रहस्योद्घाटन की पुस्तक की भविष्यवाणियाँ पूरी हो चुकी हैं: परमेश्वर के सामने पश्चाताप कैसे करें और स्वर्गिक राज्य में कैसे आरोहित हों

22 अप्रैल, 2020

साल 2020 में, कोविड-19 वायरस पूरी दुनिया में काफ़ी तेज़ी से फ़ैला, जिसने पूरी दुनिया को आतंकित कर दिया। अफ़्रीका में भारी संख्या में टिड्डियों के झुंड का हमला भी हैरान कर देने वाली घटना थी। अकाल और महामारी के आने से, परमेश्वर में विश्वास करने वाले ज़्यादातर लोगों को यह एहसास होने लगा कि परमेश्वर के आगमन का दिन करीब आ गया है, और परमेश्वर का राज्य आने वाला है। एक बार प्रभु यीशु ने कहा था, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। प्रभु हम सब से यही चाहता है। सिर्फ़ सच्चा पश्चाताप करने पर ही हम परमेश्वर द्वारा बचाये जा सकते हैं और भीषण पीड़ा से पहले स्वर्गिक राज्य में लाये जा सकते हैं। तो सच्चा पश्चाताप क्या है, और हम यह कैसे कर सकते हैं?

सूचीपत्र

क्या अच्छा व्यवहार सच्चे पश्चाताप को दर्शाता है?

सच्चा पश्चाताप क्या है?

प्रभु में अपनी आस्था में हम सच्चा पश्चाताप क्यों नहीं कर पाये

सच्चा पश्चाताप कैसे करें

परमेश्वर के सामने पश्चाताप कैसे करें और स्वर्गिक राज्य में कैसे आरोहित हों

क्या अच्छा व्यवहार सच्चे पश्चाताप को दर्शाता है?

पश्चाताप की बात पर, प्रभु में विश्वास करने वाले कई लोग ऐसा कहेंगे, "क्योंकि अब हम प्रभु में विश्वास करते हैं, इसलिए हम गाली नहीं देते या लड़ाई नहीं करते, हम दूसरों के प्रति सहनशील और धैर्यवान हैं, हम अक्सर प्रभु से प्रार्थना करते हैं और उसके सामने अपने पापों को स्वीकार करते हैं, हम प्रभु के लिए काम करते हैं और उसके लिये अपने आप को खपाते हैं, हम जेल में डाल दिये जाने पर भी प्रभु के नाम को अस्वीकार नहीं करते हैं। इस अच्छे व्यवहार से यह साबित होता है कि हमने सच्चा पश्चाताप किया है। जब प्रभु लौटकर आयेगा, तो हम उसके साथ स्वर्गिक राज्य में प्रवेश करेंगे।" जब हमने प्रभु में विश्वास करना शुरू किया, तो हमने अपनी बुरी आदतों को छोड़ दिया; हम विनम्र और सहनशील बन गये, हमने दूसरों की मदद की और चीज़ों को त्याग कर सुसमाचार फैलाने और प्रभु की गवाही देने के लिए अपने आप को खपाने में सक्षम हुए। हमारे व्यवहार में वाकई कुछ बदलाव भी हुए, लेकिन फ़िर भी इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हमने खुद को पाप की बेड़ियों से मुक्त नहीं किया है, और हम अब भी पाप के बीच जीते हैं, इससे बच नहीं पाते। उदाहरण के लिए, जब हमें कोई कुछ बुरा कहता है जिससे हमारे मुख्य हितों को ठेस नहीं पहुँचता, तो हम उस बात को सह लेते हैं, और उस पर ध्यान नहीं देते। लेकिन जब कोई हमें कुछ ऐसा कहता है जिससे हमारी प्रतिष्ठा और रुतबे को ठेस पहुँचता है और हमें शर्मिंदा करता है, तो भले ही हम उनके बारे में कुछ बुरा नहीं कहते, लेकिन हमारे दिलों में उनके प्रति अपमान और पूर्वाग्रह की भावना आ जाती है, और हम बदला लेने के बारे में भी सोचने लगते हैं। कई मामलों में, चाहे हम कोई ज़्यादा बुरा ना करें, लेकिन हमारे दिलों में बुरे ख़याल लगातार आते हैं। कभी-कभी, हम कुछ समय के लिए सहनशील हो सकते हैं और अपने आप पर काबू भी पा लेते हैं, लेकिन जैसे ही यह सब हमारे बर्दाश्त के बाहर चला जाता है, तो हम कुछ बुरा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। जब ऐसी चीज़ें हमारे अंदर से उजागर और अभिव्यक्त होती हैं, और हम अब भी पाप की बेड़ियों से बच नहीं पाये हैं, तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि हमने सच्चा पश्चाताप किया है?

