अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना परमेश्वर द्वारा सौंपा गया मिशन है
चिंगतियान, चीनमेरे परिवार की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी। जब मैं बहुत छोटी थी, तो मेरे पिता मुझे और मेरे छोटे भाई को स्कूल भेजने के लिए...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मेरे पापा हमारे इलाके में माँ-बाप की सेवा करने वाले बेटे के रूप में जाने जाते थे। बड़ी होते हुए मैं अक्सर उन्हें खाने की मेज पर यह कहते हुए सुनती थी : “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए। अपने आचरण में, तुम्हें सबसे पहले अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित धर्म निभाना चाहिए; यह बुनियादी बात है। देखो, नवजात मेमना भी दूध पीने के लिए घुटने टेकना जानता है, इसलिए जो कोई भी अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित धर्म नहीं निभाता, वह जानवर से भी बदतर है! जब तुम्हारी दादी बीमार थीं तो मैं रात-रात भर उनके साथ जागता था। सच तो यह है कि तुम्हारे दादा-दादी की देखभाल करने के लिए मैंने उनके गुजर जाने तक शादी के बारे में सोचा भी नहीं।” उस बात ने मेरे बालमन में संतानोचित धर्मनिष्ठा का बीज बो दिया और मैंने तय कर लिया कि बड़ी होकर मुझे अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना है, वरना मुझमें जमीर की कमी होगी। जब मैं सत्रह साल की थी तो मेरे पापा को सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण सीसीपी ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें दो साल की सश्रम पुनर्शिक्षा की सजा सुनाई। मैं तब घर से दूर काम करती थी। मैं समय-समय पर श्रम शिविर में अपने पापा से मिलने जाती और उनके लिए खाना ले जाती थी और अपनी तनख्वाह में से जो भी बचता, वह घर पर मदद के लिए भेज देती थी। मेरी शादी के बाद, मैं हर चीनी नव वर्ष पर अपने माता-पिता के लिए कपड़े, खास पकवान वगैरह खरीदती थी। बाद में मैं परमेश्वर में विश्वास करने लगी और घर से दूर रहकर अपना कर्तव्य करने लगी। मेरे माता-पिता ने मेरा बहुत साथ दिया और मुझे पैसे भी दिए। मुझे यह बहुत बुरा लगता था, मैंने सोचा, “मेरे माता-पिता ने मुझे पाला-पोसा है, अब तो मुझे उनकी देखभाल करनी चाहिए। इसके बजाय, वे अभी भी मेरी देखभाल कर रहे हैं...।” उस समय मैं हमेशा उम्मीद करती थी कि सीसीपी का पतन हो जाए ताकि मैं घर जाकर अपने माता-पिता की उनके बुढ़ापे में अच्छे से देखभाल कर सकूँ। लेकिन ईसाइयों पर सीसीपी का उत्पीड़न और भी गंभीर होता गया। हमारा परिवार स्थानीय तौर पर परमेश्वर में हमारी आस्था के लिए जाना जाता था और मेरे पापा का पुलिस रिकॉर्ड था, इसलिए हमारा परिवार सीसीपी के लिए मुख्य निशाना बन गया। 2016 में परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए मैं विदेश के एक लोकतांत्रिक देश में भाग गई। जब भी मैं शांति से बैठती तो याद करती कि कैसे जब मैं देश छोड़कर जा रही थी तो मेरे माता-पिता मुझे विदा करने आए थे। वह याद हमेशा मेरे दिल को दुखाती थी। मुझे बहुत अपराध-बोध महसूस होता था कि मैं उनकी अच्छी तरह से देखभाल करने के लिए वहाँ नहीं थी, खासकर जब वे बूढ़े हो रहे थे।
2019 की गर्मियों में मैंने अपने परिवार के बारे में पूछने के लिए अपने शहर के एक कलीसिया अगुआ को पत्र लिखा। कुछ समय बाद मुझे जवाब मिला जिसमें लिखा था कि कुछ साल पहले बीमारी से मेरे पापा का निधन हो गया था। मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। टीम अगुआ ने मुझे परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़कर सुनाए, लेकिन मेरा मन घर पर पापा की प्यार भरी देखभाल की यादों से भरा था, मैं उसकी संगति आत्मसात नहीं कर पा रही थी। जब मैं कमरे से बाहर निकली तो आसमान में बादल छाए हुए थे, ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया बेरंग हो गई हो। मैं ऐसे अपने कमरे में लौटी मानो मेरी आत्मा मुझे छोड़ चुकी हो। मेरे मन में बस मेरे पापा का प्यार भरा चेहरा था, वह मुझसे पूछते थे, “तुम्हारा क्या खाने का मन है? तुम वहाँ कैसी हो?” लेकिन अब मैं उनकी आवाज फिर कभी नहीं सुन पाऊँगी। मैं जितना सोचती, उतना ही दुखी होती और फूट-फूटकर रोने से खुद को रोक नहीं पाती। उन दिनों, मेरे पापा की मेरे प्रति दयालुता की यादें मेरे मन में उमड़ती रहती थीं। जब मैं प्राइमरी स्कूल में थी तो पापा अक्सर मुझे खाने-पीने के लिए जेब खर्च देते थे और मुझसे कभी कोई घरेलू काम नहीं करवाते थे। मेरी शादी के बाद मेरे पापा ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का सुसमाचार का उपदेश दिया। हम साथ में भजन गाते और अपनी