दुष्कर्मी के निष्कासन से मिली सीख

04 फ़रवरी, 2022

सोनज्ञी, नीदरलैंड

इस साल मार्च में, मैंने अगुआई का काम संभाला। जब मैं निरीक्षक से मिली, तो मुझे पता चला कि सिंचन समूह के कुछ समूह-अगुआ लोगों पर रौब झाड़ते और उनसे अपना काम करने को कहते थे, जबकि वे खुद मक्खी मारते रहते थे। उन्हें समूहों द्वारा झेली जा रही समस्याओं की समझ नहीं थी, इसलिए वे व्यावहारिक मार्ग बताए बिना बस खोखले भाषण देते, और नियमों का पालन करवाते। हमने उनके साथ संगति की, कि अगुआई सिर्फ लोगों को यह बताना नहीं है कि वे क्या करें, बल्कि उन्हें नए आए हुए लोगों को व्यावहारिक सिंचन प्रदान करना, और साझीदारी से दूसरों के साथ काम करना होता है। लेकिन कुछ दिन बाद भी, उन्होंने कोई ठोस काम नहीं किया। मैंने इस पर गौर किया तो पता चला कि गाओ नामक एक टीम अगुआ तबाही मचाए हुए थी। वह व्यावहारिक काम नहीं करती थी, और दूसरे टीम अगुआओं को उकसाती थी, उनसे कहती कि निरीक्षक और मैं उनसे नए आए हुए लोगों का सिंचन करवाती हैं, जिससे उनके पास अपनी टीम के कामकाज को जाँचने का समय ही नहीं बचता, जिसका अर्थ यह होगा कि हमें उनसे यह काम करवाने की जरूरत नहीं है। तो फिर उनकी जिम्मेदारी क्या थी? उसने यह भी कहा कि निरीक्षक अनुभवहीन हैं, तो वे सही ढंग से काम कैसे करवा सकती हैं? दरअसल वह यह कह रही थी कि सिंचन के काम में अनुभवी न होने के कारण, निरीक्षक उनका व्यावहारिक मार्गदर्शन नहीं कर सकतीं, इसलिए उन्हें उनकी बात नहीं माननी चाहिए। जब निरीक्षक को उनके काम में कुछ समस्याएँ नजर आईं, तो वे बड़ी सख्ती से बोलीं, इसलिए गाओ इसकी आलोचना करने लगी, कहने लगी कि वह घमंड से लोगों को डांट रही थी। गाओ ने खोजने का नाटक कर अफवाहें भी फैलाईं, कहा कि निरीक्षक अनुभवहीन हैं, इसलिए उन लोगों का काम जरूर बिगड़ेगा, और उच्च अगुआ लोगों को नियुक्त करने के सिद्धांत करती हैं। लेकिन दरअसल, उच्च अगुआ बहन लियू ने निरीक्षक की पदोन्नति सिद्धांत के अनुसार की थी। उन्हें नए आए हुए लोगों के सिंचन का ज्यादा अनुभव नहीं था, मगर उनकी काबिलियत अच्छी थी, वे सक्षम थीं, और जिम्मेदारी से काम करती थीं, उन्हें आगे बढ़ाया जा सकता था। वे समस्याएँ भी पकड़ पाती थीं और टीम के काम का मार्गदर्शन कर सकती थीं, और उन्होंने नए आए हुए लोगों के सिंचन में थोड़ी तरक्की की थी। लेकिन गाओ दावा करती रही कि वे योग्य नहीं हैं, उन पर हमला करती रही, और अड़ी रही कि वे पद के योग्य नहीं हैं। उसने अफवाहें फैलाईं कि उच्च अगुआ के सिद्धांतों के बिना लोगों की नियुक्ति करती हैं, इस तरह उसने दूसरों को अगुआ और निरीक्षक के खिलाफ कर दिया और वे काम करने से इनकार करने लगे। इससे उन अगुआओं और परमेश्वर के घर के काम में बाधा पैदा हो गई, गाओ सभाओं में कुछ कपटपूर्ण संगतियाँ भी करती, उच्च अगुआ और निरीक्षक का अपमान कर उन पर हमला करती। उदाहरण के लिए, उसने कहा कि उसने देखा है कि इन दोनों ने एक खास काम अच्छे ढंग से नहीं किया। गाओ ने यह मामला उठाया था, लेकिन उन दोनों ने काम को न समझने के कारण उसका सुझाव नहीं माना। गाओ ने जोर नहीं देना चाहा, फिर बाद में उसने देखा कि सच में एक समस्या थी। लेकिन दरअसल जो हुआ वह यह था ही नहीं। उसने जानबूझकर अस्पष्ट संगति की, जिससे ऐसा लगे कि अगुआ उसके काम को न समझ सकने के कारण उसे रोक रहे थे, उसकी सलाह नहीं मान रहे थे, और परमेश्वर के घर के हितों का मान रखने के कारण उसे दबाया जा रहा था, ताकि सब उस पर तरस खाएं, और उसका साथ दें। गाओ हमेशा अगुआओं और निरीक्षकों को नीचा जानकर, उनकी आलोचना करती है, इस बारे में दूसरों ने कई बार उससे संगति की थी, मगर उसने इसके लिए कभी भी प्रायश्चित नहीं किया था। यह थोड़ी-सी भ्रष्टता दिखाने का मामला नहीं है, यह प्रकृति की समस्या है।

