एंजल की कहानी

21 अप्रैल, 2023

मैं अगस्त 2020 में फेसबुक पर बहन यी शियांग से मिली। उसने बताया कि प्रभु यीशु लौट आया है, वह कई सत्य व्यक्त करते हुए, अंत के दिनों का न्याय कार्य कर रहा है। उसने न्याय कार्य करने के लिए परमेश्वर के लौटकर आने की भविष्यवाणियां भी बताईं। “क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्‍वर के घर से न्याय शुरू किया जाए(1 पतरस 4:17)। “यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा(यूहन्ना 12:47-48)। “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा(यूहन्ना 16:12-13)। इसे पढ़कर और यी शियांग की संगति सुनकर, मैं समझ गई कि प्रभु यीशु ने सिर्फ छुटकारे का कार्य किया था। विश्वासियों के पाप भले ही माफ हो गए हों, पर हमारी पापी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ है। हम कलीसिया जाते हैं, प्रार्थना कर पाप कबूलते हैं, फिर भी झूठ बोलते और पाप करते हैं, पाप के बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते। हमें ज़रूरत है कि परमेश्वर न्याय और स्वच्छ बनाने का कार्य करे, ताकि हम सच में इन बंधनों से मुक्त होकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने लायक बन सकें। यी शियांग की संगति प्रबुद्ध करने वाली थी, उसने जो बताया वो मैंने कलीसिया में कभी नहीं सुना था। मैं छानबीन करना चाहती थी।

पहले, दो भाई सुसमाचार साझा करने हमारे गाँव आये। मैंने उनकी मेजबानी की। एक बार, उनके उपदेश सुनने बीस से ज्यादा गाँव वाले मेरे घर आये। उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से पोषण मिला, उन्हें वे बहुत पसंद आए, वे और जानना चाहते थे। अगले दिन, पादरियों और एल्डरों को उन भाइयों के सुसमाचार प्रचार की खबर मिली, तो वे मेरे घर मुझे रोकने आ गये। दरवाजे से अंदर आते ही पादरी तियान ने पूछा : “तुम्हारे घर प्रचार करने कौन आया है?” उनके इतने सख्त तेवर देखकर मैं तो बहुत ज्यादा घबरा गई थी। मुझे चिंता हुई कि अगर पादरी जान गए कि दोनों भाई सुसमाचार प्रचार के लिए आए थे, तो उनके लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी। तो मैंने कहा : “वे मेरे मित्र हैं जिनसे मैं ऑनलाइन मिली थी।” पादरी चेन ने कहा : “हमने सुना कि वे अपना सुसमाचार फैलाने आये थे। दोबारा उनकी मेजबानी मत करना! अगर पता चला, तो तुम्हारे पति को बता दूंगा कि तुम यहाँ मर्दों को बुलाती हो!” उनकी बात सुनकर मुझे काफी गुस्सा आया। मैं सिर्फ तभी मेजबानी की जब वे गाँव वालों को सुसमाचार सुनाने आए थे। मैंने कोई शर्मिंदगी वाला काम नहीं किया था, पर पादरी झूठ बोलकर मुझे डराना चाहते थे। फिर पादरी तियान ने कहा : “उनके सुसमाचार पर विश्वास मत करो, प्रभु यीशु ने साफ कहा है : ‘उस समय यदि कोई तुम से कहे, “देखो, मसीह यहाँ है!” या “वहाँ है!” तो विश्‍वास न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्‍ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिह्न, और अद्भुत काम दिखाएँगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें(मत्ती 24:23-24)। अंत के दिनों में बहुत-से झूठे मसीह सामने आएंगे। प्रभु के आने की बात कहने वाले सभी झूठे हैं। उनके बहकावे में मत आओ। मैं तुम्हें बचाने के लिए कह रहा हूँ। तुम धोखा खा सकती हो।” उस वक्त मुझे पादरी की बातों की समझ नहीं थी, मैंने सोचा, वे इतने सालों से विश्वासी हैं, काफी कुछ जानते हैं, और उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह सब बाइबल के अनुरूप ही है। अगर उनकी बात सही हुई तो मैं क्या करूंगी? अगर मैं गुमराह हो गई तो क्या होगा? तो मैंने उन पादरियों की बातों पर विश्वास कर लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों ने मुझे सभाओं में बुलाया, पर मैंने इनकार के लिए बहाने बनाये, अपना फेसबुक अकाउंट भी बदल लिया, और उनसे सारे रिश्ते तोड़ लिये।

मैंने करीब दो हफ्ते तक सभा नहीं की। पूरे दिन घर बैठकर दोस्तों से ऑनलाइन चैट करने और वीडियो देखने में बिताने लगी। मैं काफी ऊब गई थी। अक्सर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों के साथ सभाएं करने के दिनों को याद करती, तब मैं दिल से खुश और संतुष्ट रहती थी, मगर अब मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी। मैंने सोचा : “अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, तो उसे न स्वीकार कर क्या मैं उद्धार का मौका चूक जाऊंगी? मगर पादरियों ने कहा था कि अंत के दिनों में झूठे मसीह आएंगे। प्रभु की वापसी की बात करने वाले सभी झूठे हैं। कहीं मैं धोखा खा गई तो क्या होगा?” मैं बेहद उलझन और असमंजस में थी, तो मैंने जानने के लिए प्रभु से प्रार्थना की : “हे प्रभु यीशु, मुझे कोई समझ नहीं है, नहीं पता किसकी बात मानूं, किसकी नहीं। मुझे प्रबुद्ध करो, ताकि मैं तुम्हारी इच्छा समझ सकूं और उद्धार का मौका न गंवाऊँ।” प्रार्थना के बाद लगा कि मैं बिना खोजबीन किये नहीं भाग सकती, स्पष्टता के लिए मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों को ढूंढना ही होगा। मगर मुझे हैरानी हुई, जब दो सभाओं के बाद ही पादरियों को पता चल गया। उन्होंने हमें सभा के लिए पादरी तियान के घर बुलाया। मैं बहुत घबराई हुई थी। पादरी क्या करने वाले थे, इसका कोई