अपने कपट को दूर करना

05 अप्रैल, 2022

ली क्षीयंग, फ़िलीपीन्स

मैं हमेशा खुद को ईमानदार इंसान मानता था। सोचता था मेरी कथनी-करनी भरोसे के लायक है, मुझे जानने वाले लोग भी मेरे बारे में यही कहते थे। मुझे लगा मैं एक ईमानदार, भरोसेमंद इंसान हूँ। आस्था रखने के बाद, मैंने शायद ही कभी भाई-बहनों से झूठ बोला हो या लोगों को धोखा दिया हो। मेरा मानना था, भले ही मैं पूरी तरह ईमानदार नहीं हूँ, पर कम से कम धूर्त या मक्कार तो नहीं हूँ। फिर परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से जाना कि मैं कपटी प्रकृति का हूँ, और मैंने अपना असली चेहरा देखा।

मुझे याद है, एक बार मेरी साथी, बहन ली ने किसी प्रोजेक्ट की प्रगति के बारे में जानने के लिए संदेश भेजा। तब मुझे एहसास हुआ कि मैंने उस प्रोजेक्ट पर नज़र नहीं रखी, मुझे उसके बारे में ज्यादा पता नहीं था। पहले सोचा सच बता दूँ, फिर दुविधा में पड़ गया। सोचने लगा, मैंने हमेशा ऐसा दिखाया है कि मैं एक भरोसेमंद इंसान हूँ, अगर सीधे कह दिया कि मैंने उस प्रोजेक्ट की खबर नहीं रखी, तो क्या उसे नहीं लगेगा कि मैं अपने काम में गैर-जिम्मेदार हूँ? उसके मन में मेरी नकारात्मक छवि बन जाएगी, उसकी नज़रों में मैं विश्वसनीय नहीं रहूँगा। मैंने तय किया कि सीधे-सीधे जवाब देने के बजाय प्रोजेक्ट का ध्यान रखने वाली बहन से पूछकर बहन ली को जवाब भेज दूँगा। फिर काम की प्रगति चाहे जैसी भी रहे, पर लगेगा कि मैं हर चीज का ध्यान रख रहा हूँ। मैंने ऐसा जताया मानो वो संदेश देखा ही न हो, फिर काम की जानकारी लेकर जवाब भेज दिया। उस वक्त बहन ली ने मुझे कुछ नहीं कहा, पर मैं बेचैन और फिक्रमंद रहने लगा। फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा : "ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए चीज़ें न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे शर्मिंदा किया। देखने में नहीं लगता था कि मैंने झूठ बोला है, लेकिन अपने कर्मों में अपनी सोच और निजी मंशाओं के ज़रिए मैंने दिखाया कि मैं अपनी लापरवाही को ढकना और छिपाना चाहता था, इस डर से कि बहन ली मुझे समझ जाएगी। पहले दिखाया कि उसका संदेश देखा ही नहीं, फिर जवाब देने से पहले फटाफट जानकारी इकट्ठा की, ताकि उसे लगे मैं हर चीज का ध्यान रख रहा था। मैं कपटी होकर झूठी छवि बना रहा था, जिससे पता चला कि मैं धूर्त हूँ। मैंने देखा इस मामूली से मुद्दे पर मेरी सोच कितनी पेचीदा थी, मेरी मंशाएं गलत थीं, सच को छिपाने के लिए छल लिया। ये ईमानदारी कैसे हुई? मैं भरोसे के लायक नहीं था। तब समझ आया, कि मैं उतना सच्चा नहीं था जितना सोचता था, मैंने छल-कपट से काम लिया। मैंने खुद से कहा कि अगली बार हर हाल में पूरा सच कहूंगा, मैं चीज़ों को छिपाता नहीं रह सकता।

कुछ ही दिनों में, बहन ली ने बताया कि दो दिन बाद हमारी अगुआ हमारे काम की जांच करेंगी। ये सुनकर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। आम तौर पर अगुआ अचानक हमारे काम की जाँच नहीं करते, कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई, हमारे काम में कोई समस्या तो नहीं। मैं सोचने लगा, मैं तो सिंचन के काम में व्यस्त था, अपने जिम्मे के वीडियो प्रोडक्शन कार्य की मैंने खबर नहीं ली, न ज़्यादा कुछ हासिल किया। अगुआ ने उसके बारे में पूछा, तो मैं क्या कहूंगा? मैं अंदाजा लगाने लगा कि वे किस तरह के सवाल पूछेंगी, किन बातों की जानकारी मुझे नहीं है, ताकि फटाफट इनके जवाब खोज लूँ। अगर उन्होंने कोई सवाल किया और मैं जवाब नहीं दे पाया, तो लगेगा मैंने वास्तविक कार्य नहीं किया। मुझे थोड़ी फिक्र और चिंता होने लगी। थोड़ी देर सोचने पर समझ आया, अगुआ का काम की जांच करना तो सामान्य बात है—मैं इतना ज़्यादा क्यों सोच रहा हूँ? मैं अगुआ के मकसद का अंदाज़ा लगा रहा था, समस्याओं को छिपाने के लिए सिर खपा रहा था, कि कहीं उन्हें इनका पता चल गया, तो वो कहेंगी मैं वास्तविक काम नहीं करता, मैं झूठा अगुआ हूँ। मैंने खुद को छिपाने की कोशिश की। दरअसल, काम के बारे में अगुआ का पूछना तो सामान्य बात है। मुझे सच बताना चाहिए, जिन क्षेत्रों में कमियां हैं उनमें बदलाव करना चाहिए। मैं इतना ज़्यादा क्यों सोच रहा था? मैं कपटी बन रहा था। फिर मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ये बात याद आई : "मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें')। प्रभु यीशु ने भी कहा है : "तुम्हारी बात 'हाँ' की 'हाँ,' या 'नहीं' की 'नहीं' हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है" (मत्ती 5:37)। परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं। ईमानदार लोगों को सीधी-सच्ची बात कहनी चाहिए, पर मेरी सोच बहुत पेचीदा थी। अपनी समस्याओं को छिपाने के लिए कुटिल बातें सोच रहा था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, सत्य पर अमल करने और ईमानदारी की राह दिखाने को कहा, ताकि अगुआ कुछ भी पूछें, तो मैं पूरी ईमानदारी से जवाब दे सकूँ।

