खतरनाक परिस्थिति में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहना
ली फांग, चीनजुलाई 2023 में एक दिन जब मैं एक सभा से लौटी तो एक बहन मेरे पास दौड़ी आई और बताने लगी कि किउ लिंग नाम के सामान्य मामलों के...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मेरा जन्म एक गरीब ग्रामीण परिवार में हुआ था। जब मैं हाई स्कूल में थी, तो मेरे माता-पिता ट्यूशन का खर्च नहीं उठा सकते थे, इसलिए उन्होंने मेरे चाचा से पैसे उधार लेने की कोशिश की। लेकिन मेरी चाची को डर था कि हम पैसे वापस नहीं चुका पाएँगे और वह हमें पैसे उधार देने को तैयार नहीं थी। मैंने मन ही मन सोचा, “मुझे कॉलेज में दाखिला लेने के लिए मेहनत करनी ही होगी ताकि मेरे आस-पास के लोग मेरे परिवार का सम्मान करें।” स्कूल में रहते हुए, पैसे बचाने के लिए मैं केवल घर से लाई हुई रोटियाँ खाती थी। लंबे समय तक कुपोषण के कारण मस्तिष्क में खून की अपर्याप्त आपूर्ति के चलते मुझे लगातार चक्कर आते और कमजोरी महसूस होती थी और मेरी सीखने की क्षमता पर भी इसका असर पड़ रहा था। अंत में, मैं कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में असफल हो गई। मैं फूट-फूटकर रो पड़ी और शिकायत की कि मेरी किस्मत बहुत खराब है। लेकिन मैं अपनी इस किस्मत के आगे झुकने को तैयार नहीं थी। एक उच्च-स्तरीय डिग्री पाने और भीड़ से अलग दिखने के लिए, मैंने वयस्क स्व-शिक्षा परीक्षा, अकाउंटिंग प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के लिए भी पंजीकरण किया और सिविल सेवा परीक्षाएँ भी दीं। लेकिन मेरे सभी प्रयासों के बावजूद, मैं अंत में फिर भी असफल रही। इसलिए, मैं एक कारखाने में काम करने चली गई। वर्कशॉप की आँकड़ा-विशेषज्ञ बनने और दूसरों से सम्मान पाने के लिए, जब दूसरे आराम कर रहे होते, तब मैं ओवरटाइम करती और आँकड़ा-विशेषज्ञ के पेशेवर ज्ञान का अध्ययन करने के लिए देर रात तक जागती। मैं हर दिन दस घंटे से ज्यादा काम करके खुद को थका देती थी। इसके अलावा, मैं हर दिन ओवरटाइम करती और देर रात तक जागती भी थी। इतनी मेहनत करने से मुझे चक्कर आते थे, मैं पूरी तरह थक जाती थी और काम पर मुझे झपकी आ जाती थी। नतीजतन, मैंने उत्पादों की संख्या के आँकड़ों में गलती कर दी, जिससे कारखाने को लगभग भारी नुकसान हो ही गया था। टीम लीडर ने वर्कशॉप के सभी कर्मचारियों के सामने मेरी आलोचना की। उस समय, मेरी बहुत इच्छा हुई कि मैं जमीन में कोई छेद ढूँढूँ और उसमें समा जाऊँ। मेरा सिर भन्ना गया और मैं वहीं मौके पर बेहोश हो गई। तब से, मैं संवेदन-तंत्रिका संबंधी सुनने की समस्या से पीड़ित हूँ और मैं कोई भी आवाज या तनाव बर्दाश्त नहीं कर सकती। जब भी मुझ पर काम का बहुत अधिक दबाव होता, तो मुझे चक्कर आते और मेरे कानों में घंटियाँ बजने लगतीं। इंजेक्शन और दवाएँ इसे ठीक नहीं कर सकीं और मैं अब और काम पर नहीं जा सकती थी। उस समय, मैं दिल से बहुत दुखी महसूस करती थी और मैं दिन भर शिकायत करती रहती थी कि मेरी किस्मत इतनी खराब क्यों है। मैं अक्सर खुद को एक कमरे में बंद कर लेती और रोती, यहाँ तक कि सब कुछ खत्म करने के बारे में भी सोचती। चूँकि मैं लंबे समय से भावनात्मक दबाव और दुख में जी रही थी, मेरी सुनने की क्षमता धीरे-धीरे और खराब होती गई।
2013 में, मेरे सास-ससुर ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया और मुझे सुसमाचार सुनाया। जब मैंने अपने भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचन पढ़े और कलीसियाई जीवन जिया, तो मैंने विशेष रूप से स्वतंत्र और मुक्त महसूस किया। धीरे-धीरे मेरी मनोदशा बेहतर हो गई और जीवन के लिए मेरी आशा फिर से जाग उठी। बाद में, मुझे कलीसिया में अगुआ के रूप में चुना गया। मैंने मन ही मन सोचा, “मैंने समाज में इतनी बड़ी कीमत चुकाई, लेकिन वह सब व्यर्थ गया। अब भले ही मैं अभी-अभी परमेश्वर के घर में आई हूँ, मैं एक अगुआ के कर्तव्य निभा सकती हूँ। परमेश्वर में विश्वास करना बेहतर है। मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी जिससे शायद मुझे आगे और तरक्की मिले और भविष्य में और भी ज्यादा लोग मेरा सम्मान करें।” इसलिए मैं अपने कर्तव्य निभाने में और अधिक सक्रिय हो गई। चाहे धूप हो या बारिश, मैं दिन भर समूह की सभाओं की अगुआई करने में व्यस्त रहती थी। मेरे भाई-बहनों ने भी अपने कर्तव्य में बोझ उठाने के लिए मेरी सराहना की। बाद में मुझे एक उपदेशक के रूप में चुना गया। रुतबे की मेरी इच्छा पूरी होने के साथ, मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने के लिए और अधिक ऊर्जा थी। ठीक जब मैं अपने भाई-बहनों की सराहना का आनंद ले रही थी, गैस विषाक्तता की एक घटना के कारण मेरा बहरापन और बढ़ गया। सभाओं के दौरान, जब मेरे भाई-बहन धीमी आवाज में बात करते तो मैं उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं सुन पाती थी और मैं अक्सर अपने बहरेपन से बेबस रहती, एक नकारात्मक दशा में जीती थी। अंत में, मैं वास्तविक काम करने में असमर्थ हो गई और मेरा कर्तव्य बदल दिया गया। यह सोचकर कि अब मैं एक अगुआ का कर्तव्य नहीं निभा रही थी और दूसरों का सम्मान नहीं पा सकती थी, मैंने अपनी बुरी किस्मत के बारे में और भी अधिक शिकायत की। उसके बाद, मैं फिर से उठ नहीं सकी और परमेश्वर में अपनी आस्था खो बैठी।
