किसी का दिल दुखे तो भी सत्य पर अमल करो

05 अप्रैल, 2022

एप्रिल, फ़िलीपीन्स

मई 2020 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। मैं अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ती, कलीसिया जीवन में बड़े जोश से भाग लेती, और वे काम करती जो मैं कर सकती थी। बाद में, मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया।

एक बार, हमारी कलीसिया को दो सुसमाचार उपयाजकों को जल्द-से-जल्द प्रशिक्षण देना था। मेरे पास सारे योग्य लोगों की सूची थी, मैंने देखा भाई केविन की काबिलियत दूसरों से अच्छी थी, वे काम में उतने व्यस्त भी नहीं थे, वे बैठकों में जोश से संगति करते, सुसमाचार फैलाने के सिद्धांतों पर भी अच्छी पकड़ थी, इसलिए वे उस काम के लिए सही लगे। वहीं बहन जेनेल भी थीं, जो जोश से अपना काम करती थीं, कुछ परिणाम भी दिखाए थे। दूसरों के मुकाबले, उस काम के लिए ये दोनों सही लगे, अगुआ भी मेरे सुझावों को मान गए। मैंने दोनों को सुसमाचार उपयाजक बना दिया। कुछ समय बाद, दोनों ने सुसमाचार उपयाजक की जिम्मेदारियों को अच्छी तरह समझ लिया, मैंने दोनों को स्वतंत्र रूप से अपना काम शुरू करने की इजाजत दे दी, और मैं पूरे जोश से अपने सिंचन कार्य में लग गई। कुछ हफ्ते बाद, पता चला कि हाल में सुसमाचार सुनने वाले कुछ लोगों ने बैठक समूह को छोड़ दिया है, सुसमाचार फैलाने वाले कुछ लोगों के सामने ऐसी मुश्किलें आईं जिन्हें सुलझाना उन्हें नहीं आता था। सुसमाचार कार्य की इन दिक्कतों को देखकर मैंने सोचा, "क्या सुसमाचार उपयाजक व्यावहारिक कार्य कर रहे हैं?" मैंने कार्य की कुछ बारीकियों की जांच की, तो पाया कि सुसमाचार उपयाजक सिर्फ चीजों की व्यवस्था करते थे, खुद वह कार्य नहीं करते थे। बैठकों में वे व्यावहारिक समस्याएँ नहीं सुलझाते थे, बल्कि दूसरे भाई-बहनों से बस अपना काम करने के लिए कहते थे। हालात समझने के बाद, मुझे बड़ी निराशा हुई। कलीसिया उपयाजक के रूप में, व्यावहारिक समस्याएँ न सुलझाना क्या उनकी बेपरवाही नहीं थी? मैंने देखा कि भाई केविन ढंग से काम नहीं कर रहे थे, कई बार वे गेम खेलने चले जाते थे, इस दौरान बहन जेनेल अपने काम में आलसी और गैर-जिम्मेदार हो गई थीं। मैंने उनके साथ संगति करके उनके कामों की समस्याओं के बारे में बताना चाहा, लेकिन हमारी तालमेल अच्छी थी, मैं इस रिश्ते को खराब नहीं करना चाहती थी। मुझे आशा थी कि भाई-बहन मुझे अच्छी, समझदार और विचारशील इंसान मानते होंगे। अगर मैं सीधे-सीधे उनकी समस्याएँ बता दूँ, तो मेरी अच्छी शोहरत खराब हो सकती है। दोनों उपयाजक मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मैं उनके प्रयासों को न देखकर सिर्फ उनकी कमियाँ देखती हूँ, मेरा दिल स्नेही नहीं है? साथ ही, अगर मैंने उनकी समस्याएँ बताईं, और वे स्वीकार न सकें, अपने काम में निष्क्रिय और अनिच्छुक हो जाएं, तो क्या मेरे भाई-बहन सोचेंगे कि मैं अगुआ का कार्य करने लायक नहीं हूँ? मैं एक बुरी अगुआ हूँ? मेरी अगुआ इस बारे में पूछें, तो शायद मेरा निपटान करें। यह सोचकर, मैंने उनकी समस्याएँ नहीं बताईं। कई बार सोचती कि कलीसिया के कार्य की प्रभारी होने के नाते, उनकी समस्याओं के बारे में बताना मेरी जिम्मेदारी थी, ताकि वे आत्मचिंतन कर सकें। फिर भी मैं कह नहीं पाई। इसके बजाय, मैंने उन्हें परमेश्वर के हिम्मत और सुकून देनेवाले कुछ वचन भेजे, उनसे विनम्रता से कहा कि अपना काम अच्छे से कैसे करना चाहिए, दूसरों के साथ मिल-जुल कर कैसे सहयोग करना चाहिए। मैंने उनके काम की समस्याओं के बारे में नहीं बताया। बाद में, मुझे अपराध बोध हुआ। लगा मैं बेईमान और कपटी हूँ।

