पागलखाने से बाहर

05 अप्रैल, 2022

क्षीयोकाओ, चीन

जनवरी 2012 की बात है। एक पड़ोसी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार मेरे साथ साझा किया, मैं अपना व्यापार चलाते हुए थक चुकी थी, उससे मुझे कमर की मांसपेशियों में भारी ऐंठन और कंधे में अकड़न हो गई थी। इतना ज्यादा दर्द था कि मैं बड़ी मुश्किल से बालों में कंघी कर पाती थी या कपड़े पहन पाती थी, और दवा से कोई फायदा नहीं हो रहा था। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद मैं चमत्कारी ढंग से ठीक होने लगी, इसलिए मेरे पति और बेटे रोमांचित थे और वे सच में मेरी आस्था का समर्थन कर रहे थे। लेकिन कुछ महीने बाद मेरे पति ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा ऑनलाइन फैलाए गए कुछ झूठ देखे, और उन्होंने मेरी आस्था का विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, "सरकार तुम्हारे इस परमेश्वर के खिलाफ है। अगर तुम इसके लिए गिरफ्तार हो गई, तो इससे हमारे बेटे के करियर पर असर पड़ेगा। तुम्हें इसे छोड़ देना चाहिए।" एक बार मैं सुसमाचार साझा करके वापस लौटी ही थी, कि उन्होंने चेहरे पर गुस्से के भाव लाते हुए कहा, "राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड ने मुझे बुलाकर पूछा कि क्या तुम एक विश्वासी हो, अगर हाँ, तो तुम्हें परमेश्वर संबंधी अपनी किताबें सौंपनी होंगी। उन्होंने मुझे तस्वीरों का एक पुलिंदा दिखाकर लोगों की पहचान करने को भी कहा। अगर तुम इस पर कायम रही, तो तुम्हें जरूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा।" मैंने जवाब दिया, "मैं जीवन में सही रास्ता अपना रही हूँ, और मैंने कुछ भी गैरकानूनी नहीं किया है। उन्हें मुझे गिरफ्तार करने का कोई अधिकार नहीं है!" उन्होंने कहा, "तुम बहुत भोली हो! सीसीपी तुम जैसे विश्वासियों को खास तौर पर तंग करती है। अगर तुम विश्वास पर कायम रही, तो वह तुम्हें गिरफ्तार करके मार-पीट सकती है। फिर तुम देखोगी कि वे कितने खतरनाक हैं।" मैंने मन-ही-मन सोचा, कि मेरे पति के विरोध के कारण इस रास्ते पर चलना यकीनन बहुत मुश्किल हो जाएगा। मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना करके उससे आगे के रास्ते पर मेरा मार्गदर्शन करने की विनती की। मैंने यह भी संकल्प लिया कि भले ही मेरे पति किसी भी तरह मेरे आड़े आएँ, मैं अपनी आस्था कभी नहीं छोड़ूँगी।

