बहसबाजी की आदत के पीछे कौन-सा स्वभाव है?

18 अक्टूबर, 2022

बरसों विश्वास रखकर, मैं सैद्धांतिक तौर पर जान गई कि परमेश्वर सत्य स्वीकारने वालों को पसंद करता है। सत्य स्वीकारे बिना परमेश्वर में विश्वास करने से, लोग चाहे कितने भी कष्ट झेलें, उनका जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। मैं सत्य स्वीकार करने वाली बनना चाहती थी, पर काट-छांट और निपटान किया जाता तो मैं अनायास ही बहस करके अपना बचाव करती, कभी तो दूसरे लोगों को झूठा ठहरा देती। कुछ देर बाद, पछताती और सोचती : मैंने बहस क्यों की? मुझे इतना कुछ बोलने की क्या जरूरत थी? पर पछतावा बस यहीं तक रहता, समस्या का सार साफ-साफ न समझ पाने के कारण मैं सच्चा प्रवेश न कर पाती। हाल ही में, कुछ अनुभवों के बाद, आखिर मैं आत्म-चिंतन करके सत्य खोजने लगी, मुझे यह भी समझ आने लगा कि हमेशा बहस करना सत्य से ऊबने वाला शैतानी स्वभाव था, और अगर मैं प्रायश्चित करके नहीं बदली तो खतरे में पड़ जाऊँगी।

मैं कलीसिया में सुसमाचार का काम देखती हूँ। एक बार, कामकाज की समीक्षा-बैठक में, सिंचन निरीक्षक बहन लियु ने सुसमाचार के काम में एक समस्या बताते हुए कहा, "हाल ही में, सुसमाचार के लोग सिंचन की जरूरत वाले नवागतों की अवस्था के बारे में समय पर फीडबैक नहीं देते, जिससे हम उनकी धारणाओं और समस्याओं के हल के लिए उनका सिंचन नहीं कर पाते।" बहन लियु को सबके सामने मेरे काम में समस्या का जिक्र करते देख मैं शर्म से भर गई। "मैं व्यवहारिक काम नहीं करती यही कहना चाहती हो? ऐसा नहीं है कि मैंने इन मसलों पर भाई-बहनों के साथ संगति नहीं की। मैंने बहुत पहले ही उन्हें बता दिया था, पर चीजों को बदलने में समय लगता है या नहीं? उनमें से कइयों ने अभी-अभी सुसमाचार का काम शुरू किया है। तुम उनसे इतनी ज्यादा अपेक्षा क्यों कर रही हो?" मैं उसकी बात बिल्कुल नहीं स्वीकार पाई, मुझे लगा वह दूसरों की मुश्किलों पर जरा-भी ध्यान नहीं देती। उस समय, मैं एक ही बार में अपने विचार व्यक्त कर देना चाहती थी, पर मुझे लगा सब सोचेंगे कि मैं सुझाव नहीं मानती और बुरी बन जाऊँगी, इसलिए मैंने बेमन से उसका सुझाव मान लिया। बाद में, मैंने अपने भाई-बहनों से जोर देकर कहा कि वे समय निकालकर सिंचन की जरूरत वाले नवागतों के बारे में समय पर फीडबैक दें। कुछ समय बाद, चीजें थोड़ी बेहतर हो गईं, मैंने इस पर बहुत ज्यादा विचार नहीं किया। लेकिन एक दिन, मुझे पता चला कि कुछ सिंचनकर्ता सुसमाचार कर्मियों के साथ ठीक-से काम नहीं कर रहे, और उनके मन में उनके खिलाफ कुछ पूर्वाग्रह हैं। मुझे अंदेशा होने लगा, "बहन लीऊ हमेशा सुसमाचार कर्मियों की समस्याओं की बात करती है, इसलिए ही ऐसा हुआ।" मुझे उससे बहुत-सी शिकायतें होने लगीं, "उसकी बातों से कितनी खीज होती है। किसी भी मौके पर कुछ बोलने से पहले सोचती तक नहीं। कामकाज की बात होने पर, वह यह जरूर कहती है कि सुसमाचार कर्मी नवागतों के बारे में समय पर फीडबैक नहीं देते। यह सुनकर सब हमारे बारे में राय बनाने लगते हैं। ऐसा ही रहा तो हम भविष्य में कर्तव्य में सहयोग कैसे करेंगे?" यह सब सोचते हुए अनायास ही मेरा पारा चढ़ गया। मैंने अगुआ से इस स्थिति की रिपोर्ट की, और कहा कि बहन लियु सुसमाचार कर्मियों को लेकर हमारे ग्रुप में असंतोष फैला रही है, जिससे हमारे लिए सहयोग करना नामुमकिन हो गया है। मैसेज लिखते समय मुझे भी इसका ख्याल आया था। "क्या इसे एक समस्या के रूप में रिपोर्ट करना सही होगा? क्या यहाँ 'फैलाना' शब्द सचमुच सही है?" पर फिर मैंने सोचा, "मैं जो कह रही हूँ वह तथ्य है। बहन लियु सुसमाचार कर्मियों के बारे में बात करते हुए हर बार आह भरती है। उसकी आह सुनकर तो लगता है मानो हालात लाइलाज हो। तो क्या वह असंतोष नहीं फैला रही है? मैं जो कह रही हूँ वह सही है।" बस यही सोचकर मैंने मैसेज भेज दिया, फिर इसके बारे में कुछ नहीं सोचा। अगले दिन, बहन लियु ने मुझे मैसेज भेजा : "बहन, अगर मैंने जो कुछ कहा वह अनुचित है, तो मुझे निस्संकोच बताओ। मेरे