एक रात, मैं सो नहीं पाई, सोचती रही कि कैसे प्रभावहीन सुसमाचार कार्य सीधे मुझसे जुड़ा हुआ है। मैंने देखा कि दो सुसमाचार उपयाजक अपने काम में गैर-जिम्मेदार हैं, सुसमाचार का प्रचार करनेवाले भाई-बहनों की समस्याएँ नहीं सुलझाते हैं, जिससे भाई-बहन काफी दबाव में हैं, जिसके कारण नये सदस्य बैठक समूह छोड़कर जाने लगे हैं, फिर भी मैंने उनकी समस्याएँ नहीं बताईं। मैंने दिल में अपराध बोध महसूस किया, समझ नहीं सकी अब क्या करूँ, मैंने परमेश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, भाई-बहनों की अच्छे से अगुआई न कर पाने के कारण बहुत दोषी महसूस कर रही हूँ। मुझे प्रबुद्ध करो, इस समस्या को सुलझाने का रास्ता दिखाओ।" प्रार्थना के बाद, मैंने अनुभव की गवाही का एक वीडियो देखा, जिसमें शामिल परमेश्वर के वचनों से मुझे बहुत प्रेरणा मिली। परमेश्वर के वचन कहते है, "विवेक और सूझ-बूझ दोनों ही व्यक्ति की मानवता के घटक होने चाहिए। ये दोनों सबसे बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण हैं। वह किस तरह का व्यक्ति है जिसमें विवेक नहीं है और सामान्य मानवता की सूझ-बूझ नहीं है? सीधे शब्दों में कहा जाये तो, वह ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता का अभाव है, वह बहुत ही खराब मानवता वाला व्यक्ति है। अधिक विस्तार में जाएं तो ऐसा व्यक्ति किस लुप्त मानवता का प्रदर्शन करता है? विश्लेषण करो कि ऐसे लोगों में कैसे लक्षण पाए जाते हैं और वे कौन-से विशिष्ट प्रकटन दर्शाते हैं। (वे स्वार्थी और निकृष्ट होते हैं।) स्वार्थी और निकृष्ट लोग अपने कार्यों में लापरवाह होते हैं और अपने को उन चीज़ों से अलग रखते हैं जो व्यक्तिगत रूप से उनसे संबंधित नहीं होती हैं। वे परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करते हैं और परमेश्वर की इच्छा का लिहाज नहीं करते हैं। वे परमेश्वर की गवाही देने या अपने कर्तव्य को करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं और उनमें उत्तरदायित्व की कोई भावना होती ही नहीं है। ... कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ पर कोई जिम्मेदारी नहीं लेते। वे अपने वरिष्ठों को पता चलने वाली समस्याओं की रिपोर्ट भी नहीं करते। जब वे लोगों को दखलंदाजी करते और उपद्रवी होते देखते हैं, तो वे आँखें मूँद लेते हैं। जब वे दुष्ट लोगों को बुराई करते देखते हैं, तो वे उन्हें रोकने की कोशिश नहीं करते। वे परमेश्वर के घर के हितों पर थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं देते, न ही इस बात पर कि उनका कर्तव्य और जिम्मेदारी क्या है। जब ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो वे कोई वास्तविक कार्य नहीं करते; वे हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग होते हैं जो सुविधा के लालची होते हैं; वे केवल अपने घमंड, साख, हैसियत और हितों के लिए बोलते और कार्य करते हैं, और अपना समय और प्रयास निश्चित रूप से किसी भी ऐसी चीज में लगाते हैं, जिससे उन्हें लाभ होता है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। मैंने