अंदाजा नहीं था। उस रात हम पादरी के घर गए। वहाँ कुछ और पादरी और एल्डर भी थे। फिर तियान ने कहा : “सुना है तुम कुछ समय से ऑनलाइन उपदेश सुन रही हो। हमारे उपदेश छोड़कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के उपदेश क्यों सुनना? कलीसिया आकर हमारे उपदेश सुनो, प्रभु के सामने अपने पाप कबूलो, तो परमेश्वर इसे भूल जाएगा। जब प्रभु लौटेगा तो हम सबको स्वर्ग में ले जाएगा।” मैंने सोचा, “विश्वासियों को तो परमेश्वर के वचन सुनने चाहिए। ये पादरी और एल्डर हमें हरदम अपनी सुनाना चाहते हैं। वे हमें परमेश्वर के सामने ला रहे हैं या अपने सामने?” पादरी की बात मुझे जँची नहीं लेकिन मैंने उसका खंडन नहीं किया। उसके बाद हमें एक नोटबुक सौंपकर पादरी तियान ने चिल्लाते हुए कहा, “क्या तुम लोग दूसरे परमेश्वरों को चुनते हो? अभी फैसला करो! सर्वशक्तिमान परमेश्वर को चुनते हो तो यहां निशान लगा दो। अगर नहीं तो अपने नाम के आगे सही का निशान बना दो। अगर तुम दूसरे परमेश्वरों पर विश्वास करोगे तो मुसीबत में पड़ जाओगे। जब शादियाँ, मरनी या घर बनाने जैसे मामलों में हम मदद नहीं करेंगे। हम तुम्हारे परिवारों की भी कोई मदद नहीं करेंगे।” मेरे इलाके में ऐसे रीति-रिवाजों का बहुत ज्यादा ही महत्व है। पादरियों के समर्थन के बिना दूसरे गाँव वाले हमारा साथ नहीं देंगे। तब मैं काफी कमजोर थी। मैंने सोचा, “मेरा परिवार एक मकान बनाना चाहता है। गाँव के रिवाज के अनुसार, इसकी अध्यक्षता पादरी और एल्डरों को करनी होगी। अगर वे इसे मंजूर नहीं करेंगे तो मदद करने कोई नहीं आएगा। अगर मैं ऑनलाइन सभाओं में भाग लेती रही, तो घर में कोई बात होने पर मुश्किल हो जाएगी। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन प्रभु की वाणी जैसे लगते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटा प्रभु यीशु हो सकता है। पादरियों के कहे अनुसार सर्वशक्तिमान परमेश्वर को त्यागा तो क्या मैं परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही?” यह सोचकर मैंने अपने नाम के आगे x लिख दिया। दूसरों ने भी x लिखे। सिर्फ एक ने ऐसा नहीं किया। पादरी तिलमिला गया। उसने कहा, “अब जब मुसीबतें आएंगी तो गाँव वाले तुम्हारी मदद करने नहीं आएंगे। न हम तुम्हारे लिए प्रार्थना करेंगे। सारी बात खत्म। अब से हमारे रास्ते अलग हो चुके हैं।”

मैं गुस्से में थी, और उलझन में भी थी। उन झूठे मसीहों का क्या जिनकी बात पादरी कर रहे थे? मैंने उन बहनों से पूछा जिनके साथ मैंने सभा की थी। एक ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सुनाए। “देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए वह मसीह जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार होता है, और उसके कार्य में परमेश्वर का स्वभाव और बुद्धि होती है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है, जिसे धारण करके परमेश्वर मनुष्यों के बीच रहकर अपना कार्य पूरा करता है। कोई मनुष्य इस देह की जगह नहीं ले सकता, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पर्याप्त रूप से सँभाल सकती है और परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, और परमेश्वर का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व कर सकती है, और मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है। मसीह का भेस धारण करने वाले लोगों का देर-सबेर पतन हो जाएगा, क्योंकि हालाँकि वे मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें मसीह के सार का लेशमात्र भी नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती, बल्कि इसका उत्तर और निर्णय स्वयं परमेश्वर द्वारा ही दिया-लिया जाता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है)। फिर यह कहकर संगति की, “हम झूठे मसीहों के बीच असली वाले को कैसे पहचानेंगे? मसीह परमेश्वर का आत्मा है जो देह धरकर मानव रूप में धरती पर आया है। वह सत्य का मूर्त रूप और मुक्तिदाता है। मसीह रहस्य खोल और सत्य व्यक्त कर सकता है। वह इंसान को स्वच्छ बनाकर बचा सकता है, परमेश्वर का कार्य कर सकता है। लेकिन झूठे मसीह दरअसल राक्षस होते हैं। वे परमेश्वर होने का चाहे जितना भी दावा करें, वे न कोई सत्य व्यक्त कर सकते हैं, न ही मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य। वे सिर्फ कुछ सिद्धांत बघार सकते हैं या लोगों को छलने के लिए कुछ छोटे-मोटे चमत्कार दिखा सकते हैं।” फिर उसने एक उदाहरण दिया। मान लो कि सफेद कोट पहने दस लोग आला लेकर डाक्टर होने का दावा करते हैं। लेकिन उनमें से एक ही है। तो हम असली वाले को कैसे पहचानेंगे? हम सिर्फ उनका रंग-ढंग या उनका पहनावा नहीं देख सकते। मुख्य यह है कि बीमारी कौन ठीक कर सकता है। जो बीमारी ठीक कर सकता है, वही असली डॉक्टर है। मसीह की पहचान करते समय, हम वेश-भूषा पर ध्यान नहीं दे सकते। हमें इसका फैसला उसके कार्य, वचनों और स्वभाव के आधार पर करना होगा। अगर वह सत्य को व्यक्त और मानवजाति को बचाने का कार्य कर सके, तो वह मसीह है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हमें दिखाते हैं कि उसके वचन सत्य हैं और उनमें शक्ति है। उनमें अधिकार है। वह परमेश्वर के छह हजार साल की प्रबंधन योजना के रहस्य, उसके तीन चरणों का कार्य, उसका देहधारण, उसके नाम और बाइबल की सच्ची कहानी को प्रकट करता है। वह शैतान के हाथों इंसान के भ्रष्ट होने के सत्य और इंसान के परमेश्वर-विरोध के स्रोत को प्रकट करता है। इससे हमें अपना भ्रष्ट स्वभाव समझने में मदद मिलती है। वह हमें ये भी बताता है कि परमेश्वर कैसे लोगों को पसंद और किन्हें नापसंद करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और किन्हें सजा मिलेगी। वह अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है, जिसका अपमान नहीं किया जा सकता। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने वे सारे सत्य व्यक्त किए हैं जिनकी भ्रष्ट मानवजाति को बचाए जाने के लिए जरूरत है और वह अंत के दिनों का न्याय कार्य कर रहा है। इन सब बातों से हम सुनिश्चित हो सकते हैं : सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही अंत के दिनों का मसीह और देहधारी परमेश्वर है। झूठे मसीह कोई सत्य व्यक्त नहीं कर सकते, न मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य कर सकते हैं, इंसान की भ्रष्टता दूर करना तो दूर की बात है। वे अपने को चाहे जितना परमेश्वर बताएँ, वे झूठे हैं। वे दुष्ट आत्माएँ हैं और उनका पतन तय है।

उसकी संगति के बाद मेरा मन काफी उजला हो गया। मैंने देखा कि अगर मुझे सच्चे मसीह को पहचानना है तो मैं पादरी की बातें नहीं मान सकती। सबसे महत्वपूर्ण यह देखना है कि क्या वह सत्य व्यक्त कर मानवजाति को बचाने का काम कर सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कितने ही सत्य व्यक्त किए हैं, बाइबल के रहस्य प्रकट किए हैं इंसान के न्याय और उसे स्वच्छ करने का कार्य किया है। ये चीजें किसी इंसान के बस की बात नहीं है। मुझे यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटा हुआ प्रभु यीशु है। उसके बाद मैंने गाँव में भाई-बहनों के साथ अक्सर सभाएँ कीं।

अप्रैल 2021 में, मेरे पति का पुराना रोग उभर आया और बदकिस्मती से इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। मेरे रिश्तेदार चाहते थे कि पादरी दफनाने की रस्मों के आयोजन में मेरी मदद करें। लेकिन पादरियों और एल्डरों ने मेरा मजाक उड़ाया। उन्होंने मेरी आस्था छुड़वाने के लिए इस मौके का फायदा उठाना चाहा। गाँव के मुखिया ने भी ऐसा ही किया। उन्हें अनसुना करने के लिए उसने मुझे फटकारा और गाँव वालों को मेरी मदद करने से रोक दिया। उसने कहा, “अगर तुम सबके सामने कबूल लो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर को त्यागने का वादा करो, हमारी कलीसिया से फिर से जुड़ो, तो हम तुम्हारे पति को दफनाने में मदद करेंगे।” कभी नहीं सोचा था कि वे मेरा विश्वास भंग करने के लिए मेरे पति के अंतिम संस्कार का सहारा करेंगे। यह कितनी घिनौनी बात थी। उनके सामने कबूलने का कोई तुक नहीं था। अपने पाँच माह के बच्चे को थामे मैं बस रोती रही। फिर, जब मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने मेरे परिवार पर दबाव डाला कि वे मुझे गलती मानने को कहें वहाँ मेरे पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं था। मैं काँपती रही और निहायत अकेली पड़ गई। मैंने सोचा, “अगर मैं अपनी गलती नहीं मानती हूँ तो वे मेरे पति को दफनाने में मदद नहीं करेंगे, अगर गलती मानती हूँ तो परमेश्वर को नकार कर धोखा दे रही होऊँगी। मुझे क्या करना चाहिए?” दुख में मैंने परमेश्वर को याद किया। “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मुझे विश्वास है कि तुम स्वयं परमेश्वर हो, सबके अद्वितीय रचयिता, मेजबानों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सब कुछ तुम्हारे हाथ में है। मैं तुम्हारी व्यवस्था के आगे समर्पण करूँगी।” इसके बाद मैंने परमेश्वर के कुछ वचन याद किए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। ... जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। मैं समझ गई। देखने में तो ऐसा लग रहा था, मानो पादरी और गाँव का मुखिया मुझे सता और रोक रहे हैं। लेकिन हकीकत में यह सब खलल बस शैतान डाल रहा था। भले ही उन्होंने कहा कि यह मेरे भले के लिए है, हकीकत में वे कफन-दफन, शादी-ब्याह, बच्चों के जन्म और घर बनाने से जुड़े रीति-रिवाजों का इस्तेमाल कर गाँव वालों को मुझे छोड़ने पर बाध्य कर रहे थे, ताकि उनके दबाव में मैं परमेश्वर को दगा दे दूँ। वे चाहते थे कि मैं उनके धर्म में रहूँ और पिछलग्गू बनकर उनके आदेश मानती रहूँ। अंत के दिनों का न्याय कार्य करने के लिए परमेश्वर अनुग्रह के युग की कलीसियाओं को छोड़ चुका है। जानती थी कि अगर मैंने उनकी सुनी, दुबारा उनकी कलीसिया गई, तो मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का मौका खो दूँगी। यही नहीं, मुझे उनके साथ ही नरक भेजा जाएगा और सजा दी जाएगी। यह शैतान का नीच इरादा था। वे चाहे जैसे मेरे आड़े आएँ, मुझे उनकी बातें नहीं सुननी थीं। मुझे प्रार्थना कर गवाही में अडिग रहना था, शैतान को शर्मसार करना था। लेकिन अभी मेरे पति को दफनाया जाना बाकी था। यह एक व्यावहारिक समस्या थी। गाँव वाले ही नहीं, मेरा परिवार भी उन पादरियों के कहने पर चल रहा था, इसलिए वे मदद नहीं करेंगे। मैं क्या कर सकती थी? लिहाजा मैं परमेश्वर को पुकारती रही, “हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मेरे पति