हमारी बैठक में, अगुआ ने सबसे पहले वीडियो प्रोडक्शन कार्य के बारे में पूछा, जिसके लिए मैं सीधे तौर पर जिम्मेदार था, पर मैं अपना ज़्यादातर वक्त और ऊर्जा सिंचन कार्य में लगा रहा था। वीडियो के कार्य पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहा था। जब ये बताया, तो उन्होंने व्यावहारिक कार्य न करने को लेकर मेरी आलोचना की, फिर उन्होंने पूछा कि कितने नये विश्वासी ठीक से सभाओं में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। इस सवाल पर मैं थोड़ा घबरा गया। मुझे इसकी भी ज्यादा जानकारी नहीं थी, कभी-कभार इस बारे में पूछ लेता, पर मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। मैं सोचने लगा, अभी-अभी तो मैंने कहा कि मेरा सारा ध्यान सिंचन कार्य पर था, लेकिन अगर ये भी नहीं बता पाया कि कितने नये विश्वासी सभाओं में हिस्सा नहीं ले रहे हैं, तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगी? वो पूछेंगी कि, आखिर मैं दिन भर करता क्या हूँ जो ये भी नहीं पता, क्या मैंने कोई वास्तविक कार्य किया भी है। वो वीडियो के काम में पहले ही कई समस्याएं देख चुकी हैं, अगर उन्हें सिंचन कार्य में भी समस्याएं दिख गईं, तो क्या वो मुझे फौरन बर्खास्त कर देंगी? मैंने उन्हें एक अंदाज़ा बता दिया। फिर सोचा, थोड़ी कमोबेश हो, तो कोई बात नहीं। वैसे भी, ये कोई सटीक आंकड़ा नहीं है, तो असल में ये झूठ नहीं है। बैठक के बाद, मैंने हालात की जानकारी ली तो पता चला मेरा अंदाज़ा काफी गलत था। ये देखकर मुझे बहुत चिंता हुई। उस वक्त मैंने ईमानदारी नहीं दिखाई, बल्कि बड़ी ढिठाई से झूठ बोला। मैं झूठ बोलने से खुद को क्यों नहीं रोक पाया? प्रार्थना में, मैंने ईमानदार बने रहने का विश्वास जताया था। हालात का सामना होने पर, मैं खुद को रोक क्यों नहीं पाया? मुझे बहुत बुरा लगा। कुछ दिन तक, "कपट" शब्द मेरे जेहन में हर वक्त गूँजता रहा। लगा जैसे मैंने वाकई कुछ बुरा किया हो।

मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े। "क्या चालाक लोगों के लिए जीवन थका देने वाला नहीं होता? पूरा समय झूठ बोलने में, अपने झूठ छिपाने और ज्यादा झूठ बोलने में समय बिताना, धोखेबाज होना चालाक लोगों के लिए बहुत थका देने वाला होता है—तो फिर भी कोई क्यों चालाक बनना चाहेगा, ईमानदार क्यों नहीं होना चाहेगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस प्रश्न के बारे में सोचा है? यह परिणाम तब होता है, जब लोगों की शैतानी प्रकृति उनके साथ चालबाजी करती है; वह उन्हें इस तरह का जीवन पीछे छोड़ पाने से, इस तरह के स्वभाव से बच पाने से रोकती है। वे इस तरह की चालबाजी में जीवन जीकर खुश रहते हैं; वे सत्य का अभ्यास करना और प्रकाश के मार्ग पर चलना नहीं चाहते। तुम्हें लगता है कि इस तरह जीना थकाऊ और अनावश्यक है—लेकिन वे इसे बहुत जरूरी समझते हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा न करने से उनके हितों को, और उनकी छवि और प्रतिष्ठा को भी नुकसान होगा। वे बहुत ज्यादा खो देंगे, नुकसान बहुत बड़ा होगा। वे इन चीजों को सँजोते हैं, वे अपनी छवि, प्रतिष्ठा और हैसियत को सँजोकर रखते हैं—जो लोगों में सत्य के प्रति प्रेम के अभाव का असली चेहरा है। संक्षेप में, जब लोग ईमानदार होना नहीं चाहते या सत्य का अभ्यास करने में विफल रहते हैं, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते; ऐसा कभी नहीं होता कि वे अपने दिलों में प्रतिष्ठा और हैसियत को न सँजोएँ, बाहरी दुनिया की प्रवृत्तियों के पीछे न भागें, या शैतान के प्रभाव में न रहें—जो कि उनकी प्रकृति की समस्या है। आज, ऐसे लोग हैं, जो वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जिन्होंने बहुत उपदेश सुने हैं, और जो जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास क्या होता है, फिर भी वे सत्य का अभ्यास क्यों नहीं करते, उनमें कोई बदलाव क्यों नहीं आया है? क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। यहाँ तक कि जब वे सत्य को थोड़ा-बहुत समझ भी लेते हैं, तब भी वे उसे व्यवहार में नहीं ला पाते, और इसलिए उनके इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने का कोई फायदा नहीं होता" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास')।