यह दिसंबर 2012 की बात है, मेरे विश्वासी बनने के करीब एक साल बाद। मुझे गिरफ्तार कर पाँच दिन के लिए हिरासत में रखा गया था, क्योंकि किसी ने मेरे सुसमाचार का प्रचार करने की शिकायत कर दी थी। जिस दिन उन्होंने मुझे रिहा किया, एक अफसर ने मुझे चेतावनी दी, "बेहतर होगा, बाहर जाकर तुम इसे छोड़ दो, वरना तुम यकीनन जेल जाओगी!" करीब आधे घंटे बाद मेरे पति मुझे लेने आए, वे बहुत बेचैन थे और उनके चेहरे पर अजीब-से भाव थे। वे कार से उतरकर पुलिस-कार्यालय में चले गए। वहाँ अंदर उनके बीच क्या बातचीत हुई, मुझे कुछ पता नहीं चला, और फिर वे मुझे घर ले गए। वहाँ पहुँचने पर मैंने देखा, मेरा भाई, बहन और जीजाजी सभी बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैंने सोचा, इन सबके यहाँ इकट्ठा होने का एकमात्र मकसद मुझे अपनी आस्था का अभ्यास करने से रोकना है। तिस पर, मेरा भाई राष्ट्रीय स्तर का नेता था, उसने मुझसे पहले भी इसे छोड़ देने को कहा था, क्योंकि उसने ऑनलाइन जाकर कम्युनिस्ट पार्टी के तरह-तरह के झूठ देखे थे, जिनमें कलीसिया की निंदा और तिरस्कार किया गया था। उसने यह भी कहा था कि मेरी आस्था मेरे बेटे के करियर पर बुरा असर डाल सकती है, और खुद उस पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है, वह अपना अफसर का पद खो सकता है। मैं जानती थी कि शायद वह यहाँ फिर से मुझ पर आस्था छोड़ने के लिए दबाव डालने आया है। मैंने जल्दी से प्रार्थना करके परमेश्वर से इन बाधाओं से मेरी रक्षा करने की विनती की। मेरे कार से उतरते ही मेरे भाई ने मेरे पास आकर मुस्कराते हुए कहा, "तुम्हें यह परमेश्वर वाला काम बंद कर देना चाहिए। बस, घर पर रहो, और यहाँ चीजों की देखभाल करो। इतनी अड़ियल मत बनो। तुम्हारे बेटे के पास अच्छी नौकरी है, अगर तुम ये सब करती रही, तो वह खतरे में पड़ जाएगी। वह तुमसे हमेशा घृणा करेगा।" फिर मेरे जीजाजी अपने दाँत भींचकर हाथ यहाँ-वहाँ घुमाते हुए मुझ पर चिल्लाने लगे, "परमेश्वर में आस्था? कहाँ है परमेश्वर? मैं उसमें विश्वास नहीं रखता, फिर भी अच्छी-खासी जिंदगी जी रहा हूँ!" फिर मेरे पति ने गुस्से से कहा, "हमारे बेटे के लिए अच्छी नौकरी पाना, सबके बीच चमकना आसान नहीं था, अगर तुम्हारी आस्था के कारण उसकी नौकरी चली गई तो?" मेरी बहन ने आगे आकर मुझसे कहा, "सुन, तुझे यह छोड़ देना चाहिए। तेरे पति तुझे बहुत अच्छे से रखते हैं, तेरे बेटे के पास अच्छी नौकरी है। यह काफी होना चाहिए। बस, अपने परिवार का ठीक से ध्यान रख।" यह सब सुनकर मैंने सोचा, कि अपने बेटे की शिक्षा की खातिर मेरे पति और मैंने पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत की थी, और अब उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई है, जो कोई आसान बात नहीं है। अगर मेरी आस्था के कारण वाकई उसकी नौकरी छूट गई, तो शायद पूरी जिंदगी वह मुझसे नफरत करे! लेकिन फिर मैंने सोचा कि अपनी आस्था छोड़ देना परमेश्वर को धोखा देना होगा, और मैंने उन सत्यों को याद किया जो मैंने एक विश्वासी के रूप में जाने थे। मैं जानती थी कि एक सृजित प्राणी के लिए परमेश्वर की आराधना करना सही चीज है, चलने का सही मार्ग है, और परमेश्वर ने मेरे घाव भी भरे हैं। मैं इतनी विवेकशून्य नहीं हो सकती। मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मेरा परिवार मुझे मेरी आस्था छोड़ने पर मजबूर करने की कोशिश कर रहा है, और मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मुझे आस्था और शक्ति दो।" फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया : "परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है')। मैं समझ गई कि मेरे परिवार का मेरे खिलाफ एकजुट होना वास्तव में शैतान द्वारा मेरी परीक्षा लेना और मुझ पर हमला करना था। मेरा परिवार पार्टी के झूठ से प्रभावित हो गया था, और मुझे डराने के लिए मेरे बेटे की नौकरी का इस्तेमाल कर रहा था, ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ। मैं शैतान की चाल में नहीं फँस सकती थी, बल्कि मुझे परमेश्वर की गवाही देनी थी। फिर मेरे मन में यह बात भी कौंधी कि मेरे बेटे के पास जो भी नौकरी है, वह परमेश्वर के शासन और व्यवस्थाओं की बदौलत है। कोई भी उसे बदल नहीं सकता। इसलिए मैंने कहा, "आस्था रखना जीवन का सही मार्ग है, और मैंने कोई नियम नहीं तोड़ा है। कम्युनिस्ट पार्टी का मुझे गिरफ्तार करना और आप सबको इसमें घसीटना पार्टी की दुष्टता है। उसके साथ मिलकर आपको मेरा दमन नहीं करना चाहिए, मेरी आस्था में आड़े नहीं आना चाहिए। आप सभी जानते हैं, परमेश्वर में विश्वास रखने से पहले मेरे घाव इतने गहरे थे कि मैं खुद उनका खयाल नहीं रख पाई थी। आस्था हासिल करने के बाद मैं बिलकुल ठीक हो गई, और यह सब परमेश्वर की कृपा और आशीष के कारण था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है, वह उद्धारकर्ता बनकर आया है। आपदाएँ बड़ी से बड़ी होती जा रही हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अनेक सत्य व्यक्त किए हैं। उसने मनुष्य को पापों और आपदाओं से बचाने के लिए ऐसा किया है, ताकि हमें उसकी रक्षा मिल सके और हम आपदाओं से बचकर उसके राज्य में प्रवेश कर सकें। अगर मैं कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सताए जाने से डरकर अपनी आस्था छोड़ दूँ, तो उद्धार का अपना मौका खो दूँगी। आप लोग चाहे जितना भी विरोध करें, मैं अपनी आस्था के प्रति प्रतिबद्ध हूँ।" मेरे पति पूरी तरह आवेश में आकर मेरे सामने खड़े हो गए और मुझ पर उँगली उठाते हुए बोले, "तुम किसी काम की नहीं हो!" फिर उन्होंने और मेरे भाई ने एक-दूसरे की तरफ देखा, और वे साथ-साथ घर की ओर चले गए, और न जाने किस बारे में बात करने लगे। मैं बड़ी उलझन में थी। ऐसे नजर बचाकर ये क्या बातें कर रहे हैं? जल्दी ही वे वापस लौट आए, मेरे भाई ने मेरी बहन की ओर देखा, फिर एक रहस्यमय मुस्कान के साथ बोला, "चलो, कुछ खाने के लिए लेकर आते हैं!" मेरी बहन और मेरे जीजाजी मुझ पर झपट पड़े, दोनों ने मेरा एक-एक हाथ पकड़कर मुझे कार की और खींचा। मुझे लगा, कुछ तो गड़बड़ है। मैंने उनके हाथ झटकने की कोशिश की, और कहा कि मुझे नहीं जाना, लेकिन उन्होंने बस मुझे कार के अंदर धकेल दिया। करीब आधे घंटे चलने के बाद कार रुक गई, देखकर मुझे अचरज हुआ कि हम एक मानसिक अस्पताल में थे। मेरे पति, भाई और जीजा सब कार से उतर गए। मैं चौंक गई। क्या वे सच में मुझे पागलखाने भेज रहे हैं? मैं सोचने लगी कि मुझे कार से निकलकर भागना होगा, लेकिन सुरक्षा-ताले के कारण मैं अंदर बंद थी। मैंने उन सबको अस्पताल के कार्यालय की ओर जाते देखा, तो एकाएक सब-कुछ स्पष्ट हो गया। उन्होंने पूरे समय इसकी योजना बनाई थी। उन्होंने मुझे यह कहकर यहाँ आने के लिए बरगलाया था कि खाने के लिए बाहर जा रहे हैं। मैं नाराज और चिढ़ी हुई थी। मुझे यकीन नहीं हुआ कि ये मुझे यहाँ ले आए हैं, ये सब कितने बेरहम हैं। तथाकथित प्रियजन! मुझे याद आया कि जब मेरे पति मुझसे पुलिस-थाने में मिले थे, तब उन्होंने अंदर पुलिसवाले से थोड़ी देर बात की थी, और मेरे परिवार के लोग खाना खाने जाने की बात पर कैसे एक-दूसरे को आँखों-ही-आँखों में इशारे कर रहे थे। मुझे एहसास हुआ कि शायद यह योजना कम्युनिस्ट पार्टी ने बनाई होगी। वे मुझसे परमेश्वर को धोखा दिलवाने की भरसक कोशिश कर रही थे। मैं इतनी बेचैन थी कि बयान नहीं कर सकती, मेरी आँखों से आँसू छलक रहे थे। मैंने उनसे गुस्से से कहा, "मैं परमेश्वर में विश्वास रखती हूँ, इसलिए आप सब मुझे यातना देने के लिए यहाँ लाए हैं। पागल तो आप सब हैं! आप जो कर रहे हैं, वह सरासर गलत है, समझ से परे है। आपको इसके लिए फटकार मिलेगी।" तभी अस्पताल से कुछ अर्दली मुझे बाँधने के लिए कुछ बेड़ियाँ लेकर बाहर आए। मेरे पति, भाई और जीजाजी बस वहाँ खड़े मुझे देखते रहे, एक शब्द भी नहीं बोले। मेरा दिल टूट चुका था, मैं बिलकुल मायूस थी। मैंने कभी बुरे-से-बुरे सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि मेरा परिवार, सिर्फ अपने हितों की रक्षा के लिए, फँसाए जाने से बचने के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी के झूठ सुनेगा और मुझे एक मानसिक अस्पताल में डाल देगा, जहाँ मेरे बिलकुल स्वस्थ होने के बावजूद, मेरे जीने-मरने का खयाल किए बिना मुझे यातना दी जाएगी। ये सब प्रियजन नहीं—दानव हैं। यह सोचकर मैं अपने आँसू नहीं रोक पाई। मैंने उनकी तरफ देखा भी नहीं। मैंने अर्दलियों से गुस्से से कहा, "मुझे कोई बीमारी नहीं है! ये मुझे फँसाकर यहाँ लाए हैं। ये यहाँ मुझे इलाज के लिए मजबूर कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि मैं परमेश्वर में विश्वास रखती हूँ। आपने इस पर गौर भी नहीं किया है। आप मुझे बाँध क्यों रहे हैं?" लेकिन उन्होंने मेरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।