अनुभवजन्य समझ पर संगति करते थे। जब मैं अपना कर्तव्य करने के लिए घर से निकली तो मेरे माता-पिता ने बहुत साथ दिया और अक्सर मेरी आर्थिक मदद की। जब भी मैं लौटती तो वे हमेशा मेरे लिए तरह-तरह के नए और स्वादिष्ट भोजन बनाते और मुझ पर बहुत लाड़-प्यार लुटाते थे। मेरे पापा मेरे लिए इतने अच्छे थे और इससे पहले कि मैं उनका कर्ज चुका पाती, वे चले गए। मुझे बहुत अपराध-बोध और आत्मग्लानि हुई। मुझे इतनी जल्दी शादी करने का भी अफसोस हुआ और अपना कर्तव्य निभाने में इतना व्यस्त रहने का भी कि मैं उनके प्रति संतानोचित होने के लिए वहाँ नहीं थी। अब वे जा चुके थे और मैंने इसे सुधारने का हर मौका खो दिया था। मेरा दिल अफसोस, अपराध-बोध और आत्मग्लानि से भर गया और अपने कर्तव्य में मेरा दिल नहीं लगता था। हम उस समय एक नाटक का रिहर्सल कर रहे थे। मुझे एक दरवाजा खोलकर चिल्लाना था, “चाचा, मैं आ गई!” लेकिन अभ्यास के दौरान मैंने दरवाजा खोला और चिल्लाई, “पापा, मैं घर आ गई!” मेरे आँसू तुरंत बहने लगे और हम रिहर्सल जारी नहीं रख पाए। उस दौरान, हालाँकि मैं हर दिन अपना कर्तव्य करती थी, लेकिन मेरा दिल खाली-खाली सा लगता था। मैं जो भी करती, मेरा मन कहीं और रहता था और रिहर्सल के लिए मुझमें जरा भी ऊर्जा नहीं बचती थी। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा ठीक नहीं है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मेरे पापा का निधन हो गया है और मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरी जड़ें ही उखड़ गई हैं। मेरा दिल बहुत दुखी है। मुझे नहीं पता कि इसका अनुभव कैसे करूँ। मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारा इरादा समझ सकूँ।”
अपनी खोज के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिससे मुझे अपने पापा की मृत्यु को स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जीवन से नियत था, तो उसकी मृत्यु उस नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके मिशन की शुरुआत है, तो उसकी मृत्यु उसके उस मिशन के अंत को चिह्नित करती है। चूँकि सृष्टिकर्ता ने प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय तय किया है, तो यह तय है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति संयोग से पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अकस्मात नहीं होती है और जन्म-मरण दोनों ही अनिवार्य रूप से उसके पिछले और वर्तमान जीवन से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ कैसी हैं और उसकी मृत्यु की परिस्थितियाँ कैसी हैं, इनका संबंध सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति से है; यह व्यक्ति की नियति है, व्यक्ति का भाग्य है। चूँकि किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत सारी व्याख्याएँ होती हैं, इसलिए उसकी मृत्यु के लिए भी अनिवार्य रूप से विभिन्न विशेष परिस्थितियाँ होनी चाहिए। इस प्रकार, मानवजाति में लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग ताकतवर और स्वस्थ होते हैं, फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमजोर और बीमार होते हैं, फिर भी बूढ़े होने तक जीते रहते हैं और बिना कोई कष्ट पाए मर जाते हैं। कुछ की मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से होती है और कुछ की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। कुछ की मृत्यु अपने घर से दूर होती है, कुछ अपने प्रियजनों के साथ उनके सान्निध्य में आखिरी साँस लेते हैं। कुछ आसमान में मरते हैं, कुछ धरती के नीचे। कुछ पानी में डूब जाते हैं, कुछ आपदाओं में मर जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ... हर कोई एक शानदार जन्म, एक उत्कृष्ट जीवन और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी नियति से परे नहीं जा सकता है, कोई भी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि हर किसी का जीवन और मृत्यु परमेश्वर ने बहुत पहले ही तय कर दिया है; हर किसी का अपना भाग्य होता है। मेरे पापा का निधन अचानक नहीं हुआ था। उनका समय पूरा हो गया था। जब उनके जाने का समय आया तो वे चले गए। यह नियम परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है जिसे कोई नहीं बदल सकता, मैं हमेशा उन के साथ होती तो भी मैं उस सच्चाई को नहीं बदल सकती थी। असल में, सिर्फ मेरे पापा ही नहीं, जन्म के क्षण से ही हम सभी का इस दुनिया से एक दिन जाना तय है। बस हर किसी के जाने का समय और तरीका अलग-अलग होता है। कुछ बुढ़ापे से मरते हैं, कुछ डूबकर और कुछ अचानक बीमारी से। ये ऐसी चीजें हैं जिनका न कोई अनुमान नहीं लगा सकता है, न कोई इन्हें रोक सकता है। यह सब परमेश्वर की पूर्वनियति है। हमें परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होना चाहिए और जीवन-मृत्यु से सही ढंग से पेश आना चाहिए। यह समझने से मेरे दिल को कुछ शांति मिली और मैं धीरे-धीरे अपना दिल शांत करके अपना कर्तव्य निभाने लगी।
