असल में स्वर्गारोहित होने का क्या अर्थ है?

26 दिसम्बर, 2021

2,000 वर्ष पहले, प्रभु यीशु ने सूली पर चढ़ाये जाने, और छुटकारे का कार्य पूरा कर लेने के बाद, वापस लौटकर आने का वादा किया था। तब से, सभी विश्वासी हमारे उद्धारकर्ता के बादल पर सवार होकर नीचे आने की आस लगाए बैठे हैं, ताकि वे उसके पास स्वर्गारोहित हो सकें। विश्वासियों को किसी भी पल स्वर्गारोहित होने की आशा है, मगर वे अपनी आँखों से आपदाएँ आते देख रहे हैं, पर अब तक बादल पर वापस आ रहे प्रभु का स्वागत नहीं कर पाए हैं। बहुत-से लोगों को बड़ी निराशा हो रही है। वे हमेशा सोचते रहे हैं कहीं प्रभु वास्तव में वापस तो नहीं आ गया, कोई विश्वासी स्वर्गारोहित तो नहीं हो गया, लेकिन किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं देखा है। वे सिर्फ आपदाओं को लगातार बढ़ते, महामारियों को और गंभीर होते, और बहुत ज्यादा लोगों को, कुछ पादरियों और एल्डरों को भी, आपदाओं में मरते हुए देख रहे हैं। लोग डरा हुआ या शायद प्रभु द्वारा त्यागा हुआ भी महसूस कर रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि किसी भी पल आपदाओं में उनकी मृत्यु हो जाएगी। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अब जबकि आपदाएँ शुरू हो चुकी हैं, प्रभु लौट कर क्यों नहीं आया, उन्हें स्वर्गारोहित क्यों नहीं किया। उनके लिए यह हैरानी की बात है कि चमकती पूर्वी बिजली गवाही दे रही है कि प्रभु यीशु पहले ही देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, और अंत के दिनों में, सत्य व्यक्त कर न्याय-कार्य कर रहा है। बहुत-से लोग जो सत्य के लिए लालायित हैं, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर, परमेश्वर की वाणी को पहचान लेते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ जाते हैं। वे हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का खा-पी रहे हैं, जिनसे उनका भरण-पोषण हो रहा है, और वे मेमने के विवाह भोज में शामिल होते हैं। यही वे लोग हैं जिन्होंने प्रभु का स्वागत किया है, और आपदाओं से पहले परमेश्वर के सिंहासन के सामने स्वर्गारोहित किए गए हैं। बहुत-से धार्मिक लोग यह सोचकर पशोपेश में हैं, कि "प्रभु के वापस लौट आने और उनके स्वर्गारोहित होने के बारे में चमकती पूर्वी बिजली गलत है, क्योंकि बाइबल में कहा गया है, 'तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे' (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। अगर प्रभु वापस आ चुका है, तो फिर हमें ऊपर क्यों नहीं ले जाया गया? उसे तो लोगों को आकाश में ऊपर ले जाना है न? चमकती पूर्वी बिजली के विश्वासी तो जमीन पर ही हैं, फिर वे कैसे स्वर्गारोहित हुए होंगे?" उन्हें यह बात बेतुकी लगती है। तो फिर, स्वर्गारोहित होने का वास्तव में क्या अर्थ है? बहुत-से लोग स्वर्गारोहण का सच्चा अर्थ नहीं समझते, बल्कि सोचते हैं कि इसका अर्थ आकाश में ले जाया जाना होता है, यानी कोई भी व्यक्ति जो अभी जमीन पर है, स्वर्गारोहित नहीं हुआ है। वे बहुत गलत समझ रहे हैं।

प्रभु के वापस आने और उन्हें स्वर्गारोहित करने की आशा करना बिल्कुल सही है, क्योंकि प्रभु यीशु ने विश्वासियों से उसका स्वागत करने को कहा था। लेकिन पौलुस ने कहा, "उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें।" क्या यह सही है? क्या प्रभु यीशु ने कभी यह कहा कि वापस आने पर वह विश्वासियों को हवा में उससे मिलने के लिए ले जाएगा? उसने नहीं कहा। क्या पवित्र आत्मा द्वारा इसकी कोई गवाही है? नहीं है। क्या पौलुस प्रभु यीशु की ओर से इस बारे में बोल सकता था? क्या प्रभु ने इस बात को स्वीकार किया? नहीं। प्रभु विश्वासियों को कैसे स्वर्गारोहित करता है, इसकी व्यवस्था परमेश्वर करता है। प्रभु यीशु ने कहा था, "उस दिन या उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र; परन्तु केवल पिता" (मरकुस 13:32)। पौलुस एक इंसान था, सिर्फ एक प्रेरित, तो उसे कैसे पता होता कि प्रभु विश्वासियों को कैसे स्वर्गारोहित करता है? पौलुस की बात पूरी तरह उसकी कल्पना पर आधारित थी और प्रभु का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हम इसके आधार पर तय नहीं कर सकते कि हम प्रभु का स्वागत कैसे करेंगे। प्रभु यीशु, अंत के दिनों में कैसे वापस आकर