मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 6. लोगों के प्रदर्शन के अनुसार उनके परिणाम के निर्धारण का अर्थ

1. यदि परमेश्वर केवल लोगों के स्वभाव की अभिव्यक्ति की ओर देखे तो कोई भी बचाया नहीं जा सकता है।

वर्तमान में, लोगों का प्रदर्शन उनके परिणाम को निर्धारित करता है, लेकिन यह प्रदर्शन क्या है? क्या आप जानते हैं? आप लोग सोच रहे होंगे कि यह लोगों के कार्यों में उनके भ्रष्ट स्वभाव को व्यक्त करने के बारे में है, परन्तु वास्तव में इसका अर्थ यह नहीं है। आप सत्य को अभ्यास में लाने के योग्य हैं या नहीं, आप अपने कर्तव्य को करते समय ईमानदार और समर्पित रहने के योग्य हैं या नहीं, साथ ही साथ परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में आपका दृष्टिकोण, आपका परमेश्वर के प्रति रवैया, कठिनाईयों को सहने का निश्चय, न्याय और सुधार स्वीकार करने के प्रति रवैया, परिवर्तन का स्तर और गम्भीर अपराधों की संख्या, यह सब कुछ इस प्रदर्शन से सम्बन्ध रखता है। यह सब आपके प्रदर्शन में योगदान देता है। यह प्रदर्शन आपके भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण की अधिकतम सीमा का उल्लेख नहीं करता है, परन्तु इसके बजाय इस बात को प्रकट करता है कि आपने परमेश्वर पर विश्वास करके क्या हासिल किया है। यदि लोगों का परिणाम उनके स्वभाव की अभिव्यक्ति के अनुसार निर्धारित किया जाता, तो कोई भी नहीं बचाया जा सकता था। यह कैसे परमेश्वर की धार्मिकता हो सकती है? यदि आप एक अगुवे हैं, तो यह आपके स्वभाव से ही अधिक से अधिक व्यक्त होगा और जो कोई जितना अधिक व्यक्त करता है वह बचे रहने के बारे में उतना ही कम आश्वस्त रहता है। यदि यह लोगों के परिणाम को निर्धारित करता है, तो लोग जितने अधिक उच्च स्तर पर कार्य करेंगे, उतनी ही अधिक तीव्रता से वे समाप्त भी होंगे; वे जितने अधिक उच्च स्तर पर होंगे, उतना ही अधिक उच्च स्तर पर वे अपने स्वभाव व्यक्त करेंगे। यदि यह मामला होता, तो कौन अपना कर्तव्य पूरा करने की हिम्मत करेगा? इस प्रकार से, क्या ऐसा नहीं होगा कि जो कोई अपना कर्तव्य नहीं निभाता है वे सभी बचाए जाएंगे?

यह प्रदर्शन इसका उल्लेख करता है कि आप परमेश्वर के प्रति वफादार हैं कि नहीं, आप उससे प्रेम करते हैं कि नहीं, आप सत्य को अभ्यास में लाते हैं कि नहीं, साथ ही साथ आप किस हद तक परिवर्तित हुए हैं। इस प्रदर्शन के अनुसार आपका दण्ड निर्धारित किया जाता है; यह इसके अनुसार नहीं होता है कि कितना अधिक भ्रष्ट स्वभाव व्यक्त किया गया है। यदि आप इस प्रकार से सोचते हैं, तो आपने परमेश्वर की इच्छा का गलत अर्थ लगा लिया है। सभी मनुष्यों का स्वभाव एक सा ही है, बस मानवता के कुछ अच्छे और खराब पहलू हैं। हालांकि आप इसे व्यक्त न करते हों, फिर भी आपका स्वभाव व्यक्त करने वाले लोगों के जैसा ही है। परमेश्वर मनुष्य के भीतर गहराई में पाई जाने वाली बातों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। आपको परमेश्वर से कुछ भी छिपाने की आवश्यकता नहीं है - परमेश्वर लोगों के हृदय और मन को जांचता है। यदि आपके उच्च स्तर पर कार्य करते हुए बहुत सारी भ्रष्टता प्रकट होती है, तो परमेश्वर इसे देखेगा; यदि आप कार्य नहीं करेंगे और यह प्रकट नहीं होगा, तो क्या परमेश्वर को पता नहीं चलेगा? क्या यह स्वयं के झूठ पर विश्वास करना नहीं है? वास्तविकता यह है कि परमेश्वर, आपके सम्पूर्ण स्वभाव को चाहे वह बाहर का हो या भीतर का, जानता है, इससे कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कहां पर हैं? परमेश्वर अच्छी तरह से समझता है कि