अक्टूबर 2022 में, मुझे अपने शहर की एक बहन से पता चला कि कुछ साल पहले मेरी माँ का भी निधन हो गया था। मेरा दिल टूट गया। मुझे याद आया कि जब मैं देश से जा रही थी तो मेरी माँ ने क्या पूछा था, “मेरी प्यारी बेटी, क्या ऐसा हो सकता है कि मैं मरने से पहले तुम्हें फिर कभी न देख पाऊँ?” मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये शब्द सच हो जाएँगे। हालाँकि मैंने अपने पापा के निधन के समय मृत्यु से पेश आने को लेकर परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े थे और मैं उनका निधन स्वीकार कर सकती थी, लेकिन यह भावना कि “जब संतान सेवा करना चाहती है, तब तक माता-पिता नहीं रहते” और भी मजबूत होती गई। अपने माता-पिता के प्रति मेरे मन में जो अपराध-बोध था, वह मेरे दिल में एक ऐसी गाँठ की तरह था जिसे मैं खोल नहीं पा रही थी। खासकर जब मैं सोचती कि जब वे बीमार थे तो मैं उनकी देखभाल के लिए वहाँ नहीं थी तो मुझे बहुत अपराध-बोध होता, इसके बावजूद कि मैं साथ होती तो भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाती। शायद बस उनके साथ रहकर और उन्हें परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाने से ही उनकी तन्हाई और दर्द थोड़ा कम हो जाता। लेकिन इससे पहले कि मैं उनकी अच्छी तरह से देखभाल कर पाती, वे चले गए और वे मरने से पहले मुझे आखिरी बार नहीं देख पाए। जब मेरे माता-पिता का निधन हुआ तो मैं उनके साथ नहीं थी, मेरे रिश्तेदार जरूर कहेंगे कि मैं एक अकृतज्ञ, नीच इंसान हूँ और मेरे माता-पिता ने मुझ पर अपना प्यार बर्बाद कर दिया। मैं जितना सोचती, उतना ही दुखी होती जाती। यादें एक फिल्म की तरह एक के बाद एक मेरे मन में चलने लगीं। उस समय हम एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। दो साधारण शॉट थे जिनके लिए मैं किरदार में नहीं आ पा रही थी और अंत में हमें शूटिंग रोकनी पड़ी। भाई-बहनों ने मेरी दशा ठीक न देखकर मुझे याद दिलाया, “इस तरह का दृश्य तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं होना चाहिए। अपनी दशा ठीक करने के लिए थोड़ा समय लो और हम बाद में फिर से कोशिश करेंगे।” उस दौरान मेरे माता-पिता का निधन मेरे दिल की सबसे बड़ी पीड़ा बन गया था। कभी-कभी, अपने माता-पिता की उम्र के भाई-बहनों को देखकर मुझे उनकी याद आ जाती थी। मेरा दिल दुखने लगता और मैं अनजाने में ही रोने लगती। यहाँ तक कि मैं उनके सपने देखती और आधी रात को रोते हुए जाग जाती थी। फिर मैं घंटों जागती रहती, उनके चेहरे और आवाजें मेरे मन में घूमती रहतीं और मुझे लगता जैसे मैं उनकी बहुत कर्जदार हूँ। यह अफसोस मेरे दिल पर एक भारी पत्थर की तरह बोझ बन गया था फिर एक दिन परमेश्वर ने अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित धर्म निभाने के सत्य पर संगति की, तब जाकर मेरा दिल आखिरकार रोशन हो गया।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ माता-पिताओं के पास यह आशीष होता है और यह नियति होती है कि वे घरेलू सुख का और पुत्र-पुत्रियों और नाती-पोतों से भरे घर के सुख का आनंद उठा पाते हैं। यह परमेश्वर की संप्रभुता है और उन्हें परमेश्वर का दिया आशीष है। कुछ माता-पिताओं के पास ऐसी नियति नहीं होती है; परमेश्वर ने उनके लिए यह व्यवस्था नहीं की है। उन्हें अपना एक सुखी परिवार होने या अपने बच्चों से घिरे होने का आनंद लेने का आशीष नहीं मिला है। यह परमेश्वर का आयोजन है और लोग इसे जबरदस्ती हासिल नहीं कर सकते। चाहे कुछ भी हो, अंततः जब संतानोचित शील की बात आती है, तो लोगों के पास कम-से-कम समर्पण की मानसिकता तो होनी ही चाहिए। यदि परिवेश अनुमति दे और तुम्हारे पास ऐसा करने के साधन हों, तो तुम अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित सम्मान दिखा सकते हो। अगर परिवेश उपयुक्त न हो और तुम्हारे पास साधन न हों, तो तुम्हें जबरन ऐसा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह समर्पण है। यह समर्पण कैसे आता है? समर्पण का आधार क्या है? इसका आधार यह है कि ये सभी चीजें परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं और उसकी संप्रभुता के अधीन हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य वास्तविकता क्या है?)