वांटेड मगर बेकसूर

06 मई, 2024

लियू युनयिंग, चीन

मई 2014 में, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को फंसाने और बदनाम करने के लिए शैन्दोंग में झाओयुआन मामला गढ़ा, और फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों को गिरफ्तार करने के लिए फौरन देश भर में, “सौ दिनों की कार्रवाई” शुरू कर दी। कई भाई-बहनों को गिरफ्तार कर लिया गया। सितंबर से नवंबर के बीच, सिर्फ दो महीनों में, मेरी काउंटी के 30 से भी अधिक भाई-बहन एक के बाद एक गिरफ्तार हो गए। उस वक्त मुझ पर बहुत-सी कलीसियाओं के कार्य की ज़िम्मेदारी थी, और हर दिन, पुलिस की पैनी निगरानी के सामने खतरे में फंसे भाई-बहनों और आस्था से जुडी किताबों को सुरक्षित जगह पहुँचाने की व्यवस्था करती थी। मेरे सामने, हर पल गिरफ्तारी का खतरा होता था। एक रात, कैद से रिहा हुए एक भाई ने मुझे बताया कि उससे पूछताछ के दौरान पुलिस ने मेरी निजी जानकारी का जिक्र किया और मेरा फोटो दिखाकर पूछा कि क्या वह मुझे जानता है। भाई ने बताया कि मैं गिरफ्तारी का पहला निशाना हूँ, और मुझे तुरंत वहां से चले जाना चाहिए। मुझे लगा, “इतने भाई-बहन गिरफ्तार हो चुके हैं, गिरफ्तारी के बाद के हालात से निपटने का बहुत-सा काम बाकी है। इसके अलावा, कुछ भाई-बहन बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तारी और सताए जाने के कारण कमजोर महसूस कर रहे हैं, और उन्हें साथ और मदद की जरूरत है। कुछ दिन बाद चली जाऊंगी।” लेकिन मेरे भाई ने जोर देकर कहा, “आज ही रात जाना ठीक रहेगा। यहाँ मत रहो। सड़क पर हर जगह कैमरे हैं, कैमरे की रिकॉर्डिंग की जाँच करते ही वे तुम्हें ढूँढ़ लेंगे।” यह सुनते ही मेरे भीतर भयानक डर समा गया और मैं बुरी तरह घबरा गई। इसलिए मैंने जल्दी-जल्दी कलीसिया के बचे हुए काम की व्यवस्था की और एक पास के काउंटी में भाग गई।

एक बुजुर्ग भाई और बहन ने मुझे अपने घर में रखने का खतरा मोल लिया। बाहर कैमरे होने के कारण मैं बाहर नहीं जा सकती थी, इसलिए मुझे उनके घर पर ही रहना पड़ता था। उनका बेटा एक स्कूल में काम करता था। सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था कि शिक्षक स्टाफ और उनके परिवार के सदस्य धार्मिक आस्था नहीं रख सकते वरना उन्हें उनके पदों से निकाल दिया जाएगा। इस वजह से, उनके बेटे को डर था कि उसका भविष्य खराब हो जाएगा, और वह परमेश्वर में अपने माता-पिता की आस्था का विरोध करता था। बहन को डर था कि उसका बेटा मुझे घर पर देखेगा तो पुलिस को सूचित कर देगा, इसलिए उसे मेरे रहने की व्यवस्था अटारी में करनी पड़ी। जब भी मेरी बहन का बेटा वापस आता, मैं बहुत घबरा जाती। एक बार कुछ लेने के लिए उसका बेटा ऊपर आया। मैं डर गई कि वह मुझे देख लेगा, तो मैं एक दरवाजे के पीछे छुप गई और हिलने तक की हिम्मत नहीं की। लेकिन उसी पल रसोई की चिमनी से तेल का धुआँ ऊपर आने लगा और मैं अपनी खांसी रोक नहीं पाई। मैंने फौरन रजाई से अपना मुँह और सिर ढँक लिया, मैं बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रही थी। बहन का एक और बेटा था जो पड़ोस में रहता था, और जब उसके टीवी की आवाज तेज होती थी तो मुझे सुनाई पड़ती थी, तो छिपे रहने के लिए मैं अटारी में लाइट जलाने की हिम्मत नहीं करती थी और बहुत धीमी आवाज में बोलती थी। वे सर्दियों के दिन थे, कमरा बहुत ठंडा था, मगर मैं बाहर धूप में जाने की हिम्मत नहीं करती थी। काफी समय बीत गया, मैं बहुत उदास महसूस करने लगी, और सोचने लगी, “मुझे इस तरह जीने से मुक्ति कब मिलेगी? अपने परिवार से फिर कब मिलूँगी और अपना कर्तव्य निभाने के लिए भाई-बहनों के साथ कब बाहर जा सकूंगी?” उस दौरान, मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती थी, उससे मुझे रास्ता दिखाने और प्रबुद्ध करने की विनती करती, ताकि मैं उसकी इच्छा समझ सकूँ और जान सकूँ कि इस माहौल से कैसे पार पाऊँ।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : ‘क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’ तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं। चूँकि परमेश्वर का कार्य उस देश में आरंभ किया जाता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्य को भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और उसके बहुत-से वचनों को संपन्न करने में समय लगता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शुद्ध किए जाते हैं, जो कष्ट झेलने का भाग भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना अत्यंत कठिन है—परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्म प्रत्यक्ष करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए इस अवसर का उपयोग करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)परमेश्वर के वचन से मैं समझ सकी कि जब सीसीपी के शासन वाले देश में कोई परमेश्वर में विश्वास रखता है, तो उसका सताया जाना अपरिहार्य है, लेकिन परमेश्वर ऐसे माहौल का इस्तेमाल लोगों की आस्था को पूर्ण करने के लिए करता है। मैंने वह वक्त याद किया जब मैं ऐसे माहौल में नहीं थी, मुझे लगता था कि मैं मुश्किलें झेल सकती हूँ और मुझे परमेश्वर में आस्था थी, लेकिन जब मेरा ऐसा पीछा किया गया कि घर-बार छूट गया, छिपकर रहना पड़ा, आजादी छिन गई और सचमुच कष्ट झेलना पड़ा, तो मेरे दिल में शिकायतें पालने लगी, मैं बस बच निकलना चाहती थी। सच्चाइयों के खुलासे से ही मुझे एहसास हुआ कि मैं परमेश्वर में जरा-भी सच्ची श्रद्धा नहीं रखती, मुझमें आज्ञाकारिता नहीं है, और मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैंने यह भी सोचा कि इन कुछ महीनों में, सीसीपी ने घरों में अंधाधुंध छापेमारी की, लोगों को गिरफ्तार किया, कलीसिया का पैसा जब्त कर लिया, बहुत-से भाई-बहनों को घर से भागने पर मजबूर कर दिया, उनकी जिंदगी बरबाद कर दी, और उनके पास रहने की जगह तक नहीं छोड़ी। सीसीपी ने बहुत दुराचार किया, लोगों को गिरफ्तार किया और सताया। क्या उसका उद्देश्य सिर्फ लोगों को परमेश्वर से दूर करके उसे धोखा दिलवाना नहीं था? अगर ऐसे माहौल में मैं कमजोर हो गई, पीछे हट गई, या मैंने शिकायत तक की, तो शैतान की चाल में फंस जाऊँगी, अपनी गवाही खो दूँगी। एक बार यह एहसास होने पर मेरा दर्द और दिल की पीड़ा कम हो गई। सोचा, “यहाँ जितने भी दिन रहूँ, जितने भी कष्ट झेलने पड़ें, मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं के सामने समर्पण करना चाहती हूँ।”

