क्या आपने परमेश्वर की वाणी सुनी है?

16 अप्रैल, 2023

प्रभु के सभी विश्वासी बेसब्री से उसकी वापसी का इंतजार कर रहे हैं। आज हम प्रभु यीशु की भविष्यवाणियों के बारे में थोड़ी संगति करेंगे और प्रभु की वापसी को लेकर अलग-अलग तरह की समझ के बारे में चर्चा करेंगे। ज्यादातर लोगों का मानना है कि प्रभु की वापसी उसके बादलों पर उतरने से होगी, लेकिन बाइबल में प्रभु यीशु द्वारा की गई भविष्यवाणियों के अनुसार, वह मनुष्य के पुत्र के रूप में लौटेगा और वचन बोलेगा। प्रभु ने कई मौकों पर मनुष्य के पुत्र के आगमन या प्रकटन की भविष्यवाणी की है, और मनुष्य के पुत्र के आगमन का मतलब परमेश्वर के देह में प्रकट होकर कार्य करने से है। सिर्फ यही सबसे शुद्ध व्याख्या है, और यह आपको किसी धार्मिक कलीसिया में सुनने को नहीं मिलेगी। मनुष्य के पुत्र का आगमन या प्रकटन एक बड़ा रहस्य है, जिसे परमेश्वर के प्रकटन और कार्य का स्वागत किए बिना कोई भी नहीं जान पाएगा।

बाइबल में प्रभु की वापसी के बारे में बहुत-सी भविष्यवाणियाँ मौजूद हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर इंसानों, जैसे कि प्रेरितों या नबियों से आईं या स्वर्गदूतों की ओर से आईं। लोग जिन भविष्यवाणियों का हवाला देते हैं वे इंसानों ने की हैं, और इसी वजह से वे प्रभु को सबके सामने बादलों पर उतरते हुए देखने को तरस रहे हैं। लेकिन असल में, प्रभु की वापसी एक अच्छे से रखा गया रहस्य है। प्रभु यीशु ने कहा था, “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता(मत्ती 24:36)। चूंकि उस दिन या घड़ी के बारे में कोई नहीं जानता, स्वर्ग के दूत या पुत्र भी नहीं, तो बाइबल में प्रभु की वापसी को लेकर की गई इंसानों या स्वर्गदूतों की कोई भी भविष्यवाणी असल में सही कैसे हो सकती है? वे सही नहीं हो सकतीं। तो फिर, अगर हम प्रभु का स्वागत करना चाहते हैं, हमें प्रभु यीशु की अपनी भविष्यवाणियों पर भरोसा करना होगा। यह प्रभु का स्वागत करने की हमारी एकमात्र उम्मीद है। जो अड़ियल बनकर इस बात पर जोर देते हैं कि प्रभु बादलों पर उतरेगा, वे सभी लोग बेशक आपदाओं में घिर जाएंगे, वे रोते और दांत पीसते रह जाएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, “क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा(मत्ती 24:27)। “क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ(लूका 17:24-25)। “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा ... और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा(यूहन्ना 16:12-13)। “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ(प्रकाशितवाक्य 3:20)। “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है(प्रकाशितवाक्य 2:7)। “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं(यूहन्ना 10:27)। प्रभु यीशु की इन भविष्यवाणियों में हम क्या देख सकते हैं? प्रभु के वचन हमें साफ तौर पर बताते हैं कि वह अंत के दिनों में मनुष्य के पुत्र के रूप में लौटेगा। मनुष्य का पुत्र वास्तव में देहधारण है, और वह मुख्य रूप से वचन बोलेगा, बहुत-से सत्य व्यक्त करेगा, और सभी सत्यों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई करेगा। धरती पर आकर और सत्य व्यक्त करके प्रभु कौन-सा कार्य पूरा करेगा? बेशक, वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करेगा; वह मानवता को पूरी तरह से बचाने का कार्य करेगा। फिर हम प्रभु का स्वागत कैसे कर सकते हैं? चूंकि वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आ रहा है, और मनुष्य का पुत्र पूरी तरह से साधारण इंसान की तरह दिखता है, उसमें कुछ भी अलौकिक नहीं दिखता है, तो सिर्फ उसके बाहरी स्वरूप से कोई भी नहीं जान पाएगा कि यह परमेश्वर का प्रकटन है। सबसे अहम बात है मनुष्य के पुत्र के कथनों को सुनना और यह देखना कि यह परमेश्वर की वाणी है