माँ की गिरफ्तारी और कैद से मैंने जो सबक सीखा

19 मई, 2026

शिआओ यूशिन, चीन

अगस्त 2023 में, मेरी माँ को अपना कर्तव्य निभाते समय सीसीपी ने गिरफ्तार कर लिया था। उस समय मुझे और भाई-बहनों को कुछ पता नहीं था। हमें उसके बारे में तब तक कोई खबर नहीं मिली, जब तक कि सितंबर 2024 में उसने जेल से एक पत्र नहीं भेजा। तभी हमें पता चला कि उसे चार साल की सजा सुनाई गई है। इस खबर से मैं पूरी तरह कमजोर पड़ गई। मेरा दिल पीड़ा से भर गया और मैंने सोचा, “माँ को पहले सुसमाचार का प्रचार करने के लिए हिरासत में लिया गया था। रिहा होने के बाद वह घर से दूर रहकर अपना कर्तव्य निभाती रही। इन सारे वर्षों में पुलिस हमेशा हमारे घर आती रही, यह जानने के लिए कि वह कहाँ है। अब वह फिर से उनके चंगुल में है। मैं सोच भी नहीं सकती कि वे उसे कैसे यातना देंगे। जेल का जीवन कठिन है। क्या वह अडिग रह पाएगी?” तब एक बहन ने मेरे साथ संगति की। उसने मुझे बताया कि हम जिन परिवेशों का अनुभव करते हैं और जीवन में जो कष्ट सहते हैं, वे सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत हैं। उसने कहा कि मुझे अपनी माँ को परमेश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। मैं जानती थी कि मुझे समर्पण करना चाहिए, लेकिन जैसे ही मैंने सोचा कि सीसीपी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों के साथ कितनी क्रूरता से पेश आती है और कैसे मेरी माँ को निश्चित रूप से बहुत कष्ट सहना पड़ेगा, मेरे मन में उथल-पुथल मच गई और उसकी कही बात को मैं मुश्किल से ही समझ पाई। इसके बाद मैं अपना कर्तव्य निभाती रही, लेकिन जब भी मुझे फुर्सत मिलती या रात को नींद नहीं आती, मेरा मन गिरफ्तार हुए भाई-बहनों की उन तस्वीरों से भर जाता, जिन्हें पुलिस बेरहमी से यातना दे रही थी या जिन्हें कैदी सता रहे थे और मुझे अपनी माँ की बहुत चिंता होने लगती। मैं सोचती, “वह जेल में कैसी होगी?” “उसकी चार साल की सजा में अभी भी कितने दिन और रातें बाकी हैं। वह इसे कैसे काट पाएगी? कुछ लोग गिरफ्तार होने के बाद यातना नहीं सह पाते, इसलिए वे यहूदा बन जाते हैं। दूसरे लोग तीन कथनों पर दस्तखत कर देते हैं और परमेश्वर को धोखा दे देते हैं। क्या होगा अगर माँ अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाई और उसने परमेश्वर को धोखा दे दिया? क्या उसके सहे हुए सारे कष्ट व्यर्थ नहीं चले जाएँगे?” फिर मुझे याद आया कि कुछ महीने पहले एक बहन ने मुझे बताया था कि उसके पति को उसकी आस्था के कारण साढ़े पाँच साल की सजा सुनाई गई थी। वह अपनी सजा पूरी होने पर रिहा होने वाला था, लेकिन चूँकि उसने कलीसिया के साथ गद्दारी करने या परमेश्वर को नकारने से इनकार कर दिया, पुलिस ने असल में उसे पीट-पीटकर मार डाला। यहाँ तक कि उन्होंने तथ्यों को भी तोड़ा-मरोड़ा और दावा किया कि उसने आत्महत्या कर ली थी। एक और भाई को भी उसकी गिरफ्तारी के एक साल बाद यातना देकर मार डाला गया था। यह सोचकर मैं और भी चिंतित हो गई। अगर पुलिस ने मेरी माँ को यातना देकर मार डाला, तो परमेश्वर उसे कैसे बचा पाएगा? मैं इसे समझ ही नहीं पाई। मैं उलझन में थी, “परमेश्वर में विश्वास करने के बाद माँ ने लगन से अपना कर्तव्य निभाया। पिछली बार जब उसे गिरफ्तार किया गया था, तो उसने कभी किसी के साथ या कलीसिया के साथ गद्दारी नहीं की। उसके बाद वह गिरफ्तारी से बचने के लिए हमेशा घर से दूर रहकर अपना कर्तव्य निभाती रही। परमेश्वर ने इतने सालों तक उसकी देखभाल और रक्षा की है, तो इस बार उसने उसकी रक्षा क्यों नहीं की? परमेश्वर सीसीपी को हमें गिरफ्तार करने और सताने क्यों देता है? अगर यह सारा उत्पीड़न न होता, तो हम शांति से परमेश्वर में विश्वास कर सकते थे और अपने कर्तव्य निभा सकते थे, और माँ को जेल में कष्ट नहीं सहना पड़ता।” उन दिनों मेरा मन भारी और दमित रहता था। मुझे नहीं पता था कि अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर से क्या कहूँ और मैं अपना कर्तव्य निभाते हुए अपने दिल को शांत नहीं रख पाती थी। मैं बस यही सोचती रहती थी कि मेरी माँ कैसी होगी और मैं बहुत ज्यादा मानसिक पीड़ा में थी। मैं जानती थी कि मेरी दशा गलत थी और मैंने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना ली थीं। फिर मुझे उसके वचनों का एक अंश याद आया : “धारणाएँ एक बड़ी समस्या हैं। परमेश्वर के बारे में लोगों का धारणाएँ रखना, उनके और परमेश्वर के बीच एक दीवार होने जैसा है, जो उन्हें परमेश्वर का वास्तविक चेहरा देखने से रोकती है, जो उन्हें परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और सच्चे सार को देखने से रोकती है। ऐसा क्यों है? इसलिए कि लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जीते हैं, वे अपनी धारणाओं का प्रयोग यह निर्धारित करने के लिए करते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत और परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसे मापने, परखने और उसकी निंदा करने के लिए करते हैं। ऐसा करके लोग अक्सर कैसी दशा में डूब जाते हैं? क्या लोग अपनी धारणाओं में जीते हुए परमेश्वर के प्रति सचमुच समर्पित हो सकते हैं? क्या वे परमेश्वर में सच्ची आस्था रख सकते हैं? (नहीं, वे नहीं रख सकते हैं।) जब लोग परमेश्वर के प्रति थोड़ा-बहुत समर्पण करते भी हैं, तो ऐसा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार ही करते हैं। जब कोई अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करता है, तो वह उनकी निजी चीजों से कलंकित हो जाता है जो शैतान और बाहरी दुनिया की होती हैं और वह सत्य के विपरीत होता है। परमेश्वर को लेकर लोगों की धारणाओं की समस्या गंभीर है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच के इस प्रमुख मुद्दे को तत्काल सुलझाने की आवश्यकता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (1))। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि उसके बारे में धारणाएँ रखना कितना खतरनाक है। वे इंसान और परमेश्वर के बीच गलतफहमियाँ और अवरोध पैदा करती हैं। अगर कोई इंसान होने वाली चीजों के पीछे परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता, तो वह उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकता। उस दौरान मेरी दशा बिल्कुल यही थी। जब से मुझे पता चला कि मेरी माँ जेल में है, जैसे ही मैंने उसके कष्टों के बारे में सोचा और यह सोचा कि क्या वह जिंदा भी बच पाएगी, मैं परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लेती थी। मैं नहीं समझ पाई कि वह बड़े लाल अजगर को विश्वासियों को गिरफ्तार करने और सताने क्यों देता है, मैंने शिकायत की कि उसने मेरी माँ की रक्षा नहीं की थी और मेरा दिल अपने कर्तव्य में नहीं था। अगर मैं सत्य खोजने के बजाय अपनी धारणाओं में जीती रहती, तो मेरे और परमेश्वर के बीच अवरोध केवल बढ़ता ही जाता। इसलिए मैंने प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं माँ की गिरफ्तारी के प्रति समर्पण नहीं कर पा रही हूँ और मैंने तुम्हारे बारे में धारणाएँ बना ली हैं। मैं इतनी विद्रोही नहीं बने रहना चाहती। मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ।”

अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिससे मुझे बहुत मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोगों को बार-बार यह जाँच करनी चाहिए कि उनके दिल में कुछ ऐसा तो नहीं है जो परमेश्वर के साथ असंगत है या उसके बारे में गलतफहमी है। गलतफहमियाँ कैसे पैदा होती हैं? लोग परमेश्वर को गलत क्यों समझ लेते हैं? (क्योंकि उनका स्वार्थ प्रभावित होता है।) यहूदियों के यहूदिया से निर्वासन के तथ्य देखने के बाद लोग आहत महसूस करते हैं और कहते हैं, ‘पहले तो परमेश्वर ने इस्राइलियों से इतना प्यार किया। उसने मिस्र से बाहर जाने और लाल सागर पार करने में उनकी अगुआई की, उन्हें खाने के लिए स्वर्ग का मन्ना और पीने के लिए झरने का जल दिया, फिर उनकी अगुआई करने के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से विधि-विधान दिए और उन्हें जीना सिखाया। मनुष्य के प्रति परमेश्वर का प्रेम उमड़ रहा था—उस समय जो लोग जी रहे थे, वे कितने धन्य थे! पलक झपकते ही उनके प्रति परमेश्वर के रवैये में 180 डिग्री बदलाव कैसे आ गया? उसका सारा प्रेम कहाँ चला गया?’ लोग इसे भावनात्मक रूप से स्वीकार नहीं कर पाते, और वे संदेह करते हुए कहते हैं, ‘परमेश्वर प्रेम है या नहीं है? इस्राइलियों के प्रति उसका मूल रवैया अब क्यों नहीं दिखता? उसका प्रेम बिना कोई नामो-निशान छोड़े लुप्त हो गया है। उसमें कोई प्रेम है भी या नहीं?’ यहीं से लोगों की गलतफहमी शुरू होती है। लोगों में गलतफहमियाँ पनपने का संदर्भ क्या है? क्या इसका कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के साथ संगत नहीं हैं? क्या यही तथ्य लोगों में परमेश्वर के प्रति गलतफहमी पैदा करता है? क्या लोग परमेश्वर को इसलिए गलत समझते हैं क्योंकि वे उसके प्रेम को सीमित कर देते हैं? वे सोचते हैं, ‘परमेश्वर प्रेम है। इसलिए, उसे लोगों पर नजर रखनी और उनकी सुरक्षा करनी चाहिए और उन्हें अनुग्रह और आशीषों से नवाजना चाहिए। यही परमेश्वर का प्रेम है! जब परमेश्वर इस तरह लोगों से प्रेम करता है, तो मुझे अच्छा लगता है। परमेश्वर लोगों से कितना प्रेम करता है, यह मैं खास तौर से उस समय देख पाया जब उसने उन्हें लाल सागर पार करवाया। उस समय के लोग कितने धन्य थे! काश, मैं भी उनमें से एक होता!’ जब तुम इस कहानी पर मुग्ध होते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा उस पल प्रकट किए गए प्रेम को उच्चतम सत्य और उसके सार का एकमात्र चिह्न मान लेते हो। तुम अपने दिल में परमेश्वर को सीमित कर देते हो और यह फैसला दे देते हो कि परमेश्वर द्वारा उस पल किया गया हर एक कार्य उच्चतम सत्य है। तुम्हें लगता है कि यह परमेश्वर का सबसे प्यारा पक्ष है, और यह वह पक्ष है जो लोगों में उसका आदर और भय उत्पन्न करता है, और यही परमेश्वर का प्रेम है। असलियत में, परमेश्वर के कार्य अपने-आप में सकारात्मक थे, पर तुम्हारे सीमांकन के कारण वे तुम्हारे मन में धारणाएँ बन गए और वे आधार बन गए जिन पर तुम परमेश्वर के बारे में फैसले देते हो। उनकी वजह से तुम परमेश्वर के प्रेम को गलत समझते हो, मानो उसमें दया, निगरानी, सुरक्षा, मार्गदर्शन, अनुग्रह और आशीषों