आइये परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ते हैं, "जो परिवर्तन व्यवहार से अधिक किसी बात में नहीं होते, वे देर तक नहीं टिकते हैं। अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनका दुष्ट पक्ष स्वयं को दिखाएगा। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, जो पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य के साथ मिलकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छा बनना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है, मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ हैं। उनका व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उनका जीवन है, उनका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल वही जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जीवन का और व्यक्ति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर का कार्य लोगों के स्वभाव को बदलने के लिए, उन्हें नए लोगों में पुनर्जीवित करने के लिए होता है। ... अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं—वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में आश्रित तो और भी कम होते हैं। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करते हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यावहारिक परिवर्तन क्षणिक भ्रम हैं, वे उत्साह की अभिव्यक्ति हैं, और वे जीवन की अभिव्यक्ति नहीं हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर")।

परमेश्वर के वचनों से पता चलता है कि भले ही परमेश्वर में विश्वास करने के बाद से हमारा व्यवहार बेहतर हुआ हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारे जीवन स्वभाव में कुछ बदलाव आया है। ज़्यादातार अच्छा व्यवहार उत्साह के कारण है, यह वो व्यवहार है जो सिद्धांतों और नियमों के कारण आया है, या फ़िर यह पवित्र आत्मा की कृपा से किया जाने वाला अभ्यास है। यह इसलिए नहीं है क्योंकि हम सत्य को समझते हैं, यह इसलिए नहीं है क्योंकि हमें परमेश्वर का ज्ञान है, और यह कोई ऐसा अभ्यास नहीं है जो परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की हमारी इच्छा से अपने आप आता है। हम शैतान द्वारा हज़ारों सालों से भ्रष्ट किये गए हैं, हम हर तरह के शैतानी भ्रष्ट स्वभाव—अहंकार, अभिमान, स्वार्थ, नीचता, विश्वासघात, और कपट से भरे हुए हैं। अगर इन स्वभावों को बिना ठीक किये छोड़ दिया गया, तो भले ही हम कुछ नियमों का पालन कर पाएं और बाहर से नेक दिखें, लेकिन यह ज़्यादा समय के लिए नहीं होगा, और जब हमारा सामना किसी अप्रिय चीज़ से होगा तो हम अपने आप को पाप करने से रोक नहीं पायेंगे। उदाहरण के लिए, अपनी अहंकारी और दंभी शैतानी प्रकृति के वश में रहकर, हम हमेशा दूसरों से सम्मान पाने की कोशिश करते हैं, और जब दूसरे लोग हमारे अनुसार काम नहीं करते, तो हम गुस्से में आकर उन्हें भाषण देने लगते हैं। अपनी स्वार्थी प्रकृति के प्रभाव में, हम जो कुछ भी करते हैं वह सिर्फ़ हमारे अपने हितों के लिए होता है; जब घर पर सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तो