कौन अपने कार्य को करता है, परन्तु क्या वह उन लोगों के बारे में नहीं जानता जो अपने कार्य नहीं करते हैं? कुछ लोगों को लगता है कि उच्च स्तर वाले अगुवे सिर्फ़ अपनी ही कब्र की खुदाई कर रहे हैं, क्योंकि उनकी बहुत सारी भ्रष्टताएँ अनिवार्य रूप से प्रकट हो जाएँगी और परमेश्वर के द्वारा देख ली जाएँगी। यदि वे कार्य नहीं करेंगे तो क्या यह इतना अधिक प्रकट होगा? इस प्रकार की सोच निरर्थक है! यदि परमेश्वर इसे नहीं देखेगा, तो क्या वह इस पर दोष लगा सकेगा? यदि यह मामला होता, तो क्या यह ऐसा नहीं होता कि जो अपना कार्य नहीं करते वे सभी बचे रहते? मानवीय समझ के अनुसार, परमेश्वर कार्य करने वालों के परिवर्तन को नहीं देखेगा, चाहे उनका परिवर्तन कितना भी महान क्यों न हो; परमेश्वर उनको केवल उनकी भ्रष्टता की अभिव्यक्ति के अनुसार ही दोषी ठहराएगा। इसके विपरीत, परमेश्वर थोड़ा व्यक्त करने वालों को दोषी नहीं ठहराएगा, चाहे उनका थोड़ा परिवर्तन ही क्यों न हुआ हो। क्या आप को लगता है कि यह परमेश्वर की धार्मिकता है? यदि परमेश्वर ऐसा करता है तो क्या कोई कह सकता है कि परमेश्वर धर्मी है? क्या यह आपका गलत अर्थ लगाना नहीं है और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में गलत समझ नहीं है? तो क्या परमेश्वर पर आपका विश्वास गलत नहीं है? क्या यह ऐसा विश्वास करना नहीं है कि परमेश्वर कभी भी धर्मी रहा ही नहीं? क्या इस प्रकार की सोच परमेश्वर की निंदा करनी नहीं है? यदि आपके पास कुछ भी सकारात्मक नहीं है और न ही कुछ भी नकारात्मक प्रकट होता है, तो अभी भी आप बचाए नहीं जा सकते हैं। सबसे प्रमुख बात यह है कि सकारात्मक प्रदर्शन ही लोगों के परिणाम को निर्धारित करता है। फिर भी, यहां पर कुछ भी बहुत अधिक नकारात्मक नहीं है - यदि यह विनाश या दण्ड के समान गम्भीर होता, तो वे बर्बाद हो जाते। यदि यह आपकी कल्पना के अनुसार होता, तो जो लोग निचले स्तर पर अनुयायी हैं वे अंत में उद्धार प्राप्त कर लेते और जो अगुवे हैं वे फँस जाते। आपका एक कर्तव्य है जिसे आपको अवश्य ही निभाना है; परन्तु जब आप उस कर्तव्य को निभाते हैं तो आप न चाहते हुए भी अपनी भ्रष्टता को व्यक्त करेंगे, मानो आपकी गर्दन कटने वाली हो। यदि लोगों का परिणाम उनके स्वभाव से निर्धारित होता, तो कोई भी नहीं बचाया जा सकता था - यदि वास्तव में यही मामला होता, तो परमेश्वर की धार्मिकता का क्या होता? यह कहीं भी नहीं देखी जा सकेगी। आप सभी ने परमेश्वर की इच्छा को गलत समझा है।

2. यह प्रदर्शन, परमेश्वर का लोगों में किए गए कार्य का परिणाम है।

आइए, मुझे एक उदाहरण देने दें: एक बगीचे में, मालिक पेड़-पौधों को पानी और खाद देता है, फिर उन से फल पाने का इंतज़ार करता है। फल देने वाले पेड़ अच्छे होते हैं और उन्हें सम्भाल कर रखा जाता है, फल नहीं देने वाले पेड़ अच्छे पेड़ बिल्कुल नहीं होते हैं और उन्हें नहीं रखा जाता है। इस स्थिति पर भी विचार करें: एक पेड़ फल देता है परन्तु उसे एक बीमारी है और कुछ बेकार शाखाओं को काटने की आवश्यकता है। क्या ऐसे पेड़ को रखा जाना चाहिए? हां, इसे अवश्य ही रखा जाना चाहिए और यह कांट-छांट और उपचार के बाद वह स्वस्थ हो जाएगा। एक और स्थिति पर विचार करें: एक पेड़ में कोई बीमारी नहीं है, परन्तु उसमें फल नहीं होते - इस प्रकार के पेड़ को नहीं रखना चाहिए। यहां पर “फल होने” से क्या तात्पर्य है? इसका अर्थ परमेश्वर का कार्य अपना प्रभाव दिखा रहा है। जब परमेश्वर लोगों में अपना कार्य करता है, तो उनका स्वभाव व्यक्त हो ही जाता है और शैतान की भ्रष्टता के चलते उनमें अनिवार्य