। “अगर तुम सच में मानते हो कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है, तो तुम्हें यह विश्वास करना चाहिए कि उन्हें कितनी तकलीफें सहनी हैं और उन्हें अपने पूरे जीवन में कितनी खुशी मिलेगी, यह मामला भी परमेश्वर के हाथों में है। तुम्हारे संतानोचित होने या न होने से कुछ नहीं बदलेगा—तुम्हारे संतानोचित होने से तुम्हारे माता-पिता के कष्ट कम नहीं होंगे, और तुम्हारे संतानोचित न होने से वे ज्यादा कष्ट नहीं सहेंगे। परमेश्वर ने बहुत समय पहले ही उनका भाग्य पूर्वनियत कर दिया था, और उनके प्रति तुम्हारे रवैये या तुम्हारे बीच भावना की गहराई के कारण इसमें से कुछ भी नहीं बदलेगा। उनका अपना भाग्य है। वे अपनी पूरी जिंदगी चाहे गरीब हों या अमीर, सब कुछ उनके लिए सुगम हो या नहीं, या वे जैसी भी गुणवत्ता के जीवन, भौतिक लाभों, सामाजिक हैसियत और जीवन स्थितियों का आनंद लेते हों, इनमें से किसी का भी तुम्हारे साथ ज्यादा लेना-देना नहीं है। ... ज्यादातर लोग अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने का चुनाव व्यापक वस्तुपरक परिस्थितियों के कारण करते हैं, जिससे उन्हें अपने माता-पिता को छोड़ना पड़ता है और वे उनकी देखभाल करने के लिए उनके साथ नहीं रह सकते। ऐसा नहीं है कि वे स्वेच्छा से अपने माता-पिता को छोड़ना चुनते हैं। यह एक वस्तुपरक कारण है। दूसरी ओर, व्यक्तिपरक ढंग से कहें, तो तुम अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाते हो तो इसलिए नहीं कि तुम अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हो, बल्कि परमेश्वर के आह्वान की वजह से जाते हो। परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करने, उसके आह्वान स्वीकार करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए तुम्हारे पास अपने माता-पिता को छोड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं था; तुम उनकी देखभाल करने और उनका साथ देने के लिए उनके बगल में नहीं रह सकते थे। तुमने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें नहीं छोड़ा, सही है? अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें छोड़ देना और परमेश्वर के आह्वान को स्वीकार करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए उन्हें छोड़ना—क्या इन दोनों बातों की प्रकृतियाँ अलग नहीं हैं? (बिल्कुल।) तुम्हारे हृदय में अपने माता-पिता के प्रति सचमुच चिंता है और तुम उन्हें याद करते हो; तुम्हारी भावनाएँ खोखली नहीं हैं। अगर वस्तुपरक हालात अनुमति दें, और तुम अपना कर्तव्य निभाते हुए भी उनके साथ रह पाओ, तो तुम उनका साथ देते रहने को तैयार होगे, नियमित रूप से उनकी देखभाल करोगे और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करोगे। लेकिन वस्तुपरक हालात के कारण तुम्हें उनको छोड़ना पड़ता है और तुम उनके साथ नहीं रह सकते। ऐसा नहीं है कि तुम उनके बच्चे के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते हो, बल्कि तुम नहीं निभा सकते हो। क्या इसकी प्रकृति अलग नहीं है? (बिल्कुल है।) अगर तुमने संतानोचित होने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने से बचने के लिए घर छोड़ दिया था, तो यह असंतानोचित होना है और यह मानवता का अभाव दर्शाता है। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन तुम अपने पंख फैलाकर जल्द-से-जल्द अपने रास्ते चले जाना चाहते हो। तुम अपने माता-पिता को नहीं देखना चाहते, और उनकी किसी भी मुश्किल के बारे में सुनकर तुम कोई ध्यान नहीं देते। तुम्हारे पास मदद करने के साधन होने पर भी तुम नहीं करते; तुम बस सुनाई न देने का बहाना कर लोगों को तुम्हारे बारे में जो चाहें कहने देते हो—तुम बस अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते। यह असंतानोचित होना है। लेकिन क्या स्थिति अभी ऐसी है? (नहीं।) बहुत-से लोगों ने अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपनी काउंटी, शहर, प्रांत और यहाँ तक कि अपने देश तक को छोड़ दिया है; वे पहले ही अपने गृहनगरों से बहुत दूर हैं। इसके अलावा, विभिन्न कारणों से उनके लिए अपने परिवारों के साथ संपर्क करना सुविधाजनक नहीं है। कभी-कभी वे अपने माता-पिता की मौजूदा दशा के बारे में उसी गृहनगर से आए लोगों से पूछ लेते हैं और यह सुनकर राहत महसूस करते हैं कि उनके माता-पिता स्वस्थ हैं और ठीक से गुजारा कर रहे हैं। दरअसल, तुम असंतानोचित नहीं हो। ऐसा नहीं है कि तुम मानवता न होने के उस मुकाम पर पहुँच चुके हो जहाँ तुम अपने माता-पिता की परवाह भी नहीं करना चाहते हो या उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते हो। यह विभिन्न वस्तुपरक कारणों से है कि तुम अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हो—इसका यह मतलब नहीं है कि तुम असंतानोचित