ऐसे व्यक्ति को उजागर करने के बारे में परमेश्वर के वचनों को मैंने याद किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "कलीसिया के जीवन में, कौन-से लोग, मामले और चीजें रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा के मुद्दे से जुड़ी होती हैं? रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा की कौन-सी अभिव्यक्तियाँ प्रकृति में परमेश्वर के घर के कार्य में बाधक और विघटनकारी होने से जुड़ी होती हैं? इनमें सबसे आम है चुने हुए लोगों पर नियंत्रण करने की खातिर कलीसिया में अपने रुतबे के लिए कलीसिया के अगुआओं से प्रतिस्पर्धा करना, अक्सर बदनाम करना, कलंक लगाना, कलीसिया अगुआओं की निंदा करना और उनकी मानवता में जानबूझकर उनकी विफलताओं और उनकी कमियां या उनकी क्षमता में समस्याएँ उजागर करना, खासकर जब अपना काम करते हुए या लोगों के साथ व्यवहार करते समय उनसे कोई गलती हो गई हो तो उसे उजागर करना। रुतबे के लिए ऐसी स्पर्धा सर्वाधिक सामान्य रूप से देखी जाती है, और सर्वाधिक मुखर होती है। अन्य अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? रुतबे के लिए कलीसिया के अगुआओं के साथ खुले तौर पर प्रतिस्पर्धा करना : उनका आज्ञापालन न करना, चाहे वे अपना काम कितनी भी अच्छी तरह से करें, चाहे वह सिद्धांत के अनुसार हो या न हो, और उनकी मानवता के साथ कोई समस्या हो या न हो। वे उनका आज्ञापालन क्यों नहीं करते? क्योंकि रुतबे के लिए होड़ करने वाला व्यक्ति भी अगुआ बनना चाहता है। इसलिए निर्वाचित या नियुक्त अगुआ भले ही कुछ भी करे, वे उस पर आक्षेप लगाने और उसकी निंदा करने से नहीं चूकते। अगुआओं और कर्मियों से परमेश्वर का घर जिन सिद्धांतों की अपेक्षा करता है, उनका उपयोग वे यह मापने या देखने के लिए नहीं करते कि क्या उस अगुआ के काम सिद्धांत के अनुसार हैं, क्या वह सही इंसान है, क्या वह सत्य का अनुसरण करता है, क्या उसकी मानवता में विवेक और समझ है—यह ऐसी बातों के अनुसार नहीं होता। बल्कि यह उनकी महत्वाकांक्षाओं, मंशाओं और उद्देश्यों के अनुरूप होता है, वे लगातार बाल की खाल निकालते हैं, अगुआ या कर्मी पर शिकंजा कसते हैं, उनके सत्य का उल्लंघन करने या उनकी कमियों को उजागर करने के लिए उनकी पीठ पीछे अफवाहें फैलाते हैं। उदाहरण के लिए, वे कह सकते हैं कि 'फ्लाँ अगुआ ने एक बार यह गलती की थी और उच्च ने उसका निपटारा किया था, जिसके बारे में तुममें से कोई नहीं जानता–यह व्यक्ति इतना नाटकबाज है।' वे इस बात की उपेक्षा या उसे अनदेखा कर देते हैं कि क्या इस अगुआ या कर्मी को परमेश्वर का घर प्रशिक्षित कर रहा है, और क्या वह योग्य अगुआ या कर्मी है, लेकिन बस उसे कलंकित करते रहते हैं, उसके बारे में झूठी बातें करते रहते हैं, और उसकी पीठ पीछे उसके खिलाफ षडयंत्र रचते रहते हैं। और वे किस उद्देश्य से ऐसा करते हैं? ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, है न? वे जो कुछ भी कहते और करते हैं उसका एक उद्देश्य होता है। यह कलीसिया के कार्य के लिए नहीं होता, यह न तो परमेश्वर के वचनों पर आधारित होता है, न सत्य पर, यह परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं या उन सिद्धांतों पर तो बिल्कुल आधारित नहीं होता जिनकी अपेक्षा परमेश्वर मनुष्य से करता है, बल्कि उनकी अपनी महत्वाकांक्षाओं और लक्ष्यों पर आधारित होता है। वे अगुआ या कर्मी की हर बात का प्रतिवाद अपनी 'अंतर्दृष्टि' से करते हैं; तुम जो कुछ भी कहते हो, वे उसे अपनी अलग राय से ठुकरा देते हैं। खासकर वे तब प्रसन्न होते हैं जब कोई अगुआ या कर्मी खुद को पूरी तरह से उजागर कर देता है और आत्म-ज्ञान के बारे में बात करता है : उन्हें लगता है कि उन्हें मौका मिल गया है। कौन-सा मौका? अगुआ या कर्मी को बदनाम करने का मौका, लोगों को यह बताने का मौका कि उनकी क्षमता में कोई कमी है, वे कमजोर हैं, भ्रष्ट हैं, अपने काम में अक्सर गलतियाँ करते हैं, वे किसी से बेहतर नहीं हैं। उनके लिए यह उन पर शिकंजा कसने का मौका होता है, अगुआ या कर्मी को तबाह करने, उसे नीचा दिखाने और आलोचना करने के लिए दूसरों को प्रोत्साहित करने का अवसर होता है। इन सभी व्यवहारों और कार्यों के पीछे की प्रेरणा कुछ और नहीं बल्कि रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा होती है।" "किसी अगुआ या कर्मी के खिलाफ खुले तौर पर चिल्लाना और रुतबे के लिए उनसे प्रतिस्पर्धा करना केवल प्रतिबंधों और सीमाओं के अधीन नहीं होना चाहिए; यदि स्थिति गंभीर है और हटाने तथा निष्कासन की शर्तों को पूरा करती है, तो इसे सिद्धांत के अनुसार निपटाया जाना चाहिए। इसके अलावा, वे उन लोगों को अलग-थलग करने और उन पर हमला करने की कोशिश करते हैं जो कलीसिया में सत्य का अनुसरण करने के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं, क्योंकि जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं उनकी समझ शुद्ध होती है, उनके पास परमेश्वर के वचनों का अनुभव होता है, वचनों में अंतर्दृष्टि होती है, उनके लिए तड़प होती है, और भाई-बहनों के बीच, वे लोग अक्सर सत्य की संगति करके समस्याओं को हल करने में सक्षम होते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सन्मार्ग पर लाकर धीरे-धीरे कलीसिया में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण करने वालों पर हमला करते हैं या उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश करते हैं, वे सीधे तौर पर कलीसिया के जीवन को बाधित और अशांत करते हैं। वे भले ही सीधे तौर पर कलीसिया अगुआओं को निशाना न बनाएँ, लेकिन उनमें कलीसिया के ऐसे लोगों के प्रति एक विशेष शत्रुता का भाव रहता है जिन के पास वास्तविक अनुभव होता है, जो सत्य की वास्तविकता से युक्त होते हैं, जो सत्य को समझते हैं और उससे प्रेम करते हैं। वे ऐसे लोगों को अलग-थलग, उन्हें कमजोर बनाते और तिरस्कृत करते हैं, अक्सर उनका मजाक उड़ाते और उन्हें नीचा दिखाते हैं, यहाँ तक कि उनके लिए जाल बिछाते हैं और उनके खिलाफ षडयंत्र रचते हैं, इत्यादि। हालाँकि इस तरह की समस्याएँ अगुआओं और कर्मियों के साथ रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करने से कम गंभीर होती हैं, फिर भी वे कलीसिया के जीवन को अशांत और बाधित करती हैं। अवरोधक और विघटनकारी होने के कारण, इन लोगों को सीमित और नियंत्रण में रखा जाना चाहिए। और यदि कलीसिया में बड़ी संख्या में भाई-बहन प्रभावित होते हैं, यदि वे अक्सर नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं, तो इन लोगों को न केवल नियंत्रण में रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें शुद्ध करना या दूसरों से अलग रखना चाहिए ताकि वे आत्म-चिंतन करें। यदि उनकी प्रकृति अवरोधक और विघटनकारी है, तो इस प्रकार के सभी मुद्दे आदतन किस्म के होते हैं। यदि दो लोग कभी-कभी किसी खास चीज के कारण अलग हो जाते हैं, यदि वे व्यक्तित्व में अंतर के कारण एक-दूसरे के साथ झगड़ा और शिकायत करते हैं, चीजों को देखने का उनका नजरिया या खुद को व्यक्त करने का तरीका अलग है, तो कभी-कभी इस तरह से पेश आने का मतलब यह नहीं है कि उनकी प्रकृति अवरोधक और विघटनकारी है। हम यहाँ उस स्थिति के बारे में बात कर रहे हैं जहाँ यह प्रकृति पहले ही अवरोधक और विघटनकारी होने की हद तक पहुँच चुकी है : जो लोग आदतन इस तरह से पेश आते हैं, जो वास्तविक अनुभव वाले और वास्तविक अनुभव साझा करने वाले किसी भी व्यक्ति को कमजोर करते हैं, अलग-थलग कर देते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं और उनके खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। वे आदतन इस तरह से पेश आते हैं, वे अच्छे लोगों को सहन नहीं कर पाते–अच्छे लोग उन्हें उकसाते हैं, उन्हें क्रोधित करते हैं, और वे हर अच्छे इंसान को निशाना बनाते हैं, उन्हें नुकसान और पीड़ा पहुँचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग पहले ही कलीसिया के सामान्य जीवन और व्यवस्था में गंभीर अवरोध और व्यवधान पैदा कर चुके होते हैं। अगुआओं और कर्मियों को ऐसे व्यक्तियों को रोकने, सीमित करने और उजागर करने में भाई-बहनों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए। यदि उन्हें नियंत्रण में रखना संभव न हो, यदि उनके साथ संगति करने से वे पश्चाताप नहीं करते या खुद पर लगाम नहीं लगाते, तो जब भाई-बहन परस्पर संगति करके एक आम सहमति बना लेते हैं, तब ऐसे लोगों को कलीसिया से निकाल देना चाहिए। उन्हें और छूट नहीं दी जानी चाहिए; कलीसिया के जीवन में उनके व्यवधान को और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यदि तुम उनके कुकर्मों को सहन करते हो, तो तुम भाई-बहनों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं कर रहे हो" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (14)')। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि इस बात पर गौर किए बिना कि अगुआ काम के लिए सही हैं या नहीं, लोगों का पालन-पोषण करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं, बस आँखें बंद करके उनकी खामियां ढूँढ़ना और उन पर दबाव डालना, और पीठ पीछे उनकी आलोचना करना, उनका विरोध कर उन्हें हटा देने के लिए दूसरों को उकसाना, ये सब परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करना है। ऐसे लोगों को उजागर करके उन्हें काबू में करना चाहिए, और गंभीर मामलों में, उन्हें कलीसिया से बाहर निकाल देना चाहिए। इन बातों की तुलना गाओ से करें, तो उसने ये नहीं देखा कि निरीक्षक अपने काम में कामयाब हो रही हैं या नहीं, उनका काम परमेश्वर के घर को फायदा पहुँचा रहा है या नहीं, या वे प्रशिक्षण के लायक हैं या नहीं। गाओ ने बस यह देखा कि उनके पास उसके जितना अनुभव नहीं था, और उसने कह दिया कि वे निर्णय करना चाहने वाली अनुभवहीन इंसान हैं। उसने सच्चाई को मरोड़कर मतभेद पैदा किया, और दूसरों के मन में निरीक्षक के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा कर दिया, जिससे वे उनके निर्देश मानने से इनकार करने लगे। इससे हमारे सुसमाचार कार्य की प्रगति में रुकावट पैदा हो गई। यह गाओ का थोड़े समय के लिए भ्रष्टता दिखाना नहीं था, वह हमेशा से ऐसी ही थी। उसने पहले ही कलीसियाई जीवन को गंभीर रूप से बाधित कर रखा था, और किसी काम के लायक नहीं थी। सिद्धांत के अनुसार मुझे उसे तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए था। फिर प्रायश्चित न करने पर उसे कलीसिया से निकाल दिया जाता। लेकिन मैं यह सोचकर झिझक गई कि वह थोड़े समय से टीम अगुआ रही है, और एक अच्छी अभिनेत्री है। भाई-बहन चीजों को अच्छी तरह नहीं समझते थे, और कुछ लोग उसकी मदद लेते थे। उन्हें लगता कि उसमें न्याय की भावना है, अपना काम जिम्मेदारी और प्रेम से करती है। कलीसिया में शामिल होते ही अगर मैंने उसे बर्खास्त कर दिया, तो क्या भाई-बहन यह नहीं सोचेंगे कि मैं निर्दयी और क्रूर हूँ, दंडित कर रही हूँ? क्या इसके बाद वे मेरी अगुआई स्वीकार करेंगे? लेकिन गाओ सचमुच दुष्ट थी, आग भड़काने और परदे के पीछे मतभेद पैदा करने में तेज़ थी। अगर मैंने उसे नाराज़ किया, और उसने मुझ पर उंगली उठाकर दूसरों के साथ मेरी भी आलोचना की, उनके साथ मेरे रिश्ते की बात छेड़ दी, तो मेरे लिए अपना काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। मुझे लगा कि मुझे उसे बर्खास्त करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। बल्कि पहले उसकी काट-छाँट और निपटान करना चाहिए, उसकी करतूतों के सार और परिणामों को उजागर कर उनका विश्लेषण करना चाहिए। अगर वह इसे स्वीकार कर बदल गई, तो उसके पास अभी भी एक मौका होगा। अगर वह नहीं मानी और अगुआओं और कर्मचारियों की आलोचना करती रही, तो फिर उसे निकाला जा सकेगा।

बाद में, हमारी उच्च अगुआ बहन लियू और मैंने, गाओ और इसमें शामिल लोगों से बात की, और उनके साथ परमेश्वर के घर में चयन करने के सिद्धांतों, और निरीक्षक की पदोन्नति की पृष्ठभूमि के बारे में संगति की। मैंने यह भी समझाया कि गाओ और दूसरे कुछ टीम अगुआओं का हाल का बर्ताव, दरअसल अगुआओं और कर्मचारियों को नीचा दिखाने, और परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करने के लिए एक गुटबाजी थी। अगर वे नहीं बदले, और ये सब करते रहे, तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। कुछ टीम अगुआओं ने अपनी गलतियाँ मान लीं, और कहा कि वे निरीक्षक के साथ सहयोग करना चाहते हैं और साथ मिलकर काम पूरा करना चाहते