शोहरत और लाभ के पीछे भागने पर चिंतन

04 फ़रवरी, 2022

मरकीयल, फ्रांस

मई 2021 में, मैंने सिंचन कार्य की टीम अगुआ का काम संभाला। मुझे भाई-बहनों के दो समूहों के सिंचन कार्य की जिम्मेदारी दी गई, जल्दी ही, अगुआ ने मेरे लिए कुछ और भाई-बहनों के सिंचन की व्यवस्था की। यह खबर सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने सोचा, अपने भाई-बहनों का सिंचन करके मुझे बहुत सारा प्रबोधन मिलेगा, बेहतर अनुभव और अधिक सत्य की समझ हासिल होगी। अगर मैं उनके जीवन प्रवेश में आने वाली समस्याएं हल कर पाई, तो भाई-बहन पक्के तौर पर कहेंगे कि मैं अच्छी हूँ और सत्य समझती हूँ, मैं परमेश्वर के घर की बुनियाद बन सकती हूँ। इसलिए, मैं अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो गई, संगति के लिए अक्सर सभाओं में जाने लगी, भाई-बहनों की परेशानी में उनकी मदद के लिए मैं परमेश्वर के वचन ढूंढती। कुछ समय बाद, कोई सवाल होने पर भाई-बहन सहभागिता के लिए मेरे पास आने लगे, मैं बहुत खुश थी।

फिर, जब और लोगों ने अंत के दिनों के परमेश्वर का कार्य स्वीकारा, तो कलीसिया में लोगों की संख्या बढ़ने लगी। एक दिन एक सभा में, मुझे पता चला कि एक कलीसिया अगुआ नए सदस्यों का सिंचन करने और मेरे काम की जानकारी लेने आने वाली है। भाई-बहन समस्याओं का हल पाने के लिए उससे बात कर सकते हैं। जब मैंने सुना कि आने वाली अगुआ मेरी पार्टनर बनेंगी, तो मुझे कोई खुशी नहीं हुई। इस अगुआ ने पहले मेरा सिंचन किया था, उसमें काबिलियत थी। उसकी समझ और परमेश्वर के वचनों पर संगति बेहतर थी। भाई-बहनों की समस्याओं का हल करना उसके लिए आसान था, मैंने सोचा, "अब वो मेरी पार्टनर बनेगी, तो क्या भाई-बहन पहले की तरह अपने सवाल लेकर मेरे पास आएंगे? क्या वे मुझे किनारे करके मेरी अगुआ से सवाल पूछेंगे? इसके बाद कौन मेरे बारे में ऊँचा सोचेगा? भाई-बहनों के दिलों में बनी मेरी अच्छी छवि मिट जाएगी।" यह सोचकर, मैं अगुआ से बिल्कुल भी सहयोग नहीं करना चाहती थी। इसी के साथ, मुझे संकट भी महसूस हुआ। मैंने मन में कहा, "मैं ऐसा नहीं होने दे सकती। मुझे भाई-बहनों के दिलों में अपनी जगह बनाये रखनी होगी। मुझे भाई-बहनों से कहना होगा कि कोई परेशानी हो या परमेश्वर के वचनों का कोई अंश ढूंढना हो, तो वे मुझे पूछ सकते हैं, मैं उनकी मदद करूंगी।" तब से, जब भी मुझे पता चलता कि भाई-बहनों की हालत बुरी है या उन्हें कोई परेशानी है, तो मैं सहभागिता करने भागती, कि कहीं मेरी अगुआ पहले न पहुंच जाये। मैं सभी भाई-बहनों को कॉल करके पूछती कि उन्हें किसी मदद की ज़रूरत तो नहीं, कहती कि उनके मन में कोई सवाल या उलझन है, तो वे मेरे पास आ सकते हैं। मैंने सोचा, इस तरह, जब अगुआ उनसे संपर्क करेगी, तो भाई-बहन कहेंगे कि मैंने उनकी मदद कर दी है। मगर सब कुछ उतना आसान नहीं था जितना मैंने सोचा था। मुझमें उनकी कई समस्याओं की गहरी समझ नहीं थी, मुझे उन्हें हल करना भी नहीं आता था, मगर मैं अगुआ से नहीं पूछना चाहती थी। मैंने सोचा, "अगर मैंने अगुआ से पूछा, तो उसे ऐसा नहीं लगेगा कि मुझे सत्य की समझ नहीं, मैं परमेश्वर के वचन ज़्यादा नहीं पढ़ती? वो यह नहीं सोचेगी कि मैं समस्याएं हल नहीं