या नहीं। परमेश्वर की वाणी पहचान कर और उसके लिए दरवाजे खोलकर ही प्रभु का स्वागत किया जा सकता है। अगर परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है और लोग उसकी वाणी सुनकर भी उसे अनदेखा कर देते हैं, तो वे उसका स्वागत नहीं कर सकते। प्रकाशितवाक्य में बार-बार यह भविष्यवाणी की गई है : “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है(प्रकाशितवाक्य अध्याय 2, 3)। कुल मिलाकर सात बार इसका उल्लेख किया गया है। इसलिए, प्रभु का स्वागत करने के लिए, परमेश्वर की वाणी सुनना सबसे अहम है; यह परमेश्वर का स्वागत करने का एकमात्र रास्ता है। अब क्या आप जानते हैं कि प्रभु का स्वागत करने की कुंजी क्या है? प्रभु का स्वागत करने के लिए, हमें परमेश्वर की वाणी सुनने की कोशिश करनी ही होगी, और “वाणी” का मतलब है लौटकर आए प्रभु द्वारा व्यक्त किए गए बहुत-से सत्य, वे सभी सत्य जो लोगों ने पहले कभी नहीं सुने और जिन्हें बाइबल में कभी दर्ज नहीं किया गया। बुद्धिमान कुंवारियाँ सुन पाती हैं कि मनुष्य के पुत्र द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, सभी परमेश्वर की वाणी हैं, और वे बड़ी खुशी से प्रभु का स्वागत करती हैं। सिर्फ प्रभु ही सत्य व्यक्त करने में सक्षम है; केवल प्रभु ही सत्य, मार्ग और जीवन है। अगर कोई मनुष्य के पुत्र द्वारा व्यक्त वचनों को सुनकर भी उदासीन रहता है या उन्हें खारिज कर देता है, सत्य को स्वीकारने से इनकार करता है, तो वह मूर्ख कुँवारी है, जिसे प्रभु अंत में त्याग देगा। ऐसे लोग यकीनन भयंकर आपदाओं में घिरकर रोएँगे और अपने दांत पीसेंगे। अभी तक धार्मिक जगत ने प्रभु का स्वागत नहीं किया है; बल्कि वे आपदाओं में घिरकर, परमेश्वर को दोष देते और ठुकराते हुए निरंतर मायूसी की दशा में जी रहे हैं। जबकि परमेश्वर की भेड़ें उसकी वाणी सुनने के बाद उत्सुकता से सच्चे मार्ग की खोज और जाँच-पड़ताल करती हैं, इस तरह वे प्रभु का स्वागत कर पाती हैं। इसलिए हमें अच्छे से समझ लेना चाहिए : जब अंत के दिनों में प्रभु लौटता है, तो वह मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होकर सभी सत्य व्यक्त करता है, और प्रभु के प्रकटन की खोज करने में हमारे लिए सबसे अहम यह खोजना है कि प्रभु द्वारा व्यक्त सभी सत्य कहाँ हैं, उस कलीसिया को खोजना जिसमें परमेश्वर बोल रहा है। मनुष्य के पुत्र द्वारा व्यक्त सत्य का पता लगा लेने के बाद, उस वाणी का अनुसरण करते हुए उसके स्रोत तक पहुँचकर आप परमेश्वर के प्रकटन और कार्य का पता लगा सकते हैं। जैसे ही आपको पता चलेगा कि प्रभु द्वारा व्यक्त सभी सत्य इंसान को शुद्ध करने और बचाने के लिए हैं, तब तुम प्रभु की वापसी को स्वीकार लोगे और उसका स्वागत कर चुके होगे। यह प्रभु का स्वागत करने का सबसे अच्छा और सबसे आसान तरीका है। आसमान पर टकटकी लगाए घूरते रहने की कोई जरूरत नहीं, न ही प्रभु का स्वागत करने के लिए पहाड़ की चोटी पर खड़े होने की कोई जरूरत है ताकि उसे बादलों से उतरते देख सकें; चौबीसों घंटे प्रार्थना करने या उपवास रखकर प्रार्थना करने की जरूरत तो और भी नहीं है। जरूरत बस इसकी है कि आप इंतजार करें और परमेश्वर की वाणी सुनने की अपनी खोज में कभी न रुकें।

अभी, आप में से कुछ लोग शायद यह सोच रहे होगे : हम परमेश्वर की वाणी सुनकर उसे कैसे पहचान सकते हैं? दरअसल, परमेश्वर की वाणी सुनना जरा-भी मुश्किल नहीं है। प्रभु यीशु ने कहा था, “आधी रात को धूम मची : ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो’(मत्ती 25:6)। जब भी आप किसी को परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की या इसकी गवाही देते सुनें कि उसने बहुत-से सत्य व्यक्त किए हैं, आपको फौरन इसकी छानबीन करके देखना चाहिए कि परमेश्वर द्वारा तथाकथित रूप से बोले गए ये वचन सत्य हैं या नहीं। अगर ये सत्य हैं, तो आपको इन्हें