परमेश्वर के वचन दो बार पढ़े, और बहुत दुखी हो गई। मैं सोचती थी, मेरी इंसानियत अच्छी है, मैं सब्र के साथ अपने भाई-बहनों की मदद कर रही हूँ, मुझे सुसमाचार उपयाजकों की परवाह है। काम करते समय, हमेशा दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखती हूँ, उनका दिल नहीं दुखाना चाहती। सोचती कि यह परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखना है, मैं एक अच्छी इंसान हूँ। लेकिन जब मैंने देखा कि दोनों उपयाजक कलीसिया के कार्य के प्रति गैर-जिम्मेदार हैं, तो उन्हें काम में गैरजिम्मेदार होने का एहसास दिलाने के लिए, उनकी समस्याएँ नहीं बताईं। इसके बजाय, मैंने उन्हें पुचकारा, क्योंकि मुझे डर था कि समस्याएँ बताने से हमारा रिश्ता टूट जाएगा। यह भी फिक्र थी कि मैंने उन्हें नकारात्मक बना दिया, तो अगुआ मुझे डांटेंगी, मेरे भाई-बहन मुझे गलत समझेंगे, इसलिए मैंने उनके साथ अपना रिश्ता, अपनी छवि और रुतबा बचाए रखना चाहा, उनके साथ संगति के लिए सिर्फ हिम्मत और सुकून देनेवाले परमेश्वर के वचन भेजे। नतीजतन, वे अपनी समस्याएँ नहीं पहचान पाए, समय रहते प्रायश्चित करके बदल नहीं पाए। अपनी छवि और निजी हितों के लिए मैंने कलीसिया के कार्य का ध्यान नहीं रखा। परमेश्वर की इच्छा का कोई मान नहीं रखा, मैं नेक इंसान नहीं थी। दरअसल, अच्छी इंसानियत वाले लोग सच्चे होते हैं, सत्य पर अमल करके, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कर पाते हैं, दूसरों के साथ संगति करने, उनकी समस्याएँ उजागर कर उन्हें बदलने में मदद करने की हिम्मत रखते हैं, और अपने भाई-बहनों से सच्चे दिल से पेश आते हैं। लेकिन मैं? मैंने उपयाजकों की समस्याएँ देखकर भी कुछ नहीं कहा, अपने निजी हितों को बचाने के लिए परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान होने दिया। मेरी इंसानियत इतनी बुरी थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और खुद के बारे में थोड़ी समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "कलीसिया के कुछ अगुआ अपने भाई-बहनों को अपने कर्तव्य लापरवाही और मशीनी ढंग से निभाते देख फटकार नहीं लगाते, हालाँकि उन्‍हें ऐसा करना चाहिए। जब वे कुछ ऐसा देखते हैं जो परमेश्‍वर के घर के हितों के लिए स्पष्ट रूप से हानिकारक है, तो वे आँख मूँद लेते हैं, और कोई पूछताछ नहीं करते, ताकि दूसरों के थोड़े भी अपमान का कारण न बनें। उनका असली उद्देश्य और लक्ष्‍य दूसरों की कमज़ोरियों का लिहाज करना नहीं है—वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि उनका मंतव्य क्‍या है : 'अगर मैं इसे बनाए रखूँ और किसी के भी अपमान का कारण न बनूँ, तो वे सोचेंगे कि मैं अच्‍छा अगुआ हूँ। मेरे बारे में उनकी अच्‍छी, ऊँची राय होगी। वे मुझे मान्यता देंगे और मुझे पसंद करेंगे।' परमेश्‍वर के घर के हितों को चाहे जितनी अधिक क्षति पहुँची हो, और परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को उनके जीवन प्रवेश में चाहे जितना अधिक बाधित किया जाए, या कलीसिया का उनका जीवन चाहे जितना अधिक अशांत हो, ऐसे लोग अपने शैतानी फलसफ़े पर अड़े रहते हैं और किसी को नुकसान नहीं पहुँचाते। उनके दिलों में कभी भी आत्म-धिक्कार का भाव नहीं होता; बहुत-से-बहुत, वे चलते-चलते कुछ मुद्दों का आकस्मिक उल्लेख भर कर सकते हैं, और फिर बस हो गया। वे सत्‍य की सहभागिता