बाद में, कुछ समय के इलाज के बाद, मेरी सुनने की क्षमता थोड़ी बेहतर हो गई और अगुआओं ने मेरे लिए सींचने का कर्तव्य निभाने की व्यवस्था की। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैं सींचने के कर्तव्य में कुछ नतीजे हासिल कर सकी, तो भाई-बहन मेरी उतनी ही सराहना करेंगे।” इसलिए, मैं हर दिन संबंधित सिद्धांतों को पढ़ती और खुद को सत्य से लैस करती, अक्सर रात में 11 या 12 बजे तक जागती। धीरे-धीरे मेरे कर्तव्य निर्वहन के नतीजे बेहतर होते गए और मुझे एक व्यापक दायरे के काम की जिम्मेदारी सँभालने के लिए पदोन्नत किया गया। जब मैंने दोबारा भाई-बहनों की सराहना पाने के बारे में सोचा, तो मैं बहुत खुश थी। मैंने मन ही मन सोचा, “मेहनत का फल मीठा होता है। अगर मैं और भी ज्यादा मेहनत करूँ, तो शायद मुझे और तरक्की मिल सकती है। इस तरह और भी ज्यादा लोग मेरी सराहना करेंगे।” लेकिन बाद में मेरा सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस बढ़ गया और मेरी सुनने की क्षमता इतनी ज्यादा खराब हो गई कि मैं अब दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद नहीं कर सकती थी। अगुआओं ने मेरे लिए व्यवस्था की कि मैं अपनी स्थानीय कलीसिया में वापस जाकर इलाज कराऊँ और साथ ही अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य निभाती रहूँ। मैं बहुत हताश महसूस कर रही थी। मैंने सोचा कि मैंने कितनी मुश्किल से और कितनी बड़ी कीमत चुकाकर दूसरों की सराहना हासिल की थी। लेकिन अपनी बीमारी के कारण मैं अब यह कर्तव्य नहीं निभा सकती थी। मेरी किस्मत इतनी खराब क्यों थी? बाद में, मेरी सुनने की क्षमता कमजोर होने के कारण मेरे लिए दूसरों से संवाद करना बहुत मुश्किल हो गया। मैं केवल कुछ सामान्य कामकाज ही कर सकती थी। इस बात से मेरे दिल को खास तौर पर बहुत पीड़ा हुई और मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैं बहरी नहीं होती, तो मुझे सुसमाचार का प्रचार करने और नए लोगों को सींचने का अवसर मिलता। लेकिन अब मैं केवल कुछ सामान्य कामकाज ही कर सकती हूँ। अगर मैं सबकी नजरों में नहीं रहूँगी, तो कौन मेरी सराहना करेगा? मेरी किस्मत इतनी खराब क्यों है? खैर, यही मेरी किस्मत है, तो मैं बस कामचलाऊ ढंग से अपना कर्तव्य करती रहूँगी और दिन गिनती रहूँगी।” इसके बाद, भले ही मैंने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा, मैं लगातार एक हताश दशा में जीती रही और अपना कर्तव्य निभाते समय ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती थी। मैं हमेशा कोई न कोई बात भूल जाती थी और अक्सर गलतियाँ करती थी, जिससे चीजों में देरी होती थी।
बाद में, मेरे साथ सहयोग करने वाली बहन ने मुझे याद दिलाया कि इस दशा में जीना खतरनाक है और मुझे अपनी नकारात्मक भावनाओं का समाधान करने के लिए फौरन सत्य खोजना होगा। अपनी बहन के याद दिलाने पर ही मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं निराशा में नहीं जीना चाहती। इस तरह जीना बहुत दुखदायी है। मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं अपनी समस्याओं को समझूँ और इस गलत दशा से बाहर निकलूँ।” एक दिन अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े, जिन्होंने तुरंत मेरे दिल को छू लिया। परमेश्वर कहता है : “निस्संदेह प्रत्येक व्यक्ति के लिए हताशा की नकारात्मक भावना पैदा होने का मूल कारण अलग होता है। किसी एक प्रकार के व्यक्ति में इस बात से हताशा की भावना आ सकती है कि वह अपनी भयावह नियति के ख्याल से निरंतर घिरा रहता है। क्या यह एक कारण नहीं है? (अवश्य है।) ऐसे लोगों का बचपन गाँव-कस्बे या किसी गरीब इलाके में गुजरा था, उनका परिवार समृद्ध नहीं था, कुछ जरूरी चीजों के अलावा उनके परिवार के पास कीमती चीजें नहीं थीं। शायद उनके पास पहनने के लिए एक-दो जोड़ी फटे-पुराने कपड़े थे, आमतौर पर वे कभी भी अच्छा भोजन नहीं खा पाते थे, और उन्हें माँस-मच्छी खाने के लिए नए साल या छुट्टियों की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। कभी-कभी वे भूखे रह जाते थे, उनके पास शरीर को गर्म रखने के लिए पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे, कटोरा भर माँस-मच्छी खाना उनके लिए बस एक सपना था और खाने को एक टुकड़ा फल पाना भी मुश्किल था। ऐसे माहौल में रहते हुए वे बड़े शहरों में रहने वाले उन दूसरे लोगों से अलग महसूस करते, जिनके माता-पिता समृद्ध थे, जो अपने मन का खा और पहन सकते थे, जिनकी पसंद की हर चीज उन्हें फौरन मिल जाती थी और जिन्हें चीजों का अच्छा ज्ञान था। वे सोचते, ‘ये लोग बहुत भाग्यशाली हैं। मेरा भाग्य इतना खराब क्यों है?’ वे हमेशा भीड़ में अलग दिखना चाहते हैं, अपनी नियति बदलना चाहते हैं। मगर किसी के लिए अपनी नियति बदलना इतना आसान नहीं होता। जब कोई ऐसी स्थिति में पैदा होता है, तो कोशिश करके भी वह अपने भाग्य को कितना बदल सकता है, उसे कितना बेहतर बना सकता है? वयस्क होने के बाद ऐसे लोग समाज में जहाँ भी जाते हैं, बाधाएँ उन्हें रोक देती हैं, हर कहीं उन्हें डराया-धमकाया जाता है, ऐसे में वे हमेशा बड़ा अभागा महसूस करते हैं। उन्हें लगता है, ‘मैं इतना अभागा क्यों हूँ? मेरी मुलाकात हमेशा कमीनों से क्यों होती है? बचपन में मेरा जीवन मुश्किलों में गुजरा, बस ऐसा ही था। अब मेरे बड़े हो जाने पर भी इतना ही बुरा हाल है। मैं हमेशा दिखाना चाहता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ, मगर मुझे कभी मौका नहीं मिलता। ...’ ... एक बार परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद, ऐसे लोग परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने की ठान लेते हैं, वे कठिनाइयाँ झेलने और कड़ी मेहनत करने लायक हो जाते हैं, हर मामले में किसी भी दूसरे से ज्यादा सहने में समर्थ हो जाते हैं, और वे ज्यादातर लोगों की स्वीकृति और आदर पाने का प्रयत्न करते हैं। उन्हें लगता है कि शायद उन्हें कलीसिया अगुआ, कोई प्रभारी या टीम अगुआ भी चुना जा सकता है, और तब क्या वे अपने पूर्वजों और अपने परिवार का सम्मान नहीं बढ़ाएंगे? तब क्या उन्होंने अपनी नियति नहीं बदल ली होगी? मगर वास्तविकता उनकी कामनाओं पर खरी नहीं उतरती और वे मायूस होकर सोचते हैं, ‘मैंने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, और अपने भाई-बहनों से मेरे अच्छे संबंध हैं, लेकिन ऐसा क्यों है कि जब कभी अगुआ, प्रभारी या टीम अगुआ चुनने का समय आता है, मेरी बारी कभी नहीं आती? क्या इसलिए कि मैं दिखने में बहुत साधारण हूँ, या मेरा कामकाज बढ़िया नहीं रहा, और मुझ पर किसी का ध्यान नहीं गया? हर बार चुनाव होने पर मुझे थोड़ी-सी आशा होती है, और मैं एक टीम अगुआ भी चुन लिया जाऊँ तो मुझे खुशी होगी। मुझमें परमेश्वर का प्रतिदान करने का बड़ा जोश है, मगर हर बार चुनाव के समय चुने न जाने के कारण मैं निराश हो जाता हूँ। इसका कारण क्या है? क्या इसलिए कि मैं जीवन भर सच में सिर्फ एक औसत, साधारण और मामूली व्यक्ति ही बना रहूँगा? जब मैं पीछे मुड़कर अपने बचपन, अपने यौवन और अपनी अधेड़ उम्र को देखता हूँ, तो जिस मार्ग पर मैं चला हूँ, वह हमेशा बेहद मामूली रहा है और मैंने कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया है। ऐसी बात नहीं है कि मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या मेरी क्षमता बहुत कम है, ऐसा भी नहीं है कि मैं पर्याप्त प्रयास नहीं करता या कठिनाइयाँ नहीं झेल सकता। मेरे संकल्प हैं, मेरे लक्ष्य हैं, और कह सकते हैं कि मैं महत्वाकांक्षी भी हूँ। तो फिर ऐसा क्यों है कि मैं कभी भी भीड़ में सबसे अलग नहीं दिख सकता? अंतिम विश्लेषण यही है कि मेरा ही भाग्य खराब है, दुख सहना मेरी नियति है, और परमेश्वर ने मेरे लिए ऐसी ही व्यवस्था की है।’ वे इस बारे में जितना सोचते हैं, उन्हें लगता है कि उनका भाग्य उतना ही खराब है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। “खुद को हमेशा दुर्भाग्यशाली समझने वाले ऐसे लोगों को निरंतर महसूस होता है कि एक विशाल चट्टान उनके दिल को चूर-चूर कर रही है। चूंकि वे हमेशा मानते हैं कि उनके साथ जो कुछ भी होता है वह उनकी फूटी किस्मत के कारण होता है, इसलिए उन्हें लगता है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे इसमें से कुछ भी नहीं बदल सकते। तो फिर वे क्या करते हैं? वे बस नकारात्मक महसूस करते हैं, और सुस्त होकर सब अपने दुर्भाग्य पर छोड़ देते हैं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों ने जिस बात का खुलासा किया, वह ठीक मेरी ही दशा थी। मैं लगातार निराशा की नकारात्मक भावनाओं में इसलिए जी रही थी क्योंकि मैं हमेशा यह मानती थी कि मेरी किस्मत खराब है। जब मैं बच्ची थी, तो मेरा परिवार गरीब था और लोग हमें नीची नजर से देखते थे, इसलिए मैंने अपनी खराब किस्मत की शिकायत की। मेरा मानना था कि केवल एक बेहतर जीवन जीना और दूसरों की सराहना पाना ही अच्छी किस्मत है। अपनी किस्मत बदलने के लिए, मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की। लेकिन कुपोषण की वजह से मस्तिष्क में खून की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण, मैं कुशलता से पढ़ाई नहीं कर सकी और अंत में मैं कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में असफल हो गई। हालाँकि, मैं अपनी किस्मत को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थी, इसलिए मैं पैसे कमाने के लिए एक कारखाने में काम करने चली गई। एक आँकड़ा-विशेषज्ञ बनने, दफ्तर में बैठने और दूसरों से सराहना पाने के लिए, मैंने तकनीकें सीखने की खातिर ओवरटाइम काम किया। अंत में, मैंने आँकड़ों में एक गलती कर दी और टीम लीडर ने सबके सामने मेरी आलोचना की, जिससे मुझे ऐसा सदमा लगा कि मुझे संवेदन-तंत्रिका संबंधी सुनने की समस्या हो गई। मुझे और भी दृढ़ विश्वास हो गया कि यह मेरी खराब किस्मत के कारण हुआ था और मैं दुख में जीती रही, अपने जीवन की आशा खो बैठी। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, तो मैंने सोचा कि अपने कर्तव्यों को ठीक से निभाकर और एक अगुआ के रूप में पदोन्नत होकर, मैं अपने भाई-बहनों से सराहना पाऊँगी और अपनी किस्मत बदल दूँगी। लेकिन गैस विषाक्तता के कारण मेरा बहरापन बढ़ गया और मैं सामान्य रूप से अपना कर्तव्य नहीं निभा सकी। इसका काम पर असर पड़ा और मेरा कर्तव्य बदल दिया गया। बाद में, जब मैंने सिंचन का कर्तव्य निभाना शुरू किया, तो मैंने उस कर्तव्य में इस उम्मीद से कीमत चुकाई कि ऐसे नतीजे हासिल करूँगी जिससे दूसरे मेरी सराहना करें। जब मुझे पदोन्नत किया गया, तो मैंने सोचा कि मेरी किस्मत ने बेहतर मोड़ लिया है और मुझे अंततः चमकने का मौका मिलेगा। लेकिन मेरा सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस बढ़ गया और मेरा बहरापन भी बदतर हो गया। मैं दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद करने में असमर्थ थी, जिससे मेरे कर्तव्यों पर असर पड़ रहा था। मेरे पास अपनी स्थानीय कलीसिया में वापस जाकर सामान्य मामलों के कर्तव्य निभाने के अलावा कोई चारा नहीं था। चूँकि प्रतिष्ठा और रुतबे की मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई, इसलिए मैंने परमेश्वर को मेरे लिए एक बुरी किस्मत की व्यवस्था करने के लिए दोषी ठहराया। मेरा मानना था कि इस जीवन में मेरी बुरी किस्मत केवल मेहनत और मशक्कत करने के लिए ही थी और इसलिए मैं एक हताश दशा में जीती रही और पूरी तरह से हार मान लिया। मैंने अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाया, लगातार गलतियाँ कीं, कामों में देरी की और अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया। मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास करती थी और मैंने उसके इतने सारे वचन पढ़े थे, लेकिन जब चीजें मुझ पर आतीं, तो मैं सत्य की खोज के लिए उसके सामने नहीं आती थी और जब चीजें मेरे मनमुताबिक नहीं हुईं, तो मैंने शिकायत की कि उसने मेरे लिए एक बुरी किस्मत की व्यवस्था की है। मैं नकारात्मक होकर उसका प्रतिरोध भी करने लगी। यह एक छद्म-विश्वासी का दृष्टिकोण था और मैंने परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी समर्पण नहीं दिखाया।
