धूर्त बनने से मुझे कैसे नुकसान हुआ
सामंथा, जापानएक बार जब हम अपने काम का सार प्रस्तुत कर रहे थे, तो एक कलीसिया अगुआ ने बताया कि हाल के दिनों में हमारा सुसमाचार कार्य बहुत...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
जब मैं 17 साल की थी, तब मैंने अपने माता-पिता के साथ प्रभु में विश्वास करना शुरू किया। 2001 में हमारे पूरे परिवार ने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया और उसके बाद हम सभी अपने-अपने कर्तव्य निभाने लगे। 2012 के अंत में सुसमाचार का प्रचार करते समय मुझे सीसीपी द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। रिहा होने के बाद मैं दोबारा गिरफ्तारी से बचने के लिए घर छोड़कर अपना कर्तव्य निभाने दूसरी जगह चली गई। 2014 में मैंने अपने पिता को उस जगह देखा, जहाँ मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी। जब मैंने उन्हें सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाते देखा और पता चला कि मेरी बहन भी कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रही है, तो मैं बहुत खुश हुई। मैंने सोचा, “पिछले करीब एक दर्जन वर्षों में हमारे परिवार में हर कोई कर्तव्य निभा रहा है। जब तक हम इसी तरह खपते और प्रयास करते रहेंगे और अंत तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, तो जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने पर हमारा पूरा परिवार बचाया जा सकेगा और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकेगा।” लेकिन मेरे लिए पूरी तरह से आश्चर्य की बात यह थी कि जब 2015 में एक दिन जिला अगुआ काम के बारे में हमसे बात करने आए, तो उन्होंने मेरी गृह कलीसिया से आई एक चिट्ठी का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि मेरे पिता सभाओं में अगुआ की कमियाँ निकालते रहते थे और चाहे उनके साथ कैसी भी संगति की जाए, उनमें कोई सुधार नहीं हो रहा था। मेरे पिता ने यहाँ तक कहा कि अगुआ कुछ नहीं समझते और उन्होंने सुझाव दिया कि उनके साथ संगति करने के लिए किसी विशेषज्ञ को ढूँढा जाए। इसने भाई-बहनों को इतना बाधित किया कि वे शांति से सभा नहीं कर पा रहे थे। जिला अगुआओं ने कहा कि वे स्थिति की बारीकियों को जाँचने और फिर मेरे पिता के साथ ठीक से संगति करने की योजना बना रहे हैं। मैंने शांत होने का दिखावा किया और कहा, “मेरे पिता की हालत इतनी खराब कैसे हो सकती है?” लेकिन अंदर से मैं नाराज और संताप में थी, सोच रही थी, “उन्हें क्या हो गया है? उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए दस साल से ज्यादा हो गए हैं, फिर भी वे अपने कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं और यहाँ तक कि कलीसियाई जीवन में भी बाधा डाल रहे हैं?” उस समय मैं जल्द से जल्द अपने पिता से मिलने के लिए बेताब थी, ताकि मैं उनसे बात कर सकूँ और उन्हें और बाधा न करने के लिए मनाने की कोशिश कर सकूँ। लेकिन मैं जानती थी कि मेरे पिता का स्वभाव बहुत अहंकारी है, जब उन्हें लगता था कि वे सही हैं तो वे पीछे हटने से इनकार कर देते थे और मेरे समझाने की कोशिशों से कोई मदद नहीं मिलेगी। मुझसे चिंता किए बिना रहा न गया, “अगर मेरे पिता बिना पश्चात्ताप किए बाधा डालना जारी रखते हैं, तो इसकी प्रकृति बहुत गंभीर होगी और उन्हें बाहर निकाले जाने का सामना करना पड़ेगा। प्रभु को पाने से लेकर परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्वीकार करने तक, मेरे पिता ने लगभग बीस वर्षों तक विश्वास किया है और इस दौरान उन्होंने बहुत कष्ट सहे हैं, यहाँ तक कि खतरनाक स्थितियों में भी अपने कर्तव्य निभाना जारी रखा है। अगर उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, तो क्या उनके इतने सालों के कष्ट व्यर्थ नहीं चले जाएँगे? उनका आस्था का जीवन पूरी तरह खत्म हो जाएगा!” यह सोचकर मैंने अगुआओं से कहा, “अगर मैं अपने पिता से मिल सकूँ और उन्हें समझाने की कोशिश कर सकूँ, तो शायद उनकी दशा बदली जा सकती है।” उनमें से एक ने कहा, “तुम अभी बहुत भावुक हो रही हो। अगर तुम अपने पिता से मिलने जाओगी, तो तुम या तो जल्दबाजी में काम करोगी या फिर स्नेह के वशीभूत होकर। तुम्हें अपना कर्तव्य करना है। हम तुम्हारे पिता के साथ संगति करने जाएँगे। अभी बस अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करो।” मैंने सोचा कि अगुआ ने जो कहा वह सही है, उन्हें ही पिता के साथ संगति करने देना बेहतर होगा। अगले कुछ दिनों तक मैं अपने पिता की स्थिति से इतनी परेशान थी कि मैं सो नहीं पाई, मुझे भूख नहीं लगी, मेरे विचार उलझे हुए थे और मैं अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थी। मुझे उम्मीद थी कि अगुआओं की संगति के माध्यम से मेरे पिता हालात बदल पाएँगे और कम से कम उन्हें बाहर नहीं निकाला जाएगा। मुझे लगा कि जब तक वे परमेश्वर के घर में श्रम कर सकते हैं, तब तक उनके बचाए जाने की उम्मीद रहेगी। इसलिए हर दिन मैं बेसब्री से अगुआओं द्वारा मेरे पिता के सुधरने की खुशखबरी लाने का इंतजार करती रही।