कर सकती? अगर अगुआ ने भाई-बहनों की समस्याएं हल कर दी तो क्या उन्हें ऐसा नहीं लगेगा कि मैं नाकाबिल हूँ, उनकी मदद नहीं कर सकती? मैं नहीं दिखाना चाहती कि मैं ये नहीं कर सकती। मैं चाहती हूँ भाई-बहनों को लगे मैं ये काम कर सकती हूँ, ताकि उनके मन में कोई सवाल हो, तो वे मुझसे ही पूछें।" मगर अपने बल पर भाई-बहनों की मदद करना मुश्किल था। कुछ चीजों का मैंने अनुभव नहीं किया था, और सहभागिता करना नहीं जानती थी, कभी-कभी तो उनकी समस्याएं हल करने के लिए परमेश्वर के वचन ढूंढने में मुझे कई दिन लग जाते, फिर जब दूसरे भाई-बहन अपने सवाल लेकर आते, तो मेरे पास उनके लिए समय नहीं होता। इसी तरह, पलक झपकते एक महीना गुजर गया, क्योंकि मैंने समय पर अपने भाई-बहनों की मदद नहीं की, उनकी समस्याएं हल नहीं हो पाईं और उनकी बुरी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अगर मैंने अगुआ से कह दिया होता कि मुझे इन समस्याओं की समझ नहीं है, तो हम साथ मिलकर परमेश्वर के वचन ढूंढ सकते थे, और उनकी समस्याएं भी झटपट हल हो जातीं। मगर मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि मैं उनके दिलों में अपनी छवि बनाये रखना चाहती थी। ऐसा करने पर मुझे थोड़ा अपराध-बोध हुआ। मैं जानती थी अगर मैं ऐसा करती रही, तो अपने भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में रुकावट बन जाउंगी, और मैं यह काम अच्छे से नहीं कर पाउंगी।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जो कर्तव्यों के प्रति लोगों के गलत रवैये का खुलासा करता था। "कर्तव्य परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपे गए काम हैं; वे लोगों द्वारा पूरा करने के लिए विशेष कार्य हैं। लेकिन, एक कर्तव्य निश्चित रूप से तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय नहीं है, और न ही वह भीड़ में बेहतर दिखने का एक माध्यम है। कुछ लोग कर्तव्यों का उपयोग अपने प्रबंधन के लिए और गिरोह बनाने के लिए करते हैं; कुछ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए करते हैं; कुछ अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिए करते हैं; और कुछ भाग्य पर भरोसा करने वाली अपनी मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए करते हैं यह सोचकर कि जब तक वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर के घर में और परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए व्यवस्थित अद्भुत गंतव्य में उनका भी एक हिस्सा होगा। कर्तव्य के बारे में इस तरह के दृष्टिकोण गलत हैं; वे परमेश्वर को घिनौने लगते हैं और उन्हें तत्काल दूर किया जाना चाहिए" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?')। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि हमारा कर्तव्य परमेश्वर द्वारा हमें दी गई आज्ञा है, यह कोई निजी मामला नहीं है, हमें अपने कर्तव्य को दूसरों की प्रशंसा पाने का ज़रिया नहीं समझना चाहिए, न ही हमें इज़्ज़त और रुतबे के पीछे भागना चाहिए, ताकि लोग हमारा अनुसरण करें। अपने कर्तव्य को एक दायित्व समझकर, परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार उसे करना चाहिए। मगर अपने कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया कैसा था? मैंने शोहरत और लाभ पाने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने लिए कर्तव्य निभाया। मैं चाहती थी कि मेरे भाई-बहन मेरी प्रशंसा और पूजा करें, अपने समस्याएं लेकर मेरे पास आएं। मैं उनके प्रति ईमानदार नहीं थी, उनकी मदद नहीं करना चाहती थी, बल्कि मैं चाहती थी उनकी नज़र में मेरी अच्छी छवि बने, ताकि जब वे मेरी बात करें, तो कहें कि मैंने उनकी मदद की है, मैं बहुत अच्छी और उदार हूँ। इस तरह मुझे संतुष्टि मिलती। मैंने अपने कर्तव्य से शोहरत, लाभ और रुतबा पाना चाहा, ताकि लोगों के दिलों में मेरी जगह बने, वे अपनी समस्याएं लेकर मेरे पास आएं और परमेश्वर को किनारे कर दें। मैं एक निजी उद्यम चला रही थी। फिर मुझे एहसास हुआ कि कर्तव्य को लेकर मेरा रवैया गलत था। भाई-बहनों की समस्याएं हल कर भी पाऊँ, तब भी मेरी मंशा काम ठीक से करने की नहीं थी, जिससे परमेश्वर कभी संतुष्ट नहीं होता।

फिर मैंने मसीह-विरोधियों को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन पढ़े, जो मेरी हालत के अनुरूप हैं। "चाहे कोई भी संदर्भ हो, मसीह-विरोधी चाहे कहीं भी अपना कर्तव्य निभा रहे हों, वे यह छाप छोड़ने की कोशिश करेंगे कि वे कमजोर नहीं हैं, कि वे हमेशा मजबूत, आत्मविश्वास से भरे हुए रहते हैं, कभी नकारात्मक नहीं होते। वे कभी परमेश्वर के प्रति अपना असली दृष्टिकोण या असली रवैया प्रकट नहीं करते। अपने दिल की गहराइयों में क्या वे सचमुच यह मानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है जो वे नहीं कर सकते? क्या वे वाकई मानते हैं कि उनमें कोई कमजोरी, नकारात्मकता या भ्रष्टता नहीं भरी है? बिलकुल नहीं। वे दिखावा करने में अच्छे होते हैं, चीजों को छिपाने में माहिर होते हैं। वे लोगों को अपना मजबूत और सम्मानजनक पक्ष दिखाना पसंद करते हैं; वे नहीं चाहते कि वे उनका वह पक्ष देखें जो कमजोर और अंधकारमय है। उनका उद्देश्य स्पष्ट होता है : सीधी-सी बात है, वे लोगों के सामने अपनी साख, उनके दिलों में अपनी जगह बनाए रखना चाहते हैं। उन्हें लगता है अगर वे अपनी नकारात्मकता और कमजोरी दूसरों के सामने उजागर करेंगे, अपना विद्रोही और भ्रष्ट पक्ष प्रकट करेंगे, तो यह उनकी हैसियत और प्रतिष्ठा के लिए एक गंभीर खतरा होगा—तो बेकार की परेशानी खड़ी होगी। इसलिए वे अपनी कमजोरी और विद्रोह को सख्ती से अपने तक ही रखना पसंद करते हैं। और अगर ऐसा कभी हो भी जाए जब हर कोई उनके कमजोर और विद्रोही पक्ष को देख ले, तो वे उस दिखावे को बरकरार रखते हैं; वे सोचते हैं कि अगर वे अपने भीतर किसी भ्रष्ट स्वभाव का होना स्वीकार करते हैं, एक सामान्य व्यक्ति होना जो छोटा और महत्वहीन है, तो वे लोगों के दिलों में अपना स्थान खो देंगे, और पूरी तरह से विफल हो जाएँगे। और इसलिए, कुछ भी हो जाए, वे बस लोगों के सामने खुल नहीं सकते; कुछ भी हो जाए, वे अपना सामर्थ्य और हैसियत किसी और को नहीं दे सकते; इसके बजाय, वे प्रतिस्पर्धा करने का हर संभव प्रयास करते हैं, और कभी हार नहीं मानते" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग दस)')। इस अंश को पढ़कर मैं समझ गई कि मसीह-विरोधियों को रुतबा पसंद है। लोगों के दिलों में अपनी अच्छी छवि बनाये रखने के लिए, वे कभी लोगों को अपनी परेशानियां नहीं बताते कि कोई उनकी कमियां न जान पाए। कामों में परेशानियां आने पर भी वे दिखावा करते हैं, ताकि लोग उन्हें सर्वगुण-संपन्न समझें और मानें कि उन्हें सत्य की समझ है। यही मेरी हालत थी। भाई-बहनों की समस्याएं हल नहीं कर पाने पर भी मैंने किसी की मदद नहीं माँगी। मैं लोगों के दिलों में अपनी अच्छी छवि बनाना चाहती थी, ताकि मेरे भाई-बहन सोचें कि मुझमें कोई कमी या खामी नहीं है, मैं समस्याएं हल करने में उनकी मदद कर सकती हूँ, जिससे कि उन्हें किसी और से पूछने की ज़रूरत न पड़े। मैं डरती थी कि अगुआ उनकी मदद करेगी, तो उनके दिलों में बनी मेरी साख और छवि बिगड़ जाएगी। साख बनाए रखने के लिए मैंने उन समस्याओं को हल कर पाने का दिखावा किया जिन्हें मैं हल नहीं कर सकती थी। मैंने अगुआ की मदद लेने के बजाय चीजों को खोजने में काफी समय लगाया। इसलिए मैं अपने काम में प्रभावशाली नहीं रही और दूसरों के जीवन प्रवेश में रुकावट बन गई। मैंने देखा कि मेरा भ्रष्ट स्वभाव गंभीर था और मैं पाखंडी थी। मैंने सोचा कि अनुग्रह के युग में फरीसियों का स्वभाव बाहर से विनम्र और सहनशील दिखता था। वे अक्सर चौराहों पर प्रार्थना करते या लोगों को धर्मशास्त्र समझाते थे। लोगों के दिलों में उनकी अच्छी छवि थी, मगर अंदर से, वे पाखंडी, अहंकारी और दुष्ट थे, उनके मन में परमेश्वर का भय या आज्ञाकारिता नहीं थी, वे परमेश्वर के वचनों का पालन करने के लिए काम नहीं करते थे। इसके बजाय, वे अच्छे व्यवहार और भ्रांतियों से लोगों को धोखा देते थे, ताकि लोग उनकी पूजा और प्रशंसा करें। मैंने देखा कि मैं भी उन फरीसियों जैसी ही थी, मैं परमेश्वर विरोधियों के मार्ग पर चल रही थी।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा। "मसीह-विरोधियों के व्यवहार का सार यह है कि वे लगातार ऐसे बहुत-से साधनों और तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं, जिनसे वे रुतबा हासिल करने और लोगों को जीतने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सकें, ताकि लोग उनका अनुसरण करें और उनका स्तुतिगान करें। संभव है कि अपने दिल की गहराइयों में वे जानबूझकर मानवता को लेकर परमेश्वर से होड़ न कर रहे हों, पर एक बात तो पक्की है, अगर मनुष्यों को लेकर वे परमेश्वर के साथ होड़ न भी कर रहे हों तो भी वे मनुष्यों के बीच रुतबा और शक्ति पाना चाहते हैं। अगर वह दिन आ भी जाए जब उन्हें यह अहसास होने लगे कि वे परमेश्वर के साथ होड़ कर रहे हैं, और वे अपने-आप पर लगाम लगा लें, तो भी वे यह विश्वास करते हुए कि दूसरों की स्वीकृति और सहमति प्राप्त करके वे वैधता प्राप्त कर लेंगे, कलीसिया में रुतबा प्राप्त करने के लिए दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं। संक्षेप में, भले ही मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उससे वे अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते प्रतीत होते हैं, और परमेश्वर के सच्चे अनुयायी लगते हैं, पर लोगों को नियंत्रित करने और उनके बीच रुतबा और शक्ति हासिल