"कुछ लोग कभी किसी को सच नहीं बताते। लोगों से कहने से पहले उनके दिमाग में सब कुछ सोचा-विचारा और पूर्व-संपादित किया जाता है; तुम नहीं बता सकते कि उनकी कौन-सी बातें सच हैं और कौन-सी झूठी। वे आज एक बात कहते हैं तो कल दूसरी, वे एक व्यक्ति से एक बात कहते हैं तो दूसरे से कुछ और; वे जो कुछ भी कहते हैं, वह अपने आप में विरोधाभासी होता है। ऐसे लोगों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है? तथ्यों की सटीक समझ प्राप्त करना बहुत कठिन हो जाता है; तुम उनसे कुछ भी सटीक प्राप्त नहीं कर सकते। यह कौन-सा स्वभाव है? यह धूर्तता है। क्या धूर्त स्वभाव का बदलना आसान होता है? इसे बदलना सबसे मुश्किल है। स्वभाव से जुड़ी हर चीज में लोगों की प्रकृति शामिल होती है, और लोगों की प्रकृति से जुड़ी चीजों से मुश्किल किसी भी चीज का बदलना नहीं होता। एक कहावत है कि कुत्ते की दुम सीधी नहीं हो सकती। यह परम सत्य है। धूर्त लोग चाहे किसी भी चीज के बारे में बात करें या कुछ भी करें, वे हमेशा अपने लक्ष्य और इरादे रखते हैं। जब उनका कोई लक्ष्य या इरादा नहीं होता, तो वे कुछ नहीं कहते। अगर तुम उनके लक्ष्य और इरादे पता लगाने की कोशिश करते हो, तो वे मुँह बंद कर लेते हैं; और अगर उनके मुँह से अचानक कभी कोई सच निकल भी जाए, तो वे उसे तोड़ने-मरोड़ने का कोई तरीका सोचने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे, ताकि तुम्हें भ्रमित कर सच जानने से रोका जा सके। दूसरे शब्दों में, वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें वे किसी को भी जमीनी हकीकत पता नहीं चलने देते; लोग उन्हें कितने भी लंबे समय से जानते हों, कोई नहीं जान सकता कि उनके दिमाग में वास्तव में क्या चल रहा है। ऐसी होती है धूर्त लोगों की प्रकृति। धूर्त लोग कितना भी बोलें, तुम कभी नहीं जान पाओगे कि उनके क्या इरादे हैं, और न यह कि वे क्या उद्देश्य हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, या वे वास्तव में क्या सोच रहे हैं। यहाँ तक कि उनके माता-पिता को भी यह जानने में मुश्किल होती है; किसी धूर्त को समझने की कोशिश करना बेहद मुश्किल है। ऐसे होते हैं धूर्त लोग : कुछ भी करने से पहले ही वे अपनी धूर्तता दिखा देते हैं। यह एक प्रकार का स्वभाव है, है न? चाहे तुमने कुछ कहा हो या नहीं, या तुमने कुछ किया हो या नहीं—यह स्वभाव तुम्हारे भीतर होता है, यह हर समय और हर स्थान पर तुम्हें नियंत्रित करता है, तुमसे खेल कराता है और तुम्हें छल-कपट में संलग्न करता है, तुमसे लोगों के साथ खिलवाड़ कराता है, सत्य पर पर्दा डलवाता है, और तुमसे अपने असली मनोभाव छिपवाता है। यह धूर्तता है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'स्‍वभाव में परिवर्तन के लिए भ्रष्‍ट स्‍वभाव के छह पक्षों को समझना अनिवार्य है')। परमेश्वर के वचनों से पता चला कि मैं झूठ बोलने, धोखा देने और सच को छिपाने से खुद को नहीं रोक पाया, क्योंकि मैं मक्कार था, अपने नाम और रुतबे को संजोता था। हमेशा नाम और रुतबे को बचाने में लगा रहा। जो भी कहता, उस पर पहले अच्छे से सोच लेता, ये कितना भी थकाने वाला हो, पर मैं सही बात बताना नहीं चाहता था। मैंने ईमानदार बनने के लिए परमेश्वर से बहुत मदद मांगी, पर जब अगुआ ने उस काम के बारे में पूछा जिसकी मुझे जानकारी नहीं थी, तो मैंने सोचा कि अगर मैंने सीधे कह दिया कि मुझे नहीं पता, तो उन्हें लगेगा मैंने व्यावहारिक काम नहीं किया, मैं भरोसे के लायक नहीं हूँ, मुझे बर्खास्त भी किया जा सकता है। अपने रुतबे के लिए, मैं नहीं चाहता था कि अगुआ को मेरे काम में कोई समस्या दिखे, इसलिए मैं सच को छिपाने के तरीके सोच रहा था। मुझे सचमुच जानकारी नहीं थी, पर मैंने चालाकी से एक अनुमान बता दिया, ताकि उनको लगे कि मुझे काम के सभी पहलुओं की अच्छी समझ है, मैं कुछ वास्तविक काम कर सकता हूँ। मैंने देखा कि मैं सिर्फ अपने नाम और रुतबे के लिए साधारण-सी बात पर झूठ बोलने को तैयार था। कितनी बुरी बात है! किसी काम में थोड़ी-बहुत गड़बड़ होना बिल्कुल सामान्य बात है, इसमें कुछ भी