कुछ महीने बाद लगा कि जाँच-पड़ताल उतनी सख्त नहीं रही, तो मैं अपना कर्तव्य निभाने दूसरे शहर चली गई। सुरक्षा के लिए मैंने अपने लंबे बाल काट लिए, और सभाओं में जाते समय टोपी, मास्क और चश्मा पहन लेती थी। संकरी गलियाँ और लंबे रास्ते पकड़ती, पूरी कोशिश करती कि मुझ पर किसी की नजर न पड़े। मुझे लगा, सावधान रही, तो अब भी अपना कर्तव्य निभा सकूँगी। मुझे हैरत हुई जब कुछ महीने बाद, एक शाम मेरे अगुआ ने मुझसे कहा, “पुलिस ने तुम्हारी जानकारी इंटरनेट पर डाल दी है। वह तुम्हें तलाश रही है। हमारे शहर के केन्द्रीय इलाके और पास-पड़ोस के अनेक जिलों में रहने वाले लोगों के मोबाइल फोन पर तलाश की सूचना भेज कर उनसे कहा गया है कि वे तुम्हें देखने पर सूचना दें। पुलिस ने पता लगा लिया कि तुम्हारे अंकल ने तुम्हें सुसमाचार सुनाया था, और वे तुम्हारे अंकल और आंटी को पहले ही गिरफ्तार कर चुके हैं। सुरक्षा के लिए, अब तुम अपना कर्तव्य निभाने नहीं जा सकती।” बाद में, मुझे खबर मिली कि पुलिस ने मेरे 80 वर्ष के दादा जी का पता लगाकर मेरे बारे में पूछताछ की। उन्होंने मेरे अंकल के फिजियोथेरेपी केंद्र को भी बंद कर दिया था। यही नहीं, पुलिस मेरी माँ और बहन को भी खोज रही थी, जिस कारण से वे भी घर नहीं जा सकती थीं। यह खबर सुनकर मैं बहुत नाराज हो गई। परमेश्वर में मेरी आस्था सही और उचित थी। कम्युनिस्ट पार्टी परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों का इतना क्रूर दमन क्यों कर रही थी? चीन में आस्था को लेकर निष्पक्षता और आजादी क्यों नहीं थी? मैंने शुरू में चोरी-छिपे जाकर अपने परिवार से मिलने की योजना बनाई थी, लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि मेरा नाम वाँटेड सूची में है, न ये सोचा था कि वे मेरे परिवार को धमकी देंगे और डराएंगे। मेरा अपना घर होने के बावजूद मैं वापस नहीं जा सकती थी, और मेरे परिवार को फँसा कर गिरफ्तार कर लिया गया था। मैं समझ गई कि अब मैं एक वाँटेड अपराधी हूँ, सोचने लगी कि मेरे दोस्त और परिवार मेरे बारे में क्या कहेंगे। क्या वे सोचेंगे कि मैंने कुछ गलत किया था? उनको भविष्य में कैसे मुँह दिखाऊंगी? इस बारे में सोचकर मैं अपने आँसू नहीं रोक पाई। जितना सोचा, उतनी ही दुखी हो गई। लगा चीन में परमेश्वर में विश्वास रखना बहुत मुश्किल है। अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं नहीं जानती, इसे कैसे झेलूँ? मुझे आस्था और शक्ति दो, तुम्हारी इच्छा को समझने का रास्ता दिखाओ।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर के वचन का एक भजन याद आया, नाम था “सबसे सार्थक जीवन,” इसमें कहा गया है : “तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, जो सुधार की खोज करते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2))। इसे सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गए। सृजित प्राणियों के लिए परमेश्वर में विश्वास रखना, उसकी आराधना करना, सही और उचित है, परमेश्वर इसकी स्वीकृति देता है। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा, जो परमेश्वर से डरता था, बुराई से दूर रहता था। हालांकि उसने अपने बाल-बच्चे और दौलत खो दी, उसके पूरे शरीर पर फोड़े हो गए, उसकी पत्नी और दोस्तों ने उसे गलत समझा, पर उसने परमेश्वर में आस्था रखी, अपनी पीड़ा में भी परमेश्वर की सराहना की, परमेश्वर की गवाही में दृढ़ता से खड़ा रहा, और शैतान को नीचा दिखाया। पतरस भी तो था, जिसने पूरा जीवन परमेश्वर को जानने और उसे प्रेम करने का प्रयास किया। वह सैकड़ों परीक्षणों और शोधनों से गुजरा, बड़ी पीड़ा सही, और आखिरकार परमेश्वर के लिए सूली पर उलटा लटका दिया गया, और इस तरह उसने सुंदर और शानदार गवाही दी। एक सृजित प्राणी के रूप में, परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में डटकर खड़े रहना और उसकी गवाही देना और सृजनकर्ता की स्वीकृति पाना बहुत सार्थक होता है! उस समय, परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण, कम्युनिस्ट पार्टी मेरी तलाश और पीछा कर रही थी। रिश्तेदार और दोस्त गलत समझकर मुझे छोड़ भी दें, तो इसमें शर्मिंदगी की कोई बात नहीं है, क्योंकि मैं जीवन के सही मार्ग का अनुसरण कर रही हूँ, और सबसे धार्मिक काम कर रही हूँ। ऐसा सोचकर मेरी पीड़ा कम हुई, मैंने यूँ कष्ट झेल सकने के कारण गर्व महसूस किया।