उन्होंने मुझे गंभीर रूप से विक्षिप्त मरीज के रूप में दाखिल कर लिया और मुझे वार्ड 1 में बंद कर ताला लगा दिया, जहाँ सभी गलियारों, दरवाजों और खिड़कियों में धातु की छड़ें लगी थीं। मेरा कमरा तकरीबन 40-50 वर्गफुट का था, और बिलकुल खाली था। उसमें बस एक खाट और उस पर एक गंदी-सी रजाई पड़ी हुई थी, जिस पर अभी भी पेशाब के पुराने धब्बे लगे हुए थे। पेशाब की बहुत तेज बदबू आ रही थी। कमरे में संडास नहीं था, हॉल में स्त्री-पुरुष दोनों के लिए बस एक ही बाथरूम था, जिस पर ताला लगा था। जब भी बाथरूम जाने की जरूरत पड़ती, मुझे अर्दली को ढूँढ़ना पड़ता, अगर वे व्यस्त होते, तो दरवाजा न खोलते। मुझे बस रोके रहना पड़ता। अस्पताल में लगातार मनसिक रोगियों के रोने की आवाज गूँजती रहती। कभी-कभी वे गाना गाने, चीखने या चिल्लाने लगते, "मुझे बाहर निकालो! मुझे बाहर निकालो!" वे बिना रुके धातु की छड़ों को ठोकते-पीटते भी रहते। यूँ लगता, जैसे पूरी जगह रोते हुए पिशाचों और भेड़ियों से भरी हुई है। इससे मेरा खून जम गया। मुझे लगा, यह जगह इंसानों के लिए नहीं है। सिर्फ मेरी आस्था के कारण कम्युनिस्ट पार्टी ने मुझे गिरफ्तार कर बंद कर दिया था, और जैसे ही मैं रिहा हुई, मेरे अपने परिवार ने मुझे यातना दिलवाने के लिए पागलखाने में डाल दिया। यह आसमान से गिरकर खजूर में अटकने, शेर की माँद में गिरने वाली बात थी। मैं इस तरह कैसे जी सकती हूँ? मैंने इस बारे में जितना ज्यादा सोचा, उतना ही खराब महसूस किया, और मैं रोने लगी। रोते हुए मैं सभाओं में हम भाई-बहनों के भजन गाने और परमेश्वर का गुणगान करने के बारे में सोचने लगी। मैं परमेश्वर के वचन पढ़ने और उन लोगों के साथ अपना कर्तव्य निभाने को बेताब थी, लेकिन मैं बाहर नहीं जा सकती थी, मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि मुझे यहाँ कितने दिन रखा जाएगा। मेरे कष्ट कब खत्म होंगे? मैंने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं मानसिक रोगियों के साथ बंद हूँ। बहुत दुखी हूँ। हे परमेश्वर, मैं नहीं जानती इससे कैसे उबरूँ. मुझे रास्ता दिखाओ।" प्रार्थना करने के बाद मुझे परमेश्वर के वचनों का ये अंश याद आया : "तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : 'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं। चूँकि परमेश्वर का कार्य उस देश में आरंभ किया जाता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्य को भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और उसके बहुत-से वचनों को संपन्न करने में समय लगता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शुद्ध किए जाते हैं, जो कष्ट झेलने का भाग भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना अत्यंत कठिन है—परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्म प्रत्यक्ष करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए इस अवसर का उपयोग करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?')। मैं समझ गई कि पार्टी परमेश्वर की घोर दुश्मन है, और यह लोगों को आस्था रखने और परमेश्वर का अनुसरण करने नहीं देगी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है, इसलिए पार्टी विश्वासियों को पागलों की तरह गिरफ्तार कर सता रही है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की निंदा करने के लिए हर प्रकार की अफवाहें और झूठ फैला रही है, ताकि उन लोगों को धोखा दे सके जो सत्य नहीं जानते। यह पीढ़ियों तक विश्वासियों के परिवार के सदस्यों को फँसा देती है, उनके करियर बरबाद कर देती है, जिससे वे अपने जीवन में विश्वासियों से घृणा करने लगें। यह विश्वासियों से परमेश्वर को धोखा दिलवाने पर मजबूर करने के लिए उनका इस्तेमाल करती है। पार्टी बहुत ज्यादा दुष्ट है। पार्टी ने मेरे परिवार को गुमराह किया, जिससे वे उसका साथ देने लगे, और मेरी आस्था के कारण मुझे सताने लगे, यहाँ तक कि उन्होंने मुझे मानसिक अस्पताल में डाल दिया। यह बहुत भयानक जगह थी, मगर मैं कम्युनिस्ट पार्टी के दुष्ट सार को समझ गई, परमेश्वर इस प्रकार मेरी आस्था को पूर्ण कर रहा था, इसलिए मुझे परमेश्वर का सहारा लेकर उसकी गवाही देनी थी। इस विचार के आने पर मैंने प्रार्थना करके परमेश्वर से मेरा साथ देने और दुष्ट शैतान से मेरी रक्षा करने की विनती की। शैतान मेरा जितना ज्यादा दमन करता, उतना ही ज्यादा परमेश्वर में मेरा विश्वास बढ़ता।