स्वीकारना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर की भेड़ उसकी वाणी सुन सकती है। यह परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई इंसान कितना शिक्षित है, वह बाइबल को कितनी अच्छी तरह जानता है या उसका अनुभव कितना गहरा है। ईसाई होने के नाते, प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त बहुत-से वचन सुनकर हम कैसा महसूस करते हैं? बिना किसी अनुभव या प्रभु के वचनों की समझ के भी, उन्हें सुनते ही हम महसूस कर सकते हैं कि ये सत्य हैं, इनमें अधिकार और सामर्थ्य है; हम देख सकते हैं कि ये वचन गहरे और रहस्यपूर्ण हैं, इंसान की समझ से परे हैं—यही प्रेरणा और सहज ज्ञान की भूमिका है। हम चाहे इस भाव को साफ तौर पर व्यक्त कर पाएं या नहीं, मगर यह सही है और यह दिखाने के लिए काफी है कि किसी इंसान के पास हृदय और आत्मा है या नहीं, वह परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य और अधिकार को महसूस कर पाता है या नहीं। परमेश्वर की वाणी सुनना ऐसा ही है। थोड़ी और गहराई में जाएँ तो, परमेश्वर के वचनों की अन्य विशेषताएँ क्या हैं? परमेश्वर के वचन हमारे जीवन के लिए पोषण देते हैं; ये रहस्यों पर से पर्दा हटाते हैं, एक नया युग शुरू करते हैं और पुराने युग को समाप्त करते हैं। जैसे कि प्रभु यीशु लोगों की चरवाही, सिंचन और आपूर्ति के लिए कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त करने में सक्षम था; प्रभु ने स्वर्ग के राज्य के रहस्यों का भी खुलासा किया, उसने इंसान को यह रास्ता बताया, “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है,” उसने अनुग्रह के युग की शुरुआत की, व्यवस्था के युग को समाप्त किया, और मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया। यह ऐसा कार्य था जो कोई इंसान पूरा नहीं कर सकता था। क्या ऐसा नहीं है? तो फिर, इन दिनों, एक मनुष्य का पुत्र कई वर्षों से वचन बोल रहा है, बहुत-से सत्य व्यक्त कर रहा है। इन वचनों को पढ़कर बहुत-से लोगों को लगा है कि ये पवित्र आत्मा के कथन और परमेश्वर की वाणी हैं, और उन्हें यकीन हो गया है कि सत्य व्यक्त कर रहा यह मनुष्य का पुत्र ही लौटकर आया प्रभु यीशु है, वही देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए आवश्यक सभी सत्य व्यक्त किये हैं, परमेश्वर की 6,000 वर्षीय प्रबंधन योजना के रहस्यों को खोला है, और वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य कर रहा है। उसने राज्य के युग की शुरुआत की है और अनुग्रह के युग का अंत किया है। क्या सभी लोग परमेश्वर की वाणी सुनने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन सुनना चाहते हैं? आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथनों के कुछ अंश पढ़ते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “मैं कभी यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीहा भी कहा जाता था, और लोग कभी मुझे प्यार और सम्मान से उद्धारकर्ता यीशु भी कहते थे। किंतु आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ, जिसे लोग बीते समयों में जानते थे; मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आया है, वह परमेश्वर जो युग का समापन करेगा। मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो अपने संपूर्ण स्वभाव से परिपूर्ण और अधिकार, आदर और महिमा से भरा, पृथ्वी के छोरों से उदित होता है। लोग कभी मेरे साथ संलग्न नहीं हुए हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है, और वे मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक एक भी मनुष्य ने मुझे नहीं देखा है। यह वही परमेश्वर है, जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्यों पर प्रकट होता है, किंतु मनुष्यों के बीच में छिपा हुआ है। वह सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, दहकते हुए सूर्य और धधकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, मनुष्यों के बीच निवास करता है। ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज़ नहीं है, जिसका मेरे वचनों द्वारा न्याय नहीं किया जाएगा, और ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज़ नहीं है, जिसे जलती आग के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हो जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्ता हूँ जो वापस लौट आया है, और मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है। और सभी देखेंगे कि मैं ही एक बार मनुष्य के लिए पाप-बलि था, किंतु अंत के दिनों में मैं सूर्य की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों में यह मेरा कार्य है। मैंने इस नाम को इसलिए अपनाया और मेरा यह स्वभाव इसलिए है, ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं एक धार्मिक परमेश्वर हूँ, दहकता हुआ सूर्य हूँ और धधकती हुई ज्वाला हूँ, और ताकि सभी मेरी, एक सच्चे परमेश्वर की, आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें : मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, और मैं केवल छुटकारा दिलाने वाला नहीं हूँ; मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है)। “पूरे ब्रह्मांड में मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, और पूरब में असंख्य गर्जनाएँ निरंतर जारी हैं और सभी राष्ट्रों और संप्रदायों को झकझोर रही हैं। यह मेरी वाणी है, जो सभी मनुष्यों को वर्तमान में ले आई है। मैं अपनी वाणी से सभी मनुष्यों को जीत लेता हूँ, उन्हें इस धारा में बहाता हूँ और उनसे अपने सामने समर्पण करवाता हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले पूरी पृथ्वी से अपनी महिमा वापस लेकर उसे नए सिरे से पूरब में जारी किया है। भला कौन मेरी महिमा देखने के लिए लालायित नहीं होता? कौन बेसब्री से मेरे लौटने का इंतज़ार नहीं करता? किसे मेरे पुनः प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन मेरी सुंदरता देखने के लिए नहीं तरसता? कौन प्रकाश में नहीं आना चाहता? कौन कनान की समृद्धि नहीं देखना चाहता? किसे उद्धारकर्ता के लौटने की लालसा नहीं है? कौन उसकी आराधना नहीं करता, जो सामर्थ्य में महान है? मेरी वाणी पूरी पृथ्वी पर फैल जाएगी; मैं अपने चुने हुए लोगों के सामने आकर उनसे और अधिक वचन बोलूँगा। मैं उन शक्तिशाली गर्जनाओं की तरह, जो पर्वतों और नदियों को हिला देती हैं, पूरे ब्रह्मांड के लिए और पूरी मानवजाति के लिए अपने वचन बोलता हूँ। इस प्रकार, मेरे मुँह से निकले वचन मनुष्य का खजाना बन गए हैं, और सभी मनुष्य मेरे वचनों को सँजोते हैं। बिजली पूरब से चमकते हुए दूर पश्चिम तक जाती है। मेरे वचन ऐसे हैं, जिन्हें मनुष्य छोड़ना नहीं चाहता और साथ ही उनकी थाह भी नहीं ले पाता, फिर भी उनमें और अधिक आनंदित होता है। सभी मनुष्य खुशी और आनंद से भरे हैं और मेरे आने की खुशी मनाते हैं, मानो किसी शिशु का जन्म हुआ हो। अपनी वाणी के माध्यम से मैं सभी मनुष्यों को अपने समक्ष ले आऊँगा। उसके बाद, मैं औपचारिक रूप से मनुष्यों की जाति में प्रवेश करूँगा, ताकि वे मेरी आराधना करने लगें। स्वयं द्वारा विकीर्ण महिमा और अपने मुँह से निकले वचनों से मैं ऐसा करूँगा कि सभी मनुष्य मेरे समक्ष आएँगे और देखेंगे कि बिजली पूरब से चमकती है और मैं भी पूरब में ‘जैतून के पर्वत’ पर अवतरित हो चुका हूँ। वे देखेंगे कि मैं बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हूँ, अब यहूदियों के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि पूरब की बिजली के रूप में। क्योंकि बहुत पहले मेरा पुनरुत्थान हो चुका है, और मैं मनुष्यों के बीच से जा चुका हूँ, और फिर अपनी महिमा के साथ लोगों के बीच पुनः प्रकट हुआ हूँ। मैं वही हूँ, जिसकी आराधना अब से असंख्य युगों पहले