ईमानदारी से बोलने का संघर्ष

04 फ़रवरी, 2022

वेनलेल, फ़िलीपीन्स

मैंने 2017 में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। भाई-बहनों के साथ सहभागिता में मेरा समय आम तौर पर बहुत अच्छा बीतता था, क्योंकि मुझे हमेशा अधिक सत्य सीखने और कुछ हासिल करने को मिलता था। पहले यह सब चैट मैसेज लिखकर किया जाता था, यानी हम चैट बॉक्स से ही बात करते थे। मैंने कुछ भी नहीं छिपाया, मैं परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ पर बात करने को उत्सुक थी। अगुआ कहती कि मुझे अच्छी समझ है और भाई-बहन भी मेरा आदर करते थे। वे कहते कि उन्हें मेरी संगति पसंद है और मैं अंग्रेज़ी भी अच्छी बोलती हूँ। उनकी प्रशंसा सुनकर मैं रोमांचित हो गई, लगा मैं अच्छा काम कर रही हूँ। फिर एक बहन ने सुझाव दिया कि वॉइस कॉल से सभा करनी चाहिए, तब मेरी समस्याएं सामने आ गईं।

एक बार दोपहर की सभा में, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, कुछ बहनों ने उस अंश के बारे में अपनी समझ साझा की। मगर घबराहट के मारे मैंने उनकी सहभागिता सुनी ही नहीं। पहले यह सब टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए होता था, मुझे वॉइस कॉल से सहभागिता करने की आदत नहीं थी। वॉइस कॉल से सहभागिता मेरी कमज़ोरी थी। मैसेज लिखकर सहभागिता करने पर, मैं अपने शब्दों को चुनकर उसे संवार सकती थी। मगर लाइव चैट में, मेरे पास तैयारी करने का समय नहीं होता था। भले ही मुझे परमेश्वर के वचनों की कुछ समझ थी, मगर मेरी सहभागिता बहुत गड़बड़ और बेतरतीब होगी, इसलिए डरती थी कि भाई-बहन मुझसे निराश होंगे। मेरे मन में हर समय यही आशंका बनी रहती थी। संगति साझा करूँ, न करूँ इसी हिचकिचाहट में रहती। अगर मैंने नहीं किया, तो दूसरों को लगेगा कि मैं सक्रिय रूप से भाग नहीं ले रही और अगुआ मुझसे निराश होंगी। अगर साझा किया, तो सबके सामने रहूँगी कोई गड़बड़ हो गई, तो भाई-बहन मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचेंगे। इससे उनके बीच बनी मेरी अच्छी छवि बिगड़ जाएगी। ये सोचकर मुझे इतनी घबराहट हुई कि मैंने कुछ नहीं कहा। मैं शर्मिंदा थी, खासकर इसलिए क्योंकि जिन भाई-बहनों ने मेरा मत-परिवर्तन किया था वे सभा में मौजूद थे, मुझे लगा कि उन्हें निराशा होगी क्योंकि मैसेज पर बात करते हुए, मैंने अच्छी समझ दिखाई और अच्छे से सभा में भाग लिया, मगर इस बार मैंने एक शब्द भी नहीं कहा। फिर एक अगुआ, फ्लोरा शी ने मुझसे कहा, "बहन वेनीला, क्या आप कुछ कहना चाहेंगी? सबने अपनी बात कह ली है। क्या आप सहभागिता करना भूल गईं?" उनके लहजे से मुझे लगा कि वो बहुत निराश हैं। मुझे बहुत बुरा लगा और शर्मिंदगी भी हुई। अपनी इस कमी को छिपाने और उनकी नज़रों में अच्छी छवि बनाये रखने के लिए, मैंने तय किया कि अब से मुझे सहभागिता में जो भी कहना होगा, वो मैं सभा से पहले लिख लूंगी, मेरी बारी आने पर उसे पढ़कर सुना दूँगी। तब मुझे घबराहट नहीं होगी। इससे उनको लगेगा कि मैं अच्छी वक्ता हूँ मेरी सहभागिता बिल्कुल सटीक और उनके लिए मददगार है। मुझे लगा यह एक अच्छा विचार है।

एक दिन शाम को, चीन की दो बहनों ने हमारी सभा की मेजबानी की। हम सबने सुविधा के लिए अंग्रेज़ी में बातचीत की। स्थानीय भाई-बहनों को बहुत संकोच हो रहा था क्योंकि उनकी अंग्रेज़ी बहुत अच्छी नहीं थी, मगर फिर भी उन्होंने परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ पर सहभागिता की। जब मेरी बारी आई, तो मैंने भी अच्छे से भागीदारी की और आत्मविश्वास से भरपूर थी, क्योंकि मैंने सब कुछ पहले ही लिख लिया था। मुझे सबसे आखिर में मौका मिला। मैंने अपनी सहभागिता लिखने में काफी समय दिया था मैंने बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से बोलने की पूरी कोशिश की, ताकि उन्हें पता न चले कि मैं पढ़ रही हूँ। उसके बाद, उन सबने मेरी सहभागिता की प्रशंसा की और कहा कि यह उनके लिए मददगार थी और मेरी अंग्रेज़ी भी अच्छी थी। उनकी प्रशंसा सुनकर मैं मन-ही-मन बहुत खुश थी, मुझे लगा जैसे मैंने उनका सम्मान अर्जित किया है। उसके बाद, जब भी भाई-बहन कहते कि उन्हें मेरी सहभागिता पसंद आई और मुझमें काबिलियत है, तो मैं खुशी से फूली न समाती। फिर मुझे समूह की अगुआ चुन लिया गया। दूसरे मेरे बारे में जो सोचते, मैं इस पर और ध्यान देने लगी। पर कुछ समय बाद, जब दूसरे मेरी प्रशंसा करते, तो मुझे अपराध-बोध होने लगता और मैं परेशान हो जाती। मैं जानती थी कि जो कर रही हूँ वह गलत है, मैं उन्हें अपना असली चेहरा देखने नहीं दे रही थी। मुझे यह सब ठीक नहीं लगा, मगर फिर भी कोई बदलाव नहीं किया। सभाओं में, मैं दूसरों की सहभागिता नहीं सुनती