शब्द 'असंतोष फैलाना' कैसे हैं?" मैसेज देखते ही मैं समझ गई कि अगुआ ने उसके साथ संगति की है। जब मैंने देखा कि उसका रवैया नकारने और आत्म-चिंतन न करने का है, तो मुझे और गुस्सा आया। "कितनी मोटी अक्ल है तुम्हारी? तुम्हें समझ भी आता है कि तुम क्या सोचती और बोलती हो? तुम्हारी आहों से साफ पता चलता है कि सुसमाचार कर्मियों से तुम कितनी असंतुष्ट हो। तुम्हारे इस तिरस्कार भरे रवैये का दूसरे लोगों पर असर पड़ता है। यह असंतोष फैलाना कैसे नहीं है?" मैं उसे बुलाकर उससे इस मुद्दे पर बहस करना चाहती थी, पर फिर मैंने सोचा, "अगर मैंने उसे अभी बुला लिया तो क्या हम दोनों झगड़ने नहीं लगेंगी? अगर लोगों को पता चला तो कितनी शर्मिंदगी की बात होगी। इससे हमारे रिश्तों में खटास आ जाएगी, फिर हम आपस में सहयोग कैसे करेंगे? यह कलीसिया के काम की रक्षा करना नहीं हुआ। मैं इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रही हूँ, फिर मैं ऐसे मामलों में विवेक से काम क्यों नहीं लेती?" उस घड़ी मुझे परमेश्वर के वचन याद आ गए। "अपने कर्तव्य को निभाने वाले उन तमाम लोगों के लिए, चाहे सत्य की उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए अभ्यास का सबसे सरल तरीका यह है कि हर काम में परमेश्वर के घर के हित के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत इरादों, अभिप्रेरणाओं, प्रतिष्ठा और हैसियत का त्याग किया जाए। परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखो—कम से कम इतना तो व्यक्ति को करना ही चाहिए" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना हृदय परमेश्वर को देकर सत्य प्राप्त किया जा सकता है)। "परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखो", इन शब्दों से मैं शांत हुई और मैंने आत्म-चिंतन किया। परमेश्वर के घर के हित सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस बहन से मेरा झगड़ा सिर्फ इस बात को लेकर था न कि कौन गलत है? हम दोनों ही निरीक्षक थीं। अगर हम इस बात पर झगड़ने लगीं और आपस में अनबन और पूर्वाग्रह की शिकार हो गईं तो काम पर बुरा असर पड़ेगा। इससे हमारे बड़े मकसद को नुकसान होगा। साथ ही, मैंने बहन लियु द्वारा समस्या की रिपोर्ट को असंतोष फैलाना कहा था, पर ऐसा कहना शायद सही नहीं था। असंतोष फैलाना काले को सफेद दिखाना, सही और गलत में भ्रम पैदा करना, और एक सकारात्मक चीज को नकारात्मक बताना है। इसका मतलब गलत इरादे रखना है और अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए दूसरों पर प्रहार और उनकी निंदा करना है। पर बहन लियु ने हमारे काम में जो समस्या बताई थी वह सही थी। उसने निष्पक्ष होकर समस्या उठाई थी। सुसमाचार कर्मी जिस तरह से काम कर रहे थे, उसमें ढीलेपन और गैर-जिम्मेदारी के लक्षण थे, वह हमारे काम में चूक और कमियों को दूर करने के लिए ही ऐसा कह रही थी। यह सुसमाचार के काम के लिए अच्छा था, इसमें कोई गलत व्यक्तिगत इरादे नहीं थे। अगर उसका लहजा गलत भी था, तो भी यह काम में सुधार के लिए ही था। पर मैंने इसे सुसमाचार कर्मियों के बारे में असंतोष फैलाने का नाम दिया। मैं उस पर हमला कर तोहमत लगा रही थी। यह सब सोचते हुए मुझे थोड़ा अपराध-बोध महसूस हुआ, मैंने उसे लिखा, "मैं गलत तरीके से बोलने के लिए माफी चाहती हूँ।" उसने इसे स्वीकार कर लिया, कहा कि हमें ज्यादा बातचीत और सहयोग करना चाहिए, और मिलजुलकर काम करना चाहिए। उसका यह जवाब पढ़कर मुझे शर्म आई। पर मुझे खुशी थी कि मामला सुलझ गया। नहीं तो, हमारे बीच तकरार चलती रहती और काम पर बुरा असर पड़ता। उस समय, मैंने मामले को यहीं खत्म कर दिया, पर मुझे लगा कि इस घटना से मैंने कुछ खास आत्म-ज्ञान हासिल नहीं किया, मैंने परमेश्वर से राह दिखाने की प्रार्थना की ताकि खुद को जान सकूँ।