को दफनाने में कोई मेरी मदद करता है या नहीं, यह सब तुम्हारे ऊपर है। मुझे तुम्हीं पर विश्वास है। सब तुम्हारे हाथ है। चाहे जो हो, मैं तुमसे दगा नहीं करूँगी। तुम्हारे सामने समर्पण करूँगी।” उसके बाद मुझे कुछ सुकून मिला और दर्द का एहसास घट गया। तभी मैंने बाहर अपने अंकल को किसी से कहते सुना : “मैं विनती करता हूँ। अपनी भतीजी की ओर से आप सब से माफी माँगता हूँ।” मुखिया ने कहा, “माफी तो उसे ही माँगनी होगी।” मैंने यही सोचा, “मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ, इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन वे जितनी ज्यादा कोशिश करेंगे, अपनी गवाही में मुझे उतना ही अडिग रहना होगा।” हुआ यह कि करीब दस मिनट बाद मेरी माँ का फोन आया। उन्होंने अचानक कहा, “सुनो, सब कुछ ठीक है। तुम्हारे पति के फौजी दोस्त आकर सारी मदद करेंगे। वे निकल चुके हैं, पहुँचते ही होंगे।” यह सुनते ही मैं भावुक हो गई। संकट की उस घड़ी में जब मैं सबसे ज्यादा असहाय थी, परमेश्वर ने मेरी मदद के लिए लोगों को भेजा। तब मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया। “तुम जानते हो कि तुम्हारे आसपास के परिवेश में सभी चीजें मेरी अनुमति से हैं, सब मेरे द्वारा आयोजित हैं। स्पष्ट रूप से देखो और अपने को मेरे द्वारा दिए गए परिवेश में मेरे दिल को संतुष्ट करो। डरो मत, समुदायों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे खड़ा है और तुम्हारी ढाल है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 26)। मैंने देखा कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है। अगर हम उस पर भरोसा करें, तो वह हमारे लिए रास्ता बनाएगा। वे अब भी मुझे सताते थे, मगर मैंने परमेश्वर का मार्गदर्शन देखा था। अब मेरा दिल झुक नहीं सकता था। मैं न कमजोर रही, न नकारात्मक।

दफनाने का बंदोबस्त होने के बाद से मेरी सास मुझे अक्सर डाँटती थी। कहती कि गाँव वाले हमसे कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मैंने प्रभु यीशु को धोखा दिया है। रिश्तेदार भी कहते हैं कि मैं गलत परमेश्वर पर विश्वास करती हूँ। मेरे माँ के परिवार वाले मेरे पास आने की हिम्मत न करते। सिर्फ मेरी माँ मुझसे मिलने आती। लेकिन वह अक्सर कहतीं, “तुम पादरियों की या गाँव के मुखिया की बात क्यों नहीं सुनती हो? कुछ तो सोचो। अब तो तुम्हारा पति भी नहीं रहा। उन लोगों या तुम्हारे ससुराल वालों के अलावा तुम्हारी मदद कौन करेगा? तुम्हारा बच्चा छोटा है। बस कबूल लो। सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करना बंद करो।” मैं जहाँ-कहीं जाती, गाँव वाले पीठ पीछे रोजाना मेरे बारे में ही बात करते रहते। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर मेरे विश्वास के बारे में गप-शप करते रहते। मैंने सोचा, पहले तो हम सबमें ठीक से निभ रही थी। लेकिन अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर मेरे विश्वास के कारण वे मेरा बहिष्कार कर रहे हैं। मैं आहत हुई और बहुत बुरा लगा। तब म्यांमार में इंटरनेट कट गया। इसलिए मैं ऑनलाइन उपदेश नहीं सुन सकी। और दूसरे लोग मेरे घर आकर संगति करने का साहस नहीं जुटा पाए। ऐसा लगा कि मैं अँधेरे में घिर चुकी हूँ, कहीं कोई उजाला नहीं दिखा। मैं बस परमेश्वर से प्रार्थना कर इन अंधकार भरे दिनों से निकलने का मार्गदर्शन माँगती रहती। एक दिन मुझे परमेश्वर के वचनों का मैसेज मिला। “निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे लिए चीज़ें स्पष्ट कर दूँगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है; कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएँ, है न? आज हर किसी को कठोर परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्यार करने वाला तुम लोगों का दिल मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं होगा। यदि ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त भी हों, तो भी सभी को इनसे गुज़रना होगा; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की कठिनाई हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी। परीक्षण मेरे आशीष हैं, और तुममें से कितने मेरे सामने आकर घुटनों के बल गिड़गिड़ाकर मेरे आशीष माँगते हैं? बेवकूफ़ बच्चे! तुम्हें हमेशा लगता है कि कुछ मांगलिक वचन ही मेरा आशीष होते हैं, किंतु तुम्हें यह नहीं लगता कि कड़वाहट भी मेरे आशीषों में से एक है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 41)। ये वचन पढ़कर मैं बहुत भावुक हो गई। मानो कई दिनों तक बीमार पड़े रहने के बाद कोई दवा मिली हो। फिर मैं नई शक्ति और आस्था से भर गई। परमेश्वर के वचनों पर विचार कर मेरी समझ साफ हो गई। जीवन में परमेश्वर का अनुसरण करना आसान नहीं है। हर किसी को घोर कष्ट सहने पड़ते हैं। मेरे शरीर को कष्ट तो हुआ, लेकिन मुझे परमेश्वर पर यकीन और अधिक प्रार्थना करने की प्रेरणा मिली। मैंने जितने ज्यादा कष्ट सहे, सत्य खोजने का उत्साह उतना ही बढ़ गया। अनजाने में ही सही, मुझे परमेश्वर की संप्रभुता का कुछ ज्ञान मिल गया। परमेश्वर के साथ मेरा संबंध सुधर गया, उसका अनुसरण करने पर मैं अटल थी। तुम्हें पता ही है, मैं हमेशा से विश्वासी थी, लेकिन मैंने अब तक सिर्फ उससे प्राप्त अनुग्रह और खुशी