मोआब के वंशजों का परीक्षण

17 अक्टूबर, 2020

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')। "अब मोआब के वंशजों पर कार्य करना उन लोगों को बचाना है, जो सबसे गहरे अँधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित थे, फिर भी परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है, क्योंकि पहले वे सभी ऐसे लोग थे, जिनके हृदयों में परमेश्वर की कमी थी; केवल उन लोगों को, जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं है, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने और उससे प्रेम करने के लिए तैयार करना ही सच्ची विजय है, और ऐसे कार्य का फल सबसे मूल्यवान और सबसे ठोस है। केवल यही महिमा प्राप्त कर रहा है—यही वह महिमा है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में हासिल करना चाहता है। बावजूद इसके कि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब इनका ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर द्वारा एक उन्नयन है। यह काम बहुत ही सार्थक है, और वह न्याय के माध्यम से ही इन लोगों को प्राप्त करता है। उसका इरादा इन लोगों को दंडित करने का नहीं, बल्कि बचाने का है। यदि, अंत के दिनों में, वह अभी भी इस्राएल में विजय प्राप्त करने का काम कर रहा होता, तो वह बेकार होता; यदि वह फलदायक भी होता, तो उसका कोई मूल्य या कोई बड़ा अर्थ न होता, और वह समस्त महिमा प्राप्त करने में सक्षम न होता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ')। परमेश्वर के इन वचनों को पढ़कर मुझे मोआब के वंशज के तौर पर अपने परीक्षण की याद आती है।

मुझे याद है 1993 में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने "विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (2)" और "मनुष्य का सार और उसकी पहचान" को व्यक्त किया था। उसने यह खुलासा किया था कि चीन में, परमेश्वर के चुने हुए सभी लोग मोआब के वंशज हैं। उस समय मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा था : "मोआब के वंशज विश्व में सब लोगों से निम्न हैं। कुछ लोग पूछते हैं, 'क्या हाम के वंशज सबसे निम्न नहीं हैं?' बड़े लाल अजगर की संतानें और हाम के वंशज भिन्न-भिन्न प्रातिनिधिक महत्व के हैं, और हाम के वंशज एक अलग मामला हैं : भले ही उन्हें किसी भी प्रकार शापित किया जाता हो, वे फिर भी नूह के वंशज हैं; इस बीच, मोआब की उत्पत्ति शुद्ध नहीं थी : मोआब व्याभिचार से आया था, और इसी में अंतर निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (2)')। "जिन्हें मैं बचाता हूँ, उन मनुष्यों को मैंने बहुत पहले से पूर्वनिर्धारित किया था और जिन्हें मेरे द्वारा छुटकारा दिलाया गया है, जबकि तुम लोग वो बेचारी आत्माएँ हो जो नियमों के अपवाद के रूप में मनुष्यों के बीच रखी गई हैं। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि तुम दाऊद या याकूब के घर के नहीं, बल्कि मोआब के परिवार के सदस्य हो, किसी अन्य-राष्ट्र जाति के सदस्य। क्योंकि मैंने तुम्हारे साथ एक वाचा स्थापित नहीं की, परन्तु केवल तुम्हारे बीच कार्य किया और बात की और तुम्हारी अगुआई की। मेरा लहू तुम्हारे लिए नहीं बहा था; मैं केवल अपनी गवाही की खातिर तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा था। क्या तुम लोग नहीं जानते?