निकाले जाने से पहले का आत्मचिंतन

05 फ़रवरी, 2023

2014 में, मैं कलीसिया में वीडियो बनाने का काम करती थी। जल्दी ही, मुझे समूह अगुआ बना दिया गया। अच्छे वीडियो बनाने के लिए मैं सिद्धांतों पर विचार कर, प्रार्थना और खोज करती थी, हर शॉट के प्रति गंभीर थी। कुछ समय बाद, मेरे बनाए ज्यादातर वीडियो इस्तेमाल के लिए चुने गए, भाई-बहन मुझे प्रशंसा की नजरों से देखने लगे। मैं खुद को कलीसिया के बेहतरीन सदस्यों में से एक समझने लगी, वरना मुझे तरक्की नहीं दी जाती। कुछ हफ्तों बाद, सुपरवाइजर ने दूसरे समूह के वीडियो प्रॉडक्शन की जिम्मेदारी देते हुए खास तौर पर मुझसे कहा : "परमेश्वर के वचनों का अनुभव और सिद्धांतों का पालन करने में भाई-बहनों का मार्गदर्शन करना।" मुझे बहुत खुशी महसूस हुई। सुपरवाइजर ने मुझे मार्गदर्शन करने के लिए कहा, इसका मतलब मेरे पास खूबियां थीं और मैं काबिल थी। समूह में आने के बाद पता चला कि कुछ भाइयों को अच्छे से वीडियो बनाना नहीं आता था। एक बहन ठीक-ठाक थी, पर वह नई थी, सभी पहलुओं में उसे कम अनुभव था। सिर्फ समूह अगुआ ही हर काम में थोड़ा-बहुत अच्छे था। सभाओं में परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए, समूह अगुआ मेरी तरह सटीक या व्यवस्थित नहीं था, वीडियो बनाने पर चर्चा करते हुए उसका नजरिया सीमित था। अक्सर, सभी लोग मेरा सुझाव मान लेते थे, तो मैं खुद को और भी काबिल समझने लगी। कुछ चर्चाओं में, जब समूह अगुआ मुझसे अलग कोई सुझाव देता तो मैं उसे बिल्कुल बेकार समझती थी। मन-ही-मन सोचती, "सालों से ये कर्तव्य निभाने के बाद क्या मैं सही-गलत नहीं जानती?" मैं अपने सुझाव पर अड़ी रहती, समूह अगुआ से बहुत चिढ़ जाती। एक बार जब हम वीडियो बनाने के बारे में चर्चा कर रहे थे, तो मैंने कुछ सुझाव दिए, जो समूह अगुआ को पसंद नहीं आए। मेरा खून खौलने लगा, मुझे लगा उसने मेरे सुझावों को इसलिए ठुकराया ताकि मैं बुरी दिखूँ। मैंने पीठ-पीछे उसकी शिकायत की, "पता नहीं वो क्या चाहते है, खुद के पास तो अच्छे सुझाव थे नहीं, पर मेरे सुझाव ठुकरा दिए, इसलिए सुबह से एक काम नहीं हुआ। क्या वो काम में देरी नहीं कर रहा?" मेरी बात सुनकर सभी भाई-बहनों को लगने लगा कि समूह अगुआ में ही कोई समस्या थी। एक भाई ने उसके साथ संगति की, अहंकारी होने और काम पर असर डालने को लेकर आलोचना की। समूह अगुआ ने खुद को दोषी मानकर काम छोड़ना चाहा। यह देखकर मुझे भी अपराध-बोध हुआ, लगा इस बार मैंने हद पार कर दी, मैंने फौरन उससे माफी मांगी। मगर इसके बाद आत्मचिंतन नहीं किया।

एक दिन, एक कलीसिया अगुआ सभा में आई, और हमसे वीडियो बनाने के काम के बारे में पूछा। मैंने कुछ सुझाव दिए जिन्हें अगुआ ने मान लिया, उन्होंने सभी से कहा कि वे मेरे सुझाव मानें और उन पर काम करते वक्त उन्हें और बेहतर करें। मैंने मन-ही-मन सोचा, "अगुआ ने मेरे सुझावों को माना, यानी मैं दूसरों से काबिल हूँ, तो सभी को मेरी बात माननी चाहिए।" इसके बाद, मैं ही समूह का सारा काम व्यवस्थित करती, जब किसी को कोई समस्या आती तो वे चर्चा करने के लिए मेरे पास आते। मैंने खुद को समूह का आधार बना लिया। मैं ही समूह को चला रही थी, समूह अगुआ बस नाम के अगुआ थे। आखिरी फैसला मेरा ही होता था। जब वीडियो जैसा मैं चाहती वैसा नहीं बन पाता था, तो मैं सीधे उन्हें अपने हिसाब से बदल देती। एक बार, भाई वांग यी ने देखा कि मैंने उनके बनाये वीडियो में काफी बदलाव किये थे, तो उन्होंने मुझसे पूछा, "आपने इतने सारे बदलाव क्यों किये? इतनी समस्या थी, तो साथ में उस पर चर्चा कर सकते थे। आपने बदलाव से पहले मेरी राय क्यों नहीं मांगी?" उनके सवालों से मैं थोड़ी शर्मिंदा हुई, पर फिर मैंने सोचा "मैं आपसे ज्यादा काबिल हूँ, मुझे सिद्धांतों की बेहतर समझ है, मेरे बदलावों से वीडियो बेहतर ही बना है।" मैंने कड़ाई से जवाब दिया, "क्या मेरे किये सभी बदलाव बेहतर परिणाम के लिए नहीं थे? अगर आपको ये स्वीकार नहीं हैं, तो अगली बार से मैं पहले आपके साथ चर्चा करूँगी।" वो कुछ कर नहीं सकते थे। इसके बाद से मैं अपने कर्तव्य में और भी ज्यादा अहंकारी बनती गई। काम की चर्चा करते हुए मैं दूसरे भाई-बहनों के सुझाव नहीं सुनती, मुझे लगता था उनके पास अच्छे सुझाव नहीं होंगे, आखिर में मैं जो चाहूंगी वही होगा। कभी-कभी, जब वे मेरी योजनाओं को लेकर आशंका जाहिर करते, तो मैं पूरे विश्वास से जवाब देती : "अगर आपको मेरा सुझाव नहीं पसंद, तो किसी के पास बेहतर सुझाव है?" उनके हाथ बंधे थे, जो मैं कहती उन्हें वही करना पड़ता था। समय के साथ, सबने मेरे सुझावों का विरोध करना बंद कर दिया। हर कोई मुझसे सहमत होकर बस सिर हिला देता।