का आनंद लेना ही आता था। मैं पहले कभी पीड़ा या परीक्षाओं से नहीं गुजरी। इससे पहले प्रभु के या दूसरों में भेद करने के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की विश्वासी के नाते, इन मुश्किलों के कारण मुझे कुछ कष्ट हुआ लेकिन अब मैं लोगों को समझ पाती हूँ। मैंने पादरियों और एल्डरों का परमेश्वर-विरोधी कपटी रुख देखा। पहले मैं समझती थी कि पादरी बाइबल को समझाकर हमारे लिए प्रार्थना करते हैं, इसलिए मैं सोचती थी कि वे स्नेही हैं, बाइबल और परमेश्वर को समझते हैं। लेकिन यह सुनकर भी कि प्रभु यीशु लौट चुका है, उन्होंने खोज या पड़ताल नहीं करनी चाही। इससे भी बुरा तो यह, उन्होंने विश्वासियों को परमेश्वर के कार्य की पड़ताल से रोक दिया। गाँव के रीति-रिवाजों और गाँव वालों द्वारा मुझे निशाना बनाया, ताकि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को त्याग दूँ। मैं जान गई कि वे पाखंडी फरीसी हैं। मैंने उन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया। उदासी और पीड़ा भरे उन दिनों के बारे में दुबारा सोचती हूँ कि तब मेरे पास परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन भी नहीं था, और वे राक्षस मुझे पागल बना सकते थे। परमेश्वर के वचनों से मैंने उन सारे कष्टों को पार कर लिया। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की बहुत शुक्रगुजार हूँ। कुछ समय बाद म्यांमार में इंटरनेट बहाल हो गया। मैंने कुछ दूसरे सदस्यों से संपर्क किया और उनके साथ सभा की। लेकिन तब पादरियों और गाँव के मुखिया ने अत्याचार बढ़ा दिए।

जनवरी 2022 में उन्होंने गाँव के सभी लोगों की बैठक बुलाई। लगभग तीन सौ लोग थे। हम चौदह विश्वासी भाई-बहनों को उन्होंने धूप में उकड़ूँ बैठा दिया। मुखिया ने कहा, “इस गाँव में दो अलग-अलग आस्थाएँ नहीं हो सकतीं। मैंने यह सभा इसलिए बुलाई ताकि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मानने वाले एक फैसला कर लो। मैं सारे गाँव वालों की ओर से कह रहा हूँ। क्या तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास जारी रखोगे? या हमारी कलीसिया में लौटना चाहोगे?” फिर उन्होंने एक-एक कर हमारे रिश्तेदारों को बुलाया और हमें मनाने की कोशिश की। भाई एई वाँग के पिता गाँव के एक प्रमुख थे। उन्होंने अपने बेटे से घुटने टेकने को कहा। एई वाँग ने झुकने से इनकार कर कहा, “यह आस्था गलत नहीं है।” उसके पिता गुस्से में बोले, “जिस पर माँ-बाप विश्वास करें, उसी पर विश्वास करो। हमारी बात सुनने के बजाय तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को चुनकर हमें छोड़ रहे हो।” एई वाँग ने कहा, “मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ। लेकिन यह आपको छोड़ना कैसे हुआ? मुझे अपने माँ-बाप से प्यार है। लेकिन उनसे भी ज्यादा प्यार परमेश्वर से है।” यह सुनते ही उसके पिता और आग बबूला हो गए। तभी वह चीखे, “तुम मेरी औलाद हो! तुम्हारा सब कुछ मेरे हाथ में है! तुम इस तरह जवाब नहीं दे सकते!” उन्हें जितना देखा, वे उतने ही ज्यादा घमंडी नजर आते। वे प्रभु पर विश्वास करते थे, मगर उनमें न तो उसके लिए श्रद्धा थी, न वे उसकी स्तुति ही करते थे। फिर एक सरकारी अधिकारी ने कहा, “चीन में सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास की मनाही है। वहाँ विश्वासी गिरफ्तार किए जाते हैं। हम यहाँ अपने हिसाब से तफ्तीश करेंगे। तुम्हें इस विश्वास से किसने जोड़ा? तुम्हारा अगुआ कौन है?” हमारा कोई अगुआ नहीं है। दूसरे अफसर ने भी दबाव डाला, मगर हम कहते रहे कि हमारा कोई अगुआ नहीं है। फिर एक सरकारी अधिकारी ने हमसे पूछा, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर से तुम्हारा क्या आशय है?” तो मैंने कहा, “क्या आप नहीं जानते? सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने आपको बनाया है। वही सृष्टि का प्रभु है।” यह सुनकर वह भड़क गया। उसने कहा कि हमें अब चुनना ही होगा। “अगर तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो कहो ‘कायम है।’ अगर तुम विश्वास नहीं रखना चाहते तो कहो, ‘छोड़ दिया’।” “कायम है” का विकल्प चुनने पर हमारे बारे में शिकायत की जाएगी और उच्च अधिकारी हमसे निपटेंगे। यही नहीं। मुखिया ने कहा कि “कायम है” कहने वालों को गाँव छोड़ना पड़ेगा। जो लोग “छोड़ दिया” कहेंगे, वे गाँव में रहते हुए वापस कलीसिया में जा सकते हैं। तो उसके बाद हमें अपना फैसला सुनाने को कहा गया। मुझसे आगे वाली तीन बहनों ने “छोड़ दिया” कहा। मुझे लगता है कि वे अत्याचार से डर गईं। फिर मेरी बारी आई। मेरे बच्चे को गोद में लिए मेरी माँ चीखकर कहने लगी कि मैं भी विश्वास करना छोड़ दूँ। उन्हें वहाँ देखना भी दर्दनाक था। मैंने सोचा कि अगर मैं पकड़ी गई तो क्या होगा? मेरे बच्चे की देखभाल मेरी माँ को करनी पड़ेगी। इसलिए मैंने प्रार्थना की और परमेश्वर से विश्वास माँगा। प्रभु यीशु ने कहा था, “जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं(मत्ती 10:37-38)। “धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है(मत्ती 5:10)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “परमेश्वर ने कहा था, ‘परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है।’ इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका उद्देश्य सभी लोगों को यह बताना है : हमारा जीवन और हमारी आत्माएँ परमेश्वर से आती हैं; परमेश्वर उनका सृजन करता है। वे हमारे माता-पिता से नहीं आतीं, और प्रकृति से तो निश्चित रूप से नहीं आतीं। परमेश्वर ने उन्हें हमें दिया। सिर्फ हमारी देह हमारे माता-पिता से जन्मी है, पर वह भी परमेश्वर की व्यवस्था से हुआ। चूँकि मानवजाति का सृजन परमेश्वर ने किया था और लोगों के पूर्वजों को परमेश्वर ने बनाया था, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे माता-पिता को भी परमेश्वर ने बनाया था और वे प्रकृति से उत्पन्न नहीं हुए थे। लोगों के भाग्य परमेश्वर के हाथ में हैं। परमेश्वर में हमारा विश्वास कर सकना एक अवसर है, जो उसने हमें दिया है; यह उसके द्वारा विहित है, और यह उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम किसी अन्य व्यक्ति के लिए दायित्व उठाने या जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य नहीं हो; तुम्हारा एकमात्र दायित्व परमेश्वर के प्रति उस कर्तव्य को निभाना है, जो एक सृजित प्राणी को निभाना चाहिए। इंसान के लिए सबसे अधिक यही करना अपेक्षित है, और व्यक्ति के जीवन के सभी महत्वपूर्ण मामलों के बीच, इसे पूरा करना सबसे अधिक आवश्यक है—यह व्यक्ति के जीवन का प्रमुख मामला है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। इससे मैंने सीखा कि हमारी किस्मत केवल परमेश्वर के हाथ में है। हम कहाँ जन्मेंगे-पलेंगे-बढ़ेंगे, हमारे परिवार, जो मुश्किलें हम जिंदगी में झेलेंगे, ये सब कुछ परमेश्वर तय करता है। अपने बच्चे को जन्म तो मैंने दिया है, लेकिन उसके लिए मैं सिर्फ एक माँ होने का कर्तव्य निभा सकती हूँ। मैं उसे जन्म देकर पाल-पोस सकती हूँ। मगर माँ के रूप में अगर कुछ नहीं बदल सकती तो वह है उसकी किस्मत, उसके साथ आगे क्या होगा। कुछ बच्चे बचपन में ही अनाथ हो जाते हैं। ये बच्चे भी पल-बढ़कर जवान होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे मेरे बचपन में ही मेरे माता-पिता ने तलाक ले लिया था। दूसरे बच्चों की तरह मुझे अपने पिता का सहारा नहीं मिला, फिर भी मैं ठीक-ठाक ढंग से पली-बढ़ी। मेरे बच्चे की नियति परमेश्वर ने तय की है। मेरी माँ अभी जवान है। अगर मैं नहीं भी हूँ, तो वह मेरे बेटे को सँभाल सकती है। मुझे उन दोनों को परमेश्वर को सौंपना था और उसकी व्यवस्था के आगे नतमस्तक रहना था। मुझमें यह भावना बढ़ती गई कि मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने और उसके अनुसरण का रास्ता चुनना चाहिए अपनी गवाही में दृढ़ रहकर शैतान को शर्मसार करना चाहिए। फिर मैंने खड़े होकर कहा, “कायम है।” मुखिया ने कहा, “तुम गलती कर रही हो।” मैंने जवाब दिया, “मैं परमेश्वर और उसके वचनों का अनुसरण करूँगी। इसमें कुछ गलत नहीं है।” अधिकारी ने आग बबूला होकर मुझे डाँटा। वह मुझे धर्मभ्रष्ट और गद्दार कहने लगा। मैं अच्छी तरह जानती थी सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य व्यक्त करते हुए अंत के दिनों का न्याय का कार्य कर रहा है। वह लौटा हुआ प्रभु यीशु है। मैंने परमेश्वर की वाणी सुनकर उसका उद्धार स्वीकार लिया था। मैं मेमने के पदचिह्नों पर चल रही थी। यह प्रभु से विश्वासघात कैसे हुआ? मैं उन्हें मुँहतोड़ जवाब देना चाहती थी। लेकिन उन्होंने ऐसा शोर मचाया कि मुझे यह सब कहने का मौका नहीं मिला। एल्डर ली ने मुझे नमकहराम नीच कहा। मुझे पीटने के लिए एक फट्टा उठा लिया। मैं बहुत डर गई। चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना करने लगी। लेकिन तभी मेरी सास ने आगे बढ़कर उसे रोक दिया। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया। फिर पाँच और सदस्यों ने कहा “कायम है।” यह देखकर कि हम झुकेंगे नहीं, वे पूछते रहे कि हमारा अगुआ कौन है। हममें से कोई भी उनसे नहीं बोला। तब हमें धूप में उकड़ूँ बैठे घंटों बीत चुके थे। सुबह साढ़े नौ से शाम के पाँच बजे तक धूप में बैठे सात घंटे से ज्यादा हो गए थे, न खाना मिला था, न पानी। एक भाई का रक्तचाप कम रहता था और वह बेहोश हो गया। उसका परिवार उसे सँभालने आया मगर मुखिया ने उन्हें रोक दिया। उसने कहा, “अगर तुम्हारा परमेश्वर असली परमेश्वर है तो यह बेहोश क्यों हुआ?” उसके बाद मुखिया ने हमें अपने परिवार, हमारे पशु और सारी संपत्ति, सब कुछ लेकर उसी रात गाँव छोड़ने का हुक्म सुनाया। उसने कहा कि गाँव छोड़ने के बाद हमारे घर जला दिए जाएँगे। सरकारी अधिकारी ने कहा, “इनके साथ वक्त बर्बाद मत करो। ये मर जाएंगे लेकिन अपने अगुआ का नाम नहीं बताएंगे। इन्हें पहले घर भेजो। कल मैं इनकी शिकायत सरकार को भेजूँगा। आला अधिकारी ही इनसे निपटेंगे। तभी ये डरेंगे।” लेकिन सच में, मैं ज्यादा डरी नहीं थी। जानती थी कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है। अगर अधिकारी हम सबको पकड़कर ले भी गए, तो यह परमेश्वर की व्यवस्था होगी। सब उसके हाथ में है।