कुछ ही समय बाद सफाई कार्य के लिए जिम्मेदार भाई-बहनों ने मुझे एक चिट्ठी भेजी, जिसमें मुझसे मेरे पिता के लगातार व्यवहार का विवरण देने के लिए कहा गया था। जब मैंने चिट्ठी पढ़ी, तो मुझे अपने दिल में अवर्णनीय दर्द महसूस हुआ और मेरी आँखों में आँसू आ गए। इस तथ्य को स्वीकार करना मेरे लिए बहुत कठिन था। मैंने मन ही मन सोचा, “लगता है कि मेरे पिता की समस्या गंभीर है। अगर उनका व्यवहार नीच है, तो उन्हें बाहर निकाल दिया जाएगा और एक बार बाहर निकाल दिए जाने के बाद उनका आस्था का जीवन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा, और उनके उद्धार की कोई उम्मीद नहीं रहेगी। मेरे पिता पहले ही साठ साल के हो चुके हैं और उन्होंने कई साल तक परमेश्वर में विश्वास किया है। अगर उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है तो वे इसे कैसे बर्दाश्त कर पाएँगे?” मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा ठीक नहीं है और मैं जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ गई, “परमेश्वर, मेरे पिता को बाहर निकाले जाने का सामना करते देखना बहुत दर्दनाक है। कृपया मेरे दिल की रक्षा करो ताकि मैं तुम्हारे बारे में शिकायत न करूँ और समर्पण कर सकूँ।” मैंने बार-बार प्रार्थना की। अपना मूल्यांकन लिखते समय मैंने सोचा कि कैसे मेरे पिता की मानवता अच्छी नहीं थी और कैसे उन्होंने दुनियादारी में रहते हुए करीब-करीब अत्यंत अनुचित काम कर दिए थे। अगर मैं अपने पिता के व्यवहार के इन पहलुओं के बारे में लिखती हूँ और कलीसिया उनके लगातार आचरण का आकलन करती है, तो क्या वे उन्हें बाहर निकालने का फैसला नहीं करेंगे? जब मैं बच्ची थी, तब से मेरे पिता मेरे लिए बहुत अच्छे थे। जब मैं छोटी थी, तो मेरा शरीर कमजोर था और मुझे हमेशा सर्दी-जुकाम रहता था और इंजेक्शन लगवाने के बाद मैं चलना नहीं चाहती थी, तो मेरे पिता मुझे गोद में उठाकर घर ले आते थे। जिन वर्षों में मैं घर से दूर रहकर अपना कर्तव्य निभा रही थी, मेरे माता-पिता मेरे लिए पैसे बचा रहे होते थे और उन्होंने मेरी बहुत मदद की थी। कई बार मेरे ससुराल वाले हमारे घर परेशानी पैदा करने आते थे और मेरे पिता ही थे जो इससे निपटते थे। मेरे मामलों को लेकर मेरे पिता खुद बहुत चिंतित रहे थे। मैंने सोचा, “शायद मुझे अपने पिता की खराब मानवता के बारे में नहीं लिखना चाहिए, इसके बजाय मुझे इस बारे में लिखना चाहिए कि उन्होंने कितने उत्साह के साथ खुद को खपाया। इस तरह जब भाई-बहन देखेंगे कि मेरे पिता का पिछला व्यवहार अच्छा रहा है, तो शायद वे उन्हें श्रम करने के लिए रहने देंगे और मेरे पिता के पास अभी भी उद्धार की उम्मीद होगी।” लेकिन मुझे यह भी लगा कि ऐसा करना अनुचित होगा। अगले कुछ दिनों तक मैं इस मामले से इतनी परेशान थी कि मैं अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाई। अपने दर्द में मुझे परमेश्वर के वचन की एक पंक्ति याद आई : “यदि कोई भी कलीसिया के लिए कोई हानिकारक कार्य करता है, भले ही वे तुम्हारे माता-पिता हों, तो यह अस्वीकार्य है!” इसलिए मैंने वह अंश देखा जिसमें यह पंक्ति थी। परमेश्वर कहता है : “मेरे लिए अपनी गवाही में तुम्हें ताक़त और रीढ़ दिखानी चाहिए और अडिग रहना चाहिए; उठ और मेरी तरफ़ से बोल और डर मत कि दूसरे लोग क्या कहते हैं। बस मेरे इरादों को संतुष्ट कर और दूसरों के हाथों खुद को बेबस मत होने दे। ... मैं तेरा सहारा और तेरी ढाल हूँ, और सब कुछ मेरे हाथों में है। तो फिर तुझे किस बात का डर है? क्या तू बहुत ज़्यादा भावुक नहीं हो रहा है? तुझे शीघ्रातिशीघ्र अपनी भावनाओं को निकाल फेंकना चाहिए; मैं भावनाओं के वशीभूत कार्य नहीं करता हूँ, बल्कि धार्मिकता का प्रयोग करता हूँ। यदि कोई भी कलीसिया के लिए कोई हानिकारक कार्य करता है, भले ही वे तुम्हारे माता-पिता हों, तो यह अस्वीकार्य है!” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 9)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं बहुत संतप्त और परेशान महसूस कर रही थी। परमेश्वर का इरादा था कि मैं चीजों का सामना करते समय सत्य के पक्ष में खड़ी रहूँ, स्नेह के आधार पर कार्य न करूँ, सत्य सिद्धांतों पर कायम रहूँ और परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखूँ। लेकिन जब मुझे पता चला कि मुझे अपने पिता के लगातार व्यवहार का विवरण देना है, तो मैंने सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजों को नहीं देखा। इसके बजाय मैंने याद किया कि कैसे मेरे पिता बचपन से ही मेरे लिए अच्छे थे और इसलिए मैंने अपना रुख और सिद्धांत गँवा दिए। यहाँ तक कि मैंने अपने पिता से मिलने जाने के बारे में भी सोचा ताकि मैं उनसे बात करने की कोशिश करूँ और उन्हें और अधिक बाधा डालने से रोक सकूँ। इस तरह उन्हें बाहर नहीं निकाला जाएगा और वे श्रम करते रहने के लिए रह सकते हैं और उनके पास बचाए जाने का मौका होगा। अगर अपना मूल्यांकन लिखते समय मेरे पास थोड़ी सी भी अंतरात्मा और विवेक होता, तो मुझे परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना चाहिए था और कलीसिया के कार्य को बनाए रखना चाहिए था और ईमानदारी से उस व्यवहार के बारे में लिखना चाहिए था जो मैं जानती थी कि उनमें था, लेकिन मैंने स्नेह के आधार पर अपने पिता के प्रति पक्षपात दिखाया और मैं बस उनके अच्छे व्यवहार के बारे में लिखना चाहती थी जबकि उनके बुरे व्यवहार को या तो नजरअंदाज करना चाहती थी या छोड़ देना चाहती थी। किस तरह से मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था? यह महसूस करते हुए मैंने अपने पिता के उन सभी व्यवहारों को लिख डाला जिनके बारे में मैं जानती थी और फिर रिपोर्ट भाई-बहनों को भेज दी।
