सुसमाचार साझा करने के लिए सही सोच

05 फ़रवरी, 2023

एक बार, एक भाई ने मुझसे कहा कि उनकी छोटी बहन ली पिंग बचपन से ही एक विश्वासी रही, और वर्षों से प्रभु के लिए पूरे जोश से काम करती रही, उसकी आस्था सच्ची थी। वे चाहते थे कि मैं उसके साथ सुसमाचार साझा करूँ। मैं खुशी-खुशी राजी हो गई। लेकिन मैंने जब ली पिंग से बात की, तो वह खड़ी हो गई और घबराकर बोली, "हमारे पादरी ने कहा कि अंत के दिनों में झूठे मसीह प्रकट होंगे जो लोगों को गुमराह करेंगे, और प्रभु के लौट आने की हर खबर झूठी है। आप चमकती पूर्वी बिजली का प्रचार कर रही हैं। मैं नहीं सुनूँगी। हम कुछ और बातें कर सकते हैं, मगर मुझसे आस्था के बारे में बातें न करें।" यह देखकर कि पादरी की अफवाहों और झूठी बातों ने उसे पूरी तरह गुमराह कर दिया था, मैंने उसे बताने की कोशिश की, "बहन, क्या आप जानती हैं कि चमकती पूर्वी बिजली का क्या अर्थ है? प्रभु यीशु ने स्पष्ट भविष्यवाणी की थी, 'क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा' (मत्ती 24:27)। 'चमकती पूर्वी बिजली' का अर्थ है परमेश्वर के कार्य और वचन। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्य पूरब में प्रकट होने वाले महान प्रकाश जैसे हैं, इसलिए 'चमकती पूर्वी बिजली' नाम पड़ा। सत्य का यह प्रकाश पूरब से पश्चिम तक चमक रहा है। प्रभु की भविष्यवाणी पूरी तरह साकार हो चुकी है। आइए देखें कि क्या चमकती पूर्वी बिजली प्रभु का प्रकटन और कार्य है।" वह नहीं सुनना चाहती थी, बोली, "हमारे पादरी ने कहा है कि अगर कोई हमारे मार्ग से अलग प्रचार करे, तो हमें नहीं सुनना चाहिए, भले ही वे सुनने में कितने भी अच्छे क्यों न लगें। हम अपने माता-पिता या भाई-बहनों की भी नहीं सुन सकते, अजनबियों की मेजबानी का तो सवाल ही नहीं।" यह प्रभु की इच्छा नहीं है। बाइबल में कहा गया है, "अतिथि-सत्कार करना न भूलना, क्योंकि इसके द्वारा कुछ लोगों ने अनजाने में स्वर्गदूतों का आदर-सत्कार किया है" (इब्रानियों 13:2)। मैंने सब्र से जवाब दिया, "बहन, बाइबल में कहा गया है, 'जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है' (प्रकाशितवाक्य 2:7)। 'आधी रात को धूम मची : "देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो"' (मत्ती 25:6)। ये भविष्यवाणियाँ हमें बताती हैं कि प्रभु का स्वागत करने के लिए हमें उसकी वाणी सुननी होगी। अगर कोई गवाही दे कि प्रभु लौट आया है, तो हमें उससे मिलने जाना चाहिए। प्रभु के स्वागत का मौका पाने का हमारे लिए यही एकमात्र मार्ग है। अगर प्रभु के लौट आने के बारे में किसी को गवाही देते देखकर भी हम न सुनें और सत्य न खोजें, तो हम उसके स्वागत का अपना मौका खो देंगे!" लेकिन उसने सुनने से मना कर दिया और जाने का बहाना ढूँढ लिया। ली पिंग के रवैए ने मेरे सामने मुश्किल खड़ी कर दी। अगर वह नहीं सुनना चाहती थी, तो मैं उसके साथ सुसमाचार कैसे साझा कर सकती थी? लेकिन मैं जानती थी कि यह सही सोच नहीं थी। मैंने प्रभु के लौट आने की गवाही दी ही नहीं थी, तो मैं इतनी आसानी से कैसे हार मान सकती थी? अगर वह एक सच्ची विश्वासी है, तो मुझे उसके साथ सुसमाचार साझा करने की भरसक कोशिश करनी होगी।

हम बाद में सुसमाचार साझा करने के लिए ली पिंग के घर गए, लेकिन हमें देखते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया और हमारे मनाने पर भी उसने खोलने से मना कर दिया। हम कुछ नहीं कर सकते थे, तो हम लौट आए। हम कुछ बार और गए, लेकिन उसने दरवाजा नहीं खोला और बोली, "हमारे पादरी ने कहा कि आप लोग भेड़ें चुराना चाहते हैं, और हमें चमकती पूर्वी बिजली से आए किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना चाहिए, नदी में फेंक देना चाहिए, या पुलिस से उनकी शिकायत कर देनी चाहिए। यहाँ से चली जाइए और पक्का कर लीजिए कि हमारे पादरी आपको न देखें।" उसकी यह बात सुनकर मैं बहुत परेशान हो गई, मैं हार मान लेना चाहती थी। लेकिन तब मैं पक्की नहीं थी कि हार मान लेना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था या नहीं, तो मैंने मन-ही-मन प्रार्थना की। फिर परमेश्वर के वचनों का एक अंश मन में कौंध गया : "सुसमाचार को फैलाने में, तुम्हें अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और हर उस व्यक्ति के साथ, जिस तक तुम इसे फैलाते हो, ईमानदारी से पेश आना चाहिए। परमेश्वर यथासंभव लोगों को बचाता है, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए, तुम्हें ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो सच्चा मार्ग खोज और उस पर विचार कर रहा हो, अपनी लापरवाही से अनदेखा नहीं करना चाहिए। ... अगर वह सच्चे मार्ग पर विचार करने के लिए तैयार और सत्य की खोज करने में सक्षम हो, तो उसे परमेश्वर के और ज्यादा वचन पढ़कर सुनाने और उसके साथ और ज्यादा सत्य की संगति करने, परमेश्वर के कार्य की गवाही देने और उसकी धारणाओं का समाधान करने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए, ताकि तुम उसे प्राप्त कर परमेश्वर के सामने ला सको। यही सुसमाचार फैलाने के सिद्धांतों के अनुरूप है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है)। परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचकर मैं शर्मिंदा हो गई। जिस हद तक संभव हो, परमेश्वर लोगों को बचाता ही है। जरा-सी भी उम्मीद बची हो, तो परमेश्वर किसी को छोड़ नहीं देता। सुसमाचार साझा करने वाली होने के नाते मुझे भरसक कोशिश करनी होगी। अगर कोई इंसान सिद्धांतों के अनुरूप हो, तो मुझे सब्र और प्रेम से उसे उपदेश देना चाहिए, अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यही मेरा कर्तव्य है। लेकिन जरा-सी भी मुश्किल होने पर मैं पीछे हटकर हार मान लेना चाहती थी। मैं अपना कर्तव्य जरा भी लगन से नहीं निभा रही थी। इसका एहसास होने पर मैंने सचमुच दोषी महसूस किया। मैंने प्रार्थना कर ठान ली कि ली पिंग मुझसे जैसे भी पेश आए, वह अच्छी मानवता वाली और सच्ची विश्वासी है, मैं हार नहीं मानूँगी, और परमेश्वर के वचनों और कार्य पर उसे गवाही दूँगी और उसे परमेश्वर के सामने लाऊँगी। जब मैंने शुरू में, अपनी धारणाएँ ठीक करने के लिए सब्र से भाई-बहनों की संगति सुने बिना, परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की जाँच-पड़ताल की, तो शायद मैं धर्म में बनी रहती। सुसमाचार साझा करने के लिए अगाध प्रेम और धैर्य की जरूरत होती है, हमें हर संभव प्रयास करने होते हैं, जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं। यही परमेश्वर की इच्छा है।

हैरत की बात थी कि जब अगली बार हम ली पिंग के घर गए, तो उसने हमारे लिए दरवाजा खोला। मगर वह उदासीन बनी रही, कुछ नहीं बोली। मैंने सोचा कि अगर उसने दरवाजा खोला, तो हमें संगति का मौका मिलेगा, अगर वह थोड़ा सुनेगी तो धीरे-धीरे चीजें समझेगी। हमने उसके साथ संगति के इस मौके का लाभ उठाया। मैंने कहा, "बहन, प्रभु के आगमन का स्वागत करना बहुत बड़ी बात है। अगर हम प्रभु के वचनों का पालन न करें, बल्कि सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करते समय आँखें बंद कर लोगों की बातें सुनें, तो मुमकिन है हम परमेश्वर का विरोध करें। जब प्रभु यीशु ने प्रकट होकर कार्य किये, तो यहूदी विश्वासियों ने अपने धार्मिक अगुआओं की बातें सुनीं, उनके साथ प्रभु की भी निंदा की, उसे ठुकराया। आखिरकार परमेश्वर ने उन्हें दंड दिया। मौजूदा धार्मिक अगुआ और पादरी परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की खोज या जाँच-पड़ताल नहीं करना चाहते, यहां तक कि अपनी कलीसियाओं को सीलबंद करने और विश्वासियों को गुमराह करने के लिए झूठ फैलाने की पूरी कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु के आगमन की हर खबर झूठी है, अगर यह बात सगे भाई-बहन बताएं, तो भी हमें नहीं सुननी चाहिए, और पुलिस से उनकी शिकायत कर देनी चाहिए। क्या ऐसा कहना और करना प्रभु की शिक्षाओं के अनुरूप है? क्या ऐसा कहने वाला कोई इंसान एक विश्वासी माना जा सकता है?" हमारी हर बात को सच्ची पाकर उसका रवैया काफी सुधर गया, वह हमसे बातचीत के लिए तैयार हो गई। उसने वह बात भी हमें बताई जिससे वह उलझन में थी : "प्रभु यीशु ने हमें चेताया है, 'उस समय यदि कोई तुम से कहे, "देखो, मसीह यहाँ है!" या "वहाँ है!" तो विश्‍वास न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्‍ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिह्न, और अद्भुत काम दिखाएँगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें' (मत्ती 24:23-24)। अंत के दिनों में जब प्रभु लौटकर आएगा, तब लोगों को गुमराह करने के लिए झूठे मसीह और झूठे नबी मौजूद होंगे। हमारे पादरी ने कहा कि प्रभु के लौटकर आने का हर प्रचार झूठे मसीह का लोगों को गुमराह करने से जुड़ा है। हम बाइबल को ठीक से नहीं जानते, इसलिए उन्होंने हमें सवाधान रहने को कहा, वरना हमारी वर्षों की आस्था बेकार हो जाएगी। मुझे फिक्र है कि अगर मैंने गलत चीज में आस्था रखी, तो क्या होगा।" मैंने तुरंत जवाब दिया, "बहन, हम तुम्हारे गुमराह होने के डर को समझते हैं। लेकिन हमें प्रभु की इच्छा समझनी होगी। उसने ऐसा इसलिए कहा ताकि हम झूठे मसीह को पहचान सकें और उनसे धोखा न खाएँ, इसलिए नहीं कि हम आँखें बंद कर उनसे सतर्क रहने के फेर में प्रभु का स्वागत ही न कर पाएँ। उसने झूठे मसीहों के लक्षणों के बारे में भी स्पष्ट समझाया है। वे लोगों को भटकाने के लिए संकेत और चमत्कार दिखाने का सहारा लेते हैं। हम झूठे मसीहों की खासियतें जानते हैं, इसलिए अगर हम इन बातों पर ध्यान दें, तो गुमराह नहीं होंगे। अगर हम प्रभु के वचनों को सिर्फ संदर्भ से अलग करके देखें, और यकीन करें कि प्रभु के लौटकर आने की हर गवाही झूठी है, कभी सत्य की खोज और जाँच-पड़ताल न करें, तो क्या हम खुद प्रभु यीशु के लौटकर आने की निंदा नहीं करेंगे? फिर हम प्रभु का स्वागत कैसे कर पाएँगे? इसलिए अगर हम यह पक्का करना चाहें कि यह प्रभु यीशु का लौटकर आना है या नहीं, तो अहम है कि हम प्रभु की वाणी को सुनें और सच्चे मसीह को झूठे मसीहों से अलग पहचान सकें। हमेशा सतर्क रहने और हर चीज को ठुकराने से समस्या हल नहीं होती। प्रभु के स्वागत के लिए अहम है उसकी वाणी को सुनना। प्रभु यीशु ने कहा था, 'देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ' (प्रकाशितवाक्य 3:20)।"

इसके बाद, हमने सच्चे मसीह और झूठे मसीहों में भेद करने के बारे में परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आज परमेश्वर के कार्य को जानना)। "जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। इसे ऐसे कहें, व्यक्ति को इस बात का निश्चय कि यह देहधारी परमेश्वर है या नहीं और कि यह सही मार्ग है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी कि यह देहधारी परमेश्वर की देह है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने संगति की, "परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। सच्चे मसीह को झूठे मसीहों से अलग पहचानने का काम परमेश्वर के कार्य और वचनों और उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव से किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए कि मसीह का सार मार्ग, सत्य और जीवन है। वह मानवजाति को सत्य प्रदान करता है, और उसमें परमेश्वर का स्वभाव झलकता है। वह