फिर तीसरे दिन, सरकार ने चार सौ लोगों के साथ सारे गाँव की बैठक बुलाई गई। मुझे डर था कि वे हम पर परमेश्वर की निंदा करने और आस्था छोड़ने का दबाव डालेंगे। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और डटे रहने के लिए संरक्षण माँगा। जब हम वहाँ पहुँचे तो जिला के मुखिया ने कहा, “तुम सभी अभी जवान और नादान हो। मैं तुम्हें अभी दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ। अब तुम्हें अपने माता-पिता की आज्ञा मानकर कड़ी मेहनत करनी चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ना और उसके सुसमाचार फैलाना बंद करो। वरना, गाँव का मुखिया तुम सबको गिरफ्तार कर अंदर कर देगा।” प्रशासनिक परिषद के एक अधिकारी ने सबसे कहा, “हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मानने वालों से वैसे ही पेश आएंगे, जैसे सीसीपी पेश आती है। सीसीपी इन विश्वासियों को खोजकर गिरफ्तार करती है, बेखौफ होकर उन्हें पीट-पीटकर मार सकती है। हम भी यहाँ ऐसा ही करेंगे। सभी विश्वासियों की गिरफ्तारी तय है। इससे फर्क नहीं पड़ेगा कि उन्होंने क्या किया है, या फिर वे बेगुनाह हैं या नहीं। हम खुलकर उन्हें पीट-पीटकर मार देंगे। किसी को यह कहने की इजाजत नहीं है कि इन्होंने कुछ गलत नहीं किया। ये सरकार के आदेश हैं। कोई इसे रोक नहीं सकता। जो कोई सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करे, उसके बारे में सूचना दें।” फिर उसने हम भाई-बहनों की ओर इशारा करते हुए कहा, “इनके चेहरे अच्छी तरह देख लो। इन्हें याद रखना। ये सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। इन्हें सभा या प्रवचन करते देखो तो सूचना देना।” उसके बाद एक जिला लिपिक ने परमेश्वर की निंदा करने वाले कागज पढ़कर सबको सुनाए। सरकार के शब्द भयानक थे, इन्होंने सबको धोखे में डाल दिया। कुछ लोगों ने हमें नफरत भरी निगाहों से देखा। उनकी कही बातों से मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं जानती थी कि सरकार हम विश्वासियों पर अत्याचार कर हमें आस्था छोड़ने को मजबूर कर रही है। वह लोगों को डराना और कायर बनाना चाहती है, ताकि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्यों को न देख पाएँ और परमेश्वर का उद्धार गँवा दें। इससे मैं उन राक्षसों से नफरत करने लगी। उसके बाद सरकार ने हमें घर जाने दिया। घर लौटकर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े। “शैतान चाहे जितना भी ‘सामर्थ्यवान’ हो, चाहे वह जितना भी दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी हो, चाहे नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता जितनी भी बड़ी हो, चाहे मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी तकनीकें जितनी भी व्यापक हों, चाहे मनुष्य को डराने की उसकी तरकीबें और योजनाएँ जितनी भी चतुराई से भरी हों, चाहे उसके अस्तित्व के रूप जितने भी परिवर्तनशील हों, वह कभी एक भी जीवित चीज सृजित करने में सक्षम नहीं हुआ, कभी सभी चीजों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाएँ या नियम निर्धारित करने में सक्षम नहीं हुआ, और कभी किसी सजीव या निर्जीव चीज पर शासन और नियंत्रण करने में सक्षम नहीं हुआ। ब्रह्मांड और आकाश के भीतर, एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उससे पैदा हुई हो, या उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उसके द्वारा शासित हो, या उसके द्वारा नियंत्रित हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना है, बल्कि, परमेश्वर के सभी आदेशों और आज्ञाओं का पालन करना है। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान के लिए जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत का एक कण छूना भी मुश्किल है; परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान धरती पर चींटियों का स्थान बदलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है, परमेश्वर द्वारा सृजित मानव-जाति की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर की दृष्टि में, शैतान पहाड़ पर उगने वाली कुमुदनियों से, हवा में उड़ने वाले पक्षियों से, समुद्र में रहने वाली मछलियों से, और पृथ्वी पर रहने वाले कीड़ों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानव-जाति के लिए कार्य करना, और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन-योजना के काम आना है। उसकी प्रकृति कितनी भी दुर्भावनापूर्ण क्यों न हो, और उसका सार कितना भी बुरा क्यों न हो, केवल एक चीज जो वह कर सकता है, वह है अपने कार्य का कर्तव्यनिष्ठा से पालन करना : परमेश्वर के लिए सेवा देना, और परमेश्वर को एक विषमता प्रदान करना। ऐसा है शैतान का सार और उसकी स्थिति। उसका सार जीवन से असंबद्ध है, सामर्थ्य से असंबद्ध है, अधिकार से असंबद्ध है; वह परमेश्वर के हाथ में केवल एक खिलौना है, परमेश्वर की सेवा में रत सिर्फ एक मशीन है!