मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 21. परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को कैसे समझें

लोगों को ऐसी श्रेणियों में रखा जा सकता है, जिन्हें उनकी आत्मा के द्वारा निर्धारित किया जाता है। कुछ लोगों के पास मानवीय आत्मा होती है, और उनका चयन पूर्व-निर्धारित रूप से किया जाता है। मनुष्य की आत्मा में एक भाग होता है जो पूर्व-निर्धारित है। कुछ लोग आत्मा विहीन होते हैं; वे दुष्ट आत्माएं हैं जो चुपके से घुसपैठ कर चुकी हैं। वे परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित व चयनित नहीं होती हैं। हालांकि वे भीतर आ गए हैं, फिर भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता है, और अंततः उन्हें दुष्ट-आत्माओं द्वारा खींच लिया जाएगा। इसे उस व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव के द्वारा निर्धारित किया जाता है कि वह परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार करेगा या नहीं, या वह कौन सा मार्ग लेगा या उसे स्वीकार करने के बाद वह परिवर्तित होगा या नहीं। कुछ लोग पथभ्रष्ट होने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। उनकी आत्मा निर्धारित करती है कि वे इस श्रेणी के हैं; वे बदल नहीं सकते हैं। ये वे लोग हैं जिनमें पवित्र आत्मा कार्य करना बंद देती है क्योंकि उन्होंने सही मार्ग नहीं लिया है। अगर वे वापस मुड़े तो पवित्र आत्मा अभी भी अपना कार्य कर सकती है, परन्तु यदि वे वापस ना मुड़ने की ज़िद करें तो वे पूर्णत: समाप्त हो जाते हैं। हर प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं। एक व्यक्ति को कैसे समझना चाहिए, एक व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को कैसे बूझना चाहिए? कोई इस धार्मिकता को कैसे जान सकता है? धर्मीजन परमेश्वर की आशीष पाता है, और दुष्ट-जन परमेश्वर के श्रापों का भागीदार होता है। ऐसी है परमेश्वर की धार्मिकता, सही है? क्या यह ऐसा ही है? मैं आप सभी से पूछता हूँ, अगर एक धर्मी व्यक्ति ने परमेश्वर की आशीष को प्राप्त नहीं किया हो, ना परमेश्वर की आशीष प्राप्त कर सकता हो, और यदि परमेश्वर उसे आशीषित ना करे, और इसके विपरीत एक बुरा मनुष्य पारिवारिक सम्पत्ति में सम्पन्न होता है, उसके अनेक बच्चे होते हैं, और सब कुछ आराम से सफलतापूर्वक चलता हो, तो क्या यह परमेश्वर की धार्मिकता है? हाँ! हम इसे कैसे समझायें? ऐसी कहावत है कि परमेश्वर भले जन को प्रतिफल और बुरे जन को सज़ा देता है, और यह भी कि प्रत्येक जन अपने कार्यों के अनुसार अपना प्रतिफल पाता है। क्या यह कहावत सही है? अब एक चीज ऐसी भी है: एक व्यक्ति जो परमेश्वर की आराधना करता है वह मारा जाता है या उसे परमेश्वर द्वारा श्राप दिया जाता है, या परमेश्वर ने उसे कभी भी आशीषित नहीं किया है या उस पर कभी ध्यान नहीं दिया है, और उसकी आराधना की भी उपेक्षा होती है। फिर एक बुरा जन है जिसे परमेश्वर ने ना तो आशीषित किया है ना ही सज़ा दी है, परन्तु वह पारिवारिक सम्पत्ति में सम्पन्न है, उसके अनेक बच्चे हैं, और सब कुछ आराम से सफलतापूर्वक चलता है। कुछ लोग कहते हैं: “परमेश्वर धर्मी नहीं है। हम उसकी आराधना करते हैं, फिर भी हम उसकी आशीषों को नहीं पाते हैं। जबकि बुरा जन जिसने उसकी आराधना नहीं की परन्तु उसका विरोध किया, वह हम से हर प्रकार से बेहतर है, हम से अधिक ऊंचा है। परमेश्वर धर्मी नहीं है!” अब इन बातों में आप लोग क्या देखते हैं? इन दोनों उदाहरणों में से जो मैनें अभी दिए हैं, कौन सा उदाहरण परमेश्वर की धार्मिकता की व्याख्या करता है? कुछ लोग कहते हैं: “यह दोनों ही उदाहरण परमेश्वर की धार्मिकता के हैं!” वे ऐसा यह क्यों कहते हैं? परमेश्वर के स्वभाव के विषय में लोगों के पास जो समझ है वह त्रुटिपूर्ण है। मनुष्य की सम्पूर्ण जानकारी उसकी सोच और दृष्टिकोण के