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य का सार और उसकी पहचान')। मैं एकदम हैरान रह गयी। मैंने सोचा, "क्या हम मोआब के वंशज हैं? क्या यह सच है? मोआब लूत और उसकी बेटी से पैदा हुआ था। वह ऐयाशी का नतीजा था, पवित्र मूल का नहीं था, तो आख़िर हम उसके वंशज कैसे हो सकते हैं? प्रभु में मेरी आस्था में, वे कहते थे कि हम इस्राएलियों के वंशज हैं, हम याकूब के घर से हैं। तो फिर, परमेश्वर ऐसा क्यों कहेगा कि हम मोआब के वंशज हैं?" मैं इसे बिलकुल भी स्वीकार नहीं कर पा रही थी, लेकिन फिर मैंने सोचा, "परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और सिर्फ़ वही तथ्यों का ख़ुलासा करता है। यह ग़लत नहीं हो सकता! मैं मोआब की वंशज क्यों हूँ, और चीन में पैदा क्यों हुई?" मैंने सोचा था कि परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने वाले पहले इंसानों में से एक होने, अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य के लिए चुने गए शुरुआती लोगों में से एक होने, और एक ऐसी इंसान होने के नाते, जिसे आपदाओं से पहले एक आदर्श विश्वासी, एक विजेता बना दिया जाएगा, मेरा रुतबा किसी भी दूसरे देश में परमेश्वर के चुने हुए व्यक्ति से बड़ा होना चाहिए। लेकिन हैरानी की बात है कि मैं मोआब की वंशज थी, और परमेश्वर द्वारा शापित किये जाने वालों में सबसे शीर्ष पर, मैं ऐयाशी का नतीजा थी। मैं सभी इंसानों में सबसे नीच, सबसे भ्रष्ट थी। अगर अविश्वासियों को इस बारे में पता चल गया तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मेरे परिवार के अविश्वासी लोग क्या कहेंगे? मैंने अपनी आस्था के लिए अपना घर और करियर छोड़ दिया था, मैं पीड़ा झेल रही थी और खुद को खपा रही थी, लेकिन अंत में मैं सिर्फ़ मोआब की एक वंशज निकली। यह कितनी अपमानजनक और शर्मनाक बात थी। मुझे लगा कि मुझे ख़ामोशी में पीड़ा सहनी होगी। उस दौरान, जब भी मैं इस बारे में सोचती कि मैं मोआब की वंशज हूँ, ऐयाशी का नतीजा हूँ, तो मैं बहुत शर्मिंदा हो जाती और मुझे अपना चेहरा दिखाने की हिम्मत भी नहीं होती थी। एक बार तो मैं कई दिनों तक घर पर ही रही, न कुछ खाती और न सोती थी, घर में भी कुछ करने का दिल नहीं करता था। दिल ही दिल में, मैं निरंतर शिकायत कर रही थी, "मैं मोआब की वंशज कैसे हो सकती हूँ? मेरी विरासत और मेरा रुतबा इतना नीचा कैसे हो सकता है?" मैं एक ऐसी इंसान की तरह थी जो एक अमीर परिवार में पली-बढ़ी थी, यह सोचकर बहुत गर्व करती थी कि मैं ऊँचे घराने में पैदा हुई हूँ, लेकिन फिर एक दिन अचानक मैंने जाना कि मुझे गंदगी से निकाला गया है, और अब उस ऊँचे वंश से मेरा बिलकुल कोई संबंध नहीं है। मेरे अंदर दुख, लाचारी और निराशा की एक लहर दौड़ गई थी और मैं इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मैं असंतोष, नकारात्मकता और गलतफहमी से भरी हुई थी। मैंने सोचा कि मोआब की एक वंशज होने के नाते, मैं शापित हूँ और परमेश्वर मुझे कभी नहीं बचाएगा। मैं जितना इस बारे में सोचती, उतना ही मुझे लगता कि मेरे साथ अन्याय हुआ है। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी छाती पर बहुत भारी दबाव हो, और मैं बड़ी मुश्किल से साँस ले पा रही हूँ। मैं अकेली चुपचाप बाथरूम में जाकर रोने लगती थी। उस समय सभी लोग दुखी थे। जब भी इसका जिक्र होता तो कुछ लोग रो पड़ते थे।

जब हम इस पीड़ा में जी रहे थे, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपने ये वचन, "मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ" भेजे, जिनमें हमारी स्थिति का ख़ुलासा किया गया है और हमें बताया है कि उसकी इच्छा क्या है। मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "शुरुआत में जब मैंने तुम लोगों को परमेश्वर के लोगों का स्थान दिया था, तो तुम लोग अन्य किसी से भी ज्यादा, अत्यधिक ख़ुशी से ऊपर-नीचे उछल रहे थे। लेकिन जैसे ही मैंने कहा कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, तो तुम्हारा क्या हुआ? तुम सभी तितर-बितर हो गए! कहाँ है तुम लोगों का आध्यात्मिक कद? हैसियत की तुम लोगों की अवधारणा बहुत मजबूत है! ... तुम