रूप से कुछ कमियां होती हैं, परन्तु इसके मध्य में भी उनमें परमेश्वर का कार्य कुछ फलों को लेकर आता है। यदि परमेश्वर वह नहीं देखता, बल्कि केवल मनुष्यों के व्यक्त स्वभाव को ही देखता, तो मनुष्यों का उद्धार नहीं हो सकता था। लोगों को बचाए जाने का फल मुख्य तौर पर उनके कर्तव्य को पूर्ण करने और सत्य को अभ्यास में लाने में प्रकट होता है। परमेश्वर इन क्षेत्रों में लोगों की उपलब्धि के स्तर, साथ ही साथ उनके अपराधों की हद की ओर देखता है। ये दोनों कारक उनके परिणाम और उनके बचाए या न बचाए जाने को निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत ही अधिक भ्रष्ट होते हैं, और पूर्ण तौर पर देह के, न कि परमेश्वर के परिवार को समर्पित होते हैं। उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने आप को बिल्कुल ही नहीं खपाया, परन्तु अब वे अपने कर्तव्य का प्रदर्शन अति उत्साह और परमेश्वर के साथ एक मन होकर कर रहे हैं - इस दृष्टिकोण से, क्या कोई परिवर्तन हुआ है? यह एक परिवर्तन है। यही परिवर्तन परमेश्वर चाहता है। इसके अलावा, कुछ लोग, जब उनके पास कुछ विचार होते थे तो वे अपने आप को स्वयं के आसपास प्रसारित करना चाहते थे, परन्तु अब जब उनके पास कुछ विचार हैं, तो वे अपने आप को प्रसारित किए बिना या परमेश्वर के विरोध कुछ भी किए बिना, आज्ञाकारी और सत्य को खोजने वाले बन गए हैं। क्या यहां पर परिवर्तन है? हां! कुछ लोगों ने कभी विरोध किया होगा जब उनके साथ कार्य किया गया या उन्हें सुधारा गया था, परन्तु अब जब उनका सुधार किया जाता है और उनके साथ फिर से कार्य किया जाता है, तो वे स्वयं जान सकते हैं। इसे स्वीकार करने के बाद, उनमें कुछ वास्तविक परिवर्तन होते हैं - क्या यह एक प्रभाव नहीं है? हां! फिर भी, आपके परिवर्तनकितने भी बड़े क्यों न हों, आपका स्वभाव एक बार में ही नहीं बदल सकता। किसी भी अपराध को प्रकट नहीं करना असम्भव है, परन्तु यदि आपका प्रवेश सामान्य किया गया है, यहां तक कि यदि कुछ अनाज्ञाकारिता भी होती है, तो आप को उस समय इसके बारे में पता चल जाएगा। यह जागरूकता आप में तुरन्त परिवर्तन लेकर आ सकती है और आपकी स्थिति बेहतर से और भी बेहतर होती जाएगी। आप से एक या दो बार अपराध हो सकते हैं, परन्तु इसे बार-बार नहीं दोहराया जाएगा। यही परिवर्तन कहलाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि कोई किसी एक क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है तो उस में अब कुछ भी अपराध नहीं है; यह मामला नहीं है। इस प्रकार के परिवर्तन का अर्थ है कि जिसने भी परमेश्वर के कार्य का अनुभव प्राप्त कर लिया है वह सत्य को और भी अधिक अभ्यास में ला सकता है तथा परमेश्वर की आवश्यकता में से कुछ का अभ्यास कर सकता है। उनके अपराध और भी कम होते जाएंगे तथा अनाज्ञाकरिता की अवस्था कम गम्भीर होती जाएगी। आप इस से देख सकते हैं कि परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली होना प्रारम्भ हो गया है; इस प्रकार की अभिव्यक्ति में परमेश्वर जो चाहता है कि यह परिणाम लोगों में प्राप्त किए जाएं। इसी प्रकार से, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के परिणामों को सम्भालने का तरीका और किसी के साथ व्यवहार करने का तरीका पूरी तरह से धर्मी, उचित और निष्पक्ष है। आप को सिर्फ़ अपने सम्पूर्ण प्रयासों को केवल परमेश्वर के लिए ही लगाने की आवश्यकता है, दृढ़तापूर्वक सत्य के अभ्यास में अपने हृदय को पूरी तरह से लगाएं, यही आपको करना चाहिए और परमेश्वर आप से अन्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं करेगा। इसके बारे में सोचें: क्या वे लोग जो सत्य को अभ्यास में लाते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा दण्ड दिया जा सकता है? कई लोग हमेशा ही परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के बारे में शक करते हैं और भयभीत रहते हैं कि यदि वे सत्य को अभ्यास में लाएंगे तो भी उन्हें दण्ड मिलेगा; वे भयभीत रहते हैं कि परमेश्वर उनकी वफ़ादारी और भक्ति को नहीं देखेगा। कुछ लोग सुधार किए जाने और उनके ऊपर कार्य होने के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं; वे अपना कर्तव्य निभाने में अत्यधिक कमजोरी महसूस करते हैं और अपनी वफ़ादारी और भक्ति को खो देते हैं। ऐसा क्यों होता है? यह आंशिक तौर पर लोगों का उनके कार्यों के सार के प्रति जागरूकता की कमी के कारण होता है जो सुधार तथा उनमें किए जाने वाले कार्य को स्वीकार न करने का परिणाम बनती है। यह आंशिक तौर पर लोगों को, उनके साथ किए जाने वाले कार्य और सुधार के महत्व के बारे में समझ न होने के कारण से भी होती है, ऐसा विश्वास करते हुए कि यह उनके परिणाम के निर्धारण का संकेत हो सकता है। परिणामस्वरूप, लोग ग़लती से यह विश्वास कर लेते हैं कि उनकी परमेश्वर के प्रति कुछ वफ़ादारी और भक्ति है, तो उन में कुछ कार्य और सुधार नहीं किया जा सकता; यदि उनके साथ ऐसा होता है तो यह परमेश्वर की धार्मिकता नहीं हो सकती। इस प्रकार की ग़लतफ़हमी, कई लोगों को परमेश्वर के प्रति वफ़ादार और भक्त न बनने देने का कारण बनी है। वास्तव में, यह सब इसलिए हुआ क्योंकि लोग भी धोख़बाज़ हैं; वे कठिनाई को सहना नहीं चाहते - वे आसानी से आशीषें प्राप्त करना चाहते हैं। वे परमेश्वर की धार्मिकता से परिचित नहीं हैं। यह इसलिए नहीं कि परमेश्वर ने कुछ भी धार्मिकता का कार्य नहीं किया है या वह कुछ भी धार्मिक कार्य नहीं करेगा, यह केवल इस लिए होता है क्योंकि लोग कभी भी यह नहीं सोचते कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह धार्मिक ही होता है। मानव दृष्टि में, यदि परमेश्वर का कार्य मनुष्य की इच्छा के अनुसार नहीं होता या उनकी अपेक्षा के अनुसार नहीं होता, तो इसका अर्थ यह होता है कि वह धर्मी नहीं है। लोग कभी भी यह महसूस नहीं करते हैं कि उनके द्वारा किया जाने वाला कार्य उचित नहीं है या सत्य के अनुरूप नहीं है; वे कभी भी महसूस नहीं करते कि वे परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं। यदि परमेश्वर कभी भी लोगों के अपराधों के कारण उन पर कार्य न करे या उनमें सुधार न करे और कभी भी उनकी गलतियों के लिए उलाहना न दे, परन्तु हमेशा शान्त रहे, उन्हें कभी भी उकसाए नहीं, कभी भी उन्हें नाराज़ न करे और कभी भी उनके दागों को प्रकट न करे, बल्कि उन्हें खाने-पीने और उसके साथ अच्छा समय बिताने दे, तो लोग कभी भी यह शिकायत नहीं करेंगे कि परमेश्वर धर्मी नहीं है। वे पाखंडपूर्ण ढंग से कहेंगे कि वह कभी भी धर्मी रहा ही नहीं। इसलिए, लोग अभी भी विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर परिवर्तन के अनुसार उनका प्रदर्शन चाहता है। यदि लोग ऐसा करते रहेंगे तो परमेश्वर कैसे उन्हें आराम देने का आश्वासन दे सकता है? यदि परमेश्वर लोगों के प्रति थोड़ा सा ही उलाहना भरा होता, तो वे कभी भी विश्वास नहीं कर सकते थे कि वह उनके परिवर्तन के अनुसार प्रदर्शन देखता है। वे विश्वास करना बंद कर देंगे कि वह धर्मी है और परिवर्तित होने की उनकी इच्छा भी समाप्त हो जाएगी। यदि लोग इसी प्रकार की परिस्थितियों में जीते रहेंगे, तो वे स्वयं के ही विचारों से धोखा खाएंगे।