रायश्चित करके सत्य का अभ्यास कर लेता है, तो निस्संदेह यह साबित हो जाता है कि उसने जीवन में प्रवेश किया है और वह सत्य का अनुसरण करता है। लेकिन अगर काम के दौरान कोई व्यक्ति बस भ्रष्ट स्वभाव दिखाता है, बहुत झूठ बोलता है, उसका रवैया दबंग किस्म का है, वह भोग-विलासी है, अत्यधिक अहंकारी है, खुद को ही कानून समझता है, मनमर्जी करता है, परमेश्वर में बरसों के विश्वास और अनेक उपदेश सुनने के बावजूद उसके भ्रष्ट स्वभाव में थोड़ा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है, तो यह निश्चित है कि ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण नहीं करता। ऐसे बहुत से लोग हैं जो बरसों से परमेश्वर में विश्वास रखते आए हैं, जो देखने में कुकर्मी नहीं होते और कुछ अच्छे काम करते हैं। वे पूरी लगन से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, लेकिन उनका जीवन स्वभाव बिल्कुल भी नहीं बदला, उनके पास न तो साझा करने के लिए कोई अनुभव होता है और न कोई गवाही। क्या ऐसे लोग दयनीय नहीं होते? परमेश्वर में इतने वर्षों के विश्वास के बावजूद, उनके पास कोई अनुभव या गवाही नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह सेवाकर्मी होता है। वह वास्तव में दयनीय होता है!" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'सत्य के अनुसरण में ही होता है जीवन-प्रवेश')। परमेश्वर के वचनों से खुलासा हुआ कि सत्य का अनुसरण न करने वालों को जीवन प्रवेश नहीं मिलता। वे हर रोज बस भ्रष्ट स्वभाव उजागर करते हैं। वे कितने भी जतन करें, कष्ट उठाएँ, कीमत चुकाएँ, वे सिर्फ सेवा कर रहे हैं और कुछ भी नहीं। वर्षों विश्वास करने के बाद भी ऐसे लोग बदलते नहीं, वे बस सेवाकर्ता होते हैं। यह देखकर कि सत्य का अनुसरण न करने वालों को परमेश्वर सेवाकर्ता समझता है, मैं बहुत उदास हो गई। मैं अपने आँसू नहीं रोक पाई। मुझे लगा कि परमेश्वर जैसे लोगों को उजागर किया, मैं वैसी ही थी। मैं कष्ट उठा और कीमत चुका सकती थी, पर मैं न तो सत्य का अनुसरण कर रही थी, न अपना स्वभाव बदल रही थी। मुझे लगता था कि भक्ति कार्य, परमेश्वर के वचनों का पाठ और उसके नजदीक आना समय की बर्बादी थी। अपने भाई-बहनों के साथ सभाओं में, मैं अपने दिल को शांत न रख पाती, परमेश्वर के वचनों पर ध्यान न दे पाती, दूसरों के अनुभव ध्यान से सुन न पाती, परमेश्वर के वचन समझ न पाती। जब मैंने अपने काम में भ्रष्ट स्वभाव दिखाया, तो मैं सत्य खोजने और हल तलाशने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आई। इसकी बजाय मैंने अपनी साथी पर नजरें गड़ाई रखीं, उसकी कमियाँ पकड़ती रही, खुद को जरा भी न समझ पाई। जब मेरे अगुआओं ने मेरी समस्याएँ बताईं, तो मैंने बहस करके अपना बचाव किया। मैंने यह भी सोचा कि मैं असरदार ढंग से काम कर रही थी, इसलिए भ्रष्ट स्वभाव उजागर करने के लिए मेरा निपटान नहीं होना चाहिए। अपनी इन करतूतों में मुझे सत्य का अनुसरण करने का कोई लक्षण नहीं दिखा। मेरे साथ कुछ होता था तो मैं कोई सबक नहीं सीखती थी, न ही अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने के लिए सत्य की खोज करती थी। मैं हर रोज भ्रष्ट स्वभाव उजागर कर रही थी। भले ही अपने काम में मैं असरदार थी, पर परमेश्वर की नजरों में, मैं सिर्फ खुद को खपा रही थी और सेवा कर रही थी। अतीत में, मैं सोचती थी कि जो अपने काम में सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं और असरदार होते हैं, वही सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर उन्हें स्वीकृति देता है। मुझे यह एहसास ही नहीं था कि यह मेरी सोच थी। कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं इसे परमेश्वर लोगों के ऊपरी प्रयासों और खपने के आधार पर नहीं, जीवन स्वभाव में बदलाव के आधार पर आँकता है, और इस पर कि क्या वे उसके वचनों के अनुसार जीते हैं, सत्य के सिद्धांतों पर चलते हैं। अगर मेरे भ्रष्ट स्वभाव का समाधान नहीं हुआ, और मैं अपने अहंकारी स्वभाव के साथ ही लोगों से व्यवहार करती रही, सिर्फ नाम और रुतबे के लिए अपना काम करती रही, तो परमेश्वर मेरे कृत्यों का बिल्कुल भी समर्थन नहीं करेगा। यह एहसास करके, मैंने अपने अहंकारी स्वभाव के समाधान पर परमेश्वर के वचनों को खाया-पीया, कि कैसे सद्भावना के साथ सहयोग करें, कैसे नाम और रुतबे से बचें। परमेश्वर के वचनों से मैंने आखिर जाना कि मेरा स्वभाव सचमुच बहुत अहंकारी था। मैं अपनी खूबियों की तुलना अपनी साथी की कमियों से करती थी, इसलिए मुझे लगता था कि मैं उससे बेहतर हूँ, मैं उसे छोटा समझती थी। अपने काम की प्रगति के बारे में अपनी साथी को न बताने की इच्छा और अगुआओं के सामने उसकी कमियाँ बताने का चाव यह दर्शाते थे कि मैं नाम और रुतबे के लिए उससे होड़ कर रही थी। यह एहसास होने के बाद, मैंने अपनी