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आध्यात्मिक युद्ध में परीक्षाओं पर विजय पाने के लिए 3 अचूक तरीके

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जिनशिंग, दक्षिणी कोरिया

भाइयो और बहनो,

आप सबको प्रभु की शांति मिले! अक्सर ही, परमेश्वर में विश्वास और उनका अनुसरण करने के हमारे समय के दौरान सभी प्रकार के आध्यात्मिक युद्ध होते हैं। पैसे, हैसियत और शोहरत को लेकर परीक्षाएं, और पुरुषों और महिलाओं के बीच प्रलोभन, साथ ही साथ अविश्वासियों द्वारा लांछन, प्रियजनों द्वारा दमन और बाधा के साथ-साथ शैतानी शासन द्वारा शिकार और सताए जाने की परीक्षाएं होती हैं। कभी-कभी पूरी तरह अप्रत्याशित आपदाएं हम पर आ पड़तीं हैं। बाइबल कहती है: "सचेत हो, और जागते रहो; क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए" (पतरस 5:8)। परमेश्वर के वचन कहते हैं: "पृथ्वी पर, सब प्रकार की दुष्ट आत्माएँ आराम करने के लिए एक स्थान की ओर चुपके चुपके निरन्तर आगे बढ़ती हैं, और वे लगातार मनुष्यों की लाशों की खोज कर रही हैं कि उन्हें खा सकें" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "दसवाँ कथन")। ऐसा कोई पल नहीं है जब शैतान हमारे करीब नहीं होता, हमें लुभाने, परीक्षा लेने और सताने के लिए किसी भी व्यक्ति, घटना, या चीज़ का उपयोग करने के लिए अपने दिमाग को खंगाल रहा होता है, कोशिश कर रहा होता है कि हमें बुराई में, आपदा में डुबो दे और हमें परमेश्वर से दूर कर दे, हमें परमेश्वर से धोखा दिलवाने की कोशिश करता है ताकि अंत में वो हमें पूरी तरह निगल सके। अगर हममें सत्य की कमी है, तो हममें विवेक भी नहीं होगा; अगर हम आध्यात्मिक युद्ध को स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहे हैं, अगर हम परमेश्वर के वचनों में दृढ़ नहीं रह सकते हैं, तो बहुत सम्भावना है कि हम शारीरिक लाभों और वरीयताओं के पीछे जायेंगे, शैतान के जाल में गिरेंगे और अपनी गवाही खो देंगे। ईसाई होने के नाते, शैतान की चालबाजी को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। तो हम आध्यात्मिक युद्ध के बीच शैतान की चालबाज़ी को समझने और परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होने के लिए क्या कर सकते हैं? शैतान के प्रलोभनों पर विजय पाने के लिए मैं अभ्यास के तीन मार्गों पर आपके साथ कुछ साहचर्य करना चाहूँगी।

सबसे पहले, जब शैतान के प्रलोभन का सामना हो, तो आपको परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को समझने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा सत्य की तलाश करनी चाहिए और शैतान की चालों का शिकार नहीं होना चाहिए।

शैतान अधिकतम हद तक दुष्ट और क्रूर है। उसके द्वारा लोगों को दिए गये सभी प्रलोभन उनके नाज़ुक बिंदुओं, उनकी गंभीर कमज़ोरियों का फायदा उठाते हैं। यह वहाँ से शुरू होता है जहाँ कोई व्यक्ति सबसे कमज़ोर होता है, ठीक जैसे कि अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने के लिए हव्वा को ललचाना। हमेशा ऐसे समय पर ही सबसे ज्यादा सम्भावना होती है कि लोग वो प्रकट करते हैं जो स्वाभाविक है, वे अपने कार्यों में व्यक्तिगत हितों और वरीयताओं का पीछा करते हैं-तब शैतान की चाल से उनके मात खाने की आशंका बहुत अधिक होती है। यही कारण है कि जब हम आध्यात्मिक युद्ध का सामना करते हैं, तो हमें पहले परमेश्वर से आगे खुद को शांत करना चाहिए, प्रार्थना करनी चाहिए, उनकी इच्छा और आवश्यकताओं और साथ ही, हमें यह भी जानना चाहिए कि परमेश्वर को संतुष्ट करने और उनकी गवाही देने के लिए क्या करना चाहिए, इसकी तलाश करना चाहिए और यदि हम देह को संतुष्ट करते हैं तो उसका नुकसान और परिणाम क्या होगा इसकी खोज करनी चाहिए। एक बार जब हम सत्य समझ गए, तो हम स्वाभाविक रूप से शैतान की चालबाजी से बच निकलने और प्रलोभन पर विजय पाने में सक्षम होंगे। ठीक जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था: "और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्‍वास से माँगोगे वह सब तुम को मिलेगा" (मत्ती 21:22)। परमेश्वर का वचन यह भी कहता है: "जब परमेश्वर ने मानवजाति को बना लिया और उन्हें आत्माएँ दे दीं उसके बाद, उसने उन्हें आदेश दिया कि यदि उन्होंने परमेश्वर को नहीं पुकारा, तो वे उसके आत्मा से नहीं जुड़ पाएँगे और इस प्रकार स्वर्ग से "उपग्रह टेलीविजन" पृथ्वी पर प्राप्त नहीं होगा। जब परमेश्वर लोगों की आत्माओं में अब और नहीं है, तो एक खाली स्थान अन्य चीजों के लिए खुला हुआ है, और ऐसे ही शैतान प्रवेश करने के अवसर को झपट लेता है। जब लोग अपने हृदय से परमेश्वर से संपर्क करते हैं, तो शैतान तुरंत खलबली में पड़ जाता है और बचने के लिए भागता है। मानवजाति के रोने के माध्यम से परमेश्वर उन्हें वह देता है जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है, किन्तु वह पहले से उनके भीतर "निवास नहीं" करता है। वह उनके रोने की वजह से बस लगातार उनकी सहायता करता है और लोगों को उस आंतरिक शक्ति से मजबूती मिलती है ताकि शैतान यहाँ अपनी इच्छानुसार "खेलने" की हिम्मत न करे। इस तरह, यदि लोग लगातार परमेश्वर के आत्मा से जुड़ते हैं, तो शैतान गड़बड़ी करने के लिए आने की हिम्मत नहीं करता है" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "सत्रहवें कथन की व्याख्या" से लिया गया)।