लोगों ने किस प्रकार की पीड़ा सहन की है, जो तुम यह महसूस करते हो कि तुम्हारे साथ बहुत गलत हुआ है? तुम लोग सोचते हो कि एक बार परमेश्वर ने तुम्हें एक निश्चित मात्रा में प्रताड़ित कर दिया, तो वह खुश हो जाएगा, मानो परमेश्वर जानबूझकर तुम्हारी निंदा करने आया है, और तुम लोगों की निंदा करने और तुम्हें नष्ट करने के बाद उसका कार्य पूरा हो जाएगा। क्या मैंने ऐसा ही कहा है? क्या तुम लोग ऐसा अपने अंधेपन के कारण नहीं सोचते हो? तुम लोग स्वयं अच्छा करने की कोशिश नहीं करते, या मैं जानबूझकर तुम लोगों की निंदा करता हूँ? मैंने कभी ऐसा नहीं किया है—ऐसा तुम लोगों ने खुद ही सोच लिया है। मैंने कभी बिलकुल भी इस तरह से कार्य नहीं किया है, न ही मेरा यह इरादा है। अगर मैं वास्तव में तुम लोगों को नष्ट करना चाहता, तो क्या मुझे इतनी कठिनाई उठाने की ज़रूरत थी? अगर मैं वास्तव में तुम लोगों को नष्ट करना चाहता, तो क्या मुझे तुम्हारे साथ इतनी ईमानदारी से बात करने की ज़रूरत थी? मेरी इच्छा यह है : मैं तभी आराम कर सकता हूँ, जब मैं तुम लोगों को बचा लूँगा। कोई व्यक्ति जितना अधम होगा, वह उतना ही अधिक मेरे उद्धार का लक्ष्य होगा। जितना अधिक तुम लोग अग्रसक्रियता से प्रवेश करने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक मैं प्रसन्न हूँगा। जितना अधिक तुम लोग टूटते हो, उतना ही अधिक मैं परेशान होता हूँ। तुम लोग हमेशा सिंहासन को अकड़कर लपकना चाहते हो—मैं तुमसे कहता हूँ, यह तुम्हें गंदगी से बचाने का मार्ग नहीं है। सिंहासन पर बैठने की विलक्षण कल्पना तुम लोगों को पूर्ण नहीं कर सकती; यह यथार्थवादी नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ')। इन्हें पढ़कर मैं ख़ुद को बहुत दोषी महसूस करने लगी। मैंने सोचा कि कैसे पहले, जब परमेश्वर ने कहा था कि हम राज्य के लोग बनेंगे और हमें विजेता यानी आदर्श बनाया जाएगा, तो मैं घमंडी बन गयी और खुद को पहचान नहीं पाई, मुझे लगा कि मैं परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को सबसे पहले स्वीकार करने वालों और सबसे पहले पूर्ण किये जाने वालों में से एक हूँ, इसलिए मेरा रुतबा किसी दूसरे देश के परमेश्वर के चुने हुए लोगों से ऊँचा होना चाहिए। मैं अहंकारी हो गयी थी, अपने आपसे बेहद ख़ुश थी। जब परमेश्वर ने ख़ुलासा करते हुए हमें मोआब के वंशज बताया, तो मैंने देखा कि मैं नीच कुल और नीच रुतबे की हूँ, और मैं परमेश्वर द्वारा शापित हूँ। मैंने सोचा कि परमेश्वर कभी भी मुझे नहीं बचाएगा, इसलिए मैं नकारात्मकता में घिर गयी और इससे निकल नहीं पा रही थी। मुझे एहसास हुआ कि रुतबा पाने की मेरी इच्छा बहुत ही प्रबल है, और मेरी आध्यात्मिक कद-काठी बहुत कमज़ोर है। असल में, भले ही परमेश्वर ने हमें मोआब के वंशजों के रूप में उजागर किया हो, लेकिन उसने ऐसा कभी नहीं कहा कि वह हमें नहीं बचाएगा। आखिरकार, उसने बड़े लाल अजगर के देश में देहधारण किया, हमें न्याय, ताड़ना, सिंचन और पोषण देने के लिए सत्य व्यक्त किया, ताकि हम, सबसे गंदे, भ्रष्ट लोगों को परमेश्वर द्वारा बचाये जाने का एक मौका मिल सके। इन सबके पीछे परमेश्वर के अच्छे इरादे छिपे हैं! लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पायी। मुझे लगा कि मोआब की वंशज होने के नाते, मेरे जैसा कोई गंदा और नीच व्यक्ति परमेश्वर की सबसे ज़्यादा घृणा और नफ़रत का पात्र होगा, ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह मुझे बचाए। मैंने गलत समझा और शिकायत की, मैं नकारात्मक और परमेश्वर विरोधी बन गयी। मैं कितनी विवेकहीन थी! इसके कुछ ही समय बाद, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम लोगों की प्रकृति या तुम लोगों के जन्मस्थान सबसे ऊँची किस्म के हैं? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम सभी पूरी तरह से मोआब के वंशज नहीं हो? क्या तथ्यों की सच्चाई बदली जा सकती है? क्या तुम लोगों की प्रकृति उजागर करने से अब तथ्यों की सच्चाई गलत हो जाती है? अपनी चापलूसी, अपने जीवन और अपने चरित्र देखो—क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम मानवजाति में निम्नतम हो? तुम लोगों के पास क्या है, जिसकी तुम शेखी बघार सकते हो? समाज में अपने दर्जे को देखो। क्या तुम लोग उसके सबसे निचले स्तर पर नहीं हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि मैंने गलत कहा है? अब्राहम ने इसहाक को बलिदान किया—तुमने किसे बलिदान किया है? अय्यूब ने सब-कुछ बलिदान किया—तुमने क्या बलिदान किया है? इतने सारे लोगों ने अपना जीवन दिया है, अपने सिर कुर्बान किए हैं, अपना खून बहाया है, सही राह तलाशने के लिए। क्या तुम लोगों ने वह कीमत चुकाई है? उनकी तुलना में तुम इस महान अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हो। तो क्या आज यह कहना तुम्हारे साथ अन्याय करना है कि तुम लोग मोआब के वंशज हो? तुम लोग खुद को बहुत ऊँचा मत समझो। तुम्हारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा महान उद्धार, ऐसा महान अनुग्रह तुम लोगों को मुफ्त में दिया जा रहा है। तुम लोगों ने कुछ भी बलिदान नहीं किया है, फिर भी तुम अनुग्रह का मुफ्त आनंद उठा रहे हो। क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ')। परमेश्वर के हर एक सवाल ने मेरे दिल के दरवाजे पर दस्तक दी। मैं बहुत शर्मिंदा थी, बहुत परेशान थी! मैंने युगयुगांतर के संतों के बारे में सोचा—वे परमेश्वर के प्रति समर्पित और आज्ञाकारी थे, और बड़े-बड़े परीक्षणों से गुज़रते हुए भी कभी उसे दोष नहीं दिया। उन्होंने परमेश्वर के लिए गवाही दी, उसकी स्वीकृति और आशीष प्राप्त किया। अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन किया, अपने सबसे प्यारे बेटे, इसहाक को परमेश्वर को समर्पित कर दिया। उसने परमेश्वर के सामने कोई शर्त नहीं रखी या परमेश्वर से बहस करने की कोशिश नहीं की, बल्कि पूरी तरह से आज्ञा का पालन किया। और जब अय्यूब एक भयंकर परीक्षण से गुजरा, तो उसने अपने परिवार की सारी संपत्ति और अपने सभी बच्चों को गँवा दिया, उसके पूरे शरीर पर फोड़े हो गए, इन सबके बावजूद उसने परमेश्वर की स्तुति करते हुए कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" (अय्यूब 1:21)। लेकिन मैं बड़े लाल अजगर के देश में पैदा हुई थी, छोटी उम्र से ही नास्तिकता, विकासवाद और भौतिकवाद की शिक्षा पाई थी। मुझे पता ही नहीं था कि कोई परमेश्वर भी है, उसकी आराधना करना तो जानती ही नहीं थी। मेरी आस्था सिर्फ़ परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष पाने के लिए थी, ताकि बाद में मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकूँ और एक अच्छी मंज़िल पा सकूँ। परीक्षण से सामना होने पर, कोई रुतबा और कोई आशीष नहीं मिलने पर, मैंने चीज़ों को गलत समझा और शिकायत की, नकारात्मक होकर परमेश्वर का विरोध करती रही। मैं सचमुच आज्ञाकारी नहीं थी और मैं उसे परमेश्वर की तरह नहीं मान रही थी। आस्था के उन वर्षों के दौरान, मैं मुक्त रूप से परमेश्वर के वचनों के पोषण और परमेश्वर के कार्य के चरण-दर-चरण मार्गदर्शन का आनंद उठा रही थी। मैं उसके प्रेम का ऋण चुकाने के लिए अपना कर्तव्य भी अच्छे से नहीं निभा रही थी, बल्कि मैंने बदले में बस उसे ग़लत समझा और उससे शिकायतें कीं, उसका विरोध और उसके ख़िलाफ़ विद्रोह किया। मैं कैसी विश्वासी थी? फिर भी, मैं अपने आप को परमेश्वर की आँख का तारा मानती थी, अपने आप को उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण समझती थी, मैं सोचती थी कि मेरा रुतबा किसी भी देश से परमेश्वर के चुने गए लोगों से ऊँचा होगा। मैं परमेश्वर के पुरस्कार और आशीष के लिए सबसे योग्य साबित होउंगी। मैं इतनी घमंडी थी कि मुझे नहीं पता था कि चल क्या रहा है। मैं खुद को बिल्कुल भी नहीं जानती थी! अगर परमेश्वर ने मेरे गंदे, नीच मूल का ख़ुलासा नहीं किया होता, तो मुझे अब भी यही लगता कि मैं याकूब की 12 जातियों में से एक हूँ, मैं इस्राएल की संतान हूँ, दाऊद की वंशज हूँ। मुझमें बिल्कुल भी शर्म नहीं थी! अब मुझे अपनी पहचान और रुतबे के बारे में पता था, इसलिए मैं लोगों की नज़रों से दूर रहती थी। मैं पहले की तरह ढीठ नहीं रह गयी थी। मुझे परमेश्वर के सामने कुछ विवेक भी मिला। यह मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार था! मुझे परमेश्वर से कोई भी अनावश्यक मांग नहीं करनी चाहिए, और अगर मुझे अंत में एक अच्छा परिणाम या मंज़िल न भी मिले, तो भी मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो जाऊँगी और उसकी धार्मिकता का गुणगान करूँगी।

बाद में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के और भी वचनों को पढ़ा और मोआब के वंशजों में परमेश्वर के कार्य करने के महत्व को और ज़्यादा समझा। मैंने देखा कि परमेश्वर के वचन यह कहते हैं, "अब मोआब के वंशजों पर कार्य करना उन लोगों को बचाना है, जो सबसे गहरे अँधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित थे, फिर भी परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है, क्योंकि पहले वे सभी ऐसे लोग थे, जिनके हृदयों में परमेश्वर की कमी थी; केवल उन लोगों को, जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं है, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने और उससे प्रेम करने के लिए तैयार करना ही सच्ची विजय है, और ऐसे कार्य का फल सबसे मूल्यवान और सबसे ठोस है। केवल यही महिमा प्राप्त कर रहा है—यही वह महिमा है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में हासिल करना चाहता है। बावजूद इसके कि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब इनका ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर द्वारा एक उन्नयन है। यह काम बहुत ही सार्थक है, और वह न्याय के माध्यम से ही इन लोगों को प्राप्त करता है। उसका इरादा इन लोगों को दंडित करने का नहीं, बल्कि बचाने का है। यदि, अंत के दिनों में, वह अभी भी इस्राएल में विजय प्राप्त करने का काम कर रहा होता, तो वह बेकार होता; यदि वह फलदायक भी होता, तो उसका कोई मूल्य या कोई बड़ा अर्थ न होता, और वह समस्त महिमा प्राप्त करने में सक्षम न होता। ... आज मोआब के तुम वंशजों पर कार्य करना जानबूझकर तुम लोगों को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि कार्य के अर्थ को प्रकट करने के लिए है। तुम लोगों के लिए यह एक महान उत्थान है। अगर व्यक्ति में विवेक और अंतर्दृष्टि हो, तो वह कहेगा : 'मैं मोआब का वंशज हूँ, आज परमेश्वर द्वारा ऐसा महान उत्थान या ऐसे महान आशीष पाने के सचमुच अयोग्य। अपनी समस्त करनी और कथनी में, और अपनी हैसियत और मूल्य के अनुसार, मैं परमेश्वर से ऐसे महान आशीष पाने के बिलकुल भी योग्य नहीं हूँ। इस्राएलियों को परमेश्वर से बहुत प्रेम है, और जिस अनुग्रह का वे आनंद उठाते हैं, वह उन्हें परमेश्वर द्वारा ही दिया जाता है, लेकिन उनकी हैसियत हमसे बहुत ऊँची है। अब्राहम यहोवा के प्रति बहुत समर्पित था, और पतरस यीशु के प्रति बहुत समर्पित था—उनकी भक्ति हमसे सौ गुना अधिक थी। और अपने कार्यों के आधार पर हम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल अयोग्य हैं'" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ')। "मोआब