कर्तव्यों का कोई दर्जा नहीं होता

07 दिसम्बर, 2022

सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने से पहले, मुझे शिक्षकों से सराहना पाने की आदत थी। मैं हमेशा ध्यान का केंद्र बनना चाहती थी, और दूसरों से ऊँची राय पाकर मुझे आनंद मिलता था। मई 2020 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। मैं सक्रियता से परमेश्वर के वचनों का खान-पान करती, सभाओं में भाग लेती, और सभाओं के दौरान हमेशा सबसे पहले मैं अपनी समझ पर संगति करती थी। भाई-बहन मेरी संगति पर हमेशा मुझे बधाई देते, जिससे मैं बड़ा महसूस करती। सोचती, मेरी काबिलियत अच्छी थी और समझ दूसरों से बेहतर थी। बाद में, मुझे समूह-अगुआ चुन लिया गया। मेरी खुशी का ठिकाना न था—इतने सारे लोगों में, मुझे समूह-अगुआ चुना गया था। यानी मुझमें अच्छी काबिलियत थी, और मैं दूसरों से अलग थी। इसके बाद, मैं समूह सभाओं के संचालक के तौर पर काम करने लगी। भाई-बहन पूरा ध्यान लगाते और मेरी सराहना करते थे। सभाओं के दौरान मैं उनसे बातचीत भी करती थी, उनसे उनकी स्थिति पूछती और उन्हें परमेश्वर के वचन भेजती थी। अगर मैं किसी को संगति न करते या सभाओं में न आते देखती, तो मैं अकेले में उन्हें बढ़ावा देती थी। भाई-बहनों से मेरा नजदीकी नाता था, जब भी हम बात करते, वे हमेशा बहुत खुश होते थे। सोचती, मैं नए सदस्यों के सिंचन के लिए बिल्कुल सही हूँ, शायद सिंचन उपयाजिका भी बन जाऊँ। मैं ऊँचा पद चाहती थी ताकि दूसरे समूह अगुआओं के काम की जाँच कर सकूँ। इस तरह मैं और ज्यादा लोगों की सराहना और प्रशंसा पा सकूँगी। लेकिन तब मुझे बड़ी हैरत हुई जब एक दिन अगुआ ने मुझे बताया कि मैं सुसमाचार फैलाने के लिए बहुत सही हूँ, इसलिए वे चाहती थीं कि मैं सुसमाचार कार्य पर ध्यान दूँ। लेकिन तब मुझे उत्साह महसूस नहीं हुआ। मैंने सोचा : "मैं एक सिंचक हूँ। पूरे सिंचन कार्य को बारीकी से जानती हूँ। आप मुझे सिंचन कार्य ही क्यों नहीं करने देते? मुझे सुसमाचार फैलाने का काम क्यों दे रहे हैं? एक सिंचक के तौर पर मैं अपनी प्रतिभा दिखा सकती हूँ, लेकिन अगर मुझे सुसमाचार फैलाना पड़ा, तो नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ेगी। इसमें सच्चे मार्ग की जांच-पड़ताल करने वालों को धर्मोपदेश सुनने के लिए बुलाना पड़ता है। ऐसा आसान काम तो कोई भी कर सकता है, तो मैं अपनी अलग पहचान कैसे बनाऊँगी? साथ ही, अब मैं एक समूह अगुआ हूँ। अगर वे सुसमाचार साझा करने भेजते हैं, तो सुसमाचार साझाकर्ता होकर ही रह जाऊँगी। तब मेरी सराहना कौन करेगा?" मैं बहुत उदास थी, और सुसमाचार का प्रचार करना नहीं चाहती थी। मैं बस समर्पण नहीं कर पा रही थी। मगर तब मुझे यह एहसास नहीं हुआ, बस, उलझन महसूस हुई। एक दिन, मैंने अगुआ से पूछा : "आप मुझसे सुसमाचार का प्रसार क्यों करवा रही हैं? मैं नए सदस्यों का सिंचन क्यों नहीं कर सकती? मैं दोनों काम एक साथ सँभाल सकती हूँ। सब-कुछ संभालने की व्यवस्था कर सकती हूँ।" अगुआ ने कहा : "आप एक बातूनी इंसान हैं, आपमें सुसमाचार फैलाने की प्रतिभा है। आप इसके लिए ज्यादा सही हैं।" यह सुनकर मैं बस इसे स्वीकार करने की कोशिश ही कर सकी, मगर मुझे अब भी लगता था कि सुसमाचार प्रचार के लिए कोई मेरी सराहना नहीं करेगा। मैंने मायूस और खिन्न महसूस किया। मैंने एक सिंचक के रूप में लंबे समय तक काम किया था, अपने काम में बहुत प्रभावी थी, और दूसरे मेरे बारे में ऊँची राय रखते थे। अगर मुझे सुसमाचार साझा करने का काम दे दिया गया तो मैं ये सब खो दूँगी। अगर मैं सुसमाचार साझा करने में प्रभावी नहीं रही, तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगी? मैं सचमुच दुखी