मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 24. स्वयं को जानना मुख्यतः मानव स्वभाव को जानना है

स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर द्वारा प्रकाशित करने से आना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के प्रतिघाती स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। एक बार ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाएँ, और आप वास्तव में शरीर को त्यागने में सक्षम हो जाएँ, लगातार परमेश्वर के वचन को पूरा करें, और आपमें पूरी तरह से पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के लिए समर्पित होने की इच्छा हो जाए, तो आप पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके हैं। परमेश्वर के अनुग्रह के बिना, यदि पवित्र आत्मा से कोई ज्ञान और मार्गदर्शन नहीं आता है, तो इस मार्ग पर चलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि लोगों के पास सच्चाई नहीं है और स्वयं को धोखा देने में असमर्थ हैं। सिद्ध बनने के जिस मार्ग पर पतरस चले उस पर चलने के लिए, मुख्यतः व्यक्ति में ऐसा करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए, उसमें अवश्य आत्मविश्वास, और परमेश्वर पर भरोसा होना चाहिए। इसके अलावा, उसे पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति, और हर उस चीज में जो परमेश्वर के वचन से विचलन में नहीं हैं, समर्पित अवश्य होना चाहिए। ये कई महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिनमें से किसी का भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। अनुभव के भीतर स्वयं को जानना बहुत कठिन है। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना इसमें प्रवेश करना अत्यंत कठिन है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को स्वयं को जानने और स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने पर ध्यान केन्द्रित अवश्य करना चाहिए। पौलुस ऐसे मार्ग पर चले जिसने जीवन की तलाश नहीं की, और स्वयं को जानने पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया। पौलुस ने विशेष रूप से कार्य, कार्य की प्रतिष्ठा और प्रभाव पर जोर दिया। उनकी प्रेरणा अपने कार्य और दुःख के बदले में परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना थी,परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करना थी। उनकी प्रेरणा गलत थी। उन्होंने जीवन पर ज़ोर नहीं दिया, न ही उन्होंने स्वभाव के परिवर्तन पर जोर डाला। उन्होंने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। चूँकि उन्होंने गलत लक्ष्य की तलाश की, इसलिए जिस रास्ते पर वह चला वह भी निस्संदेह गलत है। यह उसके दर्प और अहं द्वारा घटित हुआ है। स्पष्ट रूप से, उनके पास कोई सत्य नहीं था, और उनके पास कोई विवेक या तर्क भी नहीं था। लोगों को बचाने में, परमेश्वर मुख्यतः उनके स्वभाव को बदलने के माध्यम से परिवर्तन करते हैं। परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य लोगों में स्वभाव के परिवर्तन के परिणाम प्राप्त करना है, इस तरह से कि लोग परमेश्वर को जान पाएँ, उनके प्रति समर्पित हो सकें, और सामान्य तरीके से उनकी आराधना कर पाएँ। यह परमेश्वर के वचनों और उनके कार्य का लक्ष्य है। पौलुस की प्रार्थना करने की पद्धति परमेश्वर के आशय के सीधे उल्लंघन और टकराव में है। इसके प्रयोजन पूरी तरह से विपरीत हैं। हालाँकि, पतरस की प्रार्थना का मार्ग, पूरी तरह से परमेश्वर के आशय के अनुसार है, जो कि वास्तव में वह परिणाम है जिसे परमेश्वर मानवजाति में प्राप्त करने की कामना करते हैं। इसलिए पतरस का मार्ग धन्य है और परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। क्योंकि पौलुस का मार्ग परमेश्वर के आशय का उल्लंघन है, इसलिए परमेश्वर इससे घृणा करते हैं, और इसे श्राप देते हैं। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए परमेश्वर के आशय को अवश्य जानना चाहिए। यदि कोई वास्तव में उनके वचनों में परमेश्वर के आशय को पूरी तरह से समझने में सक्षम है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर मनुष्य को क्या बनाना चाहते हैं, और अंततः वे क्या परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं, केवल तब ही कोई सही ढंग से पता लगाने में समर्थ होता है कि किस मार्ग का अनुसरण करना है। यदि आप पतरस के मार्ग को पूरी तरह से नहीं समझते हैं, और केवल इसका पालन करने की इच्छा रखते है, तो आप उस पर चलने में सक्षम नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, आप बहुत सारे सिद्धांतों को जानते हैं, लेकिन अंततः वास्तविकता में प्रवेश करने में असमर्थ हैं। यद्यपि आप एक उथला प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन आप सच्चा परिणाम प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। आजकल ज्यादातर लोगों की स्वयं के बारे में बहुत सतही समझ है। वे उन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं जानते हैं जो बिल्कुल उनके स्वभाव का एक हिस्सा हैं। वे केवल स्वयं की कुछ अशुद्ध अभिव्यक्तियों, उन कार्यों को जिन्हें उनके करने की संभावना है, या अपने कुछ दोषों को ही जानते हैं, और इसलिए वे मानते हैं कि वे स्वयं को जानते हैं। यदि