विश्वासियों को स्वर्गारोहित करेगा, इस बारे में हमें उसके वचनों का अनुसरण करना होगा, क्योंकि वह मसीह है, राज्य का प्रभु, और एकमात्र उसी के वचन सत्य हैं और उन्हीं में अधिकार है। प्रभु के वचनों के अनुसार उसका स्वागत करना गलत नहीं हो सकता। आइए, गौर करें कि प्रभु यीशु ने क्या कहा। प्रभु यीशु ने कहा था, "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। "इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (मत्ती 24:44)। "आधी रात को धूम मची : 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)। "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं" (यूहन्ना 10:27)। "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य अध्याय 2, 3)। हम देख सकते हैं कि अपनी वापसी के बारे में अपनी भविष्यवाणियों में प्रभु ने हमेशा कहा है : "मनुष्य के पुत्र," "मनुष्य के पुत्र का आना," "मनुष्य का पुत्र आ जाएगा," "मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा," और "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं।" ये अहम बयान हमें बता रहे हैं कि प्रभु देहधारी होकर मनुष्य के पुत्र के रूप में वापस आता है, पृथ्वी पर हमसे बात करने, हमारा दरवाजा खटखटाने। जो लोग प्रभु की वाणी को सुनकर दरवाजा खोलते हैं, वे बुद्धिमान कुआँरियाँ हैं, जो प्रभु का स्वागत कर उसके भोज में शामिल होती हैं। उन्हें प्रभु के सामने स्वर्गारोहित किया जाता है। प्रभु यीशु ने कभी नहीं कहा कि वह लोगों को उससे मिलने के लिए आकाश में ले जाएगा, लेकिन उसने लोगों से कहा कि उसका स्वागत करने के लिए उसकी वाणी सुनें, उसके सामने आएं और उसके भोज में शामिल हों। प्रभु का स्वागत करने और उससे मिलने के लिए हमें उसके वचनों का अनुसरण कर परमेश्वर की वाणी को सुनना होगा। जैसे ही हम किसी को यह पुकारते सुनें कि दूल्हा आ रहा है, हमें उससे मिलने के लिए बाहर जाना चाहिए, न कि अपनी कल्पनाओं के आधार पर बेवकूफी से आकाश में ले जाए जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। ऐसा किया तो हमें कभी प्रभु की वाणी सुनने और उसका स्वागत करने का मौका नहीं मिलेगा। प्रभु मनुष्य के पुत्र के रूप में हमारे बीच वापस आता है, हमसे बातें करता है, इसलिए अगर हम बस आकाश में जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो हम प्रभु के मार्ग से अलग रास्ते पर हैं। इसलिए, लोगों के इस विश्वास में कि उन्हें प्रभु से आकाश में मिलने के लिए ले जाया जाएगा, बिल्कुल दम नहीं है। यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध है और मात्र इंसानी धारणा है। तो वास्तव में स्वर्गारोहित होना क्या है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हमारे लिए यह स्पष्ट करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'उठाया जाना' निचले स्थान से किसी ऊँचे स्थान पर ले जाया जाना नहीं है जैसा कि लोग सोच सकते हैं; यह एक बहुत बड़ी मिथ्या धारणा है। 'उठाया जाना' मेरे द्वारा पूर्वनियत और फिर चयनित किए जाने को इंगित करता है। यह उन सभी के लिए है जिन्हें मैंने पूर्वनियत और चयनित किया है। उठाए गए लोग वे सभी लोग हैं जिन्होंने पहलौठे पुत्रों या पुत्रों का स्तर प्राप्त कर लिया है या जो परमेश्वर के लोग हैं। यह लोगों की धारणाओं के बिलकुल भी संगत नहीं है। वे सभी लोग जिन्हें भविष्य में मेरे घर में हिस्सा मिलेगा, ऐसे लोग हैं जो मेरे सामने उठाए जा चुके हैं। यह एक सम्पूर्ण सत्य है, कभी न बदलने वाला और जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यह शैतान के विरुद्ध एक जवाबी हमला है। जिस किसी को भी मैंने पूर्वनियत किया है, वह मेरे सामने उठाया जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 104')। "चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है कि हम परमेश्वर की इच्छा, उसके वचन और कथनों की खोज करें—क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं। जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है')। इससे सारी बातें समझना आसान हो जाता है, है न? स्वर्गारोहण का अर्थ हमारी सोच जैसा नहीं है, निचले स्थान से ऊंचे स्थान में, पृथ्वी से आकाश में ले जाया जाना नहीं है। यह उतना ज्यादा अस्पष्ट और अलौकिक नहीं है। "स्वर्गारोहण" तब होता है