हो” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (16))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझने में मदद की कि माता-पिता अपने बच्चों की संतानोचित देखभाल का आनंद ले सकते हैं या नहीं, यह परमेश्वर की पूर्वनियति पर निर्भर है। हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे उसके पास रहें और बुढ़ापे में वह बच्चों और पोते-पोतियों से घिरा रहे। लेकिन कुछ माता-पिता अपने बच्चों का साथ और देखभाल पाते हैं और मरते समय वे उनके पास होते हैं, जबकि कुछ मामलों में, उनके बच्चे काम या शादी जैसे विभिन्न कारणों से उनकी देखभाल के लिए वहाँ नहीं हो पाते और माता-पिता अकेले ही अपना बुढ़ापा गुजारते हैं। यह वह भाग्य है जो परमेश्वर हर किसी के लिए व्यवस्थित करता है। कोई इसे जबरदस्ती नहीं कर सकता और न ही कोई इसे बदल सकता है। यह मेरे माता-पिता का भाग्य था कि मैं उनके मरने से पहले उनकी देखभाल के लिए वहाँ नहीं थी और मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए। लेकिन क्योंकि मुझे इस संबंध में सत्य की समझ नहीं थी, इसलिए मैं उनके साथ न होने के कारण लगातार अफसोस और दुख से भरी रहती थी। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैं समय को पीछे ले जा सकती तो मैं उनके पास ही रहती और कभी नहीं जाती। मैं मानती थी कि अगर मैं उनकी गंभीर बीमारी और निधन के समय उनकी देखभाल के लिए वहाँ होती तो शायद मैं उनका दर्द कम कर सकती थी। मैं कितनी अज्ञानी थी! मैं सिर्फ एक सृजित प्राणी हूँ; मेरे पास अपने माता-पिता का भाग्य बदलने की बिल्कुल भी शक्ति नहीं है। कुछ माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल का आनंद तो लेते हैं लेकिन फिर भी लगातार बीमारी से पीड़ित रहते हैं, हर दिन दवा लेते हैं और दुख में जीते हैं। कुछ माता-पिता स्वस्थ होते हैं, अपनी देखभाल खुद कर सकते हैं और भले ही उनके बच्चे आसपास न हों, फिर भी काफी अच्छी तरह से जीते हैं। मैंने अपनी दादी के बारे में सोचा। मेरे पापा कितने ध्यान से उनकी देखभाल करते थे, लेकिन इससे उनकी बीमारी का दर्द जरा भी कम नहीं हुआ और वह अंत में अपनी बीमारी से ही चल बसीं। फिर मैंने उन बीमारियों के बारे में सोचा जो मेरे माता-पिता को हुईं और जिस तरह से उनकी मृत्यु हुई—यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत था। मैं वहाँ होती तो भी उन्हें जो कष्ट सहना था वह जरा-भी कम नहीं होता और मेरी देखभाल उनकी उम्र एक सेकंड भी नहीं बढ़ा सकती थी। साथ ही मैंने संतानोचित होने और न होने के बीच का अंतर भी समझा : अगर परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं, लेकिन बच्चे अपनी जिम्मेदारियों से बचते हैं और जब उनके माता-पिता बीमार या मुसीबत में होते हैं तो उनकी उपेक्षा करते हैं, तो यह संतानोचित नहीं है। लेकिन अगर आप अपने नियंत्रण से बाहर की वास्तविक परिस्थितियों के कारण अपने माता-पिता की देखभाल नहीं कर सकते तो यह मानवता की कमी या संतानोचित न होना नहीं है। जब मैं घर पर थी तो मैंने अपने माता-पिता का बोझ कम करने के लिए वह सब किया जो मैं कर सकती थी। ऐसा नहीं था कि मैं संतानोचित नहीं होना चाहती थी; मुझे सीसीपी के उत्पीड़न के कारण विदेश भागना पड़ा। वस्तुनिष्ठ परिस्थितियों के कारण मैं मजबूर थी; ऐसा नहीं है कि मैं संतानोचित नहीं थी। यह समझने से मेरे दिल को बहुत रोशनी मिली और मैंने अपने माता-पिता की देखभाल न करने के लिए खुद को दोष देना और दुखी होना बंद कर दिया।
बाद में मैंने विचार किया, “मैं हमेशा अपने माता-पिता के प्रति इतना ऋणी क्यों महसूस करती थी?” खोजते समय मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “ऊपरी तौर पर यूँ लगता है कि तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया और तुम्हारे माता-पिता ने ही तुम्हें दैहिक जीवन दिया है। लेकिन परमेश्वर के नजरिए से और इस मामले की जड़ से, तो तुम्हें यह दैहिक जीवन माता-पिता ने नहीं दिया, क्योंकि लोग जीवन का सृजन नहीं कर सकते। सरल शब्दों में कहें, तो कोई भी इंसान मनुष्य की साँस का सृजन नहीं कर सकता। जिस कारण से प्रत्येक व्यक्ति की देह एक व्यक्ति बन पाती है वह है उसकी साँस। मनुष्य का जीवन इस साँस में है, और यह एक जीवित व्यक्ति का चिह्न है। लोगों में यह साँस और जीवन होता है और उनका स्रोत और उद्गम उनके माता-पिता नहीं हैं। बात बस इतनी है कि लोग अपने माता-पिता द्वारा उन्हें जन्म देने के माध्यम से उत्पन्न हुए—मूलतः यह परमेश्वर की व्यवस्था है, परमेश्वर का विधान है। इसलिए, तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे जीवन के विधाता नहीं हैं, तुम्हारे जीवन