फिर एक दिन, एक लेख लिखते समय, मुझे परमेश्वर के कुछ वचन दिखे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "निपटे जाने या काट-छाँट किए जाने के प्रति सबसे महत्वपूर्ण रवैया क्या होना चाहिए? सबसे पहले तो तुम्हें उसे स्वीकार करना चाहिए, इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुमसे कौन निपट रहा है, इसका कारण क्या है, चाहे वह कठोर लगे, लहजा और शब्द कैसे भी हों, तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। फिर तुम्हें यह पहचानना चाहिए कि तुमने क्या गलत किया है, तुमने कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया है और क्या तुमने सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य किया है। जब तुम्हारी काट-छाँट की जाती है और तुमसे निपटा जाता है, तो सबसे पहले तुम्हारा रवैया यही होना चाहिए। क्या मसीह-विरोधियों का रवैया ऐसा होता है? नहीं; शुरू से अंत तक, उनका रवैया प्रतिरोध और घृणा का होता है। क्या ऐसे रवैये के साथ, वे परमेश्वर के सामने शांत होकर, नम्रता से काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार कर सकते हैं? नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकते। तो फिर वे क्या करेंगे? सबसे पहले तो वे लोगों की समझ और क्षमा पाने की आशा में, जोरदार बहस करेंगे और तर्क देंगे, अपनी गलतियों और उजागर किए गए भ्रष्ट स्वभावों का बचाव करेंगे, उसके पक्ष में बहस करेंगे ताकि उन्हें कोई जिम्मेदारी न लेनी पड़े या उन वचनों को स्वीकार न करना पड़े जो उनके साथ निपटते और उनकी काट-छाँट करते हैं। ... वे अपनी गलतियों को अनदेखा कर देते हैं, चाहे वे कितनी ही स्पष्ट क्यों न हों और चाहे उन्होंने कितना ही बड़ा नुकसान क्यों न किया हो। उन्हें न तो जरा-सा भी दुख होता है और न ही वे खुद को दोषी मानते हैं, उनका अंतःकरण उन्हें बिल्कुल फटकार नहीं लगाता। बल्कि, वे पूरी ताकत से खुद को सही ठहराते हैं और यह सोचकर शब्दों की जंग छेड़ देते हैं, 'इसमें पूरी छूट है। सबके अपने कारण होते हैं; मुख्य यह है कि कौन ज्यादा अच्छी बातें करता है। यदि मैं अधिकतर लोगों तक अपना औचित्य और स्पष्टीकरण पहुँचा सकूँ, तो जीत मेरी होगी और तुम जिन सत्य की बात करते हो, वे सत्य नहीं हैं और तुम्हारे तथ्य भी मान्य नहीं हैं। तुम मेरी निंदा करना चाहते हो? बिल्कुल नहीं कर सकते!' जब किसी मसीह-विरोधी के साथ निपटा जाता है और उसकी काट-छाँट की जाती है, तो वह पूरे मन और आत्मा की गहराई और दृढ़ता से प्रतिरोध करता है, उसके विरुद्ध होता है और उसे नकार देता है। उसका रवैया कुछ ऐसा होता है, 'तुम जो चाहे कहो, चाहे तुम कितने भी सही हो, मैं इस बात को न तो मानूँगा और न ही स्वीकार नहीं करूँगा। मेरी कोई गलती नहीं है।' तथ्य किसी भी प्रकार से उनके भ्रष्ट स्वभाव को बाहर ले आएँ, वे उसे स्वीकार नहीं करते, बल्कि अपना बचाव और प्रतिरोध करते रहते हैं। लोग कुछ भी कहें, वे उसे स्वीकारते या मानते नहीं, बल्कि सोचते हैं, 'देखते हैं कौन किसको बातों में हरा सकता है; देखते हैं किसकी जबान ज्यादा तेज चलती है।' यह एक प्रकार का रवैया है जिसे मसीह-विरोधी निपटे जाने और काट-छाँट के प्रति अपनाते हैं" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग आठ))। "जब किसी मसीह-विरोधी से निपटा जाए और उसकी काट-छाँट की जाए, तो पहले यह पूछो : क्या वे अपने बुरे कर्मों को स्वीकार कर सकते हैं? दूसरा सवाल पूछो : क्या वे आत्मचिंतन कर स्वयं को जान सकते हैं? तीसरा सवाल पूछो : निपटारे और काट-छाँट के समय, क्या वे परमेश्वर से प्राप्त कर सकते हैं? इन तीन सवालों से मसीह-विरोधी की प्रकृति और सार देखा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति निपटारे और काट-छाँट के समय समर्पण और आत्मचिंतन कर अपनी भ्रष्टता के प्रदर्शन और सार को पहचान सकता है, तो ऐसा व्यक्ति सत्य स्वीकार कर सकता है। वह मसीह-विरोधी नहीं होता। मसीह विरोधी में इन तीन चीजों का अभाव होता है। जब किसी मसीह-विरोधी की काट-छाँट और निपटारा किया जाता है, तो वह कुछ और ही करने लगता है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती—यानी जब उसकी काट-छाँट और निपटारा किया जाता है, तो वह निराधार