सभाओं में नियमित रूप से भाग लेना ईसाइयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है

14 अगस्त, 2021

बाइबिल में लिखा है, "और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो" (इब्रानियों 10:25)। सभाओं में उपस्थित होना एक ऐसी चीज है जिसका हम ईसाइयों को पालन करना होता है। पर अब,कुछ भाई और बहनें इसे नियमित रूप से नहीं कर पाते,क्योंकि वे काम और पारिवारिक जीवन में जुटे रहते हैं। उनमें से कुछ तो सभाओं में उपस्थित होने को एक अतिरिक्त बोझ भी समझते हैं,यह सोचकर कि घर पर ही परमेश्वर के वचनों को थोड़ा-बहुत पढ़ लेना काफी है।

वास्तव में, बैठकों में भाग लेने को एक बोझ के रूप में देखना और पारिवारिक जीवन और काम के लिए अपनी बैठकों का त्याग करने का कारण यह है कि हम बैठकों में भाग लेने के अर्थ और इसे न करने के परिणामों को नहीं समझते हैं। आज, आइए इसके बारे में सहभागिता करें।

परमेश्वर उन ईसाइयों को कैसे देखता है जो सभाओं में उपस्थित नहीं होते हैं?

परमेश्वर कहता है, "तुम परमेश्वर में अपनी आस्था से केवल तभी प्राप्त करोगे, यदि तुम इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी चीज, भोजन, कपडे, या किसी भी अन्य चीज की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखोगे! यदि तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपनी आस्था के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ रहते हो, और यदि तुम हमेशा भ्रम में फँसे रहते हो, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे।" "कुछ लोगों के विश्वास को परमेश्वर के हृदय ने कभी स्वीकार नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता। क्योंकि ये लोग, भले ही कितने ही वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण करते रहे हों, लेकिन इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं; वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धांतों और कार्य करने के तौर-तरीकों, और ज़िन्दा रहने के उनके नियमों एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचन को कभी अपना जीवन नहीं माना, कभी नहीं माना कि परमेश्वर का वचन सत्य है, कभी परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया, और परमेश्वर को कभी अपना परमेश्वर नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को एक किस्म का शगल मानते हैं, परमेश्वर को महज एक आध्यात्मिक सहारा समझते हैं, इसलिए वे नहीं मानते कि परमेश्वर का स्वभाव, या उसका सार इस लायक है कि उसे समझने की कोशिश की जाए। ... परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है।"

इससे हम देख सकते है कि ईसाई होने के नाते हमें अपने हृदय में परमेश्वर का महिमागान करना चाहिए। चाहे हमारी जिंदगी हो या हमारा काम, हमें हमेशा परमेश्वर को पहले स्थान पर रखना चाहिए, और सहभागिता करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने को सबसे महत्वपूर्ण चीजें मानना चाहिए। परमेश्वर के विश्वासी को कम-से-कम इतना तो अवश्य करना चाहिए। अगर हम केवल परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करके संतुष्ट हैं, पर हम सभाओं में जुड़ने की नहीं करते हैं और अगर हम परमेश्वर में विश्वास को केवल एक अध्यात्मिक सहारे के तौर पर लेते हैं और अपने आप को हर दिन पैसा कमाने और सांसारिक मामलों में लिप्त रखते हैं, यह सोचते हुए कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम सहभागिता में जुड़ें या न जुड़ें, तो फिर अपनी विश्वास का इतनी लापरवाही भरे तरीके से अभ्यास करके क्या हम एकदम अविश्वासी के समान नहीं हो जाते हैं? अविश्वासी सत्य से प्यार नहीं करते, वे उस जीवन की खोज नहीं करते जो परमेश्वर से आता है, और वे पैसा कमाने और अपनी देह को संतुष्ट करने में व्यस्त रहते हैं। अगर हम परमेश्वर के विश्वासी अविश्वासियों जैसे ही लक्ष्य का पीछा और जीवन की दिशा साझा करते है, तो परमेश्वर हमारी आस्था के बारे में क्या सोचेगा? परमेश्वर हमें परमेश्वर पर हमारे विश्वास के प्रति उदासीन और लापरवाह रवैये के कारण हमें एक अविश्वासी के रूप में परिभाषित करेगा। वह हमें अपने अनुयायियों के रूप में मान्यता नहीं देगा,क्योंकि हम उसमें विश्वास तो करते हैं पर कभी भी उसकी सच्ची आराधना नहीं करते और हम उसके उद्धार को स्वीकार नहीं करना चाहते और न ही उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करना चाहते हैं। परिणामस्वरूप, हमारा अंतिम परिणाम अविश्वासियों के समान ही होगा, परमेश्वर द्वारा निंदित और दंडित किए जाना। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि हम सहभागिता में नियमित तौर से शामिल होते हैं या नहीं यह दर्शाता है कि क्या हम वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और क्या हम सत्य की खोज करते हैं या नहीं। अगर हम हमेशा बहाने बनाते हैं, सहभागिता में जुड़ने से बचने के लिए, और अभी भी अपनी तलाश से जुड़े गलत विचारों को नहीं बदलते हैं, तो हम कदाचित् जीवन या सत्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे, चाहे हमने परमेश्वर में कितने भी साल विश्वास क्यों न किया हो, और हम निश्चित रूप से हटा दिए जाएंगे। इसलिए हम परमेश्वर पर विश्वास अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार नहीं कर सकते, या जब भी हमारा मन न हो सभाओं में जाना नहीं छोड़ सकते। अगर हम अंत तक ऐसे शौकिया तरीके से परमेश्वर पर विश्वास करते रहें तो परमेश्वर हमें अपने विश्वासियों के रूप में नहीं गिनेगा।

