उद्धार क्या है और यह परमेश्वर से कैसे प्राप्त होता है

20 अप्रैल, 2020

लेखिका जुनयिंग

परमेश्वर द्वारा बचाया जाना किसी मुसीबत से बचाये जाने जैसा नहीं है। यह किसी अमीर की किसी गरीब को दी जाने वाली मदद नहीं है, यह मरीज़ की जान बचाने वाला कोई डॉक्टर नहीं है, और न ही यह किसी परोपकारी संस्था या किसी भले मनुष्य की मदद है। परमेश्वर का उद्धार मानवजाति को बचाने के लिए है और यह परमेश्वर के महान प्रेम और मनुष्य के लिए दया से भरा हुआ है। इसके प्राप्त होने का मतलब है कि हम परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने, उसके वर्तमान वचनों और कार्यों का पालन करने, उसके वचनों को अभ्यास में लाने, परमेश्वर के बताये मार्ग पर चलने के साथ-साथ उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम करने और बर्ताव करने के काबिल हैं। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं।

उद्धार क्या है और यह परमेश्वर से कैसे प्राप्त होता है

हम सभी के जीवन में परमेश्वर हमें उसका उद्धार प्राप्त करने के कई मौके देगा, लेकिन इसे पाने के लिए हमें पहले इसे स्वीकार करना होगा। अन्यथा, हम मूर्ख कुंवारियों की तरह यह मौक़ा खो देंगे, और फ़िर हमेशा इसका पछतावा करेंगे। कुछ लोग कह सकते हैं: "अगर मौक़ा चला गया, मतलब चला गया। फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।" लेकिन, क्या यह सच है? हमें पहले इस तथ्य को समझना चाहिए: परमेश्वर का उद्धार न मिल पाना किसी स्वादिष्ट भोजन या किसी बस के न मिल पाने जैसा नहीं है, यह उच्च शिक्षा का मौक़ा न मिल पाने या नई नौकरी न मिल पाने जैसा भी नहीं है। बल्कि, यह तो किसी जलती हुई इमारत में फंसे ऐसे व्यक्ति के जैसा है जिसे फायरमैन का बचाव नहीं मिला; यह किसी ऐसे डूबते हुए व्यक्ति के जैसा है जो पानी में बह रही लकड़ी को न पकड़ पा रहा हो। यह स्पष्ट है कि चाहे हमें परमेश्वर का उद्धार मिले या ना मिले, इसका संबंध सीधा उन ज़रूरी बातों से है कि हमें परमेश्वर की स्वीकृति मिल पायेगी या नहीं, और हम बचाये जाने के बाद स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएंगे या नहीं। परमेश्वर का उद्धार ना मिलना अफ़सोसजनक और दयनीय है; परमेश्वर के उद्धार के बारे में जानना और उसे प्राप्त करना हम सभी के लिए बहुत ज़रूरी है! क्योंकि यह इतना अधिक ज़रूरी है, इसलिए आइये अब हम परमेश्वर के कार्य से उसके उद्धार को समझते हैं, और पता लगाते हैं कि हमें यह कैसे प्राप्त हो सकता है!