छुटकारे और उद्धार का कार्य करता है। प्रभु यीशु ने अपने कार्य के दौरान, इंसान को प्रायश्चित्त का मार्ग दिखाया। उसने हमें पाप कबूल कर प्रायश्चित्त करना, दूसरों और खुद से प्रेम करना, सहनशील और धैर्यवान होना सिखाया। उसने बहुत-से संकेत और चमत्कार दिखाए, रोगियों का इलाज किया, दानवों को दूर भगाया, मृतकों को जीवनदान दिया, लंगड़ों को चलने लायक बनाया। उसने इंसान पर असीम कृपा की, हमें परमेश्वर की कृपा और प्रेम का स्वाद चखने दिया, साथ ही उसकी सामर्थ्य और अधिकार को देखने दिया। अंत में, प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, जिससे छुटकारे का कार्य समाप्त हुआ। प्रभु के वचनों और कार्य, और उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव से, हम देख सकते हैं कि उसका सार दिव्य था, वह देहधारी परमेश्वर था। अब अंत के दिनों में वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आया है। वह सत्य व्यक्त करता है और मनुष्य के न्याय और शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन समृद्ध और भरपूर हैं, जो बहुत-से रहस्यों और सत्य का खुलासा करते हैं, जैसे कि हम पाप के बंधनों से कैसे बच सकते हैं, स्वभाव में बदलाव और पूरी तरह बचाए जाने का प्रयास कैसे कर सकते हैं, और इंसान का परिणाम और मंजिल क्या है। उसने हमें बचाए जाने और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का रास्ता दिखाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर शैतान द्वारा इंसान की भ्रष्टता के सत्य का न्याय कर उसे उजागर भी करता है, और इंसान के परमेश्वर विरोधी शैतानी स्वभाव का खुलासा करता है, जैसे कि अहंकारी होना, कपटी और दुष्ट होना। वह अपना धार्मिक स्वभाव भी प्रदर्शित करता है, जो कोई अपमान सहन नहीं करता। उसके वचन हमें अभ्यास करने और उसमें प्रवेश के मार्ग भी दिखाते हैं, जैसे कि ईमानदार इंसान कैसे बनें, कर्तव्यनिष्ठ कैसे बनें, और परमेश्वर को समर्पित कैसे हों। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, और उसके न्याय और ताड़ना का अनुभव करने से, उसके चुने हुए लोगों का स्वभाव बदल जाता है, और वे बहुत-से अनुभव और गवाहियाँ पा लेते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचनों से हम समझ सकते हैं कि वह अंत के दिनों का मसीह है, स्वयं परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु का लौटकर आना है। लेकिन झूठे मसीह सार रूप में बुरी आत्माएं हैं। उनके पास सत्य नहीं होता, वे लोगों को न तो बचा सकते हैं और न ही शुद्ध कर सकते हैं। वे सिर्फ संकेत और चमत्कार दिखाकर लोगों को भटका सकते हैं। हम देख सकते हैं कि झूठे मसीहों के पास मसीह का सार नहीं होता और वे उसका कार्य नहीं कर सकते। वे सब खुद को परमेश्वर पुकारते हैं, मगर वे झूठे हैं, और थोड़े समय के लिए ही लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं।"

उसने कहा, "आपकी बात बढ़िया है—दमदार है। कोई आश्चर्य नहीं कि मेरे पादरी ने कहा था कि हम आपका उपदेश सुनकर खिंचे चले जाएँगे। आपकी बात मुझे बहुत अच्छी लगी, लेकिन मुझे इस पर विचार करना होगा।" मैंने जवाब दिया, "बहन, इतने वर्षों की आस्था में, क्या हम प्रभु के लौटकर आने को तरस नहीं रहे थे? उम्मीद है आप इसे सावधानी से देखेंगी। अगर आप परमेश्वर के उद्धार का मौका चूक गईं, तो जीवन भर पछताएँगी।" इसके बाद, हम जैसी भी संगति करते, वह न तो कोई प्रतिक्रिया दिखाती और न ही कुछ बोलती। मैंने खालीपन महसूस किया, मेरा धैर्य ख़त्म हो गया। मैं सोच रही थी कि हमारे इतनी संगति करने पर भी वह इसे स्वीकार नहीं रही थी, तो हम और कुछ नहीं कर सकतीं। लेकिन इस विचार ने मुझे बेचैन कर दिया। मुझे परमेश्वर की एक बात याद आई : "क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें टूटते तारे जैसी रोशनी के लिए कितनी ललक है जो अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर-बितर कर दे, जिन्होंने वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आस लगाए बैठे हैं और कैसे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, भयंकर कष्ट सहते, रिहाई से नाउम्मीद ये लोग, अंधकार में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएँ बेहद बदकिस्मत हैं, जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है। सदियों से ये इसी स्थिति में क्रूर बधंनों और अवरुद्ध इतिहास में जकड़े हुए हैं। उनकी कराहने की आवाज किसने सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति को विष देकर पीड़ित किया गया है। यद्यपि मनुष्य आज तक जीवित है, लेकिन कौन यह जान सकता था कि उसे लंबे समय से दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि शिकार हुए लोगों में से तू भी एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपना सारा ज़ोर लगाने को तैयार नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धर्म-परायण, परमेश्वर-सेवी जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का संकल्प और विश्वास है?" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?)। परमेश्वर के वचन हमें बताते हैं कि वह कितना दुखी और बेचैन है, उसे उम्मीद है कि हर सम्प्रदाय के सभी सच्चे विश्वासी, जो अँधेरे में हैं, प्रभु के लौटकर आने को बुरी तरह तरस रहे हैं, वे जल्द ही परमेश्वर की वाणी सुनेंगे और उसके घर को लौट आएँगे। लेकिन एक संभावी सुसमाचार ग्रहीता अपने पादरी से गुमराह और धार्मिक धारणाओं से बंधी, ठीक मेरे सामने थी, मगर मैं धैर्य से सत्य पर संगति कर उसे रास्ता नहीं दिखा पाई। मैं उसे बेपरवाही से सीमा में बांधकर छोड़े जा रही थी। प्रेम और जिम्मेदारी की मेरी भावना कहाँ थी? मैंने याद किया कि किस तरह मैं हर दिन प्रभु के लौटकर आने को तरसती थी। मुझे झूठे मसीह से गुमराह होने का डर सताता रहता था, तो जब मैंने किसी को गवाही देते सुना कि प्रभु लौट आया है, तो मैंने उसकी जाँच-पड़ताल की हिम्मत नहीं की थी। रास्त ऊबड़-खाबड़ था। मैं सौभाग्यशाली थी कि ली पिंग से पहले मैंने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार लिया था, तो उसके साथ सुसमाचार साझा करना मेरी जिम्मेदारी थी, मेरा कर्तव्य था। साथ ही, कार्य के इस चरण को मैंने पलक झपकते ही स्वीकार नहीं कर लिया था। पहले मैं भी बहुत-सी धारणाएँ पाले हुए थी। भाई-बहनों ने धैर्य के साथ मुझसे बारम्बार संगति की थी, तब जाकर मुझे परमेश्वर के सामने आने का सौभाग्य मिला था। लेकिन मैं खुद को उसकी स्थिति में रखकर उसके नजरिये से सोचना नहीं चाहती थी। मुझमें प्रेम और धैर्य की कमी थी, और मैं अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही थी। अगर जरा भी उम्मीद हो, सत्य खोजने और जाँच-पड़ताल करने की ओर उसका थोड़ा भी झुकाव हो, तो मुझे उससे संगति करते रहने के तरीके के बारे में सोचना चाहिए। केवल यही होगा जिम्मेदारी निभाना। इस तरह सोचकर मुझे उससे सहानुभूति हुई। प्रभु का स्वागत करना हमारे अंतिम परिणाम के लिए बहुत बड़ी बात है। उसका सतर्क रवैया बहुत सामान्य था। मैंने बस थोड़े-से ज्यादा दौरे किए थे, और उसमें ढेरों धारणाएँ देखकर, मैं उसे सीमाओं में बाँधकर छोड़ देना चाहती थी। मैं अहंकारी और नासमझ थी। ऐसा सोचकर मैंने बहुत बुरा और दोषी महसूस किया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर शपथ ली कि मैं उसके साथ संगति करती रहूँगी, उसे परमेश्वर के पास लाने की भरसक कोशिश करूँगी।