के अलावा कुछ न हो—मानो परमेश्वर का प्रेम बस यही हो। तुम प्रेम के इन पहलुओं को इतना ज्यादा क्यों सँजोते हो? क्या इसका कारण यह है कि यह तुम्हारे स्वार्थ से जुड़ा है? (हाँ, यही कारण है।) यह किस स्वार्थ से जुड़ा है? (दैहिक सुखों और सुविधाजनक जीवन से।) जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं तो वे उससे ये ही चीजें प्राप्त करना चाहते हैं, दूसरी चीजें नहीं। लोग न्याय, ताड़ना, परीक्षणों, शोधन और परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने, चीजें त्यागने और खुद को खपाने, यहाँ तक कि अपने जीवन का उत्सर्ग करने के बारे में भी सोचना नहीं चाहते। लोग सिर्फ परमेश्वर के प्रेम, देखभाल, सुरक्षा, और मार्गदर्शन का आनंद लेना चाहते हैं, इसलिए वे यह फैसला देते हैं कि परमेश्वर का प्रेम उसके सार की एकमात्र विशेषता और उसका एकमात्र सार है। क्या इस्राएलियों को लाल सागर पार करवाते हुए परमेश्वर ने जो चीजें कीं, वे लोगों की धारणाओं का स्रोत बनीं? (हाँ, बन गईं।) इससे एक ऐसा संदर्भ बन गया, जिसमें लोगों ने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं। अगर उन्होंने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, तो क्या वे परमेश्वर के कार्य और स्वभाव की सच्ची समझ हासिल कर सकते हैं? स्पष्ट है कि न सिर्फ वे उसे नहीं समझेंगे, बल्कि उसकी गलत व्याख्या भी करेंगे और उसके बारे में धारणाएँ बना लेंगे। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की समझ बहुत संकुचित है और वह सच्ची समझ नहीं है। क्योंकि यह सत्य नहीं है, बल्कि एक तरह का प्रेम और समझ है जिसका लोग अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और स्वार्थपूर्ण इच्छाओं के आधार पर परमेश्वर से मिले प्रेम और समझ का विश्लेषण और व्याख्या करते हैं; यह परमेश्वर के सच्चे सार के अनुरूप नहीं है। दया, उद्धार, निगरानी, सुरक्षा और लोगों की प्रार्थनाएँ सुनने के अलावा और किन तरीकों से परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है? (दंड, अनुशासन, काट-छाँट, न्याय, ताड़ना, परीक्षणों और शोधन से।) सही कहा। परमेश्वर प्रचुर तरीकों से अपना प्रेम प्रदर्शित करता है : प्रहार करके, अनुशासित करके, तिरस्कृत करके, और न्याय, ताड़ना, परीक्षणों, शोधन इत्यादि से। ये सभी परमेश्वर के प्रेम के पहलू हैं। सिर्फ यही परिप्रेक्ष्य व्यापक और सत्य के अनुरूप है। अगर तुम इसे समझते हो, तो जब तुम अपनी जाँच करके यह पाते हो कि तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ हैं, तब क्या तुम अपनी विकृतियाँ पहचानने और यह चिंतन करके कि तुमसे कहाँ गलती हुई है, एक अच्छा काम करने में सक्षम नहीं होते? क्या यह परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ दूर करने में मदद नहीं कर सकता? (हाँ, कर सकता है।) ऐसा करने के लिए तुम्हें सत्य खोजना चाहिए। जब तक लोग सत्य खोजते हैं, तब तक वे परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियाँ दूर कर सकते हैं, और जब वे परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियाँ दूर कर लेते हैं, तब वे परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के आगे समर्पण कर सकते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य समझकर ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है)परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं उसके कार्यकलापों को इसलिए नहीं समझ सकी क्योंकि मैंने उसके प्रेम को एक निश्चित तरीके से सीमित कर दिया था। मेरा मानना था कि परमेश्वर के प्रेम का मतलब है कि उसे लोगों की निगरानी और उनकी रक्षा करनी चाहिए, उन्हें अनुग्रह और आशीष देना चाहिए और उन्हें कभी भी दर्द या क्लेश का सामना नहीं करने देना चाहिए। जब परमेश्वर के कार्यकलाप मेरी धारणाओं से मेल नहीं खाते थे, तो मैं उन्हें स्वीकार या उनके प्रति समर्पण नहीं कर पाती थी। यह सब इसलिए था क्योंकि मैं सच में उसके कार्य को नहीं जानती थी। मुझे याद है जब मैं छोटी थी, मेरी माँ मुझे बताती थी कि कैसे परमेश्वर ने मानवता की रचना की और हमारे लिए सब कुछ प्रदान किया। व्यवस्था के युग में उसने मूसा से इस्राएलियों को मिस्र से बाहर लाल सागर के पार ले जाने को कहा, उन्हें जंगल में बटेर और मन्ना भेजा और उन्हें कनान की अच्छी भूमि में पहुँचाया। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने बीमारों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को निकाला और मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए उसे सूली पर चढ़ाया गया। तो मेरे मन में परमेश्वर का प्रेम केवल देखभाल, सुरक्षा, अनुग्रह और आशीष प्रदान करने के बारे में था। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद मैंने उसे हमें सुरक्षित और स्वस्थ रखते हुए देखा और हमने अपने जीवन में उसके अनुग्रह और आशीषों का आनंद लिया, जिससे मुझे और भी ज्यादा महसूस हुआ कि वह हमसे बहुत प्रेम करता है। लेकिन इस बार मेरी माँ के गिरफ्तारी और जेल में होने के कारण उसकी देह को बहुत कष्ट सहना ही था। मुझे चिंता थी कि अगर वह अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाई या पुलिस द्वारा उसे यातना देकर मार दिया गया, तो वह उद्धार का मौका खो देगी। इसलिए मैंने उसकी रक्षा न करने के लिए परमेश्वर से शिकायत की। यहाँ तक कि मैंने उससे बहस करने की भी कोशिश की, यह बताया कि वह अपना कर्तव्य निभाने में कितनी मेहनती थी और जब उसे गिरफ्तार किया गया था तो उसने कभी किसी के साथ या कलीसिया के साथ गद्दारी नहीं की थी। मैं कितनी विवेकहीन थी! मैं परमेश्वर के प्रेम को इस आधार पर माप रही थी कि देह को लाभ और आशीष मिलते हैं या नहीं, जो सत्य के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है। परमेश्वर का प्रेम केवल अनुग्रह और आशीष नहीं है; इसमें न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन भी शामिल है। जब परमेश्वर लोगों पर अनुग्रह और आशीष बरसाता है, तो वह उसका प्रेम होता है; लेकिन जब वह लोगों को परखने और उनका शोधन करने के लिए परिवेश तैयार करता है, तो यह उसके प्रेम की और भी बड़ी अभिव्यक्ति होती है। मेरी माँ की गिरफ्तारी का उदाहरण ही ले लें। देह के दृष्टिकोण से मैंने इसे एक बुरी चीज के रूप में देखा और इसे परमेश्वर का प्रेम न होने के रूप में सीमित कर दिया। असल में मेरी समझ बस बहुत एकतरफा थी। अगर ऐसा न हुआ होता, तो मुझे कभी एहसास नहीं होता कि मैंने परमेश्वर को सीमित कर दिया था, उसके बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ बना ली थीं, या कि मुझे उसके कार्य और उसके प्रेम का कोई सच्चा ज्ञान नहीं था। उसी तरह भले ही मेरी माँ गिरफ्तारी और जेल का अनुभव करते हुए शारीरिक रूप से कष्ट सह रही है, अगर वह अपनी कठिनाई में परमेश्वर से प्रार्थना कर सके, उस पर भरोसा कर सके और उसके इरादे खोज सके, तो वह सत्य समझ सकती है, अपने जीवन में बढ़ सकती है और परमेश्वर में उसकी आस्था भी बढ़ सकती है। यह उसके लिए एक अच्छी बात होगी। परमेश्वर के कई कार्य हमारी धारणाओं से मेल नहीं खाते या हमारी देह को लाभ नहीं पहुँचाते, लेकिन वे हमारे जीवन को लाभ पहुँचाते हैं, जो उसके प्रेम को और भी ज्यादा प्रदर्शित करता है। इस पर विचार करने से मेरा दिल बहुत हल्का हो गया।

बाद में मैंने फिर से विचार किया : मैं अपनी माँ की गिरफ्तारी के प्रति समर्पण क्यों नहीं कर सकी? फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मैं लोगों को अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं से रहित हूँ, और चरम सीमा तक लोगों की भावनाओं से नफरत करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में ‘तीसरा पक्ष’ बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह अपने ‘जमीर’ को चुनने के अवसर का लाभ उठाता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़ना से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मुझे अन्यायी और अनुचित कहता है और कहता है कि मैं चीजें सँभालने में मनुष्य की भावनाओं से बेपरवाह रहता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी मेरी तरह अपनी पूरी प्रबंधन योजना के लिए बिना खाने या सोने के बारे में सोचे दिन-रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? मनुष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत कैसे हो सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28)। “वे सभी भावनाओं की एक दशा में जीते हैं और इसलिए परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी बख़्शता नहीं है, और संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए अपनी भावनाओं को छोड़ना इतना कठिन क्यों है? क्या ऐसा करना अंतरात्मा के मानकों के परे जाना है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकती है? क्या भावनाएँ विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती हैं? परमेश्वर की नजरों में, भावनाएँ उसकी दुश्मन हैं—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, अध्याय 28)। मैंने आत्म-चिंतन किया और महसूस किया कि मैं इसलिए समर्पण नहीं कर सकी क्योंकि मैं दैहिक स्नेह में जी रही थी। धर्म-सिद्धांत के तौर पर मैं जानती थी कि हमारे सामने प्रतिदिन आने वाले लोग, घटनाएँ और चीजें, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, परमेश्वर की अनुमति से होती हैं और उन्हें परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन जब मुझे पता चला कि मेरी माँ जेल में है, तो मैं इसे परमेश्वर से स्वीकार नहीं कर सकी और मैंने उसके इरादे खोजने की कोशिश तो और भी कम की। जेल में उसकी शारीरिक और मानसिक पीड़ा और यातना के बारे में सोचते ही मेरा दिल टूट जाता था। मैं नहीं चाहती थी कि वह कष्ट सहे। मुझे यह भी डर था कि वह अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाएगी, यहूदा बन जाएगी और इस तरह बचाई नहीं जाएगी, या कि पुलिस उसे जेल में यातना देकर मार डालेगी और मैं अपनी माँ को खो दूँगी। मैंने अपने दैहिक स्नेह का पक्ष लिया और परमेश्वर से बहस की, शिकायत की कि उसने उसकी रक्षा नहीं की। मैंने जो कुछ भी सोचा वह परमेश्वर के प्रतिरोध में था। मैं खुद को परमेश्वर के खिलाफ खड़ा कर रही थी और उसका विरोध कर रही थी। मैंने उसके