कुछ समय तक, हमारे वीडियो पुनरीक्षण में कई बार असफल हुए, उनमें साफ तौर पर सिद्धांतों का उल्लंघन था। भाई-बहनों ने खुद को दोषी माना, सोचा कि उन्होंने कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया, मगर मैंने आत्मचिंतन नहीं किया। मुझे लगा मैंने अच्छा काम किया, पर हमारी काबिलियत सीमित थी, तो मानकों पर खरा नहीं उतरना सामान्य था। तबसे, मेरा कर्तव्य अधिक मुश्किल लगने लगा, मुझे हमेशा नींद आती। एक बहन ने मुझे चेताया, "आपको आत्मचिंतन करना चाहिए। आजकल आप सबसे अपनी मनमानी करवाती हैं—क्या यह अहंकार नहीं है?" यह जानकर कि मैं अहंकारी और तानाशाह हो गई थी, दूसरों की संगति नहीं सुनती थी, अगुआ मुझसे कड़ाई से निपटी। आत्मचिंतन न करते देख, उन्होंने मुझे बर्खास्त कर दिया। मैं जैसे सुन्न थी, परमेश्वर की तरफ मुड़ना नहीं जानती थी। लगा मुझमें खूबियां थीं तो कलीसिया जल्दी काम सौंपगी। मैं वीडियो बनाने के तरीके सीखती रही ताकि समय के साथ मेरा अभ्यास कम न हो। मगर जब भी मैं कोई वीडियो बनाने की तैयारी करती, तो कुछ न सूझता। बहुत सोचने के बाद भी कोई तरीका न सूझता—सब कुछ धुंधला था। मुझे लगता था मेरी सोच व्यापक है, मैं तेज हूँ। अब मैं कुछ बना क्यों नहीं पा रही? फिर मुझे परमेश्वर के वचन याद आये : "परमेश्वर इंसान को गुण प्रदान करता है, उन्हें विशेष हुनर और साथ ही विवेक और बुद्धि देता है। इंसान को इन गुणों का इस्तेमाल किस प्रकार से करना चाहिए? तुम्हें अपने विशेष हुनर, गुणों, विवेक और बुद्धि को अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित करना चाहिए। तुम्हें अपने कर्तव्य में अपना दिल इस्तेमाल करना चाहिए और जो कुछ भी तुम जानते हो, जो कुछ भी तुम समझते हो, और जो कुछ भी तुम हासिल कर सकते हो, उसे लागू करना चाहिए। ऐसा करके तुम धन्य हो जाओगे। परमेश्वर का आशीष पाने का क्या अर्थ है? इससे लोगों को क्या महसूस होता है? यह कि उन्हें परमेश्वर ने प्रबुद्ध कर उनका मार्गदर्शन किया है, और अपना कर्तव्य निभाते हुए उनके पास एक मार्ग होता है। ... जब परमेश्वर किसी को आशीष देता है, तो वह बुद्धिमान और समझदार, सभी मामलों में कुशाग्रबुद्धि, और साथ ही तेज, सतर्क और विशेष रूप से कुशल बन जाता है; जो कुछ भी वह करता है, उसमें उसके पास कौशल होता है और वह प्रेरित होता है, और वह सोचता है कि वह जो कुछ भी करता है, वह बहुत आसान है और कोई भी कठिनाई उसे बाधित नहीं कर सकती—उसे परमेश्वर का आशीष प्राप्त है। अगर किसी को सब-कुछ बहुत कठिन लगता है, और चाहे वह कुछ भी कर रहा हो, वह अनाडी, हास्यास्पद और अनजान रहता है, और चाहे उससे कुछ भी कहा जाए, वह उसे नहीं समझता, तो इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उसके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष नहीं है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, ईमानदार होकर ही व्यक्ति सच्चे मनुष्य की तरह जी सकता है)। परमेश्वर के वचन मेरे लिए चेतावनी की घंटी थे। जब हम सही मार्ग पर होते हैं, तो परमेश्वर हमें आशीष देता है, हम अपनी खूबियों और गुणों का इस्तेमाल कर पाते हैं। सही मार्ग पर न होने पर, पवित्र आत्मा हम पर काम नहीं करता, फिर हममें चाहे कितने ही गुण या खूबियां हों, कोई फायदा नहीं होता। परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना, इंसान की खूबियाँ और गुण बेकार हैं। पहली बार वीडियो बनाना शुरू किया, तब मेरा रवैया सही था, मेरा ध्यान सिद्धांत समझने पर था, तो परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया। कोई कौशल विकसित करना हो या सिद्धांत सीखना, वह मेरी आँखें खोल देता था। अब एहसास हुआ कि यह सब परमेश्वर की आशीष थी। मगर मैं पवित्र आत्मा का कार्य नहीं पहचान पाई। थोड़े नतीजे मिलते ही मैंने खुद को खास समझ लिया। मैं अपनी काबिलियत और चालाकी के बलबूते दूसरों को नीचा समझने लगी, उनके सुझाव सुनने से भी मना कर दिया। इस लिए पवित्र आत्मा ने मुझे त्याग दिया—मैं अंधकार में गिर गई और कर्तव्य में कुछ भी हासिल नहीं कर पाई। पहले, लगता था मैं प्रतिभाशाली हूँ, मगर फिर देखा कि मैं तो कभी किसी से बेहतर थी ही नहीं। मैं पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन से वीडियो बना पायी। अब, उसके कार्य के बिना, मैं कुछ नहीं कर पा रही थी। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। फिर एहसास हुआ मैं कितनी अधम और दयनीय थी।

फिर चिंतन में मैंने ईश-वचनों का यह अंश पढ़ा : "अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतने ही ज्यादा अविवेकी होते हैं, और वे जितने ज्यादा अविवेकी होते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्‍वर का प्रतिरोध किए जाने की संभावना होती है। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं, और उनके दिलों में परमेश्वर का कोई भय नहीं होता। भले ही लोग परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ—एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। जो लोग अहंकारी और दंभी होते हैं, खास तौर से वे, जो इतने घमंडी होते हैं कि अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसके प्रति समर्पित नहीं हो पाते, यहाँ तक कि बढ़-बढ़कर खुद के लिए गवाही देते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और उन्हें परमेश्वर का बिलकुल भी भय नहीं होता" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। मैंने अपने व्यवहार की तुलना परमेश्वर के वचनों से की। लगातार तरक्की मिलने पर मुझे खुद पर बहुत गर्व होने लगा था। लगा कलीसिया मेरी प्रतिभा के बिना कुछ नहीं कर