छिपाने या बेईमान बनने की ज़रूरत नहीं है। पर, अगुआ के मन में बनी अपनी छवि को बचाने की कोशिश में, मैंने झूठ बोला, अपनी समस्याएँ छिपाई, अपनी गरिमा की बलि चढ़ा दी। मैं कितना बड़ा मूर्ख था! इससे एहसास हुआ कि भले ही मैं निष्कपट दिखता था, पर अपनी कथनी में ईमानदार नहीं था, मेरे विचार सरल नहीं थे। मैंने एक शैतानी स्वभाव दिखाया था। मैं कपटी, और कमीना था। तब जाकर एहसास हुआ कि मैं कितना धूर्त, घिनौना और भ्रष्ट इंसान था। मुझे खुद से नफ़रत हो गई, तो भला परमेश्वर मुझसे घृणा कैसे नहीं करता? मैंने हमेशा खुद को एक सच्चा इंसान माना, जो शायद ही कभी कपट करता है। मैंने कभी खुले तौर पर परमेश्वर के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं किया, मुझे लगता था वो मुझे एक नेक, ईमानदार इंसान समझेगा। मुझे ईमानदार बनने के लिए सत्य पर अमल करने की ज़रूरत नहीं है, मैं इसी तरह कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर का अनुसरण करता रहूँ तो में मुझे बचा लिया जाएगा। मैं कितना तुच्छ और अंधा था। अगर मैं सच का सामना न करता और परमेश्वर के वचनों का न्याय नहीं होता, तो खुद को कभी नहीं समझ पाता। आखिरकार मैंने जाना कि मैं ईमानदार इंसान होने के आसपास नहीं, बल्कि उससे कोसों दूर हूँ।

फिर, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े। "जब मसीह-विरोधियों को उजागर किया जाता है, उनसे निपटा जाता है और उनकी काट-छाँट की जाती है, तो पहला काम वे यह करते हैं कि अपने बचाव के लिए विभिन्न कारण खोजते हैं, समस्या से बचने की कोशिश में सभी प्रकार के बहाने तलाशते हैं, और इस प्रकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने का अपना लक्ष्य पूरा कर लेते हैं, और क्षमा किए जाने का अपना उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं। मसीह-विरोधी जिस बात से सबसे अधिक डरते हैं, वह यह है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग उनके व्यक्तित्व, उनकी कमजोरियों और खामियों, उनकी वास्तविक क्षमता और कार्य करने की योग्यता की असलियत देख लेंगे—और इसलिए वे नाटक करने और अपनी कमियाँ, समस्याएँ और भ्रष्ट स्वभाव छिपाने की पूरी कोशिश करते हैं। जब उनके कुकर्म उजागर हो जाते हैं, तो पहला काम वे यह करते हैं कि इस तथ्य को मानते या स्वीकारते नहीं, या ऐसी गलतियों की भरपाई करने का भरसक प्रयास नहीं करते, बल्कि उनकी लीपापोती करने, अपने कार्यों से अवगत लोगों को धोखा देने और भ्रमित करने, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को मामले की असलियत न देखने देने, और उन्हें यह न जानने देने की कोशिश करते हैं कि उनके कार्य परमेश्वर के घर के लिए कितने हानिकारक रहे हैं, और कलीसिया के काम को उन्होंने कितना बाधित और अस्त-व्यस्त किया है। बेशक, वे जिस चीज से सबसे ज्यादा डरते हैं, वह यह होता है कि कहीं ऊपर वाले को पता न लग जाए, क्योंकि जैसे ही कोई ऊपर वाले से उनकी रिपोर्ट करता है, उनके लिए सब-कुछ खत्म हो जाता है। और इसलिए, जब कुछ गलत हो जाता है, तो पहला काम जो मसीह-विरोधी करते हैं, वह है यह न सोचना कि उनसे कहाँ गलती हुई है, कहाँ उन्होंने सिद्धांत का उल्लंघन किया है, उन्होंने जो किया वह क्यों किया, वे किस स्वभाव से नियंत्रित थे, उनकी मंशा क्या थी, उस समय उनकी स्थिति क्या थी, यह उनके स्वेच्छाचार के कारण हुआ या दूषित इरादों के कारण; इन चीजों का विश्लेषण करने या इन पर विचार करने के बजाय, और इन पर चिंतन तो बिलकुल भी न करके, वे अपना दिमाग असली तथ्यों को छिपाने का कोई तरीका सोचने में लगाते हैं, साथ ही चुने हुए लोगों के सामने उन्हें युक्तिसंगत बताने और बहाने बनाने की भी पूरी कोशिश करते हैं ताकि उन्हें चकमा दे सकें, उसे न्यूनतम करने और तिकड़म से इस कठिन समस्या से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं—यह सब वे परमेश्वर के घर में अपने कुकर्म जारी रखने, लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखने, अभी भी लोगों को बरगलाकर प्रभावित करने और उनसे अपना सम्मान करवाने, और उनसे जैसा वे कहते हैं वैसा ही करवाने की अपनी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएँ और उद्देश्य हासिल करने के लिए करते हैं" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे व्यवहार और काट-छाँट स्वीकार नहीं करते और न ही गलत काम करने पर उनमें पश्चात्ताप का रवैया होता है, बल्कि इसके बजाय वे धारणाएँ फैलाते