वे आगे कुछ नियमों का पालन करते हैं, तो सुनिश्चित करें कि वे कुछ क्षेत्रों में गलती नहीं करते हैं, और कुछ पापों को करने से बचने का प्रबंधन करते हैं, तब वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में स्वयं में वास्तविकता होना मानते हैं और यह कि वे बच जाएँगे। यह पूरी तरह से मानव कल्पना है। यदि आप इनका पालन करते हैं, तो क्या आप वास्तव में कोई अपराध नहीं करने में सक्षम बन जाएँगे? क्या स्वभाव का एक सच्चा परिवर्तन प्राप्त कर लिया गया है? क्या आप वास्तव में एक मनुष्य की समानता को बिता चुके हैं? क्या आप वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं, यह निश्चित है। परमेश्वर में विश्वास केवल तभी कार्य करता है जब किसी के अपने जीवन स्वभाव में उच्च मानदंड हों, सत्य प्राप्त करना हो और कुछ परिवर्तन हों। इसलिए यदि किसी व्यक्ति का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव पूरी तरह से नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपने स्वयं के स्वभाव को जानना और यह जानना कि किसी के स्वभाव में कौन से तत्व शामिल हैं, ये तत्व कहाँ से उठते हैं और वे कैसे घटित होते हैं। इसके अलावा, क्या आप इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हैं? क्या आपने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपने बुरे स्वभाव को देखा है? यदि कोई व्यक्ति सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाए, तो वह स्वयं से घृणा करना शुरू कर देगा। जब आप स्वयं से घृणा करते हैं और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हैं, तो आप देह को त्यागने में सक्षम हो जाएँगे, और कठिनाई के बिना सत्य को आगे बढ़ाने की शक्ति रखेंगे। क्यों लोग पूर्व काल में देह का अनुसरण कर पाते थे? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते थे। उन्होंने सही और न्यायोचित होना, कोई दोष नहीं होना, निस्संदेह पूरी तरह से सही होना महसूस किया। इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य कर सके कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जानता है कि उसका असली स्वभाव क्या है, कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है, तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अभिमान नहीं करता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जैसा वह पहले था। वह महसूस करता ​​है, कि “मुझे अवश्य ईमानदार और सादगीपूर्ण होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का पालन करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।” वह वास्तव में स्वयं को नगण्य, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान है, और वह एक इंसान की तरह अधिक दिखाई देता है। जब कोई व्यक्ति स्वयं से सचमुच घृणा करता है केवल तभी वह शरीर को त्याग पाता है। यदि कोई स्वयं से घृणा नहीं करता है, तो वह देह को नहीं त्याग सकेगा। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश हैं: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को समझना; दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति क्षुद्र और तुच्छ समझना, और स्वयं की दयनीय आत्मा, अपनी गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह वास्तव में स्वयं को जानता है, और हम कह सकते हैं कि उसने स्वयं को पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी वह स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि ​​स्वयं को शाप दे, वास्तव में महसूस करे कि वह शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है, इस तरह से वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब आसन्न मृत्यु की आशंका प्रतीत होती है, तो उसे महसूस होता है, कि “ओह ! यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है। परमेश्वर वास्तव में धर्मी हैं। मुझे सचमुच मर जाना चाहिए!” इस बिंदु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को बहुत कम दोष देगा, केवल यह महसूस करेगा कि वह अत्यंत दयनीय है, अत्यंत गंदा और भ्रष्ट है, कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए और उसके जैसी कोई आत्मा धरती पर रहने के लायक नहीं है, और इसलिए वह प्रतिरोध नहीं करेगा, बहुत कम विश्वासघात करेगा, और न ही वह परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करेगा। यदि वह स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु उसे धमकाती है, तो वह महसूस करता है, कि “मैंने परमेश्वर में इतनी अच्छी तरह से विश्वास किया है। मैंने कैसे प्रार्थना की है! मैंने इतना दिया है, मैने इतने कष्ट झेले हैं, और अंततः परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहते हैं। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? परमेश्वर मुझे मरने के लिए क्यों कह रहे हैं? यदि मेरे जैसा व्यक्ति मर जाता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?” सबसे पहले उसने परमेश्वर के बारे में धारणा बनायी। दूसरा, उसने शिकायत की; इसमें किसी तरह का कोई समर्पण नहीं है। उदाहरण के लिए, जब पौलुस मरने वाले थे, तो वे स्वयं को नहीं जानते थे। जब परमेश्वर से दण्ड आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।