घर पर एक आध्यात्मिक युद्ध

04 नवम्बर, 2020

अगस्त 2018 में, एक मित्र ने मुझे बताया कि प्रभु यीशु वापस आ चुका है, और वह परमेश्वर के घर से शुरू कर न्याय-कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े, मैं समझ गयी कि ये वचन सत्य हैं और परमेश्वर की वाणी हैं। मैं जान गयी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही वापस आया हुआ प्रभु यीशु है, इसलिए मैं अंत के दिनों के उसके कार्य को स्वीकार कर लिया और ऑनलाइन सभाओं में भाग लेने लगी। मैं प्रभु का स्वागत करने के आनंद में पूरी सराबोर थी, जब घर पर अचानक एक आध्यात्मिक युद्ध छिड़ गया।

अक्तूबर 2018 में एक दिन, मेरे पति ने मुझे एक संदेश भेजा, जिसमें लिखा था : "कुछ दिनों से तुम कलीसिया नहीं जा रही हो, और वह कौन-सी क़िताब है जो तुम हमेशा पढ़ती रहती हो? उन ऑनलाइन सभाओं में तुम सब क्या बातें करती हो?" मैंने हाल ही में परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया था, इसलिए मुझे लगा कि मैं इसे स्पष्ट रूप से समझा नहीं पाऊँगी। फिर मुझे लगा कि मेरे पति तो बचपन से ही विश्वासी रहे हैं, वे कलीसिया के एक सह-कर्मी भी हैं, इसलिए मुझे प्रभु के वापस आने की ख़बर उन्हें बतानी चाहिए। इसलिए मैंने उनसे कहा, "हम अंत के दिनों में हैं और प्रभु के वापस आने की भविष्यवाणियाँ पूरी हो गयी हैं। वह देहधारी होकर वापस आया है, उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। वह इंसान को शुद्ध करने के लिए अपने वचनों के जरिये न्याय-कार्य कर रहा है। वह क़िताब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की है। इसमें बाइबल के अनेक रहस्य प्रकट किये गये हैं। मैंने परमेश्वर के नये कार्य का पता लगाया है, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों से मिलती हूँ, इसलिए ज़ाहिर है मैं पुरानी कलीसिया की सेवाओं में शामिल नहीं होती हूँ। तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ कर खुद जान लेना चाहिए।" मैंने उन्हें कलीसिया की वेबसाइट का लिंक भी भेजा। मैं देख कर हैरान रह गयी कि जल्दी ही, उन्होंने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने के लिए सीसीपी द्वारा ऑनलाइन फैलायी गयी ढेर सारी अफवाहें और झूठ इकट्ठा कर भेज दिये, जिनमें कलीसिया पर कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा थोपा गया झूठा झाओयुआन मामला भी शामिल था। मैंने सोचा कि फिलिपीनो होने के कारण मेरे पति नहीं जानते कि चीन में कितनी झूठी ख़बरें फ़ैली हुई हैं, इसलिए वे आसानी से इसके फेर में आ गये हैं। इसलिए मैंने जवाब देते हुए कहा, "झाओयुआन मामले पर सीसीपी की एक अदालत में मुकदमा चला था, सीसीपी की सभी अदालतें सरकार की अपनी तानाशाही कायम रखने के साधन भर हैं। उनके मुकदमों और फैसलों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में सीसीपी ने बहुत-से अन्यायी झूठे मामले गढ़े हैं, जैसे कि टियानमेन स्क्वेयर छात्र विरोध प्रदर्शन जिसने दुनिया को चौंका दिया, और तिब्बत के विरोध-प्रदर्शनों पर कार्रवाई। पहले वे झूठ तैयार करते हैं, सच्चाई को तोड़ते-मरोड़ते हैं, झूठे अभियोग लगाते हैं, फिर वे हिंसक दमन का प्रयोग करते हैं। विरोध को जड़ से कुचलने की उनकी हमेशा से यही चाल रही है। इसके अलावा, यह एक नास्तिक