अस्पताल में दूसरे दिन एक अर्दली मेरे लिए एक गोली लाया। मैं गुस्सा होकर उससे बोली, "मैंने आपसे कहा है कि मुझे कोई बीमारी नहीं है। मैं बिलकुल सामान्य हूँ, मैं इसे नहीं खाऊँगी।" उसने कहा, "बिना किसी समस्या के यहाँ कोई नहीं लाया जाता, अगर तुम इलाज में सहयोग करोगी, तो ठीक हो जाओगी और जल्दी बाहर जा सकोगी।" लेकिन चाहे उसने कुछ भी कहा, मैं उसे लेने से डर रही थी। तीसरे दिन, एक गंभीर रूप से परेशान व्यक्ति को दाखिल किया गया, और मुझे वार्ड 3 में भेज दिया गया, क्योंकि मेरे वार्ड में कोई अतिरक्त बिस्तर नहीं था। उस वार्ड पर उतना सख्त नियंत्रण नहीं था—मैं गतिविधियों के लिए अपने कमरे से बाहर जा सकती थी। वहाँ मैंने देखा कि कुछ मरीजों की पतलूनें इतनी फटी हुई थीं कि उनके नितंब दिख रहे थे, उनके चेहरे और गर्दन बहुत मैले थे, और उनके बाल किसी चिड़िया के घोंसले जैसे थे। कुछ लोगों के कपड़े बहुत गंदे और तेल से सने लगे रहे थे—देखकर उलटी आती थी। उस वार्ड में मेरे कमरे में दो और महिलाएँ थीं। एक की आँखें निर्जीव और भावहीन थीं, वह कभी-कभी बेतरतीब ढंग से खुद से ही बड़बड़ाने लगती थी। दूसरी महिला पता नहीं कब से वहाँ बंद थी। वह हर सुबह उठते ही सिगरेट पीती हुई गलियारे में लगातार चलती रहती थी। उनसे मैं बहुत डर गई। मैं डरती थी कि दौरा पड़ने पर वे बेध्यानी में मेरी पिटाई न कर दें या मेरे बाल न खींच लें, या कहीं मेरे सोते समय मेरा गला दबाकर मुझे मार न डालें, इसलिए रात में कभी भी मैं गहरी नींद नहीं सो पाई। हर बार सो जाने से पहले मैं मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना कर मेरी रक्षा करने की विनती करती। थोड़ी आरामदेह नींद के लिए मैं इसी तरह विश्राम कर पाती थी। हर दिन एक अर्दली आकर एक-एक करके हमें दवा दे जाता। मैं दवा तभी खाती जब वह सीधे मेरी आँखों में घूरता, वरना मैं गोली न निगलती, बल्कि बाथरूम जाने पर उसे फेंक देती। एक बार एक दूसरी मरीज ने मुझे गोली फेंकते हुए देख लिया, और मुझसे बोली, "तुम ऐसा नहीं कर सकती। एक बार एक अर्दली ने मुझे दवा फेंकते हुए पकड़ लिया था। उसने मुझे कई थप्पड़ जड़ दिए, फिर उसने प्लास्टिक की एक नली लेकर मेरी नाक में डाल दी, और उसके जरिये जबरन दवा पिला दी। बहुत दर्द हुआ था।" मैं कभी नहीं जान पाई कि क्या उस औरत ने अर्दलियों को मेरे दवा फेंकने के बारे में बता दिया था, लेकिन इसके बाद से अस्पताल के कर्मचारी मरीजों के दवा लेते समय उन पर कड़ी नजर रखने लगे। अर्दली हम पर नजर रखने के लिए एक चौकोर मेज के पास खड़े हो जाते, और एक फ्लैश-लाइट लेकर यह सुनिश्चित करते कि हमने अपना मुँह खोलकर दवा निगल ली है। मेरे पास दवा खाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रहा।