जनवरी 2016 में एक दिन, एक बहन ने मुझे ताश के पत्तों की गड्डी दी। हाथ में लेकर देखा, तो उन पर मेरी फोटो और मेरी पहचान कि सूचना छपी हुई थी। मेरा नाम, आईडी नंबर, और घरेलू रजिस्ट्रेशन पता सब-कुछ था, साथ ही यह भी लिखा था कि जन सुरक्षा ब्यूरो ने अपनी ऑनलाइन सूची में मुझे “कानून व्यवस्था को कमजोर करने वाले एक पंथ संगठन का गठन कर उसका इस्तेमाल करने वाला अपराधी” बताकर एक भगोड़ा घोषित किया था। ताश के पत्ते पर सूचना देने का एक हॉटलाइन नंबर भी छपा हुआ था, साथ ही यह बयान भी कि सूचना देने वालों को इनाम दिया जाएगा। उस बहन ने बताया कि पुलिस खूनियों और लुटेरों के साथ मेरी तथा कलीसिया-कार्य की प्रभारी तीन और बहनों की फोटो और जानकारी वाले ताश के पत्तों की गड्डियाँ बाँट रही थी। बाद में, मैंने भाई-बहनों से सुना कि उन्होंने ट्रेन स्टेशन के बाहर बड़े पर्दों और जन सुरक्षा ब्यूरो के प्रवेशद्वार के बुलेटिन बोर्ड पर मेरी तलाश की सूचना देखी थी। ये सब सुनकर मैं हैरान हो गई। उनसे पूछना चाहा, “मैंने कौन-सा कानून तोड़ा है? मैंने कानून तोड़ने वाला कौन-सा काम किया है? मुझे तलाश कर पकड़ने के लिए आप ऐसे गलत तरीके क्यों अपना रहे हैं?” मैं परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद किए बिना नहीं रह सकी : “हजारों सालों से यह मलिनता की भूमि रही है। यह असहनीय रूप से गंदी और असीम दुःखों से भरी हुई है, चालें चलते और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए, क्रूर और दुष्ट बनकर इस भुतहा शहर को कुचलते हुए और लाशों से पाटते हुए प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं; सड़ांध ज़मीन पर छाकर हवा में व्याप्त हो गई है, और इस पर जबर्दस्त पहरेदारी है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? शैतान मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, अपनी दोनों आंखों पर पर्दा डालकर, अपने होंठ मजबूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हजारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीकी से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्ते चमकती हुई आंखों से घूरते हैं, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद लिया है? उन्हें मानव-जगत के मामलों की क्या कद्र है? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्कट इच्छा को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारपूर्ण समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, पलक झपकते ही लोगों को मार डालने वाला शैतानों का सरदार, ऐसे मनोहर, दयालु और पवित्र परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जयजयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया के बदले घृणा देते हैं, लंबे समय पहले ही वे परमेश्वर से शत्रु की तरह पेश आने लगे थे, ये परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, ये बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, ये लूटते और डाका डालते हैं, इनका विवेक मर चुका है, ये विवेक के विरुद्ध कार्य करते हैं, और ये लालच देकर निर्दोषों को अचेत कर देते हैं। प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुवा? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने की चालें हैं!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। परमेश्वर के वचनों ने बड़े लाल अजगर की सच्ची प्रकृति का खुलासा किया। सीसीपी परमेश्वर की दुश्मन है, वह एक दानव है, परमेश्वर का प्रतिरोध कर उससे घृणा करती है, जिस स्थान पर उसका शासन है, वह दानव शैतान की माँद है। वह लोगों को सच्चे परमेश्वर में विश्वास रखने और सही मार्ग का अनुसरण करने देना तो दूर, परमेश्वर को अस्तित्व में रहने भी नहीं देना चाहती। इसी कारण से वह ईसाई धर्म को एक “कुपंथ” तथा बाइबल को “कुपंथ साहित्य” कहती है, ईसाइयों की ऐसी अंधाधुंध गिरफ्तारी करती है। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को खत्म कर देने के लिए वह हर तरह की अफवाहें गढ़ती है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को फँसाने और बदनाम करने के लिए झूठे आपराधिक मामले गढ़ती है। वह परमेश्वर के विश्वासियों का पीछा करती है, उनकी गिरफ्तारी के आदेश ऐसे देती है मानो वे सबसे खतरनाक अपराधी हों, और जिन लोगों को सच्चाई का पता नहीं हैं, उन्हें धोखा देकर उकसाती है कि वे उसके साथ मिलकर विश्वासियों से घृणा करें और परमेश्वर का प्रतिरोध करें। कम्युनिस्ट पार्टी हर संभव झूठ बोलती है, और वे सारे बुरे काम करती है जिनकी कल्पना की जा सकती है! यह पहचान लेने के बाद, बड़े लाल अजगर को छोड़ देने और अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करने का मेरा संकल्प और मजबूत हो गया! बाद में, मैंने अपने अगुआ से सुना कि ताश के पत्तों पर वाँटेड की सूची में मेरे साथ जो दो बहनें थीं, उन्हें गिरफ्तार कर चार साल जेल की सजा सुना दी गई थी।