हैं। सिर्फ गाओ ने कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया। कुछ दिन बाद, गाओ ने अफवाहें फैलाते हुए एक दूसरी बहन को बताया, कि निरीक्षक अयोग्य है, और अगुआ ने गलत चयन किया है। वह बहन उसके फेर में नहीं पड़ी, बल्कि उसने कुछ सिद्धांतों के बारे में उसके साथ संगति की। यह देखकर कि बहन उसका साथ नहीं दे रही है, गाओ ने बात वहीं रोक दी। कुछ दिन बाद, गाओ ने कुछ दूसरे टीम अगुआओं को गुमराह करने के लिए यह संदेश भेजा, "उस दिन की संगति के बाद से बर्खास्त होने के डर से, मैं बच-बचकर रहने लगी हूँ। क्या आप सबको भी ऐसा ही लगता है? अब मैं एक भी शब्द बोलने की हिम्मत नहीं करती। ऐसा लगता है अब हम सुझाव भी नहीं दे सकते, अलग राय नहीं रख सकते, अगर हम बोले, तो हमें बर्खास्त कर कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाएगा। भला सुझाव देने की हिम्मत कौन करेगा?" फिर उसने कहा कि अगुआओं के कारण ही कलीसिया की तरक्की अच्छी नहीं है, वे सिद्धांतों के अनुसार लोगों की नियुक्ति नहीं कर रहे हैं। यही नहीं, उसने उन सिद्धांतों को खोजने के बहाने से, सुसमाचार टीम के एक भाई के पास जाकर निरीक्षक की बुराई की। वह भाई निरीक्षक की पदोन्नति के बारे में बहुत-कुछ जानता था, उसने परमेश्वर के घर में लोगों के चयन के सिद्धांतों के बारे में संगति की। बाद में, उसने उससे पूछा कि क्या वह समझ गई। उसने हामी भरी और कहा कि अब वह निरीक्षक के खिलाफ नहीं है। उसने उससे पूछा कि क्या वह निरीक्षक का समर्थन करके उनके साथ सद्भाव से काम करेगी, और उसने ऐसा करने की कसम खाई। लेकिन इस सच्चाई के बाद, उसने गुप्त रूप से एक बहन से बात की, खोजने और संगति करने का नाटक किया, मगर इसके बजाय सिर्फ शिकायत की, यह कहकर सच को मरोड़ा, "हमारी अगुआ बहन लियू की दूसरे भाई-बहनों के साथ मिली-भगत है। वे सब मिले हुए हैं। लियू बहुत शक्तिशाली हैं, और सभी लोग उनसे डरते हैं। मुझे फ़िक्र है कि अगर मैं निरीक्षक की समस्याओं की शिकायत करती रही, तो वे मेरे साथ एक मसीह-विरोधी जैसा बर्ताव कर सकती हैं।" दरअसल इसका अर्थ यह है कि पूरी कलीसिया बहन लियू की मुट्ठी में है, वे समस्याओं की रिपोर्ट दबा रही हैं। मैं समझ गई कि गाओ कितनी शातिर और कपटी है, वो पालन करने का नाटक करती है। बहुत-से लोगों ने उसके साथ सिद्धांतों के बारे में संगति की, लेकिन उसने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। अगुआओं और कर्मचारियों की आलोचना करने के लिए उसे जरा भी पछतावा नहीं था, इसके बजाय, वह और ज्यादा धोखेबाज होकर उन पर अंधाधुंध हमला कर रही थी। उसने दूसरों और अगुआओं के बीच दुर्भावना उकसाई, कलीसिया के कार्य को लगातार बाधित किया। वह एक दानव थी, शैतान की गुलाम। उस मुकाम पर, उसे बर्खास्त न करने पर मुझे खेद हुआ, इतने दिन झिझकते हुए, मैंने उसे लोगों को बेवकूफ बनाने के और-भी मौके दिए। मुझे पता था कि गाओ हमेशा अगुआओं को नीची नजर से देखा और आलोचना की है, और उनके काम को बाधित करती है, इसलिए मुझे उसे बर्खास्त कर देना चाहिए था। लेकिन मुझे डर था कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे, इसलिए मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाना चाहती थी, पहले सत्य के बारे में संगति और फिर उसे फटकार, फिर भी वह प्रायश्चित न करे, तो उसे बर्खास्त कर बाहर निकाल देना। इस तरह भाई-बहन मुझसे आश्वस्त होंगे और वे मेरे बारे में बुरा नहीं सोचेंगे। अपनी शोहरत और रुतबे के लिए मैंने गाओ को काबू में नहीं रखा। मैंने परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करने की उसे खुली छूट दे दी। क्या उसकी दुष्टता में मैं भी भागीदार नहीं थी? अपनी करनी के बारे में सोचना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। मुझे लगा मैंने एक अगुआ के रूप में अपना कर्तव्य नहीं निभाया है, या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं की है। परमेश्वर को इससे घृणा थी। इसलिए मैंने प्रार्थना की, परमेश्वर से आत्मचिंतन करने और खुद को जानने में मेरा मार्गदर्शन करने की विनती की।