की गई थी, और मैं वह शिशु भी हूँ जिसे अब से असंख्य युगों पहले इस्राएलियों ने त्याग दिया था। इसके अलावा, मैं वर्तमान युग का संपूर्ण-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ! सभी मेरे सिंहासन के सामने आएँ और मेरे महिमामय मुखमंडल को देखें, मेरी वाणी सुनें और मेरे कर्मों को देखें। यही मेरी संपूर्ण इच्छा है; यही मेरी योजना का अंत और उसका चरमोत्कर्ष है और साथ ही मेरे प्रबंधन का उद्देश्य भी : हर राष्ट्र मेरी आराधना करे, हर जिह्वा मुझे स्वीकार करे, हर मनुष्य मुझमें आस्था रखे और हर मनुष्य मेरी अधीनता स्वीकार करे!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सात गर्जनाएँ होती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य का सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएगा)। “जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 26)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश सुनने के बाद, अब सबको कैसा महसूस हो रहा है? क्या यह परमेश्वर की वाणी है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के हर वाक्य में सामर्थ्य और अधिकार है, यह लोगों को अंदर तक झकझोर देता है। परमेश्वर के अलावा भला कौन पूरी मानवता को संबोधित कर सकता है? कौन मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त कर सकता है? कौन सबसे सामने पहले से परमेश्वर की योजना और अंत के दिनों में उसके कार्य की व्यवस्थाओं के साथ-साथ मानवजाति के परिणाम और मंजिल का खुलासा कर सकता है? कौन पूरे ब्रह्माण्ड को परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के बारे में बता सकता है? परमेश्वर के अलावा कोई भी ये काम नहीं कर सकता। पूरी मानवता के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन हमें परमेश्वर के वचनों के अधिकार और शक्ति को महसूस करने देते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन सीधे परमेश्वर से आए हैं, यह स्वयं परमेश्वर की वाणी है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों से ऐसा लगता है मानो परमेश्वर स्वर्ग में ऊँचे पर पूरी दुनिया के सामने खड़े होकर बोल रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर सृष्टि के प्रभु के अपने ओहदे से पूरी मानवता से बात कर रहा है, पूरी मानवता के सामने परमेश्वर के धार्मिक, प्रतापी स्वभाव का खुलासा कर रहा है जो कोई अपराध नहीं सहेगा। भले ही लोग सुनकर पहली ही बार में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में निहित सत्य को न समझ पाएँ या उन्हें कोई वास्तविक अनुभव या समझ न मिले, मगर परमेश्वर की भेड़ें फिर भी महसूस करेंगी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का हर एक वचन सामर्थ्य और अधिकार से भरपूर है, और उन्हें यकीन हो जाता है कि यह परमेश्वर की वाणी है और सीधे परमेश्वर के आत्मा से आ रही है। यह प्रभु यीशु के इन वचनों को साकार करता है, “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं(यूहन्ना 10:27)

अब हमने परमेश्वर की वाणी सुन ली है और उसके द्वारा व्यक्त सत्य को जान लिया है, तो फिर सत्य व्यक्त करके परमेश्वर कौन-सा कार्य करने आया है? वह अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने आया है, जिसे प्रभु यीशु के मुख से निकली भविष्यवाणियों से साबित किया जा सकता है। “पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है(यूहन्ना 5:22)। “वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है(यूहन्ना 5:27)। “यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा(यूहन्ना 12:47-48)। “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा ... और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा(यूहन्ना 16:12-13)। और हम पतरस की पहली पुस्तक के अध्याय 4, पद 17 को भी नहीं भूल सकते : “क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्‍वर के घर से न्याय शुरू किया जाए।” ये भविष्यवाणियाँ बहुत स्पष्ट हैं। अंत के दिनों में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होगा, और यह उन सभी लोगों के बीच किया जाएगा जिन्होंने अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय-कार्य स्वीकार लिया है। अर्थात, देहधारी मनुष्य का पुत्र मानवजाति का न्याय और उसे शुद्ध करने के लिए बहुत-से सत्य व्यक्त करेगा और सभी सत्य में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों का मार्गदर्शन करेगा। यही अंत के दिनों में उद्धारकर्ता द्वारा किया जाने वाला न्याय-कार्य है, वह कार्य जिसकी योजना परमेश्वर ने बहुत पहले बनाई थी। अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर, देह में मनुष्य का पुत्र, कुछ समय पहले आकर मानवजाति के शुद्धिकरण और उद्धार के लिए सभी सत्य व्यक्त कर रहा है, जिसने पूरी दुनिया के साथ-साथ सभी धर्मों और संप्रदायों में खलबली मचा दी है। अधिक से अधिक लोग परमेश्वर की वाणी पर ध्यान दे रहे हैं, सच्चे मार्ग की खोज और जाँच-पड़ताल कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर की 6,000 वर्षीय प्रबंधन योजना के सभी प्रमुख रहस्यों का ही खुलासा नहीं किया है, बल्कि उसने हमें सत्य के रहस्य भी बताए हैं, जैसे कि मानवजाति के प्रबंधन में परमेश्वर का लक्ष्य क्या है, वह मानवजाति को बचाने के अपने कार्य के तीन चरण कैसे पूरे करता है, देहधारण के रहस्य क्या हैं, और बाइबल के पीछे की असली कहानी क्या है; और तो और, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने शैतान द्वारा मानवजाति के भ्रष्ट बनाए जाने के सत्य और परमेश्वर का विरोध करने की हमारी शैतानी प्रकृति का भी खुलासा किया है; उसने हमारे लिए व्यावहारिक मार्ग भी बताया है ताकि हम अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़कर पूरी तरह से बचाए जा सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हर किस्म के इंसान के परिणाम, लोगों की वास्तविक अंतिम मंजिल पर से पर्दा उठाया है और बताया है कि कैसे परमेश्वर युग का समापन करेगा और कैसे मसीह का राज्य प्रकट होगा। सत्य के इन रहस्यों में से हर एक का खुलासा हमारे सामने कर दिया गया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने लाखों वचन बोले हैं, और ये सभी वचन मानवजाति को परखने और शुद्ध करने में इस्तेमाल होने वाले सत्य हैं। यही अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला न्याय-कार्य है। यह मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करके बचाने के लिए, सिर्फ वचनों के जरिये किए जाने वाले कार्य का एक चरण है।

फिर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर न्याय का कार्य कैसे करता है? आइए देखें, उसके वचन क्या कहते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। चूँकि न्याय सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना है, इसलिए परमेश्वर निःसंदेह अभी भी मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होगा। अर्थात्, अंत के दिनों का मसीह दुनिया भर के लोगों को सिखाने के लिए और उन्हें सभी सच्चाइयों का ज्ञान कराने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है)। “वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इस नींव पर निर्माण करते हुए वह मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाता है और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताता है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करता है। यही वह चीज़ है, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। “अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है)। परमेश्वर के वचन पढ़कर यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय-कार्य