साथी को अपनी भ्रष्टता के बारे में बता दिया। धीरे-धीरे हम दोनों मिलजुलकर काम करने मे सक्षम हो गए, और हमारा काम भी सुचारु ढंग से बढ़ने लगा। मुझे यह भी एहसास हुआ कि परमेश्वर के मार्गदर्शन से ही हमारा काम असरदार हो सकता है। मुझे अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए इसका श्रेय नहीं लेना चाहिए। मुझे यह महिमा परमेश्वर को देनी चाहिए। इस अनुभव के बाद, मैं परमेश्वर की कृतज्ञ महसूस करने लगी। अगर मेरे अगुआ मेरा निपटान न करते, तो मैं आत्मचिंतन ही न कर पाती, और मुझे उन गंभीर परिणामों का एहसास न होता जो सिर्फ नाम और रुतबे के लिए काम करने और जीवन प्रवेश पर ध्यान न देने के होते हैं। अगर मैं उसी तरह जीती रहती तो मैं और ज्यादा अहंकारी हो जाती। इन बातों का एहसास हुआ तो मैं सच्चे मन से जीवन प्रवेश पर ध्यान देने लगी, अपने काम में उजागर होने वाली बातों और विचारों को रोज लिखने लगी, इस विषय पर परमेश्वर के वचन भी पढ़ने लगी। कुछ समय तक इस अभ्यास के बाद, मैंने खुद को परमेश्वर के ज्यादा नजदीक पाया, मैं काम में रोज कुछ हासिल करती, और संतुष्ट रहती।

बाद में, मुझे एक अगुआ चुन लिया गया। मुझे पता था मुझमें बहुत कमियाँ हैं, सत्य की बहुत सतही और इसकी वास्तविकताओं की थोड़ी समझ है, इसलिए डरती थी कि समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य पर संगति नहीं कर पाऊँगी, जिससे दूसरों के जीवन प्रवेश में देर होगी। मैं अक्सर प्रार्थना में परमेश्वर के सामने अपनी समस्याएँ और मुश्किलें रखती, सत्य खोजती, और अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानने की कोशिश करती, और परमेश्वर के वचनों से समस्याओं से निपटने के सिद्धांत तलाशती। उस समय, मुझे लगता था कि मैं अपने काम में काफी कुछ हासिल कर रही हूँ। पर बाद में मुझे पता चला कि काम में गैर-जिम्मेदार और अप्रभावी होने के कारण कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं का सख्ती से निपटान किया गया था, मेरे सहकर्मी और साथी निरंतर बर्खास्त किए जा रहे थे, इसलिए कि उन्होंने व्यावहारिक काम नहीं किया, बर्खास्त करते समय हर किसी को कारण बताया जाता था। मुझे खासतौर से यह डर था कि अगर मैंने ठीक से काम न किया, तो मुझे मेरे भाई-बहनों द्वारा उजागर और बर्खास्त कर दिया जाएगा, उन सबको पता चल जाएगा कि मैं किस तरह की इंसान थी। यह कितनी शर्मिंदगी की बात होगी! मैं भविष्य में अपने भाई-बहनों का सामना कैसे करूंगी? मैं उजागर और बर्खास्त किए जाने के कारण शर्मिंदा नहीं होना चाहती थी। उस पल से, मुझे यह एहसास हो गया कि एक अगुआ पर भाई-बहनों की नजरें हमेशा टिकी होती हैं, और उसका साथी भी निगरानी करता है। अपने काम में असरदार होकर ही आप एक अगुआ बने रह सकते हैं, हरेक का समर्थन और स्वीकृति पा सकते हैं। प्रभावी न होने पर देर-सवेर आपको उजागर करके बदल दिया जाएगा। इसलिए, मैं ज्यादा मेहनत से अपना काम करने लगी। सुबह उठने के बाद, मैं भाई-बहनों से उनके काम के बारे में बात करती, उनकी प्रगति पर नजर रखती, काम के हर पहलू में किसी समस्या या चूक की जांच करती, देखती कि कहाँ प्रगति धीमी है, और सीखती कि समस्याओं को कैसे सुलझाना है, वगैरह-वगैरह। धीरे-धीरे, मैं परमेश्वर के वचन पढ़ने, उसके नजदीक आने, भक्ति कार्य के नोट्स बनाने और अपने भ्रष्ट स्वभाव पर चिंतन करने को कम महत्व देने लगी। कभी-कभी मुझे लगता कि मैं कुछ भ्रष्ट स्वभाव उजागर कर रही हूँ, और मुझे परमेश्वर के सामने आने, उसके वचन पढ़ने और आत्मचिंतन करने की जरूरत है, पर मैं जानती थी कि इन सब में काफी समय लग जाएगा, इसलिए खुद को तसल्ली देने के लिए खुद से कहती, "भ्रष्ट स्वभावों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं, उन्हें कुछ ही दिनों में नहीं सुधारा जा सकता। यह एक लंबी प्रक्रिया है। भ्रष्ट स्वभावों को अनसुलझा छोडने से मेरे अभी के कर्तव्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल, अपना कर्तव्य असरदार ढंग से निभाना सबसे महत्वपूर्ण है। जब समय होगा तो समस्या सुलझाने के लिए परमेश्वर के वचन पढ़ लूँगी। अभी भ्रष्ट स्वभाव सुलझाने की कोई जल्दबाजी नहीं है।" और इस तरह, मैं रोज काम में इतनी व्यस्त रहती, कि मैंने परमेश्वर के घर की इस अपेक्षा को गंभीरता से नहीं लिया कि अगुआ और कार्यकर्ता गवाही के लेख लिखें। मुझे लगता था यह महत्वपूर्ण नहीं है। मैं अपना काम अच्छे से कर रही थी, यह अपने-आपमें एक गवाही थी। साथ ही, मैं अपने काम में व्यस्त थी, और मेरे पास लेख लिखने का समय नहीं था। कभी-कभी मुझे लगता कि मेरी अवस्था सही नहीं थी, मुझे काम में निरंतर व्यस्त नहीं रहना चाहिए, सत्य और जीवन प्रवेश की अपनी खोज को छोड़ना नहीं चाहिए। अगर मैंने बहुत सारा काम कर लिया, पर सत्य न पाया या जीवन प्रवेश में प्रगति न की, तो क्या यह शर्मनाक नहीं होगा? इसके बाद, मुझमें ऊर्जा का संचार हुआ। मैं कुछ समय तक सामान्य आध्यात्मिक अभ्यास करती रही, अपनी भ्रष्टता और समस्याओं के समाधान के लिए परमेश्वर के वचन खाती-पीती रही। पर वह अवधि बीत जाने के बाद, जब मैंने अपनी दो साथियों को व्यावहारिक काम न करने और दैहिक सुविधाओं की लालसा रखने के लिए बर्खास्त होते देखा तो मेरा दिल एक बार फिर घबराने लगा। मैंने फौरन खुद को 120% काम में झोंक दिया। मैं जब भी अपने काम में कोई गलती या चूक देखती, तो मैं अथक मेहनत करने लगती। इस तरह, जब मेरे वरिष्ठ तमाम कामों के बारे में पूछते तो मेरे पास समय पर जवाब होते और वे देख पाते कि मैं व्यावहारिक काम कर रही हूँ।