परीक्षणों के दौरान अय्यूब के बारे में सोचा। उसने अपने सारे मवेशी, अपनी सारी संपत्ति और अपने सभी दस बच्चे गँवा दिए और उसका शरीर फोड़ों और घावों से भर गया था। लेकिन अय्यूब ने कभी शिकायत नहीं की। उसका मानना था कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है और यहाँ तक कि विपत्ति भी परमेश्वर की अनुमति से आई और उसने फिर भी परमेश्वर के प्रति समर्पण किया और उसके नाम की स्तुति की। मैंने देखा कि अय्यूब के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था। मैं उससे बहुत पीछे हूँ! जब मैंने सुना कि मेरी माँ को गिरफ्तार कर लिया गया है और वह जेल में है, तो मैं किसी तरह इसे स्वीकार नहीं कर सकी। मैं पूरी तरह से स्नेह में जी रही थी। भले ही मैं जानती थी कि इसमें परमेश्वर की अनुमति है, मैं समर्पण नहीं कर सकी। मैंने परमेश्वर से बहस की और अंदर ही अंदर उसका विरोध किया। परमेश्वर का भय मानने वाला मेरा दिल कहाँ था? यह स्पष्ट रूप से बड़ा लाल अजगर है जो परमेश्वर से घृणा करता है और विश्वासियों को गिरफ्तार कर उन्हें सताता है, और इसीलिए मेरी माँ अपनी गिरफ्तारी के बाद इतना कष्ट सह रही है। लेकिन सीसीपी से घृणा करने के बजाय मैंने परमेश्वर से शिकायत की। मैंने सब कुछ पूरी तरह से उल्टा-पुल्टा कर दिया था और सही-गलत का भेद नहीं कर पा रही थी!

इसके बाद मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े और मुझे यह समझने में थोड़ी मदद मिली कि परमेश्वर द्वारा उत्पीड़न और क्लेशों की अनुमति देने का महत्व क्या है। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरंभ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए—या तुम लोग कह सकते हो, उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो उसका अनुसरण करता है—परीक्षाएँ निर्धारित कर रखी हैं और ये परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में होती हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा ठुकराए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ ने विपरीत परिवेश की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने गिरफ्तार किए जाने और यातना दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने विकल्प का सामना करने की परीक्षा का अनुभव किया है; और कुछ लोगों ने धन एवं हैसियत की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ उसका महत्वपूर्ण बिंदु यह है : परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले रहा होता है, तुम्हें किसी परिस्थिति का सामना करने पर मजबूर कर रहा होता है, तो वह यह जाँचना चाहता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो उसका भय मानता और बुराई से दूर रहता है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो नतीजा हासिल करेगा, उसे कैसे जानें)। “मनुष्य के चिरकालिक भरण-पोषण और सहारे के अपने कार्य के दौरान, परमेश्वर अपने इरादे और अपनी अपेक्षाएँ मनुष्य को संपूर्णता में बताता है, और मनुष्य को अपने कर्म, स्वभाव, और वह जो है और उसके पास जो है दिखाता है। उद्देश्य है मनुष्य को आध्यात्मिक कद से सुसज्जित करना और उसे परमेश्वर का अनुसरण करते हुए विभिन्न सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाना—सत्य जो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा शैतान से लड़ने के लिए दिए गए हथियार हैं। इस प्रकार सुसज्जित होकर मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना करना ही चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए बहुत-से साधन और मार्ग हैं, किंतु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु—शैतान—के ‘सहयोग’ की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह है, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को शक्तिशाली शस्त्र देने के बाद परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य के आध्यात्मिक कद की ‘परीक्षा’ लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और अभी भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली होगी। परंतु यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं से छूटने में विफल हो जाता है और शैतान के अधीन हो जाता है, तो उसने परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की होगी। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू को परखता है, उसकी परीक्षाओं की कसौटी यही होती है कि क्या शैतान द्वारा आक्रमण किए जाने पर मनुष्य अपनी गवाही में अडिग रहता है या नहीं, और क्या शैतान द्वारा जाल में फँसाए जाने पर वह परमेश्वर को त्याग देता है या नहीं और शैतान के आगे हार मानकर आत्मसमर्पण करता है या नहीं। कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि क्या वह शैतान पर विजय प्राप्त कर सकता है और उसे हरा सकता है, और वह स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि क्या वह शैतान के बंधन पर विजय पाने के लिए परमेश्वर द्वारा दिए गए शस्त्र अपने दम पर उठा सकता है, शैतान को पूरी तरह आस तजने और उसे छोड़ देने के लिए विवश कर पाता है या नहीं। यदि शैतान