पार्टी है, जिसने सत्ता में आने के बाद से धार्मिक आस्थाओं का बर्बर उत्पीड़न किया है। हम कलीसिया की उनके द्वारा की गयी निंदा पर भरोसा कैसे कर सकते हैं? दरअसल, पश्चिमी अध्येताओं ने स्वतंत्र जांच-पड़ताल करके उनके झूठ का पर्दाफ़ाश किया है।" इसके बाद, मैंने उन्हें इतालवी धार्मिक अध्येता प्रोफ़ेसर मसीमो इन्ट्रोविएन द्वारा एक सभा में दिये गये भाषण का वीडियो भेजा। मैंने उनसे कहा, "वीडियो देखने के बाद आप सच्चाई को समझ पायेंगे। अदालत में एक झाओयुआन आरोपी ने कहा, 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से मेरा कभी संपर्क नहीं रहा।' उन्होंने खुद कहा कि वे कलीसिया के साथ नहीं हैं। कलीसिया भी उन्हें अपना नहीं मानता। साफ़ है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से उनका कोई संबंध नहीं हैं, लेकिन अदालत ने उनसे ज़बरदस्ती संबंध होने की बात कहलवायी। उन्होंने जान-बूझ कर सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर कलीसिया को बदनाम करने के लिए एक मामला गढ़ डाला! इससे पता चलता है कि झाओयुआन मामला सीसीपी द्वारा ईसाइयों को उत्पीड़ित करने के बहाने के रूप में गढ़ा गया था। धार्मिक आस्थाओं पर कार्रवाई करने की यह उनकी हमेशा की चाल है।" लेकिन मेरे पति सीसीपी के झूठ से पूरी तरह आश्वस्त थे और मेरी बात बिल्कुल नहीं सुनना चाहते थे।

इसके बाद वे मेरी आस्था के आड़े आने की कोशिश करने लगे, उन्होंने घर में छह सुरक्षा कैमरे लगवा दिये, ताकि वे मेरे हर कदम की निगरानी कर सकें। एक शाम उन्होंने मुझे एक कैमरे में एक सभा में भाग लेते देख लिया, वे चिल्लाते हुए कमरे में दाखिल हो गये, पूछने लगे कि मैं अभी भी क्यों इन सभाओं में भाग ले रही हूँ। मैंने कहा, "यह अमेरिका है, आस्था की आज़ादी वाला देश। इसे क़ानून का संरक्षण मिला हुआ है। मेरा अपनी आस्था का पालन करना उचित ही है। आप मेरा रास्ता क्यों रोकना चाहते हैं? सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार कई पश्चिमी देशों में फ़ैल चुका है। एरिज़ोना के मिस्टर और मिसेज़ श्मिट, टीना और चार्ली जैसे लोगों से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के अनुभवों के बारे में भेंटवार्ता की गयी है। कनाडा, क्यूबा, जापान, फ्रांस, रशिया, थाईलैंड और बहुत से-देशों से गवाहियां मिली हैं। प्रभु के वापस आने को लालायित दुनिया भर के लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने आकर उसके कार्य को स्वीकार कर चुके हैं। नास्तिक सीसीपी सरकार के झूठ को आँख मूँद कर मान लेने के बजाय आप भी क्यों नहीं समझते कि उसका कार्य क्या हासिल कर सकता है और क्या यह परमेश्वर की वाणी है।" उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी, वे मेरा फोन छीनने को आ गये। उन्हें रोकने की कोशिश में मैंने उनकी बांह को चोट पहुंचा दी। यह देखकर मुझे दहशत हुई कि इसे बहाना बना कर उन्होंने पुलिस से मेरी शिकायत कर दी। फिर ठंडी मुस्कान के साथ वे बोले, "तुम्हारे अपने परमेश्वर हैं न? तो फिर उन्हें मदद के लिए पुकार लो। किसी भी पल पुलिस यहाँ पहुँच जाएगी। देखते हैं आज तुम्हें कौन बचाता है।" मैं आग बबूला थी, थोड़ा डर भी गयी थी। मुझे डर था कि चीन के बहुतेरे भाई-बहनों की तरह पुलिस मुझे भी ले जाएगी। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया : "मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, उसके जीवन की हर चीज़ परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीज़ों को इसी तरीके से संचालित करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है')। सब-कुछ परमेश्वर के हाथ में है, हर चीज़ पर उसका ही राज है। उस दिन पुलिस मुझे ले जाती या नहीं, यह पूरी तरह परमेश्वर के ही हाथ में था। अगर परमेश्वर ने ऐसा होने दिया, तो इसमें उसकी इच्छा शामिल है, मैं उसके सामने समर्पण करूंगी। प्रार्थना करने के बाद मैं उतनी भयभीत नहीं हुई। पांच मिनट बाद पुलिस आ गयी, हालात समझ लेने के बाद उन्होंने मेरे प्रति थोड़ी उदारता दिखायी। अफसरों में से एक, एक श्वेत व्यक्ति ने कहा कि उसने चीन में वक्त गुज़ारा है और वह चीनी सरकार द्वारा धार्मिक आस्थाओं के उत्पीड़न के बारे में जानता है। हमारे वार्तालाप के बाद, उस अफसर ने मेरे पति को यह कह कर चेतावनी दी, "अमेरिका में धर्म की आज़ादी है। आपको अपनी पत्नी की आस्था में दखल देने का अधिकार नहीं है।" तब मेरे पति ने कहा, "वह आस्था रख सकती है, लेकिन घर पर ऑनलाइन सभाओं में शामिल नहीं हो सकती।" फिर अफसर ने उन्हें दोबारा चेतावनी दी : "ये आपकी पत्नी हैं, इस घर की एक सदस्य। उन्हें घर पर रह कर सभाओं में शामिल होने का अधिकार है—इस काम को क़ानून का संरक्षण प्राप्त है। आप उन्हें घर पर सभाओं में भाग लेने से नहीं रोक सकते, ऐसा करना अमेरिकी क़ानून का उल्लंघन होगा।" पुलिस के जाने के बाद, मैं घटनाक्रम के बारे में सोच कर यकीन नहीं कर पायी। हमने इतने वर्षों में बहुत-कुछ साथ-साथ झेला, लेकिन उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरी आस्था का बहाना लेकर पुलिस से मेरी शिकायत कर दी। वे पति जिन्हें मैं जानती थी, कहाँ गायब हो गये? इनमें तो कोई इंसानियत ही नहीं है। मुझे यह भी पता था कि मेरे इन कष्टों से गुज़रने के बावजूद, परमेश्वर मेरी रक्षा करते हुए मेरे साथ खड़ा था। मैंने परमेश्वर का आभार माना, उसका अनुसरण करने का मेरा संकल्प और मज़बूत हो गया।

मैंने अपनी आस्था पर कायम रहने की ठान ली थी, इसलिए मेरे पति ने हमारे सभी साझा बैंक कार्ड, कार की चाभी, हमारी दूकान की चाभी और मेरे पास पड़े नकद को अपने कब्ज़े में कर लिया। शादी होने के बाद से, मैं ही हमारे पैसे और व्यापार के मामले संभाला करती थी, लेकिन अब वे वह सब मुझसे छीन रहे थे। उन्होंने मेरी इंटरनेट सुविधा भी बंद कर दी, ताकि मैं ऑनलाइन सभाओं में भाग न ले सकूँ, मास्टर बेडरूम के दरवाज़े का ताला बंद कर दिया ताकि मैं अंदर न जा सकूँ। धीरे-धीरे वे मुझसे दूरी बढ़ाने लगे। कभी-कभी मैं उनसे पूछती कि वे कहाँ जा रहे हैं, तो वे बड़ी बेरुखी से कुछ ऐसा कह देते, "मेरे मामले में टांग मत अड़ाओ—तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है। अगर तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखना है, तो तुम इस घर से बाहर जा सकती हो। अपना रास्ता ढूँढ़ लो। अब तुम दूकान में काम नहीं कर सकती। अगर मुझे पता चला कि तुम उसके आसपास फटकी हो, तो मैं पुलिस बुला लूंगा।" उन्होंने हमारे मित्रों पर भी झूठ की ऑनलाइन बमबारी की, कुछ मित्र तो घर आकर मुझसे अपनी आस्था छोड़ने को कहने लगे। हमारा शांतिपूर्ण जीवन चूर-चूर