आरोप लगाने लगता है। वह अपने गलत कामों और भ्रष्ट स्वभाव को स्वीकारने के बजाय उसी व्यक्ति की निंदा करने लगता है जो उसकी काट-छाँट और निपटारा करता है। वह ऐसा कैसे करता है? वह कहता है, 'जरूरी नहीं कि सारी काट-छाँट और निपटारा सही हो। काट-छाँट और निपटारा इंसान द्वारा की गई निंदा और आलोचना है; यह परमेश्वर की ओर से नहीं किया जाता। मात्र परमेश्वर धार्मिक है। जो कोई किसी की निंदा करे, उसकी निंदा की जानी चाहिए।' क्या यह निराधार आरोप नहीं है? जो इस तरह के निराधार आरोप लगाता है, वह किस तरह का व्यक्ति होता है? ऐसा तो कोई विवेकशून्य अनवरत चलने वाला कीड़ा ही कर सकता है, शैतान की तरह का इंसान ही कर सकता है। अंतःकरण और समझ वाला व्यक्ति ऐसा कभी नहीं करेगा" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग आठ))। परमेश्वर के वचनों से खुलासा हुआ कि काट-छांट और निपटान के प्रति मसीह-विरोधियों का रवैया ढीला और प्रतिरोध का होता है। उनके सामने तथ्य रखने पर भी वे अपनी गलती नहीं मानते। अपना मान और रुतबा बचाने के लिए, वे खुद को सही ठहराते हैं, अपना बचाव करते हैं, और दूसरों से झगड़ते हैं, इस हद तक कि वे सफेद को काला ठहरा सकते हैं, अपना निपटान करने वालों की निंदा कर सकते हैं। मेरा बर्ताव भी परमेश्वर के वचनों में उजागर हुए मसीह-विरोधियों जैसा ही था। मैं सुसमाचार के काम की निरीक्षक हूँ। बहन लियु ने सुसमाचार कर्मियों के काम में जो समस्या बताई थीं, वह हमारे काम की एक बड़ी कमजोरी थी, उसे स्वीकारनेके बजाय, मैं अपना बचाव और बहस करती रही। मुझे लगता था मुझमें कोई खराबी नहीं है वह जानबूझकर मुझे शर्मिंदा करना चाहती है, इसलिए मैंने उसके प्रति पूर्वाग्रह पाल लिया। बाद में, मुझे मौका मिला तो मैंने सफेद को काला बनाते हुए उसकी बुराई की, और उल्टे उसी पर दोष मढ़ते हुए अगुआ से उसकी शिकायत कर दी। मुझमें कोई इंसानियत ही नहीं थी। मैंने सुसमाचार कर्मियों की मुश्किलों पर ध्यान देने के बहाने दूसरों को समस्याओं पर उंगली उठाने से रोका। ऊपरी तौर पर, मैं अपने भाई-बहनों से सहानुभूति दिखा रही थी, पर असल में, मैं बहस करके अपना बचाव कर रही थी। अगर मैंने ईमानदारी से भाई-बहनों की जिंदगी की जिम्मेदारी ली होती, तो समस्याएँ सुलझाने और गलतियाँ सुधारने में मैंने उनकी बेहतर तरीके से मदद की होती। इससे उनको सचमुच लाभ होता। इसके बजाय मैंने ठीक उल्टा किया। जहाँ तक उनके काम में समस्याओं का संबंध था, सत्य पर संगति कर मदद करने या उन्हें हल करने के बजाय, मैंने बार-बार उन पर पर्दा डाला। मैं भाई-बहनों की जिंदगी की जिम्मेदारी कहाँ ले रही थी? साफ था कि मैं सिर्फ छवि और रुतबा बनाने में लगी थी। वे मुश्किलें मेरे लिए सत्य या काट-छांट और निपटान को स्वीकार न करने का कारण और बहाना बन गईं। मैं कितनी चालबाज और दुष्ट थी।

बाद में, मैंने सोचा मेरे कर्तव्य निभाने में कुछ समस्याएँ थीं, तो मैंने इतने विश्वास से अपनी समस्याओं का दोष दूसरों पर कैसे डाल दिया? मुझे शर्मिंदगी या बेचैनी क्यों नहीं हुई? इस समस्या की जड़ क्या थी? इसका जवाब खोजते हुए परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जब मसीह-विरोधियों की काट-छाँट और निपटारा किया जाता है, तो सबसे पहले वे उसका विरोध करते हैं और पूरी ताकत से उसे नकार देते हैं। वे उससे लड़ते हैं। और ऐसा क्यों करते है? ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि मसीह-विरोधियों की प्रकृति और सार सत्य से ऊबने और घृणा करने का होता है और वे सत्य जरा-भी नहीं स्वीकारते। स्वाभाविक-सी बात है कि एक मसीह-विरोधी का सार और स्वभाव उन्हें अपनी गलतियों को मानने या अपने भ्रष्ट स्वभाव को स्वीकारने से रोकता है। इन दो तथ्यों के आधार पर, काट-छाँट और निपटाए जाने के प्रति एक मसीह-विरोधी का रवैया उसे पूरी तरह से नकारने और विरोध करने का होता है। वे दिल की गहराइयों से इससे घृणा और इसका विरोध करते हैं, उनमें जरा-सा भी स्वीकृति या समर्पण का भाव नहीं होता, तो सच्चे