पाएगी। जब सुपरवाइजर ने मुझे भाई-बहनों के वीडियो बनाने के काम की ज़िम्मेदारी दी, तो मैं और अहंकारी बन गई, खुद को दूसरों से बेहतर समझा। जब समूह अगुआ मेरे सुझावों पर अपनी राय देता, तो मैं उन्हें पूरी तरह ठुकरा देती थी। सोचती कि मुझसे असहमत होकर वो मुझे नीचा दिखाना और मेरी छवि खराब करना चाहता है, तो मैंने पीठ पीछे उसकी आलोचना की, जिस कारण दूसरे उसकी आलोचना करने लगे और उसका निपटान किया। फिर वो मेरे आगे बेबस हो गया, मेरी समस्याएँ बताना बंद कर दिया। मैं ही कानून थी, कोई मुझसे असहमत होने की हिम्मत न करता। अहंकार में मैंने सबको नीची नजरों से देखा, मैं तानाशाह और घमंडी थी, किसी के सुझाव नहीं सुनती थी। इसी वजह से हम अपने वीडियो में सिद्धांतों से भटक गये, एक महीने तक कोई काम नहीं हो पाया। यह कलीसिया के वीडियो-कार्य बहुत बड़ी रुकावट थी। यह छोटी-मोटी गलती नहीं, बल्कि कुकर्म और परमेश्वर का विरोध था! फिर एहसास हुआ कि मैं अहंकारी स्वभाव के कारण ही परमेश्वर का विरोध कर रही थी। कलीसिया से निकाले गए मसीह-विरोधी अहंकार में समझ खो देते हैं, किसी की नहीं सुनते। वे कलीसिया के कार्य में रुकावटें डालते हैं, पश्चात्ताप भी नहीं करते। अंत में निकाले जाते हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अहंकारी स्वभाव में जीकर घमंडी बन जाऊँगी, और कलीसिया के महत्वपूर्ण कार्य इतनी रुकावट डालूँगी। अनजाने में मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी। कुछ दिनों तक मैं भय की हालत में जीती रही, इस एहसास के साथ कि इतना बड़ा कुकर्म करने पर मेरा निकाला जाना तय था, मैं हताश हो गई। मेरे पापा ने मुझे ईश-वचनों का एक अंश सुनाया जिसने मेरे दिल को छू लिया। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता, मानो परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठंड में छोड़ दिया हो, या परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी गलतफहमी या बोझ के, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने का प्रयास करने के मार्ग पर साहसपूर्वक दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ। चाहे तुमने जो भी गलतियाँ की हों, चाहे तुम कितनी भी दूर तक भटक गए हो या तुमने कितने भी गंभीर अपराध किए हों, इन्हें वह बोझ या फालतू सामान मत बनने दो, जिसे तुम्हें परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में ढोना पड़े। आगे बढ़ते रहो। हर वक्त, परमेश्वर मनुष्य के उद्धार को अपने हृदय में रखता है; यह कभी नहीं बदलता। यह परमेश्वर के सार का सबसे कीमती हिस्सा है" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। दिल को सुकून देने वाले परमेश्वर के स्नेह भरे वचनों को सुनकर, मैं अपने आँसुओं को न रोक पाई। मैं अहंकारी स्वभाव के साथ जी रही थी, मैंने वीडियो कार्य में रुकावट डाली, पर आसपास के लोगों ने मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाये, ताकि मैं उसकी इच्छा समझ सकूँ, मुझे अभ्यास का मार्ग मिल जाए। यह परमेश्वर का प्रेम था। मगर मैं न परमेश्वर की इच्छा समझी, न उसकी ओर मुड़ी। मैंने उसे गलत समझा और दोषी ठहराया। मुझमें जमीर नहीं था। अपने कुकर्मों के बारे में सोचकर लगा मैं दोषी हूँ, मुझे काफी अफसोस हुआ, पर मैं अपने अपराधों से बेबस होकर निराशा और गलतफहमी में नहीं जीना चाहती थी, तो मैंने सत्य खोजने, पश्चात्ताप करने, और खुद को बदलने के लिए प्रार्थना की। मुझे हैरानी हुई जब छह महीने बाद, अगुआ ने मुझे फिर से वीडियो बनाने को कहा। मैं बहुत आभारी थी। मैंने कसम खाई मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभाकर अपने पिछले अपराधों की भरपाई करूँगी। इस बार मैं अपने कर्तव्य में पहले जितनी अहंकारी या अड़ियल नहीं थी। मैं अक्सर दूसरों के साथ काम पर चर्चा करती, सत्य के सिद्धांत खोजती, किसी की राय अलग होने पर मैंने खुद को अनदेखा कर उनके सुझावों को सुनना सीखा। मैं वीडियो बनाने में ज्यादा से ज्यादा कामयाब होती गयी।

पर अच्छी चीजें कहाँ टिकती हैं। जब मैंने देखा कि मैं वीडियो कार्य में अच्छा कर रही थी, तो अनजाने में मेरा अहंकार फिर से सिर उठाने लगा। मैं एक बहन के साथ वीडियो बनाने का काम कर रही थी, पर मुझे उनके विचार बहुत पुराने लगते, तो मैं उनके सुझावों को अनदेखा कर उन्हें तवज्जो नहीं देती थी। बाद में, उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है मैं उनका साथ नहीं दे रही, तब जाकर मैंने उनकी बात सुनी, पर जब उनका काम अच्छा नहीं हुआ, तो मैंने उन्हें तिरस्कार से देखा। मैंने बहुत कठोरता से उन्हें उनका काम बताया, वे बेबस महसूस करने लगीं। एक और बार, जब समूह अगुआ ने मेरे बनाए वीडियो को लेकर एक सुझाव दिया, तो मैंने सोचा, "तुम सिद्धांतों को मुझसे बेहतर नहीं समझतीं, और न ही तुम्हारी काबिलियत मुझसे बेहतर है। मुझे तुम्हारे सुझाव की क्या जरूरत?" फिर मैंने बिना सोचे उनका सुझाव ठुकरा दिया। यह देखकर कि मैं जरा भी ग्रहणशील नहीं थी, समूह अगुआ ने अपने अनुभव से मेरा मार्गदर्शन किया ताकि मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझ सकूँ, पर मैं प्रतिरोधी बन गई और इसे स्वीकार नहीं किया। एक और समूह अगुआ ने मेरे साथ संगति करके मेरे तानाशाह व्यवहार और दूसरों के सुझाव न मानने को लेकर मेरी आलोचना की। मगर मैं स्वीकार नहीं कर पाई, "आप चाहते हैं कि मैं आपके सुझाव मान लूँ। जब मेरे सुझाव सही थे, तो मैं उन्हें ठुकराकर आपके सुझाव क्यों मानूँ?" मैंने मुँह बनाया पर कुछ नहीं कहा, माहौल खराब हो गया, सभा को जल्दी खत्म कर दिया गया। मैं अहंकारी और जिद्दी थी, दूसरों के सुझाव नहीं मानती थी, तो मैंने कर्तव्य में कुछ हासिल नहीं किया और बर्खास्त हो गई। घर लौटकर मैं बहुत दुखी हो गई। मैंने सोचा, "मैं पुराने ढर्रे पर क्यों लौट आई? मैं अहंकारी नहीं बनना चाहती थी, पर खुद को रोक नहीं पाई। लगा जैसे यही मेरी प्रकृति, मेरा सार है, मैं इसे नहीं बदल सकती।" मैंने खुद से उम्मीद छोड़ दी।

मेरी माँ शहर से बाहर थीं, उन्होंने वापस आकर मेरे साथ संगति की, मेरे आत्मचिंतन के बारे में पूछा। उन्होंने मेरी बात सुनी, फिर सिर हिलाकर मुझसे कहा, "तुमने अपनी अहंकारी प्रकृति, कुकर्म, परमेश्वर के विरोध की बात मानी, पर क्या तुमने खुद को पहचानकर पश्चात्ताप किया? ऐसा कैसे है कि इतने सालों से खुद को जानने के बाद भी तुम्हारे अहंकार में कोई बदलाव नहीं आया? इसकी वजह है कि तुम्हारा आत्मज्ञान उथला है, तभी स्वभाव में बदलाव नहीं हुआ! परमेश्वर के वचनों को इकट्ठा कर, इसके मूल से आत्मचिंतन करो। क्या तुमने कभी अपनी आस्था पर चिंतन किया है? एक दशक की आस्था में, तुमने किसके आगे समर्पण किया है? किसका आदर किया है? तुम हर मोड़ पर संघर्ष करती रही, सबसे मुकाबला करके खुद का दिखावा करना चाहा। कलीसिया अगुआ रहते हुए दो बार बर्खास्त होने को छोड़कर तुमने हमेशा खुद को ऊँचा उठाया और दूसरों की सराहना पानी चाही। दो साल पहले, जब तुम वीडियो बना रही थी, तुमने समूह अगुआ को नीचा दिखाया, खुलेआम उनसे होड़ की। नतीजतन, दो महीनों तक समूह कुछ भी हासिल नहीं कर पाया। क्या तुमने आत्मचिंतन किया? दूसरों ने कई बार तुम्हें समझाया—पर क्या तुमने कभी स्वीकारा?" माँ के सवालों ने मेरा सीना छलनी कर दिया—वे सवाल बेहद तीखे थे। मैं जानती थी उनकी हर बात सच थी, क्या कहूँ समझ नहीं आया। फिर उन्होंने निराश होकर कहा, "तुम्हें बर्खास्त हुए इतना समय हो गया है, अब तक सच में आत्मचिंतन क्यों नहीं किया? तुमने सत्य को नहीं स्वीकारा है। तुम जहाँ कर्तव्य निभाती हो वहाँ शांति नहीं रहती। यह एक गंभीर समस्या है! इतने सालों से विश्वासी रहकर भी तुम्हारे व्यवहार, तुम्हारी अहंकारी प्रकृति, तुम्हारे कुकर्म, सत्य को न स्वीकारने, आत्मचिंतन न करने के कारण तुम्हारा निकाला जाना पक्का है।" निकाले जाने की बात सुनकर, मैं रो पड़ी। मुझे बहुत पीड़ा होने लगी : "क्या मुझे वाकई निकाल दिया जाएगा? क्या वाकई मेरी आस्था के मार्ग का अंत होने वाला है? क्या मुझे हमेशा के लिए कलीसिया से दूर कर दिया जाएगा? मैंने इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास किया, बहुत सारे कष्ट सहे, मुझे कैसे निकाल सकते हैं?" लगा मेरे साथ अन्याय हो रहा है, मैं दुखी हो गई। मेरी माँ मेरे साथ संगति करती रही, पर मैं नहीं सुन पा रही थी। कुछ दिनों तक, मैं लगातार रोती रही। कलीसिया मुझे निकाल देगी, यह विचार ही बेहद पीड़ादायी था। मैंने जिंदा लाश की तरह अपने दिन बिताये, कुछ भी करने की ताकत खो चुकी थी।

एक बार, मेरे पापा एक सभा से वापस लौटे तो मैंने उनसे पूछा, "क्या मैं निकाल दी जाऊँगी?" उन्होंने सख्त लहजे में कहा, "अभी जरूरी यह है कि तुम इसे कैसे देखती हो। अगर तुम्हें निकाल दिया गया, क्या तब भी परमेश्वर में विश्वास करोगी? अगर तुम्हें सच में पछतावा है, तो पश्चात्ताप करो, और सत्य खोजो, फिर निकाला जाना भी तुम्हारे लिए एक उद्धार होगा। अगर निकाले जाने पर तुम हार मान लोगी, तो तुम्हें पूरी तरह से उजागर करके त्याग दिया जाएगा। क्या तुम हार मान लेना चाहती हो? क्या तुम सत्य खोजकर पश्चात्ताप करना नहीं चाहती, अपने अंत को बचाना नहीं चाहती?" मेरे पापा की बातों ने मेरी आँखें खोल दीं। वो सही थे। क्या निकाले जाने के बाद भी मैं एक सृजित प्राणी नहीं रहूँगी? मुझसे परमेश्वर के वचन पढ़ने और सत्य खोजने का हक कोई नहीं छीन सकता। मुझे परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करना था। मैंने परमेश्वर के सामने सिर झुकाकर प्रार्थना की, "परमेश्वर! आज मैं सिर्फ अपनी गलतियों और सत्य खोजने में विफल रहने के कारण इस हालत में हूँ।" बाद में, मैंने विचार किया, "इतने सालों की आस्था में, मैंने कभी सत्य क्यों नहीं खोजा, निकाले जाने की नौबत आने तक कुछ क्यों नहीं समझी? अगर मैंने सत्य खोजने में जरा सी मेहनत कर ली होती, तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचती!" मुझे बहुत अफसोस और पीड़ा हो रही थी। फिर मैंने नीनवे के लोगों के बारे में सोचा, जिन्हें सच में पश्चात्ताप करने पर परमेश्वर की दया मिली। मैंने परमेश्वर के वचनों की किताब में पढ़ा : "यह 'कुमार्ग' मुटठीभर बुरे कार्यों को संदर्भित नहीं करता, बल्कि उस बुरे स्रोत को संदर्भित करता है, जिससे लोगों का व्यवहार उत्पन्न होता है। 