बाइबिल में लिखा है कि अय्यूब ने शैतान के परीक्षणों के कारण अपनी संपत्ति और बच्चों दोनों को खो दिया लेकिन कुछ भी नहीं कहा, और न ही उसने लोगों को अपनी संपत्ति वापस पाने के लिए लुटेरों से लड़ने के लिए जमा किया। इसके बजाय, वह प्रार्थना करने और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आया और उसके माध्यम से वह समझ पाया कि उसने जो कुछ हासिल किया था, वह उसकी अपनी क्षमताओं के माध्यम से नहीं था, बल्कि सब परमेश्वर द्वारा दिया गया था। उस समय उसे जो नुकसान हुआ वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित था, और चूँकि सभी घटनाएं और चीजें परमेश्वर के हाथों में हैं, इसलिए मानवजाति को आज्ञाकारिता दिखानी चाहिए। इसलिए अय्यूब ने ये कहा: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" (अय्यूब 1:21)। अय्यूब ने परमेश्वर की गवाही दी और शैतान को शर्मिंदा किया। हम अपने वास्तविक जीवन में देख सकते हैं कि कुछ लोग, जिन्होंने परमेश्वर में विश्वास किया है और कलीसिया का काम किया है, उनके परिवार और मित्र ऐसे लोग रहे हैं जो उन्हें देह के सुख, पैसा बनाने के सुख की बातों से उकसाते हैं, नतीजतन पैसे कमाने के लिए उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है। वे सभाओं में कम से कम भाग लेते हैं और परमेश्वर के वचनों को कम से कम पढ़ते हैं, और अंत में वे बुरी प्रवृत्तियों द्वारा पूरी तरह से कब्जे में कर लिये जाते हैं। जब वास्तविक विश्वासियों का इन चीजों का सामना होता है, तो उन्हें भी आंतरिक युद्ध का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे परमेश्वर के सामने आने और प्रार्थना करने में, उनकी इच्छा और अपेक्षाओं को खोजने में सक्षम हो जाते हैं, और परमेश्वर के वचनों के माध्यम से समझ जाते हैं कि देह के सुख-वे क्या पहनते और खाते है-ये सब अस्थायी हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आनंद कितना अधिक है, वे अर्थहीन हैं और केवल खोखलापन और पीड़ा हैं, और जब लोग बहुत सहज हो जाते हैं तो बुराई के मार्गों पर उतरना आसान होता है। उन्हें यह भी एहसास होता है कि परमेश्वर हमें एक उद्देश्य के साथ, एक आदेश के साथ दुनिया में लेकर आये हैं, जिसे हमें पूरा करना चाहिए। हमें सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपना कर्तव्य पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। ठीक जैसा कि बाइबिल में लिखा है, हम आगंतुक हैं, हम दुनिया में मेहमान हैं, इसलिए ईसाईयों के तौर पर हमें अपनी देह पर कपड़ों और मेज पर भोजन से संतुष्ट होना चाहिए। एक बार जब कोई परमेश्वर की इच्छा को समझ लेता है तो वो अब धन की चिंताओं से और बंधा नहीं रहेगा और सृष्टि में से एक के रूप में अपना कर्तव्य पूरा कर पाने और उचित आस्था रख पाने में समर्थ होगा। इससे यह स्पष्ट है कि यदि हम आध्यात्मिक युद्ध में शैतान पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर से अधिक से अधिक प्रार्थना करना चाहिए और उन पर निर्भर होना चाहिए। केवल अगर हम सत्य को वास्तव में समझते हैं तो हम शैतान की चालों से बच निकलने और परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होंगे।

दूसरा, जब शैतान से प्रलोभन का सामना हो तो आपको यह सत्य समझने में सक्षम होना चाहिए कि आध्यात्मिक युद्ध शैतान द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर हमला है और यह परमेश्वर के साथ शर्त लगाना है। केवल परमेश्वर की तरफ दृढ़ता से खड़े होकर ही आप विजयी हो सकते हैं।