कुछ समय बाद मैंने अपने पिता को बाहर निकाले जाने का नोटिस देखा। मेरे पिता न केवल अगुआ की गलतियाँ निकालते रहते थे, बल्कि सत्य को भी बिल्कुल स्वीकार नहीं करते थे। वे परमेश्वर के वचनों को संदर्भ से बाहर ले रहे थे और जो कोई भी उनके साथ संगति करता, उसकी निंदा कर रहे थे और उस पर आरोप लगा रहे थे। उन्होंने लगातार कलीसियाई जीवन में व्यवधान डाला था और पश्चात्ताप करने से बिल्कुल इनकार कर दिया था और इसलिए अंततः उन्हें बाहर निकाल दिया गया। लगातार व्यवहार के आधार पर देखें तो मेरे पिता वास्तव में बेतुके थे, उनमें आध्यात्मिक समझ की कमी थी और उनकी प्रकृति सत्य के प्रति अत्यंत विमुख होने की और घृणा से भरी थी। उनके बाहर निकाले जाने ने परमेश्वर की धार्मिकता को पूरी तरह से प्रकट कर दिया। यह देखकर मैंने अपने दिल की गहराइयों से अपने पिता के लिए अपना स्नेह छोड़ दिया।
मार्च 2022 में एक दिन मुझे अपनी बहन की कलीसिया के अगुआओं से एक पत्र मिला, जिसमें कहा गया था कि मेरी बहन अगस्त 2021 से किसी भी सभा में शामिल नहीं हुई है। सिद्धांतों के अनुसार, जो लोग लंबे समय तक सभा नहीं करते, सत्य का अनुसरण नहीं करते या अपने कर्तव्य नहीं करते, उन्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए और उन्होंने मुझसे अपनी बहन के लगातार व्यवहार के बारे में जल्दी लिखने के लिए कहा। इसे पढ़ने पर मुझे दिल दहला देने वाला दर्द महसूस हुआ और मैं बस इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाई। मैं उथल-पुथल में थी और काम के बारे में बहनों के साथ बात करने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थी, इसलिए मैं सिमट गई और अपना सिर पकड़कर सिसकने लगी। बहनों ने मुझे इस तरह देखा और मेरे साथ संगति करके मेरी मदद करने आईं, लेकिन उनकी बातें मेरे दिल तक नहीं पहुँच पाईं। मैंने मन ही मन सोचा, “ऐसा कैसे हो सकता है? कुछ समय पहले मेरी बहन ने मुझे खर्च के लिए कुछ पैसों के साथ एक चिट्ठी भेजी थी। कुछ ही महीनों में उसका कलीसिया से संपर्क कैसे टूट सकता है? क्या घर पर कुछ हुआ हो सकता है? मुझे याद है कि जब मेरी बहन परमेश्वर में विश्वास करने लगी, तो वह हमेशा खुद को खपाने के लिए उत्साहित रहती थी और अपने कर्तव्यों में सक्रिय रहती थी। घर पर जरूर कोई बड़ी बात हुई होगी कि वह सभाओं में शामिल नहीं हुई। क्या कलीसिया को उसे पश्चात्ताप करने का एक और मौका देना चाहिए?” मुझे यह भी पता चला कि कलीसिया केवल मेरी बहन के लगातार व्यवहार के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रही थी और यह कि अगर वह ईमानदारी से पश्चात्ताप करे और ठीक से परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तैयार हो, तो उसके पास अभी भी पश्चात्ताप करने का मौका होगा। लेकिन मुझे फिर भी चिंता थी, “अगर मेरी बहन जल्द ही सभाओं में वापस नहीं आई तो क्या होगा?” उस रात मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, मैं सो नहीं पाई। हमारे परिवार के परमेश्वर में विश्वास करने और अपने कर्तव्य निभाने की सुंदर यादें मेरे दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रही थीं। मेरी बहन ने बचपन से ही हमेशा मेरा ख्याल रखा था। जब मैं बुरी दशा में थी, तो उसने मुझे सहारा दिया और मेरी मदद की और जब मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रही थी, तो वह अक्सर मुझे खर्च के लिए पैसे भेजती थी। अगर मेरी बहन को बाहर निकाल दिया जाता है, तो उसके पास उद्धार की बिल्कुल कोई उम्मीद नहीं होगी। यह सोचकर मुझे कसक महसूस हुई। अगले कुछ दिनों तक मेरी बहन की वजह से मेरी दशा बहुत खराब थी और मैं अपने कर्तव्यों में अपने दिल को शांत नहीं कर पा रही थी। मैंने सोचा, “मुझे घर वापस जाना चाहिए और अपनी बहन को समझाना चाहिए। अगर वह कलीसिया में वापस आ जाए और अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्य निभाए, तो उसे बाहर नहीं निकाला जाएगा।