नहीं करते, न ही वे दूसरों की समस्‍याओं का मूलतत्त्व बताते हैं, और लोगों की दशाओं का विश्‍लेषण तो वे और भी नहीं करते। वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश के लिए लोगों की अगुआई नहीं करते, न ही वे बतलाते हैं कि परमेश्‍वर की इच्‍छा क्‍या है, या लोग अकसर कैसी ग़लतियाँ करते हैं, या लोग किस तरह के भ्रष्‍ट स्‍वभाव प्रकट करते हैं। वे इन जैसी व्‍यावहारिक समस्‍याओं को हल नहीं करते; इसकी बजाय, वे दूसरों की कमज़ोरियों और नकारात्‍मकता के प्रति, यहाँ तक कि उनकी लापरवाही और मशीनी ढंग के प्रति भी हमेशा दयालु होते हैं। वे इन लोगों के कृत्‍यों और व्यवहारों को उनकी वास्तविकता का ठप्पा लगाए बिना जाने देते हैं, और, ठीक इसीलिए कि वे ऐसा करते हैं, अधिकांश लोग सोचने लगते हैं : 'हमारा अगुआ तो हमारे लिए माँ जैसा है। हमारी कमज़ोरियों के प्रति उनमें परमेश्‍वर से कहीं ज्‍़यादा समझ-बूझ है। हमारा आध्यात्मिक कद परमेश्‍वर की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की दृष्टि से काफ़ी छोटा हो सकता है, लेकिन हमें केवल अपने अगुआ की अपेक्षाएँ पूरी करने की आवश्यकता है; अपने अगुआ का अनुसरण करके हम परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। अगर कोई दिन ऐसा आए जब उच्च हमारे अगुआ को बदल दे, तो हम जोर-जोर से बोलेंगे; अपने अगुआ को रखने और उसे उच्च द्वारा बदले जाने से रोकने के लिए उच्च से बातचीत करेंगे और उसे अपनी माँगों पर सहमत होने के लिए मजबूर करेंगे। इस तरह हम अपने अगुआ के साथ उचित व्यवहार करेंगे।' जब लोगों के मन में ऐसे विचार होते हैं, जब उनका अगुआ के साथ निर्भरता का संबंध होता है, और अपने दिलों में वे अपने अगुआ के प्रति निर्भरता, प्रशंसा, आदर और सम्मान महसूस करते हैं, और ऐसा लगता है जैसे उस अगुआ ने उनके दिलों में परमेश्वर की जगह ले ली हो, और अगर अगुआ इस रिश्ते को बनाए रखने का इच्छुक होता है, अगर अगुआ के दिल में इससे आनंद की भावना उत्पन्न होती है, और वह मानता है कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए, तो उसके और पौलुस के बीच कोई फर्क नहीं रहता, और वह पहले ही मसीह-विरोधियों के मार्ग पर कदम रख चुका होता है। ... मसीह-विरोधी वास्तविक कार्य नहीं करते, वे सत्य की संगति और समस्याओं का समाधान नहीं करते, वे परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने में लोगों का मार्गदर्शन नहीं करते। वे केवल हैसियत और प्रसिद्धि के लिए काम करते हैं, वे केवल खुद को स्थापित करने की परवाह करते हैं, लोगों के दिलों में अपने स्थान की रक्षा करते हैं, और सबसे अपनी आराधना करवाते हैं, अपना सम्मान करवाते हैं, और अपना अनुसरण करवाते हैं; इस तरह वे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। मसीह-विरोधी इसी तरह लोगों को जीतने और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। क्या काम करने का यह तरीका बुरा नहीं है, क्या यह घृणित नहीं है? यह घृणित है!" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों का दिल जीतना चाहते हैं')। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ने के बाद, मैंने घोर शर्मिंदगी महसूस की। परमेश्वर के वचन मेरी हालत को बयान करते थे। मैं समझ गई कि दोनों उपयाजक वास्तविक काम नहीं करते थे, समस्या बहुत गंभीर थी, मुझे संगति के लिए उन वचनों को चुनना था जो लोगों का न्याय कर भ्रष्ट स्वभाव को सामने लाते हैं, ताकि वे अपनी समस्याएँ समझ सकें और काम के प्रति अपना रवैया बदल सकें। इससे उनका कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचाना बंद हो जाता। लेकिन उनके साथ अपना रिश्ता बनाए रखने के लिए, अपनी अच्छी छाप छोड़ने के लिए, मैंने उनकी समस्याओं का सार उजागर नहीं किया, बल्कि परमेश्वर के सुकून-भरे वचनों से उनका हौसला बढ़ाया। लगा, ऐसा करने से वे मुझे एक अच्छी अगुआ मानेंगे, मेरे बारे में अच्छी राय रखेंगे, मुझे स्वीकार करेंगे और पसंद करेंगे। मैं बहुत स्वार्थी और नीच थी! मैंने समय रहते उन दोनों उपयाजकों की समस्याएँ नहीं बताईं, नए सदस्य समय रहते अपनी धारणाएँ ठीक नहीं कर पाए, हाल में सुसमाचार स्वीकार करने वाले दूसरे लोग बैठक समूह छोड़ कर चले गए। मुझे एहसास हुआ कि यह मेरा किया-धरा था। एक अगुआ का काम कलीसिया के उपयाजकों और समूह अगुआओं के काम की निगरानी और जाँच करना और समय रहते समस्याएँ सुलझाना है। हमें अपने भाई-बहनों के हालात को जानना चाहिए, जब कोई सिद्धांतों का उल्लंघन करने या कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचाने वाले काम करे, तो हमें प्रेम से संगति करके उनकी मदद करनी चाहिए। संगति से भी चीजें न बदलें, तो हमें उनकी काट-छाँट, निपटान या फिर उन्हें बर्खास्त करना होगा। परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करने का बस यही एक रास्ता है। लेकिन एक कलीसिया अगुआ होने के नाते, मैं न सिर्फ गैर-जिम्मेदार थी, बल्कि शैतान की चाकरी कर रही थी, परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा डाल रही थी। कितनी शर्मिंदगी की बात थी! चीजों को ऐसा होते देखकर मैंने अपमानित और दुखी महसूस किया। ये समस्याएँ इसलिए आईं, क्योंकि मैंने एक अगुआ की तरह काम नहीं किया। अगर मैंने संगति कर उनकी समस्याओं को उजागर किया होता, तो कलीसिया के कार्य को ऐसा नुकसान नहीं पहुँचाया होता, मैं एक झूठी अगुआ थी, जिसने कोई वास्तविक कार्य नहीं किया। मैंने सत्य को समझने में भाई-बहनों की मदद नहीं की, उन्हें परमेश्वर के सामने नहीं ला सकी। मैंने हमेशा यही चाहा कि वे मुझे स्वीकार कर मेरा बचाव करें, ताकि उनके मन में मेरी अच्छी छवि रहे, उनके दिलों में मेरा रुतबा बना रहे। मैं परमेश्वर का प्रतिरोध करने के मसीह-विरोधी मार्ग पर चल रही थी। परमेश्वर के वचन के न्याय के बिना, पता नहीं मैं कौन-सा कुकर्म कर डालती।

यह जानकर, मुझे अपने कर्मों पर बड़ा पछतावा हुआ, मैंने सच्चे दिल से परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मैं जान नहीं पाई कि मेरा स्वार्थ कलीसिया के कार्य को ऐसा नुकसान पहुँचाएगा, मेरे भाई-बहनों के जीवन को खतरे में डाल देगा। मैं ऐसी अहम आज्ञा का पालन करने लायक नहीं हूँ। मैं प्रायश्चित करना चाहती हूँ। उन भाई-बहनों को वापस लाना चाहती हूँ, जिन्होंने हाल ही में सुसमाचार स्वीकार किया था। मुझे आत्मचिंतन करने का रास्ता दिखाओ, ताकि मैं वो गलतियाँ न दोहराऊँ।" प्रार्थना करने से मेरी हालत में थोड़ा सुधार हुआ, पर अभी भी बहुत दोषी महसूस कर रही थी। लगा मैं एक पापी हूँ, मानो मेरा हर काम शैतान का है, मुझ जैसे लोग बचाये नहीं जा सकते, मेरे लिए कोई उम्मीद नहीं रही। उस वक्त, एक बहन ने चैट समूह में परमेश्वर के कुछ वचन भेजे। परमेश्वर के वचन