शैतान परमेश्वर का कट्टर दुश्मन है और यह परमेश्वर से, परमेश्वर द्वारा निर्मित मानवजाति से नफरत करता है, और यह विशेष रूप से उन लोगों से नफरत करता है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति विश्वास प्राप्त करता है और परमेश्वर की ओर मुड़ता है तो यह अपनी शक्ति से, प्रलोभन देने, बाधा डालने और काम बिगाड़ने के लिए जो कुछ भी हो सकता है वो करता है। यह सभी लोगों, घटनाओं और चीजों का उपयोग अपनी चालबाजी के लिए करता है ताकि लोग नकारात्मक और कमज़ोर हो जाएं, परमेश्वर से इनकार कर दें और खुद को उनसे दूर कर लें, और यहां तक कि शैतान के पलड़े में वापस चले जाएं। जैसे कि जब अय्यूब का परीक्षण किया गया था, लोग अपनी आंखों से देख सकते थे कि लुटेरे अय्यूब की संपत्ति लेकर भाग गये, उसका घर गिर गया और अपने साथ उसके बच्चों का जीवन ले गया, लेकिन असल में, इन सबके पीछे आध्यात्मिक युद्ध था। यह शैतान था जो परमेश्वर के साथ एक दांव लगा रहा था। यदि हम आध्यात्मिक युद्ध के पीछे के सत्य को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं, लेकिन इसका विश्लेषण करते हैं और इसे मानवीय परिप्रेक्ष्य से देखते हैं, सही और गलत पर विचार करते हैं, तो हम शैतान की चाल के शिकार हो जाएंगे, जिससे परमेश्वर से हो जायेंगे और उन्हें धोखा दे देंगे। परमेश्वर के वचनों में जो प्रकट किया जाता है वो यह है: "परमेश्वर किसी व्यक्ति के लिए कार्य करता है और उसकी देखभाल करता है, किसी व्यक्ति पर नज़र रखता है, और शैतान उसके हर एक कदम का करीब से पीछा करता है। परमेश्वर किसी पर भी अनुग्रह करता है, तो शैतान भी पीछे पीछे चलते हुए नज़र रखता है। यदि परमेश्वर को यह व्यक्ति चाहिए, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब कुछ करेगा, वह विभिन्न बुरे तरीकों का इस्तेमाल करता है ताकि वह कार्य जिसे परमेश्वर ने किया है उसे भरमाए, परेशान और तबाह करे जिससे वह अपने छिपे हुए उद्देश्य को हासिल कर सके। उसका उद्देश्य क्या है? वह नहीं चाहता है कि परमेश्वर के पास कोई हो; उसे वे सभी लोग चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्जा करे, उनका नियन्त्रण करे, उनका आदेश ले जिससे वे उसकी आराधना करें, जिससे वे उसके साथ रहते हुए बुरे कार्य करें। क्या यह शैतान का भयानक इरादा नहीं है? सामान्यतः, तुम लोग अकसर कहते हो कि शैतान कितना बुरा, एवं कितना खराब है, परन्तु क्या तुम लोगों ने उसे देखा है? तुम लोग सिर्फ यह देख सकते हो कि मनुष्य कितना बुरा है और मनुष्य ने असल में नहीं देखा है कि शैतान वास्तव में कितना बुरा है। …शैतान परमेश्वर के साथ युद्ध में है, उसके पीछे पीछे चलता रहता है। उसका उद्देश्य परमेश्वर के समस्त कार्य को नष्ट करना है जिसे परमेश्वर करना चाहता है, उन लोगों पर कब्जा एवं नियन्त्रण करना है जिन्हें परमेश्वर चाहता है, उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है जिन्हें परमेश्वर चाहता है। यदि उन्हें मिटाया नहीं जाता है, तो वे शैतान के द्वारा उपयोग होने के लिए उसके कब्जे में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV")।