आत्मचिंतन या पश्चात्ताप की तो बात ही दूर है। जब किसी मसीह-विरोधी की काट-छाँट कर उससे निपटा जाता है, तो यह किसने किया है, यह किससे संबंधित है, उस मामले के लिए वह किस हद तक दोषी है, भूल कितनी स्पष्ट है, उसने कितनी दुष्टता की है या कलीसिया के लिए उसकी दुष्टता के क्या परिणाम होते हैं—मसीह-विरोधी इनमें से किसी बात पर कोई विचार नहीं करता। एक मसीह-विरोधी के लिए, उसकी काट-छाँट और उससे निपटने वाला बस उसी के पीछे पड़ा है या जानबूझकर उसे दंडित करने के लिए उसमें दोष ढूंढ़ रहा है। मसीह-विरोधी तो यहाँ तक कह सकता है कि उसे धमकाया और अपमानित किया जा रहा है, उसके साथ मानवीय व्यवहार नहीं किया जा रहा, उसे नीचा दिखाकर उसका उपहास किया जा रहा है। मसीह-विरोधी काट-छाँट और निपटारे के बाद भी, इस बात पर कभी विचार नहीं करते कि उन्होंने आखिर क्या गलती की है, उन्होंने किस प्रकार का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया, क्या उन्होंने इस मामले में सिद्धांतों की खोज की, क्या उन्होंने सिद्धांतों के अनुसार कार्य किया या अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कीं। वे न तो अपनी जांच करते हैं, न ही इन बातों पर चिंतन करते हैं और न ही इन मुद्दों पर विचार करते हैं। बल्कि, वे निपटारे और काट-छाँट से अपनी मनमर्जी और गुस्सैल दिमाग से पेश आते हैं" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब कोई पद या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि मसीह-विरोधी काट-छांट और निपटान नहीं स्वीकारते, क्योंकि उनकी प्रकृति सत्य से ऊबने और इससे घृणा करने की होती है। वे परमेश्वर से किसी भी सकारात्मक चीज को स्वीकार नहीं कर पाते, अगर कोई सलाह सत्य के अनुरूप हो तो उससे घृणा करते हैं। मैंने आत्म-चिंतन किया, देखा कि शुरू से आखिर तक बहन की सलाह के प्रति मेरा रवैया नकारने का था, क्योंकि मैंने पहले ही तय कर लिया था कि "तुममें से कोई भी हमारे साथ सीधे काम नहीं करता, पर समझे बिना सलाह देता है, तुम तर्कसंगत नहीं हो और मुश्किलें खड़ी कर रहे हो।" हालांकि मैंने कुछ नहीं कहा, और बात मान लेने का भ्रम पैदा किया था, पर दूसरों के विचारों का खंडन करने और कोई सलाह न मानने के लिए, मैंने अपने दिमाग में सभी कारण सिलसिलेवार ढंग से तैयार रखे हुए थे। मैं बार-बार इस बात पर जोर देती थी कि मैंने वही कहा और किया जो मुझे कहने और करने के लिए कहा गया, पर मेरा मतलब था, "तुम मुझसे और क्या चाहती हो? मैंने वही किया जो कहा गया, तो मैं सत्य का अभ्यास कर रही थी। तुम मुझे दोष नहीं दे सकती। अगर फिर दोष मढ़ोगी तो तुम गलत होगी।" उनके बातों और मदद को स्वीकार न करके मैं सत्य से ऊबने के अपने शैतानी स्वभाव को उजागर कर रही थी। उस समय, मुझे परमेश्वर के वचनों के एक अंश का ख्याल आया, जिसने मुझे झकझोर दिया। परमेश्वर कहते हैं, "बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में सत्य ऐसी चीज़ बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए)। मैं यह मानने का दावा करती थी कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, कि काट-छांट और निपटान लोगों के जीवन प्रवेश के लिए लाभकारी हैं, और आत्म-चिंतन करने से लोगों को मदद मिलती है। पर असलियत में, जब मुझे सचमुच काट-छांट और निपटान का सामना करना पड़ता था, तो मैं प्रतिरोध करती और नाराज हो जाती थी। अगर कोई मुझे दोष देता या सलाह देता तो मैं उसे स्वीकार नहीं करती थी। अपने बचाव में बहाने बनाकर बहस करती थी, और सत्य के सिद्धांतों की बिल्कुल परवाह नहीं करती थी। मैं वही करती जो मैं चाहती थी, अपने मन से चलती थी। विस्तार से विश्लेषण करने के बाद, मैंने देखा कि मेरी बहसबाजी ऊपरी तौर पर तो सुसमाचार कर्मियों के बचाव में थी, पर असल में, मैं अपनी छवि और रुतबे को बचा रही थी, मानो मैं जितनी बहस करूंगी, भाई-बहन मुझे उतना ही सही समझेंगे और मेरे साथ हमदर्दी जताएँगे। इस तरह, सुसमाचार के काम में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न