कुछ दिन बाद कमरों की जाँच के लिए अस्पताल के निदेशक आए, और एकाएक मुझसे पूछ बैठे, "क्या महाआपदा 21 तारीख को आएगी?" मुझे बहुत अजीब लगा, मैंने कहा, "आपदा कब आएगी, यह तो सिर्फ परमेश्वर बता सकता है।" उसका जवाब था, "मैं देख सकता हूँ कि तुम्हारी सेहत ठीक नहीं है। हमें तुम्हारी दवा की खुराक बढ़ानी पड़ेगी।" इसके बाद मुझे एक के बजाय दो गोलियाँ खानी पड़ीं। मैं आगबबूला हो गई। निदेशक को कोई अंदाजा नहीं था कि मैं सचमुच बीमार हूँ या नहीं, बस उसने यूँ ही मेरी खुराक दोगुनी कर दी। वह इंसान के जीवन की कद्र नहीं करता था। अस्पताल जीवन बचाने और घायलों की मदद करने की जगह होना चाहिए, लेकिन यह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा ईसाइयों को सताए जाने की जगह बन गया था। पार्टी मेरी आस्था के कारण दुर्भावना के साथ मुझे हानि पहुँचा रही थी। मुझे उससे बहुत ज्यादा घृणा हो गई।

दवा लेने के दस दिन बाद मैं बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस करने लगी, यहाँ तक कि मेरे लिए चलना भी मुश्किल हो गया। मैं सोचने लगी, कहीं यह मुझे दी जाने वाली दवा का असर तो नहीं। इतने थोड़े-से समय में ही मुझे बहुत अजीब लग रहा था। हालाँकि यहाँ लाई जाने पर मैं बिलकुल ठीक थी, लेकिन अगर मैं यह दवा लेती रही तो इससे मेरी तबीयत बिगड़ जाएगी। और मुझे लगा, हर दिन इन सब मानसिक रोगियों के बीच दुखी और उदास रहकर मैं भी जल्दी ही इस यातना से मानसिक रोग का शिकार हो जाऊँगी। मैं परमेश्वर से बहुत प्रार्थना करती थी, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से ही मैं इससे निकल पाई। मुझे याद है, एक बार प्रार्थना के बाद मैंने प्रभु यीशु द्वारा लाजर को उसकी मजार से निकाले जाने की बात याद की। वह चार दिन पहले मर चुका था, और उसके शव से दुर्गंध आ रही थी, लेकिन परमेश्वर ने कुछ ही वचनों से उसे फिर से जीवित कर दिया। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। वह मनुष्य के भाग्य पर शासन करता है। इसलिए मैं जानती थी कि मेरा जीवन भी परमेश्वर के हाथ में है। मैंने परमेश्वर के इस वचन को याद किया : "संसार में घटित होने वाली समस्त चीजों में से ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज है, जो मेरे हाथ में न हो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 1')। यह दवा मुझे पागल तो नहीं बना देगी, और मैं कब बाहर निकल पाऊँगी, ये सब परमेश्वर के हाथ में है। मुझे अपनी आस्था और परमेश्वर का सहारा लेकर इससे उबरना होगा। इस विचार ने मेरी आस्था को मजबूती दी और अब मुझे पहले जितना डर नहीं लगा।