चार महीने बाद, पुलिस ने मेरी गिरफ्तारी के लिए 10,000 युआन अतिरिक्त दे रही थी। मेरे कस्बे की एक बहन ने मुझे एक पत्र भेजकर बताया की गाँव के पार्टी सचिव अफवाह फैला रहे हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अब मैं अपने परिवार या रिश्तेदारों से नहीं मिलना चाहती, और सरकार के खिलाफ काम कर रही थी। समय के साथ अफवाहें और भी ज्यादा भयानक हो गईं, कुछ लोग तो कहने लगे कि मैं पागल हो गई थी, या नशीली दवाएं बेचती थी। आस-पड़ोस के गाँवों के लोगों ने ये अफवाहें सुनीं, तो सबने मुझे बदनाम कर मेरी निंदा की। मेरे छोटे भाई को ये अफवाहें बर्दाश्त के इतने बाहर लगीं कि वह मेरी फिक्र में रोने लगा और मुझसे मिलने के लिए मुझे खोजना चाहता था। जब मैंने यह खबर सुनी, तो मैं शांत नहीं रह सकी, आँसू अपने आप बहने लगे। मैं अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के सामने खड़ी होकर बताना चाहती थी कि मैं सच्चे परमेश्वर में विश्वास रखती थी, सही मार्ग का अनुसरण करती थी, और मैंने कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया। मैं अपने भाई के पास सीधे उड़कर पहुँच जाना चाहती थी, उसे सुकून देना चाहती थी, और मेरे बारे में फिक्र न करने को कहना चाहती थी। लेकिन अगर मैं ऐसे ही चली गई तो पुलिस मुझे यकीनन गिरफ्तार कर लेगी, और मैं अपने संपर्क के भाई-बहनों को भी खतरे में डाल दूंगी। मैं बेचैनी से कमरे में चलने लगी। इन बातों के बारे में जितना ज्यादा सोचा, उतना ही शांत रहना कठिन हो गया। आखिरकार, मैंने खतरा उठाने और अपने भाई को फोन करने का फैसला लिया।

मैं जानती थी कि शायद मेरे भाई के सेल फोन की निगरानी की जा रही हो, मगर मैं बस किसी तरह उससे बात करना चाहती थी, तो मैंने इन बातों की फिक्र नहीं की। मैं उससे बात करने के लिए वेश बदल कर मीलों दूर एक जगह चली गई, मगर हैरत हुई कि कॉल नहीं लगा। मैं छोड़ने को तैयार नहीं थी, इसलिए फिर कोशिश की, मगर नतीजा वही रहा। एकाएक मुझे एहसास हुआ कि शायद इसमें परमेश्वर का हाथ है। अगर मेरे भाई के फोन की निगरानी हो रही थी, तो वो और मैं दोनों खतरे में पड़ जाते। यह सोचकर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! आज मैं शैतान की इस चाल में फँसने ही वाली थी। अगर तुमने समय रहते मुझे रोका न होता, तो शायद मैं खतरे में पड़ जाती। हे परमेश्वर, तुम मेरी कमजोरियाँ जानते हो। मेरी अगुआई करो, रास्ता दिखाओ, आस्था और शक्ति दो...।” जब मैं आध्यात्मिक आराधना-कार्य के लिए अपने मेजबान के घर लौटी, तो परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर ‘विजेताओं’ के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर ‘विजेता’ होने के रूप में संदर्भित करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए)। परमेश्वर के वचनों से, मुझे समझ आया कि परमेश्वर, अंत के दिनों में, विजेताओं का एक समूह बनाता है। वे जितनी भी पीड़ा या शोधन सहें, शैतान की ताकतें उन्हें किसी भी तरह से परेशान करें, उन पर हमला करें, वे परमेश्वर में अपनी आस्था बनाए रख पाते हैं, और अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। फिर मैंने सोचा कि जब मेरी बदनामी और बेइज्जती की गई, तो मैं नकारात्मक और कमजोर हो गई, क्योंकि मुझे अपनी शोहरत के नष्ट होने का डर था। मुझे यह भी डर था कि मेरा छोटा भाई नहीं समझ पाएगा, इसलिए उसे सुकून देने के लिए मैंने अपने भाई-बहनों की सुरक्षा की अनदेखी की। मुझे समझ आया कि मुझमें परमेश्वर के प्रति आस्था या वफादारी नहीं थी। क्या ऐसा करके मैं अपनी गवाही नहीं खो रही थी? बड़ा लाल अजगर मेरा ऐसे पीछा कर रहा था, मानो मैं कोई अपराधी थी, मुझे बदनाम करने, मुझ पर हमला करने के लिए सबको उकसा रहा था, मेरे रिश्तेदारों को मुझे गलत समझने पर मजबूर कर रहा था। वह ये सारी चीजें ठीक इसलिए कर रहा था क्योंकि वह मुझे नकारात्मक और कमजोर बनाकर परमेश्वर को धोखा देने पर मजबूर करना चाहता था। मैं बड़े लाल अजगर की इन कपटी चालों को सफल नहीं होने दे सकती थी। एक बार यह समझ लेने के बाद, मैंने तय कर लिया : मैं शैतान की घेरेबंदी में परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए गवाही दूँगी, और बड़े लाल अजगर को नीचा दिखाऊँगी!