हमारे बार-बार सभाओं में न जाने के पीछे शैतान की योजना होती है

सभाओं में अपनी अनुपस्थिति का औचित्य साबित करने के लिए, बहुत से लोग पैसे कमाने, सामाजिक मेलजोल या अपने परिवार की देखभाल में बहुत व्यस्त होने के बहाने बनाते हैं। ये बहाने सुनने में बहुत ही उचित भी लगते हैं, लेकिन अनजाने में हम शैतान की योजनाओं में फंस गए होते हैं। परमेश्वर कहता है, "परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह एक व्यक्ति की देखभाल करता है, उस पर नज़र रखता है, और शैतान इस पूरे समय के दौरान उसके हर कदम का पीछा करता है। परमेश्वर जिस किसी पर भी अनुग्रह करता है, शैतान भी पीछे-पीछे चलते हुए उस पर नज़र रखता है। यदि परमेश्वर इस व्यक्ति को चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को भ्रमित, बाधित और नष्ट करने के लिए विभिन्न बुरे हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; उसे वे सभी लोग अपने लिए चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्ज़ा कर सके, उन पर नियंत्रण कर सके, उनको अपने अधिकार में ले सके, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है? ... परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का उद्देश्य उस समस्त कार्य को नष्ट करना है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है; उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है; उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। यदि वे मिटाए नहीं जाते, तो वे शैतान द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है।" "यह अधिकाधिक आमोद-प्रमोद और धूमधाम के संसार जैसा बनता जा रहा है, सारे लोगों के हृदय इसकी ओर खिंचे चले आते हैं, और कई लोग जाल में फँस जाते हैं और स्वयं को इससे छुड़ा नहीं पाते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा छले जाएँगे जो धोखेबाज़ी और जादू-टोने में लिप्त हैं। यदि तुम उन्नति के लिए कठोर प्रयास नहीं करते, और आदर्शों से रहित हो, और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमाई हैं, तो पाप के ऊँचे उठते ज्वार तुम्हें बहा ले जाएँगे।"