कुछ दिन बाद, बहन चेंग के साथ मैं फिर से ली पिंग के घर गई। हमें देखते ही वह गर्मजोशी से हमारा अभिनंदन करते हुए बोली, "बहनो, आपने भोजन किया? नहीं तो, मैं कुछ बना देती हूँ। आज बड़ी ठंड है—आराम से बैठिए।" इतनी जल्दी उसका रवैया इतना बदल गया? बहन चेंग और मुझे भी हैरानी हुई। मुझे फिक्र थी कि पता नहीं वह हमें अंदर बुलाएगी या नहीं। उसके रवैये में ऐसे 180 डिग्री बदलाव की उम्मीद नहीं थी। हमारे बैठने के बाद, ली पिंग ने हमसे अपने मन की बात कही : "पिछले कुछ दिनों से मैं सोच रही थी। आप मुझसे सुसमाचार साझा करने के लिए कई-कई बार आईं। अगर सच्चे मार्ग में आपकी आस्था न होती, यह पवित्र आत्मा से न आई होती, तो आपमें इतना प्रेम और धैर्य कहाँ से होता? मुझे भी लग रहा था कि जितनी बार भी आप आईं, मैंने आपकी नहीं सुनी और आपके साथ ठीक से पेश भी नहीं आई, बल्कि एक झूठे मसीह से गुमराह होने के डर से अपने पादरी की सुनती रही। मैं परमेश्वर की वाणी नहीं सुन रही थी। मैं आपकी गवाही पर गौर नहीं कर रही थी कि प्रभु लौट आया है, बल्कि आपको देखते ही छिप जाती थी। इस तरह मैं कभी भी प्रभु का स्वागत कैसे कर सकती थी? मैं बहुत मूर्ख और अज्ञानी थी!" उसकी इन बातों ने मेरे दिल को छू लिया, और मैंने मन-ही-मन परमेश्वर का धन्यवाद किया। फिर मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों के बारे में सोचा : "मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, उसके जीवन की हर चीज़ परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीज़ों को इसी तरीके से संचालित करता है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। उस दिन हमने इस बारे में भी बात की कि कैसे सिर्फ पापों से छुटकारा पाकर, और परमेश्वर के अंत के दिनों का न्याय स्वीकार किए बिना हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। मैंने कहा, "प्रभु में विश्वास रखने, पाप कबूल कर प्रायश्चित्त करने का अर्थ सिर्फ इतना है कि प्रभु ने हमें छुटकारा दिलाया है, और वह हमें पापी नहीं मानता, मगर इसका यह अर्थ नहीं कि हम पाप से मुक्त हैं। हम अभी भी पाप करने और उसे कबूल करने के कुचक्र में जी रहे हैं। अगर हमारा भ्रष्ट स्वभाव ठीक नहीं हुआ, तो हम पाप कर परमेश्वर का प्रतिरोध करते रहेंगे, और उसके राज्य में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। बाइबल में कहा गया है, 'पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा' (इब्रानियों 12:14)। 'इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ' (लैव्यव्यवस्था 11:45)। 'मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है' (यूहन्ना 8:34-35)। परमेश्वर पवित्र है और वह गंदे इंसानों को पवित्र भूमि को कलंकित नहीं करने देगा, लेकिन हम हर पल पाप किए बिना नहीं रह सकते। भ्रष्टता से सराबोर होकर, पापों से बंधे रहकर हम परमेश्वर के राज्य में कैसे प्रवेश कर सकते हैं? सिर्फ परमेश्वर ही हमें बचा सकता है। अंत के दिनों में, परमेश्वर प्रकट होकर कार्य करता है, मनुष्य की भ्रष्टता ठीक करने, उसे पाप की बेड़ियों से मुक्त करने और भ्रष्टता से शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त कर न्याय कार्य करता है, ताकि आखिरकार हम परमेश्वर की पवित्र भूमि में प्रवेश कर सकें।" ली पिंग ने भावुक होकर कहा, "यानी अगर हम शुद्ध होना चाहें, तो हमें परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य का अनुभव करना होगा, वरना हमारा भष्ट स्वभाव कभी नहीं बदलेगा।" उसे यह समझने में समर्थ देख मैं बहुत खुश हुई।