करने की उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं बदलेगी। चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे या करे, चाहे वह लोगों से कुछ भी चाहता हो, वे वह नहीं करते जो उन्हें करना चाहिए, या अपने कर्तव्य उस तरह से नहीं निभाते कि वे परमेश्वर के वचनों और जरूरतों के अनुरूप हों, न ही वे उसके कथनों और सत्य को समझते हुए शक्ति और रुतबे का मोह ही त्यागते हैं। पूरे समय उनकी महत्वाकांक्षा उन पर सवार रहती है, उनके व्यवहार और विचारों को नियंत्रित और निर्देशित करती है, और उस रास्ते को तय करती है जिस पर वे चलते हैं। यह एक मसीह-विरोधी का सार-संक्षेप है। यहाँ क्या बात रेखांकित होती है? कुछ लोग पूछते हैं, 'क्या मसीह-विरोधी वे लोग नहीं हैं जो लोगों को जीतने के लिए परमेश्वर से होड़ करते हैं, और जो उसे नहीं मानते?' वे परमेश्वर को मानने वाले भी हो सकते हैं, वे सही तौर पर उसे मानने वाले और उसके अस्तित्व में विश्वास रखने वाले हो सकते हैं, वे उसका अनुसरण करने और सत्य की खोज के इच्छुक भी हो सकते हैं, पर एक चीज कभी नहीं बदलेगी : वे शक्ति और रुतबे की अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग कभी नहीं करेंगे, न ही वे अपने वातावरण के कारण या अपने प्रति परमेश्वर के रवैये के कारण इन चीजों का पीछा करना छोड़ेंगे। ये एक मसीह-विरोधी की विशिष्टताएँ हैं" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों को भ्रमित करने, फुसलाने, धमकाने और नियंत्रित करने का काम करते हैं')। परमेश्वर कहता है, मसीह-विरोधी शोहरत और रुतबे के पीछे भागते हैं, ताकि लोग उनका अनुसरण करें और वे लोगों को काबू में करने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर सकें। वे लोगों पर काबू पाने को परमेश्वर से होड़ करते हैं। मैं बिल्कुल इसी मार्ग पर चल रही थी। मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, उससे प्रेम करना चाहती थी, यह भी जानती थी कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर की सत्ता है और वह सर्वोपरि है। वह सृष्टिकर्ता है और हमें उसे पूजना चाहिए, रुतबे और लोगों के लिए उससे होड़ नहीं करनी चाहिए। मगर मैं अपने काम के ज़रिए लोगों से अपनी प्रशंसा और पूजा करवाना चाहती थी, उनके दिलों में जगह बनाना चाहती थी। क्या यह चुने हुओं के लिए परमेश्वर से होड़ करना नहीं है? जब लोग मेरी पूजा करेंगे, तो उनके दिलों में परमेश्वर के लिए जगह नहीं होगी, कोई समस्या होने पर, वे परमेश्वर पर भरोसा करके उससे प्रार्थना करने के बजाय मेरे पास आएंगे। मैंने लोगों को खुद के पास ले आई, मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी। मैंने धार्मिक जगत के पादरियों और एल्डरों के बारे में सोचा, कैसे वे सुसमाचार का प्रचार करते, बाइबल समझाते, आशीष देते और कुछ अच्छे कर्म भी करते हैं, फिर भी उनका उद्देश्य यही होता है कि विश्वासी उनके बारे में ऊँचा सोचें, उनका अनुसरण करें। विश्वासी अपने मन के सवाल लेकर पादरी के पास जाते और उनका मार्गदर्शन मानते हैं। प्रभु के आगमन की बात सुनकर भी वे खोज या छानबीन करना नहीं चाहते, वे अपने पादरी की सहमति मांगते हैं। क्या यह