हम सब कुछ त्याग कर अपने आप को परमेश्वर के लिए खपाना चाहते हैं, और किसी भी कठिनाई का सामना करने के लिए तैयार होते हैं। लेकिन जब बुरा समय आता है, तब हम परमेश्वर को हमारी रक्षा नहीं करने के लिए दोषी ठहराते हैं। यहां तक कि हमने जिन चीजों को त्यागा है उनके लिए भी पछताने भी लगते हैं, और परमेश्वर का विरोध करने के बारे में सोचते हैं। कभी-कभी हम कलीसिया में अपने भाई-बहनों की ऐसी गतिविधियों को देखते हैं जो परमेश्वर की शिक्षा के बिलकुल विपरीत होती हैं और कलीसिया के हितों को भी नुकसान पहुंचाती हैं, हम उनके ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाना चाहते हैं। लेकिन, जीने के ऐसे शैतानी सिद्धांतों के कारण हम मौन रह जाते हैं, जो कहती हैं, "अच्छे मित्रों की गलतियों पर मौन रहने से एक दीर्घकालीन और अच्छी मित्रता बनती है" और "जितनी कम परेशानी, उतना ही बेहतर," हम उनके साथ अपने रिश्ते बनाए रखने के लिए कलीसिया के हितों का त्याग करना पसंद करते हैं। ऐसे सिद्धांतों की सूची लंबी है। इससे पता चलता है कि अगर हमारे भ्रष्ट स्वभावों को ठीक नहीं किया गया, तो हम सत्य का अभ्यास या परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं कर पाएंगे, और हम उनका विरोध भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, दो हज़ार साल पहले के फरीसियों की ही बात करते हैं। बाहर से देखा जाए तो उन्होंने कोई बुरे काम नहीं किये। उन्होंने सुसमाचार फ़ैलाते हुए काफ़ी दूर-दूर तक यात्राएं की, लोगों को बाइबल के बारे में समझाया, और लोगों को व्यवस्था का पालन करना सिखाया। उनका ज़्यादातर व्यवहार अच्छा था, लेकिन जब प्रभु यीशु आया और उसने अपना कार्य करना शुरू किया, तो क्योंकि वह देखने में बहुत ही साधारण मनुष्य था और उसे मसीहा नहीं कहा गया, और क्योंकि उसके बारे में हर बात उनकी धारणाओं के विपरीत थी, इसलिए उनका अहंकारी और अभिमानी स्वभाव उजागर हो गया। उन लोगों ने खुले आम प्रभु यीशु की निंदा की और उसका तिरस्कार किया, उन्होंने इस बात पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया कि कहीं प्रभु यीशु द्वारा बोले गए संदेश सत्य तो नहीं, चाहे प्रभु ने कितने ही संकेत दिए हों या चमत्कार किये हों, उन लोगों ने उसे अनदेखा कर दिया। आखिर में, उन्होंने रोमन अधिकारियों के साथ षड्यंत्र करके प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया।

उक्त बातों से पता चलता है कि भले ही हमारे बाहरी स्वभाव में कुछ बदलाव आये हों, लेकिन अगर हमारे भीतरी स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया, तो हम अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के अधीन रहेंगे, पाप करते रहेंगे और हर समय परमेश्वर का विरोध करने के लिये तैयार रहेंगे। ऐसे लोगों ने भी कभी सच्चा पश्चाताप नहीं किया होता है और वे मूलतः स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिये अयोग्य होते हैं। जैसा कि बाइबल में कहा गया है, "जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है" (यूहन्ना 8:34-35)।

सच्चा पश्चाताप क्या है?