परमेश्वर के शब्दों से, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर हमें बचाने के लिए कार्य कर रहा है, पर शैतान नहीं चाहता है कि हम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाएं, तो इसलिए वह हमें परमेश्वर के पास जाने से रोकने के लिए हर मुमकिन तरीका अपनाता है। पैसा, शोहरत और हैसियत, खाना-पीना और मौज-मस्ती जैसी चीजें हमारे लिए प्रलोभन होती हैं। शैतान पहले लोगों के मन में सभी प्रकार के गलत दृष्टिकोणों को पैदा करता है, जैसा कि हम अक्सर कहते हैं, "धन-दौलत सब कुछ नहीं है, लेकिन इसके बिना तुम कुछ नहीं कर सकते।" कोई व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है," आनंद के लिए हर दिन का लाभ उठाओ,क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है।" यदि हमारे पास सत्य नहीं है तो ये गलत दृष्टिकोण हमें आसानी से धोखा दे देंगे। जब हम इन विचारों को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम धन और प्रसिद्धि का पीछा करने और दैहिक सुखों में लिप्त होने की बुरी प्रवृत्तियों में पड़ जाएंगे, और हम अविश्वासियों के समान बन जाएंगे, और प्रसिद्धि और लाभ के लिए चालबाजी में लिप्त हो जाएंगे और विश्वासघाती व्यवहार करेंगे, पाप के बीच में रहते हुए भी इसे पाप नहीं मानेंगे। खासकर जब हम पाते हैं कि किसी और का जीवन हमसे बेहतर है, तो हम इस बारे में अधिक सोचेंगे कि अधिक पैसा कैसे कमाया जाए। अभी भी कुछ लोग पतित, खाने पीने में लिप्त भ्रष्ट जीवन जीते है, अपने जटिल पारस्परिक संबंधों को बनाए रखने के लिए स्वयं को मौज-मस्ती में डुबोए रखते है, और सभाओं में शामिल होने को एक बोझ के रूप में देखते हैं। एक बार जब कोई व्यक्ति ऐसे भंवर में फंस जाता है तो वह शैतान का शिकार हो जाता है। न केवल उनकी आत्मा बहुत अंधकारमय होती जाएगी, बल्कि उनका जीवन भी अधिक से अधिक खोखला होता जाएगा। अंततः, वे परमेश्वर से दूर रहने, परमेश्वर को धोखा देने और सांसारिक सुखों में लौटने के कारण सत्य और उद्धार प्राप्त करने के अवसर को खो देंगे।

अब, कई ईसाई शैतान की चालों को नहीं देख सकते हैं, यह सोचकर कि दुनिया की प्रवृत्तियों का पालन करना कोई बड़ा पाप नहीं है, और यह कि परमेश्वर में विश्वास करना और सत्य की खोज करके रातोंरात परिणाम उत्पन्न नहीं हो सकता है। इसलिए, वे अक्सर दैहिक सुखों का अनुसरण करते हैं और सत्य की खोज के लिए उनमें तत्काल आवश्यकता क भावना नहीं होती। वास्तव में, शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए बुरी प्रवृत्तियों का उपयोग कर रहा होता है, उन्हें परमेश्वर से दूर-से - दूर करने के लिए और अंत में उन्हें पूरी तरह से निगल जाने के लिए। यदि हम सत्य की दृढ़ता से खोज नहीं करते हैं, तो हम शैतान की चालों को नहीं समझ पाएंगे। यह ऐसा ही है जैसे शैतान ने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया था, लोगों को यह बताने के बजाय कि परमेश्वर को नकारने और धोखा देने से क्या परिणाम होंगे, वह लोगों को लुभाने के लिए उन्हें कुछ अच्छा कहता है और उनमें यह गलत भावना पैदा करता है कि वह उन बातों को उनके भले के लिए कह रहा है, और अंत में वे ऐसे काम कर बैठते हैं जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात होते हैं। आजकल, हम सभी उसी हव्वा के समान हैं जो बहकाई गई थी, परमेश्वर के वचनों पर विश्वास न करना, लेकिन अपने सामने की भौतिक चीजों को सबसे महत्वपूर्ण मानना। अपने भौतिक आनंद को संतुष्ट करने के लिए, हम अपनी सारी ऊर्जा और समय उसके लिए समर्पित करने में संकोच नहीं करते। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो क्या हम भी शैतान द्वारा निगल जाने के निशाने पर नहीं होंगे? पर अगर, हम परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं, सामान्य रूप से कलीसिया जीवन में भाग लेते हैं, और अधिक सत्यों को समझते हैं, तो हम सत्य का उपयोग करके शैतान की चालों को समझने में सक्षम होंगे, और हम शैतान द्वारा मूर्ख नहीं बनाए जाएंगे और उसके द्वारा पीड़ित नहीं किए जाएंगे।

सभाओं में भाग लेना क्यों बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है?

प्रभु यीशु ने कहा, "क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" (मत्ती 18:20)। परमेश्वर कहते है,"पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। किसी अन्य समय शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें शीघ्र अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। उसी प्रकार अनुभव करो जैसा उसने किया है, तो तुम्हें उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। ऐसा करने से तुम तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य के लिए पूर्णता का ऐसा मार्ग है जिससे जीवन विकसित होता है।"