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और अच्छी किस्मत और बुरी किस्मत की अवधारणा की गहरी समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “मनुष्य का भाग्य कैसा होगा, वह अच्छा होगा या बुरा, इसे लेकर परमेश्वर की व्यवस्था को मनुष्य या किसी भविष्यवक्ता की दृष्टि से देखा या मापा नहीं जाना चाहिए, न ही उसे इस अनुसार मापना चाहिए कि वह व्यक्ति अपने जीवनकाल में कितने धन और महिमा का आनंद लेता है, वह कितने कष्ट सहता है, या अपनी संभावनाओं, शोहरत और लाभ की तलाश में वह कितना सफल है। फिर भी ठीक यही गंभीर गलती वे लोग करते हैं जो कहते हैं कि उनका भाग्य खराब है, और साथ ही ज्यादातर लोग अपना भाग्य मापने में इसी तरीके का प्रयोग करते हैं। अधिकतर लोग अपना भाग्य कैसे मापते हैं? सांसारिक लोग कैसे मापते हैं कि किसी व्यक्ति का भाग्य अच्छा है या बुरा? सबसे पहले तो वे उसे इस आधार पर देखते हैं कि उस व्यक्ति का जीवन आराम से गुजर रहा है या नहीं, वह धन और महिमा का आनंद ले पाता है या नहीं, क्या वह दूसरों से बेहतर जीवनशैली के साथ जी पाता है, अपने जीवनकाल में वह कितने कष्ट सहता है और कितना आनंद ले पाता है, वह कितना लंबा जीवन जीता है, उसका करियर क्या है, उसका जीवन श्रमसाध्य है या आरामदेह और आसान है—वे किसी व्यक्ति का भाग्य अच्छा है या बुरा, यह मापने के लिए इनका और ऐसी ही दूसरी चीजों का प्रयोग करते हैं। क्या तुम भी इसे इसी तरह से नहीं मापते? (हाँ।) तो, जब तुममें से ज्यादातर लोगों का सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो तुम्हें पसंद नहीं, जब मुश्किल वक्त आता है, या तुम बेहतर जीवनशैली का आनंद नहीं ले पाते, तो तुम सब सोचोगे कि तुम्हारा भाग्य भी खराब है, और हताशा में डूब जाओगे। जो लोग कहते हैं कि उनका भाग्य खराब है, जरूरी नहीं कि उनका भाग्य सचमुच खराब हो, इसी तरह से जो लोग कहते हैं कि उनका भाग्य अच्छा है, जरूरी नहीं कि उनका भाग्य सचमुच अच्छा हो। भाग्य अच्छा है या बुरा, यह सही-सही कैसे मापा जाता है? ... बोलो, क्या कोई विधवा अच्छे भाग्य वाली होती है? सांसारिक लोगों के लिए, विधवाओं का भाग्य खराब होता है। अगर वे तीस-चालीस की उम्र में विधवा हो जाएँ, तो उनका भाग्य सचमुच खराब होता है, यह उनके लिए बहुत मुश्किल होता है! लेकिन अपने पति को खोने के कारण अगर कोई विधवा बहुत कष्ट सहती है, और परमेश्वर में विश्वास रखने लगती है, तब क्या उसका जीवन मुश्किल होता है? (नहीं।) चूँकि जो महिलाएँ विधवा नहीं हुई हैं, वे खुशहाल जीवन बिताती हैं, उनके साथ सब-कुछ अच्छा चल रहा होता है, उनके पास आश्रय, खाना और कपड़े सब होता है, बच्चों और नाती-पोतों के साथ उनका परिवार भरा-पूरा होता है, किसी मुश्किल या किसी आध्यात्मिक कमी को महसूस किए बिना वे आरामदेह जीवन जीती हैं, इसलिए वे परमेश्वर में विश्वास नहीं रखतीं, और तुम उनके बीच चाहे जितना भी सुसमाचार फैलाने की कोशिश करो वे उसमें विश्वास नहीं रखतीं। तो फिर किसका भाग्य अच्छा है? (विधवा का भाग्य अच्छा है, क्योंकि वह परमेश्वर में विश्वास रखने लगी है।) देखो, चूँकि सांसारिक लोग मानते हैं कि विधवा का भाग्य बुरा है, वह इतने दुख सहती है, इसलिए वह दिशा बदल कर एक अलग मार्ग पर चलने लगती है, और वह परमेश्वर में विश्वास रखकर उसका अनुसरण करती है—क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अब उसका भाग्य अच्छा है और वह खुशी-खुशी जी रही है? (बिल्कुल।) उसका दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया है। यदि तुम कहते हो कि उसका भाग्य खराब है, तो जीवन में उसका भाग्य हमेशा खराब होना चाहिए, और वह उसे नहीं बदल सकती; तो फिर इसे कैसे बदला जा सकता है? क्या परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद से उसका भाग्य बदल गया है? (नहीं, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीजों के बारे में उसकी सोच बदल गई है।) इसलिए कि उसका चीजों को देखने का तरीका बदल गया है। क्या उसके भाग्य का वस्तुपरक तथ्य बदल गया है? (नहीं।) ... वास्तव में, क्या परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण उसका भाग्य अच्छा हो गया है? जरूरी नहीं। बात बस इतनी है कि अब वह परमेश्वर में विश्वास रखती है, आशान्वित है, अपने दिल में थोड़ा संतोष अनुभव करती है, अनुसरण करने के उसके लक्ष्य बदल गए हैं, उसके विचार अलग हैं, और इसलिए उसके जीने का मौजूदा परिवेश उसे खुश, संतुष्ट, उल्लसित और शांतिपूर्ण बनाता है। उसे लगता है कि अब उसका भाग्य बहुत अच्छा है, उस महिला के भाग्य से बहुत बेहतर, जो अभी विधवा नहीं हुई है। अब जाकर उसे एहसास हुआ है कि उसकी पहले वाली सोच गलत थी कि उसका अपना भाग्य खराब है। इससे तुम सब क्या समझते हो? क्या ‘सौभाग्य’ और ‘दुर्भाग्य’ जैसा कुछ होता है? (नहीं।) नहीं, ऐसा नहीं होता” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचन पढ़ने से मेरा हृदय उज्ज्वल हो गया। किसी व्यक्ति की किस्मत अच्छी है या बुरी, इसे हमारी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर नहीं मापा जा सकता, न ही इसे सांसारिक परिप्रेक्ष्य से देखा जा सकता है। अविश्वासी सोचते हैं कि अच्छा खाना, अच्छे कपड़े पहनना और दूसरों की सराहना