चोरी-छिपे भागने के दिनों में, बीमारी ने भी मेरे लिए समस्या खड़ी की। 15 वर्ष की उम्र में मेरे बाएं फेफड़े की सर्जरी हुई थी, मेरा दायाँ फेफड़ा भी कुछ ज्यादा अच्छा नहीं था। उस वक्त, डॉक्टर ने मुझे ताजी हवा में साँस लेने और अपने फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने के लिए ठीक से कसरत करने को कहा था। लेकिन पुलिस को मेरी तलाश थी, इसलिए मुझे लंबे समय तक अंदर ही छिपे रहना पड़ता। मैं ताजी हवा के लिए बाहर नहीं जा पाती। मुझे कसरत के लिए बालकनी में खड़े होने का भी मौका नहीं मिलता। ताजी हवा लेने के लिए कभी-कभार खिड़की खोलते समय भी मुझे बहुत चौकस रहना पड़ता, क्योंकि अगर पड़ोसियों ने देख लिया, तो न सिर्फ मेरे लिए खतरा होता, बल्कि मेजबानी कर रहे भाई-बहन भी खतरे में पड़ जाते। ऐसे माहौल में लंबे समय तक रहने के बाद, मेरी शारीरिक हालत बिगड़ने लगी। घर के अंदर ताजी हवा न ले पाने से मेरा साँस लेना और दूभर होता गया, सीना कसने लगा, कुछ समय बाद, फेफड़ों में दर्द होने लगा, और मैं अक्सर खाँसने लगी। जब घुटने टेक कर प्रार्थना करती, तो लगता जैसे मुँह से पानी निकल पड़ेगा। करवट लेकर सोने पर फेफड़ों में पानी यहाँ-वहां बहता महसूस होता। फिर, जब हालत और बदतर हो गई, तो खांसने पर मुँह से खून निकलने लगा। मेरे भाई-बहनों ने मुझे अस्पताल जाने को कहा, लेकिन अस्पताल जाकर डॉक्टर से मिलने के लिए मुझे अपना पहचान-पत्र दिखाना पड़ता। भगोड़ी होने के कारण, अगर कुछ हो जाता तो न सिर्फ मैं गिरफ्तार हो जाती, बल्कि मेरी देखभाल करने वाले भाई-बहन भी फँस जाते, इसलिए मैंने अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं की। कुछ भाई-बहन मेरे लिए पारंपरिक चीनी दवाएँ ले आए, लेकिन इनको लेने से भी मेरी हालत में सुधार नहीं हुआ। अब भी खाँसते समय खून निकलता। मैं खा नहीं पा रही थी, शरीर और ज्यादा कमजोर हो गया। मुझे थोड़ा डर लगा, क्योंकि इलाज करवाए बिना यूँ ही चलती रही, तो कहीं ऐसा न हो कि बाद में साँस ही न ले पाऊँ और दम घुट जाए। क्या इसका यह अर्थ नहीं कि उद्धार और एक सुंदर मंजिल की मेरी उम्मीद चौपट हो जाएगी? परमेश्वर में अपनी आस्था में किए मेरे त्याग, मेरे खुद को खपाने और कड़ी मेहनत के इतने वर्ष बेकार नहीं होंगे? मैं सचमुच मरना नहीं चाहती थी। जब मैंने देखा कि मेरी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी, खाँसी में खून आ रहा था, तो मैं रोये बिना नहीं रह सकी, बेहद दुखी हो गई।