फिर, मैंने मसीह-विरोधियों को उजागर करते परमेश्वर के वचन पढ़े, जिससे मैं खुद को बेहतर समझ सकी। परमेश्वर के वचन कहते है, "मसीह-विरोधी इस बात पर गंभीरता से विचार करते हैं कि सत्य के सिद्धांतों, परमेश्वर के आदेशों और परमेश्वर के घर के कार्य से किस ढंग से पेश आया जाए या उनके सामने जो चीजें आती हैं, उनसे कैसे निपटा जाए। वे इन बातों पर विचार नहीं करते कि परमेश्वर की इच्छा कैसे पूरी की जाए, परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाने से कैसे बचा जाए, परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए या भाई-बहनों को कैसे लाभ पहुँचाया जाए; वे लोग इन बातों विचार नहीं करते। मसीह-विरोधी इस बात पर विचार करते हैं कि कहीं उनके अपने रुतबे और प्रतिष्ठा पर तो आँच नहीं आएगी, कहीं उनकी प्रतिष्ठा तो कम नहीं हो जाएगी। अगर सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कुछ करने से कलीसिया के काम को फायदा होता है और भाई-बहनों को लाभ पहुँचता है, लेकिन इससे उनकी अपनी प्रतिष्ठा को धक्का लगता है, लोगों को उनके वास्तविक कद का एहसास हो जाता है और पता चल जाता है उनकी प्रकृति और सार कैसा है, तो वे निश्चित रूप से सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करेंगे। यदि किसी निश्चित तरीके से काम करने से वे परमेश्वर के घर के भीतर अधिक उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं और ज्यादा लोग उनके बारे में अच्छी राय बना लेते हैं, उनका सम्मान और प्रशंसा करते हैं, उनकी बातों में अधिकार आ जाता है जिससे और अधिक लोग उनके प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो फिर वे काम को उस प्रकार करना चाहेंगे; अन्यथा, वे परमेश्वर के घर या भाई-बहनों के हितों पर ध्यान देते हुए अपने हितों को तिलाँजलि कभी नहीं देंगे। यह मसीह-विरोधी की प्रकृति और सार है। क्या यह स्वार्थ और नीचता नहीं है?" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग तीन)')। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी सचमुच शोहरत और रुतबे की चाहत रखते हैं, और उनका हर काम इसी के लिए होता है। वे सिर्फ वही काम करते हैं, जो उनके रुतबे के लिए फायदेमंद होता है, अगर उनके हितों की बात हो, तो वे समस्याओं को अनदेखा कर देंगे। वे अपने हितों को बनाए रखने के लिए परमेश्वर के घर के हितों का भी नुकसान होते देख सकते हैं। परमेश्वर ने मसीह-विरोधियों का जो बर्ताव बताया मेरा व्यवहार ठीक वैसा ही था। मैं अच्छी तरह जानता था कि परमेश्वर के घर की अपेक्षा यह थी कि कलीसिया की सफाई की जाए, और परमेश्वर ने कई बार कहा कि जब एक दुष्ट व्यक्ति कलीसिया को बाधित करे, तो अगुआओं और कर्मचारियों को चाहिए कि उससे तुरंत निपटें, उसे उजागर करें, सीमा में बांधें या बाहर निकालें। गाओ का बर्ताव पहले ही कलीसिया के कार्य के लिए रोड़ा बन चुका था, तो मुझे उसका निपटान करना चाहिए था। लेकिन मुझे फिक्र थी कि दूसरे लोग मुझे अच्छा नहीं समझेंगे, और अगुआ के रूप में मेरा समर्थन नहीं करेंगे। अपनी शोहरत और रुतबे की रक्षा के लिए मैंने बस थोड़ी संगति कर दी, मुझे पता था कि उसने स्वीकार नहीं किया है, मगर मैंने उसे सीमा में नहीं बांधा या बर्खास्त नहीं किया, और इसलिए उसे दुर्भावना के बीज बोने, और कलीसिया के कार्य को बाधित करने का मौका मिल गया। अपने लिए मैं परमेश्वर के घर के हितों की बलि देने को तैयार थी। मैं बहुत कपटी, स्वार्थी और घिनौनी थी! मैंने गाओ को सिद्धांतों के अनुसार बर्खास्त नहीं किया, या दूसरों को सत्य समझने और विवेक विकसित करने का रास्ता नहीं दिखाया। नतीजा यह हुआ कि उसने बहुत-से लोगों को गुमराह करके अपने साथ कर लिया, जिससे कलीसिया का कार्य रुक गया। मैंने बहुत दोषी महसूस किया और मैं पछतावे से भर गई। मुझे महसूस हुआ कि मैं बिल्कुल भी अगुआ बनने लायक नहीं हूँ। मैंने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, एक बाधाजनक दुष्कर्मी कलीसिया में सामने आया। मैंने कलीसिया के हितों के बजाय अपनी शोहरत और रुतबे की रक्षा की। मैं बहुत स्वार्थी हूँ। मैं ऐसी नीच बनकर जीते नहीं रहना चाहती। मैं तुम्हारे सामने प्रायश्चित करना चाहती हूँ।"