व्यवस्था के युग में मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार

शुरुआत में, परमेश्वर ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें बनायी। जब सब कुछ व्यवस्थित हो गया, तब उसने आदम और हव्वा को बनाया जो इंसानों के सबसे पहले जनक थे। परमेश्वर ने उन्हें अदन के बाग़ में रखा, और उन्होंने उसकी हिफ़ाज़त में ख़ुशी-ख़ुशी जीवन बिताया। हालांकि, उन्हें सांप ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहकाया, जिसके बाद उन्हें अदन के बाग़ से निकाल दिया गया और उन्हें रोग, बुढ़ापे, और मृत्यु वाला जीवन जीना पड़ा। उसके बाद, मानवजाति और भी ज़्यादा भ्रष्ट होती चली गयी और ऐसे पापों और भ्रष्टता में पड़ गयी कि परमेश्वर उस समय के सभी मनुष्यों को नष्ट करने के लिए एक भयानक बाढ़ लेकर आया, जिसमें सिर्फ़ नूह के परिवार के आठ सदस्य ही जीवित बच पाये। इसके बाद पृथ्वी पर मानवता जीती रही और इंसानों की संख्या बढ़ती गयी, लेकिन उस समय के लोग अपने भोजन, आवास और अपने ऊपर किये गए परमेश्वर के अनुग्रह के अलावा और कुछ नहीं जानते थे। उन्हें नहीं पता था कि अच्छा मनुष्य कैसे बनना है, पृथ्वी पर जीवन कैसे जीना है, मानवजाति कहाँ से आयी या परमेश्वर की आराधना या स्तुति कैसे करनी है। वैसे लोगों के पास परमेश्वर की प्रशंसा करने या उसका गुणगान करने की काबिलियत नहीं थी और वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में पूरी तरह असमर्थ थे। इसी कारण से, परमेश्वर ने मानवजाति के उद्धार के लिए अपना प्रबंधन का कार्य शुरू किया। यहोवा परमेश्वर ने अपनी आज्ञाओं को जारी करने के लिए मूसा का इस्तेमाल किया और पृथ्वी पर मानवजाति को मार्ग दिखाने के लिए व्यवस्था का निर्धारण किया। उदाहरण के लिये, सब्त के दिनों का पालन करना, अपने माता-पिता का आदर करना, मूर्तियों की पूजा नहीं करना, और चोरी या व्यभिचार ना करना। उसने लोगों के त्याग के लिए, भोजन के लिए, चोरी करने पर हर्जाना देने और जानवरों की हत्या करने के लिए भी कई नियम बनाए। जो भी परमेश्वर के नियमों का उल्लंघन करता उसे जला कर या पत्थर मारकर ख़त्म कर दिया जाता था, लेकिन अगर वे यहोवा के नियमों और आज्ञाओं का पालन करते, तो उन्हें उसका आशीर्वाद मिलता। यहोवा परमेश्वर ने इंसानों को अपने नियमों और आज्ञाओं से नियंत्रित करके रखा था; इससे पृथ्वी पर लोगों को सही तरीके से, नियमित ढंग से जीवन जीने का मार्गदर्शन मिला, लोग मापदंडों के अनुसार काम करने लगे और उन्हें पता चला कि लोगों को एकमात्र परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए—यह व्यवस्था के युग में परमेश्वर का उद्धार था। परमेश्वर के सामने आकर, यहोवा के वचनों पर ध्यान देकर, उसके नियमों और आज्ञाओं का पालन करके और पूरी निष्ठा से यहोवा की आराधना करके, लोग परमेश्वर द्वारा बचाये जा सकते हैं और परमेश्वर की आशीष पा सकते हैं। इस तरह, व्यवस्था के युग में उन्हें परमेश्वर का उद्धार मिल सकता है।