अब अंत के दिनों में, परमेश्वर ने अपने घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य का एक कदम सम्पन्न किया है। अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के काम को स्वीकार करने के बाद, कुछ लोगों को कुछ मुश्किल चीजों का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के लिए, विश्वास प्राप्त करने के ठीक बाद कुछ भाइयों और बहनों ने अपने परिवारों से बाधा और दमन का सामना किया है; कुछ लोगों को उनकी जीवनसाथी द्वारा तलाक की धमकी भी मिली है जिससे वे सच्चे मार्ग को त्यागने पर मजबूर हो जायें। कुछ भाई-बहन अचानक बीमार पड़ गये हैं, उन्हें अप्रत्याशित आपदाओं का सामना करना पड़ा है, या उनके परिवारों को दुर्भाग्यपूर्ण चीज़ों का सामना करना पड़ा है। इन चीजों का सामना करते समय कई लोगों ने अवधारणाओं को विकसित कर लिया है। "मैं पहले प्रभु यीशु में विश्वास करता था और सबकुछ शांतिपूर्ण और बढिया था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। क्या मेरा विश्वास अब गलत है? अगर मैं सच्चे परमेश्वर में विश्वास करता तो चीजें अच्छी तरह से चलनी चाहिये।" नतीजतन, कुछ लोग निराश और कमजोर हो जाते हैं, कुछ लोग परमेश्वर के काम के बारे में संदेह करने लगते हैं, और कुछ लोग तो अपना विश्वास भी त्याग देते हैं। वास्तविकता यह है कि ये हालात लोगों में इसलिए पैदा होते हैं क्योंकि उन्होंने आध्यात्मिक युद्ध की सच्चाई में नहीं झाँका है और उनमें शैतान की चाल के प्रति समझ की कमी है। वास्तव में, इन मुद्दों का सामना करना ही दरअसल शैतान की बाधा और व्यवधान है-शैतान जानता है कि हम सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते है और वह विशेष रूप से जानता है कि परमेश्वर मानवजाति को बचाने के लिए आए हैं। उसे डर है कि सभी लोग परमेश्वर में विश्वास करेंगे और उनका पालन करेंगे और फिर कोई भी उसका अनुसरण नहीं करेगा। यही कारण है कि लोगों को बाधित और भ्रमित करने के लिए आपदाओं का निर्माण करने के लिए वो सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों का उपयोग करने की हरसम्भव कोशिश करता है ताकि वे सही और गलत के बीच अंतर न कर सकें, और वे सच्चे मार्ग को त्याग दें। यह शैतान का भयावह इरादा है और यही आध्यात्मिक युद्ध के पीछे का सच है। ये यह देखने का समय है कि लोग किस प्रकार के चुनाव करते हैं। अगर हम केवल चीजों की सतह को देखते हैं और अपने शारीरिक हितों को बनाए रखते हैं, तो हम शैतान की चाल में आ जाएंगे और परमेश्वर को धोखा दे देंगे। यदि हम आध्यात्मिक युद्ध की सच्चाई को समझने में सक्षम हैं, परमेश्वर के लिए एक शक्तिशाली इच्छा रखते हैं और दृढ़ता से उनकी तरफ बने रहते हैं, अगर जो कुछ भी हमारे पास देह में है उसे खो कर भी हम अपने विश्वास में दृढ़ हो सकें, परमेश्वर का अनुसरण कर सकें, और उसकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकें, तब शैतान के हाथ बंध जायेंगे-और जब हम इस आध्यात्मिक युद्ध में दृढ़ता से गवाही देंगे तो वह अपमानित और पराजित होगा। जैसे कि परमेश्वर ने कहा: "मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य परस्पर क्रिया के समान प्रतीत होता है, जैसे कि यह मानव प्रबंधों के द्वारा उत्पन्न हुआ हो, या मानविक हस्तक्षेप के माध्यम से। परन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी होती है और परमेश्वर के लिए एक दृढ़ गवाह बने रहने के लिए लोगों से अपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब की परीक्षा ली जा रही थी: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के सामने शर्त लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कार्य थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। हर कदम के पीछे जो परमेश्वर ने शैतान के साथ बाज़ी में परमेश्वर ने तेरे लिए उठाए—उन सभी के पीछे एक युद्ध था। …जब परमेश्वर और शैतान आत्मिक क्षेत्र में युद्ध करते हैं, तुझे परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए गवाही में तुझे किस प्रकार से दृढ़ खड़े रहना चाहिए? तुझे यह जानना चाहिए कि जो कुछ भी तेरे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर चाहता है तू उसके लिए एक गवाह बन" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है")।

तीसरा, जब शैतान से प्रलोभन का सामना हो तो आपको परमेश्वर के वचनों के अनुसार चलना करना चाहिए, सत्य का पालन करने में दृढ़ और परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए ताकि शैतान को पूरी तरह से अपमानित और पराजित करते हुए उसकी चाल के खिलाफ जवाबी हमला कर सकें।