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “मुझे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए गिरफ्तार किया गया है, मेरा पुलिस रिकॉर्ड है और अगर मैं लापरवाही से घर लौटती हूँ और पकड़ी जाती हूँ, तो मैं अपने कर्तव्य नहीं कर पाऊँगी और मैं अपने भाई-बहनों को मुसीबत में डाल दूँगी। परिणाम अकल्पनीय होंगे।” मेरा दिमाग उलझा हुआ था और मुझे नहीं पता था कि क्या करना है। तीन दिन बाद मुझे चक्कर आने लगे, मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा और मुझे सीने में जकड़न और साँस लेने में तकलीफ होने लगी। मुझे लगा कि मैं महज चलते समय किसी भी पल गिर सकती हूँ। तभी मैंने खुद पर विचार किया और घर लौटने का विचार त्याग दिया। लेकिन यह सोचकर कि मेरी बहन को बाहर निकाल दिया जा सकता है, मुझे अभी भी थोड़ा दुख हो रहा था। मैंने अपने आस-पास की एक बहन के साथ अपनी दशा साझा की और उसने मुझे परमेश्वर के वचनों के कई अंश पढ़कर सुनाए। बहन के साथ संगति के माध्यम से मैं समझ गई कि परमेश्वर का घर सत्य और धार्मिकता द्वारा शासित होता है और यह कि परमेश्वर का घर कभी किसी अच्छे व्यक्ति के साथ गलत नहीं करेगा, न ही किसी कुकर्मी को सजा के बिना छोड़ेगा। चूँकि कलीसिया मेरी बहन के लगातार व्यवहार का रिकॉर्ड इकट्ठा कर रही थी, यह परमेश्वर की अनुमति के तहत था और भले ही मैं इस बात की असलियत नहीं देख पा रही थी, मुझे पहले समर्पण करना चाहिए और उसके व्यवहार के बारे में जो मैं जानती थी वह बताना चाहिए और कलीसिया निश्चित रूप से उसे सँभालेगी और सिद्धांतों के अनुसार उसके साथ व्यवहार करेगी।
बाद में मेरी बहन को बाहर निकाल दिया गया। मैंने भाई-बहनों द्वारा उपलब्ध कराया गया अपनी बहन के व्यवहार का रिकॉर्ड देखा और उसमें उल्लेख था कि हाल के वर्षों में मेरी बहन ने केवल अपने बेटे की विश्वविद्यालय की तैयारियों में सहायता करने के लिए पैसे कमाने पर ध्यान केंद्रित किया था और उसे अपने कर्तव्यों के लिए बोझ का कोई एहसास नहीं था। अपने कर्तव्यों में वह हमेशा लापरवाह रहती थी, अपनी मर्जी से काम करती थी, अपने कर्तव्यों में टालमटोल करती थी, गैर-जिम्मेदार थी और कलीसिया के कार्य में गंभीर रूप से देरी करती थी। भाई-बहनों द्वारा बार-बार उसकी समस्याओं की ओर इशारा करने और उसकी मदद करने के बाद भी वह बिना किसी अपराधबोध या पछतावे के वैसी ही रही। घर पर वह शायद ही कभी परमेश्वर के वचन खाती-पीती थी या परमेश्वर के घर द्वारा बनाए गए वीडियो देखती थी और वह हर दिन पैसे कमाने के लिए काम करती थी। यहाँ तक कि वह बाद में भी सभाओं में शामिल नहीं होती थी। एक बहन उसे सहारा देने गई, लेकिन उसने कहा, “जब मेरी माँ बीमार थी, तो परमेश्वर में विश्वास करने के बाद वह ठीक हो गई, इसलिए मैंने उसका अनुसरण किया और विश्वास किया। लेकिन अब जब उसकी बीमारी दोबारा लौट आई है, तो मुझे परमेश्वर का अस्तित्व क्यों महसूस नहीं हो रहा है?” यह कहकर वह चली गई। इन व्यवहारों को देखने के बाद मैं बहुत गुस्से में थी और मैंने सोचा, “वह ये बातें कैसे कह सकती है? वह एक छद्म-विश्वासी है!” अतीत में मैंने देखा था कि वह खुद को खपाने में उत्साही थी और इसलिए मुझे लगा कि वह सचमुच परमेश्वर में विश्वास करती है, लेकिन अब मैंने देखा कि उसकी आस्था में उसके मूल इरादे और मकसद गलत थे। मेरी माँ की लंबी बीमारी को परमेश्वर में विश्वास के माध्यम से चमत्कारिक रूप से ठीक होते देखने और हमारे परिवार के जीवन में भी धीरे-धीरे सुधार होते देखने के बाद ही उसने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया। जब उसने परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया तभी उसने परमेश्वर में विश्वास करने के लिए हमारी माँ का अनुसरण किया। बाद में जब मेरी माँ फिर से बीमार हो गईं, तो मेरी बहन ने देखा कि उसे परमेश्वर में विश्वास करने से वे लाभ नहीं मिल रहे थे जो वह चाहती थी और उसकी आशीषों की इच्छा चकनाचूर हो गई, इसलिए उसने सभाओं में शामिल होना और अपना कर्तव्य निभाना बंद कर दिया और यहाँ तक कि परमेश्वर को भी नकार दिया। मेरी बहन के व्यवहार से यह स्पष्ट था कि वह बिल्कुल भी परमेश्वर की सच्ची विश्वासी नहीं थी और उसका सार एक छद्म-विश्वासी का था।
बाद में, मैंने खुद पर विचार किया : मैंने हमेशा सोचा था कि जब तक मैं चीजों का त्याग करती हूँ, परमेश्वर के लिए खुद को खपाती हूँ और अंत तक उसका अनुसरण करती हूँ, तो अंततः मैं बचाई जाऊँगी। लेकिन क्या यह नजरिया वास्तव में सही था? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “लोग कहते हैं कि परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है, और अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह परम धार्मिक है। यदि मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है? मैं सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ और सभी लोगों का न्याय अपने धार्मिक स्वभाव से करता हूँ, फिर भी मैं लोगों से जो अपेक्षाएं रखता हूँ उन सबमें उचित स्थितियाँ शामिल होती हैं, और मैं जो अपेक्षा करता हूँ वह सभी लोगों के लिए पूरा करना जरूरी है, चाहे वे कोई भी हों। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि तुम कितने योग्य हो या कितने अनुभवी हो; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तुम मेरे मार्ग पर चलते रहे हो या नहीं, सत्य के लिए तुममें प्रेम और प्यास है या नहीं। यदि तुममें सत्य की कमी है, और इसकी बजाय तुम मेरे नाम को लज्जित करते हो, और मेरे मार्ग के अनुसार क्रिया-कलाप नहीं करते हो, कोई परवाह या चिंता किए बगैर सिर्फ अनुसरण मात्र कर रहे हो, तो मैं उस समय तुम्हें गिरा दूँगा और तुम्हारी बुराई के लिए तुम्हें दंड दूँगा, तब तुम्हारे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तुम यह कह पाओगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? यदि तुम आज मेरे द्वारा बोले गए वचनों का पालन करते हो, तो तुम एक ऐसे इंसान हो जिसे मैं स्वीकृति देता हूँ। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हमेशा पीड़ा सही है, कि तुमने तूफानों के बीच उसका अनुसरण किया है और उसके साथ अच्छा और बुरा समय बिताया है, लेकिन तुमने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को नहीं जिया है; तुम हर दिन सिर्फ परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करना और उसके लिए स्वयं को खपाना चाहते हो, तुमने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में नहीं सोचा है। तुम यह भी कहते हो, ‘चाहे जो हो, मैं मानता हूँ कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं उसके लिए पीड़ा सहता हूँ, भाग-दौड़ करता हूँ और अपने आपको उसे समर्पित करता हूँ, और भले ही मेरे पास कोई प्राप्ति न हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है; वह निश्चित ही मुझे याद रखेगा।’ यह सच है कि परमेश्वर धार्मिक है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है : इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और यह देह या मानवीय लेन-देनों से दूषित नहीं है। जो लोग विद्रोही हैं और विरोध में हैं, जो उसके मार्ग का पालन नहीं करते हैं, उन सबको दंडित किया जाएगा; न तो किसी को क्षमा किया जाएगा, न ही किसी को बख्शा जाएगा! कुछ लोग कहते हैं, ‘आज मैं तुम्हारे लिए भाग-दौड़ कर रहा हूँ; जब अंत आएगा, तो क्या तुम मुझे थोड़ा-सा आशीष दे सकते हो?’ तो मैं तुमसे पूछता हूँ, ‘क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है?’ तुम जिस धार्मिकता की बात करते हो, वह एक सौदे पर आधारित है। तुम केवल यह सोचते हो कि मैं सभी लोगों के प्रति धार्मिक और निष्पक्ष हूँ, और जो लोग अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे उन्हें निश्चित रूप से बचा लिया जाएगा और वे मेरे आशीष प्राप्त करेंगे। ‘जो लोग अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे उन्हें निश्चित रूप से बचा लिया जाएगा,’ मेरे इन वचनों का एक भीतरी अर्थ है : जो लोग अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं, उन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से ग्रहण कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो मेरे द्वारा जीते जाने के बाद, सत्य खोजते हैं और जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। तुमने कैसी स्थितियाँ हासिल की हैं? तुमने केवल अंत तक मेरा अनुसरण करना ही हासिल किया है, लेकिन तुमने और क्या हासिल किया है? क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है? तुमने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं है। तुमने बस सबसे सरल और आसान रास्ता ढूँढ़ लिया है और इसी का अनुसरण किया है। तुम्हारे जैसे इंसान के लिए मेरा धार्मिक स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, यह धार्मिक प्रतिफल है, और यह बुरा काम करने वालों के लिए धार्मिक दंड है; जो लोग मेरे मार्ग पर नहीं चलते उन्हें निश्चित ही दंड दिया जाएगा, भले ही वे अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। लोग दूसरों को बाहरी दिखावे के आधार पर आँकते हैं, लेकिन परमेश्वर किसी व्यक्ति के सार को देखता है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि किसी व्यक्ति ने कितना बलिदान दिया है या उसने खुद को कितना खपाया है, उसने कितना कष्ट सहा है या उसकी वरिष्ठता क्या है। मुख्य बात यह है कि क्या कोई व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग पर चलता है, क्या वह सत्य का अभ्यास करता है और क्या उसका स्वभाव बदल गया है। इन्हीं चीजों पर किसी का परिणाम निर्धारित होता है। लेकिन मेरा मानना था कि परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम और गंतव्य इस आधार पर निर्धारित करता है कि क्या कोई व्यक्ति अंत तक अनुसरण कर सकता है, उसने कितने समय तक विश्वास किया है और उसने कितना कष्ट सहा है या खुद को खपाया है। मैंने सोचा कि जब हम प्रयास करते रहेंगे और खुद को खपाते रहेंगे और अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, तो जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा, हमारे पास परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की उम्मीद होगी और परमेश्वर की आशीषों का आनंद लेने के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने की उम्मीद होगी। लेकिन ये बस मेरी धारणाएँ और कल्पनाएँ थीं। मैंने यह भी समझा कि अंत तक अनुसरण करने के बाद बचाए जाने का मतलब है कि कोई व्यक्ति सत्य और स्वभावगत बदलाव का अनुसरण कर रहा है और सभी चीजों में परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम है, अंततः उसका भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो जाता है और विभिन्न परीक्षणों और शोधन के बीच वह न तो परमेश्वर से इनकार करता है और न ही परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, बल्कि फिर भी परमेश्वर का अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम रहता है। केवल ऐसे लोग ही अंततः परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे और उसके राज्य में प्रवेश करेंगे। लेकिन जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, जिनके भ्रष्ट स्वभाव में कोई बदलाव नहीं दिखता और जो अभी भी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और प्रतिरोध करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। अपने परिवार के सदस्यों को बाहर निकाले जाने के मुद्दे का दो बार सामना करने पर विचार करते हुए मैंने उनके सार का भेद नहीं पहचाना। मैं नहीं जानती थी कि परमेश्वर किस तरह के लोगों को बचाता है या हटाता है और मैं देह के स्नेह के पक्ष में खड़ी थी, मैं जाकर उन्हें समझाना चाहती थी, मैं उन्हें श्रम करने के लिए परमेश्वर के घर में रखना चाहती थी। मैंने सोचा कि इस तरह उनके पास उद्धार की उम्मीद होगी। लेकिन मेरी सोच परमेश्वर के वचनों से पूरी तरह असंगत थी। मैंने सोचा कि प्रभु यीशु ने क्या कहा था : “जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)। मैंने विचार किया, “जिन्होंने प्रभु के लिए सब कुछ त्याग दिया और खुद को खपाया, उन्हें प्रभु यीशु की स्वीकृति क्यों नहीं मिली और इसके बजाय प्रभु द्वारा दंड दिए और शापित किए गए?” मेरे नजरिए के अनुसार कोई भी जो बहुत त्याग करता है और खपता है और कई वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, वह निश्चित रूप से बचाया जाएगा। तो फरीसी, जिन्होंने सालों मंदिर में यहोवा की सेवा की, वे न केवल परमेश्वर द्वारा बचाए नहीं गए, बल्कि अंत में उन्हें साँपों की संतान कहकर परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया और दोषी ठहराया गया और कहा गया कि उन पर धिक्कार है। ऐसा इसलिए था क्योंकि भले ही फरीसी बाहर से परमेश्वर में विश्वास करते थे, लेकिन वास्तव में उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल नहीं थे, उन्होंने कभी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया और यहाँ तक कि प्रभु यीशु को नकारा, उसे दोषी ठहराया और उसे सूली पर चढ़ा दिया। उन्होंने परमेश्वर के स्वभाव को गंभीर रूप से नाराज किया, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर ने उन्हें दंड दिया और शापित किया। अब इसे देखते हुए मैंने सोचा था कि यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, परमेश्वर के लिए त्याग करते और खुद को खपाते हो और अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तो तुम्हें बचाया जा सकता है और तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हो। लेकिन यह सब बस मेरे ख्याली पुलाव, धारणाएँ और कल्पनाएँ थीं। यह बेतुका और निरर्थक था और वास्तविकता में इसका कोई आधार नहीं था! मैं अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर मूल्यांकन कर रही थी, यहाँ तक कि अपने परिवार को श्रम करने के लिए कलीसिया में रखना चाहती थी, यह सोचती थी कि अंत में परमेश्वर उन्हें एक अच्छा परिणाम और गंतव्य देगा। मैं सचमुच मूर्ख और अंधी थी! उनके सार और जिस रास्ते पर वे चले, उसके आधार पर वे बिल्कुल वही जंगली दाने थे जो अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रकट हुए थे। वे छद्म-विश्वासी थे जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं था और उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया और भले ही वे अनिच्छा से परमेश्वर के घर में रहे, उन्हें नहीं बचाया जा सकता था।
मैं आत्मचिंतन करती रही, “अपने परिवार के सदस्यों को बाहर निकाले जाने का सामना करते समय मैं कभी भी परमेश्वर के पक्ष में नहीं खड़ी हो सकी। मैं किसके नियंत्रण में थी?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “भावनाओं का सार क्या है? यह दैहिक भावनाओं को सबसे आगे रखना और सत्य सिद्धांतों को किनारे कर देना है। भावनाओं की अभिव्यक्तियों को कई शब्दों और वाक्यांशों का उपयोग करते हुए बताया जा सकता है : अनुचित पक्षपात, सिद्धांतहीन तरीके से दूसरों की रक्षा करना, दैहिक संबंध बनाए रखना और निष्पक्षता की अनुपस्थिति। ये ही भावनाएँ हैं। लोगों में भावनाएँ होने और उन्हीं भावनाओं के अनुसार जीवन जीने के क्या संभावित दुष्परिणाम हो सकते हैं? परमेश्वर लोगों की भावनाओं से सबसे अधिक घृणा क्यों करता है? कुछ लोग हमेशा अपनी भावनाओं से विवश रहते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, और यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहते हैं किंतु ऐसा नहीं कर पाते, इसलिए वे अपनी भावनाओं से त्रस्त महसूस करते हैं। ऐसे बहुत-से लोग हैं जो सत्य को समझते हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला सकते; ऐसा भी इसलिए है कि वे भावनाओं से बाधित हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य वास्तविकता क्या है?)