और समर्थन का आनंद लेना ही अच्छी किस्मत है। इसके विपरीत, वे सोचते हैं कि यदि आप जीवन भर कंगाल रहते हैं, समाज में सबसे निचले स्तर पर जीते हैं, दूसरों द्वारा नीची नजर से देखे जाते हैं या यदि आप बीमारी की पीड़ा का अनुभव करते हैं या परीक्षाओं और कठिनाइयों का अनुभव करते हैं, तो यह एक बुरी किस्मत होना है। वास्तव में, परमेश्वर के लिए, अच्छी किस्मत या बुरी किस्मत जैसी कोई चीज नहीं है। यह ठीक वैसा ही है जैसा परमेश्वर ने उस विधवा का उदाहरण दिया था। शुरू में वह विधवा सोचती थी कि उसकी किस्मत खराब है, लेकिन बाद में वह सोचने लगी कि उसकी किस्मत अच्छी है। भले ही उसके रहन-सहन का परिवेश नहीं बदला था, लेकिन चीजों पर उसका परिप्रेक्ष्य बदल गया था। उसने परमेश्वर के वचनों से समझा कि चाहे वे लोग जिनका परिवार सुखी है और जीवन आरामदायक है, कितना भी आनंद क्यों न लें, अगर वे परमेश्वर के सामने आकर उसका उद्धार स्वीकार नहीं कर सकते, तो उन्हें अंततः नरक में जाना होगा। उसने जो कष्ट सहे, उनके कारण उसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया और उसे सत्य को समझने और बचाए जाने का अवसर मिला। वह वास्तव में सबसे धन्य व्यक्ति है। चूँकि चीजों के प्रति विधवा का परिप्रेक्ष्य बदल गया था, उसकी मानसिकता भी बदल गई। लेकिन चूँकि मैं सत्य को नहीं समझती थी, मेरा मानना था कि प्रसिद्धि, लाभ और दूसरों की सराहना पाने का मतलब अच्छी किस्मत है और यह कि पदोन्नत होना और एक अगुआ के कर्तव्य निभाने में सक्षम होना अच्छी किस्मत है, इसलिए हर बार जब मेरे कर्तव्य में फेरबदल होता, तो मैं शिकायत करती कि मेरी किस्मत खराब है। मुझे एहसास हुआ कि चीजों पर मेरे दृष्टिकोण कितने बेतुके और अविवेकपूर्ण थे। वास्तव में, परमेश्वर के घर में काम की जरूरतों के आधार पर कर्तव्य बदले जाते हैं और यह बदलाव लोगों की काबिलियत और कौशल के अनुसार व्यापक रूप से तौलकर किए जाते हैं। कोई व्यक्ति कौन-सा कर्तव्य निभाता है, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उसकी किस्मत अच्छी है या बुरी। अगर मेरे कर्तव्य में फेरबदल न हुआ होता और अगर मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया होता, तो भी मुझे बेनकाब करके हटा दिया जाता। भले ही मैं सामान्य मामलों का कर्तव्य निभा रही थी, जब तक मैं सत्य और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करती, तब भी मेरे पास बचाए जाने का अवसर हो सकता था। एक उपदेशक का उदाहरण लेते हैं जो मेरे साथ अपना कर्तव्य निभाती थी। उसके पास कुछ गुण थे और बाद में उसे एक जिला अगुआ के रूप में चुना गया। लेकिन उसने हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे का ही अनुसरण किया और कलीसिया के काम में गड़बड़ी करने और बाधा डालने वाली कई चीजें कीं। अंत में, उसने हठपूर्वक पश्चात्ताप करने से इनकार कर दिया, उसे कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया और उसने बचाए जाने का अपना मौका खो दिया। इससे हम देख सकते हैं कि यदि तुम सत्य का अनुसरण किए बिना और अपने स्वभाव में बदलाव की खोज किए बिना परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो भले ही तुम एक अगुआ बन जाओ, फिर भी तुम्हें परमेश्वर द्वारा बेनकाब करके हटा दिया जाएगा। इन उदाहरणों से, यह स्पष्ट है कि मेरा मानना था कि प्रसिद्धि, लाभ और सभी से सराहना का आनंद लेना एक अच्छी किस्मत है और यह कि यदि आप परमेश्वर में विश्वास करते हैं और आपको पदोन्नत किया जाता है और महत्वपूर्ण पद दिए जाते हैं, तो आपकी किस्मत अच्छी है, जबकि यदि आप पर्दे के पीछे एक साधारण कर्तव्य निभाते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी किस्मत खराब है। यह दृष्टिकोण अत्यंत विकृत है और सत्य के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर हर व्यक्ति के रहने के परिवेश की व्यवस्था उसकी जरूरतों के आधार पर करता है। लोग अपने जीवन में जो कुछ भी अनुभव करते हैं, उसमें परमेश्वर के नेक इरादे होते हैं। मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था और भले ही मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, फिर भी मैं भीड़ से अलग खड़ी नहीं हो सकी। हालाँकि मैं सतही तौर पर एक बुरी किस्मत वाली लग रही थी, इसी वजह से मैं परमेश्वर के सामने आने और उसका उद्धार स्वीकार करने में सक्षम हुई। मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की तीव्र इच्छा थी, इसलिए यदि मैंने धन और रुतबे वाला जीवन जिया होता, तो मैं प्रसिद्धि और लाभ के पीछे और ज्यादा भागती। अंततः मैं बुरी प्रवृत्तियों की लहर में बह गई होती और शैतान द्वारा निगल ली गई होती। इतने सारे झटकों और असफलताओं का अनुभव करने के बाद ही मैं परमेश्वर के पास लौटने, परमेश्वर के वचनों के सिंचन और आपूर्ति को स्वीकार करने और कुछ सत्यों को समझने में सक्षम हुई। यह सबसे बड़ा आशीष है। यह दुनिया में प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने और धन-वैभव का आनंद लेने की तुलना में कहीं अधिक सार्थक है। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मेरे बहरेपन के कारण मुझे सामान्य मामलों के कर्तव्य सौंपे गए। यह मुझ पर परमेश्वर का संरक्षण भी था। मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की इच्छा बहुत प्रबल थी; जब भी दिखावा करने का कोई अवसर मिलता, मैं खुद को प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए काम करने से रोक नहीं पाती थी। ऐसे में मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलना और बेनकाब करके हटा दिया जाना बहुत आसान होता। भले ही अब मैं बहरी हो गई हूँ, परमेश्वर के घर ने मुझसे मेरा कर्तव्य निभाने का अवसर नहीं छीना। इसके बजाय, मेरी शारीरिक स्थिति के आधार पर मुझे उपयुक्त कर्तव्य सौंपे गए। भले ही यह पर्दे के पीछे का कर्तव्य है और शायद दूसरे उसे बहुत सम्मान की दृष्टि से न देखें, लेकिन यह मेरे सत्य के अनुसरण में बाधा नहीं डालता। इस कर्तव्य को निभाने के दौरान मैंने बहुत भ्रष्टता प्रकट की। कभी-कभी मैं अपने काम में लापरवाही बरतती और कर्तव्यनिष्ठ नहीं होती थी और कभी-कभी मैं दैहिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहती थी और कीमत चुकाने को तैयार नहीं होती थी। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव की कुछ समझ हासिल की और उसके बाद, काम करते समय मैं देह के खिलाफ विद्रोह कर सकती थी और अपने कर्तव्य में दिल लगाकर और कर्तव्यनिष्ठा से काम कर सकती थी। साथ ही, मैंने हर चीज में सत्य सिद्धांतों को खोजना भी सीखा और हर छोटी-से-छोटी बात में भी कर्तव्यनिष्ठा और बारीकी से काम करना सीखा। इसका अनुभव करते हुए मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर के घर में चाहे तुम एक अगुआ हो या सामान्य मामलों के कर्तव्य निभा रहे हो, जब तक तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तुम्हारे पास जीवन प्रवेश होगा और तुम्हें बचाए जाने का अवसर मिलेगा। परमेश्वर ने जीवन में मेरी किस्मत की व्यवस्था मेरी जरूरतों के अनुसार की; यह सब मेरे लिए लाभदायक है। समस्या यह थी कि मैं संतुष्ट नहीं थी; मेरी हमेशा अपनी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ होती थीं और मैंने परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण नहीं किया। नतीजतन, न केवल मैंने बहुत दुख झेला, बल्कि मैंने अपना कर्तव्य भी ठीक से नहीं निभाया। जब मेरा परिप्रेक्ष्य बदल गया, तो मैंने उतना दुखी महसूस नहीं किया।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने अनुसरण के पीछे के परिप्रेक्ष्य का थोड़ा और ज्ञान प्राप्त किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हमेशा अपने भाग्य को खराब बताने वाले लोगों के विचार और नजरिए सही हैं या गलत? (वे गलत हैं।) साफ तौर पर, अतिशय सोच में उलझने के कारण इन लोगों को हताशा की भावना होती है। चूँकि उनमें अतिवादी विचारों और नजरियों की वजह से हताशा की यह अति भावना होती है, इसलिए वे जीवन में होने वाली चीजों का सही ढंग से सामना नहीं कर पाते, वे मनुष्य की स्वाभाविक भूमिकाओं और कार्यों को सामान्य रूप से निभा नहीं पाते, और न ही एक सृजित प्राणी के कर्तव्य, जिम्मेदारियाँ और दायित्व निभा पाते हैं। ... वे समस्याओं और लोगों को इस अतिशय और गलत दृष्टिकोण से देखते हैं, जिससे वे बार-बार इस नकारात्मक भावना के असर और प्रभाव में जीते, लोगों और चीजों को देखते एवं आचरण और कार्य करते हैं। अंत में, वे जैसे भी जियें, वे इतने थके हुए लगते हैं कि परमेश्वर में आस्था और सत्य के अनुसरण के लिए कोई जोश नहीं जुटा पाते। वे अपना जीवन चाहे जैसे भी जीएँ, वे कभी भी सकारात्मक या सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते, और अनेक वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बावजूद वे न तो हृदय और प्राण से अपना कर्तव्य निभाने पर ध्यान देते, न ही उसे मानक स्तर के अनुसार पूरा करने पर, और जहाँ तक सत्य का अनुसरण करने या सत्य-सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की बात है, वह तो और भी दूर की बात है। ऐसा क्यों है? अंतिम विश्लेषण में, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे हमेशा सोचते हैं कि उनका भाग्य खराब है, और इससे उनमें गहन हताशा की भावना पैदा हो जाती है। वे पूरी तरह से मायूस, विवश, जिंदा लाश की तरह हो जाते हैं, बिल्कुल निष्प्राण और शक्तिहीन, कोई सकारात्मक या आशावादी व्यवहार नहीं दर्शाते, अपने कर्तव्य, जिम्मेदारियों और दायित्वों के प्रति अपनी निष्ठा अर्पित करने का संकल्प या सहनशीलता दिखाना तो दूर की बात है। इसके बजाय वे अनमने ढंग से, एक लापरवाह और चलताऊ रवैये के साथ, निरुद्देश्य और भ्रमित होकर हर दिन संघर्ष करते रहते हैं, यहाँ तक कि वे बेसुध और यंत्रवत ढंग से जैसे-तैसे दिन गुजारते हैं। उन्हें कोई अंदाजा नहीं होता कि वे कब तक यूँ ही जैसे तैसे काम चलाते रहेंगे। अंत में, उनके पास लाचार होकर यह कहने के सिवाय कोई रास्ता नहीं होता : ‘ओह, जब तक जैसे-तैसे काम चलता रहे, तब तक मैं जीता रहूँगा। अगर किसी दिन मैं आगे इसी तरह जीता न रह सकूँ, और कलीसिया मुझे निष्कासित कर हटा देना चाहे, तो उसे बस मुझे हटा देना चाहिए। ऐसा इसलिए कि मेरा भाग्य खराब है!’ देखा, उनकी बातें भी बेहद हारी हुई होती हैं। हताशा की यह भावना सिर्फ एक सरल-सी मनःस्थिति नहीं है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण तौर पर लोगों के विचारों, दिलों और उनके अनुसरण पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। यदि तुम समय रहते तेजी से अपनी हताशा की भावना को नहीं पलट सकते, तो यह न सिर्फ तुम्हारे पूरे जीवन को प्रभावित करेगी, बल्कि तुम्हारे जीवन को नष्ट कर तुम्हें मृत्यु तक पहुँचा देगी। भले ही तुम परमेश्वर में विश्वास रखो, फिर भी सत्य हासिल कर उद्धार प्राप्त नहीं कर पाओगे, और अंत में, तुम नष्ट हो जाओगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि लगातार निराशा की भावनाओं में जीने और अपनी खराब किस्मत की शिकायत करने की मेरी दशा बहुत खतरनाक थी। ये अतिवादी विचार थे और अगर मैंने इनका समाधान नहीं किया, तो मैं बचाए जाने का अपना अवसर खो दूँगी। मैंने मूल रूप से सोचा था कि जब मैं निराशा में जी रही थी और अपनी खराब किस्मत के बारे में शिकायत कर रही थी, तो मैं केवल परेशान महसूस कर रही थी और चूँकि मैंने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा था, इसलिए मैंने इसे एक बुरे कर्म के रूप में नहीं देखा। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि निराशा की भावनाओं में जीने का सार परमेश्वर की संप्रभुता से असंतोष है; यह परमेश्वर का एक मौन प्रतिरोध है। अगर मैंने कभी पश्चात्ताप नहीं किया, तो मैं कभी भी सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने में सक्षम नहीं हो पाऊँगी। अंत में, मैं केवल नष्ट ही हो सकती हूँ। इसके परिणाम कितने भयानक हैं! मैंने सोचा कि कैसे, परमेश्वर में विश्वास करने से पहले, मैं उस किस्मत से असंतुष्ट थी जो परमेश्वर ने मेरे लिए व्यवस्थित की थी क्योंकि मैं दुनिया में हमेशा असफल रहती थी। परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद भी, मैं दूसरों से सराहना पाने के पीछे भागती रही। जब मैं अपने कर्तव्य में सबसे अलग नहीं दिख सकी, तो मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने अपनी खराब किस्मत की शिकायत की और नकारात्मकता और भ्रष्टता की दशा में जीती रही। भले ही मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, मुझमें प्रेरणा की कमी थी। मैं अपने कर्तव्य में निष्क्रिय और ढीली पड़ी रहती और लापरवाही करती थी। मैं अक्सर गलतियाँ करती, जिससे मेरे भाई-बहन परेशान और बाधित होते और मेरे अपने जीवन प्रवेश में भी देरी होती। अगर मैंने इस दशा को नहीं बदला, तो मैं पवित्र आत्मा का कार्य, अपना कर्तव्य और अंततः उद्धार पाने का अपना मौका खो दूँगी। यह समझकर, मैं सहम गई और ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं इतने सालों से हठी और सत्य से विमुख रही हूँ। मैंने लगातार अपनी खराब किस्मत की शिकायत की है और अपनी अतिवादी भावनाओं से मुक्त होने में असमर्थ रही हूँ। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे अनुसरण के पीछे का परिप्रेक्ष्य गलत रहा है। मैं तुम्हारे समक्ष पश्चात्ताप करने, ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए तैयार हूँ।”
बाद में मैंने सोचा : इतने सालों तक मेरे इतने दुख में रहने के पीछे का मूल कारण क्या था? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मनुष्य को मजबूती से अपने नियंत्रण में रखने के लिए शैतान किस चीज का उपयोग करता है? (प्रसिद्धि और लाभ का।) शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और वे अपना हर फैसला या निर्णय प्रसिद्धि और लाभ की खातिर लेते हैं। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस होता है। जैसे-जैसे वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम घिसटते हुए आगे बढ़ते हैं, वे अनजाने में ही ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भार-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और उन बेड़ियों का प्रतिरोध करोगे जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लाता है। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे मन में बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे अचानक एहसास हुआ कि इन वर्षों में मैंने जो भी दर्द सहा था, वह शैतान द्वारा लाया गया था। शैतान ने मुझे प्रसिद्धि और लाभ का लालच दिया और नुकसान पहुँचाया, जिससे मैं बचपन से ही भीड़ से अलग दिखने और अपनी किस्मत बदलने की कोशिश करने लगी। जब मैं स्कूल में थी, तो शिक्षकों ने मुझे सिखाया कि “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी,” “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” और “एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है।” मैंने जीने के इन नियमों को स्वीकार कर लिया और गलती से मान लिया कि अगर मेरे पास प्रसिद्धि और लाभ है, तो मेरे पास सब कुछ होगा और जब तक मैं कड़ी मेहनत करती हूँ, अधिक कष्ट सहती हूँ और अधिक कीमत चुकाती हूँ, मेरा भविष्य अच्छा होगा और मैं दुनिया में सभी धन और समृद्धि का आनंद ले सकूँगी। मैंने प्रसिद्धि और लाभ पाने और दूसरों से सराहना पाने के लिए एक दशक से अधिक समय तक कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, लेकिन अंत में, मैं फिर भी असफल रही। मैं अपनी किस्मत को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, इसलिए मैंने एक आँकड़ा-विशेषज्ञ बनना सीखने के लिए ओवरटाइम काम किया। अंत में, न केवल मैं अपनी किस्मत बदलने में असफल रही, बल्कि अपने शरीर पर बहुत ज्यादा जोर डालने के कारण मैंने काम पर गलतियाँ भी कीं। मुझे एक सदमा लगा, जिसके कारण मुझे संवेदन-तंत्रिका संबंधी सुनने की समस्या हो गई। परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद, मैं अपने कर्तव्य में फौरन अच्छे नतीजे पाने के लिए बेचैन थी, अपनी सेहत की परवाह किए बिना काम करने के लिए देर रात तक जागती थी ताकि कोई मुझे नीची नजर से न देखे। अंततः मेरी सुनने की समस्या बदतर हो गई और मैं अपने भाई-बहनों के साथ सामान्य रूप से संवाद करने में असमर्थ हो गई। मैं केवल पर्दे के पीछे सामान्य मामलों के कामकाज ही कर सकती थी और मैं विशेष रूप से पीड़ा में थी क्योंकि दूसरे मेरी सराहना नहीं करते थे। प्रसिद्धि और लाभ मेरे शरीर पर बेड़ियों की तरह थे, जो मुझे मुक्त होने से रोक रहे थे। मैंने सोचा कि कैसे अविश्वासी प्रसिद्धि और लाभ को अपने जीवन से भी ज्यादा महत्व देते हैं। कुछ लोग कॉलेज में दाखिला न ले पाने या अपने करियर में असफल होने के झटके को सहन नहीं कर पाते और इसके कारण मानसिक रूप से टूट जाते हैं या यहाँ तक कि इमारतों से कूदकर आत्महत्या कर लेते हैं। मैं भी वैसी ही थी। जब मैं