थी। सुनउनकी बातों पर ज़रा भी ध्यान नहीं देती थी। बल्कि अपनी समझ के बारे में लिखने में व्यस्त रहती थी। नतीजा ये हुआ कि मैं उनकी सहभागिता से कुछ नहीं सीख पाई। सभाओं से मुझे कोई फायदा नहीं हो रहा था। मैं हमेशा ऐसा कुछ लिखने पर ध्यान देती थी जो सुनने में अच्छा लगे, जो मेरे अहंकार को संतुष्ट करे और मेरे रुतबे की रक्षा करे। इसके कारण मैं सभाओं से ज्यादा हासिल नहीं कर पा रही थी। मैं बदलना और खुलकर सहभागिता करना चाहती थी, मगर ऐसा करने में डर लगता था। मुझे डर था कि अगर सब जान गए कि मैं सारी बातें पहले से लिख लेती हूँ, तो वे मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचेंगे, वे यह भी कह सकते हैं कि मैं बहुत कपटी हूँ, झूठ बोलकर धोखा दे रही थी। मैं कई बार ऐसा करने से खुद को रोकना चाहती थी, क्योंकि इससे मुझे कोई फायदा नहीं हो रहा था, मैं बहुत परेशान हो गई थी, मगर वह चिंता मेरी छवि और दूसरों की प्रशंसा के मुकाबले ज़्यादा देर ठहर नहीं पाई। मुझे अपने नाम और रुतबे की परवाह अधिक थी। मगर मैं जब भी ऐसा करती, मुझे बहुत अपराध-बोध होता। मैंने तो खुद को यह समझाने की भी कोशिश की, मैं ऐसा सिर्फ इसलिए कर रही हूँ ताकि अपनी समझ साफ और स्पष्ट तरीके से साझा कर सकूँ, इससे दूसरे मेरी बात को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। मैं खुद से यही कहती रही कि ये ठीक है, मगर अपराध-बोध और बेचैनी मुझे सताती रही। मैंने तय किया, अगर मैं अपने अहंकार को त्यागकर सबको सच बता दूँ, तो इससे बच पाऊँगी। लेकिन अगर उन्हें पता चल गया कि मेरी अंग्रेज़ी उतनी अच्छी नहीं है, तो वे मुझ पर हँसेंगे। फिर मैं उनका सामना कैसे कर पाऊँगी? मैं काफी समय तक इस समस्या से जूझती रही, मगर फिर भी खुलकर कुछ नहीं बोल पाई। जब कुछ भी समझ नहीं आया, तो मैं अपनी भाषा सुधारने में जुट गई। मैं घर पर अकेले सहभागिता का अभ्यास करने लगी, खुद की रिकॉर्डिंग करती फिर सुनकर देखती कि कैसा लग रहा है। मैंने सोचा, इस तरह धीरे-धीरे मैं अपने बोलने का तरीका सुधार लूंगी, फिर मुझे पहले से अपनी सहभागिता लिखकर नहीं रखनी होगी, बल्कि सीधे इसे सभा में साझा कर पाऊँगी। उसके बाद सबको सच बताने की ज़रूरत नहीं होगी। अगर मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी के साथ अच्छे से सहभागिता कर सकती हूँ, तो मेरे लिए उनका सम्मान बना रहेगा। मगर मैं चाहे जितना भी अभ्यास करती, हर बार सबके साथ सहभागिता में घबराहट महसूस होती, इसलिए मैं पहले की तरह अपनी सहभागिता पढ़कर सुनाती रही। मैं खुद से निराश थी और एक नकारात्मक स्थिति में फंस गई थी। इसका असर मेरे काम पर भी पड़ा। मुझे समूह-अगुआ के पद से बर्खास्त कर दिया गया।

एक बार सभा में, एक बहन ने परमेश्वर के वचनों का यह अंश साझा किया : "यदि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम पर विश्वास करें, तो पहले तुमको ईमानदार बनना होगा। एक ईमानदार व्यक्ति होने के नाते तुम्हें अपना दिल खोलना चाहिए, ताकि हर कोई उसके अंदर देख सके, तुम्हारे विचारों को समझ सके, और तुम्हारा असली चेहरा देख सके; अच्छा दिखने के लिए तुम्हें तुम खुद भेष धारण करने या खुद को आकर्षक बनाने का प्रयास न करो। लोग तभी तुम पर विश्वास करेंगे और तुमको ईमानदार मानेंगे। यह ईमानदार होने का सबसे मूल अभ्यास और ईमानदार व्यक्ति होने की शर्त है। तू हमेशा पवित्रता, सदाचार, महानता का दिखावा करता है, नाटक करता है, और उच्च नैतिक गुणों के होने का नाटक करता है। तू लोगों को अपनी भ्रष्टता और विफलताओं को नहीं देखने देता है। तू लोगों के सामने एक झूठी छवि पेश करता है, ताकि वे मानें कि तू सच्चा, महान, आत्म-त्यागी, निष्पक्ष और निस्वार्थी है। यह धोखा है। भेष धारण मत कर और खुद को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत मत कर; इसके बजाय, अपने आप को स्पष्ट कर और दूसरों के देखने के लिए खुद को और अपने हृदय को पूरी तरह उजागर कर दे। यदि तू दूसरों के देखने के लिए अपने हृदय को उजागर कर सकता है और अपने विचारों और योजनाओं को—चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक—स्पष्ट कर सकता है तो क्या तू ईमानदार नहीं बन रहा है? यदि तू दूसरों के समक्ष अपने आप को उजागर कर सकता है, तो परमेश्वर भी तुझे देखेगा और कहेगा: 'तूने दूसरों के देखने के लिए स्वयं को खोल दिया है, और इसलिए मेरे सामने भी तू निश्चित रूप से ईमानदार है।' यदि तू दूसरे लोगों की नज़र से दूर केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को उजागर करता है, और उनके साथ रहते हुए हमेशा महान और गुणी या न्यायी और निःस्वार्थ होने का दिखावा करता है, तो परमेश्वर