फिर हमने धार्मिक पादरियों, फरीसियों को जानने-समझने पर संगति की। हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "प्रत्येक पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और बाइबल की उनकी व्याख्या में संदर्भ का अभाव है और वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चलते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे उपदेश देने में पूरी तरह अक्षम होते, तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें। इनके माध्यम से वे लोगों को धोखा देते हैं और अपने सामने ले आते हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। जब वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, 'हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।' देखो परमेश्वर में विश्वास करते और नया मार्ग स्वीकारते समय कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। "ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे 'मज़बूत देह' वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं?" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं)। मैंने संगति की, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन धार्मिक अगुआओं की उस प्रकृति और सार का तीखा खुलासा करते हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध है। पहले, हम पादरी वर्ग को जानते-समझते नहीं थे। हम सोचते थे कि वे बाइबल को अच्छी तरह समझते हैं, उनका आध्यात्मिक कद ऊँचा है और उन्हें सत्य की समझ है, तो हम आँखें बंद कर उन्हें सुनते थे। उनकी हर व्यवस्था हमें मंजूर थी। हम पादरियों के कथनों को प्रभु के वचनों से बढ़कर समझते थे, और प्रभु के स्वागत जैसी बड़ी बात के लिए भी हमें उनकी स्वीकृति की जरूरत पड़ती थी। स्वीकृति न मिलने पर, हम सत्य खोजने या स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते थे, भले ही हमने प्रभु की वाणी सुनी हो। हम उन्हें बहुत बड़ा समझते थे। हम विश्वासी या अनुयायी नहीं थे। अब तथ्यों ने हमें दिखाया है कि धार्मिक दुनिया के अगुआ जब प्रभु यीशु के लौटकर आने के बारे में सुनते हैं, तो वे उसकी जाँच करने में विश्वासियों का मार्गदर्शन नहीं करते, बल्कि उन्हें तरह-तरह की झूठी बातें बताकर गुमराह करते हैं और सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने से रोकते हैं। उनका बस एक ही लक्ष्य है : लोगों को परमेश्वर के अंत के दिनों का उद्धार स्वीकारने से रोकना, उन्हें सख्ती से अपनी मुट्ठी में जकड़े रखना, और अपने साथ नरक में घसीट लेना। हम उनके इस बर्ताव से देख सकते हैं कि उनका सार परमेशर के विरुद्ध है, वे ऐसे दानव हैं जो लोगों की आत्माओं को निगल लेते हैं। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा, 'हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो' (मत्ती 23:13)।" ली पिंग की प्रतिक्रिया थी, "अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारी हुए बिना, प्रकट होकर कार्य किए बिना, सत्य व्यक्त किए बिना, इन धार्मिक अगुआओं के पाखंड को उजागर किए बिना, हम उनके असली चेहरे, उनका पाखंड और द्वेष कभी न समझ पाएँगे, बल्कि उनके जाल में ही फंसे रहेंगे। कैसी मूर्खता है!" परमेश्वर के कारण ही वह अपने पादरी को जान-समझ पाई। इसके बाद ली पिंग ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अनेक वचन पढ़े, और हमने साथ मिलकर परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर संगति की, बताया कि परमेश्वर अंत के दिनों में कार्य करने के लिए देहधारी क्यों बना, शुद्ध होने के लिए परमेश्वर के न्याय का अनुभव कैसे करें, और सत्य के अन्य पहलू क्या हैं।

कुछ समय तक खोज और जाँच-पड़ताल के बाद, उसे विश्वास हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में प्रभु यीशु लौट आया है। लेकिन हमें उम्मीद नहीं थी कि परमेश्वर के कार्य के बारे में उसके आश्वस्त होते ही, उसके पादरी को पता चल जाएगा।