थी, मुझमें सुसमाचार फैलाने की प्रेरणा नहीं रही। लोगों को धर्मोपदेश सुनने बुलाते समय मैं बस नाटक करती थी, दिल नहीं लगाती थी। मैं अपना ज्यादातर समय भाई-बहनों से बातें करने और गप्पें लगाने में बिताती, इस उम्मीद से कि सारी निराशा की भावनाएं दूर हो जाएँगी। अक्सर ये भी सोचती कि जाने कब नए सदस्यों का सिंचन करने लौट सकूँगी। नतीजतन, सुसमाचार साझा करने के महीने भर बाद भी, मेरे पास दिखाने को कुछ नहीं था। तब जाकर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मुझे इस स्थिति के आगे समर्पण में मुश्किल हो रही है, और मैं फिर सिंचन पर लौटना चाहती हूँ। अपना इरादा समझने में मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं समर्पण कर सकूँ।"

इसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा। "अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया कैसा होना चाहिए, जिसे कि सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कहा जा सके? पहली बात, तुम इसकी जाँच नहीं कर सकते कि उसकी किसके द्वारा व्यवस्था की गई है, उसे किस स्तर की अगुआई द्वारा सौंपा गया है—तुम्हें उसे परमेश्वर की ओर से स्वीकार करना चाहिए। तुम इसका विश्लेषण नहीं कर सकते, तुम्हें इसे परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए। यह एक शर्त है। इसके अलावा, तुम्हारा चाहे जो भी कर्तव्य हो, उसमें ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो। मान लो तुम कहते हो, 'हालाँकि यह काम परमेश्वर का आदेश और परमेश्वर के घर का कार्य है, पर यदि मैं इसे करूँगा, तो लोग मुझे नीची निगाह से देख सकते हैं। दूसरों को ऐसा काम मिलता है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है। मुझे यह काम दिया गया है, जो मुझे विशिष्ट नहीं बनाता, बल्कि परदे के पीछे मुझसे कड़ी मेहनत करवाता है, यह अनुचित है! मैं यह कर्तव्य नहीं करूँगा। मेरा कर्तव्य वह होना चाहिए, जो मुझे दूसरों के बीच खास बनाए और मुझे प्रसिद्धि दे—और अगर प्रसिद्धि न भी दे या खास न भी बनाए, तो भी मुझे इससे लाभ होना चाहिए और शारीरिक आराम मिलना चाहिए।' क्या यह कोई स्वीकार्य रवैया है? मीन-मेख निकालना परमेश्वर से आई चीज़ को स्वीकार करना नहीं है; यह अपनी पसंद के अनुसार विकल्प चुनना है। यह अपने कर्तव्य को स्वीकारना नहीं है; यह अपने कर्तव्य से इनकार करना है, यह तुम्हारी विद्रोहशीलता की अभिव्यक्ति है। इस तरह मीन-मेख निकालने में तुम्हारी निजी पसंद और आकांक्षाओं की मिलावट होती है; जब तुम अपने लाभ, अपनी ख्याति आदि को महत्त्व देते हो, तो अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया आज्ञाकारी नहीं होता" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?)। इसे पढ़ने के बाद, मैंने अपनी करनी पर सोच-विचार किया। कर्तव्य निभाने में मैं अपनी पसंद पर चलती थी। सिंचन कार्य में अपनी प्रतिभा दिखा सकती थी, मैं एक समूह अगुआ थी, दूसरे लोगों की प्रभारी, नए सदस्यों के सिंचन में मैंने अच्छे नतीजे हासिल किए थे, दूसरे मेरा आदर करते, मेरी सराहना करते, सो मैं हमेशा खुश रहती थी। बहुत काम होने पर भी, मैं कभी शिकायत नहीं करती थी। लेकिन जब अगुआ ने मुझे सुसमाचार साझा करने का काम सौंपा, तो लगा, मैं बस लोगों को धर्मोपदेश सुनने को बुला रही थी, ये काम तो कोई भी कर लेता। मैंने समूह अगुआ का पद खो दिया, अब कोई मेरी सराहना नहीं करता था। मैं नाखुश थी, खुद से शिकायत कर परमेश्वर से बहस करने की कोशिश करती थी। हालाँकि मैं सुसमाचार फैलाने को राजी हो गई थी, पर मुझमें इसके लिए जोश नहीं था। मैं अपने कर्तव्य की बेहतरी पर सोचने के बजाय दूसरों