क्या सोचेगा और परमेश्वर क्या कहेगा? वह कहेगा: 'तू वास्तव में धोखेबाज़ है; तू विशुद्ध रूप से पाखंडी और क्षुद्र है; और तू ईमानदार व्यक्ति नहीं है।' परमेश्वर इस प्रकार से तेरी निंदा करेगा। यदि तू ईमानदार व्यक्ति होना चाहता है, तो चाहे तू परमेश्वर के सामने हो या दूसरे लोगों के सामने, तुझे अपने में जो कुछ भी प्रकट होता है, उसका और अपने हृदय में मौजूद शब्दों का एक शुद्ध और खुला लेखा-जोखा प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए। क्या यह हासिल करना आसान है? इसके लिए समय की आवश्यकता होती है, इसमें आंतरिक संघर्ष की आवश्यकता होती है और हमें लगातार अभ्यास करना पड़ता है। धीरे-धीरे हमारा हृदय खुल जाता है और हम खुद को उजागर कर पाते हैं" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास')। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है, उसे कपट और बेईमानी पसंद नहीं है। चाहे हमारा सच अच्छा हो या बुरा, सहभागिता में हमें सब कुछ खुलकर बताना चाहिए, ऐसा बनने का ढ़ोंग नहीं करना चाहिए जो हम नहीं हैं। यही ईमानदार होना है। यह अंश पढ़कर मैं खुद को दोषी समझने लगी, क्योंकि मुझे पता था कि मैं ईमानदार इंसान नहीं हूँ। मैं सबके सामने खुलकर बोलना चाहती थी, ताकि अपनी छवि बचाने की चाह और अहंकार को त्याग सकूँ, मैंने कई बार इसे त्यागने की कोशिश भी की, मगर कामयाब नहीं हो पाई। मुझे अपनी छवि की बहुत परवाह थी। मैं अपने ही अहंकार में कैद थी। मैंने देखा कि मैं वाकई बहुत भ्रष्ट थी। मुझे अपराध-बोध के साथ-साथ खीझ भी महसूस हुई। मैं हमेशा दिखावा करके लोगों के बीच अपनी झूठी सकारात्मक छवि पेश क्यों करती थी? मैं सत्य पर अमल क्यों नहीं कर पाई? परमेश्वर में अपनी आस्था को बेकार क्यों कर रही थी? क्या वे सभी सभाएं और काम बेकार चले गये? मुझे लगा जैसे मैं कभी अपने अहंकार के बंधनों से नहीं निकल पाऊँगी। मैं अपने समूह को छोड़कर कुछ वक्त खुद को सही स्थिति में लाने में देना चाहती थी, ताकि फिर सभाओं में लौटकर ऐसी चीज़ें करना बंद कर सकूँ। इसलिए मैं ग्रुप से निकल गई और उस अकाउंट का इस्तेमाल करना भी बंद कर दिया, मैं अकेले रहकर आत्मचिंतन करना चाहती थी। कुछ समय तक मैं बहुत निराश, परेशान और अकेली भी रही। मैं खुद से निराश थी। मैं दो सालों से विश्वासी थी, मगर अब तक ईमानदार बनने और अपने अहंकार को त्यागने में कामयाब नहीं हो पाई। मुझे अपने बारे में दूसरों की राय की बहुत परवाह थी। सच जानने के बाद दूसरों की प्रतिक्रिया के बारे में सोचते ही मैं बहुत शर्मिंदा हो जाती थी।

उस दौरान मैं सिर्फ परमेश्वर के वचन पढ़ती थी। एक दिन मैंने ये अंश देखा : "सत्य का अनुसरण करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, और इस पर अमल करना सचमुच बहुत आसान है। तुमको ईमानदार इन्सान बनने से शुरुआत करनी चाहिये, सच बोलना चाहिये, और अपने दिल को खोल देना चाहिये। अगर ऐसी कोई बात है जिस पर अपने भाई-बहनों से चर्चा करते हुए तुमको शर्म आती है, तो तुम्हें परमेश्वर के आगे घुटनों के बल झुककर, प्रार्थना के माध्यम से उनसे अपनी बात कह देनी चाहिये। तुमको परमेश्वर से क्या कहना चाहिए? तुम परमेश्वर से अपने दिल की बात कहो। तुम उनसे ख़ुश करने वाली खोखली बातें न करो या उन्हें धोखा देने की कोशिश न करो। ईमानदार होने से शुरुआत करो। अगर तुम दुर्बल हो, तो उनसे कहो कि तुम दुर्बल हो; अगर तुम दुष्ट हो, तो कहो कि तुम दुष्ट हो; अगर कपटी हो, तो कहो कि तुम कपटी हो; अगर तुम्हारे मन में गंदे और धोखेबाज़ी के विचार आते हैं, तो तुम परमेश्वर से ऐसा कहो; अगर तुम हमेशा पद के लिए प्रतिस्पर्द्धा करते रहते हो, तो उन्हें यह बात बताओ; परमेश्वर को तुम्हें अनुशासित करने दो; उन्हें तुम्हारे लिये परिवेश की व्यवस्था करने दो; परमेश्वर को अवसर दो कि वह तुम्हें तमाम मुश्किलों और समस्याओं से निजात दिलाने में तुम्हारी मदद करें। तुमको अपना दिल खोल देना चाहिये; उसे बंद न रखो। अगर तुम परमेश्वर के लिये अपने दिल के दरवाज़े बंद भी कर देते हो, तो भी वे तुम्हारे अंदर देख सकता है, लेकिन अगर तुम उसके आगे खुलकर बात करोगे, तो तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो। तो तुम्हें कौन-सा मार्ग चुनना चाहिए? ईमानदार बनने से शुरुआत करो और किसी भी तरह का ढोंग बिल्कुल न करो। वर्षों से हम ईमानदार होने के बारे में सत्य पर संगति करते रहे हैं, फिर भी, आज भी कई ऐसे लोग हैं जो उदासीन रहते हैं, जो केवल अपने ही इरादों, इच्छाओं और लक्ष्यों के अनुसार बोलते और कार्य करते हैं, और जिन्हें कभी पश्चात्ताप करने का खयाल नहीं आया। क्या ईमानदार लोगों का यही रवैया होता है? (नहीं।) परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने के लिए क्यों कहता है? क्या इसलिए कि उन्हें नियंत्रित करना आसान हो सके? (नहीं।) ईमानदार होना सामान्य होने, परमेश्वर को प्रिय होने, सत्य को प्राप्त करने की शुरुआत है; और यह व्यक्ति में मानवता होने और उसके वास्तविक व्यक्ति जैसा होने का सबसे बुनियादी संकेत भी है। इस प्रकार, जो व्यक्ति कभी ईमानदार नहीं रहा, या जिसे ईमानदार नहीं माना गया, वह ऐसा व्यक्ति होता है जो सत्य को समझ या प्राप्त नहीं कर सकता। अगर तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं आता, तो स्वयं देखो, या स्वयं इसका अनुभव करो। उसके आगे तुम अपना दिल तभी खोल पाओगे, और केवल जब तुम्हारा दिल खुल जाता है, तो सत्य तुम्हारे अंदर प्रवेश कर सकता है जिससे तुम उसे समझ और प्राप्त भी कर सकते हो। अगर तुम्हारा हृदय हमेशा बंद रहता है, तुम कभी किसी से सत्यतापूर्वक नहीं बोलते हो, हमेशा टाल-मटोल करते हो और पकड़ में नहीं आते हो, तो तुम्हारे उस टाल-मटोल करने का क्या परिणाम होगा? आगे चलकर तुम स्वयं को नष्ट कर लोगे, फिर तुम न तो किसी सत्य को समझ पाओगे, न ही उसे कभी हासिल कर पाओगे" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')। इससे मुझे पता चला कि सत्य को समझना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, मेरी इज़्ज़त और अहंकार से कहीं ज़्यादा। सत्य को पाने के लिए, मुझे ईमानदार बनने की कोशिश करनी होगी। सब कुछ साफ होना चाहिए, कोई दिखावा या धोखेबाजी नहीं चलेगी। काफी समय से, मैं दिखावा कर रही थी, दूसरों को धोखा दे रही थी। जो सहभागिता करना चाहती, उसे लिख लेती थी, ताकि उनको लगे कि मुझमें अच्छी समझ है और मैं अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हूँ, जिससे कि वे मेरी प्रशंसा करते रहें। मैं अपराध-बोध और घबराहट की पहेली में उलझ गई थी, मगर मुझमें भाई-बहनों के सामने खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं थी। मैं नहीं चाहती थी कि वे मेरी कमियां देखें और मेरे बारे में नीचा सोचें या मुझे झूठी कहें। मैंने सच कहने के बजाय अपने समूह को छोड़ देना ही बेहतर समझा। मैं वाकई धूर्त थी। मुझे एहसास हुआ, इतनी निराश होने का मतलब है कि शैतान मुझे नुकसान पहुंचा रहा था शायद ये मेरे जीवन प्रवेश के रास्ते की रुकावट भी था। ये मुझे बर्बाद भी कर सकता था। मुझमें दूसरों को अपने दिल की बात बनाते की हिम्मत होनी चाहिए, ताकि मैं थोड़ी ईमानदारी का अभ्यास कर सकूँ। सच बताने में चाहे कितना भी बुरा क्यों न लगे, मैं जानती थी कि मुझे गलत तरीके से काम करने से बचना ही होगा। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद और धूर्त लोगों से नफ़रत करता है। अगर मैं दिखावा करती रही, दूसरों के बीच अपनी झूठी छवि बनाती रही और साफदिल नहीं रही, तो मैं अँधेरे में जीती रहूँगी और कभी पवित्र आत्मा का कार्य हासिल नहीं कर पाऊँगी। मैं कभी सत्य को नहीं पा सकूँगी। मुझे परमेश्वर के सामने सब खुलकर बताना होगा ताकि वह इस धूर्तता को खत्म करने में मेरी मदद कर सके। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वो मुझे सत्य पर अमल करके ईमानदार इंसान बनने में मेरा मार्गदर्शन करे।

आखिरकार, मैंने अपनी अगुआ, बहन कॉनी को सब खुलकर बता दिया, कि क्यों मैंने अपना ग्रुप छोड़ा और अपना अकाउंट बंद किया। मेरी बातें सुनने के बाद, बहन कॉनी ने कहा, "इसके लिए मैं कभी आपको नीचा नहीं समझूँगी, मैं आपकी ईमानदारी की बहुत सराहना करती हूँ।" उनके मुँह से यह सुनकर मुझे बहुत राहत मिली। मैंने सचमुच अनुभव किया कि ईमानदार बनना कितना अच्छा है। इस ईमानदारी ने मुझे सारी चिंताओं से मुक्त कर दिया मुझे अपनी गलत सोच को ठीक करने का मौका दिया। उन्होंने मुझे कुछ सलाह भी दी, जैसे परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ को साझा करते समय, मुझे बहुत कुशलता से बोलने या किसी तरह का उच्च-स्तरीय सिद्धांत साझा करने की ज़रूरत नहीं है। ईमानदार बनने के लिए, बस दिल से अपनी बात कह देना ही काफी है। इससे परमेश्वर को खुशी मिलती है। मैं उनके सुझाव को मानकर फौरन इसे अमल में लाने को तैयार हो गई।