मैं गाओ के बर्ताव के बारे में ज्यादा जानने के लिए हालत को जानने वाले कुछ दूसरों से मिली। इसकी जांच करते समय मैंने देखा कि कुछ लोगों को उसके बारे में सही समझ नहीं है, वे सोचते थे कि वह धार्मिकता से परमेश्वर के घर की रक्षा कर रही है। कुछ लोगों को उसके गलत तरीकों की जानकारी थी, मगर उन्होंने सोचा कि वह बस सत्य के सिद्धांतों को नहीं समझती है। मैंने उन लोगों के साथ धार्मिकता और अहंकार, और क्षणिक अपराध और किसी की प्रकृति के बीच के फर्क के बारे में संगति की। इससे उन्हें और ज्यादा समझ हासिल करने में मदद मिली, और वे उसे उजागर करने के लिए डटकर खड़े होने को तैयार हो गए। लेकिन जब मैंने भाई वांग से उसका जिक्र किया, तो उनका जवाब सुनकर मुझे हैरत हुई, "आप उसके बारे में क्यों जानना चाहती हैं? उसने बस एक छोटा-सा सुझाव दिया था। आप सब उसे क्यों निशाना बना रही हैं? आप सभी अगुआ किसी नए विचार वाले को इस तरह दबाकर उन्हें मुश्किल में कैसे डाल सकते हैं? कोई सुझाव देने की हिम्मत कैसे करेगा? आपकी इस जाँच-पड़ताल से मुझे कभी भी अपनी राय रखने में डर लगेगा। आप लोग मसीह-विरोधी जैसे ही लगते हैं, वे अलग राय की इजाजत नहीं देते।" ये सब सुनकर मैं हैरान हो गया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उसकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी होगी और वो कहेगा हम उसके साथ गलत कर रहे हैं। मैंने धैर्य रखकर उसके साथ संगति शुरू की। वह सुनने को तैयार नहीं था और अभी भी यह सोचकर गाओ पर यकीन कर रहा था कि समस्या हममें है। फिर मैंने सच में यहीं छोड़ देना चाहा। मुझे लगा कि सत्य की मेरी समझ सतही है, और मुझे अनुभव नहीं है। अगर मैं यह मामला संभालती रही, तो शायद दूसरे मुझे नीची नजर से देखेंगे। फिर मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपने हितों का ही ध्यान रख रही हूँ, इसलिए मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना कर उससे आस्था और ताकत मांगी। मुझे यह अंश याद आया : "हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा की परवाह करनी चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाते हो, तब तुम परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करोगे। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य की वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है। यदि तू हमेशा देह के अनुसार जीता है, हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करता है, तो ऐसे व्यक्ति में सत्य की वास्तविकता नहीं होती; यह परमेश्वर को लज्जित करने का चिह्न है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ पाई कि हम अपने कर्तव्य में निजी लाभ का विचार नहीं कर सकते। हमें परमेश्वर के घर के हितों को आगे रखना होगा, परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर पूरी लगन से समर्पण करना होगा। यही एकमात्र तरीका है, जिससे हमारे काम को परमेश्वर की स्वीकृति मिलती है। वरना, हम बुराई और परमेश्वर का विरोध करते हैं। दूसरों को नाराज़ करने के डर से या उनके पूर्वाग्रह का ख्याल करके मैं सत्य का अभ्यास नहीं छोड़ सकती, मैंने ऐसा मामला पहले कभी नहीं संभाला था, मगर मुझे कम-से-कम अपने काम के प्रति सच्चा बने रहना होगा, दूसरों के साथ संगति करने की भरसक कोशिश करनी होगी। गाओ ने भाई वांग को गुमराह कर उलझा दिया था, इसलिए वह उसकी तरफ से बोल रहा था। उसने झूठ को सत्य कहकर उसे बता दिया, कहा कि वह अगुआ उसकी आलोचना इसलिए करते हैं क्योंकि वे सुझाव या अलग राय नहीं देने देते। सच लगने वाले ये झूठ सच में गुमराह करने वाले हो सकते हैं। गाओ ने कहा था कि अगुआ सिद्धांतों के बिना लोगों का चयन करते हैं, मगर वह सच से दूर थी। उसे लोगों के चयन के सिद्धांतों के बारे में बताया गया था, लेकिन उसने उन्हें स्वीकार करके