हैं और परमेश्वर के बारे में सार्वजनिक रूप से निर्णय सुनाते हैं')। परमेश्वर के वचन मेरे लिए खतरे की घंटी थे। खासकर जब मैंने इन वचनों को पढ़ा, "मसीह-विरोधी," "असली तथ्यों को छिपाना," "धोखा देना" और "भ्रमित करना," लगा जैसे परमेश्वर सामने से मेरा न्याय करके मुझे उजागर कर रहा हो। जब बहन ली ने पूछा कि क्या मैं उस प्रोजेक्ट पर नज़र रख रहा हूँ, तब मैंने फौरन ये नहीं माना कि मैंने ऐसा नहीं किया, आत्मचिंतन तक नहीं किया, ये भी नहीं सोचा कि मुझे किस तरह के बदलाव लाने चाहिए। संदेश न देखने का बहाना बनाकर फटाफट जवाब ढूंढे और उनको बता दिया। ताकि बहन ली को पता न चले कि मैं उस प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं दे रहा या मैं अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार नहीं था। उन्हें लगेगा कि मैं भरोसेमंद हूँ, फ़िक्र करने की कोई बात नहीं है। फिर जब बड़ी अगुआ मेरे काम की जांच करने आईं, तो मेरे काम में समस्याएं देख, उन्होंने मेरी काट-छाँट और निपटान किया। मैंने सच को स्वीकार और आत्मचिंतन नहीं किया, ये भी नहीं माना कि मैं वास्तविक कार्य नहीं करता और अपने कर्तव्य में लापरवाह हूँ, ऊपर से झूठ बोला, अपनी समस्याएं छिपाई। मैंने खुद से ये तक कहा कि मुझे कड़ी मेहनत करके पक्का करना है कि अगुआ हर सवाल का फौरन जवाब दूँ, ताकि उन्हें मेरे काम में कोई गड़बड़ी या चूक न दिखे, बल्कि वे सोचें कि मैं जिम्मेदार हूँ, पूरी जानकारी रखता हूँ। मैं इस डर से खुद को बचा रहा था कि लोग मुझे समझ जाएंगे, उनके मन में बनी मेरी जिम्मेदार, भरोसेमंद इंसान की छवि खराब हो जाएगी। मेरा लक्ष्य दूसरों के दिलों में अपनी खास जगह बनाना था। मैंने देखा मैं सचमुच एक मसीह-विरोधी स्वभाव दिखा रहा था। जब उसकी आलोचना होती है या उसे उजागर किया जाता है, तो वह समर्पित होकर आत्मचिंतन करने के बजाय, खुद को सही ठहराने, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और अपनी समस्याएं छिपाने की भरसक कोशिश करता है। मसीह-विरोधी सत्य को स्वीकार करने की ज़रा सी भी इच्छा नहीं दिखाते, वे अपनी तरकीबें लड़ाते हुए बोलते और काम करते हैं कि उनका रुतबा कायम रह सके। क्या मैं भी ऐसा ही नहीं कर रहा था? मैंने वास्तविक कार्य नहीं किया, खुद को कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं किया, तो मुझे अपराध बोध होना चाहिए था। मगर मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा, मैंने खुद को बचाने के लिए सब कुछ सोचा। मैंने देखा कि मैं प्रकृति से धूर्त, कपटी और बुरा इंसान था। लगा जैसे मुझे उजाले में उजागर करके, उघाड़ दिया गया हो, परमेश्वर ने मेरे कर्मों का न्याय करके मेरी निंदा की हो। मैंने ये भी महसूस किया कि परमेश्वर की धार्मिकता अपमान नहीं सहती, मुझे बहुत डर लगा। मैं जानता था मुझे फौरन पश्चाताप करके बदलना होगा।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "लोग ईमानदार होकर ही जान सकते हैं कि वे कितनी बुरी तरह से भ्रष्ट हैं और उनमें इंसानियत बची है या नहीं; ईमानदारी पर अमल करने पर ही वे जान सकते हैं कि वे कितने झूठ बोलते हैं और कपट और बे‌ईमानी उनके अंदर कितनी गहराई में छिपे हैं। ईमानदारी पर अमल करने का अनुभव होने पर ही वे धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को जान सकते हैं और अपने प्रकृति और सार को पहचान सकते हैं और तभी उनका भ्रष्ट स्वभाव निरंतर शुद्ध हो सकता है। अपने भ्रष्ट स्वभाव की निरंतर शुद्धि के दौरान ही लोग सत्य पा सकते हैं। इन वचनों का अनुभव करने के लिए समय लो। परमेश्वर उन लोगों को सिद्ध नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। यदि तुम लोगों का हृदय ईमानदार नहीं है, यदि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाओगे। इसी तरह, तुम भी कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और परमेश्वर को पाने में भी असमर्थ रहोगे। परमेश्वर को न पाने का क्या अर्थ है? यदि तुम परमेश्वर को प्राप्त नहीं करते हो और तुमने सत्य को नहीं समझा है, तो तुम परमेश्वर को नहीं जानोगे और परमेश्वर के अनुकूल होने का कोई रास्ता नहीं होगा, ऐसा हुआ तो तुम परमेश्वर के शत्रु हो। अगर तुम परमेश्वर से असंगत हो, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है; यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो तुम्हें बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम उद्धार प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते, तो तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? यदि तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा परमेश्वर के कट्टर शत्रु बनकर रहोगे और तुम्हारा परिणाम तय हो चुका होगा। इस प्रकार, यदि लोग चाहते हैं कि उन्हें बचाया जाए, तो उन्हें ईमानदार बनना शुरू करना होगा। ऐसा एक संकेत है जो उन लोगों को चिह्नित करता है, जिन्हें अंतत: परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाएगा। क्या तुम लोग जानते हो कि वह क्या है? बाइबल में, प्रकाशित-वाक्य में लिखा है: 'उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं' (प्रकाशितवाक्य 14:5)। कौन हैं 'वे'? ये वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया, पूर्ण किया और प्राप्त किया जाता है। परमेश्वर उनका वर्णन कैसे करता है? उनके क्रियाकलापों की विशिष्टताएँ और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? उन पर कोई कलंक नहीं है। वे झूठ नहीं बोलते।‌ तुम सब शायद समझ-बूझ सकते हो कि झूठ न बोलने का क्या अर्थ है: इसका अर्थ ईमानदार होना है। 'निर्दोष' : इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कोई बुराई न करना। और कोई बुराई न करना किस नींव पर निर्मित है? बिना किसी संदेह के, यह परमेश्वर का भय मानने की नींव पर निर्मित है। अत: निर्दोष होने का अर्थ है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। निर्दोष व्यक्ति को परमेश्वर कैसे परिभाषित करता है? परमेश्वर की दृष्टि में केवल वे ही पूर्ण हैं, जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं; इस प्रकार, निर्दोष लोग वे हैं जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं, और केवल पूर्ण लोग ही निर्दोष हैं। यह बिल्कुल सही है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')। परमेश्वर के वचन बिल्कुल सही हैं। ईमानदारी का अभ्यास किये बिना, कभी पता नहीं चलता कि मैं कितना झूठ बोलता और धोखा देता था, मेरा कपटी स्वभाव कितना गंभीर था। परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर उन लोगों को सिद्ध नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। यदि तुम लोगों का हृदय ईमानदार नहीं है, यदि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाओगे। इसी तरह, तुम भी कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और परमेश्वर को पाने में भी असमर्थ रहोगे" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')। कपटी लोग बहुत झूठे होते हैं। वे पूरी तरह शैतानी स्वभाव में जीते हैं और परमेश्वर के शत्रु हैं। वे शैतान के हैं, परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा। मैंने देखा मेरा कपट कितना खतरनाक और शर्मनाक था। मुझे पता था मैं इस तरीके से काम नहीं कर सकता, ईमानदार बनने के लिए मुझे अपनी गलतियां मानकर सत्य पर अमल करना होगा।

मैं अगुआ को असलियत बताने के लिए संदेश भेजने को तैयार हो गया, पर फिर मुझे थोड़ा संकोच होने लगा। मुझे चिंता हुई कि अगर मैंने अपनी बेईमानी की बात खुलकर बता दी तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगी। क्या उन्हें लगेगा कि मैं बहुत कपटी हूँ, जो इतनी साधारण-सी बात पर इतना सोचा, इस बारे में झूठ तक बोला, मैं भरोसे के लायक नहीं हूँ? मैं उस वाकये के बारे में नहीं बताना चाहता था, सोचा कि अगली बार सीधी बात कहूंगा, ईमानदार रहूँगा, तब उसे पश्चाताप के रूप में गिना जाएगा। मैं खुद को दिलासा देता रहा कि दोबारा कभी झूठ नहीं बोलूँगा, पर मेरा ज़मीर कचोट रहा था, मुझे अपराध बोध हुआ। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "लोगों को ईमानदार होने का अनुभव होने पर कई व्यावहारिक समस्याएँ पैदा होंगी। कभी-कभी वे बिना सोचे-समझे अपना मुँह खोल देंगे और किसी गलत विचार, किसी खास इरादे या मकसद, या अहंकार से निर्देशित होकर वे झूठ बोल देंगे, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें इसे छिपाने के लिए झूठ पर झूठ बोलना पड़ेगा, जो अंततः मानसिक अशांति में परिणत हो जाएगा—लेकिन वे उसे वापस नहीं ले पाते, उनमें अपनी गलती सुधारने का, यह स्वीकार करने का साहस नहीं होता कि उन्होंने झूठ बोला था, और इस तरह, वे गलती पर गलती करते चले जाते हैं। उन्हें हमेशा यही लगता है, जैसे उनके सीने पर कोई भारी बोझ रखा हो; वे निर्मल होने, अपनी गलती