दूसरों से सराहना पाने की अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छा को पूरा नहीं कर सकी, तो मैं बस यही शिकायत करती रही कि परमेश्वर ने मेरे लिए एक अच्छी किस्मत की व्यवस्था नहीं की है, एक हताश दशा में जीती रही और कोशिश करना ही छोड़ दिया। मैंने तो सब कुछ खत्म करने के बारे में भी सोचा था। अगर परमेश्वर का संरक्षण न होता, तो शायद मेरा भी हश्र उन अविश्वासियों जैसा ही होता। आखिरकार मैं यह साफ-साफ देख पाई कि जीने के जो नियम शैतान ने मेरे मन में डाले थे, वे सकारात्मक नहीं थे। उन्होंने मुझे प्रतिष्ठा और रुतबे की चिंता में डाल दिया और जब मैं उन्हें प्राप्त नहीं कर सकी, तो परमेश्वर से दूर हो गई, परमेश्वर से विश्वासघात किया, परमेश्वर का प्रतिरोध किया और अंततः अपने उद्धार का अवसर खोने का जोखिम उठाया। लोगों को भ्रष्ट करने में यही शैतान का दुष्ट इरादा था। अगर मैं ऐसे ही चलती रहती, तो देर-सबेर मुझे हटा दिया जाता। मुझे इतने सालों तक इतनी अंधी और मूर्ख होने और शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाए जाने पर पछतावा हुआ। मैंने शैतान के खिलाफ पूरी तरह से विद्रोह करने, अब से परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने और प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे न भागने का संकल्प लिया।
एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और परमेश्वर के इरादों को समझा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “भाग्य के प्रति लोगों का रवैया कैसा होना चाहिए? तुम्हें सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए, सक्रियता और मेहनत से इन सब चीजों की व्यवस्था में सृष्टिकर्ता का प्रयोजन और अर्थ खोजना चाहिए, और सत्य की समझ हासिल करनी चाहिए, इस जीवन में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित की गई अपनी सबसे बड़ी भूमिका को निभाना चाहिए, सृजित प्राणी के कर्तव्य, दायित्व और उत्तरदायित्व निभाने चाहिए, और अपने जीवन को तब तक और अधिक सार्थक और मूल्यवान बनाना चाहिए जब तक कि अंततः सृष्टिकर्ता खुश होकर तुम्हें याद न रखने लगे। बेशक, इससे भी अच्छा यह होगा कि तुम अपनी खोज और मेहनतकश प्रयासों से उद्धार प्राप्त करो—यह परिणाम सर्वोत्तम होगा। किसी भी हाल में, भाग्य के मामले में, सृजित मानवजाति को जो सबसे उपयुक्त रवैया अपनाना चाहिए, वह मनमाने फैसले और परिभाषा का नहीं है, या इससे निपटने के लिए अतिशय विधियों के प्रयोग करने का नहीं है। बेशक लोगों को अपने भाग्य का प्रतिरोध करने, उसे चुनने या बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें उसका सामना सकारात्मक रूप से करने से पहले, उसे दिल से समझने, खोजना, जाँचना और उसके अनुरूप चलने की कोशिश करनी चाहिए। अंततः जीने के माहौल और जीवन में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए तय यात्रा में, तुम्हें वह आचरण विधि खोजनी चाहिए जो परमेश्वर तुम्हें सिखाता है, वह मार्ग खोजना चाहिए जिसे अपनाने की परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इस प्रकार परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित भाग्य का अनुभव करना चाहिए, और अंत में, तुम आशीष पाओगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों से, मुझे एक मार्ग मिल गया। परमेश्वर मुझसे अपेक्षा करता है कि मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जगह पर बनी रहूँ और व्यावहारिक रूप से अपना कर्तव्य निभाऊँ। इस बारे में सोचने पर मैंने जाना कि मैं जो भी कर्तव्य निभाती हूँ उसमें परमेश्वर के नेक इरादे होते हैं और मुझे इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार करना चाहिए। चाहे मैं दूसरों से सराहना पा सकूँ या नहीं, मैं बस एक मामूली सृजित प्राणी हूँ और मेरे लिए एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना मकसद पूरा करना ही काफी है। मैं तहे दिल से उस किस्मत के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ जो परमेश्वर ने मेरे लिए व्यवस्थित की है।
अब मैं स्वेच्छा से समर्पण कर सकती हूँ और अपने कर्तव्य को दिल लगाकर करना और उसमें कर्तव्यनिष्ठ होना सीख रही हूँ। मैं हर चीज में सत्य सिद्धांतों को खोजने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने का अभ्यास कर रही हूँ। अगर मुझे कुछ समझ नहीं आता है, तो मैं अपने भाई-बहनों से और अधिक संगति खोजती हूँ। अगर मैं अपने कर्तव्य में गलतियाँ करती हूँ, तो मैं तुरंत कारणों को ढूँढ़कर आंतरिक चिंतन करती हूँ, अपने भ्रष्ट स्वभावों पर विचार करती हूँ और जल्द से जल्द अपनी गलतियों को सुधारती हूँ। जब मैं इस तरह से अभ्यास करती हूँ, तो मुझे अपने दिल में शांति और सुकून महसूस होता है। धीरे-धीरे, मैंने इस दृष्टिकोण से बँधना बंद कर दिया कि मेरी किस्मत खराब है और मेरी दशा बेहतर से बेहतर होती जा रही है। ये वे नतीजे हैं जो परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और अगुआई से मुझे हासिल हुए हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
ली फांग, चीनजुलाई 2023 में एक दिन जब मैं एक सभा से लौटी तो एक बहन मेरे पास दौड़ी आई और बताने लगी कि किउ लिंग नाम के सामान्य मामलों के...
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तेरेसा, जर्मनीजब मैं पहली बार कलीसिया अगुआ बनी, तो मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि कैली मेरे काम की निगरानी करेगी। मैं पहले भी सभाओं में...
ओयांग शुए, चीनसन् 2015 में, अगुआओं ने मेरे लिए पाठ-आधारित कर्तव्य करने की व्यवस्था की। उस समय, कर्तव्य निभाने में बुरा रवैया दिखाने के कारण...