तो सच्चा पश्चाताप क्या है? बाइबल में दर्ज है, "धन्य वे हैं, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे" (प्रकाशितवाक्य 22:14)। "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। परमेश्वर पवित्र है। वह मनुष्य के पापों से घृणा करता है, इसलिए सच्चे पश्चाताप का मानक वह है जब लोगों के विभिन्न शैतानी स्वभावों अर्थात अहंकार, दंभ, स्वार्थ, नीचता, विश्वासघात और कपट को शुद्ध करके बदल दिया जाता है, जब लोग अपने आस-पास की चीज़ों से बेपरवाह होकर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हैं, पाप नहीं करते या परमेश्वर का विरोध नहीं करते, बल्कि वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन और उसका सम्मान करते हैं, तभी उन्हें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किया जाता है। सिर्फ़ ऐसे लोगों ने ही सच्चा पश्चाताप किया होता है।

प्रभु में अपनी आस्था में हम सच्चा पश्चाताप क्यों नहीं कर पाये

कुछ लोग पूछ सकते हैं, "ऐसा क्यों है कि प्रभु द्वारा छुटकारा दिलाये जाने और हमारे पापों को क्षमा किये जाने के बाद भी हम सच्चा पश्चाताप करने में असमर्थ हैं?" ऐसा ख़ास कर इसलिए है क्योंकि अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया था, जो कि लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को बदलने का कार्य नहीं था। आइये परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ें, "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)। इससे हमें पता चलता है कि अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने सिर्फ़ मानवजाति के छुटकारे का कार्य किया था, जिसका प्रभाव लोगों से अपने पापों को कबूल करवाना और पश्चाताप करवाना था। छुटकारे के कार्य के हिस्से के रूप में, प्रभु यीशु ने पश्चाताप का मार्ग बताया, उसने लोगों को अपने पापों को कबूल करना और पश्चाताप करना सिखाया, क्रूस धारण करना और प्रभु का अनुसरण करना सिखाया। इसलिए, लोगों को दूसरों से उसी प्रकार प्रेम करना चाहिए जैसे कि वे अपने आप से करते हैं, उन्हें विनम्र, धैर्यवान, और सहनशील होना चाहिए, उन्हें लोगों को सत्तर गुना सात बार माफ़ करना सीखना चाहिए, आदि आदि। उस समय लोगों की कद-काठी के आधार पर मनुष्य से यही अपेक्षाएँ थीं; जब लोग पाप करते थे, तो वे प्रभु यीशु के सामने आकर अपने पापों को कबूल करते और पश्चाताप करते थे, तब उनके पापों को क्षमा कर दिया जाता था, और वे परमेश्वर के सामने आकर उसकी आराधना करने के हकदार बन जाते थे। वह सब कुछ जिसे प्रभु यीशु ने अभिव्यक्त किया था, बिल्कुल सत्य था जिसे उस समय के लोग समझ सकते थे। लेकिन इसमें लोगों के स्वभावों को बदलना शामिल नहीं था, इसलिए चाहे हम कितना भी बाइबल पढ़ लें, कितना भी अपने पापों को कबूल करके पश्चाताप करें, कितना भी अपने आप को जीत लें, हम तब भी पापों से खुद को छुटकारा दिलाने और सच्चा पश्चाताप करने में असमर्थ ही रहेंगे।

सच्चा पश्चाताप कैसे करें

तो, हम सच्चा पश्चाताप कैसे कर सकते हैं? प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17)। इन वचनों से हमें पता चलता है कि क्योंकि उस समय के लोगों की कद-काठी इतनी छोटी थी, इसलिए अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु ने ज़्यादा सत्यों को अभिव्यक्त नहीं किया या हमारी शैतानी प्रकृति को ठीक करने का मार्ग नहीं बताया। इसलिए प्रभु ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि वह वापस लौटेगा, वह इससे भी ज़्यादा और बड़े सत्यों को अभिव्यक्त करेगा, वह न्याय का कार्य और मनुष्य को शुद्ध करने का कार्य करेगा, जिससे हमें पूरी तरह से पाप की बेड़ियों से मुक्त होने में मदद मिलेगी, हमें शुद्ध करके बदल दिया जाएगा। हम सिर्फ़ प्रभु के लौटकर आने पर उसके न्याय के कार्य को स्वीकार करके और शुद्ध होकर ही सच्चा पश्चाताप कर सकते हैं