जब परमेश्वर बोलने और कार्य करने के लिए पृथ्वी पर मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारी होता है, हम उसके वचन सुनते हैं, इसे सत्य और परमेश्वर की वाणी के रूप में पहचानते हैं, फिर परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होकर उसे स्वीकार कर पाते हैं। हम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, खुद उसके द्वारा सिंचित और पोषित होते हैं, और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करते हैं। यह होता है परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित होना। जब प्रभु यीशु अपना छुटकारे का कार्य करने आया, तो जिन्होंने पहचाना कि उसके वचन परमेश्वर की वाणी हैं, फिर उसे स्वीकार कर उसका अनुसरण किया, जैसे कि पतरस, यूहन्ना, और दूसरे अनुयायी, सभी परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित किए गए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में आया है, सत्य व्यक्त कर रहा है, न्याय-कार्य कर रहा है। सभी संप्रदायों के सत्य से प्रेम करने वाले और परमेश्वर के प्रकटन के लिए लालायित लोगों ने, यह देखकर कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य हैं, परमेश्वर की वाणी हैं, उसके न्याय-कार्य को स्वीकार कर लिया है। वे हर दिन परमेश्वर के वचनों का खान-पान करते हैं, उनके द्वारा सिंचित और पोषित होते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं। वे परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित बुद्धिमान कुआँरियाँ हैं, जो मेमने के विवाह भोज में शामिल होती हैं, जिससे प्रकाशितवाक्य की भविष्यवाणी पूरी तरह से साकार होती है : "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

अब मुझे लगता है कि स्वर्गारोहण के अर्थ के बारे में हमें स्पष्टता मिल गई है। अब प्रभु से आकाश में मिलने के विचार के बारे में सोचें, तो क्या वह अवास्तविक और मूर्खतापूर्ण नहीं है? प्रभु यीशु ने कई बार "मनुष्य के पुत्र के आने," की भविष्यवाणी की, मनुष्य को बारम्बार चेतावनी दी कि उसकी वाणी सुने। तो फिर लोग उसका स्वागत करने के लिए उसके वचनों के बजाय इंसान के वचनों पर चलने पर क्यों अड़े हुए हैं? वे इस बेतुके बयान से क्यों चिपके हुए हैं, "उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें"? यह कैसी समस्या है? क्या यह आशीष पाने के लिए बहुत उतावले होने की ओर इशारा नहीं करती? क्या यह इसलिए नहीं कि वे चाहते हैं कि उन्हें सीधे परमेश्वर के राज्य में ले जाया जाए, आपदाओं से दूर, जहां वे आशीषों का आनंद उठा सकें? आइए, इस बारे में सोचें। क्या प्रभु के आने पर, अपने पापों की क्षमा पा चुके लोग जो लगातार पाप करते हैं, राज्य में स्वर्गारोहित किए जा सकते हैं? क्या उन्हें इसके आशीषों का आनंद उठाने का कोई हक है? यह सच है कि प्रभु ने हमें पाप से छुटकारा दिलाया, लेकिन हम नकार नहीं सकते कि हम अभी भी अपनी पापी प्रकृति के काबू में हैं, और पाप करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने से खुद को रोक नहीं पाते। हम पाप के बंधनों से बच निकल कर शुद्धता हासिल नहीं कर पाए हैं। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है। "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (इब्रानियों 12:14)। तो क्या गंदगी और भ्रष्टता से भरे हुए लोग उसके राज्य में जा सकते हैं? क्या यह एक इंसानी कल्पना और खयाली पुलाव पकाना नहीं है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अंत के दिनों में उतरेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे उतरेगा? तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ अवतरण चाहते हो—क्या तुम इतने भाग्यशाली हो सकते हो? तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के आशीषों में साझेदारी के अयोग्य होंगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में')। "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')। प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, जो सिर्फ लोगों को पापों से छुटकारा दिलाकर माफ करने के लिए था, मगर हमारी पापी प्रकृति बरकरार है। हम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते रहते हैं, और हमें पूरी तरह से बचाया नहीं गया