दो-तीन हफ्ते बाद, एक शाम मेरे मन में कौंधा कि मैं अपने परिवार को बुलाकर देख सकती हूँ कि क्या मैं यहाँ से जल्दी निकल सकूँगी। अगली सुबह मेरे पति गाड़ी चलाकर अस्पताल पहुँचे, मैंने उनसे मुझे वहाँ से निकालकर ले जाने को कहा। मैंने उन्हें बताया कि यह इंसानों के रहने लायक जगह नहीं है, यहाँ लंबे समय तक रहने से स्वस्थ इंसान भी पागल हो जाएगा। उन्होंने इस पर चर्चा करने के लिए मेरे भाई को फोन किया, और मैंने अपने भाई को फोन पर यह कहते सुना, "पहले उससे उसकी आस्था छोड़ने की गारंटी पर हस्ताक्षर ले लीजिए, फिर वह बाहर आ सकती है। अगर वह अपनी आस्था पर कायम रहना चाहे, तो वहीं मर सकती है।" मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक ही कोख से जन्मा मेरा सगा भाई ऐसी बात कह सकता है। यह सच में बहुत डरावनी बात थी। वह परिवार नहीं, मनुष्य के चेहरे वाला एक दानव था, मुझे बाहर निकालने का उनका कोई इरादा न देखकर, मैंने मन-ही-मन सोचा, अगर इसने मुझे यहाँ छोड़ दिया, तो मुझे बाहर निकलने का रास्ता कभी नहीं मिलेगा, फिर मैं अपनी आस्था का अभ्यास कैसे करूँगी? इसलिए मैंने उनसे चालाकी से कहा, "मैं अब विश्वास नहीं रखती।" इस पर वे मुझे घर ले जाने को राजी हो गए। मेरे पति लगातार मुझ पर नजर रख रहे थे। वे मुझे सभाओं में नहीं जाने देते थे, परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ने देते थे। कभी-कभी दोपहर को मेरे झपकी लेने के दौरान वे यह देखने अंदर आते कि कहीं मैं परमेश्वर के वचन तो नहीं पढ़ रही, लेकिन मैं फिर भी अपने एमपी5 प्लेयर पर चुपचाप परमेश्वर के वचन पढ़ लेती थी। फिर एक सुबह उसे चार्ज करते समय उन्होंने मुझे पकड़ लिया। उन्होंने उसे छीन लिया और गुस्से से मुझ पर चिल्ला पड़े, "तुम अब भी विश्वास कैसे रख सकती हो? अगर तुम्हें पकड़कर जेल ले जाया गया, और तुम्हारे कारण हमारे बेटे की नौकरी चली गई, तो तुम उसे क्या मुँह दिखाओगी? अब तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण करने की इजाजत नहीं है!" यह कहकर उन्होंने मुझे जोर से धक्का दिया, मेरा सिर जोर से पलंग के किनारे से जा टकराया। मुझे समझ नहीं आया, वे इतने क्रूर कैसे हो सकते हैं। मैं सिर्फ परमेश्वर में विश्वास रखती थी। मैंने कोई गलत काम नहीं किया, लेकिन वे मुझसे बहुत बुरा बरताव कर रहे थे। उन्होंने न सिर्फ मुझे एक अस्पताल में डाल दिया था, बल्कि अब वे मुझ पर हाथ भी उठा रहे थे, और मुझे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ने दे रहे थे। बहुत बुरा महसूस करते हुए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मेरे पति मुझसे बहुत बुरा बरताव कर रहे हैं, मैं कमजोर महसूस कर रही हूँ। मैं नहीं जानती, इस मार्ग पर कैसे चलती रहूँ। मेरा मार्गदर्शन करो!" फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का ये अंश याद आया : "आज अधिकतर लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि कष्टों का कोई मूल्य नहीं है, कष्ट उठाने वाले संसार द्वारा त्याग दिए जाते हैं, उनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है, वे परमेश्वर के प्रिय नहीं होते, और उनकी संभावनाएँ धूमिल होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। ... इस प्रकार, इन अंत के दिनों में तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। चाहे तुम्हारे कष्ट कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हें बिलकुल अंत तक चलना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम साँस पर भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसके आयोजनों के प्रति समर्पित होना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है, और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के वचनों पर मनन करके मैंने यह साफ समझ लिया कि भले ही मैं मुश्किलें झेल रही थी, लेकिन परमेश्वर इस हालत का उपयोग मेरी आस्था को पूर्ण करने के लिए, शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही देने का एक मौका देने के लिए कर रहा था। यह परमेश्वर का प्रेम था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा समझे बिना मैं अपने कष्टों के कारण कमजोर और नकारात्मक महसूस कर रही थी। मैं समझ गई कि मैं कितनी कायर हूँ। फिर मैंने अपने पति की मुझसे परमेश्वर का त्याग करवाने की कोशिश के बारे में सोचा। मैं जियूँ या मरूँ, इसकी परवाह किए बिना वे मुझे खुद ही एक मानसिक अस्पताल में ले गए, और अब उन्होंने मुझ पर हाथ भी उठाया। इस मुकाम पर, मैंने सही मायनों में देखा कि वे परमेश्वर से घृणा करने वाले परमेश्वर-विरोधी दानव हैं। मैंने परमेश्वर के इस वचन को याद किया : "विश्वासी और अविश्वासी संगत नहीं हैं, बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। मेरे पति और मैं दो अलग रास्तों पर चलने वाले दो भिन्न व्यक्ति थे। वे मेरा चाहे जैसे दमन करें, मैं परमेश्वर का अनुसरण करती रहूँगी। मुझे कोई रोक नहीं सकता। इसलिए मैंने उनसे कहा, "चलिए, तलाक ले लें। आप सांसारिक मार्ग पर हैं, धन के पीछे भाग रहे हैं, और मैं आस्था के मार्ग पर हूँ। हम अलग-अलग रास्तों पर हैं और हमारे बीच कुछ भी एक-समान नहीं है। आप हमारे बेटे के लिए डर रहे हैं, इसलिए हमें तलाक ले लेना चाहिए। फिर मेरी आस्था का आप दोनों पर कोई बुरा असर नहीं होगा। मुझे आपकी कोई संपत्ति नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ एक कमरा, रहने के लिए एक जगह चाहिए, ताकि मैं परमेश्वर का अनुसरण कर सकूँ।" उन्होंने कहा, "मैं जानता हूँ, तुम एक अच्छी औरत हो। मुझे तलाक नहीं चाहिए।" मैंने उनसे कहा, "अगर आपको तलाक नहीं चाहिए, तो मुझे मेरी आजादी दीजिए। मैं एक विश्वासी हूँ, और आप मेरे आड़े नहीं आ सकते।" उन्होंने कहा, "तुम अपनी आजादी ले सकती हो, लेकिन पहले तुम्हें मेरे साथ एक सहमति-पत्र पर दस्तखत करने होंगे कि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को छोड़ दोगी!" यह सुनकर मैंने कहा, "मुझे अपनी आस्था रखनी है—मैं उस सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती।" वे अवाक् हो गए। इसके बाद, यह देखकर कि वे मुझे विश्वास रखने से नहीं रोक सकते, उन्होंने मेरी आस्था के अभ्यास में उतनी ज्यादा बाधा नहीं डाली। मैं कलीसिया का जीवन जी पाई और सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा पाई।