हो, मुझ पर कभी दोष नहीं आएगा, कोई भी मुझ पर दोष नहीं लगाएगा और मेरी छवि खराब नहीं होगी। यह चालबाजी थी! इस बहसबाजी ने ऊपरी तौर पर तो मेरी छवि बचा दी थी, पर चूँकि मैंने सत्य खोजा या स्वीकारा नहीं था, इसलिए अपना शैतानी स्वभाव उजागर कर मैंने अपना चरित्र और गरिमागँवा दी थी। यह समझ में आने के बाद, मुझे पछतावा हुआ कि वर्षों परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी मैंने सही तरीके से सत्य का अनुसरण नहीं किया। जब भी मेरी काट-छांट और निपटान होता, तो कुछ न कहने के बावजूद मेरे दिमाग में तर्क चलते रहते थे और मैं शांत मन से आत्म-चिंतन नहीं कर पाती थी। नतीजा यह हुआ कि मैं अनुभव तो ले रही थी लेकिन प्राप्त कुछ नहीं हो रहा था। यह सोचते हुए, मैंने खुद से कहा, आगे से अगर कुछ मेरी धारणाओं के विपरीत हुआ तो मैं बहस में नहीं उलझूंगी। इसकी बजाय मैं शांत रहकरपरमेश्वर से प्रार्थना करूंगी और सबक सीखूंगी। यह सबसे महत्वपूर्ण था।

जल्दी ही, मैंने पार्टटाइम फिल्म का काम ले लिया। एक दिन, मुझे मैसेज मिला कि एक किसी नवागत ने अफवाहों पर विश्वास कर ग्रुप में कुछ नकारात्मक टिप्पणियाँ और वीडियो भेजे हैं, नवागतों को इस झांसे में फँसने से बचाने के लिए हमें उनके साथ फौरन सत्य पर संगति करनी थी। पर उस समय, मुझे फिल्म के काम से जुड़े एक मसले पर ध्यान देने की जरूरत थी। मैं बड़ी उलझन में पड़ गई, क्योंकि दोनों ही काम बेहद जरूरी थे, पर मैंने पहले ही नवागतों का मामला किसी और को सौंप दिया था, इसलिए मैंने पहले फिल्म शूटिंग में जाने का फैसला किया। फिल्म शूटिंग में ऐसा मसला आ गया कि मुझे देर तक वहाँ रुकना पड़ा। फिर मेरी अगुआ ने मुझे बुलाया और कहा, "तुम चीजों को प्राथमिकता के हिसाब से क्यों नहीं कर पाती? नवागतों का धोखे में फंसना किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? तुम पार्टटाइम फिल्म का काम कर सकती हो, पर इसे तुम्हारे मुख्य काम के आड़े नहीं आना चाहिए, ठीक है? तुम्हें खुद की जांच करके यह देखना चाहिए कि अपने काम को इस तरह लेने के पीछे कहीं कोई इरादा तो नहीं है। शायद तुम्हें कैमरे में अपना चेहरा दिखाना ज्यादा कीमती लगता है।" इस तरह की काट-छांट और निपटान का सामना होने पर मैं फिर से बहस करना चाहती थी। "क्या मैंने पहले ही नवागतों का मामला किसी और को नहीं सौंप दिया था? ज्यादा से ज्यादा समस्या सुलझाने में थोड़ी देर होगी। मैं यह तो मान सकती हूँ कि मुझे कार्य की प्राथमिकताएँ तय करनी नहीं आतीं, पर यह कहना कि मैं अपना चेहरा दिखाना चाहती हूँ, बिल्कुल गलत है! पहली बात तो यह कि मैं यह पार्टटाइम काम एक अभिनेत्री के तौर पर नहीं कर रही, और दूसरे, अपना चेहरा दिखाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, तो तुम मेरे बारे में ऐसा क्यों कह रही हो? क्या तुम्हें यह चिंता है कि मेरा ध्यान बंट जाने से मैं अपने काम में उतनी असरदार नहीं रहूँगी, जिससे तुम्हारे काम के नतीजे खराब दिखेंगे?" यह सोचते हुए, अचानक ही मुझे एहसास हुआ कि मैं गलत हूँ। मैंने अपने दिमाग में इसे किसी दूसरे की गलती कैसे मान लिया था? मैं फिर से किसी दूसरे पर हमला करने की क्यों सोचने लगी थी? क्या मैं फिर से बहसबाजी में नहीं पड़ रही थी? उस घड़ी में, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया, "कारण चाहे जो भी हो—भले ही तुम्हें कोई बहुत बड़ी शिकायत हो—अगर तुम सत्य नहीं स्वीकारते, तो तुम्हारा काम तमाम है। परमेश्वर तुम्हारा रवैया देखता है, खासकर उन मामलों में, जो सत्य के अभ्यास से संबंधित हैं। क्या शिकायत करना तुम्हारे काम आएगा? क्या तुम्हारे शिकायत करने से भ्रष्ट स्वभाव की समस्याओं का समाधान हो सकता है? और अगर तुम्हारी शिकायत जायज भी है, तो क्या? क्या तुम सत्य हासिल कर लोगे? क्या परमेश्वर तुम्हें अपने सामने स्वीकार करेगा? जब परमेश्वर कहता है, 'तुम सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति नहीं हो। दूर हटो; मुझे तुमसे