उसके बाद, एक और बहन ने परमेश्वर के वचनों का यह अंश मुझे भेजा। "सत्य की खोज करने के बजाय, अधिकतर लोगों के अपने तुच्छ एजेंडे होते हैं। अपने हित, इज्जत और दूसरे लोगों की नजर में जो स्थान या प्रतिष्ठा वे रखते हैं, उनके लिए बहुत महत्व रखते हैं। वे केवल इन्हीं चीजों को सँजोते हैं। वे इनसे इस तरह चिपके रहते हैं, जैसे वे उनका जीवन हों। और परमेश्वर उन्हें कैसे देखता या उनसे कैसे पेश आता है, इसका महत्व उनके लिए गौण होता है; फिलहाल वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं; फिलहाल वे केवल इस बात पर विचार करते हैं कि क्या वे समूह के मुखिया हैं, क्या अन्य लोग उनका सम्मान करते हैं और उनकी बात सुनते हैं। ये उनके लिए प्राथमिक महत्व रखते हैं। जब वे किसी समूह में होते हैं, तो प्राय: सभी लोग इसी प्रकार की प्रतिष्ठा, इसी प्रकार के अवसर तलाशते हैं। अगर वे अत्यधिक प्रतिभाशाली होते हैं, तब तो शीर्षस्थ होना चाहते ही हैं, लेकिन अगर वे औसत क्षमता के भी होते हैं, तो भी वे समूह के अन्य औसत लोगों से उच्च पद धारण करना चाहते हैं; और अगर वे औसत क्षमता और योग्यताओं के होने के कारण समूह में निम्न पद धारण करते हैं, तो भी वे यह चाहते हैं कि दूसरे उनका सम्मान करें, वे नहीं चाहते कि दूसरे उन्हें नीची निगाह से देखें। इन लोगों की इज्जत और गरिमा ही होती है, जहाँ वे सीमा-रेखा खींचते हैं : उन्हें इन चीजों को कसकर पकड़ना होता है। उनमें कोई निष्ठा न हो, उनके पास परमेश्वर की स्वीकृति या सहमति भी न हो, तब भी समूह में वे इज्जत, हैसियत और दूसरों की प्रशंसा पाने की कोशिश करने का मौका कभी नहीं छोड़ते—जो शैतान का स्वभाव है। ज्यादातर लोग इसके प्रति जागरूक नहीं हैं। उनका विश्वास है कि उन्हें इस इज्जत की रद्दी से अंत तक चिपके रहना चाहिए। वे नहीं जानते कि ये बेकार और सतही चीजें पूरी तरह से त्यागकर और एक तरफ रखकर ही वे ऐसे व्यक्ति बनेंगे, जिनके पास संकल्प है। हैसियत को अपना जीवन बना लेने वालों का जीवन व्यर्थ हो जाता है। वे नहीं जानते कि दाँव पर क्या लगा है। इसीलिए, जब वे कार्य करते हैं तो हमेशा कुछ छिपा लेते हैं, वे हमेशा अपनी इज्जत और हैसियत बचाने की कोशिश करते हैं, वे इन्हें पहले रखते हैं, वे केवल अपने झूठे बचाव के लिए, अपने उद्देश्यों के लिए बोलते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, अपने लिए करते हैं। वे हर चमकने वाली चीज के पीछे भागते हैं, जिससे सभी को पता चल जाता है कि वे उसका हिस्सा थे। इसका वास्तव में उनसे कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन वे कभी पृष्ठभूमि में नहीं रहना चाहते, वे हमेशा अन्य लोगों द्वारा नीची निगाह से देखे जाने से डरते हैं, वे हमेशा दूसरे लोगों द्वारा यह कहे जाने से डरते हैं कि वे कुछ नहीं हैं, कि वे कुछ भी करने में असमर्थ हैं, कि उनके पास कोई कौशल नहीं है। क्या यह सब उनके शैतानी स्वभावों द्वारा निर्देशित नहीं है? जब तुम यह सब छोड़ने में सक्षम हो जाते हो, तो तुम अपने भीतर अधिक निश्चिंत और मुक्त हो जाते हो; तुम ईमानदार होने की राह पर कदम रख देते हो। लेकिन कई लोगों के लिए इसे हासिल करना आसान नहीं होता। जब कैमरा दिखता है, वे आगे आने के लिए हाथापाई करते हैं; वे कैमरे में दिखना पसंद करते हैं, जितनी ज्यादा कवरेज, उतनी बेहतर; वे पर्याप्त कवरेज न मिलने से डरते हैं और उसे प्राप्त करने का अवसर पाने के लिए हर कीमत चुकाते हैं। क्या यह सब उनके शैतानी स्वभावों द्वारा निर्देशित नहीं है? (हाँ।) ये उनके शैतानी स्वभाव हैं। तो तुम्हें कवरेज मिल जाती है—फिर क्या? लोग तुम्हारे बारे में अच्छी राय रखते हैं—तो क्या? वे तुम्हारी आराधना करते हैं—तो क्या? क्या इनमें से कोई भी चीज साबित करती है कि तुम्हारे पास सत्य है? इसमें से किसी भी चीज का कोई मूल्य नहीं है। जब तुम इन चीजों पर काबू पा लेते हो—जब तुम इनके प्रति उदासीन हो जाते हो और इन्हें महत्वपूर्ण नहीं समझते, जब इज्जत, अभिमान, हैसियत, तुम्हारे बारे में दूसरे लोगों के विचार तुम्हारे विचारों और व्यवहार को नियंत्रित नहीं करते, तुम्हारे कर्तव्य-पालन के तरीके को तो बिलकुल भी नियंत्रित नहीं करते—तब तुम्हारा कार्य-निष्पादन और अधिक प्रभावी हो जाता है, और अधिक शुद्ध हो जाता है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है')। इस अंश में परमेश्वर यह खुलासा करता है कि कैसे लोग अपने जीवन से ज़्यादा अपनी इज़्ज़त और रुतबे को अहमियत देते हैं, कोई समस्या आने पर वे परमेश्वर की इच्छा के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते, बल्कि सबसे पहले अपने रुतबे, अहंकार और पद के बारे में सोचते हैं। परमेश्वर नहीं चाहता कि हम दिखावा करें, अपने रुतबे को सबसे पहले रखें या लोगों के बीच अपने रुतबे की परवाह करें। इससे हमें परमेश्वर की स्वीकृति पाने में मदद नहीं मिलेगी, इससे हमारे स्वभाव को बदलने या बचाये जाने में भी मदद नहीं मिलेगी। नाम और रुतबे के बंधनों से शैतान हमें बाँधने की कोशिश करता है, इन चीज़ों के पीछे भागने से हम कहीं ज़्यादा अहंकारी और धूर्त बन जाते हैं। इस तरह