परमेश्वर के वचन कहते हैं: "वह सत्य जिसे मनुष्य को धारण करने की आवश्यकता है उसे परमेश्वर के वचन में पाया जाता है, यह एक सत्य है जो मानवजाति के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक है। यह वह शक्तिवर्धक पेय और भरण-पोषण है जिसकी जरूरत तुम लोगों के शरीर को है। कुछ ऐसा जो तुम्हारे सामान्य मानवता को बहाल करने में सहायता करता है। अर्थात् एक सत्य जिससे तुम लोगों को सुसज्जित किया जाना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, उतनी ही जल्दी तुम लोगों का जीवन फूल की तरह खिलेगा; तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट हो जाता है। जैसे जैसे तुम्हारी उच्चता बढ़ती है, तुम लोग आध्यात्मिक संसार की चीज़ों को और भी अधिक साफ साफ देखोगे, और तुम लोग शैतान के ऊपर विजय पाने के लिए और भी अधिक शक्तिशाली होगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सत्य को समझ लेने के बाद उसका अभ्यास करो")। "मेरी प्रजा! तुम लोगों को मेरी देखभाल और सुरक्षा के भीतर रहना होगा। कामुकता का व्यवहार कभी भी न करो! बिना सोचे समझे कभी भी व्यवहार न करो! उसके बजाए, मेरे घराने में अपनी वफादारी अर्पित करो, और केवल वफादारी से ही तुम शैतान की धूर्तता के विरूद्ध पलटकर वार कर सकते हो" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "दसवाँ कथन")। हम सभी जानते हैं कि केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, कि वे परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, कि सत्य सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है, कि परमेश्वर के वचनों के बाहर सभी सिद्धांत मिथ्या हैं, शैतानी दर्शन हैं, और उनमें कोई सार नहीं है। जब तक हम चीजों पर हमारे दृष्टिकोण में परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करते हैं, तब तक हम जान सकते हैं कि सकारात्मक क्या है और नकारात्मक क्या है। केवल तभी हम शैतान के सभी मिथ्या और झूठों को समझ सकते हैं, उसकी चालबाजी के खिलाफ जवाबी हमला कर सकते हैं, और कठिनाइयों में अपना रास्ता खोने से या शैतान की बातों में आने से बच सकते हैं। शैतान द्वारा प्रभु यीशु की तीन परीक्षा को बाइबल में दर्ज किया गया है। उसने उन पर हमला करने के लिए शास्त्रों के वचनों का उपयोग किया था, यहाँ तक कि उन्हें प्रलोभन देने के लिए दुनिया के धन का उपयोग भी किया। लेकिन हर बार प्रभु यीशु ने शैतान की चाल के खिलाफ हमला करने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल किया। इस तरह शैतान अपनी दुम दबाकर, अपमानित और पराजित होकर भाग गया। इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं, और वे शैतान की चालबाजी के खिलाफ सबसे अच्छे हथियार हैं।