चिढ़ है,' तो क्या तुम्हारा काम तमाम नहीं हो जाता? इस एक वाक्यांश—'मुझे तुमसे चिढ़ है'—से परमेश्वर तुम्हें एक व्यक्ति के रूप में प्रकट और परिभाषित कर देता है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्‍वर के प्रति समर्पण सत्‍य प्राप्‍त करने में बुनियादी सबक है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि जब मैं काट-छांट और निपटान का सामना कर रही थी, तो परमेश्वर मेरा रवैया देखना चाहता था। अगर मैं हमेशा बहस करूंगी, दूसरों की गलतियाँ पकड़ूँगी, सत्य नहीं खोजूँगी और मसलों पर अड़ जाऊँगी, तो मैंने सबक नहीं सीखा है। मेरे तर्क कितने ही अच्छे और ऊंचे क्यों न लगें, भले ही हर कोई उन्हें समझ सके और उनका समर्थन करे, पर इसका क्या लाभ था? अगर मैं सत्य न स्वीकारूँ, तो मेरा जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। यह सब सोचते हुए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि मुझे राह दिखाए ताकि उसकी इच्छा समझ सकूँ। अगले कुछ दिनों तक, मैं अक्सर खुद से पूछती, "मुझमें कौन-से भ्रामक इरादे हैं?" मैंने आत्म-चिंतन किया तो अचानक मुझे कुछ सूझा। पार्टटाइम फिल्मी काम में, मैं जानती थी कि वरिष्ठ अगुआ इस काम के लिए मुझे चाहते हैं, इसलिए मैं फौरन तत्परता दिखाई। वरिष्ठ अगुआओं के लिए फिल्म बहुत महत्वपूर्ण थी, इसलिए मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ करना था। हालांकि यह पार्टटाइम काम था, पर मैं हर चीज पर खूब ध्यान देकर एक मुकम्मल सलाह देना चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि किसी तरह की कोई समस्या पैदा हो। अगर कुछ गलत हो गया तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? इसलिए, इस दौरान मैं बहुत जोश में और तत्पर थी। मेरे कैमरे में नहीं दिखने का यह मतलब नहीं था कि मेरे निजी इरादे नहीं थे। दरअसल, मैं यह काम अगुआओं और दूसरों का सम्मान पाने के लिए कर रही थी। मैं यह अपनी छवि और रुतबे के लिए कर रही थी। नवागतों को झांसा देने जैसे महत्वपूर्ण मामले में मुझे फिल्म कार्य से जुड़े भाई-बहनों से अपने कार्यक्रम की चर्चा करनी चाहिए थी, फिर मैं आसानी से पहले नवागतों के मसले को देख सकती थी। पर जब मैंने सोचा कि वरिष्ठ अगुआ फिल्म में कितनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं, तो मैं प्राथमिकताएँ तय नहीं कर पाई, और नवागतों के मसले को छोड़कर पहले फिल्म की शूटिंग में चली गई। मैं अपने कर्तव्य में परमेश्वर की इच्छा का ध्यान नहीं रख रही थी। मैं दूसरों के दिल में छवि और रुतबे को बनाए रखने पर ध्यान दे रही थी। मैं कितनी स्वार्थी और घिनौनी थी! अगर बहन ने मेरी काट-छांट और निपटान न किया होता तो मैंने आत्म-चिंतन न किया होता, और मैं काम में अपने निजी इरादों की मिलावट को पहचान न पाती। इसका एहसास हो जाने पर, मेरी सारी शिकायतें दूर हो गईं। मुझे लगा कि मैं भ्रष्ट थी और मेरे इरादे बुरे थे। परमेश्वर मुझे अपमानित या शर्मिंदा करने के लिए लोगों और मामलों द्वारा मेरी काट-छांट और निपटान नहीं करता, यह मुझे शुद्ध करने के लिए था, सिद्धांतों के अनुसार काम करने की राह दिखाने और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश में मदद के लिए था। मुझे यह भी समझ आया कि अगर मैं अपने लिए बहसबाजी न करूँ, आज्ञापालन और खोज करूँ, तो परमेश्वर मुझे अपने दोषों और कमियों का एहसास करवाने के लिए प्रबुद्ध करेगा, ताकि मैं अपने विचारों के हिसाब से चलने और परमेश्वर के घर के काम को नुकसान पहुंचाने से बच सकूँ। इन एहसासों और प्राप्तियों के बाद, न सिर्फ मेरे मन की यंत्रणा खत्म हो गई, बल्कि एक संतुष्टि महसूस करने लगी। वे शानदार अनुभव थे।