आशा छोड़ देता है और किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान फिर कभी इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने की कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी इस व्यक्ति पर दोषारोपण नहीं करेगा और उसे बाधित नहीं करेगा, फिर कभी उसे निर्दयतापूर्वक यातना नहीं देगा या उस पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस जैसे किसी व्यक्ति को ही परमेश्वर द्वारा सचमुच प्राप्त किया गया होगा। यही वह संपूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर किसी व्यक्ति को प्राप्त करता है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। “जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा लिया जाना सह पाते हैं, जबकि जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण को सहने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य का परीक्षण करने के द्वारा ही किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा निकाले गए निष्कर्ष से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर किसी मनुष्य को हल्के में अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से कायल कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को कायल न कर सके। मनुष्य का विश्वास सच्चा है कि नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है और मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘गेहूँ को जंगली दाने नहीं बनाया जा सकता, और जंगली दानों को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता।’ जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे, और परमेश्वर उस किसी के साथ अन्याय नहीं करेगा जो वास्तव में उससे प्रेम करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि वह लोगों को पूर्ण बनाने और उन्हें अपने प्रति निष्ठावान और समर्पित बनाने के लिए उन पर उत्पीड़न और क्लेश आने देता है। साथ ही, वह उन लोगों को प्रकट करता है और हटाता है जो उसके प्रति ईमानदार नहीं हैं। अंत के दिनों में, परमेश्वर हमारी आपूर्ति के लिए सत्य व्यक्त करता है और हमें अपनी सभी अपेक्षाएँ बताता है। फिर वह हमें परखने और हमारी परीक्षा लेने के लिए कुछ वास्तविक परिवेश तैयार करता है, यह देखने के लिए कि हम उसके प्रति ईमानदार और समर्पित हैं या नहीं। अगर हम शैतान से लड़ने के लिए सत्य को अपने हथियार के रूप में ले सकते हैं, परीक्षणों के दौरान परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं और शैतान को पूरी तरह से शर्मिंदा कर सकते हैं, तो हम ऐसे लोग बन जाते हैं जिन्हें परमेश्वर ने प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए सीसीपी की गिरफ्तारियों और उत्पीड़न को ही लें। ईमानदार विश्वासी, अपने दर्द और कमजोरी के बावजूद परमेश्वर को नकारते या उससे विश्वासघात नहीं करते। इसके बजाय शैतान के उत्पीड़न के माध्यम से वे शैतान का घिनौना चेहरा साफ-साफ देखते हैं। कमजोरी और पीड़ा के समय में परमेश्वर के वचनों का प्रबोधन और मार्गदर्शन उन्हें और भी अधिक आस्था देता है और वे अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार रहते हैं। इस तरह के परिवेश के जरिए परमेश्वर लोगों के सच्चे दिलों को प्राप्त करता है और उनमें सत्य को गढ़ता है। यह फिल्म “शोधन करने वाली आग” के मुख्य किरदार की तरह है। परमेश्वर से विश्वासघात को मजबूर करने के लिए पुलिस ने उसे नंगा कर दिया और उसके पूरे शरीर पर बिजली के डंडों से झटका दिया। उसने अत्यधिक यातनाएँ सहीं, लेकिन परमेश्वर के वचनों ने उसे आस्था दी। वह परमेश्वर से विश्वासघात करने या उसे नकारने के बजाय मर जाना पसंद करती। उसने उसके लिए एक जबरदस्त गवाही दी और अंततः शैतान को शर्मिंदा किया। मैंने देखा कि ईमानदार विश्वासी, चाहे वे किसी भी परिवेश का अनुभव करें या कितना भी कष्ट या यातना सहें, परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रख सकते हैं। उनके लिए क्लेश और कष्ट पूर्ण बनाए जाने का एक तरीका हैं और यह परमेश्वर की ओर से एक विशेष आशीष भी है। लेकिन जो लोग परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं हैं, वे शारीरिक यातना, दर्द या मृत्यु के खतरे के सामने खुद को बचाने के लिए परमेश्वर को नकारते हैं और उससे विश्वासघात करते हैं। ऐसे लोग प्रकट किए गए जंगली पौधे हैं, जिन्हें परमेश्वर हटा देगा। परमेश्वर लोगों को प्रकट करने और पूर्ण बनाने दोनों के लिए बड़े लाल अजगर को एक सेवाकर्मी के रूप में उपयोग करता है। परमेश्वर कितना बुद्धिमान है! मुझे अपनी माँ का पिछली गिरफ्तारी के बाद लिया गया संकल्प याद आया : भले ही उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया जाए, वह अपनी आस्था पर अडिग रहेगी और परमेश्वर का अनुसरण करती रहेगी और कभी भी परमेश्वर से विश्वासघात नहीं करेगी। यह गिरफ्तारी परमेश्वर की ओर से उसकी परीक्षा है। अगर वह अपनी देह की रक्षा के लिए परमेश्वर से विश्वासघात करती है, तो उसे बेनकाब कर दिया जाएगा। लेकिन अगर वह परमेश्वर से प्रार्थना कर सके और उस पर भरोसा कर सके और चाहे शैतान उसे कितना भी सताए, परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सके, तो यह परिवेश उसे पूर्ण बनाएगा, उसकी आस्था और प्रेम को बढ़ाएगा। यह परमेश्वर द्वारा उसे गवाही देने का एक अवसर भी है—उसकी ओर से एक विशेष आशीष। यह समझने के बाद मेरे दिल में अपनी माँ के लिए कुछ चिंताएँ कम हो गईं।