काम में इतनी व्यस्त होने के कारण, मैं अपने भ्रष्ट स्वभावों को जाँचने और उनके समाधान पर ध्यान नहीं दे पाई, मैं और ज्यादा अहंकारी होती गई, कुछ घटने पर सत्य की खोज करने के बजाय सब कुछ अपने विचारों के अनुसार करती रही। जो वीडियो निर्माण कार्य मेरे जिम्मे था, उसका निरीक्षक काम टालता रहता और मनमाने ढंग से काम करता था। इसलिए मेरे वरिष्ठों ने मुझे सिद्धांतों के अनुसार उसे बर्खास्त करने के लिए कहा। पर मुझे लगता था उसमें कुछ खूबियाँ और योग्यता थी, और उसे बदलने से वीडियो निर्माण की प्रगति और परिणामों पर असर पड़ेगा। इसलिए मैंने उसे काफी समय तक बर्खास्त नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि उनके बनाए वीडियो में बार-बार संशोधन करने पड़े, जिससे परमेश्वर के घर के काम में देरी हुई। आखिर में, मेरे वरिष्ठों ने उसे खुद ही बर्खास्त कर दिया। जब मैंने देखा कि मेरे अहंकार और मनमानेपन का परमेश्वर के घर के काम पर सीधा असर पड़ा था, तो मैं थोड़ी जागरूक हुई। ऐसे अहम मामले में मैं इतनी अहंकारी और अपनी चलाने पर आमादा कैसे हो सकती थी? मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करके सिद्धांत क्यों नहीं खोजे? फिर मैंने इस दौरान की अपनी अवस्था के बारे में सोचा। मैं रोज काम में इतनी व्यस्त रहती थी कि मैं परमेश्वर के नजदीक ही नहीं आ पाई। आधे-अधूरे मन से उसके वचन पढ़ती थी। मैंने भ्रष्टता उजागर की थी, पर समय पर सत्य खोज कर इसका समाधान नहीं कर पाई, इसलिए समस्याओं से जूझते समय परमेश्वर से प्रार्थना करने का ख्याल भी नहीं आया, चीजों को ठीक करने के लिए मैं अपनी ही सोच पर निर्भर करती रही।

खुद को दोबारा ऐसी हालत में पाकर मैं परेशान थी, पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों में पढ़ा, "परमेश्वर को निहारना और सभी चीजों में परमेश्वर पर निर्भर रहना सबसे बड़ी बुद्धिमानी है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए')। यह सच है। मैं परमेश्वर से प्रार्थना और उस पर भरोसा कर सकती थी, खुद को जानने के लिए उसका मार्गदर्शन मांग सकती थी। इसलिए मैं अक्सर अपनी मुश्किलें परमेश्वर के सामने लाकर प्रार्थना करने लगी। मैं निरंतर मनन-चिंतन भी करती रहती कि यह समस्या सुलझी क्यों नहीं थी। एक दिन अपने भक्ति कार्य में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, "आज के कार्य के संदर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ें करेंगे, जो इन वचनों में दर्शाई गई हैं, 'मंदिर परमेश्वर से बड़ा है।' उदाहरण के लिए, लोग अपना कर्तव्य निभाने को अपने कार्य के रूप में देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के लिए मानवाधिकारों की रक्षा हेतु किए जाने वाले राजनीतिक आंदोलनों के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को अपने कौशलों का उपयोग आजीविका में करने की ओर मोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं, बल्कि धार्मिक सिद्धांत के एक अंश के पालन के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या ये व्यवहार बिलकुल 'मंदिर परमेश्वर से बड़ा है' के समान नहीं हैं? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय भौतिक मंदिरों में कर रहे थे, जबकि आज लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय अमूर्त मंदिरों में करते हैं। जो लोग नियमों को महत्व देते हैं, वे नियमों को परमेश्वर से बड़ा समझते हैं; जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं, वे हैसियत को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं; जो लोग अपनी आजीविका से प्रेम करते हैं, वे आजीविका को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने के लिए बाध्य करती हैं : 'लोग अपने वचनों से परमेश्वर को सबसे बड़ा कहकर उसकी स्तुति करते हैं, किंतु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बड़ी है।' ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने या अपना व्यवसाय या अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलता है, वे परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अपने आप को अपनी प्यारी आजीविका में झोंक देते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, उसे और उसकी इच्छा को बहुत पहले ही त्याग दिया गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III')। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि अपने काम में इतनी व्यस्त रहने का मूल कारण यह था कि मैं नाम और रुतबे के पीछे थी। व्यावहारिक काम न करने के कारण कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बर्खास्त होते देख, मुझे डर लगा कि मेरा भी यही हाल होगा, मैं विफलता की उस राह पर नहीं जाना चाहती थी। मैंने सोचा कि उन्होंने नहीं किया पर मैं व्यावहारिक काम ज्यादा करूंगी। इस तरह, मुझे बर्खास्त नहीं किया जाएगा। मैं अगुआ बनी रहूँगी। मैं दूसरों द्वारा उजागर और विश्लेषित नहीं की जाऊँगी, मुझे शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ेगी। मैंने नाम और रुतबे को सत्य की खोज से ज्यादा महत्वपूर्ण समझा, इसलिए मैं ज्यादा कर्तव्य निभाने, ज्यादा काम करने को उत्सुक थी। अगर भाई-बहनों को लगेगा कि मैं काम की निगरानी करती और समस्याएँ सुलझाती हूँ, व्यावहारिक काम करने वाली एक अच्छी अगुआ हूँ, हर कोई मेरा समर्थन करेगा, मुझे स्वीकृति देगा, और कलीसिया में मेरी जगह बनी रहेगी। नाम और रुतबे के पीछे अंधाधुंध भागते हुए, मैं परमेश्वर की अपेक्षाएँ भूल गई थी। परमेश्वर चाहता है कि लोग सत्य का अनुसरण करें और जीवन प्रवेश करें, पर मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। मैं उसी से चिपकी रही जो मुझे ठीक लगा, जैसेकि, "भ्रष्ट स्वभावों की जड़ें गहरी होती हैं," "भ्रष्ट स्वभावों को सुलझाने की कोई जल्दी नहीं है," "थोड़ी-सी भ्रष्टता का मेरे कर्तव्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, मेरे काम के नतीजे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं," और "मैं अभी अपने काम में बहुत व्यस्त हूँ, मेरे पास समय नहीं है, जब समय होगा मैं परमेश्वर के वचन पढ़ूँगी और सत्य का अनुसरण करूगी।" मैंने जीवन प्रवेश पर ध्यान न देने के लिए इन शब्दों को बहानों की तरह इस्तेमाल किया, और नाम और रुतबे के पीछे भागने के लिए इन्हें कारण बनाया। अपने नाम और रुतबे को बचाने के लिए, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के नाम पर अपने ही उपक्रम का अनुसरण किया, सारा दिन ज्यादा काम करके ज्यादा नतीजे हासिल करने की ही सोचती रही। मैं इस तरह अपने नाम और रुतबे की रक्षा करना चाहती थी, अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को संतुष्ट करना चाहती थी। मैं कितनी घृणित और शर्मनाक थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े, जिनसे मुझे खोज से जुड़ी गलतफहमियों के बारे में एक अंतर्दृष्टि मिली। परमेश्वर कहते हैं, "पवित्र आत्मा के कार्य का इतने अधिक वर्षों तक अनुभव कर चुकने के बाद भी, पौलुस में हुए बदलाव न के बराबर थे। वह अब भी लगभग अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही था, और वह अब भी पहले का पौलुस ही था। बात बस इतनी थी कि कई वर्षों के कार्य की तक़लीफ़ सहने के बाद, उसने सीख लिया था कि कैसे 'कार्य करना' है, और सहनशीलता सीख ली थी, किंतु उसकी पुरानी प्रकृति—उसकी अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और स्वार्थलोलुप प्रकृति—अब भी क़ायम थी। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं जानता था, न ही उसने स्वयं को अपने पुराने स्वभाव से मुक्त किया था, और यह उसके कार्य में अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसमें कार्य का अधिक अनुभव मुश्किल से ही था, किंतु इतना थोड़ा-सा अनुभव मात्र उसे बदलने में असमर्थ था और अस्तित्व या उसके अनुसरण के महत्व के बारे में उसके विचारों को नहीं बदल सकता था। ... मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता है कि उसने कितना कार्य किया है, या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इससे निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है या नहीं, और अनुसरण के प्रति उसके विचार सत्य की अनुरूपता में हैं या नहीं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। "यदि तुमने बहुत सारा कार्य किया है, और दूसरों ने तुम्हारी शिक्षाएँ प्राप्त की हैं, किंतु तुम स्वयं नहीं बदले हो, और कोई गवाही नहीं दी है, या कोई सच्चा अनुभव नहीं लिया है, यहाँ तक कि अपने जीवन के अंत में भी, तुमने जो कुछ किया उसमें से किसी कार्य ने भी गवाही नहीं दी है, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो बदल चुका है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तुम्हारा उपयोग किया था, किंतु जब उसने तुम्हारा उपयोग किया, तब उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग किया था जिसका कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता था, और उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता था। यदि तुम बदलने की कोशिश करते, तो तुम्हें उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। परंतु पवित्र आत्मा इस बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता कि तुम्हें अंततः प्राप्त किया जाएगा या नहीं, और यह तुम्हारे अनुसरण के तरीक़े पर निर्भर करता है। यदि तुम्हारे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं, तो इसलिए क्योंकि अनुसरण के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ग़लत है। यदि तुम्हें कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है, और इसलिए कि तुमने स्वयं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हो। और इसलिए, तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और तुम्हारे व्यक्तिगत प्रवेश से अधिक अत्यावश्यक कुछ भी नहीं है! कुछ लोग अंततः कहेंगे, 'मैंने तुम्हारे लिए इतना अधिक कार्य किया है, और मैंने कोई प्रशंसनीय उपलब्धियाँ भले प्राप्त न की हों, फिर भी मैंने पूरी मेहनत से अपने प्रयास किए हैं। क्या तुम मुझे जीवन के फल खाने के लिए बस स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकते?' तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन लोगों को कभी आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरे साथ साँठ-गाँठ करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन की खोज करनी ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो, और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने की कोशिश नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। "पतरस और पौलुस के सार में अंतर से तुम्हें समझना चाहिए कि वे सब जो जीवन का अनुसरण नहीं करते, व्यर्थ परिश्रम करते हैं! तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और इसलिए अपने ह्रदय में तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना ही चाहिए। तुम्हें अपना भ्रष्ट स्वभाव जरूर छोड़ देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति की खोज अवश्य करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तुम्हें अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए। चूँकि तुम्हें सृजित किया गया था, इसलिए तुम्हें उस प्रभु का आज्ञापालन करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया, क्योंकि तुम्हारा स्वयं अपने ऊपर स्वाभाविक कोई प्रभुत्व नहीं है, और स्वयं अपनी नियति को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पवित्रता और परिवर्तन की खोज करनी चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, और तुम्हें अपने कर्तव्य का अतिक्रमण कदापि नहीं करना चाहिए। यह तुम्हें सिद्धांत के माध्यम से बाध्य करने, या तुम्हें दबाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय यह वह पथ है जिसके माध्यम तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो, और यह उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है—और प्राप्त किया जाना चाहिए—जो धार्मिकता का पालन करते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि अपने विश्वास में किसका अनुसरण करना है, इसे लेकर मैं गलत थी। कोई परमेश्वर की स्वीकृति पाता है या नहीं, यह कलीसिया में उनके काम की मात्रा या ऊंचे ओहदे पर निर्भर नहीं करता, यह इस पर निर्भर करता है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं और क्या वे अपने जीवन स्वभाव को बदल पाते हैं। सिर्फ नाम और रुतबे के लिए काम करते हुए भले ही तुम्हारा रुतबा कुछ समय तक बना रहे, जीवन-अनुभव की वास्तविक गवाही के बिना परमेश्वर के घर में जगह बनाए रखना नामुमकिन है, देर-सवेर तुम्हें हटा दिया जाएगा। पौलुस के बारे में सोचो। वह वर्षों यात्रा करता रहा, खपता रहा, कष्ट सहता, उपदेश देता रहा, उसने बहुत लोगों को प्राप्त किया, पर उसका सारा काम नाम, रुतबे, पुरस्कार और मुकुट के लिए था। उसने सत्य का अनुसरण नहीं किया, उसका भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदला, खुद को ऊंचा दिखाने के लिए वह अक्सर अपने कष्टों और कारावास की बात करता था, थोड़ी प्रबुद्धता हासिल करने के बाद उसने कलीसियाओं को पत्र लिखकर दिखावा किया। वह दूसरों से होड़ करता था और अन्य प्रेरितों के आगे नहीं झुकता था। वह हमेशा यह गवाही देता था कि वह दूसरों से ऊपर है, और अपने अहंकार में अपना विवेक खो बैठा। पौलुस ने कभी भी अपना जीवन स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं किया, उसे परमेश्वर प्रतिरोधी अपनी प्रकृति की भी कोई समझ नहीं