बाद में, परमेश्वर के वचनों में मुझे अभ्यास के मार्ग मिले। परमेश्वर कहते हैं, "आज्ञाकारिता का पाठ सीखने से मुख्य रूप से लोगों की किस अवस्था का समाधान होता है? यह लोगों का अहंकारी और दंभी स्वभाव दूर करता है, और यह सभी स्वभावों में सबसे विद्रोही स्वभाव का समाधान करता है जो है तर्क करने की प्रवृत्ति। जब लोग सत्य स्वीकार कर अपने तर्क पेश करना बंद कर देते हैं, तो विद्रोह की यह समस्या हल हो जाती है और वे आज्ञाकारी बनने में समर्थ हो जाते हैं। अगर लोगों को आज्ञाकारी बनने में सक्षम होना है, तो क्या उनमें कुछ हद तक तार्किकता होनी आवश्यक है? उनमें एक सामान्य व्यक्ति की समझ होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, कुछ मामलों में : हमने सही काम किया हो या न किया हो, अगर परमेश्वर संतुष्ट नहीं है, तो हमें वही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, परमेश्वर के वचन हर चीज के लिए मानक हैं। क्या यह तर्कसंगत है? लोगों में इस भावना का होना सबसे जरूरी है। हम चाहे कितना भी कष्ट उठाएँ, हमारे इरादे, उद्देश्य और कारण कुछ भी हों, यदि परमेश्वर संतुष्ट नहीं है—यदि परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुई हैं—तो हमारे कार्य निस्संदेह सत्य के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए हमें परमेश्वर की बात मानकर उसका आज्ञापालन करना चाहिए, परमेश्वर के साथ बहस या तर्क करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जब तुममें ऐसी तर्कसंगतता होगी, जब तुममें एक सामान्य व्यक्ति की समझ होगी, तो तुम्हारे लिए अपनी समस्याएँ हल करना आसान होगा, तुम सच में आज्ञाकारी होगे, किसी भी स्थिति में तुम अवज्ञाकारी नहीं बनोगे और परमेश्वर की अपेक्षाओं की अवहेलना नहीं करोगे, तुम यह विश्लेषण नहीं करोगे कि परमेश्वर ने जो कहा है वह सही है या गलत, अच्छा है या बुरा, तुम आज्ञापालन कर पाओगे—इस तरह तुम अपनी तर्क, हठधर्मिता और विद्रोह की स्थिति को हल कर सकते हो। क्या सबके भीतर ऐसी विद्रोही स्थिति होती है? लोगों में अक्सर ये अवस्थाएँ दिखाई देती हैं और वे सोचते हैं, 'अगर मेरा दृष्टिकोण, प्रस्ताव और सुझाव विवेकपूर्ण है, अगर मैं कुछ गलत भी करूँ, तो भी मेरी काट-छाँट या निपटारा नहीं किया जाना चाहिए, मैं काट-छाँट और निपटारे को नकार सकता हूँ।' यह लोगों में एक सामान्य अवस्था है, और परमेश्वर का आज्ञापालन न कर पाने में प्राथमिक कठिनाई है। अगर लोग वाकई सत्य समझ लें, तो वे इस तरह की विद्रोही अवस्था को प्रभावी ढंग से हल कर सकते हैं" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पाँच शर्तें, जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चलने के लिए पूरा करना आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों पर मनन के बाद, मैंने जाना कि बहस करने के विद्रोही स्वभाव को हल करने के लिए आज्ञाकारिता का रवैया अहम है। तुम्हारे हालात कुछ भी हों, तुम्हारे तर्क कितने ही अच्छे हों, अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, या कोई उन पर एतराज जताता है, तो तुम्हें पहले स्वीकार कर सत्य खोजना चाहिए, आत्म-चिंतन कर खुद को समझना चाहिए। तुम्हारे पास यह समझ और अभ्यास का मार्ग होना चाहिए। बहस करने वाले खोज नहीं करते, सत्य नहीं स्वीकारते, उनमें आज्ञाकारी रवैये का अभाव होता है, वे कितना भी अनुभव कर लें, जीवन में कभी विकास नहीं कर पाएँगे। सिर्फ सत्य स्वीकार कर, परमेश्वर का आज्ञापालन करके, के, और उसके वचनों की रोशनी में चिंतन करके ही हमारे भ्रष्ट स्वभाव बदल सकते हैं। परमेश्वर में विश्वास के इन तमाम वर्षों में, जब भी मेरी काट-छांट और निपटान हुआ, तो मैंने मन में प्रतिरोध महसूस किया और बहस करना चाहा। मैंने सत्य पाने के कितने ही अवसर गंवा दिए, इस तरह बीस वर्ष और विश्वास करके भी, मुझे क्या हासिल होगा? यह एहसास करके मैंने खुद से कहा, अब आगे से, जब भी मेरी काट-छांट और निपटान होगा, तो मुझे कितना ही बुरा क्यों न लगे, मैं आज्ञापालन करूंगी और सबक सीखूंगी। ये सत्य पाने और खुद में बदलाव लाने के अवसर हैं, मैं इन्हें संजोकर रखूँगी, सत्य स्वीकारने और परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाली इंसान बनूँगी।

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