आज, प्रभु यीशु लौट आया है: वह देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की नींव पर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य की शुरुआत की है, उसने मानवजाति के उद्धार के लिए आवश्यक सभी सत्यों को अभिव्यक्त किया है, वह उन सभी लोगों का न्याय करने, उन्हें शुद्ध करने और पूर्ण करने के लिए आया है जो अंत के दिनों के उसके उद्धार को स्वीकार करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में सत्य को व्यक्त करता है, मनुष्य का न्याय करने और उसे शुद्ध करने का कार्य करता है, तो वह हमें सीधे तौर पर पश्चाताप करने के विभिन्न तरीक़े ही नहीं बताता, बल्कि न्याय के वचन भी बोलता है, वह हमारी उन प्रकृतियों और सारों को भी उजागर करता है जो परमेश्वर की अवज्ञा और उसका विरोध करते हैं, वह हमारी भ्रष्टता की सच्चाई को भी उजागर करता है; वह हमें विभिन्न सत्यों के बारे में बताता है, जैसे कि ईमानदार कैसे बनें, परमेश्वर की आज्ञा का पालन कैसे करें, परमेश्वर से प्रेम कैसे करें, आदि आदि। इस तरह वह हमें हमारे सामने आने वाली सभी चीज़ों में अभ्यास करने का एक मार्ग प्रदान करता है। परमेश्वर के वचनों के न्याय को अनुभव करके, हमें धीरे-धीरे यह एहसास होता है कि हम शैतान द्वारा कितनी गहराई तक भ्रष्ट किये जा चुके हैं, हमारी प्रकृति और सार में अहंकार और पाखंड, स्वार्थ और नीचता, विश्वासघात और कपट जैसे शैतानी स्वभाव भरे पड़े हैं। ऐसी चीज़ों के प्रभाव में जीकर, हमारे जीवन में इंसान कहलाने लायक कुछ भी नहीं है, हम दूसरों से घृणा करते हैं, और यहां तक कि हम परमेश्वर से भी घृणा करते हैं। परमेश्वर के न्याय के कार्य के बीच, हम देखते हैं कि हम नीच और दुष्ट हैं, परमेश्वर के सामने रहने के लायक नहीं हैं, और तब जाकर हम अपने पापों से घृणा करने लगते हैं और पश्चाताप करना चाहते हैं। साथ ही साथ, हमें परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का पता चलता है जो किसी भी अपराध को सहन नहीं करता और अगर हम सत्य का अभ्यास नहीं करेंगे, तो हम निश्चित तौर पर परमेश्वर की घृणा का पात्र बन जायेंगे और उसके द्वारा अस्वीकार कर दिए जायेंगे। सिर्फ़ तभी हमारे अंदर परमेश्वर का भय पैदा होता है, हम देह-सुख को त्याग कर सत्य का अभ्यास करने लगते हैं, धीरे-धीरे हमें परमेश्वर की आज्ञाकारिता की कुछ सच्चाई का पता चलता है, और तब हम परमेश्वर का विरोध और उसके ख़िलाफ़ विद्रोह भी नहीं करते हैं।

परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को अनुभव करके, हम पूरी तरह पाप से बच पाते हैं, हम अपनी शैतानी प्रकृति की बेड़ियों में नहीं जकड़े रहते, और हम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने, उसकी आज्ञा का पालन करने और उसकी आराधना करने के लिए पूरी तरह से मुक्त होते हैं। सिर्फ़ तभी ऐसा कहा जा सकता है कि हमने वास्तव में पश्चाताप किया है और अपने आप को बदला है, तभी हम स्वर्गिक राज्य में प्रवेश पाने के हक़दार होते हैं। निस्संदेह, परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करके ही हम सच्चा पश्चाताप कर सकते हैं और अपने आप में बदलाव ला सकते हैं। अब, मुझे विश्वास है कि आपको सच्चा पश्चाताप करने का मार्ग मिल गया होगा—तो अब हमें किन विकल्पों को चुनना चाहिए?

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