थी। उसने परमेश्वर के साथ लेन-देन के लिए अपने काम को पूंजी की तरह इस्तेमाल किया। वह और ज्यादा अहंकारी होता गया, उसने यह भी गवाही दी कि वह मसीह की तरह जिया। पौलुस परमेश्वर के प्रतिरोध के मसीह-विरोधी मार्ग पर चलता था। आखिर में, उसने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर दिया, और परमेश्वर ने अनंत दंड भुगतने को उसे नरक भेज दिया। मैं हमेशा नाम और रुतबे के पीछे रही, कभी भी जीवन स्वभाव बदलने पर ध्यान नहीं दिया। क्या मैं पौलुस के रास्ते पर ही नहीं चल रही थी? जब मैंने एक-एक करके अपनी साथियों को बर्खास्त होते देखा, तो मुझे डर लगा कि मैं भी बर्खास्त हो जाऊँगी, इसलिए, अपने नाम और रुतबे की खातिर, मैं और ज्यादा काम करने लगी। जब काम के अच्छे नतीजे मिले, तो मुझे लगा मैंने अच्छा काम किया है, मेरा स्वभाव और अहंकारी होता गया, और मैं सत्य या सिद्धांतों को खोजे बिना अपना कर्तव्य निभाने लगी। मेरे वरिष्ठों ने सिद्धांत के अनुसार उस निरीक्षक को बर्खास्त करने के लिए कहा, पर मुझे वह काम का आदमी लगा, इसलिए मैं उसे बर्खास्त करना नहीं चाहती थी। ऐसे गलत व्यक्ति के हाथ में जिम्मेदारी होने के कारण, वीडियो में बार-बार संशोधन करने पड़े और काम की प्रगति में देर हुई, और परमेश्वर के घर के कार्य का नुकसान हुआ। मैंने देखा कि मेरे अहंकार और अपने विचारों पर अड़े रहने का सीधा संबंध नाम और रुतबे की लालसा और जीवन-प्रवेश पर ध्यान न देने से था। जितना मैं नाम और रुतबे के पीछे भाग रही थी, मेरे दिल में परमेश्वर की जगह उतनी कम हो रही थी। कोई घटना होने पर मैं सत्य नहीं खोजती थी, बल्कि अपने भरोसे रहती थी। पहले मैं सोचती थी कि अगर मैं ज्यादा व्यावहारिक काम करूंगी तो मुझे बर्खास्त नहीं किया जाएगा। पर अब मुझे एहसास हुआ कि पूरी तरह काम पर ध्यान देकर और अपना नाम और रुतबा बचाकर, अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान न करके, मैं अहंकारी होती जाऊँगी, परमेश्वर का और प्रतिरोध करूंगी। अगर मैं ऐसी ही रही तो, पौलुस की तरह, परमेश्वर मुझे उजागर करके हटा देगा। परमेश्वर हरेक से निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार करता है। वे लोग परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करते हैं जो सत्य खोजते और अभ्यास करते हैं, और अपना जीवन स्वभाव बदलते हैं। अगर तुम बरसों परमेश्वर में विश्वास करते हो, पर अपने जीवन स्वभाव को जरा-भी नहीं बदलते हो, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं करते, जीवन अनुभव की कोई गवाही हासिल नहीं करते, बस परमेश्वर के लिए सेवा करते रहते हो, तो ऐसे लोग परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। यह परमेश्वर की धार्मिकता से तय होता है। मुझे याद है, जब मैं नाम और रुतबे के लिए सिर्फ अपने काम पर ध्यान दे रही थी तो सत्य की खोज न करने के लिए अक्सर कारण और बहाने तलाशती रहती थी, जैसेकि "भ्रष्ट स्वभावों की जड़ें गहरी होती हैं और उन्हें रातोंरात सुधारा नहीं जा सकता" "थोड़ी-सी भ्रष्टता मेरे कर्तव्यों पर असर नहीं डालेगी, मेरे काम के नतीजे बहुत महत्वपूर्ण हैं।" इनमें से कोई भी कारण सत्य के अनुरूप नहीं था। भ्रष्ट स्वभाव गहरे पैठे होते हैं, और झट से बदले नहीं जा सकते, पर उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके निकालना पड़ता है, और परमेश्वर के वचनों की मदद से विश्लेषित करना पड़ता है, फिर परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का रास्ता ढूँढना पड़ता है। सिर्फ अनुभव से ही हम सत्य पा सकते हैं और भ्रष्टता का समाधान कर सकते हैं। हमारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान न हो, तो हम कभी भी परमेश्वर के घर को नुकसान पहुंचाने वाले काम कर सकते हैं। तो वे हमारे कर्तव्य पर कैसे असर नहीं डालेंगे? अपने अहंकार और विचारों के अनुसार काम करने की इच्छा के कारण असल काम न करने वाले निरीक्षक को फौरन बर्खास्त न करने से काम को बहुत नुकसान पहुंचा। साथ ही, मैं परमेश्वर के वचन न पढ़ने या आत्मचिंतन करने को परमेश्वर के सामने न आने के लिए कर्तव्य का बहाना बनाती थी, पर इस बहाने में कोई दम नहीं था। कर्तव्य निभाना दरअसल परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का सबसे अच्छा तरीका है। जीवन प्रवेश की शुरुआत अपना कर्तव्य निभाने से होती है। कर्तव्य निभाते हुए जो अवस्थाएं उजागर होती हैं, जो विचार और नजरिए पनपते हैं, उन पर चिंतन करने, सत्य खोजने और सबक सीखने के लिए परमेश्वर के सामने लाया जा सकता है। मैंने सिर्फ काम पर, नाम और रुतबे के पीछे भागने पर ध्यान दिया, जीवन प्रवेश पर नहीं। मैं कितनी अंधी और अज्ञानी थी! इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने शपथ ली कि मैं आगे से नाम और रुतबे के लिए काम नहीं करूंगी, सत्य के अनुसरण और जीवन प्रवेश पर ज्यादा ध्यान दूँगी।