स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने का अवसर खोजना चाहते हैं, लेकिन वे इसे कभी व्यवहार में नहीं लाते; अंतत: वे इसके बारे में सोचते हैं और अपने आप से कहते हैं, 'जब मैं भविष्य में अपना कर्तव्य निभाऊँगा, तो मैं इसकी भरपाई कर दूँगा।' वे हमेशा कहते हैं कि वे इसकी भरपाई कर देंगे, लेकिन वे कभी करते नहीं। यह झूठ बोलकर माफी माँगने जितना आसान नहीं होता। क्या तुम झूठ बोलने और धोखेबाज होने के नुकसान और परिणामों की भरपाई कर सकते हो? अगर, अत्यधिक आत्म-तिरस्कार के बीच, तुम पश्चात्ताप का अभ्यास करने में सक्षम रहते हो, और फिर कभी उस तरह का काम नहीं करते, तो तुमने जो किया, वह क्षमा किया जा सकता है, और तुम परमेश्वर की सहनशीलता और दया प्राप्त कर सकते हो। लेकिन अगर तुम लीपापोती करते हो और कहते हो कि तुम भविष्य में इसकी भरपाई कर दोगे, लेकिन पश्चात्ताप नहीं करते, और बाद में भी झूठ बोलना और छल करना जारी रखते हो—अगर तुम हठपूर्वक पश्चात्ताप करने से इनकार करते हो—तो तुम्हारा हटाया जाना निश्चित है। यह उन लोगों द्वारा पहचाना जाना चाहिए, जिनमें विवेक और बोध है। झूठ बोलने और छल करने के बाद केवल संशोधन करने के बारे में सोचना ही काफी नहीं है; सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें सच में पश्चात्ताप करना चाहिए। अगर तुम ईमानदार होना चाहते हो, तो तुम्हें सच बोलना चाहिए और वास्तविक चीजें करनी चाहिए। तुम्हें झूठ बोलने और धोखेबाज होने की समस्या का हल निकालना चाहिए; कभी-कभी तुम अपना सम्मान खो सकते हो, तुमसे निपटा जा सकता है, यहाँ तक कि तुम्हें धिक्कारा भी जा सकता है, लेकिन तुम्हारा दिल स्थिर और शांत रहेगा, और तुम अपने आप से कहोगे : 'चाहे मुझसे निपटा जाए या मुझे हटा दिया जाए, मैं अपने दिल में स्थिर महसूस करता हूँ; मैं ईमानदार हूँ और बिलकुल झूठ नहीं बोलता; चूँकि मैंने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया है, इसलिए मुझसे निपटा जाना चाहिए और मुझे इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।' यह एक सकारात्मक मन:स्थिति है। लेकिन जब तुम धोखेबाज हो जाते हो, तो परिणाम क्या होता है? धोखेबाज होने के बाद तुम अपने दिल में कैसा महसूस करते हो? (असहज।) असहज; तुम मन ही मन में खुद को अपराधी और भ्रष्ट महसूस करते हो, तुम हमेशा खुद को दोषी महसूस करते हो : 'मैं धोखेबाज कैसे हो सकता हूँ? मैं फिर से धोखेबाज कैसे हो गया हूँ? मेँ ऐसा क्यों हूँ?' तुम्हें लगता है कि तुम अपना सिर ऊँचा नहीं उठा सकते, मानो तुम परमेश्वर का सामना करने की स्थिति में नहीं हो। विशेष रूप से, जब लोगों को परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाता है, जब वे परमेश्वर की दया, करुणा और सहनशीलता प्राप्त करते हैं, तो उन्हें लगता है कि परमेश्वर को धोखा देना शर्मनाक है; उनके मन में तिरस्कार की भावना प्रबल हो जाती है—और, इतना ही नहीं, वे शांति या आनंद का अनुभव नहीं कर पाते। यह कौन-सी समस्या दर्शाता है? धोखेबाज होने का अर्थ विद्रोह करना है, परमेश्वर का विरोध करना है, यह भ्रष्ट स्वभाव का उत्प्लावन है, और इसलिए यह तुम्हें पीड़ा पहुँचाएगा" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है')। इसने मेरी हालत बयान कर दी। मुझे लगा जैसे परमेश्वर यह सब सीधे मुझसे ही कह रहा हो, मैंने जाना कि कपटी होना और ईमानदार होना, बिल्कुल विपरीत मार्ग हैं। कपटी होना सही मार्ग नहीं है, यह उचित इंसानियत नहीं है। कुछ लोग मक्कारी से अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं, पर वे अपना ईमान और गरिमा खो देते हैं, इससे अपराध बोध और बेचैनी ही होती है, वे शैतान की हँसी का पात्र बनकर अँधेरे में जिएंगे। मेरा झूठ बोलना और कपट करना एक नरपिशाच जैसा था, बेहद शर्मनाक, मैं शैतान के हाथों का खिलौना बन गया था। मेरी बेईमानी कुछ पल के लिए मेरे अहंकार को संतुष्ट कर सकती थी, पर परमेश्वर इसे अस्वीकार करता है। क्या मैं मूर्ख नहीं था? हर अहम मौके पर, जब मुझे सच कहने की ज़रूरत थी, मैंने ये कहते हुए खुद को समझाया, "अगली बार, अगली बार।" मैं खुद को माफ किए जा रहा था, सत्य समझकर भी उस पर अमल नहीं कर रहा था, मैंने कभी ईमानदार होने की वास्तविकता को नहीं जिया। मैंने खुद से कहा कि मैं आगे से ऐसा नहीं कर सकता, चाहे लोग मुझे कैसा भी समझें, मुझे परमेश्वर के सामने जीना है, उसकी जांच-पड़ताल को स्वीकारना और उसे संतुष्ट करना है। यही