में कहा गया है, "असफलता, कमजोरी और नकारात्मकता के समय के तुम्हारे समस्त अनुभव परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परीक्षण कहे जा सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हर चीज परमेश्वर से आती है, और सभी चीजें और घटनाएँ उसके हाथों में हैं। तुम असफल होते हो या कमजोर होते और ठोकर खा जाते हो, यह सब परमेश्वर पर निर्भर करता है और उसकी मुट्ठी में है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, यह तुम्हारा परीक्षण है, और अगर तुम इसे नहीं पहचान सकते, तो यह प्रलोभन बन जाएगा। दो प्रकार की अवस्थाएँ हैं, जिन्हें लोगों को पहचानना चाहिए : एक पवित्र आत्मा से आती है, और दूसरी का संभावित स्रोत शैतान है। एक अवस्था वह है, जिसमें पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करता है और तुम्हें स्वयं को जानने, अपना तिरस्कार करने, खुद पर पछताने, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम रखने में समर्थ होने और अपना दिल उसे संतुष्ट करने पर लगाने देता है। दूसरी अवस्था वह है, जिसमें तुम स्वयं को जानते हो, लेकिन तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो। कहा जा सकता है कि यह अवस्था परमेश्वर द्वारा शोधन है, और यह भी कि यह शैतान का प्रलोभन है। अगर तुम यह जानते हो कि यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार है और अनुभव करते हो कि अब तुम गहराई से उसके ऋणी हो, और अगर अब से तुम उसका कर्ज चुकाने का प्रयास करते हो और इस तरह की भ्रष्टता में अब और नहीं पड़ते, अगर तुम उसके वचनों को खाने-पीने का प्रयास करते हो, और अगर तुम हमेशा यह महसूस करते हो कि तुम में कमी है, और लालसा भरा हृदय रखते हो, तो यह परमेश्वर द्वारा परीक्षण है। जब कष्ट समाप्त हो जाता है और और तुम एक बार फिर से आगे बढ़ने लगते हो, तो परमेश्वर तब भी तुम्हारी अगुआई करेगा, तुम्हें रोशन करेगा, तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा पोषण करेगा। लेकिन अगर तुम इसे नहीं पहचानते और नकारात्मक होते हो, स्वयं को निराशा में छोड़ देते हो, अगर तुम इस तरह से सोचते हो, तो तुम्हारे ऊपर शैतान का प्रलोभन आ चुका होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा')। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़कर, मुझे सुकून मिला, आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी पैदा हुआ। जब पहले मैंने परमेश्वर के कठोर वचन पढ़े थे, जिनमें परमेश्वर ने मेरी भ्रष्टता का खुलासा किया था, तो यह दुखी और परेशान करनेवाला था, लगा था मानो मेरी निंदा की गई है, मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए मैं नकारात्मक और कमजोर हो गई थी। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा, तो मैंने उसकी इच्छा समझ ली। अगर लोग अपने कामों में परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा न करें, उन्हें उजागर कर निपटान किया जाए, तो उनका नकारात्मक और कमजोर महसूस करना आम बात है। अगर मैं अपनी नाकामी में सत्य खोजकर आत्मचिंतन कर सकती, तो यह मेरे लिए सबक सीखने का मौका था। अगर मैं नकारात्मक हो जाऊँ, पीछे हट जाऊँ, या खुद को बेकार समझ लूँ, तो मैं शैतान की चाल में फँस जाऊँगी और प्रलोभन में डूब जाऊंगी। मैं समझ गई कि परमेश्वर के न्याय और लोगों के भ्रष्ट स्वभाव का ख़ुलासा करने के पीछे परमेश्वर का प्रेम है। परमेश्वर चाहता है कि हम खुद को जानें, अपनी नाकामियों से सीखें, और शैतानी स्वभाव के काबू में न रहें। यह अच्छी बात है, बढ़ने का मौका है। अब मैंने न तो नकारात्मक महसूस किया, न ही परमेश्वर को गलत समझा। मुझे परमेश्वर के वचन और सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना था। अब न तो मैं दैहिक सुख के पीछे भाग रही थी और न ही शोहरत और रुतबे को बचा रही थी।