बाद में, परमेश्वर के वचनों से मुझे अभ्यास के कुछ रास्ते मिले। "जब परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास की बात आती है, तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से निभाने के अलावा सत्य को समझना, सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना और जीवन में प्रवेश करने के लिए अधिक प्रयास करना महत्वपूर्ण होता है। चाहे कुछ भी हो जाए, सीखने के लिए कुछ सबक तो होते ही हैं, इसलिए इसे हल्के में लेकर छोड़ो मत। तुम्हें इस बारे में एक-दूसरे से सहभागिता करनी चाहिए, तब तुम्हें पवित्र आत्मा प्रबुद्ध और प्रकाशित करेगा और तुम सत्य समझ पाओगे। संगति के जरिए, तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाता है। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारी कुछ समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा, तुम्हें ज्यादा से ज्यादा बातें स्पष्ट रूप से समझ आने लगेंगी और सत्य की तुम्हारी समझ बढ़ जाएगी। इस तरह, तुम्हारी जानकारी के बिना ही तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ जाएगा। सत्य के लिए प्रयास करने में तुम्हें पहल करनी चाहिए और सत्य के लिए तुम्हें अपनी पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए। ... जो लोग हमेशा धर्म-सिद्धांत के खोखले शब्द झाड़ते हैं, तोते की तरह नारे लगाते हैं, ऊंची प्रतीत होती बातें कहते हैं, नियमों का पालन करते हैं, और कभी भी सत्य के अभ्यास पर ध्यान नहीं देते, वे कुछ भी हासिल नहीं करते, चाहे वे कितने ही वर्षों पुराने विश्वासी क्यों न हों। वे कौन-से लोग हैं जो कुछ हासिल करते हैं? वे लोग जो ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं और सत्य का अभ्यास करने के लिए तैयार होते हैं, जो परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को अपना मिशन समझते हैं, जो खुशी-खुशी अपना सारा जीवन परमेश्वर के लिए खपा देते हैं और खुद अपने लिए योजनाएँ नहीं बनाते, जिनके पाँव मजबूती से जमीन पर टिके होते हैं और जो परमेश्वर के आयोजनों का पालन करते हैं। वे अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य के सिद्धांतों को समझने में सक्षम होते हैं, और हर काम सही ढंग से करने के लिए अथक प्रयास करते हैं, इससे उन्हें परमेश्वर की गवाही देने के परिणाम को हासिल करने और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने का अवसर मिलता है। जब वे अपना कर्तव्य निभाने के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करते हैं। वे परमेश्वर की तरफ से आने वाले आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन करने में सक्षम रहते हैं, और वे अपने हर काम में सत्य की खोज और उसका अभ्यास करते हैं। वे तोते की तरह नारे नहीं लगाते या ऊंची प्रतीत होने वाली बातें नहीं कहते, बल्कि अपने पाँव मजबूती से जमीन पर टिकाकर हर काम करने पर, और बहुत जतन से सिद्धांतों का पालन करने पर ही ध्यान देते हैं। वे हर काम में अथक प्रयास करते हैं, हर चीज को समझने का बहुत प्रयास करते हैं, और कई मामलों में वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम रहते हैं, जिसके बाद वे ज्ञान और समझ हासिल कर लेते हैं, और वे सबक सीखने और सचमुच कुछ पा लेने में सफल हो जाते हैं। जब उनके मन में गलत विचार आते हैं तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उनके समाधान के लिए सत्य की खोज करते हैं; वे चाहे जिन सत्यों को भी समझते हों, उनके मन में उनके लिए प्रशंसा की भावना होती है, और वे अपने अनुभवों और गवाही के बारे में बात करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग आखिर में सत्य को प्राप्त कर लेते हैं" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश')। परमेश्वर के वचनों में, मुझे सत्य के अनुसरण का एक रास्ता मिला। जब कुछ होता है, तो हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, आत्मचिंतन करना, सत्य खोजना और खुद को जानना चाहिए। हमें हर मामले से ईमानदारी से निपटना चाहिए और उनसे सबक सीखने चाहिए। इस समय, परमेश्वर के घर ने अगुआओं और कार्यकर्ताओं को लेख लिखने के लिए कहा है; अगर हम लेख नहीं लिखते, तो हम उपयोगी नहीं हो सकते। भले ही हमारे पास रुतबा हो, देर-सवेर हमें हटा दिया जाएगा। मैंने परमेश्वर की इच्छा को और ज्यादा समझा। परमेश्वर का घर अगुआओं और कार्यकर्ताओं से अपेक्षा करता है कि वे सत्य का अनुसरण और जीवन प्रवेश करें। सत्य का अनुसरण न करने वाले अगुआ ज्यादा देर नहीं टिकते, वे देर-सवेर हटा दिए जाएंगे। इससे पहले मैं सिर्फ अपने काम में व्यस्त थी, अपने जीवन प्रवेश पर ध्यान नहीं देती थी। बरसों से, मैंने कोई प्रामाणिक गवाही