से बातें करना पसंद करती थी। नतीजतन, सुसमाचार साझा करते महीना भर होने पर भी मेरे पास दिखाने को कुछ नहीं था। अपने कर्तव्य में मैंने शोहरत और रुतबे को अहमियत दी। अगर काम मेरी पसंद का होता, मुझे शोहरत और रुतबा देता, तो मैं समर्पण कर सकती थी। लेकिन पसंद का न हो, इससे मेरा नाम और रुतबा न बढ़े, तो मैं उदास होकर परमेश्वर से शिकायत करती थी। मैं सच में समर्पण नहीं कर रही थी। मैंने इस आधार पर परमेश्वर की आज्ञा मानना तय किया था कि वह कर्तव्य मुझे सुर्खियों में रखे और रुतबा दे। अपने कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया ईमानदार नहीं था। अगर मैं इसी तरह रुतबे के पीछे भागती रहूँ, तो बहुत काम करने, कर्तव्य ठीक से निभाने, और भाई-बहनों की सराहना पा लेने के बावजूद, अगर परमेश्वर पसंद न करे और मेरी करनी को याद न रखे, तो क्या फायदा? इसका एहसास कर मैं कर्तव्य के प्रति अपना रवैया बदलने को तैयार थी। मेरे बारे में दूसरों की सोच क्या है, यह फिक्र छोड़कर, बस अच्छा काम करने पर ध्यान दूँगी।

इसके बाद मैं लगन से सुसमाचार साझा करने लगी। कुछ समय बाद सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करनेवाले कुछ लोगों ने परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लिया। अगुआ ने मुझे शाबाशी दी, मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे सुसमाचार प्रचार करते ज्यादा समय नहीं हुआ था, फिर भी मैं दूसरों से बेहतर थी। मुझे अगुआ से सराहना भी मिल चुकी थी। मुझमें बहुत संभावना थी! सोचने लगी, सुसमाचार साझा करना उतना बुरा काम नहीं था। हो सकता है, यहाँ मैं अपनी प्रतिभा दिखाकर और ज्यादा प्रशंसक पा लूँ। इसके बाद सुसमाचार साझा करने में मैंने और भी कड़ी मेहनत की और पहले से ज्यादा बेहतर नतीजे हासिल किए। मार्च 2021 में, मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया था। मैंने रोमांचित होकर परमेश्वर का धन्यवाद किया। इस कर्तव्य में मुझे कलीसिया के सभी भाई-बहनों की अगुआई करनी थी, और हर कार्य परियोजना की अध्यक्षता करनी थी। यह खास होने का बहुत बढ़िया मौका था। मुझे कर्तव्य को अपना सर्वस्व देना था। उस दौरान, मैंने लगन से काम किया। मैं हमेशा हरेक को संदेश भेजकर उनके कर्तव्य में आने वाली समस्याओं के बारे में पूछती थी। अगर किसी का काम ठीक न होता, तो मैं उन्हें व्यावहारिक बातें बताती। अक्सर हर परियोजना की जाँच करती और अच्छी काबिलियत वाले भाई-बहनों को विकसित करती। भाई-बहनों की देखभाल करते हुए मैं बड़ी बहन जैसा महसूस करती थी। वे सब सच में मुझ पर भरोसा करते थे, और अपनी समस्याओं के बारे में मुझे खुलकर बताने को तैयार थे। एक बहन ने तो उसकी समस्याएं हल करने के लिए शीघ्रता से परमेश्वर के वचनों का अंश ढूँढने पर मेरी प्रशंसा भी की। उनका आदर और सराहना पाकर मैं बहुत खुश थी और अपने कर्तव्य में और भी कड़ी मेहनत करने लगी।

फिर करीब एक महीने बाद, और भी अधिक लोग परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने लगे, और कलीसिया टूट गई। वैसे इस बार, मुझे उपयाजिका चुना गया, अगुआ नहीं। मैं सचमुच बहुत निराश थी। अगुआ होती तो मैं ज्यादा आदर पा सकती थी। मैं अच्छी अगुआ बन सकती थी, मुझे क्यों नहीं चुना गया? जब नए अगुआ ने मुझे कुछ काम सौंपा, तो मैं जवाब नहीं देना चाहती थी। मुझे बहुत बुरा लगा, उस माहौल को समर्पित होने में मुझे बड़ी मुश्किल हो रही थी। लेकिन फिर मुझे परमेश्वर के वचन याद आए, जिनमें कहा गया है : "अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाए। यह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना है। अगर तू अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में यह सोचते हुए अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर भरोसा करता है कि परमेश्वर यही अपेक्षा करता है, और यही है जो परमेश्वर को खुश करेगा, और यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो क्या यह गलती नहीं है? यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही व्यक्ति अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकता है)। परमेश्वर के वचनों के इस अंश से, मुझे एहसास हुआ कि अगुआ न चुना जाना मेरी परीक्षा थी, यह देखने के लिए कि क्या मैं सत्य पर अमल कर उसके प्रति समर्पण करती हूँ। अपनी पसंद का कर्तव्य न मिलने पर मैं परमेश्वर को समर्पण न करूँ, तो परमेश्वर मुझे नहीं सराहेगा। इसलिए यह सब स्वीकारना मुश्किल होने पर भी, मुझे मालूम था मुझे समर्पण करना होगा। दो महीने बाद, मुझे सुसमाचार साझा करने के लिए फिर दूसरी कलीसिया भेजा गया। अगुआ ने मुझे बहुत-सा काम सौंपा, और काम पर चर्चा करते समय वे अक्सर मेरी राय लेतीं। उन्होंने यह भी कहा कि मैं इस कर्तव्य के लिए बहुत सही हूँ। मैंने मन-ही-मन सोचा : "अगुआ ने मुझे ये सब काम इसलिए सौंपा क्योंकि वे मुझ पर भरोसा करती हैं। मैं उन्हें निराश नहीं कर सकती। मुझे साबित करना होगा कि मुझमें अच्छी काबिलियत और सामर्थ्य है।" उस दौरान मुझे एहसास हुआ कि मैं शोहरत और रुतबे के पीछे भाग रही थी। मैंने उदास और निराश महसूस किया। समझ नहीं आया कि मैं हमेशा ऐसा बर्ताव क्यों करती थी। मेरे भ्रष्ट स्वभाव का स्रोत क्या है। मैंने खोजने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की, बाद में मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला। "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जाकर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उनके चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें)। "अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा के प्रति मसीह-विरोधियों का चाव सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा होता है, और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव और सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है, और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करता है, उसमें उनका पहला विचार अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा का होता है, और कुछ नहीं। मसीह-विरोधी के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा उनका जीवन और उनके जीवन भर का लक्ष्य होती हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उनका पहला विचार यही होता है : 'मेरी हैसियत का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरी हैसियत बढ़ेगी?' यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं, जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार है; वे अन्यथा इन समस्याओं पर विचार नहीं करेंगे। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधी के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, कोई बाहरी चीज तो बिलकुल भी नहीं है जिसके बिना उनका काम चल सकता हो। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास हैसियत और प्रतिष्ठा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? हैसियत और प्रतिष्ठा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज के लिए वे दैनिक आधार पर प्रयास करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़ी होती हैं। और इसलिए मसीह-विरोधियों के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी वातावरण में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज के लिए प्रयास करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और उच्च पद पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं; वे इसे कभी दरकिनार नहीं कर सकते। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और उनका सार है" (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग तीन))। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि मसीह-विरोधी शोहरत और रुतबे को आम लोगों से ज्यादा संजोते हैं, यह उनके अस्तित्व का अंतरंग पहलू है। वे चाहे कुछ भी करें, उनकी पहली फिक्र हमेशा शोहरत और रुतबा होती है, और यह कि क्या दूसरे लोग उनका आदर और सराहना करते हैं। वे लोगों के दिलों में बसना चाहते हैं, उन्हें काबू में कर उन पर प्रभुत्व चाहते हैं। ऐसा मसीह-विरोधी के तौर पर उनके सार के कारण है। मैंने सोच-विचार किया कि मैं शोहरत और रुतबे की कितनी लालची थी। परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, मैं हमेशा दूसरों की सराहना खोजती थी, उनके दिलों में बसना चाहती थी। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी, मैं पहले की ही तरह आदर और सराहना ढूँढती थी। मुझे सभाओं का संचालन, संगति करना और दूसरों की अच्छी राय पाना पसंद था। अपने बारे में लोगों की ऊँची राय सुनकर मुझे आनंद मिलता था। जब मुझे अगुआ से उपयाजिका बनाया गया, तो मैं काफी आहत थी। लगा, मैंने अपनी शोहरत और रुतबा खो दिया है, मुझे फिक्र हुई कि दूसरे मेरे बारे में नीचा सोचेंगे। जब मुझे एक दूसरी कलीसिया में सुसमाचार साझा करने का काम मिला, तो मैं फिर सबका आदर पाने के लिए खुद को साबित करना चाहती थी। मेरा अनुसरण पौलुस से अलग नहीं था। पौलुस लोगों के बीच भाषण देना पसंद करता था। उसे दर्शकों से घिरे रहना, आदर और सराहना पाना पसंद था। वह लोगों के दिलों में जगह चाहता था, और आखिरकार उसने खुद को मसीह कहा। वह घोर घमंडी प्रकृति का था। अपना कर्तव्य निभाते समय, मैं सिर्फ दूसरों से आदर और सराहना पाने के बारे में सोचती थी। लोगों के दिलों में ऊँची जगह चाहती थी। मैं कितनी घोर घमंडी थी! परमेश्वर में विश्वास रखकर भी मेरे दिल में परमेश्वर का डर नहीं था। मैंने सिर्फ शोहरत और रुतबे के लिए कर्तव्य निभाए, परमेश्वर की संतुष्टि के लिए नहीं। मैं पहले ही मसीह-विरोधी की राह पर कदम रख चुकी थी। मैं सच में खतरे में थी! मुझे एहसास हुआ कि अगुआ के रूप में न चुनने देकर परमेश्वर मुझे बचा रहा था। उजागर करने वाले इस हालात के बगैर, तो मुझे कभी एहसास न होता मैं कितनी घमंडी थी, और मेरी हालत कितनी खतरनाक हो चुकी थी। अपने अनुचित अनुसरणों से मैंने दोषी और दुखी महसूस किया और मुझे बहुत डर लगा। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं शोहरत और रुतबा खोजने की गलत राह पर चली गई, बहुत बुरा लग रहा है। अपने वचनों से मुझे उजागर करने के लिए धन्यवाद! मैं अब शोहरत और रुतबा नहीं खोजूँगी तुम्हारी तमाम व्यवस्थाओं को समर्पण करूँगी। कोई मेरे बारे में कुछ भी सोचे, मैं अपना कर्तव्य पूरी लगन से निभाऊँगी।"