का विधाता परमेश्वर है। परमेश्वर ने मानवजाति को रचा, उसी ने मानवजाति के जीवन का सृजन किया, और उसी ने मानवजाति को जीवन की साँस दी, जो कि मनुष्य के जीवन का उद्गम है। इसलिए, क्या ‘तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे जीवन के विधाता नहीं हैं’ पंक्ति समझने में आसान नहीं है? तुम्हारी साँस तुम्हें तुम्हारे माता-पिता द्वारा नहीं दी गई, उनके द्वारा तुम्हें साँस देना जारी रहना तो और भी दूर की बात है। परमेश्वर तुम्हारे जीवन के प्रत्येक दिन की देखभाल करता है और उसका संप्रभु है। तुम्हारे माता-पिता फैसला नहीं कर सकते कि तुम्हारा प्रत्येक दिन कैसा बीतता है, हर दिन खुशहाल और आसान है या नहीं, तुम हर दिन किससे मिलते हो, या हर दिन कैसे माहौल में जीते हो। बात बस इतनी है कि परमेश्वर तुम्हारे माता-पिता के जरिए तुम्हारी देखभाल करता है—तुम्हारे माता-पिता बस वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने तुम्हारी देखभाल के लिए भेजा। जब पैदा होने पर तुम्हें जीवन देने वाले तुम्हारे माता-पिता नहीं थे, तो जिस जीवन के कारण तुम अब तक जीवित हो, वो क्या तुम्हारे माता-पिता ने दिया है? ऐसा नहीं है। तुम्हारे जीवन का उद्गम अभी भी परमेश्वर ही है, तुम्हारे माता-पिता नहीं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। “परमेश्वर तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; तुम्हारे परिवार की पृष्ठभूमि, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे पूर्वज—यह सब परमेश्वर पहले से ही तय कर देता है। इसलिए, परमेश्वर ये निर्णय किसी सनक के चलते नहीं लेता; बल्कि उसने यह कार्य बहुत पहले शुरू कर दिया था। जब परमेश्वर तुम्हारे लिए कोई परिवार चुन लेता है, तो फिर वह वो तिथि चुनता है, जब तुम्हारा जन्म होगा। फिर परमेश्वर तुम्हें जन्म लेते और रोते हुए संसार में आते देखता है। वह तुम्हारे आने को देखता है, तुम्हें तुतलाना सीखते हुए देखता है, तुम्हें कदम-दर-कदम लड़खड़ाते हुए चलना सीखते हुए देखता है। अब तुम दौड़ सकते हो, कूद सकते हो, बात कर सकते हो और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो...। जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, शैतान की नज़र उनमें से हर एक पर टिकी होती है, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। लेकिन अपना काम करने में, परमेश्वर कभी भी किसी व्यक्ति, घटना या चीज और स्थान या समय से उत्पन्न होने वाली चीज की सीमाओं के अधीन नहीं रहा है; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और जो वह करना चाहता है। बड़े होने की प्रक्रिया में, तुम्हें कई अवांछनीय चीजों का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें बीमारी और रास्ते में आने वाली बाधाएँ शामिल हैं। लेकिन जैसे-जैसे तुम इस रास्ते पर चलते हो, तुम्हारा जीवन और तुम्हारा भविष्य परमेश्वर की करीबी देखभाल में होता है। परमेश्वर तुम्हारे पूरे जीवन के लिए एक सच्ची गारंटी प्रदान करता है, क्योंकि वह तुम्हारे ठीक बगल में है, तुम्हारी रक्षा कर रहा है और तुम्हारी देखभाल कर रहा है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। “परमेश्वर प्रत्येक प्राणी के लिए जो कुछ करता है, वह संदेह से परे होता है; वह हर किसी की हाथ पकड़कर अगुआई करता है, हर गुजरते पल तुम्हारी देखरेख करता है और उसने कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा है। जब लोग इस प्रकार के परिवेश और इस प्रकार की पृष्ठभूमि में बढ़ते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि लोग वास्तव में परमेश्वर की हथेली में बढ़ते हैं? (हाँ।)” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। मैं अपने माता-पिता के प्रति ऋणी इसलिए महसूस करती थी क्योंकि मेरा मानना था कि उन्होंने मुझे जीवन दिया, पाला-पोसा और मेरी देखभाल की, इसलिए मुझे उनके प्रति संतानोचित धर्म निभाना था। मैंने सोचा कि अगर मैं ऐसा नहीं करती तो मैं उनके पालन-पोषण की दयालुता के बदले उन्हें निराश करूँगी और एक अकृतज्ञ, नीच इंसान बनूँगी। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि मेरा जीवन परमेश्वर से आता है। परमेश्वर हर किसी को धूप, बारिश, हवा और जीवन की साँस प्रदान करता है। अगर परमेश्वर इनमें से कुछ भी छीन ले तो मैं जीवित नहीं रह सकती। और इस दुनिया में आने से पहले ही परमेश्वर ने मेरे माता-पिता और परिवार को चुन लिया था और उस माहौल को पूर्वनियत किया था जिसमें मैं बड़ी होऊँगी। बचपन से लेकर वयस्क होने तक, शादी और बच्चे होने तक, परमेश्वर हर कदम पर मेरी निगहबानी करते हुए मेरे साथ रहा है। मेरे माता-पिता ने बस मुझे जन्म दिया और मेरी देखभाल करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी की, लेकिन मेरे जीवन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। उदाहरण के लिए, जब मैं अठारह साल की थी तो कोयला जलाना न जानने के कारण मैंने साँस में कार्बन मोनोऑक्साइड की ज़हरीली गैस ले ली और बेहोश हो गई। मेरे माता-पिता घर पर नहीं थे और एक पड़ोसी ने मुझे उठाकर बाहर निकाला और जब तक एम्बुलेंस पहुँची, मैं होश में आने लगी थी। अगर परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा न होती तो मैं बहुत पहले ही मर गई होती। यह समझने से मेरे दिल में रोशनी हुई। मेरे पास जो कुछ भी है वह परमेश्वर से आता है और यह परमेश्वर का प्यार है जिसका मुझे सबसे बढ़कर बदला चुकाना चाहिए। मुझे यह भी एहसास हुआ कि मेरी पीड़ा का मूल कारण यह था कि मैं दैहिक पारिवारिक स्नेहों की असलियत को देख नहीं पाई थी। असल में आध्यात्मिक क्षेत्र में, माता-पिता और बच्चे अलग-अलग व्यक्ति होते हैं जिनका कोई रिश्ता नहीं होता। बस परमेश्वर नहीं चाहता कि लोग इस दुनिया में अकेला जीवन जिएँ, इसलिए वह हमारे लिए परिवार, माता-पिता और बच्चों की व्यवस्था करता है। जब कोई व्यक्ति गुजर जाता है तो वह दैहिक रिश्ता खत्म हो जाता है। और मैं सिर्फ अपने माता-पिता की बेटी नहीं हूँ; मैं एक सृजित प्राणी हूँ। एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना मेरी जिम्मेदारी और मेरा लक्ष्य है। यह सत्य समझने से मेरे दिल को बहुत मुक्ति मिली।
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” के पारंपरिक सांस्कृतिक विचार का कुछ भेद पहचानना। परमेश्वर कहता है : “चीनी परंपरागत संस्कृति की शिक्षा के कारण चीनी लोगों की परंपरागत धारणाओं में यह माना जाता है कि व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा रखनी चाहिए और जो भी संतानोचित निष्ठा का पालन नहीं करता है वह विद्रोही बच्चा होता है। ये विचार बचपन से ही लोगों के मन में बिठाए गए हैं, और ये लगभग हर घर में, साथ ही हर स्कूल में और आम तौर पर समाज में सिखाए जाते हैं। जब किसी व्यक्ति का दिमाग इस तरह की चीजों से भर जाता है, तो वह सोचता है, ‘संतानोचित निष्ठा किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मैं संतानोचित न रहा तो मैं एक अच्छा इंसान नहीं हूँगा—मैं एक विद्रोही बच्चा हूँगा, जनमत द्वारा मेरी निंदा की जाएगी। मैं ऐसा व्यक्ति हूँगा जिसमें कोई जमीर नहीं है।’ क्या यह नजरिया सही है? लोगों ने परमेश्वर द्वारा व्यक्त इतने अधिक सत्य देखे हैं—क्या परमेश्वर ने अपेक्षा की है कि व्यक्ति अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाए? क्या यह कोई ऐसा सत्य है, जिसे परमेश्वर के विश्वासियों को समझना ही चाहिए? नहीं, यह ऐसा सत्य नहीं है। परमेश्वर ने केवल कुछ सिद्धांतों की संगति की है। ... शैतान इन पारंपरिक संस्कृतियों और नैतिकता की इन धारणाओं का उपयोग तुम्हारे हृदय और मन को बाँधने के लिए करता है, चीजों पर तुम्हारे विचारों को बेहूदा बना देता है और तुमसे अपने हृदय में परमेश्वर का नकार और प्रतिरोध करवाता है, इस प्रकार तुम्हें परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में असमर्थ बना देता है; तुम शैतान की इन चीजों के वश में हो गए हो, और परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम बना दिए गए हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहते हो, तो ये चीजें तुम्हारे भीतर सिर उठाएँगी और विघ्न डालेंगी, और तुमसे सत्य और परमेश्वर की माँगों का प्रतिरोध कराएंगी। भले ही तुम पारंपरिक संस्कृति के जुए से खुद को छुटकारा दिलाना चाहो, तुम ऐसा करने में शक्तिहीन होगे। कुछ समय संघर्ष करने के बाद, तुम समझौता कर लोगे। तुम मान लोगे कि नैतिकता की पारंपरिक धारणाएँ सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं, और इसलिए तुम परमेश्वर के वचनों को नकार दोगे या उन पर संदेह करोगे, परमेश्वर के वचनों को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करोगे, और इस बात की परवाह नहीं करोगे कि क्या तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो, यह महसूस करोगे कि आखिरकार तुम अभी भी इसी दुनिया में रहते हो, और इन चीजों पर निर्भर रहकर ही जीवन में आगे बढ़ सकते हो। जनमत की निंदा को सहन करने में असमर्थ होकर तुम सत्य और परमेश्वर के वचनों को छोड़ने का विकल्प चुनोगे और इसके बजाय पारंपरिक संस्कृति की नैतिकता की धारणाओं से चिपके रहोगे, शैतान के पक्ष में जाओगे और शैतान के साथ खड़े होओगे, सत्य को स्वीकार करने के बजाय परमेश्वर को नाराज करना पसंद