हो गया। उस वक्त मैंने साथ बिताये अपने जीवन के बारे में सोचा, कैसे मैंने अपने पति के साथ व्यापार में शामिल होने के लिए अपना केरियर छोड़ दिया, जिससे हम शहर में अपनी दूकान खोल पाये। लेकिन अब परिवार और आस्था के बीच चुनने का वक्त आने पर, मैं वाकई नहीं समझ पायी कि क्या करूं। मैंने वाकई कमज़ोर महसूस किया। मैं फैसला नहीं कर पायी। क्या सभी विश्वासी प्रभु के आने की लालसा नहीं रखते? मैं प्रभु का स्वागत करके आस्था के सही मार्ग पर निकल पड़ी थी, फिर कोई भी यह समझ क्यों नहीं पा रहा है? यह सब सोच कर मैं अपने आंसू नहीं रोक पायी। फिर मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों को याद किया। "तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युगों-युगों तक परमेश्वर के प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; वे बड़े त्याग के माध्यम से ही कमाए जाने चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों को उस प्रेम से युक्त होना ही चाहिए जो शुद्धिकरण से गुज़र चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास कई सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, भयभीत हुए या टाल-मटोल किए बिना, तुम्हें न्याय की ओर जाना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति निरंतर और अटूट प्रेम रखना चाहिए। तुममें संकल्प होना ही चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे ताक़त दी, मैं समझ पायी कि उसे बस लोगों का सच्चा प्रेम और आस्था चाहिए, वह चाहता है कि हमारे सामने किसी भी तरह की मुश्किल आये, हम भटक कर उससे दूर न जाएं। परमेश्वर के प्रेम से ही मुझे यह सौभाग्य मिला कि परमेश्वर की वाणी को पहचान कर अंत के दिनों में प्रभु के वापस आने का स्वागत कर सकूं। मसीह का अनुसरण करने के लिए कष्ट झेलने का मूल्य और अर्थ होता है, यह एक धार्मिक प्रयोजन के लिए है। मैंने उन अनुयायियों के बारे में सोचा जिन्होंने प्रभु यीशु का अनुसरण किया। वे रोमन लोगों द्वारा बर्बरता से उत्पीड़ित और धार्मिक अगुआओं द्वारा निंदित किये गये, कुछ तो प्रभु के नाम पर शहीद भी हो गये। उन्होंने बहुत दुख सहे, मगर प्रभु ने उनको याद रखा। मुझे एहसास हुआ कि सच्चे परमेश्वर का अनुसरण करने में आ रही रुकावटों और उत्पीड़न से मुझे परेशान नहीं होना चाहिए, बल्कि मुझे संतों की कई पीढ़ियों से सीखना चाहिए, और मुश्किलों का सामना करते हुए अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए।

इसके बाद मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े, "परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। ... जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है')। सच्चे मार्ग को स्वीकार करने के बाद परमेश्वर के नये कार्य का अनुसरण करते समय, लग ऐसा रहा था जैसे मेरे पति ही मेरे रास्ते का रोड़ा और दमनकारी हैं, लेकिन इसके पीछे आध्यात्मिक जगत में एक युद्ध छिड़ा हुआ है। शैतान मेरे पति को मुझसे दखलंदाज़ी करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, अपने पति के प्रति मेरी भावनाओं और मेरे निजी हितों का फायदा उठा कर मुझे डरा-धमका रहा है, ताकि मैं सच्चा मार्ग छोड़ कर शैतान के आगे झुक जाऊं, आखिरकार परमेश्वर को धोखा दूं। यह शैतान की एक चाल