'अपने कुमार्ग से फिर जाने' का अर्थ है कि ऐसे लोग ये कार्य दोबारा कभी नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे दोबारा कभी इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; उनके कार्यों का तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और सिद्धांत सब बदल चुके हैं; वे अपने मन को आनंदित और प्रसन्न करने के लिए दोबारा कभी उन तरीकों और सिद्धांतों का उपयोग नहीं करेंगे। 'अपने हाथों के उपद्रव को त्याग देना' में 'त्याग देना' का अर्थ है छोड़ देना या दूर करना, अतीत से पूरी तरह से नाता तोड़ लेना और कभी वापस न मुड़ना। जब नीनवे के लोगों ने हिंसा त्याग दी, तो इससे उनका सच्चा पश्चात्ताप सिद्ध हो गया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप के साथ-साथ उनका हृदय भी देखता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के हृदय में सच्चा पश्चात्ताप देखा जिसमें कोई सवाल नहीं थे, और यह भी देखा कि वे अपने कुमार्गों से फिर गए हैं और उन्होंने हिंसा त्याग दी है, तो उसने अपना मन बदल लिया" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। मुझे भी बहुत प्रेरणा मिली। नीनवे के लोगों ने सच में पश्चात्ताप किया तो परमेश्वर ने उन पर दया की। उनका पश्चात्ताप बस कहने को अपने पाप कबूलना या बाहरी बर्ताव पर ध्यान देना नहीं था। उनका पछतावा पल भर के लिए नहीं था। उन्होंने अपने कामकाज के तरीकों, और अपनी मंशाओं में बदलाव लाया। अपना पुराने अनुसरण त्याग दिया। उन्होंने सिर्फ अपना व्यवहार नहीं बदला, बल्कि सच्चे मन से पश्चात्ताप भी किया। ऐसे पश्चात्ताप से ही हमें परमेश्वर की दया और माफी मिल सकती है। फिर, मैंने अपने बारे में सोचा, मैं हमेशा कहती थी कि मैं अहंकारी थी, पर कभी अपने अहंकारी स्वभाव को काबू में नहीं किया। मुझे पता था मैं कुकर्म करके परमेश्वर के खिलाफ जा रही थी, फिर भी इसे रोका नहीं। मैं निकाले जाने के कगार पर पहुँच गई थी, इसलिए नहीं कि मैंने एक या दो बुरे काम किये, बल्कि इसलिए कि मैं पश्चात्ताप किये बिना बुराई के मार्ग पर भागी जा रही थी। मैंने कभी सत्य पर अमल या पश्चात्ताप नहीं किया। मैं जानती थी मैंने बहुत से अपराध किये थे, मेरा अहंकारी स्वभाव गंभीर था, पर कभी सत्य खोजकर उसे ठीक करने की कोशिश नहीं की। अहंकारी स्वभाव ठीक किए बिना मैं सच्चा पश्चात्ताप कैसे करती? अगर मैंने सच्चा पश्चात्ताप नहीं किया, तो क्या मेरा आत्मज्ञान बस दूसरों को छलने वाला मुखौटा नहीं था? मुझे नीनवे के लोगों जैसा बनना था। मुझे अपने व्यवहार के पीछे छिपी वजहों, मंशाओं, तरीकों और इरादों, पर आत्मचिंतन करके, परमेश्वर से पश्चात्ताप करना था।

मैंने याद किया कि कैसे मेरी माँ ने कुछ दिनों पहले मुझे उजागर किया, कैसे मुझे दो बार बर्खास्त किया गया। मैं इस सोच में डूब गयी। "क्यों मैं अपना अहंकारी स्वभाव देख पाने में तो सक्षम थी, पर जैसे ही कुछ होता, मैं अपने अहंकारी स्वभाव का सहारा लेकर परमेश्वर का विरोध करने लगती?" फिर मैंने भक्ति-कार्य में, परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब तक लोग सत्य और परमेश्वर का उद्धार नहीं स्वीकारते, तब तक वे जितने भी विचार स्वीकारते हैं, वे सब शैतान से उत्पन्न होते हैं। सभी विचार, दृष्टिकोण और परंपरागत संस्कृतियाँ, जो शैतान से उत्पन्न होती हैं—ये चीजें लोगों के लिए क्या लाती हैं? ये छल, भ्रष्टता, बंधन, बेड़ियाँ लाती हैं, जिससे भ्रष्ट मानव-जाति के विचार संकीर्ण और उग्र हो जाते हैं, और चीजों पर उनके विचार एकतरफा और पक्षपाती, यहाँ तक कि बेतुके और बेहूदे हो जाते हैं। यह शैतान द्वारा मानव-जाति को भ्रष्ट किए जाने का सटीक परिणाम है" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक))। "अगर, अपने हृदय में, तुम वास्तव में सत्य को समझते हो, तो तुम्हें पता होगा कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर की आज्ञा का पालन कैसे करना है, तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह सही है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना कम से कम होगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी और दंभी है, तो तुम्हें परमेश्वर का विरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, तुम खुद को रोक नहीं सकते, यह तुम्हारे नियंत्रण के बाहर है। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, उनके कारण तुम खुद को ऊँचा उठाओगे, निरंतर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों का तिरस्कार करने के लिए मजबूर करेंगे, वे तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे, और अंतत: तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे और चाहेंगे कि लोग तुम्हें समर्पित हों, तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं! बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति को सुधारना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है)। ईश-वचनों पर विचार करके मुझे एहसास हुआ कि सत्य हासिल करने से पहले, मेरे सभी विचार और नजरिये शैतान से आते थे। बचपन से ही मैंने स्कूल में जो कुछ सीखा, बड़ों ने जो सिखाया, और समाज के असर के कारण, लगा कि मुझे हर चीज के केंद्र में रहना चाहिए। "सर्वोच्च शासक मैं ही हूँ" और "मैं ही सब कुछ हूँ" जैसे फलसफे मेरे जीवन का आधार बन गए। मैंने इन शैतानी फलसफों को सकारात्मक चीज समझा। मैं जिस समूह में होती उसकी प्रभारी बनना चाहती, सभी फैसले खुद करना चाहती, मैं दूसरों को हुक्म देना और उनसे अपनी बात मनवाना चाहती थी। यह देखकर कि समूह अगुआ मेरी बात सुनने के बजाय मुझे सुझाव दे रहा था, मैं नाराज हो गयी और भाई-बहनों के सामने उसकी आलोचना की। सबसे अपनी बात मनवाने और उसे दबाने के लिए अपनी ऊंची काबिलियत और योग्यताओं का इस्तेमाल किया। भाई-बहन इतने बेबस हो गए कि अपनी राय व्यक्त न करना चाहते, बस कठपुतलियों की तरह मेरी बात मानते थे। नतीजतन मेरा काम बिगड़ गया। मैंने दूसरों को अपनी बात सुनने और मानने को मजबूर किया। मैंने बस थोड़ा सा अहंकारी स्वभाव नहीं दिखाया था; बल्कि मैं बहुत ज्यादा अहंकारी बन गई थी। परमेश्वर मेरे जैसे शैतानी इंसान को कभी अपने घर में नहीं रख सकता। अगर कलीसिया मुझे निकाल देती, तो यह पूरी तरह से परमेश्वर की धार्मिकता होती! मैं परमेश्वर की आभारी थी, मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। मैं जानती थी मेरे अनेक अपराधों की भरपाई करना नामुमकिन था, मुझे बहुत पछतावा हुआ।

बाद में, मुझे याद आया, माँ ने कहा था मुझे सिर्फ दो बार की बर्खास्तगी पर चिंतन न करके, आस्था में बरसों के अपने मार्ग पर भी सोचना चाहिए। मुझे इस आशय से जुड़े ईश-वचन मिले। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मसीह-विरोधी जन्म से ही नियमों से जीना या साधारण जीवन जीना या चुपचाप अपने स्थान पर बने रहना या एक साधारण इंसान की तरह जमीन से जुड़े रहकर जीना नहीं चाहते। वे इस तरह का इंसान होने से संतुष्ट नहीं होते। इसलिए, बाहर से वे कुछ भी व्यक्त करें, अंदर की गहराई से वे कभी संतुष्ट नहीं होते; उन्हें कुछ करना होता है। क्या करना होता है? ऐसी चीजें, जिसकी औसत इंसान कभी कल्पना भी नहीं कर सकता। इस तरह वे औरों से विशिष्ट होना पसंद करते हैं, और ऐसा करने के लिए वे स्वेच्छा से थोड़ी कठिनाई से गुजर जाएंगे और एक कीमत चुका देंगे। कहावत है कि 'नए अधिकारी प्रभावित करने को उत्सुक रहते हैं' : यह साबित करने के लिए कि वे कोई मामूली इंसान नहीं हैं, उन्हें कोई छोटा-मोटा चमत्कार करना होगा या किसी प्रकार की विरासत बनानी होगी। इसमें सबसे गंभीर समस्या क्या है? भले ही वे कलीसिया में काम कर रहे हों, और भले ही वे अपना कर्तव्य निभाने का ढोंग करते हुए काम कर रहे हों, उन्होंने कभी परमेश्वर से यह नहीं पूछा कि चीजें कैसे की जानी चाहिए, और कभी गंभीरता से जाँच नहीं की कि परमेश्वर का घर क्या आदेश देता है, सत्य के क्या सिद्धांत हैं, परमेश्वर के घर के कार्य को लाभ पहुँचाने के लिए क्या किया जाए, भाई-बहनों को लाभ पहुँचाने, परमेश्वर का अपमान न करने, और उसकी गवाही देने और कलीसिया के काम को सुचारु रूप से आगे बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है, ताकि वह बिना किसी परेशानी और चूक के होता रहे। वे न तो कभी इन बातों के बारे में पूछते हैं, न ही इनके बारे में पूछताछ करते हैं। उनके दिलों में ये चीजें नहीं रहतीं; उनके दिलों में ये चीजें मुख्य नहीं हैं। तो, वे किसके बारे में पूछताछ करते हैं? उनके दिलों में क्या रहता है? यही कि कलीसिया में अपनी प्रतिभा कैसे दिखाएँ, ताकि यह दिखा सकें कि वे बाकी सबसे से अलग हैं, ताकि वे अपनी अगुआई के कौशल दिखा सकें, ताकि वे लोगों को दिखा सकें कि वे कलीसिया के स्तंभ हैं, कि कलीसिया उनके बिना नहीं चल सकती, कि सिर्फ उन जैसे लोगों के वहाँ होने के कारण ही कलीसिया के कार्य की हर परियोजना सुचारु रूप से आगे बढ़ सकती है। मसीह-विरोधी की अभिव्यक्तियों और कार्य करने के प्रति उनके उत्साह और संवेग को देखते हुए, वे खुद को किस स्थान पर रखते हैं? बाकी सबसे ऊँचे स्थान पर। ... उनका लक्ष्य क्या होता है? उनका लक्ष्य सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाते हुए अच्छा काम करना, और परमेश्वर के बोझ पर विचार करना नहीं होता। बल्कि, कलीसिया में काम और भाई-बहनों की सेवा करते हुए सब-कुछ नियंत्रित करना होता है। हम क्यों कहते हैं कि वे सब-कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं? क्योंकि जब वे काम करते हैं, तो पहले वे अपनी एक जगह बनाने, अपने नाम का सिक्का जमाने, खुद को प्रतिष्ठित बनाने की कोशिश करते हैं, हुक्म चलाने और फैसले करने की ताकत पाना चाहते हैं। अगर वे ऐसा कर पाएँ, तो वे परमेश्वर की जगह ले सकते हैं और उसे एक पुतले में बदल सकते हैं। अपने प्रभाव-क्षेत्र में वे देहधारी परमेश्वर को एक कठपुतली में बदलने का प्रयास करते हैं; इसे ही खुद को औरों से ऊपर रखना कहते हैं। क्या मसीह-विरोधी ऐसा ही नहीं करते? यही मसीह-विरोधियों का व्यवहार है" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग दस))। वचनों ने मेरी अवस्था का खुलासा किया। मुझे विश्वासी