करोगे। मुझे बताओ, क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है? कुछ लोगों ने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन वे अभी भी संतानोचित निष्ठा के मामले की असलियत नहीं देख पाते हैं। सत्य पर चाहे कैसे भी संगति क्यों न की जाए, वे उसे समझ नहीं सकते हैं। वे इस सांसारिक संबंध पर कभी काबू नहीं पा सकते हैं; उनमें साहस नहीं है, न ही आस्था है, और संकल्प की बात तो छोड़ ही दो, इसलिए वे परमेश्वर से प्रेम और उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन के माध्यम से, मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा अपने माता-पिता के प्रति ऋणी महसूस करने का एक और कारण यह था कि मैंने “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” और “जो व्यक्ति संतानोचित नहीं है, वह किसी पशु से बदतर है” जैसे विचारों को स्व-आचरण के सिद्धांतों के रूप में लिया था। मैंने सोचा था कि केवल जो अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित होते हैं, उन्हीं में जमीर और मानवता होती है, लेकिन यह दृष्टिकोण सत्य के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है। मैंने इतिहास में जो संत रहे हैं उनके बारे में सोचा, उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके सुसमाचार का प्रसार करने के लिए अपने माता-पिता और परिवारों को त्याग दिया। उन्होंने जो किया वह मानव जाति के सबसे धार्मिक कर्म थे और परमेश्वर द्वारा उसे स्वीकृत और याद किया जाता है। लेकिन मैं पारंपरिक संस्कृति द्वारा भ्रष्ट और शिक्षित की गई थी और अपने माता-पिता की सेवा करने को सबसे महत्वपूर्ण चीज मान लिया था। एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने और राज्य के सुसमाचार को फैलाने में अपनी भूमिका निभाने के लिए विदेश आना स्पष्ट रूप से एक सकारात्मक बात है, फिर भी क्योंकि मैंने अपने माता-पिता की देखभाल नहीं की, मैंने खुद को एक अकृतज्ञ, नीच और संतानोचित धर्म न निभाने वाली संतान के रूप में देखा। मेरा जमीर अक्सर मुझे फटकारता था और मुझे अपना कर्तव्य करने के लिए इतनी जल्दी घर छोड़ने का भी अफसोस हुआ। मैंने देखा कि इन पारंपरिक सांस्कृतिक धारणाओं ने मेरे सही और गलत के बोध को पूरी तरह से विकृत कर दिया था। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मेरे लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है। लेकिन अपने माता-पिता के निधन के बारे में सुनने के बाद मैं अपराध-बोध की दशा में फँस गई थी। अपने कर्तव्य में मेरा मन कहीं और रहता था, अभिनय करते समय मैं किरदार में नहीं आ पाती थी और फिल्म की प्रगति में देरी के लिए मुझे कोई आत्म-ग्लानि महसूस नहीं हुई। मुझमें सच में जमीर की कमी थी! असल में, मेरे माता-पिता का निधन एक बहुत ही सामान्य बात थी। हर कोई जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करता है। लेकिन मैं एक हताश दशा में फँसी हुई थी और मुक्त नहीं हो पा रही थी, जो परमेश्वर के खिलाफ एक मूक शिकायत थी। तभी मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि पारंपरिक संस्कृति परमेश्वर की दुश्मन है। यह जहर है। इसके अनुसार जीने से मैं परमेश्वर के प्रति और भी विद्रोही और प्रतिरोधी बन जाती। यह समझने पर मैंने देखा कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए ये सत्य कितने कीमती हैं। केवल सत्य ही मुझे शैतान के बंधन और नुकसान से मुक्त कर सकता है। उसके बाद, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट हो गई हूँ। मैं ‘संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए’ के गलत विचार से बँध गई हूँ। मैं अपने माता-पिता के प्रति अपराध-बोध की दशा में फँसी हुई हूँ, ईमानदारी से अपना कर्तव्य नहीं कर पा रही हूँ। अब मैं समझती हूँ कि यह लोगों को भ्रष्ट करने की शैतान की चालों में से एक है। अब से मैं तुम्हारे वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना चाहती हूँ, सभी मामलों में सत्य खोजना और अपने कर्तव्य में दृढ़ रहना चाहती हूँ।”
अब मेरे माता-पिता का निधन मुझे और प्रभावित नहीं करता। मैं अपना सारा समय और ऊर्जा अपने कर्तव्य में लगाती हूँ। मैं जो भी भूमिका निभाती हूँ, उस पर ध्यान से विचार करती हूँ और अब अपनी व्यक्तिगत दशा या भावनाओं को अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने देती। हालाँकि मेरे माता-पिता के निधन का अनुभव बहुत दर्दनाक था, लेकिन मैं कुछ सत्य समझ पाई। मेरे लिए यह परमेश्वर का अनुग्रह और उद्धार था। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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