के वंशज शापित थे और वे इस पिछड़े देश में पैदा हुए थे; नि:संदेह अंधकार के प्रभाव से ग्रस्त सभी लोगों में मोआब के वंशजों की हैसियत सबसे कम है। चूँकि अब तक ये लोग सबसे कम हैसियत वाले रहे हैं, इसलिए उन पर किया गया कार्य मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने में सबसे सक्षम है, और परमेश्वर की संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। इन लोगों के बीच ऐसा कार्य करना मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने का सर्वोत्तम तरीका है; और इसके साथ परमेश्वर एक युग का सूत्रपात करता है; इसके साथ वह मनुष्य की सभी धारणाओं को खंडित कर देता है; इसके साथ वह संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करता है। उसका पहला कार्य इस्राएल की सीमा के भीतर यहूदिया में किया गया था; अन्यजाति-राष्ट्रों में उसने नए युग का सूत्रपात करने के लिए कोई कार्य नहीं किया। कार्य का अंतिम चरण न केवल अन्यजातियों के बीच किया जा रहा है; बल्कि इससे भी अधिक, उन लोगों में किया जा रहा है, जिन्हें शापित किया गया है। यह एक बिंदु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है, और इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड में संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर, सभी चीज़ों का प्रभु, और सभी जीवधारियों की आराधना की वस्तु 'बन' जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है')। मेरी यह धारणा थी कि परमेश्वर ने पहले ही यह निर्धारित कर लिया है कि वह किसे बचाएगा, और वे उसके चुने हुए लोग हैं, लेकिन क्योंकि चीनी लोग मोआब के वंशज हैं, क्योंकि हम नीची जातियों में सबसे नीचे हैं, उन लोगों में से हैं जो परमेश्वर को ज़रा भी नहीं पहचानते और परमेश्वर का सबसे ज़्यादा विरोध करते हैं, हम परमेश्वर द्वारा शापित और ठुकराये हुए लोग हैं, इसलिए यह निश्चित है कि वह हमें नहीं बचाएगा। लेकिन परमेश्वर ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने हमें इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि हम नीच हैं, और वह हमें इसलिए बचाने से पीछे नहीं हटा क्योंकि हम गंदे और भ्रष्ट हैं। बल्कि, उसने खुद देहधारण किया, भारी अपमान और पीड़ा सही, ताकि वह हमारे, मोआब के वंशजों के बीच आ सके, बार-बार अपने वचनों के माध्यम से कार्य करने, न्याय और ताड़ना देने, परीक्षा लेने और हमें शुद्ध कर सके। यह सब हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए किया गया था। परमेश्वर का प्रेम बहुत ही महान है! यह बिलकुल वैसा ही है जैसे प्रभु यीशु पापियों के साथ एक ही मेज़ पर बैठकर खा रहा हो। हम जितने गंदे और नीच होते हैं, हमें परमेश्वर का प्रेम और उद्धार उतना ही महान दिखाई पड़ता है। अंत में, परमेश्वर हमें, जो सबसे ज़्यादा भ्रष्ट, गंदे और नीच लोग हैं, शैतान की अंधेरी ताकतों से पूरी तरह बचाएगा ताकि हम उसके लिए शानदार गवाही दे सकें। यही बात शैतान को सबसे ज़्यादा शर्मिंदा करेगी। मोआब के वंशजों में परमेश्वर के कार्य का अर्थ यही है! साथ ही, अंत के दिनों में मोआब के वंशजों में परमेश्वर के कार्य ने हमारी सभी की धारणाओं को नष्ट कर दिया है, हमें यह दिखाया है कि वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं है, बल्कि वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर भी है। वो यह नहीं देखता कि हम किस कुल में पैदा हुए हैं, हम किस देश या जाति से संबंध रखते हैं, हम इस्राएली हैं या मोआब के वंशज, और हमें परमेश्वर का शाप मिला है या आशीष। अगर हम सृजित प्राणी हैं, और अगर हम सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, तो हम परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं। परमेश्वर हर एक सृजित प्राणी के प्रति निष्पक्ष और धार्मिक है, और हर किसी के पास उसके द्वारा बचाए जाने का मौका है। जितना ज़्यादा मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, उतना ही मुझे मोआब के वंशजों में परमेश्वर के कार्य के महान अर्थों के बारे में पता चला, और मैंने जाना कि भ्रष्ट मानवता के लिए परमेश्वर का प्रेम और उद्धार कितना वास्तविक है। लेकिन दुर्भाग्य से, मेरी क्षमता बहुत कम है और परमेश्वर के कार्य की मेरी समझ भी सीमित है। मैं अपनी भावनाओं और समझ की कुछ चीज़ों को साझा तो कर सकती हूँ, लेकिन मैं अच्छी गवाही नहीं दे सकती। मेरे ऊपर परमेश्वर के बड़े एहसान हैं।

अब इस पर विचार करके मुझे समझ आया कि मोआब के वंशज होने के परीक्षण से गुज़रने से भले ही उस दौरान मुझे थोड़ा कष्ट हुआ था, लेकिन मैंने अपनी पहचान और महत्व को जान लिया। मुझे मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य और उसके धार्मिक स्वभाव की कुछ समझ प्राप्त हुई, इसके बाद मैं पहले की तरह घमंडी और आत्म-संतुष्ट नहीं रही। मुझे महसूस हुआ कि मैं कितनी नीच और भ्रष्ट हूँ, मैं उसके प्रेम और उद्धार के योग्य नहीं हूँ, और अब मैं फिर उससे कोई मांग करने की हिम्मत नहीं करती। परमेश्वर चाहे मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करे या मेरे लिए कैसी भी व्यवस्था करे, मैं उसे स्वीकार करके उसके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार हूँ। मैं सिर्फ़ ईमानदारी से परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहती हूँ और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाना चाहती हूँ। मोआब की वंशज होने के बाद भी, मुझे सत्य की खोज करनी है और परमेश्वर के लिए गवाही देनी है। यह वैसा ही जैसा यह भजन कहता है, "हम इस्राएली नहीं हैं, बल्कि मोआब के त्यागे हुए वंशज हैं, हम पतरस नहीं, उसकी जैसी क्षमता पाने में हम सक्षम नहीं, न ही हम अय्यूब हैं, और हम पौलुस के परमेश्वर के लिए कष्ट सहने और खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के संकल्प से तुलना भी नहीं कर सकते, और हम इतने पिछड़े हुए हैं, और इसलिए हम परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं। परमेश्वर ने फिर भी आज हमें उन्नत किया है; इसलिए हमें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और हालाँकि हमारी क्षमता और योग्यताएँ अपर्याप्त हैं, लेकिन हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हैं—यह हमारा संकल्प है। हम मोआब के वंशज हैं, और हम शापित हैं। यह परमेश्वर की आज्ञा से था, और हम इसे बदलने में असमर्थ हैं, परंतु हमारा जीवन और हमारा ज्ञान बदल सकता है, और हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए संकल्पित हैं" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'वह संकल्प जो मोआब की संतानों के पास होना चाहिए')।

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एक ईमानदार व्यक्ति होना आसान नहीं है

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के समय के कार्य को स्वीकार करने के बाद, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और उपदेशों को सुनने के माध्यम से, मुझे अपने विश्वास में एक ईमानदार व्यक्ति होने का महत्व समझ में आया, और मैं जान पाई कि केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई परमेश्वर का उद्धार पा सकता है। इसलिए मैंने वास्तविक जीवन में एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करना शुरू किया। कुछ समय के बाद, मैंने पाया कि मुझे इसमें कुछ प्रवेश मिला है।

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