अनुग्रह के युग में मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार

अनुग्रह के युग में मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार

अनुग्रह के युग के आखिर में लोग ज़्यादा से ज़्यादा भ्रष्ट होते चले गये, नियमों और आज्ञाओं का पालन करने वालों की संख्या कम से कम होती चली गयी। वे बहुत सी ऐसी चीज़ें कर रहे थे जिससे परमेश्वर के स्वभावों को ठेस पहुँचती थी, जैसे मूर्तियों की पूजा करना, व्यभिचार करना, बुरी साजिशें रचना, चोरी करना और डाका डालना, लालची और भ्रष्ट बनना। यहां तक कि वे परमेश्वर को भेंट देने के लिए लंगड़े और अंधे कबूतरों, मवेशियों, और भेड़ों का भी इस्तेमाल कर रहे थे। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है; लोगों का ऐसा व्यवहार उन्हें नियम के अनुसार निस्संदेह अपनी मृत्यु तक लेकर जाता था इससे क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचती थी। हालांकि, परमेश्वर मानवजाति से बहुत प्रेम करता है और सभी मनुष्यों को नष्ट नहीं करना चाहता, इसलिए पृथ्वी पर आने के लिए उसने स्वयं देहधारण किया। देहधारी प्रभु यीशु ने व्यवस्था के युग का अंत किया और अनुग्रह के युग की शुरुआत की; उसने मानवजाति को अभ्यास का नया मार्ग बताकर, पश्चाताप की राह दिखाई। उसने लोगों को क्षमाशील और सहनशील होना, अपने दुश्मनों से भी प्रेम करना और उन्हें सत्तर गुना सात बार माफ़ करना सिखाया। प्रभु यीशु ने बीमारों को ठीक किया और राक्षसों का खात्मा किया; उसने हर तरह के चमत्कार किये, और जब लोग वास्तव में अपने पापों को स्वीकार करते थे, तो प्रभु यीशु अपने महान धैर्य और सहनशीलता से उनके पापों को क्षमा कर देता था। अंत में, प्रभु यीशु को मानवजाति के स्थायी पाप बलि के तौर पर सूली पर चढ़ा दिया गया। उसने मानवता के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया और इस तरह अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य को पूरा किया। यह अनुग्रह के युग में मानवजाति के लिये परमेश्वर का उद्धार है। प्रभु यीशु के उद्धार को स्वीकार करने, उसके नाम की प्रार्थना करने, और प्रभु के सामने अपने पापों को कबूल करके उनका पश्चाताप करने से, हमें पापों से छुटकारा दिलाया जा सकता है और हम परमेश्वर द्वारा दी गयी शांति और खुशी का आनंद उठा सकते हैं। यही अनुग्रह के युग में परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करना है।

अंत के दिनों में मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार

प्रभु यीशु ने हमें छुटकारा दिलाया, जिससे हमारे पापों को क्षमा किया गया। फ़िर भी, हमें अपनी पापी प्रकृति से छुटकारा नहीं मिला। हमारे अहंकारी और अभिमानी, नीच और स्वार्थी, धूर्त और बेईमान, लालची और दुष्ट, कपटी और द्वेषी शैतानी स्वभाव, अब भी हमारे अंदर गहराई तक समाये हुए हैं। इन शैतानी स्वभावों के प्रभाव में, हम अब भी पाप करते हैं और अपना विरोध करने के बजाय परमेश्वर का विरोध करते हैं। उदाहरण के तौर पर, हम कई बार अपने फ़ायदे के लिये लड़टे हैं और साज़िश में शामिल हो जाते हैं, अपने प्रियजनों का भरोसा भी खो बैठते हैं। जब हमें बीमारी, आपदा या ख़तरे का सामना करना पड़ता है, तो हम परमेश्वर को दोषी ठहराते हैं और उसे ग़लत समझते हैं। हम उससे कुतर्क करने और उसका विरोध करने की भी कोशिश करते हैं। हमारे अंदर आज्ञाकारिता की कमी होती है। यहोवा परमेश्वर ने कहा था: "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। प्रभु यीशु ने कहा: "मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है" (यूहन्ना 8:34-35)। परमेश्वर पवित्र है, और कोई भी दूषित व्यक्ति उसके राज्य में प्रवेश नहीं करेगा। हम सभी गंदगी से भरे हुए हैं; हम भ्रष्ट और दुराचारी हैं, और हम परमेश्वर का चेहरा देख पाने या उसके राज्य में प्रवेश करने के काबिल नहीं हैं। बाइबल में यह लिखा है, "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है" (रोमियों 6:23)। हम देख सकते हैं कि अगर हम कभी भी पाप के बंधनों और बेड़ियों को तोड़ नहीं पाये और सब कुछ जानते हुए भी बार-बार पाप करते रहे, तो हम अपने पापों के कारण परमेश्वर के ख़िलाफ़ हो जाएंगे और अंततः परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दिए जाएंगे।