हम परमेश्वर का मार्गदर्शन गँवा देंगे और उसके उद्धार का मौका भी खो देंगे। परमेश्वर धूर्त लोगों को पसंद नहीं करता, वह नहीं चाहता कि उसकी स्वीकृति या दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए लोग धूर्त तरकीबों का इस्तेमाल करें। वह चाहता है कि हम इज़्ज़त और रुतबे की परवाह न करें, सत्य की खोज कर ईमानदार बनें। परमेश्वर के सामने हो या दूसरों के सामने, हम कपटी या धूर्त नहीं बन सकते। हर बार मैं दूसरों के सामने खुलकर बोलने या अपने संघर्ष की बातें साझा करने में विफल रही, क्योंकि मुझे अपनी इज़्ज़त और अहंकार की बहुत अधिक परवाह थी। अपने शैतानी स्वभाव की बेड़ियों में जकड़ी, मैं सत्य पर अमल नहीं कर पाई। इज़्ज़त और रुतबे की मेरी चाह बहुत तीव्र थी।

फिर, उस बहन ने मुझे परमेश्वर के और वचन भेजे जिसका एक अंश खास तौर मेरे लिए बहुत मददगार था। "इसे देखकर, क्या तुम कहोगे कि छोटे-मोटे एहसानों का उपयोग करना या दिखावा करना या लोगों को भ्रमित कर धोखा देना एक अच्छा मार्ग है, भले ही ये साधन इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को बाहरी तौर पर कितने भी लाभ और कितनी भी संतुष्टि मिलती प्रतीत हो? क्या यह सत्य की खोज का मार्ग है? क्या यह ऐसा मार्ग है, जो किसी का उद्धार कर सकता है? बहुत स्पष्ट रूप से, नहीं। ये तरीके और तरकीबें चाहे कितने भी शानदार तरीके से कल्पित की गई हों, परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना सकतीं, और अंततः परमेश्वर उन सभी की निंदा और उनसे घृणा करता है, क्योंकि इस तरह के व्यवहारों के पीछे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और अपने आप को परमेश्वर के खिलाफ रखने के एक तरह के रवैये और इच्छा का सार छिपा होता है। मन ही मन परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को कभी भी ऐसे इंसान के रूप में नहीं पहचानेगा, जो अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है, बल्कि उन्हें कुकर्मी के रूप में परिभाषित करेगा। कुकर्मियों के साथ व्यवहार करते समय परमेश्वर का निष्कर्ष क्या होता है? 'हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।' जब परमेश्वर ने कहा, 'मेरे पास से चले जाओ,' तो वह लोगों को शैतान के पास, शैतानों से भरे स्थानों पर भेज रहा था, और वह अब उन्हें नहीं चाहता था। उन्हें न चाहने का मतलब था कि वह उन्हें नहीं बचाएगा। अगर तुम परमेश्वर के समूह में से एक नहीं हो, उसके अनुयायियों में से एक होने की बात तो छोड़ ही दो, तो तुम उन लोगों में से नहीं हो, जिन्हें वह बचाएगा। ऐसे व्यक्ति को इसी प्रकार परिभाषित किया जाता है" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों का दिल जीतना चाहते हैं')। परमेश्वर के वचनों से, मैंने जाना कि कुछ लोग पाखंडी और नकली होते हैं ताकि लोगों के दिलों में जगह बना सकें। देखने में लगता है कि उन्होंने दूसरों का सम्मान पाकर अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर लिया है। मगर अंत में उन्हें क्या हासिल होता है? वे कुछ पल के लिए लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, मगर परमेश्वर को नहीं। परमेश्वर हमारे दिलो-दिमाग में देखता है, आखिरकार वे परमेश्वर के उद्धार का मौका गँवा देते हैं और कभी सत्य या परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं कर पाते। परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं। वह ऐसे लोगों से नफ़रत करता है जो सत्य नहीं खोजते और अपनी मंशाएं रखते हैं, जो चोरी से लोगों के दिलों में जगह बनाना चाहते हैं। परमेश्वर उन्हें कुकर्मी मानता है और उनके कामों को स्वीकार नहीं करता है। इस बात ने मुझे डरा दिया। मुझे डर लगा कि परमेश्वर मुझे त्याग देगा, शैतान के हाथों सौंप देगा और मैं उसके उद्धार का मौका गँवा दूँगी। मुझे एहसास हुआ कि मैं सचमुच गलत मार्ग पर चल पड़ी थी। क्योंकि मेरे सारे विचार और कर्म दूसरों की प्रशंसा और सम्मान पाने के लिए थे, मैंने कभी परमेश्वर की इच्छा पर विचार नहीं किया ये नहीं सोचा कि ऐसा करके आखिर मुझे क्या हासिल होगा। कुछ लोगों के दिलों में जगह बनाकर भी मैं कभी सत्य हासिल नहीं कर पाई क्योंकि मैं परमेश्वर के विरोध के मार्ग पर चल रही थी। अगर मैं उस मार्ग पर चलती रही, तो आखिर में बर्बाद हो जाउंगी। इस बात पर, मैं समझ गई कि मेरी हरकतों से परमेश्वर को नफ़रत है और वह नहीं चाहता कि मैं इसका अनुसरण करूँ। मैं अपने जज्बातों को शांत नहीं कर पाई। मैं सचमुच बदलना चाहती थी, उस स्थिति से बचकर खुद को जानना चाहती थी, और फिर कभी ऐसी धूर्त नहीं बनना चाहती थी।