परमेश्वर के वचनों से, हम यह जानते हैं कि कलीसिया वह स्थान है जहाँ पवित्र आत्मा कार्य करता है। जब तक भाई-बहन परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए इकट्ठे होते हैं, तब तक पवित्र आत्मा काम करता रहेगा । इसलिए, एक कलीसिया जीवन जीना हमारे लिए पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने और अपने आध्यात्मिक जीवन में विकसित होने का एक तरीका है। क्योंकि अलग-अलग भाइयों और बहनों के पास अलग-अलग क्षमता, अंतर्दृष्टि और अनुभव होते हैं, और परमेश्वर के वचन से उन्हें अलग-अलग प्रबुद्धता और ज्ञान प्राप्त होता है, जब हम एक साथ संगति के लिए एकत्रित होते हैं, तो हम अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए एक-दूसरे के मजबूत पहलुओं से सीख ले सकते हैं, ताकि हम सत्य को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। जब हमें किसी चीज की गलत समझ होती है, तो भाई-बहन इस पर ध्यान देंगे और समय के साथ हमसे संवाद करेंगे, हमें बताएंगे कि सत्य के अनुसार कैसे समझा जाए। इसके अलावा, सत्य का अनुसरण करने वाले प्रत्येक भाई और बहन समय की हर अवधि के दौरान सत्य की नई समझ और अनुभव प्राप्त करेंगे। उनकी इन बबातों को सुनकर कि उन्होंने अपने जीवन में परमेश्वर के कार्य का कैसे अनुभव किया है, हम स्वयं भी पोषित महसूस करते है। इसलिए, कलीसियाई जीवन हमें और अधिक सत्यों को समझने का अवसर देता है और हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करता है। कुछ लोग कह सकते हैं, "क्या मैं घर पर स्वयं परमेश्वर के वचन को पढ़कर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त नहीं कर सकता?" यह सही है, लेकिन एक व्यक्ति जो कुछ है वह बहुत सीमित होता है, और परमेश्वर से सीधा प्राप्त किया हुआ आपका व्यक्तिगत ज्ञान और प्रकाश भी सीमित होता है। इस मामले में, हम सत्य को धीरे-धीरे समझते हैं। अधिकांश समय हम केवल कुछ अक्षरों और धर्म-सिद्धांतों को ही समझ सकते हैं, लेकिन हम ऐसे विवरणों की स्पष्ट समझ नहीं रखते हैं कि उन वचनों को कहने में परमेश्वर के इरादे क्या हैं और अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं। कभी-कभी हमारी समझ गलत भी हो सकती है, क्योंकि हम परमेश्वर के वचनों का विश्लेषण अपने मस्तिष्क से उनके शाब्दिक अर्थ के अनुसार करने का प्रयास करते हैं, और इस प्रकार हममें परमेश्वर के बारे में धारणाएं और गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। नतीजतन, हमारे जीवन का विकास धीमा हो जाएगा, या हम गलत तरीके से अभ्यास भी कर सकते हैं, जो हमारे जीवन के विकास में देरी का कारण बन सकता है।

इसके अलावा, वास्तविक जीवन में, हम सभी प्रकार की समस्याओं का सामना करेंगे, जैसे कि हमारे काम में आने वाली कठिनाइयाँ, सहकर्मियों का प्रतिस्पर्धी दबाव, बच्चों को शिक्षित करने में कठिनाइयाँ, और हमारे जीवनसाथी के साथ झगड़े। क्योंकि हमारा कद छोटा है और हम सत्य को नहीं समझते हैं और चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं इसलिए हम यह नहीं जानते कि कई कठिनाइयों से कैसे निपटा जाए।। यदि हमारे पास एक उचित कलीसिया जीवन है, तो हम उन्हें अपने भाइयों और बहनों के साथ सभाओं में प्रकट कर सकते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों पर संवाद करेंगे और अपने व्यक्तिगत अनुभवों को हमारे साथ साझा करेंगे, और इसलिए हमारे पास अपनी समस्याओं को हल करने और अभ्यास करने का तरीका जानने का एक मार्ग होगा। इसी तरह हम जितना अधिक सत्य की खोज करेंगे और समस्याओं का समाधान करेंगे, उतने ही अधिक सत्य हम समझेंगे और उतने ही कम कठिनाइयाँ और समस्याएँ पैदा होंगी, और हमारे हृदय मुक्त हो जाएंगे। इसलिए, बैठकों में भाग लेना न केवल एक अतिरिक्त बोझ नहीं है, बल्कि हमें और अधिक लाभ दिलाएगा। हमारा जीवन तेजी से बढ़ रहा होगा, और परमेश्वर के साथ हमारा संबंध अधिक से अधिक सामान्य होगा। कलीसियाई जीवन हमारे लिए अत्यंत लाभदायक है!

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