बाद में, मैंने अपनी हालत पर लागू होने वाले परमेश्वर के वचन ढूँढ़े और मुझे यह अंश मिला : “अय्यूब ने परमेश्वर से किन्हीं लेन-देनों की बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई याचनाएँ या माँगें नहीं कीं। उसका परमेश्वर के नाम की स्तुति करना भी सभी चीज़ों पर शासन करने की परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार के कारण था, और वह इस पर निर्भर नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुईं या उस पर आपदा टूटी। वह मानता था कि परमेश्वर लोगों को चाहे आशीष दे या उन पर आपदा लाए, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, व्यक्ति की परिस्थितियाँ चाहे जो हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को धन्य किया जाता है तो परमेश्वर की संप्रभुता के कारण किया जाता है, और इसलिए जब मनुष्य पर आपदा टूटती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही टूटती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से संबंधित सब कुछ पर शासन करते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के सौभाग्य के उतार-चढ़ाव परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यंजना हैं, और जिसका चाहे जो दृष्टिकोण हो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यही वह है जो अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जानने लगा था। अय्यूब के सभी विचार और कार्यकलाप परमेश्वर के कानों तक पहुँचे थे, और परमेश्वर के सामने आए थे, और परमेश्वर द्वारा महत्वपूर्ण माने गए थे। परमेश्वर ने अय्यूब के इस ज्ञान को सँजोया, और ऐसा हृदय होने के लिए अय्यूब को सँजोया। यह हृदय सदैव, और सर्वत्र, परमेश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करता था, और समय या स्थान चाहे जो हो, उस पर जो कुछ भी टूटता उसका स्वागत करता था। अय्यूब ने परमेश्वर से कोई माँगें नहीं कीं। उसने स्वयं अपने से जो माँगा वह यह था कि परमेश्वर से आई सभी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करे, स्वीकार करे, सामना करे, और आज्ञापालन करे; अय्यूब इसे अपना कर्तव्य मानता था, और यह ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं उसकी इच्छा को थोड़ा समझ सकी। मेरी बीमारी के बदतर होने की इजाजत परमेश्वर ने ही दी थी। मेरी आस्था और आज्ञाकारिता सच्ची थी या नहीं, इसकी परीक्षा ले रहा था परमेश्वर। लेकिन पीड़ा के समय मैं सिर्फ अपने जीवन, मृत्यु और अंतिम मंजिल के बारे में ही सोच रही थी। मुझे डर था कि मर गई तो अपना उद्धार खो दूँगी। मैं समझ गई कि परमेश्वर में मेरा विश्वास सिर्फ आशीष पाने के लिए था, मैं परमेश्वर से सौदेबाजी की कोशिश कर रही थी, मुझमें वह जमीर और समझ नहीं थी जो एक सृजित प्राणी के पास होनी चाहिए, मुझमें परमेश्वर के प्रति जरा भी आज्ञाकारिता नहीं थी। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा। परमेश्वर ने उसे ढेर-सारी दौलत दी हो या शैतान को उससे सब-कुछ छीन लेने दिया हो, उसने परमेश्वर के नाम की सराहना की और माना कि परमेश्वर चीजें दे या ले, वह धार्मिक है। अय्यूब के परमेश्वर के प्रति विश्वास में निजी मंशाओं की मिलावट नहीं थी, उसने अपने हितों, लाभों, हानियों का ख्याल नहीं किया, परमेश्वर ने कुछ भी किया हो, वह एक सृजित प्राणी के स्थान पर खड़ा होकर बस परमेश्वर की आज्ञा मानता रहा। उसने परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को अपने जीवन से बढ़कर महत्व दिया। अय्यूब की इंसानियत, जमीर और विवेक को देखकर मैंने शर्मिंदगी महसूस की। आज तक मैं परमेश्वर में अपने विश्वास में, उससे सौदेबाजी की कोशिश कर रही थी, अभी भी विद्रोही और भ्रष्ट थी। मैं अपनी बीमारी के कारण मर भी जाती, तो यह परमेश्वर की धार्मिकता से होता। यह समझने के बाद, मैं जान गई कि मुझे बीमारी और मृत्यु का सामना कैसे करना है, इसलिए मैंने मन-ही-मन सोचा, “मेरी बीमारी चाहे बढ़े या घटे, मैं खुद को परमेश्वर के हाथों सौंप दूँगी, उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर दूँगी।”

नवंबर 2016 में एक सुबह, जब मैंने उठना चाहा, तो मेरे फेफड़ों में दर्द हुआ। मुझे उठकर पलंग के सिरहाने टिकने में दस मिनट लगे और बहुत ताकत लगानी पड़ी। उसी पल, खिड़की से बर्फानी ठंडी हवा अंदर आ गई, मैं सच में निराश हो गई। मैं खुद को रोने से न रोक सकी। थोड़ी देर बाद, मेरी सांस फूलने लगी, दिल तेज धड़कने लगा, पूरा शरीर कस गया, साँस लेना-छोड़ना मुश्किल हो गया, पूरे शरीर में तकलीफ हो गई। लगा किसी भी पल मेरा दम घुट जाएगा, इस बार मैं नहीं बचूँगी। मुझे इस हाल में देखकर, साथ वाली बहनें घबरा गईं, उन्हें समझ नहीं आया क्या करें, तो उन्होंने एक दवाखाने वाली बहन को बुला भेजा। उसने बड़ी मुश्किल से मेरी नस में दवा चढ़ाने का इंतजाम किया, मगर सुई अंदर घुसाने के बावजूद दवा नहीं जा पा रही थी, क्योंकि मेरा रक्त-प्रवाह लगभग बंद हो चुका था। बेबसी में, वह कमरे के दरवाजे तक गई, और सिर हिलाकर बोली, “हम कुछ नहीं कर सकते।” कुछ बहनें मुँह घुमाकर चुपचाप अपने आँसू पोंछने लगीं। मुझे पता था बस मरने ही वाली हूँ, मुझे थोड़ा डर लग रहा था। मुझे डर था कि मर गई, तो राज्य को साकार होते नहीं देख सकूंगी। इस वक्त, अय्यूब के शब्द मेरे मन में गूँजते रहे : “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। मुझे पहले पढ़ा हुआ परमेश्वर के वचनों का एक अंश भी याद आया : “जब तुम कष्टों का सामना करते हो, तो तुम्हें देह की चिंता छोड़ने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें न करने में समर्थ होना चाहिए। जब परमेश्वर तुमसे अपने आप को छिपाता है, तो उसका अनुसरण करने के लिए तुम्हें अपने पिछले प्रेम को डिगने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए विश्वास रखने में समर्थ होना चाहिए। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें उसकी योजना के प्रति समर्पण करना चाहिए, और उसके विरुद्ध शिकायतें करने के बजाय अपनी देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब परीक्षणों से तुम्हारा सामना हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, भले ही तुम फूट-फूटकर रोओ या अपनी किसी प्यारी चीज से अलग होने के लिए अनिच्छुक महसूस करो। केवल यही सच्चा प्यार और विश्वास है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। पहले मृत्यु से डरने के कारण परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानती थी, मगर इस बार परमेश्वर से विद्रोह नहीं कर सकती थी। अगर मर भी जाऊँ, तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं। एक सृजित प्राणी हूँ, इसलिए मुझे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यही नहीं, मुझे परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार को स्वीकारने और जो सत्य सभी पूर्व युगों के संत नहीं सुन पाए थे, वो सत्य सुनने का सौभाग्य मिला था। यह मेरे लिए परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह था। मृत्यु का सामने खड़ी है, तो भी मुझे परमेश्वर का धन्यवाद करना होगा! इसलिए मैंने मुश्किल से दो शब्द कहे—कागज और कलम। बहनें जल्दी से दोनों चीजें ले आईं, बहनों का सहारा लेकर पूरी शक्ति लगाकर मैंने नोटबुक में लिखा : “परमेश्वर सदा धार्मिक है! वह सदा हमारी सराहना के लायक होता है!” जैसे ही मैंने कलम रखी और लिखना बंद किया, मेरी नजर धीरे-धीरे धुंधली हो गई।