एक शाम मैं पास ही रहने वाली एक बहन के साथ नवागंतुकों के सिंचन के बारे में चर्चा करने गई। हमारे बैठते ही मेरा बेटा वहाँ पहुँच गया, और उस बहन से बहुत गुस्से के साथ बोला, "आप ही ने मेरी माँ को धर्मांतरित किया है!" फिर उसने उस पर हाथ उठाने की कोशिश की। मैं अपने बेटे को रोकने के लिए उसे अपनी बाँहों से पकड़ने के लिए झपटी। वह गुस्से से उबलते हुए मुझे घसीटकर घर ले आया और गुस्से से बोला, "तुम्हें यह छोड़ना होगा। देखो, तुम्हारी कलीसिया के बारे में वे ऑनलाइन क्या कह रहे हैं!" फिर उसने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की कुछ झूठी बातों को दोहराया। इसके बाद वह चिल्लाया, "डैड, मानसिक अस्पताल को फोन कीजिए और इसे वहाँ वापस भेज दीजिए!" उसकी यह बात सुनकर मुझे लगा, मेरा सिर फटने वाला है। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मेरा बेटा अपनी नौकरी बचाने की खातिर मुझे मेरी आस्था से दूर रखने के लिए अपने पिता के साथ हाथ मिला लेगा। यह बहुत क्रूर था। मैंने अपने पति को उस अस्पताल को फोन करते हुए सुना, और उस ओर से मैंने उन्हें कहते सुना कि वहाँ जगह खाली नहीं है। मेरे पति ने कहा, "चलो, पुलिस को बुलाकर इसे ले जाने को कहते हैं।" मेरे बेटे ने जवाब दिया, "इसे वहाँ बंद नहीं किया जा सकता। हम इसे उस अँधेरे कमरे में डाल दें तो कैसा रहेगा, जहाँ हम खरगोश पालते थे?" फिर वे दोनों मुझे जबरदस्ती उठाकर उस कमरे में ले गए, लोहे का दरवाजा बंद कर दिया और चले गए। यह देखकर कि पार्टी ने मेरे पति और बेटे को मेरे साथ इतना बर्बर होने के लिए किस तरह धोखा दिया था, मैं डर के मारे सिहर गई, और दिल की गहराई से कम्युनिस्ट पार्टी से और भी ज्यादा नफरत करने लगी। मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया : "हज़ारों सालों से यह भूमि मलिन रही है। यह गंदी और दुःखों से भरी हुई है, चालें चलते और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[1] क्रूर और दुष्ट बनकर इस भुतहा शहर को कुचलते हुए और लाशों से पाटते हुए प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं; सड़ांध ज़मीन पर छाकर हवा में व्याप्त हो गई है, और इस पर ज़बर्दस्त पहरेदारी[2] है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? शैतान मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, अपनी दोनों आंखों पर पर्दा डालकर, अपने होंठ मजबूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीक नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो...। प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुवा? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज़ को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने की चालें हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)')। पार्टी ईसाइयों को गिरफ्तार कर उन्हें सताती है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में तरह-तरह की अफवाहें और झूठी निंदा फैलाती है, और उनके परिवार के सदस्यों को फँसाती है। इसलिए मेरा परिवार मुझे परमेश्वर में विश्वास न रखने देने की कोशिश में पार्टी द्वारा गुमराह होकर उसका साथ देने लगा, मुझे व्यक्तिगत रूप से एक मानसिक अस्पताल ले गया जहाँ मुझे यातना दी गई, और ये मुझे फिर से कमरे में बंद कर रहे हैं। एक अच्छा-खासा खुशहाल परिवार इतना गिर गया। पार्टी असली सरगना है, मैंने उस दानव से दिल की गहराइयों से घृणा की।