आत्मचिंतन नहीं किया। वह यह कहकर मामले तोड़ती-मरोड़ती रही कि अगुआ उसे और सभी अलग विचारों को दबा रहे हैं। क्या यह सच्चाई को उलटना और दूसरों को फँसाना नहीं हैं? उसने कहा अगर कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाए तो कौन अलग राय बताने की हिम्मत करेगा? ये शब्द दिल से निकले हुए-से और ईमानदार लगते हैं, लेकिन यह तथाकथित ईमानदारी उसके कपटी इरादों और शैतान की चालों को छिपा रही थी। वह दूसरों को अपनी तरफ लाना चाहती थी, ताकि वे उसकी तरफदारी करें और अगुआओं के खिलाफ हो जाएं। यह धोखा है, परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करना है। भाई वांग को बिल्कुल समझ नहीं है और वे गाओ की बातों से धोखा खा गए। उन्हें स्नेहपूर्ण संगति की जरूरत थी। संगति के जरिए उन्होंने उसके बारे में समझ हासिल की। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने सत्य को नहीं खोजा था और उनमें समझ नहीं है, इसलिए वे गाओ को बचा रहे थे और उन्होंने बुराई का साथ दिया। उन्होंने यह भी समझ लिया कि सत्य की समझ के बिना वे कितने अधम हैं, और कितनी जल्दी दुष्कर्म कर सकते हैं। उनकी सोच बदलते देख मुझे बहुत खुशी हुई। बाद में, कुछ सहकर्मियों के साथ मैंने दुष्कर्मियों को पहचानने के बारे में संगति की, और हमने गाओ के पूरे बर्ताव का विश्लेषण किया। सभी लोग उसकी असलियत समझ पाए, और हम लोगों ने एकमत से उसे कलीसिया से निकालने के लिए मत दिया। मतदान के दौरान, उन्होंने अपनी सीखी हुई कुछ बातें बताईं। उन्होंने ऐसी बातें बताईं जैसे कि, "गाओ परमेश्वर के घर की रक्षा का झंडा फहराते हुए झूठ बनाकर हर जगह अपने पूर्वाग्रह फैलाती थी। इससे कलीसिया का कार्य बहुत गड़बड़ हो गया। अगुआ उसे किसी भी तरह से उजागर करें या उसका निपटान करें, उसने जरा-सा भी खेद या प्रायश्चित नहीं किया। उसका सार दुष्ट है।" दूसरों ने कहा, "गाओ बड़ी भद्र महिला लगती थी, लेकिन उसकी बातें गुमराह करने वाली, कपटी और बुरी थीं। इस संगति और विश्लेषण के बिना मुझमें अभी भी समझ न होती। मैंने सत्य समझने और विवेक हासिल करने का महत्व देखा है।" कुछ लोगों ने कहा कि उसने उन्हें पहले भी गुमराह किया था, उन्हें लगा कि वह परमेश्वर के घर की रक्षा कर रही है, उन्हें पता नहीं था कि वह गुप्त रूप से इतनी दुष्टता कर रही है, इसलिए उन्होंने उसका साथ दिया और ऐसी बातें बोलीं जो सत्य के अनुरूप नहीं थीं। उन्हें आत्मचिंतन और प्रायश्चित करने की जरूरत है। उन्होंने परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव भी समझा, जो कोई अपमान सहन नहीं करता। जब दुष्कर्मी परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करते हैं, तो देर-सवेर उन्हें हटा दिया जाएगा। इससे मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आते हैं : "दुष्ट इंसान हमेशा दुष्ट ही बना रहेगा, वह कभी दण्ड के दिन से बच नहीं सकता। अच्छे लोग हमेशा अच्छे बने रहेंगे और उन्हें तब प्रकट किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। किसी भी दुष्ट को धार्मिक नहीं समझा जाएगा, न ही किसी धार्मिक को दुष्ट समझा जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे')। इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि, एक अगुआ के रूप में, जब कलीसिया का कोई दुष्ट इंसान परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करता है, तो अगर मैं इसे सिद्धांतों और सत्य के आधार पर न संभालूं, बल्कि अपने निजी हितों की रक्षा करूँ, तो यह दरअसल शैतान को परमेश्वर के घर के कार्य में सेंध लगाने देना है, उसके गुलाम की तरह काम करके दुष्कर्म करना और परमेश्वर का विरोध करना है। मुझे दुष्कर्मियों को इसी वक्त कलीसिया से बाहर निकाल देना होगा, और सत्य जानने और विवेक हासिल करने में भाई-बहनों की अगुआई करनी होगी। यह है परमेश्वर के घर की रक्षा करना, और वो काम करना है जो एक अगुआ को करने चाहिए। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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