जैसे-जैसे मैं खोजती गई, मुझे एहसास हुआ कि मेरा एक और नजरिया गलत था। मैंने सोचा था कि अगर किसी को जेल में सताकर मार दिया जाता है, तो उसे बचाया नहीं जा सकता। जब तक मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश नहीं पढ़ा, तब तक मेरा दृष्टिकोण नहीं बदला। परमेश्वर कहता है : “आओ, हम उन शहीदों के अंतिम परिणाम या उनके कर्मों पर परमेश्वर के फैसले के बारे में बात न करें, बल्कि यह पूछें : जब वे शहीद अंत तक पहुँचे, तो क्या उनके जीवन के अंत के तरीके मानवीय धारणाओं के अनुरूप थे? (नहीं, वे नहीं थे।) मानवीय धारणाओं के परिप्रेक्ष्य से, उन शहीदों ने परमेश्वर के कार्य का प्रसार करने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, लेकिन अंततः शैतान द्वारा उन्हें गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाकर मार डाला गया। यह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है। हालाँकि, ये चीजें ठीक वही हैं जो उन पर बीतीं—यह वही है जिसकी परमेश्वर ने अनुमति दी। इसमें कौन-सा सत्य खोजा जा सकता है? क्या परमेश्वर का उन्हें इस तरह मरने देना उसका शाप और निंदा थी या यह उसकी व्यवस्था थी, उसका आशीष था? यह दोनों में से कुछ भी नहीं था। यह क्या था? उन शहीदों की मौतों के बारे में सोचकर लोगों को दुख होता है, फिर भी ये वास्तव में तथ्य हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के इस तरह मरने के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए? जब हम इस विषय का उल्लेख करते हैं, तो तुम लोग खुद को उनकी जगह पर रखते हो, तो क्या तुम लोग अपने दिलों में परेशान और थोड़ा-सा छिपा हुआ दर्द महसूस करते हो? तुम सोचते हो, ‘इन लोगों ने परमेश्वर के सुसमाचार का प्रसार करने का अपना कर्तव्य निभाया, इन्हें अच्छा इंसान माना जाना चाहिए, तो फिर उनका अंत, और उनका परिणाम ऐसा कैसे हो सकता है?’ वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना तरीका था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं था कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनके निधन और प्रस्थान का तरीका चाहे जो भी रहा हो या यह चाहे जैसे भी हुआ हो, लेकिन परमेश्वर ने उन जीवनों के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम इस तरह निर्धारित नहीं किए थे। यह ऐसी बात है जो तुम्हें स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, यह सटीक तौर पर वह तरीका था जिससे उन्होंने इस संसार की घोर निंदा की और परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग—परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए किया और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषणा करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है और परमेश्वर का देहधारी शरीर है। यहाँ तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं नकारा। क्या यह इस संसार को दोषी ठहराने का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग संसार के समक्ष यह घोषणा करने, मनुष्यों के सामने यह साबित करने के लिए किया कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी है, कि उसने समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कार्य किया वही मानवजाति को जीवित रख पाया है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपना कर्तव्य निभाया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई। परिवार, सम्पदा, और इस जीवन की भौतिक वस्तुएँ, सभी बाहरी चीजें हैं; स्वयं से संबंधित एकमात्र चीज जीवन है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के लिए जीवन सबसे अधिक सँजोने योग्य है, सबसे बहुमूल्य है और संयोग से ये लोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम की पुष्टि और गवाही के रूप में अपनी सबसे बहुमूल्य वस्तु अर्पित कर सके। अपनी मृत्यु तक उन्होंने परमेश्वर के नाम को नहीं नकारा, न ही परमेश्वर के कार्य को नकारा, और उन्होंने जीवन के अपने अंतिम क्षणों का उपयोग इस तथ्य के अस्तित्व की गवाही देने के लिए किया—क्या यह गवाही का सर्वोच्च रूप नहीं है? यह अपना कर्तव्य निभाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है; अपना उत्तरदायित्व इसी तरह पूरा किया जाता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरा दिल रोशन हो गया। मैं सोचती थी कि पुलिस द्वारा सताकर मारे जाने का मतलब है कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जा सकता, लेकिन परमेश्वर इसे बिल्कुल भी इस तरह से नहीं देखता है। प्रभु यीशु ने कहा था : “जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा(मत्ती 16:25)। मैंने उन लोगों के बारे में सोचा जो यहूदा बन गए थे। गिरफ्तारी के बाद पुलिस की यातना से डरकर उन्होंने अगुआओं और कार्यकर्ताओं या अपने