एक शाम हम साथ बैठे ही थे कि हमने दरवाजे पर बेसब्री वाली दस्तक सुनी। ली पिंग को दरवाजे के नीचे की दरार से बहुत-से पैर दिखे, तो वह डरकर बोली, "नहीं, नहीं, उन्होंने कहा था कि अगर आप उनके हाथ लग गईं, तो वे आपको मौत के घाट उतार देंगे, आपको पुलिस के हवाले कर देंगे। मैं उन्हें आपको नहीं देखने दे सकती।" उसने हमें फौरन छिपा दिया, और इसके तुरंत बाद 7-8 लोग अंदर घुस आए। गुस्से से उबलकर एक साथ बोलते हुए उन्होंने कहा, "कहाँ हैं वो लोग? हमने दो लोगों को तुम्हारे घर आते देखा, और वे वापस नहीं गए हैं। यहीं होंगे। हाथ लगते ही हम उनके हाथ-पाँव तोड़ देंगे।" छोटी-सी दरार से मैंने उनका भयानक चेहरा देखा, वे भेड़ियों जैसे थे। वे हर जगह ढूँढने लगे, अहाते में, बिस्तरों के नीचे, सुअर के बाड़े में, हर कोने-नुक्कड़ में। जब वे हमारे छिपे होने की जगह पर पहुँचे, तो उन्होंने हर जगह टॉर्च से रोशनी की, जैसे ही वे ठीक मेरे सामने पहुँचे, मेरा दिल डर के मारे तेजी से धड़कने लगा। अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया, तो पीट-पीट कर मार भले न डालें, पर लूली-लंगड़ी तो कर ही देंगे। मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, पल भर के लिए भी उससे जुदा होने की हिम्मत नहीं की। मैं जानती थी कि परमेश्वर ही मेरा सहारा था, और उस दिन वे मेरे साथ जो भी करते, वह परमेश्वर के हाथ में था। अगर परमेश्वर इजाजत न दे, तो वे मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यह सोचकर, मैंने उतना ज्यादा डर महसूस नहीं किया। उन्होंने कई जगहें खंगालीं, लेकिन हमें नहीं ढूँढ पाए। यह परमेश्वर की सुरक्षा थी! फिर मैंने किसी को नाराजगी से कहते सुना, "अजीब बात है। दो लोग तुम्हारे घर में घुसे जरूर, मगर गए ही नहीं। हमें वे मिल क्यों नहीं रहे हैं?" ली पिंग ने उन्हें गुस्से से फटकारा, "मैं आपके बर्ताव से समझ सकती हूँ कि आप विश्वासी नहीं हैं। वे सुसमाचार साझा करने आए थे, पर लगता है वे भेड़िए की मांद में घुस आए थे, शाप और पिटाई का सामना करने के लिए। प्रभु यीशु ने हमें खुद के जैसे दूसरों से प्रेम करना सिखाया था। आपका बर्ताव देखें तो आप एक अविश्वासी जितने अच्छे भी नहीं हैं। अब मैं आपकी असलियत समझ गई हूँ। क्या आप लोग ईसाई हैं भी? आप तो फरीसी हैं।" उसकी बात सुनकर वे गुस्से से चले गए। उसकी यह बात सुनकर बहन चेंग और मैं बहुत रोमांचित हुए। आखिरकार वह धार्मिक अगुआओं को जान-समझ गई थी, और अब उनसे गुमराह या परेशान नहीं हो रही थी। उनके जाने के बाद, ली पिंग ने भावुक होकर कहा, "आज इस बाधा के बाद, मैंने उनका असली चेहरा देख लिया है। वे मसीह-विरोधी हैं, परमेश्वर के दुश्मन हैं। वे मुझे जैसे भी परेशान करें, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करूँगी।" उसकी बात ने मेरे दिल को छू लिया, मैंने परमेश्वर को बार-बार धन्यवाद दिया।

उस अनुभव ने मुझे धार्मिक अगुआओं के परमेश्वर विरोधी दानवी चेहरे साफ तौर पर दिखाए। वे परमेश्वर के कार्य की खोज या जाँच-पड़ताल बिल्कुल नहीं करते, वे जब किसी को प्रभु के लौट आने की गवाही देते सुनते हैं तो आपे से बाहर हो जाते हैं, और उन्हें मौत के घाट उतार देना चाहते हैं। वे विश्वासी नहीं हैं। वे मसीह-विरोधी हैं, फरीसी हैं, जो सत्य से उकता चुके हैं, उससे घृणा करते हैं। मैंने परमेश्वर के चमत्कारी कर्म देखे और इससे मेरी आस्था को मजबूती मिली। सुसमाचार साझा करने में मुझे जैसी भी मुश्किलें आएँ, अगर कोई संभावी सुसमाचार ग्रहीता हो, तो मुझे परमेश्वर के कार्य और वचनों की गवाही देने के लिए प्रेम और धैर्य से काम लेना होगा, ताकि वे परमेश्वर की वाणी सुन सकें और अंत के दिनों का उसका उद्धार स्वीकार सकें। अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाने का यही एकमात्र मार्ग है।

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