बने दस साल हो गए थे, पर मैं कभी सामान्य इंसान बनकर संतुष्ट नहीं थी। मैं जहाँ भी जाती और जो भी कर्तव्य निभाती, उसमें हमेशा सबसे अच्छी होना चाहती थी। विश्वासी बनने के शुरूआती सालों में, मैंने कलीसिया में नए सदस्यों का सिंचन किया। खुद को साबित करने के लिए, मैंने दर्शन का सत्य पाने के लिए बहुत मेहनत की ताकि नए सदस्यों की समस्याएँ हल कर सकूँ। बारिश हो या धूप, मंजिल कितनी ही दूर हो, मैंने शिकायत नहीं की। कलीसिया अगुआ बनने के बाद, मैंने भीड़ से अलग दिखने की कोशिश की। फिर, वीडियो बनाते समय, अच्छे नतीजे पाने के लिए, मैंने रातभर काम किया, सिद्धांत और कौशल सीखने में मेहनत की, जिसके कारण मुझे तरक्की मिली, अगुआओं और दूसरों ने मेरी खूब सराहना की, तो मैं इस रास्ते पर चलती गई। लगा मेरी प्रतिभा के बिना कलीसिया में कुछ नहीं होगा, मैं तो बेशर्मों की तरह खुद को समूह का आधार मान चुकी थी। समूह में मैं बहुत ज्यादा अहंकारी और तानाशाह थी। बर्खास्त होने पर, मैंने यह स्वीकार किया कि मैं अहंकारी थी और मैंने कुकर्म किये थे, पर कभी अपने व्यवहार या अपने चुने मार्ग पर चिंतन नहीं किया। फिर से वीडियो बनाते समय वही समस्याएँ दोबारा आईं। मैं अहंकारी क्यों थी, किसी की बात क्यों नहीं मानी? मैंने दूसरों के सुझाव क्यों नहीं सुने? क्यों हर बार मैं ही फैसला करके दूसरों से अपनी बात मनवाना चाहती थी? ऐसा इसलिए क्योंकि मैं बहुत अहंकारी थी और आम इंसान नहीं बनना चाहती थी। मैं दूसरों से बड़ी बनकर उनसे अपनी बात मनवाना चाहती थी। मेरे ऐसे स्वभाव और मसीह-विरोधी के "खुद को औरों से ऊपर रखने" वाले स्वभाव में फर्क ही क्या है? फिर मुझे एहसास हुआ कि इतने सालों से विश्वासी होने के बाद भी मेरा शैतानी स्वभाव नहीं बदला था, मेरा स्वभाव कट्टर मसीह-विरोधी का था। कलीसिया मुझे निकालने वाली है ये सुनकर, लगा मेरे साथ अन्याय हो रहा है, मानो इतने सालों से विश्वासी रहने के कारण परमेश्वर को मुझे ठुकराना नहीं चाहिए। असल में, मैं सत्य खोजना नहीं चाहती थी। मैं बस नाम और फायदा पाना चाहती थी—मैंने गलत मार्ग चुन लिया था। इसलिए, एक दशक के बाद भी मुझे सत्य हासिल नहीं हुआ। यह किसकी गलती थी? सत्य न खोजना मेरी ही गलती थी! फिर इतने सालों में मेरे अपराधों और कुकर्मों के बारे में सोचूँ तो, तो कलीसिया का मुझे निकालना परमेश्वर की धार्मिकता थी! मैं अहंकारी स्वभाव में जी रही थी। मैंने न सिर्फ हमारे काम में गंभीर रुकावटें डालीं, बल्कि दूसरों को बेबस करके कष्ट भी पहुँचाया। मुझमें बिलकुल मानवता नहीं थी! मेरे सार, स्वभाव, और कुकर्मों को देखा जाए, तो मुझे निकाल ही दिया जाना चाहिए था। तब, मैंने इस पर ध्यान देना बंद कर दिया कि कलीसिया मुझे निकालेगी या नहीं। मुझे सत्य खोजने और अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने का फैसला करना था।

बाद में, कलीसिया ने व्यवस्था की कि मैं चिंतन के लिए अलग किए गए कुछ लोगों के साथ सभा करूँ। अपनी भ्रष्टता और बुरे व्यवहार को समझने और उजागर करने के लिए मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, ताकि सबको दिखा सकूँ कि मैं एक मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी, मैं शैतान जैसी ही थी, मुझे निकालना परमेश्वर की धार्मिकता होगी। मैंने उनसे यह भी कहा, "हमें सच में पश्चात्ताप करना होगा। परिणाम चाहे कुछ भी हो, हमें परमेश्वर का अनुसरण कर अपना कर्तव्य निभाना होगा।" इसके बाद, मैं पहले जितनी अहंकारी नहीं रही। दूसरों के साथ बातचीत में, मैं अपनी बात मनवाना नहीं चाहती थी। जब समस्याएँ आतीं, तो मैं दूसरों से सुझाव माँगती। अक्सर खुद को सचेत करती थी कि मुझे खुद को ठुकराकर दूसरों की खूबियों पर ध्यान देना चाहिए, फिर मुझे पता भी नहीं चला और मैं अधिक विनम्र बन गई। कुछ महीनों बाद, कलीसिया ने मेरे व्यवहार पर विचार करके तय किया कि मेरा स्वभाव कट्टर मसीह-विरोधी का था, पर मेरा सार वैसा नहीं था, इसलिए मुझे निकाला नहीं गया। बाद में, मेरे आत्मज्ञान और पश्चात्ताप को देखकर, कलीसिया ने मुझे फिर से एक कर्तव्य सौंपा। यह सुनकर मैं बहुत भावुक हो गई और मेरी आँखें भर आई। मैंने इन ईश-वचनों को याद किया : "परमेश्वर का स्वभाव जीवंत और एकदम स्पष्ट है, वह अपने विचार और रवैये चीज़ों के विकसित होने के हिसाब से बदलता है। नीनवे के लोगों के प्रति उसके रवैये का रूपांतरण मनुष्य को बताता है कि उसके अपने विचार और युक्तियाँ हैं; वह कोई मशीन या मिट्टी का पुतला नहीं है, बल्कि स्वयं जीवित परमेश्वर है। वह नीनवे के लोगों से क्रोधित हो सकता था, वैसे ही जैसे उनके रवैये के कारण उसने उनके अतीत को क्षमा किया था। वह नीनवे के लोगों के ऊपर दुर्भाग्य लाने का निर्णय ले सकता था, और उनके पश्चात्ताप के कारण वह अपना निर्णय बदल भी सकता था। लोग नियमों को कठोरता से लागू करना, और ऐसे नियमों का परमेश्वर को सीमांकित और परिभाषित करने के लिए उपयोग करना पसंद करते हैं, वैसे ही जैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए सूत्रों का उपयोग करना पसंद करते हैं। इसलिए, जहाँ तक मानवीय विचारों के दायरे का संबंध है, परमेश्वर