फिर, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : "तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए चीज़ें न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। "हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी हैसियत, गौरव और प्रतिष्ठा पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा की परवाह करनी चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, तू वफादार रहा है या नहीं, तूने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के इन वचनों ने मेरी मदद की। परमेश्वर के वचन से मैंने समझा कि परमेश्वर कपटी लोगों से घृणा और सच्चे लोगों से प्रेम करता है। सच्चे लोग परमेश्वर के घर के हितों और अपने भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश की रक्षा करते हैं। जब सच्चे लोग अगुआ होते हैं, तो कलीसिया का कार्य कभी नहीं पिछड़ता। मुझे परमेश्वर के घर के हितों को आगे रखना था, ईमानदारी से दोनों उपयाजकों की समस्याओं का सामना करना था। उनके कर्मों के बारे में संगति कर उन्हें उजागर करना था, ताकि वे अपनी समस्याओं की गंभीरता समझें, सच्चाई से प्रायश्चित करें, और फिर से जिम्मेदारी से काम करने लगें। अगर वे मेरी संगति के बाद भी नहीं बदल सके, तो कलीसिया के कार्य की रक्षा के लिए उन्हें बर्खास्त करना होगा।

फिर, मुझे परमेश्वर के कुछ वचन मिले, मैंने भाई केविन के साथ पहले संगति करके उन्हें बताया कि ये समाजिक रुझान शैतान के प्रलोभन हैं, उन्हें अपने दैहिक सुखों को छोड़ना होगा। फिर मैंने बहन जेनेल के साथ संगति की, कामों की जिम्मेदारी उठाने में उनकी कमियों के बारे में बताया, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने को कहा। मुझे अचरज हुआ कि मेरी संगति के बाद, दोनों ही काम के प्रति अपना रवैया बदलने और अपने व्यवहार में सुधार करने को तैयार हो गये। बाद में, भाई केविन ने कुछ बदलाव भी किए, जब उन्हें दोबारा प्रलोभन दिया गया, तो सचेत होकर उन्होंने अपने देह-सुख का त्याग किया, जबकि बहन जेनेल अपना काम पहले से अधिक जोश से संभाल पा रही थीं। यह परिणाम देखने के बाद, मैंने उनकी समस्याओं के बारे में पहले न बताने के लिए खुद को दोष दिया। समझ गई कि जो लोग सत्य स्वीकार करते हैं, वे उजागर करके सलाह दिये जाने पर नकारात्मक नहीं होते। वे इससे खुद को जान पाते हैं, सच में प्रायश्चित करते हैं, परमेश्वर के साथ बेहतर सहयोग करते हैं। यह अनुभव पाकर मैं बहुत खुश हूँ। परमेश्वर के वचन के न्याय और प्रकाशन का अनुभव करके मुझे अपनी भ्रष्टता की थोड़ी समझ मिली। मैंने यह भी अनुभव किया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन ही सत्य हैं, ये लोगों को बदल कर उन्हें बचा सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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