मुख्य रूप से सत्य व्यक्त करने, और मानवजाति का न्याय करने, उसे शुद्ध करने व बचाने के लिए सत्य का इस्तेमाल करने के द्वारा किया जाता है। अर्थात, अंत के दिनों में, परमेश्वर सत्य व्यक्त कर और अपना न्याय-कार्य करके मानवजाति की भ्रष्टता को स्वच्छ करता है, वह लोगों के समूह को बचाकर पूर्ण करता है और ऐसे लोगों का एक समूह बनाता है जो अपने दिलोदिमाग से परमेश्वर के साथ एक हैं : यही परमेश्वर की 6,000 वर्षीय प्रबंधन योजना का फल है। अंत के दिनों के न्याय-कार्य का केंद्र यहीं है! यही वजह है कि उद्धारकर्ता, सर्वशक्तिमान परमेश्वर इस धरती पर आने के बाद से ही सत्य व्यक्त कर रहा है, लोगों के हर प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर उसका न्याय कर रहा है। इसके अलावा, वह हमारे साथ काट-छाँट और निपटारा करके, हमारा परीक्षण और परिशोधन करके भी हमारे भ्रष्ट स्वभावों को स्वच्छ और परिवर्तित कर रहा है; यह इंसान की पापी प्रकृति के मूल कारण का समाधान करता है, जिससे हम पूरी तरह से पाप को छोड़कर शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं, और परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर उसकी आराधना करने लगते हैं। इस बात पर, कुछ लोग यह सोचकर थोड़े उलझन में पड़ सकते हैं कि प्रभु यीशु ने पहले ही मानवजाति को छुटकारा दिला दिया है, तो फिर अंत के दिनों में मानवजाति का न्याय करने के लिए उद्धारकर्ता को सत्य व्यक्त करने की क्या जरूरत है? इसकी वजह है कि प्रभु यीशु ने सिर्फ छुटकारे का कार्य किया था, यानी प्रभु यीशु में आस्था रखने से पापों को क्षमा कर दिया जाता या सिर्फ आस्था के कारण उचित ठहराया जाता है जिससे लोग परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना करने, परमेश्वर से बात करने और उसके अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने के योग्य हो जाते हैं। लेकिन, पाप बलि के रूप में प्रभु यीशु की भूमिका से सिर्फ मानवजाति के पापों को क्षमा किया गया; इससे मनुष्य की पापी प्रकृति की समस्या जड़ से खत्म नहीं हो पाई। यही वजह है कि अनुग्रह के युग में रहने वाले सभी लोग इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि मानवजाति के पाप माफ किए जाने के बाद भी हम हर समय पाप करते रहते हैं। हम खुद को रोक नहीं पाते, पाप से छुटकारा पाने को हम कितना भी तरसें पर ऐसा कर नहीं पाते। हम दिन में पाप करने और रात में उसे कबूल करने के दुष्चक्र में जीवन जी रहे थे। इसीलिये प्रभु यीशु दोबारा आने पर सत्य व्यक्त करेगा और अंत के दिनों का न्याय कार्य करेगा; वह मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों को पूरी तरह से स्वच्छ करेगा और उसकी पापी प्रकृति की जड़ को ठीक कर देगा। इस तरह से लोगों को अच्छी और पूरी तरह से बचाया जा सकेगा। अगर लोग अंत के दिनों के न्याय-कार्य का अनुभव किए बिना सिर्फ प्रभु यीशु के छुटकारे का अनुभव करेंगे, वे यह जानने से अधिक कुछ नहीं कर पाएँगे कि उनके पाप कर्म कौन-से हैं; वे इंसान की पापी प्रकृति की जड़ को नहीं देख पाएँगे। यानी, वे इंसान की शैतानी प्रकृति और शैतानी स्वभावों को नहीं समझ पाएँगे, उन्हें ठीक करने की बात तो दूर रही। मनुष्य की पापी प्रकृति का मूल कारण यानी भ्रष्ट स्वभाव की समस्या को ठीक करने का एकमात्र तरीका परमेश्वर के न्याय-कार्य का अनुभव करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ... मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4))। “यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। परमेश्वर ने इस धरती पर आकर न्याय का कार्य करने के लिए स्वयं देहधारण किया है; वह बहुत-से सत्य व्यक्त कर रहा है और लंबी अवधि में लोगों को उजागर करते हुए उनका न्याय कर रहा है। यही वह एकमात्र तरीका है जिससे लोग अपनी भ्रष्टता के सत्य को साफ तौर पर