सबसे अहम है। अगर किसी ने मुझे समझ लिया और मेरी छवि थोड़ी खराब हो गई, तब भी सत्य पर अमल करके ईमानदार बनने का मतलब परमेश्वर की स्वीकृति पाना होगा, यही बात सबसे अधिक मायने रखती है, यही सबसे कीमती और सार्थक है! मैं हमेशा अपनी निजी समस्याओं को छिपाता रहा, भले ही दूसरों को उनके बारे में पता न चले या वे मेरी आलोचना न करें, पर मैं अपनी भ्रष्टता और कमियों को नहीं जान पाया, इसलिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को बदल नहीं पाया, अपने काम में बेहतर नहीं कर पाया। ये चीज़ें मेरे दिल में एक ट्यूमर की तरह बनी रहीं जो लगातार बढ़ती ही जा रही थीं, और आखिर में मुझे खत्म कर डालतीं। हालांकि जो भाई-बहन सरल और सच्चे थे, वे अपने काम की सभी गलतियों और सवालों को सबके सामने खुलकर बता देते थे, कभी-कभी उनकी आलोचना होती या बर्खास्त भी किये जाते, पर उसका असर सीधे उनके दिल पर होता था। वे जल्द अपनी समस्याओं को समझकर उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजते, जिससे उनके जीवन में काफी प्रगति होती। गलती मानना शर्मनाक था, पर वे सत्य पर अमल करके परमेश्वर की स्वीकृति पा लेते। यही बुद्धिमानी है। मैं सोचता था मेरे पास तरकीबों की कमी नहीं, मैं चालाक हूँ, दूसरों की आँखों में धूल झोंकना स्मार्ट होना है, पर मैं निहायत ही मूर्ख और बेवकूफ था! ये ऐसा था मानो मुहरों की लूट और कोयले पर छाप। मैं बिल्कुल हँसी का पात्र था। फिर मैंने ये सोचना छोड़ दिया कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, परमेश्वर को फिर से निराश न करके सत्य पर अमल कर शैतान को शर्मिंदा करना चाहता था। मैंने अगुआ को झूठ बोलने के कारण के साथ-साथ, सच बताने के लिए हिम्मत जुटाई। संदेश भेजने के बाद मुझे काफी सुकून और शांति मिली। अगुआ ने जल्दी ही यह कहते हुए संदेश भेजा, "ईमानदार बनने की कोशिश करना बहुत बढ़िया है। मेरा स्वभाव भी कपटी है, मुझे भी परमेश्वर के न्याय का अनुभव करना है।" यह देखकर मेरा दिल भर आया, शर्मिंदा भी हुआ। ईमानदार बनने की इस कोशिश ने मुझे दिखाया कि इंसान बनने का यही सबसे सही तरीका है।

उसके बाद, मैं रोजाना अपनी कथनी और करनी में ईमानदारी का अभ्यास करने लगा, जिससे पता चला कि मैं बहुत सी बातों में निष्पक्ष नहीं था। कभी-कभी अपनी धारणाओं के आधार पर बातें करता और सच के अनुसार नहीं चलता, कभी-कभी बढ़ा-चढ़ाकर बातें करता। कभी तो जानबूझकर खुद को गलत तरीके से पेश कर कपट करता। धीरे-धीरे और भी साफ हो गया कि मैं सचमुच एक झूठा इंसान हूँ। मुझे याद है, एक बार अगुआ ने पूछा कि प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है, मैंने सोचा कि, मेरे पास तो उसके बारे में जानने का वक्त ही नहीं है। अगर मैंने कहा कि मुझे नहीं पता, जाकर पूछना पड़ेगा, तो क्या उन्हें लगेगा कि मैं व्यावहारिक नहीं हूँ, वास्तविक कार्य नहीं करता? मैं उस सवाल से बचने और उसके बारे में पता करके बताने की सोच रहा था, तब भले ही वो काम न हुआ हो, अगुआ मेरे बारे में कुछ बुरा नहीं कहेंगी, लगेगा कि कम से कम मैं चीज़ों की जानकारी तो रखता हूँ। मैं ऐसा करने ही वाला था, तभी एहसास हुआ कि मैं फिर से अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए कपटी बन रहा हूँ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा, "परमेश्वर, मैं अपनी कुटिल मंशाओं को त्यागकर, ईमानदार बनकर सत्य पर अमल करना चाहता हूँ। मुझे राह दिखाओ, मेरी मदद करो।" फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ये वचन याद आये : "झूठ बोल कर तुम अपना ईमान और आत्म-सम्मान बेच देते हो। इन झूठों की वजह से तुम अपनी गरिमा खो देते हो और परमेश्‍वर के समक्ष तुम्‍हारा कोई ईमान नहीं रह जाता। परमेश्‍वर इससे आनन्दित नहीं होता और वह इससे नफ़रत करता है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है')। "ईमान" और "आत्म-सम्मान" जैसे शब्दों ने मुझे सच बोलने और राक्षस की तरह जीना छोड़ने के लिए प्रेरित किया। फिर मैंने ये कहते हुए सीधा सा जवाब भेजा, "मुझे इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है, पहले इसका पता लगाना होगा।" संदेश भेजने के बाद मेरे दिल को काफी सुकून मिला। मुझे और भी ज़्यादा लगने लगा कि ईमानदार होना इंसानियत का और सही मार्ग अपनाने का सबसे बुनियादी पहलू है।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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