है। प्रभु यीशु से सिर्फ अपने पापों के लिए माफी पा लेना काफी नहीं है। हमें अभी भी प्रभु का स्वागत करके उसके सामने स्वर्गारोहित होना है, अंत के दिनों में, उसके न्याय को स्वीकार करना है, तब हम पाप से मुक्त होकर पूरी तरह से बचाए जा सकेंगे, ऐसे इंसान बनेंगे, जो परमेश्वर के प्रति समर्पित होते और उसका भय मानते हैं। फिर हम उसके राज्य में प्रवेश कर सकेंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में आकर सत्य व्यक्त करता है और प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की बुनियाद पर न्याय-कार्य करता है। यह मनुष्य की पापी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह से ठीक करने के लिए है, ताकि हम पाप और शैतान की ताकतों से मुक्त होकर परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से बचाए जा सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट होकर अनेक सत्य व्यक्त किए हैं, हम भ्रष्ट इंसानों को, शुद्ध होने और पूरी तरह से बचाए जाने के लिए जरूरी हर बात बताई। उसने परमेश्वर की प्रबंधन योजना के रहस्यों को प्रकट किया है, जैसे कि मनुष्य का प्रबंध करने के पीछे परमेश्वर का क्या लक्ष्य है, शैतान मनुष्य को कैसे भ्रष्ट करता है, कैसे परमेश्वर के तीन चरणों का कार्य मनुष्य को पूरी तरह बचाता है, अंत के दिनों के उसके न्याय-कार्य का अर्थ, देहधारणों और परमेश्वर के नामों के रहस्य, हर किस्म के इंसान के परिणाम और गंतव्य, और राज्य का सौंदर्य। ये वचन अविश्वसनीय रूप से आँखें खोलने और पूरी तरह से आश्वस्त करने वाले हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मनुष्य के पाप और परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध की जड़, हमारी शैतानी प्रकृति और स्वभाव, का न्याय कर उसे उजागर करता है। वह इस सत्य को भी उजागर करता है कि हम शैतान द्वारा कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, और हमें भ्रष्टता से बच निकलने और पूरी तरह से बचाए जाने का रास्ता दिखाता है। परमेश्वर के चुने हुए लोग हर दिन परमेश्वर के वचनों का खान-पान कर आनंद लेते हैं। उनके वचनों से हमारा न्याय होता है, हमें ताड़ना मिलती है, निपटान और काट-छाँट होती है, हम हर प्रकार के परीक्षणों का अनुभव करते हैं, हम अनेक सत्य सीखते हैं, और सही मायनों में अपनी शैतानी प्रकृति को जान पाते हैं। हम समझ पाते हैं कि हम हमेशा भ्रष्टता में जीते हैं, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उसे गुस्सा दिलाते हैं, और अगर हम प्रायश्चित करके नहीं बदले, तो परमेश्वर हमें हटाकर दंडित करेगा। हम परमेश्वर के धार्मिक, अपमानित न किए जा सकने वाले स्वभाव का अनुभव करते हैं, उसके प्रति हमारे मन में श्रद्धा जागती है। हमारी भ्रष्टता धीरे-धीरे शुद्ध होकर ठीक हो जाती है, हम आखिर पाप के बंधनों से बच निकलते हैं, और परमेश्वर की शानदार गवाही देते हैं। आपदाओं से पहले, परमेश्वर विजेताओं का एक समूह बना चुका है, आपदाएँ आ रही हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ठुकराकर उसका प्रतिरोध करने और शैतान से संबंध रखने वाले लोग आपदाओं में नष्ट कर दिए जाएंगे। जो लोग परमेश्वर के न्याय का अनुभव कर शुद्ध हो जाते हैं, उन्हें आपदाओं में परमेश्वर से रक्षा मिलेगी, वे उसके राज्य में ले जाए जाएंगे, और उन्हें एक सुंदर गंतव्य मिलेगा। सही मायनों में यही परमेश्वर के राज्य में स्वर्गारोहित होना है। परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से बचाकर पूर्ण किए जाने वाले ये विजेता, पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हैं, उसकी इच्छा पूरी करते हैं। वे परमेश्वर के राज्य के लोग हैं। इस तरह पृथ्वी पर मसीह का राज्य साकार होता है, और इससे प्रभु यीशु की भविष्यवाणी साकार होती है : "हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो" (मत्ती 6:9-10)। "फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा। वह उस दुल्हिन के समान थी जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो। फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊँचे शब्द से यह कहते हुए सुना, 'देख, परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं'" (प्रकाशितवाक्य 21:2-4)। "जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा" (प्रकाशितवाक्य 11:15)। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं, "एक बार जब विजय का कार्य पूरा कर लिया जाएगा, तब मनुष्य को एक सुंदर संसार में लाया जाएगा। निस्संदेह, यह जीवन तब भी पृथ्वी पर ही होगा, किंतु यह मनुष्य के आज के जीवन के बिलकुल विपरीत होगा। यह वह जीवन है, जो संपूर्ण मानव-जाति पर विजय प्राप्त कर लिए जाने के बाद मानव-जाति के पास होगा, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए एक नई शुरुआत होगी, और मनुष्य के पास इस प्रकार का जीवन होना इस बात का सबूत होगा कि मनुष्य ने एक नए और सुंदर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। यह पृथ्वी पर मनुष्य और परमेश्वर के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुंदर जीवन का आधार ऐसा होना चाहिए, कि मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने और उस पर विजय पा लिए जाने के बाद वह परमेश्वर के सम्मुख समर्पण कर दे। और इसलिए, मानव-जाति के अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने से पहले विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन ही पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य का जीवन है, पृथ्वी पर सबसे अधिक सुंदर जीवन, उस प्रकार का जीवन जिसकी लालसा मनुष्य करता है, और उस प्रकार का जीवन, जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी प्राप्त नहीं किया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबधंन के कार्य का अंतिम परिणाम है, यह वही है जिसकी मानव-जाति सर्वाधिक अभिलाषा करती है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना')।

"जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा, और जब वे अपने-अपने कर्तव्य निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं को समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीज़ों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर सभी चीज़ों पर और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और मनुष्यों और स्वयं के साथ एक अनंत जीवन का आरंभ करेगा। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')।

इस मुकाम पर, हम यह पूरी तरह समझ गए हैं कि सही मायनों में स्वर्गारोहित होना क्या है। स्वर्गारोहित होना, मुख्य रूप से परमेश्वर की वाणी को सुनना, उसके पदचिन्हों पर चलना, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ना, और अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय-कार्य स्वीकारना है। धार्मिक संसार ने आपदाओं से पहले स्वर्गारोहण का अनुभव क्यों नहीं किया है? मुख्य रूप से इसलिए, क्योंकि वे सत्य नहीं खोजते, परमेश्वर की वाणी नहीं सुनते, बल्कि अपनी धारणाओं और बाइबल के पदों के शब्दों से चिपके रहते हैं। वे सिर्फ मनुष्य के कथन सुनते हैं, मगर प्रभु का उसके वचनों के अनुसार स्वागत नहीं करते। यही कारण है कि वे आपदाओं में डूब गए हैं। लोग बस प्रभु के बादल पर आने की प्रतीक्षा करना चाहते हैं, और तुरंत रूप बदल कर उससे मिलने के लिए आकाश में ले जाया जाना चाहते हैं, इसलिए वे खुद को तैयार किए बिना या परमेश्वर की वाणी को सुनने की कोशिश किए बिना बस यूं ही प्रतीक्षा करते हैं। उनके दिल सुन्न हैं। इस तरह वे प्रभु का स्वागत कैसे कर सकते हैं? वे रोते हुए, दांत पीसते हुए, आपदाओं में डूब जाएंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अपना न्याय-कार्य पिछले तीन दशकों से कर रहा है। उसने आपदाओं से पहले, विजेताओं का एक समूह बनाया, और अब आपदाएँ आ रही हैं। जो लोग परमेश्वर की वाणी सुनते हैं, और आपदाओं में प्रभु का स्वागत करते हैं, उनके पास अभी भी स्वर्गारोहण का मौका है। यह आपदाओं के बीच स्वर्गारोहित होना है, उनके पास बचने की आशा है। जो लोग अपनी धारणाओं पर चलकर अड़े रहते हैं कि प्रभु को एक बादल पर ही आना होगा, वे आपदाओं में डूब जाएंगे, और उन्हें बचाया नहीं जा सकेगा। आपदाएँ ख़त्म होने के बाद, परमेश्वर सभी राष्ट्रों और लोगों के सामने खुलकर प्रकट होगा, और इस तरह प्रकाशितवाक्य 1:7 की भविष्यवाणी साकार होगी, "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे।" सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंशों से समापन करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "बहुत से लोगों को शायद इसकी परवाह न हो कि मैं क्या कहता हूँ, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को, जो यीशु का अनुसरण करते हैं, बताना चाहता हूँ कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते अपनी आँखों से देखोगे, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते देखोगे, यही वह समय भी होगा जब तुम दंडित किए जाने के लिए नीचे नरक में जाओगे। वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति का समय होगा, और वह समय होगा, जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दंड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं और संकेतों की खोज नहीं करते और इस प्रकार शुद्ध कर दिए गए हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि 'ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता, एक झूठा मसीह है' अनंत दंड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेत प्रदर्शित करता है, पर उस यीशु को स्वीकार नहीं करते, जो कड़े न्याय की घोषणा करता है और जीवन और सच्चा मार्ग प्रकट करता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटे, तो वह उनके साथ निपटे। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु की वापसी उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है, जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, पर उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह दंडाज्ञा का संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के ख़िलाफ़ निंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए, जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा')।

"अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लेकर आता है। यह सत्य वह मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यह एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते हो, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। वे लोग जो नियमों से, शब्दों से नियंत्रित होते हैं, और इतिहास की जंजीरों में जकड़े हुए हैं, न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का शाश्वत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास, सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल की बजाय, बस मैला पानी ही है जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। वे जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की गई है, हमेशा के लिए मुर्दे, शैतान के खिलौने, और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की कोशिश करते हो, केवल जड़वत खड़े रहकर चीजों को जस का तस रखने की कोशिश करते हो, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को ख़ारिज़ करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के चरण उमड़ती लहरों और गरजते तूफानों की तरह विशाल और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निठल्ले बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, अपनी नादानी से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? तुम जिस परमेश्वर को थामे हो उसे उस परमेश्वर के रूप में सही कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को ढूँढ़ने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? तुम अपने हाथों में जो थामे हो वे शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं दे सकते। तुम जो शास्त्र पढ़ते हो वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं और ये दर्शनशास्त्र के वचन नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हैं, तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए गहन चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों का बोध नहीं करवाती है? क्या तुम परमेश्वर से अकेले में मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग को सौंप देने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा सुझाव यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—उसकी ओर देखो जो अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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