जल्दी ही मेरा बेटा एक स्टूल लाकर लोहे के गेट के बाहर उस पर बैठकर बोला, "मॉम, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखना बंद कर देना चाहिए। व्यापार करते समय तुम बहुत कड़ी मेहनत करती थी, मेरी शिक्षा का खर्च उठाना आसान नहीं था। अब मैं काम कर रहा हूँ, थोड़ा पैसा भी जमा किया है। कैसा रहेगा अगर मैं तुम्हारे कहीं घूमने पर खर्च करूँ?" उसकी इस बात पर मुझे एहसास हुआ कि यह शैतान की एक चाल है, इसलिए मैंने उससे कहा, "विश्वासी बनने से पहले मैं सिर्फ पैसा कमाना चाहती थी। वह जीने का एक मुश्किल, थकाऊ तरीका था। अब परमेश्वर को पा लेने और कुछ सत्य समझ लेने के बाद मेरा जीवन पहले से ज्यादा आजाद और सुखी है। क्या तुम दोनों मुझे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते? तुम मुझे अपनी माँ के रूप में ठुकरा दो और तुम्हारे पिता मुझे तलाक दे दें, तो भी मैं अपनी आस्था पर कायम रहूँगी। मैं इस पथ को समर्पित हूँ।" उसने जवाब में एक भी शब्द नहीं कहा, बल्कि उठकर चला गया। मेरी आस्था को मजबूती देने के लिए मैं सचमुच परमेश्वर की आभारी थी, मुझे सच में बड़ा सुकून मिला। मैंने यह भजन गाना शुरू किया : "हे सर्वशक्तिमान सच्चे परमेश्वर, मेरा हृदय तुझे अर्पित है। कारागार सिर्फ़ मेरे जिस्म पर पाबंदी लगा सकता है। यह मेरे कदमों को तेरा अनुसरण करने से नहीं रोक सकता। दुखदायी कष्टों में, पथरीले रास्तों पर, तेरे वचनों के मार्गदर्शन, मेरा दिल निर्भय रहता है। तेरे प्रेम के संग, मेरा दिल परितृप्त रहता है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'अ‍पनी पसंद पर अ‍फ़सोस नहीं')। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर मेरे साथ है। उस छोटे-से अँधेरे कमरे में बैठकर, जहाँ मुझे आसपास कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, मैं दुखी नहीं हुई। अगली सुबह मेरे बेटे ने अचानक दरवाजा खोलकर मुझे बाहर जाने दिया, और बोला, "मॉम, हम अब तुम्हें अकेला छोड़ देंगे। तुम जो चाहो कर सकती हो।" उसने जब यह कहा, तो मैं जान गई कि शैतान शर्मसार होकर हार गया है, मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया।

कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा गिरफ्तारी और अपने परिवार के दमन से गुजरने से मुझे पार्टी के दानवी परमेश्वर-विरोधी सार को पूरी तरह समझने में मदद मिली। यह पार्टी विश्वासियों को गिरफ्तार कर उन्हें सताती है, और लोगों को धोखा देने के लिए हर प्रकार की झूठी बातें फैलाती है, उनकी आस्था के आड़े आने के लिए विश्वासियों के परिवारों को साथ लेती है। यह ईसाई परिवारों को नष्ट करने वाली मास्टरमाइंड है। मेरे परिवार ने पार्टी के साथ होकर अपने निजी हितों के लिए मेरी आस्था में रुकावट पैदा की, उन्होंने मेरे जीने-मरने का खयाल किए बिना मुझे एक पागलखाने में दाखिल भी करवा दिया। मैंने परमेश्वर का विरोध करने वाले उनके सार को पूरी तरह समझ लिया, और मैं उन्हें कभी भी मुझे रोकने नहीं दूँगी। इस अनुभव ने मुझे दिखा दिया है कि सिर्फ परमेश्वर ही हमसे प्रेम करता है, और सिर्फ परमेश्वर ही हमें बचा सकता है। जब मैं बहुत दुखी और बेसहारा थी, तब परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध करने, मुझे आराम देने और प्रोत्साहित करने और उन मुश्किल दिनों से उबारने के लिए अपने वचनों का प्रयोग किया। अब मैंने खुद अनुभव किया है कि परमेश्वर का प्रेम बहुत सच्चा है, और मैं परमेश्वर का अनुसरण करके अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ। मुझे इसका कभी पछतावा नहीं होगा।

फुटनोट :

1. "निराधार आरोप लगाते हुए" उन तरीकों को संदर्भित करता है, जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

2. "ज़बर्दस्त पहरेदारी" दर्शाता है कि वे तरीके, जिनके द्वारा शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, बहुत ही शातिर होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने-डुलने की भी जगह नहीं मिलती।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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