उसके बाद, बहन कॉनी ने संगति करने, दूसरों के सामने खुलकर बोलने और ईमानदार बनने के लिए, मेरा हौसला बढ़ाया, ताकि मुझे कुछ सुकून और खुशी महसूस हो सके। मगर अपनी भ्रष्टता और कमियों के बारे में भाई-बहनों से खुलकर बात करने के विचार पर, मुझे बहुत संकोच हुआ। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : "कोई भी समस्या पैदा होने पर, चाहे वह कैसी भी हो, तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए, और तुम्हें किसी भी तरीके से छद्म व्यवहार नहीं करना चाहिए या दूसरों के सामने नकली चेहरा नहीं लगाना चाहिए। तुम्हारी कमियाँ हों, खामियाँ हों, गलतियाँ हों, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हों—तुम्हें उनके प्रति खुला रुख अपनाना चाहिए और उनके बारे में संगति करनी चाहिए। उन्हें अपने अंदर न रखो। सत्य में प्रवेश करने के लिए खुलकर बोलना सीखना सबसे पहला कदम है, और यह पहली बाधा है, जिसे पार करना सबसे मुश्किल है। एक बार तुमने इसे पार कर लिया तो सत्य में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह कदम उठाने का मतलब है कि तुम अपना हृदय खोल रहे हो और वह सब कुछ दिखा रहे हो जो तुम्हारे पास है, अच्छा या बुरा, सकारात्मक या नकारात्मक: दूसरों और परमेश्वर के देखने के लिए खुद को खोलना, परमेश्वर से कुछ न छिपाना, कोई स्वांग न करना, धोखे और चालबाजी से मुक्त रहना, और इसी तरह दूसरे लोगों के साथ खुला और ईमानदार रहना। इस तरह, तुम प्रकाश में रहते हो, और न सिर्फ परमेश्वर तुम्हारी जांच करेगा बल्कि अन्य लोग भी यह देख पाएंगे कि तुम सिद्धांत से और एक हद तक पारदर्शिता से काम करते हो। तुम्हें अपनी निजी प्रतिष्ठा, अपने मान-सम्मान और ओहदे की खातिर, कुछ भी ढकने की, कोई संशोधन करने की, या कोई भी चालाकी करने की आवश्यकता नहीं है, और यह बात तुम्हारे द्वारा की गई किसी भूल पर भी लागू होती है; ऐसा व्यर्थ कार्य अनावश्यक है। यदि तुम ये सारी चीज़ें नहीं करते हो, तो तुम आसानी से और बिना थकान के, पूरी तरह से प्रकाश में, जियोगे। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर की प्रशंसा पा सकते हैं। फिर, तुम्हें अपने विचारों और सुझावों का विश्लेषण करना सीखना चाहिए। जो गलत काम तुम करते हो, तुम्हारा जो व्यवहार परमेश्वर को पसंद नहीं आयेगा, तुम्हें उन्हें तुरंत परिवर्तित करके सुधारने में सक्षम होना चाहिए। इन्हें सुधारने का मकसद क्या है? इसका मकसद यह है कि तुम अपने भीतर उन चीजों को अस्वीकार करो जो शैतान से संबंधित हैं और उनकी जगह सत्य को लाते हुए, सत्य को स्वीकार करो और उसका पालन भी करो। पहले तुम कपट और धोखेबाज़ी जैसी अपनी भ्रष्ट प्रकृतियों पर भरोसा करते थे, लेकिन अब तुम ऐसे नहीं हो; अब, जब तुम कोई काम करते हो, तो तुम ईमानदारी, पवित्रता और आज्ञाकारिता की मानसिकता के साथ कार्य करते हो। यदि तुम अपने मन में कुछ भी नहीं रखते हो, दिखावा नहीं करते हो, ढोंग नहीं करते हो, मुखौटा नहीं लगाते हो, यदि तुम भाई-बहनों के सामने अपने आपको खोल देते हो, अपने अंतरतम विचारों और चिंतन को छिपाते नहीं हो, बल्कि दूसरों को अपना ईमानदार रवैया दिखा देते हो, तो फिर धीरे-धीरे सत्य तुम्हारे अंदर जड़ें जमाने लगेगा, यह खिल उठेगा और फलदायी होगा, धीरे-धीरे तुम्हें इसके परिणाम दिखाई देने लगेंगे। यदि तुम्हारा दिल ईमानदार होता जाएगा, परमेश्वर की ओर उन्मुख होता जाएगा और यदि तुम अपने कर्तव्य का पालन करते समय परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना जानते हो, और इन हितों की रक्षा न कर पाने पर जब तुम्हारी अंतरात्मा परेशान हो जाए, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम पर सत्य का प्रभाव पड़ा है और वह तुम्हारा जीवन बन गया है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। मैं देख सकती थी कि परमेश्वर के वचन वाकई लोगों को बदल सकते हैं। जब लोग अपनी भ्रष्टता के बारे में खुलकर बोलना और सत्य खोजना सीख जाते हैं, तो हमारे गलत विचार और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे बदल सकते हैं। परमेश्वर ने मेरी गलत सोच को उजागर किया, नाम और रुतबे के पीछे भागने की मेरी गलत मंशा का खुलासा किया, फिर उसने अपने वचनों के ज़रिए अभ्यास का सही मार्ग ढूंढने में मेरा मार्गदर्शन किया। मुझे दूसरों के सामने खुलकर बोलने के लिए, अपने नाम और इज़्ज़त के बारे में नहीं सोचने, और चालाक, धूर्त और कपटी नहीं बनने के लिए पहला कदम उठाना था। मुझे परमेश्वर के वचनों पर अमल करना था और उन्हें मेरा मार्गदर्शन करने देना था।