। “कुछ लोग बेहद भावुक होते हैं। रोजाना वे जो कुछ भी कहते हैं, जैसा आचरण करते हैं और जिस भी तरह से मामलों से निपटते हैं, उसमें वे अपनी भावनाओं के अनुसार जीते हैं। वे इस या उस व्यक्ति के प्रति कुछ महसूस करते हैं और वे अपने दिन रिश्तों और भावनाओं के मामलों पर ध्यान देते हुए बिताते हैं। अपने सामने आने वाली सभी चीजों में वे भावनाओं के दायरे में रहते हैं। जब ऐसे व्यक्ति का कोई अविश्वासी रिश्तेदार मरता है, तो वह तीन दिनों तक रोता है और शरीर को दफनाने नहीं देता, उसके मन में अभी भी मृतक के लिए भावनाएं होती हैं। वे अत्यंत भावुक होते हैं। तुम कह सकते हो कि भावनाएं इस व्यक्ति का घातक दोष है। वह सभी मामलों में अपनी भावनाओं से विवश होता है, वह सत्य का अभ्यास करने या सिद्धांत के अनुसार कार्य करने में अक्षम होता है और वह अक्सर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है। भावनाएँ उसकी सबसे बड़ी कमजोरी, उसका घातक दोष होती हैं, और उसकी भावनाएँ उसे तबाह और बरबाद करने में पूरी तरह सक्षम होती हैं। जो लोग अत्यधिक भावुक होते हैं, वे सत्य को अभ्यास में लाने या परमेश्वर के प्रति समर्पित होने में असमर्थ होते हैं। ऐसी प्रबल भावनाओं के साथ वे बस देह के सामने झुक सकते हैं; वे मूर्ख और भ्रमित लोग हैं। इस तरह के लोगों की प्रकृति अत्यधिक भावुक होने की होती है। वे अपनी भावनाओं के अनुसार जीते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। परमेश्वर के वचनों से ही मुझे आखिरकार पता चला कि मेरे परिवार को बाहर निकाले जाने के मामले में मेरे सही व्यवहार न कर पाने का मूल कारण यह था कि मैं स्नेह से बेबस थी। मैंने अपने परिवार के प्रति अपने स्नेह को हर चीज से ऊपर माना, यहाँ तक कि सत्य सिद्धांतों से भी ऊपर। मैं “खून के रिश्ते सबसे मजबूत होते हैं,” “परिवार एक साथ रहता है,” और “मनुष्य निर्जीव नहीं है; वह भावनाओं से मुक्त कैसे हो सकता है?” जैसे शैतानी सिद्धांतों के अनुसार जी रही थी। मैं सही और गलत में अंतर करने में विफल रही और मैंने अपना स्थान और सिद्धांत खो दिए। वास्तव में, अगर मैं उनके व्यवहार को नहीं समझती थी, तो मैं कलीसिया को पत्र लिखकर पूछताछ करके इसे स्पष्ट कर सकती थी। मैं सत्य सिद्धांतों के अनुसार उनके सार का भेद भी पहचान सकती थी, यह देखने के लिए कि क्या वास्तव में उनके साथ प्रेमपूर्ण मदद के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए। लेकिन अगर उनकी मदद नहीं की जानी थी, तो भले ही वे परिवार के सदस्य हों, मुझे स्नेह के आधार पर आँख मूँदकर दया नहीं दिखानी चाहिए थी। लेकिन मैंने ऐसा नहीं सोचा और मैं पहले स्नेह के पक्ष में खड़ी थी, उनके लिए दुख महसूस कर रही थी, रो रही थी और अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रही थी। यहाँ तक कि मैंने गिरफ्तारी के खतरे की परवाह किए बिना उनका साथ देने के लिए वापस जाने के बारे में भी सोचा। जब कलीसिया ने मुझसे उनके व्यवहार का विवरण देने के लिए कहा, तो मैं केवल मेरे प्रति उनकी दयालुता के बारे में ही सोच सकी। मैं स्नेह में पूरी तरह अंधी हो गई थी और मैंने परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं की और यहाँ तक कि मैं अपने परिवार को बचाने के लिए चालों और धोखे का इस्तेमाल करना चाहती थी, मैंने बिल्कुल भी विचार नहीं किया कि उन्हें परमेश्वर के घर में रखने से कलीसिया के कार्य को कितना नुकसान होगा। मैंने देखा कि स्नेह मेरी घातक कमजोरी है और वे मेरे सत्य का अभ्यास करने में बाधा और ठोकर का कारण बन गए थे। मैं स्नेह के भीतर जीती थी और अपने पिता और बहन के साथ परमेश्वर का इरादा जाने बिना जमीर और प्रेम के साथ व्यवहार करती थी। मैं उनके व्यवहार के बारे में नहीं जानती थी लेकिन आँख मूँदकर उनका साथ देने के लिए जाना चाहती थी। क्या यह मूर्खतापूर्ण प्रेम नहीं था? अगर मैं भागकर घर वापस जाती, तो न केवल मैं स्नेह के प्रलोभन में पड़ जाती, बल्कि मेरी दशा में व्यवधान पड़ता, मेरे कर्तव्य में देरी हो जाती और सबसे महत्वपूर्ण बात, मेरे पुलिस रिकॉर्ड के साथ अगर मैं पकड़ी जाती, तो इसका असर काम पर पड़ता। क्या इससे गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ पैदा नहीं होती? यह महसूस करके मुझे थोड़ा डर लगा और मुझे बेनकाब करने के लिए मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया; अन्यथा मैं स्नेह के अनुसार जीने के नुकसान और परिणामों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाती और बिना एहसास किए ही बर्बाद हो जाती। मुझे स्नेह छोड़ना पड़ा और अपने परिवार के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करना पड़ा। मैं अपने पिता और बहन को कलीसिया से निष्कासित किए जाने के बारे में अब और दुखी नहीं हो सकती थी क्योंकि यह पूरी तरह से परमेश्वर की धार्मिकता थी। उनके पैरों के छाले उनके अपने रास्ते के कारण थे और वे खुद के अलावा किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकते थे।