है। साथ-साथ, परमेश्वर इस हालत का इस्तेमाल मेरे पति के परमेश्वर का विरोध करने वाले बुरे रूप को दिखाने के लिए कर रहा था। कलीसिया में धर्मोपदेश देते समय वे सहिष्णुता का उपदेश देते, हमसे प्रभु के आने के प्रति चौकस रहने को कहते। लेकिन प्रभु के वापस आने के कार्य का पता चलने पर, उन्होंने उस पर ज़रा भी गौर नहीं किया, यहाँ तक कि मुझसे एक दुश्मन की तरह पेश आये। वे मुझसे नहीं, परमेश्वर से घृणा और उसका विरोध कर रहे थे। वे पूरी तरह से एक अविश्वासी हैं, उनकी करतूतों के बारे में सोच कर अब मुझे दुख नहीं हो रहा था। मैं बस सच में नाराज़ थी। हम दोनों पति-पत्नी होकर भी अलग रास्तों पर हैं। मुझे पता था कि मैं अब उनके काबू में नहीं आ सकती थी। वे जितना दमन करते, मैं परमेश्वर का उतना ही अनुसरण कर उसकी गवाही देना और शैतान को शर्मिंदा करना चाहती। मैं न केवल खुद परमेश्वर का अनुसरण करना चाहती, बल्कि सत्य से प्रेम करने वाले अनेक सच्चे विश्वासियों के साथ परमेश्वर के अंत के दिनों का सुसमाचार साझा करना चाहती। इस विचार ने मुझे इस कष्ट से उबरने की ताकत दी। जल्दी ही मुझे घर के पास वाले बाज़ार में एक नया काम मिल गया, इसलिए मैं वहां काम करते हुए सुसमाचार साझा करने लगी। वह कड़ी मेहनत का काम था, मगर परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, मैं आराम से कर पा रही थी।

लेकिन मेरे पति अभी भी नहीं रुके। मुझे विश्वास रखने से रोकने के लिए, उन्होंने काम पर जाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मेरी साइकिल चुरा ली, मेरे वहां काम करने पर रोक लगा दी। उन्होंने मुझसे अपनी आस्था छोड़ देने को कहने के लिए मेरे काम की जगह पर कुछ खरीदारों को भी भेजा। इतना ही नहीं, उन्होंने कलीसिया में यह कहते हुए मेरे ख़िलाफ़ झूठ भी फैलाये कि मैं अपनी आस्था के लिए अपने परिवार को छोड़ रही हूँ। जब मेरे अधिकारी को यह पता चला, तो वह मेरे साथ अलग बर्ताव करने लगी, फिर उसने मुझे काम से निकाल दिया। तभी, फिलिप्पीन्स में मेरी सास अचानक गुज़र गयी, इसलिए मेरे पति को वापस जाना पड़ा। मेरा फोन और दूकान की चाभी मेरे पास छोड़ देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। जब वे अमेरिका वापस लौटे, तो मेरे प्रति उनका रवैया बहुत नरम पड़ गया था। वे अब मेरे ऑनलाइन सभाओं में शामिल होने का पहले जैसा विरोध नहीं कर रहे थे। मुझे लगा कि वे वाकई बदल गये हैं।

लेकिन एक दिन, उन्हें पता चला कि मैंने उनकी कलीसिया की एक बहन के साथ परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का सुसमाचार साझा किया है, तो उन्होंने उससे संपर्क साधने के लिए मेरी पीठ पीछे पादरी की मदद ली। उन्होंने उस बहन से बहुत झूठ बोला, उसने उनकी बात पर यकीन कर हमेशा के लिए मुझसे नाता तोड़ लिया। मेरे पति ने मुझे चेतावनी दी, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने से तुम्हें कोई भी नहीं रोक सकता, लेकिन मैं तुम्हें अपनी कलीसिया के लोगों को उसमें शामिल नहीं करने दूंगा। अब तुम्हें वहां नहीं आने दिया जाएगा, हमारी दूकान में भी अपना फोन लेकर नहीं आ सकती। अगर तुमने दोबारा उनके संदेश पढ़े या उनकी कॉल का जवाब दिया, तो मैं तुम्हें धक्के मार कर निकाल दूंगा।" उसका बर्ताव चौंकाने वाला और गुस्सा दिलाने वाला था। उन कुछ महीनों