लेख भी नहीं लिखा था। अपने कर्तव्य में मैं बहुत-से झटकों, विफलताओं और चूकों से गुजरी थी। मैंने कई भ्रष्ट स्वभाव उजागर किए थे, कुछ काट-छांट और निपटान का भी अनुभव किया था। अगर मैं सत्य का अनुसरण और जीवन में प्रवेश करना चाहती थी तो मुझे लेख लिखने चाहिए। इसलिए, मैंने पहले उस काट-छांट और निपटान जो चुना, जिसने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था, अपनी काट-छांट और निपटान के कारणों पर चिंतन किया। रोज खाते और कपड़े धोते समय और सोने से पहले, मैं उस घटना की पृष्ठभूमि पर चिंतन-मनन करती, मैंने कौन-से भ्रष्ट स्वभाव उजागर किए थे, परमेश्वर के कौन-से वचन खाए और पिए थे, परमेश्वर के वचनों में मुझे अभ्यास का कौन-सा रास्ता मिला था, मैं कौन-से मिथ्या विचारों और नजरियों को पहचान पाई थी। मैंने जितना सोचा, मेरा अनुभव उतना ही स्पष्ट होता चला गया, जिससे काट-छांट और निपटान से सीखे जाने वाले सबक भी स्पष्ट हो गए, परमेश्वर के वचनों से मुझे अपने भ्रष्ट स्वभावों की और ज्यादा समझ आई। मुझे यह भी महसूस हुआ कि लेख लिखकर मैं परमेश्वर के सामने शांत हो सकती हूँ, अपनी अवस्था पर मनन कर सकती हूँ, परमेश्वर के वचनों पर विचार करके खुद को जान सकती हूँ, जो सब मेरे जीवन प्रवेश के लिए बेहद लाभदायक थे। मैं कितनी अज्ञानी थी। मुझे लगता था जीवन प्रवेश और लेख लिखने से मेरा समय बर्बाद होगा और मेरे काम पर असर पड़ेगा। अब मैं समझ गई हूँ कि इससे मैं अप्रभावी नहीं होती; अक्सर अपनी अवस्था पर सोच-विचार करने और परमेश्वर के वचनों द्वारा आत्म-चिंतन करने से मुझे अपनी समस्या को साफ देखने में मदद मिली है। पहले मैं हमेशा अपने नाम और रुतबे के लिए काम करती थी, इसे खोने से डरती थी। मैं डरती थी कि मैं गलतियाँ करूंगी तो मेरी अगुआ पर मेरी बुरी छाप पड़ेगी। अगर मेरे कर्तव्य में कुछ गलतियाँ और चूकें होतीं, मेरी अगुआ द्वारा ध्यान दिलाने या काट-छांट और निपटान के बाद, मैं स्वीकार तो लेती कि काट-छांट और निपटान मेरी भलाई और मदद के लिए था, पर इससे मेरा हमेशा डूब जाता था, और मुझे यह आशंका रहती थी कि मेरी अगुआ समझेगी कि मुझमें काम करने की योग्यता और क्षमता नहीं है और मैं किसी काम की नहीं हूँ, या फिर अगुआओं को बहुत-सी समस्याएँ दिख जाएंगी, और मेरे कर्तव्य निभाने का अंत हो जाएगा। हमेशा ऐसा लगता था जैसे मेरे सिर पर कोई भारी बोझ हो। जब मैंने जीवन प्रवेश पर ध्यान दिया और अपने परिवेश से रोज सबक सीखने लगी, तो कभी मेरी अगुआ को मेरे काम में समस्याएँ मिल जातीं, और वह मेरे साथ संगति करती, तो मुझे पहले जितनी हताशा का एहसास नहीं होता थी, अब मुझे यह चिंता नहीं रहती थी कि मेरे अगुआ मुझे कैसे देखेंगे। मैं गलतियाँ करती तो मुझे पछतावा होता, मैं अपनी भूलों और चूकों पर चिंतन-मनन करती, कि मेरे कौन-से भ्रष्ट स्वभावों या मिथ्या विचारों के कारण ये गलतियाँ हुई थीं, यह सब समझने के बाद, मैं परमेश्वर के वचनों में उत्तर खोज सकती थी, चीजों को ठीक कर सकती थी। इस तरह अभ्यास करने के बाद मुझे अपना काम पहले जितना थकाऊ न लगता।

मैंने जीवन प्रवेश पर ध्यान देने की मिठास का भी स्वाद चखा, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, कहा कि वचनों के अनुसार आत्म-चिंतन करूंगी और सत्य का ज्यादा अनुसरण करूंगी। कभी-कभी, जब मैं काम में बहुत ज्यादा व्यस्त होती हूँ और सुबह परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ पाती, तो खाने या सोने से पहले, मैं चिंतन करती हूँ कि मेरी अवस्था कैसी है, मैं कौन-सी भ्रष्टता उजागर करती हूँ, आत्मचिंतन के लिए परमेश्वर के वचनों के कौन-से अंश पढ़ने चाहिए। इन पर अच्छे से सोचने के बाद, मैं समय मिलते ही परमेश्वर के संबंधित वचन पढ़ती हूँ। मैं अब पहले की तरह नहीं सोचती, कि मेरे भ्रष्ट स्वभावों का फौरन समाधान न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, और मैं बाद में समय मिलने पर उन्हें ठीक कर सकती हूँ। अब कुछ समय बीत चुका है तो मैं उन विचारों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गई हूँ जिन्हें मैं उजागर करती हूँ, मुझे अब भी अपने कर्तव्य में कुछ चूकें दिखती हैं, और मैं परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के मार्ग पा सकती हूँ। अब मैं यही महसूस करती हूँ कि परमेश्वर में मेरे विश्वास में सत्य का अनुसरण बहुत महत्वपूर्ण है। हमें परमेश्वर के कार्य का जमीनी स्तर पर अनुभव करना चाहिए, हर चीज को समझने का प्रयास करना चाहिए। अगर हम अपना श्रेष्ठतम प्रयास कर रहे हैं, जीवन प्रवेश में बोझ उठा रहे हैं, सत्य के लिए तड़प रहे हैं, तो हमें परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। हम अपने आसपास होने वाली घटनाओं से भी सत्य पा और सबक सीख सकते हैं।

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