न तो सोचता है, न ही उसके पास कोई ठोस विचार हैं। वास्तव में परमेश्वर के विचार चीज़ों और वातावरण में परिवर्तन के अनुसार निरंतर रूपांतरण की स्थिति में रहते हैं। जब ये विचार रूपांतरित हो रहे होते हैं, तब परमेश्वर के सार के विभिन्न पहलू प्रकट हो रहे होते हैं। रूपांतरण की इस प्रक्रिया के दौरान, ठीक उसी क्षण, जब परमेश्वर अपना मन बदलता है, तब वह मानवजाति को अपने जीवन का वास्तविक अस्तित्व दिखाता है और यह भी दिखाता है कि उसका धार्मिक स्वभाव गतिशील जीवन-शक्ति से भरा है। उसी समय, परमेश्वर मानवजाति के सामने अपने कोप, अपनी दया, अपनी प्रेममय करुणा और अपनी सहनशीलता के अस्तित्व की सच्चाई प्रमाणित करने के लिए अपने सच्चे प्रकाशनों का उपयोग करता है" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव प्राणशक्ति से भरा है। चाहे क्रोध हो, प्रताप हो, दया हो, या प्रेम, यह सब असली है। परमेश्वर अपने और सत्य के प्रति इंसान के रवैये को देखकर धीरे-धीरे अपना स्वभाव व्यक्त करता है। जब मैं अपने मार्ग पर थी, तो उसने बार-बार मुझे उजागर करने, अनुशासित करने और जगाने की व्यवस्था की, पर मैंने कभी पश्चात्ताप नहीं किया, आत्मचिंतन नहीं किया, कट्टर बनी रही। जब निकाले जाने की नौबत आई तब जाकर मेरी आँखें खुलीं और मैंने आत्मचिंतन करना शुरू किया। जब खुद को थोड़ा समझी और खुद से नफरत हुई, तो मैं अपना गलत अनुसरण त्यागने और परमेश्वर की तरफ मुड़ने को तैयार थी, उसने मुझ पर दया दिखाकर पश्चात्ताप का एक और मौका दिया। परमेश्वर का क्रोध हो, शाप हो, दया हो या सहनशीलता, यह सब उसके धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति थी। परमेश्वर और सत्य को लेकर मेरे रवैये के आधार पर परमेश्वर ने अपना स्वभाव व्यक्त किया। मैंने सच में यह भी अनुभव किया कि परमेश्वर का स्वभाव प्राणशक्ति से भराहै। वह हमेशा से मेरे साथ खड़ा था, मेरी हर कथनी और करनी पर उसकी नजर थी। मेरे हर विचार, हर बर्ताव को लेकर उसके पास एक राय थी। अगर उस वक्त मेरे निकाले जाने की नौबत नहीं आती, तो मेरा सुन्न और जिद्दी दिल कभी परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ता, मैं कभी वास्तव में आत्मचिंतन नहीं कर पाती। परमेश्वर की कठोर ताड़ना और अनुशासन के बिना, मैं और भी अहंकारी बनकर परमेश्वर का खूब विरोध करती, और अंत में मुझे दंडित किया जाता। इस अनुभव से एक विश्वासी के रूप मेंमेरे जीवन में बदलाव आया। मैं परमेश्वर के सच्चे इरादे देख पाई, मैंने परमेश्वर के प्रेम और उद्धार को महसूस किया।

पिछली गर्मियों में, कलीसिया ने मुझे फिर से वीडियो बनाने का काम सौंपा। एक बार, मैं वीडियो को लेकर एक विचार पर अटक गयी, तब एक बहन मेरे पास आई। मेरी परेशानी सुनकर उन्होंने अपनी राय बताई। उनकी बात सुनकर लगा कि वह जो कह रही थी वैसा तो मैं चाहती ही नहीं थी, मुझे थोड़ी चिढ़ होने लगी। मैंने मन-ही-मन सोचा, "इतनी देर से सोच रही हूँ फिर भी अभी तक कुछ नहीं सूझा, तुमने तो यह कर्तव्य निभाया ही नहीं है, तो तुम्हारे पास अच्छे सुझाव कहाँ से होंगे?" मैं उसकी बात और नहीं सुनना चाहती थी। तभी, एहसास हुआ मेरा अहंकारी स्वभाव फिर से सिर उठा रहा है, तो मैंने फौरन मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना की, परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद किया : "पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना, चीज़ के जरिए वह तुम्हें पाने या देखने देगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे)। मैंने देखा कि मैं विवेकहीन थी। मुझे लगा इस कर्तव्य में अनुभव के बिना वह बहन अच्छे सुझाव नहीं दे पायेगी। यह मेरी सोच थी जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप नहीं थी। मैंने सोचा मेरे पास दिमाग है, खूबियां हैं, पर परमेश्वर के मार्गदर्शन के बगैर कितनी ही कोशिश कर लूँ, कुछ नहीं सूझेगा। मैंने पुरानी नाकामियों को याद किया, दोबारा खुद पर विश्वास करने की हिमाकत नहीं की। शायद पवित्र आत्मा इन बहन को मार्ग दिखाये या प्रबुद्ध बनाये, मैं अहंकारी होकर उन्हें सीमित नहीं कर सकती। मैंने खुद को ठुकराकर, बहन के सुझाव ध्यान से सुने, इस बीच पता भी नहीं चला कब हमारी बातचीत से मुझे प्रेरणा मिल गई और मेरे विचार स्पष्ट हो गए। मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया! मैंने जितना इसे अनुभव किया, उतना ही लगा मैं कितनी ज्यादा अहंकारी थी। शैतान ने मुझे गहराई तक भ्रष्ट कर दिया था, मेरी अहंकारी प्रकृति की जड़ें बहुत गहरी थीं, मुझे खुद से और भी नफरत हुई, पर जानती थी मैं अपनी अहंकारी प्रकृति की समस्या को रातों-रात हल नहीं कर सकती थी, इसे बार-बार परमेश्वर के न्याय और काट-छाँट का सामना करके ही हल किया जा सकता था। मैं परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन का अनुभव करने के लिए अक्सर उससे प्रार्थना करती, कसम खाती कि कितना भी कष्ट हो, मैं सत्य खोजती रहूँगी, अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी, और परमेश्वर के दिल को सुकून दूंगी।

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