खुद को परमेश्वर बनाना नहीं? ये धार्मिक अगुआ लोगों पर मजबूत पकड़ बनाये रखते हैं, उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं होती, वे खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करते हैं। मैं भी वैसी ही थी। मैं चाहती थी कि भाई-बहन मेरा अनुसरण करें, मुझे पार्टनर नहीं चाहिए थी, मैं लोगों को लुभाकर उनके बीच रुतबा हासिल करना चाहती थी, मैंने उनसे कहा, वे कोई भी समस्या लेकर मेरे पास आ सकते हैं और मैं उनकी मदद करूंगी। क्या इसका मतलब यह नहीं कि मैं उन्हें काबू में करना चाहती थी? दरअसल, मुझे विश्वास रखे थोड़ा ही समय हुआ है और मुझे अनुभव भी कम है। मुझे भाई-बहनों की हालत और समस्याओं की गहरी समझ नहीं थी। मैं अकेले उनकी मदद नहीं कर सकती थी, फिर भी मैंने मदद के लिए अगुआ से नहीं पूछा। मैं बहुत अहंकारी और नासमझ थी। तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा प्रदर्शन और बर्ताव मसीह-विरोधी जैसा ही था। पहले, जब हम सभाओं में मसीह-विरोधियों की बात करते थे, तो इससे मुझे घबराहट होती थी, क्योंकि मुझे मसीह-विरोधी होने का डर रहता था, मगर मुझे यह भी लगता था कि सिर्फ ऊँचे स्तर के अगुआ ही मसीह-विरोधी बन सकते हैं, एक टीम अगुआ के तौर पर, ऊँचे रुतबे के बिना मैं उस मार्ग पर नहीं चल सकती। मगर मुझे एहसास हुआ कि यह सोच गलत थी। परमेश्वर के वचनों के न्याय के बिना मुझे कभी पता नहीं चलता, मैं और बुरे कर्म करती थी और फरीसियों की तरह परमेश्वर द्वारा ठुकराकर हटा दी जाती। इसे समझने में मार्गदर्शन और प्रबोधन के लिए मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया। मैं जानती थी मुझे शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे न भागकर, पश्चाताप करना होगा, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना होगा।

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर लोगों से यह अपेक्षा नहीं करता कि उनमें एक निश्चित संख्या में कार्य पूरे करने की क्षमता हो या वे कोई महान उपक्रम संपन्न करें, न ही वह उनसे किन्हीं महान उपक्रमों का प्रवर्तन करवाना चाहता है। परमेश्वर बस इतना चाहता है कि लोग ज़मीनी तरीके से वह सब करें, जो वे कर सकते हैं, और उसके वचनों के अनुसार जिएँ। परमेश्वर यह नहीं चाहता कि तुम कोई महान या माननीय बनो, न ही वह चाहता है कि तुम कोई चमत्कार करो, न ही वह तुममें कोई सुखद आश्चर्य देखना चाहता है। उसे ऐसी चीज़ें नहीं चाहिए। परमेश्वर बस इतना चाहता है कि तुम मजबूती से उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करो। जब तुम परमेश्वर के वचन सुनते हो तो तुमने जो समझा है वह करो, जो समझ-बूझ लिया है उसे क्रियान्वित करो, जो तुमने देखा है उसे याद रखो और सही समय आने पर परमेश्वर के कहे अनुसार अभ्यास करो, ताकि परमेश्वर के वचन तुम्हारी जीवन-शैली और तुम्हारा जीवन बन जाएँ। इस तरह, परमेश्वर संतुष्ट होगा। तुम हमेशा महानता, कुलीनता और प्रतिष्ठा ढूँढ़ते हो; तुम हमेशा उन्नयन खोजते हो। इसे देखकर परमेश्वर को कैसा लगता है? वह इससे घृणा करता है और इसकी तरफ देखना भी नहीं चाहता। जितना अधिक तुम महानता और कुलीनता जैसी चीज़ों के पीछे