बहनों ने रोते हुए मेरा हाथ पकड़ा, परमेश्वर पर भरोसा कर डटे रहने का प्रोत्साहन दिया, लेकिन सामने की सच्चाई देखते हुए लगा नहीं कि अब और झेल पाऊँगी, मुझे लगा, अब जीना मुश्किल है। महसूस हुआ कि मेरा दिल धीरे-धीरे डूबते हुए समुद्र के तल पर जा रहा है, और मेरे आसपास की आवाजें धूमिल हो गईं। मगर जैसे ही मुझे लगा कि अब कोई उम्मीद नहीं, मेरे मन में एकाएक परमेश्वर के वचनों का एक अंश कौंध गया : “लोगों का विश्वास तब आवश्यक होता है, जब कोई चीज खुली आँखों से न देखी जा सकती हो, और तुम्हारा विश्वास तब आवश्यक होता है, जब तुम अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ पाते। जब तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में स्पष्ट नहीं होते, तो आवश्यक होता है कि तुम विश्वास बनाए रखो, रवैया दृढ़ रखो और गवाह बनो। जब अय्यूब इस मुकाम पर पहुँचा, तो परमेश्वर उसे दिखाई दिया और उससे बोला। अर्थात्, केवल अपने विश्वास के भीतर से ही तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ हो पाओगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास होगा तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा। विश्वास के बिना वह ऐसा नहीं कर सकता(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता से मुझे बड़ी राहत और प्रोत्साहन मिला। मेरा जीवन परमेश्वर का दिया हुआ है, और उस दिन मैं जियूँगी या मरूँगी, यह परमेश्वर के हाथ में है। परमेश्वर की इजाजत के बिना, न शैतान की दुष्ट ताकतें और न ही बीमारी मेरा जीवन ले सकती हैं। जब तक मेरी एक भी साँस बाकी है, मैं हौसला नहीं छोड़ सकती, मुझे परमेश्वर से उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! हालांकि आज मृत्यु मेरे सामने है, मगर मैंने गहराई से महसूस किया है कि तुम हमेशा मेरे साथ रहते हो। हे परमेश्वर, मैं खुद को तुम्हें पूरी तरह सौंप देना चाहती हूँ, अपना जीवन और मृत्यु मैं पूरी तरह तुम्हारे हवाले करती हूँ! मुझे इस पर यकीन है कि तुम जो भी करते हो, तुम धार्मिक होते हो। मैं इस जीवन में तुम्हारे सामने आई हूँ, तुम्हारे बारे में कुछ जाना है, इसलिए मैं मर भी गई, तो भी मुझे न कोई शिकायत होगा, न पछतावा होगा। अगर आज मैं मरी नहीं, जीती रही, तो अब से, मैं सत्य का अनुसरण करना, अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से करना, और तुम्हारे महान प्रेम की कीमत चुकाना चाहती हूँ।” उस वक्त, एक बहन ने “शुद्ध प्रेम बिना दोष के” नामक भजन बजाया : “‘प्रेम’ ऐसे स्नेह को कहते हैं जो शुद्ध और निष्कलंक है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई बाधा और कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई व्यापार नहीं होता और उसमें कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी खुद को समर्पित करोगे, खुशी-खुशी कष्ट सहोगे, मेरे अनुरूप हो जाओगे...(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं)। इन गीतों को सुनने के बाद, मुझे खुद से बहुत घृणा हुई। परमेश्वर में इतने लंबे अरसे तक विश्वास रखने के बाद, मैंने परमेश्वर से सच्चा प्रेम करना तो दूर रहा, मैंने परमेश्वर के वचनों पर अमल भी नहीं किया था। उस समय, मैं मरूं या जियूँ, सिर्फ परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण करना चाहती थी। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते समय, एक चमत्कार हो गया। मुझे पता ही नहीं चला कब धीरे-धीरे मेरी साँस आराम से चलने लगी, साँस की तेजी कम हो गई, दिल काफी शांत हो गया। जब बहनों ने देखा कि मैं ठीक हो गई थी, तो उन्होंने गर्मजोशी से परमेश्वर का धन्यवाद किया, और मैंने सही मायनों में परमेश्वर का चमत्कारिक कारनामा देखा। हालांकि मैं दोबारा आराम से सांस लेने लगी थी, मगर मेरा शरीर गल चुका था, इसलिए बहनों ने मुझे अस्पताल में जाने की सलाह दी। उनमें से एक ने मुझे अपना पहचान पत्र दिया, मगर मैं उसे नहीं फँसाना चाहती थी, पर उसने मेरा हाथ थामकर कहा, “आओ, हम साथ मिलकर परमेश्वर से प्रार्थना करें। अभी अस्पताल जाना जरूरी है। बस परमेश्वर से हौसला देने की प्रार्थना करो, सब ठीक हो जाएगा।” उसकी बात ने मेरे दिल को यूँ छू लिया कि मुझे समझ नहीं आया क्या कहूँ, न ही मुझमें कहने की ताकत थी, इसलिए यह जानकर कि ये सब परमेश्वर के प्रेम के द्वारा है, मैं सिर्फ अपना सिर हिला पाई। अस्पताल पहुँचने के बाद, हालांकि डॉक्टर को मेरे पहचान पत्र पर शक था, मगर उन लोगों ने मेरी असली पहचान पर ज्यादा गौर नहीं किया, और इलाज आराम से हो गया। धीरे-धीरे मेरी हालत सुधर गई, और एक हफ्ते बाद, मुझे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