उस रविवार की सुबह, मैं हमेशा की तरह सभा में शामिल हुई और खुद को समझाया कि मुझे ईमानदार बनना है, हर किसी से खुलकर अपनी समझ साझा करनी है। मैंने प्रार्थना की, "प्रिय परमेश्वर, इस बार में सत्य पर अमल करना चाहती हूँ, ताकि शैतान की बेड़ियों से बचकर अपने पाखंड और कपट का खुलासा कर सकूँ। अगर लोग मेरे बारे में नीचा सोचते हैं तो सोचें। मैं बस एक ईमानदार इंसान बनना चाहती हूँ ताकि तुम्हें संतुष्ट कर सकूँ, मेरी मदद करो ताकि मैं खुलकर, ईमानदारी से अपनी बात कह सकूँ।" इस प्रार्थना के बाद मुझे और भी सुकून मिला। सभा के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, दूसरों के अनुभव और समझ से जुड़ी उनकी सहभागिता को बहुत ध्यान से सुना। मैंने उस समय को अपनी सहभागिता लिखने में नहीं गंवाया और यह नहीं सोचा कि किस तरह की सहभागिता सबको पसंद होगी। ऐसा करने पर, मुझे दूसरों की सहभागिता से नया प्रबोधन हासिल हुआ। जब मेरी बारी आई, तो मैं यह नहीं सोच रही थी कि मेरी सहभागिता कितनी अच्छी या स्पष्ट है, भले ही मैं थोड़ी घबराई हुई थी, मगर इससे अपनी सहभागिता जारी रखने में कोई दिक्कत नहीं हुई। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश की बात की जिसने मुझे बहुत प्रेरित किया था। "ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए चीज़े न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। ... यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को मैंने अपने अनुभव से जोड़ दिया, और फिर अंत में अपना दिल खोलकर रख दिया, सबके सामने अपना असली चेहरा पूरी तरह उजागर कर दिया। मुझे यह चिंता बिल्कुल भी नहीं थी कि वे मेरे बारे में क्या कहेंगे। मैंने उन्हें बताया, "इस दौरान, मैं लगातार दिखावे करती रही, धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने का नाटक करती रही। सच तो ये है कि मैं पहले से अपनी सारी सहभागिता लिख लेती थी, अभ्यास करने के लिए इसे रिकॉर्ड भी करती थी, ताकि यह स्वाभाविक लगे और आप मेरे बारे में बेहतर सोचें। यह सब सिर्फ आपकी प्रशंसा पाने और आपकी नज़र में ऊँचा उठने के लिए था। मैं आप लोगों को धोखा दे रही थी। ..." मुझे लगा था कि दिल खोलकर रख देने के बाद, वे मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचेंगे, मगर उन्होंने कहा कि अच्छे से सहभागिता नहीं कर पाने को लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं, हम सब एक जैसे ही हैं। परमेश्वर चाहता है हम ईमानदार बनें, लच्छेदार और अव्यावहारिक बातें न करें। अगर मैं दिल से सहभागिता न करूँ, सिर्फ कागजी सिद्धांत की बात करूँ, तो इसका क्या फायदा? इससे मैं बहुत अधिक प्रेरित हुई। वे मेरे बारे में बिल्कुल भी नीचा नहीं सोच रहे थे, कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि वे समझ सकते हैं मैंने ये सब क्यों किया, और मेरे अनुभव से उन्हें मदद मिली है। यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था। अपनी भ्रष्टता के बारे में सबको खुलकर बता देने के बाद, ऐसा लगा जैसे मेरी एक बहुत बड़ी समस्या हल हो गई है। आखिरकार मैं आज़ाद हो गई और अपने शैतानी स्वभाव के बंधनों से बचकर निकल गई। शैतान हमें सत्य पर अमल करने से रोकने के लिए अहंकार और रुतबे का इस्तेमाल करता है, मगर परमेश्वर के वचनों के ज़रिए खुद को जानने और ईमानदार इंसान बनकर दिल से अपनी बात कह देने के बाद, मुझे लगा कि मैं परमेश्वर के और करीब आ गई हूँ, मैंने अपने और भाई-बहनों के बीच की आशंकाओं और बाधाओं को दूर कर दिया है। मैं काफी समय तक अपने अहंकार को त्यागने या सच कहने में कामयाब नहीं हुई, क्योंकि मुझे परमेश्वर की इच्छा की नहीं, बल्कि अपनी इज़्ज़त की परवाह थी। काफी समय तक, मैंने अपने अहंकार को संतुष्ट करने और दूसरों की प्रशंसा का आनंद लेने के लिए भेष धारण किया, मगर परमेश्वर ऐसा नहीं चाहता था। दरअसल, मैं काफी समय से परमेश्वर का दिल दुखा रही थी। मगर परमेश्वर हमेशा मुझे माफ कर देता था और धीरज रखकर मेरे बदलने का इंतज़ार कर रहा था। मैं परमेश्वर के अगाध प्रेम की बहुत आभारी हूँ।

इस अनुभव ने मुझे सत्य का अनुसरण करने का महत्व सिखाया। शैतानी स्वभाव की बेड़ियों से बचने का एकमात्र तरीका है ईमानदार इंसान बनना और सत्य पर अमल करना। सच्ची खुशी और सुकून पाने का एकमात्र तरीका है सत्य को चुनना। मैं बहुत चालाक और पाखंडी थी, मगर अब मैं सत्य पर अमल करके ईमानदार बनने का फैसला करती हूँ। यही मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मैं सिर्फ यही चाहती हूँ कि परमेश्वर मेरा मार्गदर्शन करता रहे, ताकि मैं और अधिक सत्य का अभ्यास कर सकूं।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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