अंत के दिनों में, परमेश्वर ने अब एक बार फिर से देहधारण किया है, और न्याय के कार्य का एक कदम को पूरा करने के लिए वचनों को बोला है। कई भाई-बहनों ने परमेश्वर की वाणी सुनी है और देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, इससे यह पता चलता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटे हुए प्रभु यीशु हैं। एक-एक करके, उन्होंने अंत के दिनों के परमेश्वर का काम स्वीकार कर लिया है। इस वक्त के दौरान कुछ भाई-बहनों ने सीसीपी सरकार के ऑनलाइन झूठ, निंदा और उनके द्वारा की गयी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी को भी देखा है और यह कि सीसीपी ने कलीसिया को एक अपधर्म, एक कुपंथ बताकर उसकी निंदा की है। कुछ भाई-बहनों ने धार्मिक मंडलियों के पादरियों और एल्डर्स की बाधा और व्यवधान का सामना किया है, जिन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में इस विश्वास की यह कहकर निंदा की है कि वे सिर्फ़ एक व्यक्ति में विश्वास करते हैं। उनका कहना है कि उनके वचन बाइबल की सीमाओं के बाहर हैं, इत्यादि। इन पादरियों और एल्डर्स ने भाइयों और बहनों के परिवार के सदस्यों को भी परमेश्वर की ओर मुड़ने से रोकने और बाधा डालने के लिए प्रेरित किया है। गंभीर आध्यात्मिक युद्ध के बीच में कुछ भाई-बहन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का पालन करने, परमेश्वर के प्रति भक्ति बनाए रखने में, और परमेश्वर की तरफ से दृढ़ रहने में सक्षम रहे हैं क्योंकि उन्होंने देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, और वे बाइबल के सभी रहस्यों का अनावरण करते हैं। ये वचन इंसानों के भ्रष्टाचार को दूर कर सकते हैं, शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचा सकते हैं, और वे सटीक रूप से वही हैं जो आत्मा कलीसियाओं से कहता है। इस प्रकार उन्होंने यह निर्धारित किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर जो कर रहे हैं वो अंत के दिनों में मानवजाति को बचाने का काम है, और कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर हैं। तथ्य यह है कि यदि लोग इस बात की पुष्टि करने में सक्षम हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन सत्य हैं और परमेश्वर की वाणी हैं, तो चाहे सीसीपी सरकार और धार्मिक दुनिया कितने ही झूठ क्यों न फैलाये, वे भ्रमित नहीं होंगे। सच सच है और झूठ झूठ है। एक हज़ार बार बोला गया झूठ, झूठ ही रहता है और यह कभी सच नहीं बन सकता है। जैसे जब प्रभु यीशु प्रकट हुये थे और कार्य किया था, तब यहूदी धर्म के अगुवाओं ने उनके बारे में सभी प्रकार की झूठी बातें बनाईं, इस बात से इनकार करते हुए कि वे पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आये थे, प्रभु यीशु की निंदा की कि वे ईशनिंदा करते हैं, और दावा किया कि उनका दुष्टात्माओं को बाहर निकालना बेल्जबूब के माध्यम से था। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे कैसे आलोचना और निंदा करते थे, प्रभु यीशु मसीह, उद्धारकर्ता थे, और कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता था। उस समय, जो लोग वास्तव में प्रभु में विश्वास करते थे, वे उनके वचनों को कायम रख सकते थे, गुमराह करने वाले झूठ और मिथ्या के फेर में नहीं आते थे, वे दृढ़ता से प्रभु यीशु के अनुसरण में बने रहते थे। जैसा कि पतरस ने कहा था: "हे प्रभु, हम किसके पास जाएँ? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं; और हम ने विश्‍वास किया और जान गए हैं कि परमेश्‍वर का पवित्र जन तू ही है" (यूहन्ना 6:68–69)। लेकिन अगर हम परमेश्वर के वचनों को लेकर मन में संदेह रखते हैं, अगर हम परमेश्वर के वचनों को कायम रख पाने और परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी बनाए रखने में असमर्थ हैं, तो हममें शैतान की चाल की समझ नहीं होगी और निश्चित रूप से हम इसके प्रलोभन में पड़ जाएंगे। हम प्रभु की वापसी का स्वागत नहीं कर पाएंगे। इस बात से स्पष्ट है कि किसी भी तरह के आध्यात्मिक युद्ध के माध्यम से, केवल अगर हम दृढ़ता से परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं और परमेश्वर के प्रति बिल्कुल वफादार बने रहते हैं, तो हम शैतान को पूरी तरह से त्यागने, इसके प्रभाव को फेंकने और परमेश्वर द्वारा बचाए जाने में सक्षम होंगे।

वास्तविक जीवन में आध्यात्मिक युद्ध किसी भी समय शुरू हो सकता है। अगर हम अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं आते और प्रार्थना नहीं करते हैं, तो हम आध्यात्मिक युद्ध की सत्यता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाएंगे। अगर हम अपने विवेक में परमेश्वर के वचनों और सत्य पर भरोसा नहीं करते हैं, तो हम शैतान के प्रलोभनों का शिकार बन जायेंगे और अपनी गवाही खो देंगे। शैतान की चालों के आधार पर परमेश्वर की बुद्धि का प्रयोग किया जाता है - परमेश्वर हमें सत्य को समझने और गहन आध्यात्मिक युद्ध के माध्यम से विवेक हासिल करने में मदद करते हैं ताकि हम अपने जीवन में विकास कर सकें। सभी प्रकार के आध्यात्मिक युद्ध के दौरान, जब तक हम उपरोक्त तीन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करते हैं, हम निश्चित रूप से शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करने और गवाही देने में सक्षम होंगे!