अस्पताल से निकलने के बाद, मैंने छिपे रहने की हालत में अपनी जिंदगी शुरू की। मेरे आसपास भाई-बहनों की अक्सर गिरफ्तारी हो रही थी, इसलिए मुझे अक्सर तत्काल नई जगहों पर भागना पड़ता, जो मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया था। घर बदलते वक्त कैमरे में कैद होने से बचने के लिए मुझे मास्क पहनना पड़ता, लेकिन इससे साँस लेना मुश्किल हो जाता। एक बार जब मैं मास्क लगाकर सड़क किनारे तेजी से चल रही थी, तो साँस नहीं ले पा रही थी। बस पर चढ़ना बहुत मुश्किल था, जब चढ़ी तो बस में बहुत सारे लोगों के होने से ऐसा दम घुटा कि मैं गहरी साँसें भरने लगी। मेरा सीना दर्द से कस गया, आँखें अपने आप बड़ी होने लगीं, लगा अगर बस से नहीं उतरी, तो उसी में मर जाऊँगी। मैं लगातार प्रार्थना करती रही, मन-ही-मन परमेश्वर को पुकारती रही, फिर काफी देर बाद मैं साँस लेने में थोड़ी आसानी होने लगी। इतनी बार जगह बदलने के बाद, मुझे कमजोरी महसूस हुई, मुझे डर लगा कि मेरा शरीर बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, और यूँ ही चलता रहा तो इस यातना से मर जाऊँगी। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा : “कार्य के इस चरण में हमसे परम आस्था और प्रेम की अपेक्षा की जाती है। थोड़ी-सी लापरवाही से हम लड़खड़ा सकते हैं, क्योंकि कार्य का यह चरण पिछले सभी चरणों से अलग है : परमेश्वर मानवजाति की आस्था को पूर्ण कर रहा है—जो कि अदृश्य और अमूर्त दोनों है। इस चरण में परमेश्वर वचनों को आस्था में, प्रेम में और जीवन में परिवर्तित करता है। लोगों को उस बिंदु तक पहुँचने की आवश्यकता है जहाँ वे सैकड़ों बार शुद्धिकरणों का सामना कर चुके हैं और अय्यूब से भी ज़्यादा आस्था रखते हैं। किसी भी समय परमेश्वर से दूर जाए बिना उन्हें अविश्वसनीय पीड़ा और सभी प्रकार की यातनाओं को सहना आवश्यक है। जब वे मृत्यु तक आज्ञाकारी रहते हैं, और परमेश्वर में अत्यंत विश्वास रखते हैं, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा हो जाता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मार्ग ... (8))। सच है कि परमेश्वर के अनुसरण का मार्ग ऊबड़-खाबड़ और मुश्किल है। कम्युनिस्ट पार्टी ने ईसाइयों को सताना कभी नहीं छोड़ा है। परमेश्वर में विश्वास रखने पर, हमारे सामने गिरफ्तार होने, सताए जाने और किसी भी पल मार डाले जाने का खतरा होता है, मगर परमेश्वर ऐसे माहौल का इस्तेमाल हमारी आस्था को पूर्ण करने के लिए करता है। मुझे पता था कि परमेश्वर में विश्वास रख उसका अनुसरण करने वाली इंसान होने के नाते मुझे ये यातनाएँ और क्लेश झेलने ही होंगे। इस बारे में सोचने से, लगा मेरी आस्था को नई स्फूर्ति मिल गई।

परमेश्वर में अपनी आस्था के वर्षों के बारे में सोचती हूँ, तो समझ पाती हूँ कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने कदम-दर-कदम मुझे एक बंद गली में धकेलने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल किया, लेकिन परमेश्वर के वचनों ने हमेशा मुझे रास्ता दिखाया, मुझे प्रबुद्ध किया। अब मैं सीसीपी के दानवी सार को थोड़ा समझती हूँ, मैंने अपनी आस्था में आशीष पाने की मिलावट को भी थोड़ा समझ लिया है, यह भी समझ गयी हूँ कि परमेश्वर के सामने विवेकपूर्ण कैसे रहा जाए। मैंने परमेश्वर के चमत्कारिक कर्म भी देखे हैं। जब मैं मौत के कगार पर थी, तो परमेश्वर ने मुझे दृढ़ता से जीते रहने का रास्ता दिखाया, और परमेश्वर में मेरी आस्था पहले से ज्यादा मजबूत हो गई। ये सारी ऐसे लाभ हैं, जो मैं आरामदेह माहौल में कभी हासिल नहीं कर पाती। मैंने संकल्प करती हूँ कि सीसीपी मुझे जैसे भी सताए, या चीजें जितनी भी मुश्किल क्यों न हो जाएँ, मैं परमेश्वर का अनुसरण करूँगी, ढंग से अपना कर्तव्य निभाऊँगी, और परमेश्वर के प्रेम की कीमत चुकाऊँगी।

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