बाद में, मैंने परमश्वर के वचनों का एक और अंश देखा। "परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में, मनुष्य को परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की कोशिश करनी चाहिए, और दूसरे विकल्पों को छोड़ कर परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। वे जो परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करते हैं, उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं ढूँढने चाहिए या वह नहीं ढूँढना चाहिए जिसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से लालायित हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है। यदि तुम जिसकी खोज करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है, और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिसे खोजते हो वह देह के आशीष हैं, और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी अवधारणाओं का सत्य है, और यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी आज्ञाकारी नहीं हो, और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसकी खोज कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या हटा दिया जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है)। परमेश्वर के वचनों का यह अंश मेरे लिए बहुत मददगार था। मुझे एहसास हुआ कि मुझे सत्य और स्वभाव में परिवर्तन खोजना चाहिए, वही सही मार्ग है। शोहरत और रुतबे के पीछे भागना नाकामी का मार्ग है। पहले मैं हमेशा शोहरत और रुतबे के पीछे भागती थी। नए सदस्यों का सिंचन करते समय मुझे सराहना और प्रशंसा मिलती थी, और फिर अगुआ के रूप में मेरी तरक्की हुई। दूसरों की नजर में मेरा रुतबा बढ़ गया था, मगर मैं और ज्यादा घमंडी हो गई थी। मैं खुद को बहुत ऊँचा समझती थी, मेरे स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ था। अगर मैं यूँ अनुसरण करती रही, तो आखिरकार मुझे त्याग दिया जाएगा। मैं ठीक पौलुस जैसी थी, जिसने सुसमाचार फैलाकर बहुत लोग पाए थे। उसके अनेक धर्मपत्र बाइबल में देखे जा सकते हैं, और धार्मिक दुनिया में उसे पूजा और सराहा जाता है। लेकिन पौलुस ने खुद को बिल्कुल नहीं समझा था, अपना भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं बदला था, और नरक में फेंक दिया गया था। मैं समझ गई कि आस्था का सबसे अहम पहलू सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलना है। वरना देर-सवेर मुझे पछताना पड़ेगा।

बाद में, एक अनुभवात्मक गवाही देखते समय, मेरी नजर परमेश्वर के वचनों के इस अंश पर पड़ी। "यदि तुम अपने हर काम में परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए समर्पित रहना चाहते हो, तो केवल एक ही कर्तव्य करना काफी नहीं है; तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को स्वीकार करना चाहिए। चाहे यह तुम्हारी पसंदों के अनुसार हो या न हो, और चाहे यह तुम्हारी रूचियों में से एक हो या न हो, या चाहे यह कुछ ऐसा काम हो जो तुम्हें करना अच्छा नहीं लगता हो या तुमने पहले कभी न किया हो, या कुछ मुश्किल काम हो, तुम्हें इसे फिर भी स्वीकार कर इसके प्रति समर्पित होना होगा। न तुम्हें केवल इसे स्वीकार करना होगा, बल्कि अग्रसक्रिय रूप से अपना सहयोग देना होगा, इसे सीखना होगा, इसे अनुभव करना और प्रवेश पाना होगा। यदि तुम कष्ट उठाते हो, भीड़ से अलग नहीं देख पाते, अपमानित और बहिष्कृत किए जाते हो, फिर भी तुम्हें समर्पण के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। तुम्हें इसे अपना व्यक्तिगत कामकाज नहीं, बल्कि कर्तव्य मानना चाहिए जिसे पूरा करना ही है। लोगों को अपने कर्तव्यों को कैसे समझना चाहिए? उन्हें इसे सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—द्वारा उन्हें करने के लिए दी गई चीज समझना चाहिए; लोगों के कर्तव्य ऐसे ही आरंभ होते हैं। परमेश्वर जो आदेश तुम्हें देता है, वह तुम्हारा कर्तव्य होता है। यह स्वर्ग द्वारा नियत और पृथ्वी द्वारा संज्ञानित है कि तुम परमेश्वर के कहे अनुसार अपना कर्तव्य निभाओ" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, ईमानदार होकर ही व्यक्ति सच्चे