में, मैंने उनके साथ इतना सब्र रखा, मैंने उन्हें अपने ढंग से जीने को प्रेरित करने की कोशिश की। मेरे प्रति और परमेश्वर के कार्य के प्रति उनके रवैये में बदलाव के लिए उन पर ज़रूर इसका प्रभाव पड़ा होगा। मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरे पति इतने अधिक हठी और दुर्भावनापूर्ण होंगे। दुनिया को उन्होंने एक बिल्कुल झूठा चेहरा दिखाया। उन्होंने मेरी आस्था को नहीं माना और मुझे इसे दूसरों के साथ साझा करने से दूर रखा, बेशर्मी के साथ भाई-बहनों पर अपना स्वामित्व जताया। क्या यह ढीठ बन कर परमेश्वर की भेड़ों को हथियाना नहीं है? परमेश्वर की भेड़ें उसकी वाणी को पहचान कर उसके घर लौट आती हैं। यही सही और स्वाभाविक है। आस्था एक स्वतंत्र चीज़ है, लेकिन वे भाई-बहनों को तोड़ने की भरसक कोशिश करने के लिए पादरी के साथ काम कर रहे थे। उन्होंने लोगों को गुमराह करने के लिए झूठ फैलाया, ताकि वे परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार को सुनने की हिम्मत न करें। वे कलीसिया का दम घोंट कर उसे भूखा मार रहे थे, लोगों का उद्धार पाने का मौक़ा बिगाड़ रहे थे! इस बात से मुझे फरीसियों को प्रभु यीशु की फटकार याद आयी : "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो" (मत्ती 23:13)। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ूँगी। "ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे 'मज़बूत देह' वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं')। अगर मैं उनकी इन बातों और करतूतों की खुद गवाह नहीं रही होती, तो मैं कभी कल्पना भी नहीं कर पाती कि धर्मार्थ कार्यक्रम आयोजित करने वाला, बहुत धर्मनिष्ठ लगने वाला, आदर पाने वाला कोई इंसान, प्रभु के आने के कार्य पर न सिर्फ़ गौर करने या उसे स्वीकार करने से मना करेगा, बल्कि कलीसिया भर में झूठ फैलायेगा, दूसरों को धोखा देगा और उन्हें परमेश्वर की तरफ मुड़ने से रोकेगा। वे 2,000 साल पहले प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाने वाले फरीसियों से भला अलग कैसे हैं? वे सब वास्तविक मसीह-विरोधी हैं, दानव हैं, जो लोगों की आत्मा को निगल लेते हैं। मैंने अपने पति के सार का संपूर्ण सत्य देखा, वे एक छंटे हुए दानव हैं। विश्वासी और अविश्वासी मेल के योग्य नहीं होते। अभी वे मुझे रोक नहीं सकते। इस पर सोच-विचार करके मैंने संकल्प लिया कि मैं अपनी आस्था और सत्य के अनुसरण में ज़्यादा समय लगाऊँगी, मैंने ठान लिया कि मेरे पति मुझसे जैसे भी पेश आयें, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करती रहूँगी।

एक दिन, वे तलाक़ का मुकदमा चलाने के लिए एक तलाक़ वकील को ले आये, एक महीने के भीतर मुझसे घर छोड़ने की मांग की। मैंने वाकई बेबस महसूस किया। मैं कहाँ रहूँगी? क्या मैं आवारा बन जाऊंगी? उन्होंने भाई-बहनों के साथ मेरा संपर्क तोड़ने की कोशिश में, हमारे घर से फिर एक बार इंटरनेट कटवा दिया। अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, मुझे सभाओं में भाग लेने के लिए हमेशा बाहर जाकर जनता इंटरनेट का इस्तेमाल करना पड़ता था। मेरी ज़िंदगी संकट में थी। आमदनी के बिना, रोटी-मकान जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया। मैं पहले कभी ऐसे मुश्किल हालात से नहीं गुज़री थी, कोई अंदाज़ा