भाई-बहनों के साथ गद्दारी की और तीन कथन पर दस्तखत भी कर दिए। उन्होंने शारीरिक रूप से कष्ट नहीं सहा और उन्हें रिहा कर दिया गया—वे आज भी जीवित हैं—लेकिन उन्होंने हमेशा के लिए उद्धार का मौका खो दिया है और भविष्य में उन्हें अनंत दंड का सामना करना पड़ेगा। लेकिन जो लोग बड़े लाल अजगर द्वारा सताकर मारे जाने से शहीद हुए—भले ही उन्हें यातना देकर मार डाला गया, वे अपनी जान की कीमत पर अपनी गवाही में अडिग रहे। यह सबसे सार्थक और मूल्यवान चीज है और इसे परमेश्वर याद रखता है। यह बिल्कुल अनुग्रह के युग के उन शिष्यों की तरह है जो प्रभु यीशु के नाम का प्रचार करने के लिए शहीद हो गए। वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान थे। उनके मरने के बाद उनकी आत्माएँ परमेश्वर के पास लौट गईं और उसने उनके लिए उचित व्यवस्था की थी। इसके अलावा उनकी मौतें परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर शैतान द्वारा किए गए अत्याचार के प्रमाण हैं और वे परमेश्वर की महिमा पाने और शैतान को हराने की विजयी गवाही हैं। मेरी माँ का भाग्य परमेश्वर के हाथ में है। वह जो कुछ भी अनुभव करेगी, वह उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। भले ही उसे सताकर मार दिया जाए, यह धार्मिकता की खातिर होगा और यह एक गौरवशाली बात होगी। मैं तो बस एक छोटा-सी सृजित प्राणी हूँ; मुझे परमेश्वर को यह बताने का कोई अधिकार नहीं है कि क्या करना है। मुझे उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। यह महसूस करने के बाद मेरे दिल की पीड़ा कम होने लगी।

इस पिछले जनवरी में मेरे दादाजी ने लिखकर बताया कि मेरी माँ ने जेल से एक पत्र भेजा है। उसने कहा कि वहाँ का काम बहुत कठिन है और उसकी नजर बहुत खराब हो गई है। यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया और मेरा दिल टूट गया। मैंने सोचा, “माँ को पहले से ही आँखों की समस्या थी।” “हर दिन इतना भारी काम—अगर वह अंधी हो गई तो क्या होगा? उसकी सजा के अभी भी बहुत दिन बाकी हैं। आगे के दिन उसके लिए बहुत कठिन होंगे!” फिर मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “परमेश्वर हमें राह दिखाता हुआ जिस मार्ग पर ले जाता है, वह कोई सीधा मार्ग नहीं है, बल्कि वह गड्ढों से भरी टेढ़ी-मेढ़ी सड़क है; इसके अतिरिक्त, परमेश्वर कहता है कि मार्ग जितना ही ज्‍़यादा पथरीला होगा, उतना ही ज्‍़यादा वह हमारे स्‍नेहिल हृदयों को प्रकट कर सकता है। लेकिन हममें से कोई भी ऐसा मार्ग उपलब्‍ध नहीं करा सकता। अपने अनुभव में, मैं बहुत-से पथरीले, जोखिम-भरे मार्गों पर चला हूँ और मैंने भीषण दुख झेले हैं; कभी-कभी मैं इतना शोकग्रस्‍त रहा हूँ कि मेरा मन रोने को करता था, लेकिन मैं इस मार्ग पर आज तक चलता आया हूँ। मेरा विश्‍वास है कि यही वह मार्ग है जो परमेश्वर ने दिखाया है, इसलिए मैं सारे कष्टों के संताप सहता हुआ आगे बढ़ता जाता हूँ। चूँकि यह परमेश्वर का विधान है, इसलिए इससे कौन बच सकता है? मैं किसी आशीष के लिए याचना नहीं करता; मैं तो सिर्फ इतनी याचना करता हूँ कि मैं उस मार्ग पर चल सकूँ, जिस पर मुझे परमेश्वर के इरादों के अनुसार चलना अनिवार्य है। मैं दूसरों की नकल करते हुए उस मार्ग पर नहीं चलना चाहता, जिस पर वे चलते हैं; मैं तो सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि मैं आखिरी क्षण तक अपने निर्दिष्‍ट मार्ग पर चलने की अपनी निष्‍ठा का निर्वाह कर सकूँ। मैं दूसरों की सहायता की याचना नहीं करता; ईमानदारी से कहूँ तो मैं खुद भी दूसरों की सहायता नहीं कर सकता। ऐसा लगता है कि मैं इस मामले में बेहद संवेदनशील हूँ। मुझे नहीं मालूम कि दूसरे लोग क्‍या सोचते हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि किसी व्‍यक्ति को जितना भी कष्ट भोगना है और अपने मार्ग पर जितनी दूर तक चलना है, वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है और इसमें सचमुच कोई किसी की मदद नहीं कर सकता(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मार्ग ... (6))। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मैं समझ गई कि आस्था का मार्ग आसान नहीं है; हम सभी को बहुत कष्ट सहना पड़ेगा। हर व्यक्ति जो कष्ट सहेगा, वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। पुलिस मेरी माँ के साथ कैसा व्यवहार करती है, वह जेल में कितना कष्ट सहती है, क्या वह अंधी हो जाएगी—यह सब परमेश्वर के हाथ में है। मैं अब केवल और अधिक प्रार्थना कर सकती हूँ, अपनी माँ को परमेश्वर के हाथों में सौंप सकती हूँ और उससे प्रार्थना कर सकती हूँ कि वह उसे इस परिवेश का अनुभव करने की आस्था दे। अब जब मैं अपनी माँ के बारे में सोचती हूँ, तो हालाँकि मुझे थोड़ी चिंता और फिक्र होती है, लेकिन यह अब मेरी दशा को प्रभावित नहीं करती है। मैं अपने दिल को शांत कर सकती हूँ और अपने कर्तव्य के प्रति खुद को समर्पित कर सकती हूँ, क्योंकि मैं समझती हूँ कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह अच्छा है और उसमें उसके अच्छे इरादे होते हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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