मनुष्य की तरह जी सकता है)। मुझे याद रखना था कि मेरा कर्तव्य लोगों के लिए परमेश्वर का आदेश थे। लोग मेरे बारे में ऊँचा सोचें, न सोचें, मुझे अपना जीवन जिम्मेदारी पूरी करने में लगाना चाहिए, दूसरों की सराहना का विषय बनने में नहीं। पहले मैं अपना कर्तव्य परमेश्वर से आया हुआ नहीं मानती थी, हमेशा अपनी पसंद पर चलती थी। मैं कर्तव्य को अहम या मामूली, ऊँचा या नीचा दर्जा देती थी। जिन कर्तव्यों से मैं खास दिखती, उन्हें मैं जोश और सक्रियता से निभाती, जिनमें ऐसा न होता, उनके प्रति मेरा रवैया शिकायती, निराश और प्रतिरोधी होता था। मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने कर्तव्यों में इतनी मीन-मेख नहीं निकाल सकती, या अपनी पसंद पर नहीं चल सकती। असलियत में कर्तव्य चाहे मुझे लोगों की नजरों में लाएं, या परदे के पीछे किए गए हों, वे सभी कलीसिया के कार्य थे, उनके दर्जे में कोई फर्क नहीं था। परमेश्वर की नजरों में सभी कर्तव्य एक समान हैं। कलीसिया हमारी प्रतिभा अनुसार हमें विभिन्न कार्य देती है, ताकि हम अपनी खूबी का पूरा-पूरा प्रयोग कर सकें। यह कलीसिया के काम और हमारे जीवन-प्रवेश दोनों के लिए लाभकारी है। परमेश्वर की व्यवस्था मानते हुए मुझे अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं अब अपनी पसंद के आधार पर अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहती। अगर मैं खास न भी हो सकी, तो भी परमेश्वर की संतुष्टि के लिए मैं लगन से अपना कर्तव्य निभाऊँगी।"

एक दिन हम एक सभा कर रहे थे, मुझे उम्मीद थी कि अगुआ मुझे संचालन करने देंगे, लेकिन सभा में पहुँचने के बाद, मैंने देखा कि दूसरी बहन संचालन कर रही थी। मैंने मन-ही-मन सोचा : "मैं पहले इस बहन की अगुआ हुआ करती थी और अब वह मेरी समूह अगुआ है। साथ ही, मैं हमेशा सभाओं का संचालन करती थी। अब नहीं करती, और खुद को मशहूर नहीं कर सकती—क्या भाई-बहन मुझे कम आंकेंगे?" मुझे बहुत शर्मिंदगी और घबराहट महसूस हुई। मैं समूह संदेशों की अनदेखी कर किसी दूसरे समूह की सभा में जाना चाहती थी। फिर मुझे एहसास हुआ कि मेरा रवैया गलत था, तो मैंने परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना की, उससे मार्गदर्शन माँगा जिससे अपना घमंड त्याग सकूँ। प्रार्थना के बाद मुझे थोड़ा सुकून मिला। मुझे खास होने की फिक्र छोड़कर अपना कर्तव्य सही ढंग से निभाने पर ध्यान देना चाहिए। यह समझ लेने के बाद, मैं उतनी परेशान नहीं थी। बाद में तब के अपने अनुभवों के बारे में मैंने सबको खुलकर बता दिया, उस पर संगति की। मैंने बहुत खुश और आजाद महसूस किया। अब मैं बस एक आम सुसमाचार साझाकर्ता ही हूँ, मगर अब मैं अपने कर्तव्य के दर्जे की परवाह नहीं करती। अब अगर मैं समूह अगुआ, उपयाजिका या कालीसिया अगुआ न भी रहूँ, तो भी मैं अपना कर्तव्य निभाने को तैयार हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद! परमेश्वर के वचनों ने मुझे परिवर्तित कर दिया था।

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इस प्रकार की सेवा सच में तिरस्करणीय है

पिछले कुछ दिनों में, कलीसिया ने मेरे कार्य में एक परिवर्तन की व्यवस्था की है। जब मुझे यह नया कार्यभार मिला, तो मैंने सोचा, "मुझे अपने भाई—बहनों के साथ एक सभा बुलाने, मामलों के बारे में साफ तौर पर उनसे बात करने, और उन पर अच्छा प्रभाव छोड़ने के लिए इस अंतिम अवसर को लेने की जरूरत है।" इसलिए, मैंने कई उपयाजकों से मुलाकात की, और हमारी मुलाकात की समाप्ति पर, मैंने कहा, "मुझसे यहाँ से चले जाने और एक अन्य कार्य पर जाने के लिए कहा गया है।

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