भागते हो; दूसरों से बड़ा, विशिष्ट, उत्कृष्ट और महत्त्वपूर्ण होने का प्रयास करते हो, परमेश्वर को तुम उतने ही अधिक घिनौने लगते हो। यदि तुम आत्म-चिंतन करके पश्चाताप नहीं करते, तो परमेश्वर तुम्हें तुच्छ समझकर त्याग देगा। सुनिश्चित करो कि तुम ऐसे व्यक्ति न बनो जिससे परमेश्वर घृणा करता है; बल्कि ऐसे इंसान बनो जिसे परमेश्वर प्रेम करता है। तो इंसान परमेश्वर का प्रेम कैसे प्राप्त कर सकता है? सत्य को व्यावहारिक तरीके से ग्रहण करके, सृजित प्राणी के स्थान पर खड़े होकर, एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए परमेश्वर के वचन पर दृढ़ता से भरोसा करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करके और एक सच्चे की इंसान की तरह जीवन जी कर। इतना काफी है। मन में किसी तरह की महत्वाकांक्षा न पालो या बेकार के सपने न देखो, प्रसिद्धि, लाभ और हैसियत के पीछे न भागो या भीड़ से अलग दिखने की कोशिश न करो। इसके अलावा, ऐसे महान या अलौकिक व्यक्ति बनने की कोशिश न करो, जो लोगों में श्रेष्ठ हो और दूसरों से अपनी पूजा करवाता हो। यही भ्रष्ट इंसान की इच्छा होती है और यह शैतान का मार्ग है; ऐसे सृजित प्राणियों को परमेश्वर नहीं बचाता। इसके बावजूद अगर कुछ लोग प्रसिद्धि, लाभ और हैसियत के पीछे भागते हैं और पश्चाताप नहीं करते, तो उनका कोई इलाज नहीं है, उनका केवल एक ही परिणाम होता है : हटा दिया जाना। आज, अगर तुम लोग शीघ्रता से क्रम उलट दो और पश्‍चात्ताप का अभ्यास करो, तो अभी भी समय है; लेकिन जब वह दिन आएगा और परमेश्वर का काम समाप्त होगा, और आपदाएँ बरसेंगी, तब जो लोग यश, लाभ और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे होंगे और पश्चात्ताप करने से इनकार करेंगे, वे सब हटा दिए जाएँगे। तुम सब लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य किस तरह के लोगों को बचाता है, और उसके द्वारा मनुष्य के उद्धार का क्या अर्थ है; मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह परमेश्वर के वचनों को सुनने के लिए उसके सामने आए, परमेश्वर के कथन और उसकी आज्ञा के अनुसार कार्य करे और जिए, न कि अपने ही इरादों या शैतान के तर्क के अनुसार कार्य करे और जिए। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, और अभी भी शैतान के फलसफों और स्वभावों के अनुसार जीते रहते हो, और पश्चात्ताप करने से इनकार करते हो, तो तुम उस तरह के व्यक्ति नहीं हो जिसे परमेश्वर बचाता है। जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर द्वारा चुने भी गए हो—तो परमेश्वर द्वारा तुम्हें चुने जाने का क्या अर्थ है? यह तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनाना है, जो परमेश्वर पर भरोसा करता है, जो वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण करता है, जो परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग सकता है, और जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम है, जिसने शैतान के तर्क को एक तरफ रख दिया है, जिसने अपना शैतानी स्वभाव त्याग दिया है, और जो भ्रष्ट स्वभाव के अधीन नहीं रहता। अगर तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो और परमेश्वर के घर में कोई न कोई कर्तव्य निभाते हो, फिर भी हर मामले में परमेश्वर के विरुद्ध खड़े रहते हो, और हर मामले में उसके वचनों के अनुसार कार्य नहीं करते या नहीं जीते, तो क्या परमेश्वर तुम्हें स्वीकार कर सकता है? बिलकुल नहीं। इससे मेरा क्या आशय है? कर्तव्य निभाना वास्तव में कठिन नहीं है, और न ही उसे निष्ठापूर्वक और स्वीकार्य मानक तक करना कठिन है। तुम्हें अपने जीवन का बलिदान या कुछ भी समस्यात्मक नहीं करना है, तुम्हें केवल ईमानदारी और दृढ़ता से परमेश्वर के वचनों और निर्देशों का पालन करना है, इसमें अपने विचार नहीं जोड़ने या अपना खुद का कार्य संचालित नहीं करना, बल्कि सही रास्ते पर चलना है। अगर लोग ऐसा कर सकते हैं, तो उनमें मूल रूप से एक मानवीय सदृशता है। जब उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता होती है, और वे ईमानदार व्यक्ति बन जाते हैं, जो उनमें एक मनुष्य की सदृशता होगी" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'उचित कर्तव्यपालन के लिए आवश्यक है सामंजस्यपूर्ण सहयोग')। परमेश्वर के वचनों से मुझे उसकी इच्छा समझने में मदद मिली। आज, परमेश्वर ने लोगों को बचाने के लिए बहुत से वचन बोले हैं, इस उम्मीद में कि उसके वचनों को सुनकर हम अभ्यास करें, सृजित प्राणियों की अपनी जगह लें, उसके वचनों और उसकी इच्छा के अनुसार कर्तव्य निभाएं, अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाकर बचाये जा सकें। अपने कर्तव्य के प्रति हमारी मंशाएं सही होनी चाहिए, हमें अपनी इज़्ज़त और रुतबे को बनाये रखने के लिए निजी उद्यम नहीं चलाना चाहिये। हमें निष्ठा से सत्य की खोज कर, सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से आखिर मुझे अभ्यास का मार्ग मिल गया।

कुछ दिनों बाद, एक बहन ने मुझे अपनी परेशानियों के बारे में बताते हुए मुझसे मदद माँगी। यह समस्या मेरे लिए थोड़ी मुश्किल थी। इसे हल करना मुझे नहीं आता था। मुझे यह भी एहसास था कि मैं पहले जैसा बर्ताव नहीं कर सकती, अपनी काबिलियत दिखाने के लिए अगुआ से सहयोग करने को मना नहीं कर सकती, इसलिए मैंने इस समस्या के बारे में अपनी अगुआ से पूछा। मैंने कहा, "मैं इस समस्या को हल नहीं कर सकती। क्या आप मेरी मदद करेंगी?" अगुआ ने परमेश्वर के वचनों के उपयुक्त अंश ढूंढकर मुझे भेजा, और हमने साथ मिलकर समस्या को हल किया। उसके बाद, जब भी मुझे कोई समस्या होती, तो मैं अपनी अगुआ से पूछती और उसके साथ सहयोग करती, अब मैं पहले की तरह अकेले काम नहीं करती। मुझे लगता है कि भाई-बहनों की मदद करने का मेरा रवैया बदल गया है। इससे पहले, मैं यह सब अपनी छवि और रुतबे के लिए करती थी, कभी अपनी अगुआ से नहीं पूछती थी। मुझे डर था कि उसने समस्या सुलझाई, तो कोई मेरा आदर नहीं करेगा। अब, मुझे इसकी परवाह नहीं रहती कि वे मेरा आदर करेंगे या नहीं। इसके बजाय, मैं अपने भाई-बहनों की समस्याओं को बेहतर ढंग से हल करने के बारे में सोचती हूँ, अपनी अगुआ के साथ पूरा सहयोग करती हूँ। इस तरह अभ्यास करने से मुझे काफी सुकून का एहसास हुआ।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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