(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। यह पढ़कर मेरा विश्वास बढ़ गया। पादरी हमें दबा सकते हैं। सरकार हमारा उत्पीड़न कर सकती है। हमसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर को छुड़वाने के लिए वे हमारे परिवारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। वे चाहे जो कुछ कहें या करें, परमेश्वर की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जैसे एल्डर ली के साथ हुआ। उसने मुझे पीटना चाहा। लेकिन तभी मेरी सास ने उसे रोक दिया। वह मुझे पसंद नहीं करती थी, फिर भी उसने मुझे बचाया। यह सब कुछ परमेश्वर की व्यवस्था के कारण हुआ। मुझे सारी चीजों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता का सच्चा एहसास हुआ। मुझे लगा कि वह सचमुच मेरी रखवाली कर रहा है। परमेश्वर हमारे आध्यात्मिक कद के अनुरूप स्थितियाँ गढ़ता है। उसने मुझे उतना दिया जितना मैं झेल सकती हूँ। इस अनुभव के जरिए परमेश्वर पर मेरी आस्था बढ़ गई, लगा कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है अच्छा करता है। परमेश्वर का धन्यवाद। और इस सबके जरिए, अब मैं पादरियों और एल्डरों की परमेश्वर-विरोधी प्रकृति को साफ देख सकती हूँ। परमेश्वर के वचन कहते हैं, “ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे ‘मज़बूत देह’ वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं)। इन पादरियों को बाइबल की समझ नहीं है। उन्होंने अब तक बस बाइबल के वचनों और सिद्धांतों को सिखाया। उन्होंने प्रभु का बिल्कुल भी स्वागत नहीं किया, सत्य की खोज तो बहुत दूर की बात है। अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य से सामना होने पर भी उन्होंने सत्य खोजने और छानबीन का प्रयास नहीं किया। उन्होंने परमेश्वर के वचनों का गलत अर्थ लगाया, विश्वासियों को गुमराह करने की कोशिश की, प्रभु की वापसी का प्रचार करने वालों की निंदा की, ताकि विश्वासियों को प्रभु का स्वागत करने से रोक सकें। वे विश्वासियों की रक्षा का दावा करते थे। पर उन्हें डर था कि हम उनके पिछलग्गू बनने के बजाय सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने लगेंगे। इससे उनका ओहदा और आमदनी खतरे में पड़ जाएगी। इसीलिए वे चाहते थे कि हम परमेश्वर को त्याग दें। यहाँ तक कि उन्होंने कफन-दफन, शादी-ब्याह, बच्चों के जन्म, घर बनाने जैसे रीति-रिवाजों का इस्तेमाल कर हमें डराया-धमकाया, ताकि मैं अपना विश्वास छोड़ दूँ। मेरे पति की दफन क्रिया के बहाने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को छोड़ने को बाध्य किया। मैं नहीं मानी तो उन्होंने सरकार के सहारे गाँव की सभा बुलाकर मेरा उत्पीड़न किया। मेरे परिवार का भी इस्तेमाल किया कि मैं परमेश्वर को दगा दे दूँ। फिर उन्होंने हमें गाँव से भगाकर हमारे घर जलाने चाहे और हमें आला अफसरों के सामने पेश किया। हम विश्वासियों को सताने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। वे चाहते थे कि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धोखा दें और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश का मौका गँवा दें। ये पादरी बहुत ही दुष्ट और क्रूर थे। मुझे प्रभु यीशु के कुछ वचन याद आए। प्रभु यीशु ने कहा था, “हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। ... हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो(मत्ती 23:13, 15)। हमें बचाने की आड़ में इन पादरियों ने हमें परमेश्वर का नया कार्य स्वीकारने से रोका। परमेश्वर का विरोध करने के लिए लोगों को गुमराह किया। अंत में वे उन सबको नरक ले जाएँगे। ये राक्षस लोगों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश से रोकते हैं। ये मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। मैंने सत्य और परमेश्वर से नफरत करने वाला उनका सार साफ देखा, तो मेरी आस्था और मजबूत हो गई। वे मुझे चाहे जितना रोकें-टोकें, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नहीं छोड़ूँगी। मैंने प्रार्थना की कि मैं अपना कर्तव्य ठीक से निभाऊँ, उसकी शरण में ऐसे और लोगों को लाऊँ जो उसकी वापसी के इच्छुक हैं और उद्धार पाना चाहते हैं। उन्होंने हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करने और ऑनलाइन सभा करने से रोकना चाहा। लिहाजा हर तीसरे दिन मुखिया अधिकारियों से हमारे फोन की जाँच कराता था। अगर हमारे फोन पर फेसबुक होता तो वे इसे डिलीट कर देते। हम उनकी और सरकार की निगरानी से बचने की कोशिश करते, इसलिए हम खेती के नाम पर ऊपर पहाड़ों में चले जाते और काम के बहाने सभाएँ करते थे। गाँव में लौटकर हम अपनी आस्था को लेकर खुलकर बात करने का साहस नहीं करते थे। भले ही उन्होंने हमें रोकने की कोशिश की, हम परमेश्वर का आसरा लेकर दूसरी जगह सुसमाचार फैलाते रहते। समय बीतने के साथ ज्यादा लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन एक दिन गाँव के मुखिया ने मुझे सुसमाचार प्रचार करते देख लिया। सुसमाचार सुनने वाले लोगों के नाम उगलवाने के लिए उसने मुझ पर दबाव डाला। फिर भी मैंने कुछ नहीं कहा। उसने मुझे धमकी दी, अपनी आस्था छोड़ने और उनकी कलीसिया में लौटने को कहा। ऐसा न करने पर उसने मुझे गिरफ्तार कराने की धमकी दी। सामान्य रूप से सुसमाचार प्रचार करने और गिरफ्तारी से बचने के लिए, मैं म्यांमार छोड़कर विदेश चली गई। अब मैं दूसरे भाई-बहनों के साथ रहती हूँ। हम परमेश्वर के कार्यों की गवाही देकर संगति और सुसमाचार प्रचार करते हैं। मुझे इसमें बहुत आनंद मिलता है। मैंने बहुत दर्द झेला और इतने ज्यादा अत्याचार सहे। लेकिन मुझे पादरियों और एल्डरों का भेद पता चल गया। अब मुझे सरकार की बुराइयाँ अधिक साफ नजर आती हैं। मैं उनके सामने बेबस नहीं रही। मुझे परमेश्वर की संप्रभुता का कुछ और ज्ञान मिला। उसमें मेरा विश्वास बढ़ चुका है। यह सब किसी सुरक्षित माहौल में शायद कभी संभव नहीं हो पाता।

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