परमेश्वर के वचनों में मुझे स्नेह छोड़ने और रिश्तेदारों के साथ सही व्यवहार करने का मार्ग मिला। परमेश्वर कहता है : “एक दिन, जब तुम थोड़ा-बहुत सत्य समझ लोगे, तो तुम यह नहीं सोचोगे कि तुम्हारी माँ सबसे अच्छी इंसान है, या तुम्हारे माता-पिता सबसे अच्छे लोग हैं। तुम महसूस करोगे कि वे भी भ्रष्ट मानवजाति के सदस्य हैं, उनके भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल एक-जैसे हैं, उन्हें सिर्फ तुम्हारे साथ उनका रक्त-संबंध अलग करता है और अगर वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे भी गैर-विश्वासियों के ही समान हैं। तब तुम उन्हें परिवार के किसी सदस्य के नजरिये से नहीं, या अपने देह के संबंध के नजरिये से नहीं, बल्कि सत्य के दृष्टिकोण से देखोगे। तुम्हें किन मुख्य पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर में विश्वास के बारे में उनके दृष्टिकोण, दुनिया को लेकर उनके दृष्टिकोण, मामले सँभालने समय उनके दृष्टिकोण, और सबसे महत्वपूर्ण बात, परमेश्वर के प्रति उनके रवैये देखने चाहिए। अगर तुम इन पहलुओं को सटीक ढंग से देख लेते हो तो तुम स्पष्ट रूप से देख पाओगे कि वे अच्छे लोग हैं या बुरे लोग। ... मान लो तुम अपने संबंधियों को स्पष्ट रूप से देखते हो और कहते हो : ‘मेरी माँ सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करती है; वास्तव में वह सत्य से विमुख रहती है और घृणा करती है। अपने सार में वह बुरी इंसान है, एक दानव है। मेरे पिता हमेशा लोगों को खुश करने की कोशिश करते हैं और हमेशा मेरी माँ का पक्ष लेते हैं। वह न तो सत्य को स्वीकार करते हैं और न ही इसका अभ्यास करते हैं; वह सत्य का अनुसरण करने वाले इंसान नहीं हैं। वह छद्म-विश्वासी हैं। मैं उनके खिलाफ पूरी तरह विद्रोह करूँगा और उनके साथ स्पष्ट सीमारेखा खींच दूँगा।’ इस तरह तुम सत्य के पक्ष में खड़े होगे और उन्हें ठुकरा सकोगे। जब तुम यह भेद पहचान लोगे कि वे कौन हैं, किस किस्म के लोग हैं, तो क्या तब भी तुम उनके लिए स्नेह रखोगे? क्या तुम तब भी उनके प्रति पारिवारिक स्नेह महसूस करोगे? क्या तुम तब भी उनके साथ दैहिक संबंध रखोगे? तुम ऐसा नहीं करोगे। क्या तुम्हें तब भी इस तरह के स्नेह को संयम में रखने की जरूरत पड़ेगी? (नहीं।) तो तुम इन कठिनाइयों को वास्तव में कैसे हल करते हो? सत्य को समझकर, परमेश्वर पर निर्भर रहकर और परमेश्वर की ओर देखकर” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने से ही सच्चा परिवर्तन आ सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि परिवार के सदस्यों के साथ व्यवहार करते समय सबसे पहले हमें परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनका भेद पहचानना होगा और उनकी असलियत देखनी होगी कि वे कौन हैं और एक बार जब हम उनके प्रकृति सार की असलियत देख लेंगे, तो हमें पता चल जाएगा कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार उनके साथ कैसे व्यवहार करना है। परिवार के वे सदस्य जो सत्य का अनुसरण करते हैं और उससे प्रेम करते हैं, अगर वे सत्य को नहीं समझते हैं और भ्रष्टता प्रकट करते हैं, या अगर वे दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों की असलियत नहीं देख पाते हैं और क्षण भर के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं, तो हम सत्य सिद्धांतों का पालन कर सकते हैं और प्रेम के साथ उनकी मदद कर सकते हैं, या उन्हें उजागर कर सकते हैं और उनकी काट-छाँट कर सकते हैं। लेकिन अगर वे सत्य से विमुख हैं, सत्य से घृणा करते हैं और सार रूप में वे छद्म-विश्वासी, बेतुके प्रकार और बुरे लोग हैं, तो हम प्रेम के साथ उनकी मदद और समर्थन नहीं कर सकते। हमें प्रेम को घृणा से अलग करना चाहिए, अपने दिलों में उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें अस्वीकार करना चाहिए और अपने और उनके बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी चाहिए। साथ ही मैं यह भी समझ गई कि जहाँ सतह पर मेरा अपने पिता और बहन के साथ खून का रिश्ता है और वे मेरा परिवार हैं, उनके सार शैतान और छद्म-विश्वासियों के हैं और वे मेरे वाले रास्ते पर नहीं चलते हैं। एक बार जब मैं यह समझ गई, तो मैं अब स्नेह से बेबस नहीं थी और अब मैं अपने कर्तव्य में अपने दिल को शांत कर सकती हूँ। मेरा यह समझ प्राप्त कर पाना और प्रवेश पूरी तरह से मुझ पर परमेश्वर के वचनों के कार्य का परिणाम था। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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