नहीं था कि मैं कैसे गुज़ारा करूंगी। मैं बहुत दुखी और खोयी हुई महसूस कर रही थी। जब एक बहन को पता चला, तो उसने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा। "परीक्षणों से गुज़रते हुए, लोगों का कमज़ोर होना, या उनके भीतर नकारात्मकता आना, या परमेश्वर की इच्छा पर या अभ्यास के लिए उनके मार्ग पर स्पष्टता का अभाव होना स्वाभाविक है। परन्तु हर हालत में, अय्यूब की ही तरह, तुम्हें परमेश्वर के कार्य पर भरोसा अवश्य होना चाहिए, और परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। ... अपने अनुभव में, तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा चाहे जिस भी प्रकार के शुद्धिकरण से गुज़रो, संक्षेप में, परमेश्वर को मानवजाति से जिसकी अपेक्षा है वह है, परमेश्वर में उनका विश्वास और प्रेम। इस तरह से, जिसे वो पूर्ण बनाता है वह है लोगों का विश्वास, प्रेम और अभिलाषाएँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए')। इसे पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेरे पति का मुझे तलाक़ की धमकी देना परमेश्वर की इजाज़त से हो रहा है। जब अय्यूब अपने परीक्षणों से गुज़र रहा था, तब लुटेरों ने उसका सब-कुछ लूट लिया, उसके बच्चों की जान चली गयी। उसके पूरे शरीर पर फोड़े हो गये और वह राख के ढेर पर बैठा रहा। उसकी पत्नी ने उसे ठुकरा दिया, उसे अपनी आस्था छोड़ देने और मर जाने को कहा। उसके मित्रों ने उसकी आलोचना की, उसका मज़ाक उड़ाया। इन परीक्षणों और तमाम दुखों का सामना करते हुए भी, अय्यूब परमेश्वर की प्रशंसा करता रहा : "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" (अय्यूब 1:21)। यही है सच्ची आस्था। एक बार मैंने परमेश्वर के सामने एक शपथ ली थी कि चाहे जो भी हो जाए, मैं परमेश्वर का अनुसरण करती रहूँगी। लेकिन मेरे गुज़ारे को खतरे में डालने वाले मेरे पति की धमकियों से सामना होने पर, मैंने महसूस किया कि नकारात्मकता और दर्द में फंस गयी हूँ। मैं समझ सकी कि परमेश्वर में मेरी आस्था सच्ची नहीं है। मेरे पति मुझे तलाक़ की धमकी दे रहे हैं, ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दूँ, उसे छोड़ दूं। मैं शैतान की चालों का शिकार नहीं हो सकती। चाहे किसी भी तरह के परीक्षण से मेरा सामना हो, मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना है, गवाही देनी है, और शैतान को शर्मिंदा करना है।

कुछ दिन बाद मुझे एक काम मिला, इससे मैं इंटरनेट ऐक्सेस कार्ड खरीद सकी ताकि मैं सभाओं में भाग लेकर अपना कर्तव्य निभा सकूं। मैंने अडिग महसूस किया। बाद में, मैंने शांति से तलाक़ के कागज़ात पर दस्तख़त कर दिये, अपने पति की बंदिशों से पूरी आज़ादी पा ली। मैं आज़ादी से अपनी आस्था का पालन कर सकी। मैंने अपना कर्तव्य निभाना और सुसमाचार साझा करना जारी रखा, पहले के मुक़ाबले पैसों की कमी होने के बावजूद, मैं चिंतामुक्त होकर अपना कर्तव्य निभा पा रही थी। मेरे मन में आनंद और सुकून था, मैंने महसूस किया कि परमेश्वर का अनुसरण करना और सही मार्ग पर चलना, जीवन जीने का सबसे सार्थक तरीका है! घर में इस आध्यात्मिक युद्ध से गुज़रते हुए गवाही देने लायक बनाने के लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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