देख सकते हैं, अपनी प्रकृति और सार को पहचान सकते हैं। इस न्याय के जरिये, लोग परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता भी देख पाएँगे, जिससे उनके मन में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा भाव पैदा होगा। इसी तरीके से हम धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर सच्चे इंसान की तरह जिंदगी जी पाएँगे। यह कहा जा सकता है कि इस लक्ष्य को हासिल करने का एकमात्र तरीका यही है कि देहधारी परमेश्वर न्याय का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करे। इसी वजह से सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन बोलना और न्याय का कार्य करने के लिए सत्य का इस्तेमाल करना इतना अहम, इतना महत्वपूर्ण और इतना सार्थक है!

कोई विश्वासी को पूरी तरह से बचाया जा सकेगा या नहीं और उसे एक अच्छी मंजिल मिलेगी या नहीं, इसकी कुंजी इसमें है कि क्या वह परमेश्वर के प्रकटन और कार्य का स्वागत करने में सक्षम है। इस तरह, सबसे अहम यह है कि व्यक्ति परमेश्वर की वाणी सुन पाता है या नहीं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में प्रकट हुआ और करीब 30 साल से कार्य कर रहा है, लेकिन अभी भी बहुत-से लोगों ने परमेश्वर की वाणी सुनने की कोशिश नहीं की है। कुछ लोग जिंदगी भर प्रभु में विश्वास रखते हैं, लेकिन बुढ़ापे की दहलीज पर पहुँच कर भी परमेश्वर की वाणी नहीं सुन पाते हैं या प्रभु का स्वागत नहीं कर पाते हैं। इसका मतलब है कि प्रभु ने उन्हें किनारे कर दिया है और उनकी सारी मेहनत बेकार चली गई है। यही वजह है कि परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम होना यह निर्धारित करने की कुंजी है कि कोई व्यक्ति पूर्ण उद्धार हासिल कर पाएगा या नहीं और उसे अच्छी मंजिल मिलेगी या नहीं। बहुत-से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर यह तो मान लेते हैं कि ये सत्य हैं, लेकिन फिर भी यह स्वीकार नहीं कर पाते कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु है। यह वाकई शर्मनाक है; इंसान की मूर्खता और अंधेपन का नतीजा है। जो लोग प्रभु को नहीं जानते वे पक्के तौर पर आपदाओं में घिरकर रोते और दांत पीसते रह जाएँगे।

आखिर में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिए काम करने के लिए अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोण से बोल सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। इस तरह का कार्य मनुष्य को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और बाहर निकालने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करने के लिए किया जाता है। वचन के युग में वचन के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के सार और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, यह जाना जा सकता है। वचन के युग में परमेश्वर जिन सभी कार्यों को करना चाहता है, वे वचन के द्वारा संपन्न होते हैं। वचन के द्वारा ही मनुष्य की असलियत का पता चलता है, उसे बाहर निकाला जाता है और परखा जाता है। मनुष्य ने वचन देखा है, सुना है और वचन के अस्तित्व को जाना है। इसके परिणामस्वरूप वह परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करता है, मनुष्य परमेश्वर के सर्वशक्तिमान होने और उसकी बुद्धि पर, साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के हृदय के प्रेम और मनुष्य को बचाने की उसकी इच्छा पर विश्वास करता है। यद्यपि ‘वचन’ शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को झकझोरता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों के बीच जीता है, तथा और भी अधिक लोग अब परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीने लगे हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है)

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