हालांकि, परमेश्वर के वचन कहते हैं: "चूँकि उसने मनुष्य को सृजित किया है, इसलिए वह मनुष्य की अगुवाई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा, और उसे पूरी तरह प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुवाई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य को सृजित किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। यही वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता के द्वारा किया जाता है" ("मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना")। परमेश्वर ने मानवजाति को बनाया और वह पूरी तरह से उसे पाना चाहता है। क्योंकि वह मानवजाति को बचा रहा है, वह मनुष्य को पूरी तरह से शैतान के चंगुल से बचाना चाहता है। इसी कारण से, परमेश्वर ने हमारे लिए अंत के दिनों के उद्धार की तैयारी की है। जैसा कि बाइबल में लिखा है: "जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है" (1 पतरस 1:5)। "वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा" (इब्रानियों 9:28)। "इस कारण अपनी अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर, और सचेत रहकर, उस अनुग्रह की पूरी आशा रखो जो यीशु मसीह के प्रगट होने के समय तुम्हें मिलनेवाला है" (1 पतरस 1:13)। परमेश्वर के वचन कहते हैं: "परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। ऐसा होने के कारण, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और वो फिर कभी विकसित न हो, जो मनुष्य के स्वभाव को बदलने में सक्षम बनाये। इसके लिए मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और वो जो कुछ भी करे वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वो अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा" ("देहधारण का रहस्य (4)")। इन वचनों से हमें पता चलता है कि अंत के दिनों में लौटकर आने वाला प्रभु यीशु हमें जीवन का वह मार्ग प्रदान करेगा जिससे हम सभी सत्यों को समझ पाएंगे, हमारे भ्रष्ट शैतानी स्वभावों के शुद्ध होने के मार्ग को समझ पाएंगे, और अपने भ्रष्ट स्वभावों की सभी बेड़ियों और बंधनों से मुक्त हो पाएंगे। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार काम करने वाले लोग बन सकते हैं, परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं, और उसके राज्य में प्रवेश करने योग्य बन सकते हैं। परमेश्वर ने अंत के दिनों में हमारे लिये इसी तरह के उद्धार की तैयारी की है।

अंत के दिनों का परमेश्वर मुख्य रूप से कौन सा कार्य करता है? प्रभु यीशु ने कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। "पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है" (यूहन्ना 5:22)। "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। परमेश्वर ने हमें साफ़ तौर पर बता दिया है कि अंत के दिनों का परमेश्वर ज़्यादा से ज़्यादा वचन बोलेगा और न्याय का कार्य करेगा, हमें सभी सत्यों से अवगत कराएगा। परमेश्वर के अंत के दिनों के उद्धार को स्वीकार करके, सत्य के सभी पहलुओं को जानकर, शुद्ध होने के मार्ग को ढूँढकर, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करके और उसके बताये हुए मार्ग पर चलकर ही हम अपने आप को भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से मुक्त कर पाएंगे, शुद्ध हो पायेंगे और परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर पाएंगे। सिर्फ़ यही परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करना है! आइये संकल्प लेते हैं कि हम सचमुच परमेश्वर की वाणी को सुनने वाली बुद्धिमान कुंवारियाँ बनें, और जब भी ऐसा सुनने में आये कि कोई परमेश्वर द्वारा वचन बोलने और न्याय का कार्य किये जाने की गवाही दे रहा है, तो उसे आँखें मूँदकर अस्वीकार न करें। बल्कि, हम ध्यान से इस पर गौर करें और पूरी लगन से इसकी तलाश और जाँच करें कि कहीं यह वास्तव में परमेश्वर का कार्य तो नहीं, कहीं इसमें वास्तव में सत्य की अभिव्यक्ति तो नहीं। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम लौटकर आये प्रभु यीशु का स्वागत कर सकते हैं और अंत के दिनों के परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं!

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