भीतर है, और व्यवसाय के सिद्धान्त से, या अच्छे एवं बुरे या सही एवं गलत के दृष्टिकोण से, या तर्क के दृष्टिकोण से है। अगर आप ऐसे दृष्टिकोण को थामे हुए परमेश्वर को जानने निकले हैं, तो परमेश्वर के अनुरूप होने के लिए कोई मार्ग न होगा, और आप तब भी परमेश्वर का विरोध करेंगे और शिकायत करेंगे। एक भिखारी था जो मूर्ख प्रतीत होता था। उसे केवल परमेश्वर की आराधना करना आता था, परन्तु परमेश्वर बस उसकी उपेक्षा करता था; परमेश्वर ने उसे आशीषित नहीं किया था। शायद आप सोच रहे हैं कि, “भले ही परमेश्वर उसे आने वाले संसार में आशीषित नहीं करेगा, फिर भी परमेश्वर निश्चित रूप से उसे अनंतकाल में आशीष देगा और उसे दस हजार गुना प्रतिफल देगा। क्या यह परमेश्वर को धर्मी ना ठहराएगा? वह अमीर जन, उसने सौ गुना आशीषों का आनन्द लिया है; और उसके बाद हमेशा हमेशा के लिए मिट जाता है। क्या यह भी परमेश्वर की धार्मिकता नहीं है?” एक व्यक्ति को किस प्रकार धार्मिकता को समझना चाहिए? उदाहरण के लिए, परमेश्वर के कार्यों को जानने को लीजिए। अगर परमेश्वर केवल अनुग्रह के युग तक कार्य करता, और कार्य की इस अंतिम अवस्था को पूर्ण ना करता, और सभी लोग नष्ट हो जाते, तो क्या यह परमेश्वर का प्रेम है? मान लीजिए कि एक व्यक्ति जो परमेश्वर की आराधना करता है उसे आग और गन्धक की झील में फेंक दिया जाता है, और कोई जन जो परमेश्वर की आराधना नहीं करता है या उसके बारे में नहीं जानता है, और परमेश्वर उस व्यक्ति को बने रहने की अनुमति देता है, तो हम इसे क्या कहेंगे? क्या इसमें कोई धार्मिकता है? जो कुछ लोग कहते हैं वह कुल मिलाकर सिद्धांतों को जानने के विषय में है। जब वास्तविकता का सामना किया जाता है तब वहां भ्रम होता है। ऐसा क्यों कहें कि परमेश्वर के पास मनुष्य के लिए प्रेम है, और यह कि परमेश्वर धर्मी है? इस बात को ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है। मनुष्यों की धारणाओं के अनुसार, भले को प्रतिफल दिया जाता है और बुरे को सज़ा दी जाती है, बुरे जन को प्रतिफल नहीं मिलना चाहिए; और वे जो कोई बुरा काम नहीं करते हैं उन सभी को प्रतिफल मिलना चाहिए, और उन्हें आशीषित होना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर धर्मी है। यह प्रतीत होता है कि लोगों को वह मिलना चाहिए जिसके वे योग्य हैं, और यह कि परमेश्वर को केवल तभी धर्मी कहा जाता है जब लोगों को वह सब मिलता है जिसके वे हकदार हैं। अगर किसी को अपना हिस्सा प्राप्त नहीं हो तो? तब क्या आपको कहना चाहिए कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? मान लीजिये कि अगर इस युग के लोग एक पुस्तक में उस लेख को देख पाते जो बताती कि परमेश्वर ने पिछले युग में मानव-जाति को बनाया था। हजारों वर्षों के बीत जाने के बाद, परमेश्वर ने देखा कि लोग हद दर्जे के भ्रष्ट हो गए हैं, और उसमें उन्हें बचाने की कोई मनोदशा नहीं है और इसलिए वह उन्हें नाश कर देता है। आप इसे किस प्रकार देखेंगें? क्या आप कहेंगे कि परमेश्वर के मन में कोई प्रेम नहीं है? जैसा लोग देखते हैं, परमेश्वर ने पूर्व युग के लोगों का नाश किया था, अतः परमेश्वर में कोई प्रेम नहीं था। परमेश्वर का ज्ञान, जिस तरह से मनुष्य चीज़ों को देखते हैं उसके आधार पर परमेश्वर के विषय में यह या वह कहना नहीं है। जिस तरह से मनुष्य चीज़ों को देखते हैं उसमें कोई सत्य नहीं है। आपको देखना होगा कि परमेश्वर का सार-तत्व क्या है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है। लोगों को बाहरी घटना के आधार पर परमेश्वर के सार-तत्व को नहीं देखना चाहिए कि उसने क्या किया है या उसने किसके साथ व्यवहार किया है। स्वयं मानव-जाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अनिवार्य रूप से नहीं जानती कि उसका स्वभाव कैसा है, या भ्रष्ट मानव-जाति परमेश्वर के सम्मुख कैसी है, और उसके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए। अय्यूब पर विचार कीजिए, एक धर्मी मनुष्य जिसे परमेश्वर द्वारा आशीषित किया गया था। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। अय्यूब परीक्षणों से गुज़रता है, और शैतान यहोवा से शर्त लगाता है: अय्यूब आपकी आराधना क्यों करता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आप उसे ऐसा प्रतिफल देते हैं। यदि आप उससे सब कुछ ले लेते हैं, क्या तब भी वह आपकी आराधना करेगा? यहोवा परमेश्वर ने कहा, “जब तक तुम उसके प्राणों को हानि न पहुँचाओ, तुम जो मर्जी, चाहे उसके साथ कर सकते हो।” शैतान अय्यूब के पास आया और उसके पश्चात् अय्यूब ने परीक्षाओं का सामना किया। जो कुछ उसके पास था वह ले लिया गया, और उसके बच्चे मर गए। क्या परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अय्यूब के परखे जाने में पाया जाता है? हाँ! कहाँ? आप इसे समझा नहीं सकते, सही है? भले ही आप एक धर्मी व्यक्ति हैं, तब भी परमेश्वर के पास आपको जांचने, और आपको परमेश्वर का गवाह होने की अनुमति देने का अधिकार है। परमेश्वर का स्वभाव धर्मी है। वह प्रत्येक से समान व्यवहार करता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि धर्मी जन परीक्षाओं को सह सकता है और इसलिए उसे उन से होकर गुज़रने की आवश्यकता नहीं है, यह कि धर्मी जन की सुरक्षा करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है। उसे आपको जांचने का अधिकार है। यह उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्ति है। अंततः, जब अय्यूब परीक्षाओं में से होकर गुजरा और यहोवा की गवाही दी, तब उसने उसे पहले से अधिक आशीषित किया, उसे दुगुनी और बेहतर आशीषें दीं। इसके अलावा, यहोवा उसके सम्मुख प्रकट हुआ, और वायु में होकर उससे बात की; मानो अय्यूब ने उसे आमने-सामने देखा हो। यह एक आशीष है जो उसे दी गई; यह परमेश्वर की धार्मिकता है। क्या हो अगर यह इसके विपरीत हो? यहोवा ने अय्यूब को इन परीक्षाओं को स्वीकार करते, शैतान की उपस्थिति में अपना गवाह बनते, और शैतान को शर्मिन्दा होते देखा था। परन्तु परमेश्वर मुड़ा और उसकी उपेक्षा करता हुआ चला गया। अय्यूब ने बाद में आशीष को प्राप्त नहीं किया था। क्या इसमें परमेश्वर की धार्मिकता है? इससे निरपेक्ष कि परीक्षाओं के बाद अय्यूब आशीषित हुआ था या नहीं, या यहोवा उसके सम्मुख प्रकट हुआ था या नहीं, इन सब में परमेश्वर की भली इच्छा समाविष्ट है। उसके सम्मुख प्रकट होना परमेश्वर की धार्मिकता है, और उसके सम्मुख प्रकट नहीं होना भी परमेश्वर की धार्मिकता है। सृष्टि का भाग होने के नाते, आप किस आधार पर परमेश्वर के आगे मांग रखते हैं? मनुष्य परमेश्वर से माँगने के काबिल नहीं है। परमेश्वर के आगे मांग रखना बहुत ही अनुचित बात है। परमेश्वर जो वह चाहता है करेगा, और परमेश्वर के पास अधिकार है कि वह इस तरह से न करे। उसे अधिकार है कि वह इन बातों को अपने अनुसार संभाले। उसका स्वयं का स्वभाव धर्मी है। धार्मिकता किसी भी प्रकार से निष्पक्ष या तर्क-संगत होना, एक को काटकर दो टुकड़े करना, किये गये कार्य की मात्रा के अनुसार आपको मुआवज़ा देना या आपने जितना काम किया हो उसके अनुसार आपको भुगतान करना बिल्कुल नहीं है। यह परमेश्वर की धार्मिकता नहीं है। आप विश्वास करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का काम करता है, और किए गए कार्य के अनुसार ही बंटवारा होता है, और हर एक व्यक्ति जो करता है उसके अनुसार ही उसे अपना मानदेय मिलता है; इसे छोड़कर धार्मिकता और कुछ नहीं है। मान लीजिये अय्यूब के परमेश्वर की गवाही देने के बाद वह अय्यूब को समाप्त कर देता। परमेश्वर यहाँ पर भी धर्मी ही होता क्यों कहें कि वह धर्मी है? यह कहना कि परमेश्वर ऐसा करके भी धर्मी है, ऐसी बात क्यों कहें? धार्मिकता एक ऐसी चीज़ है कि यदि कोई बात लोगों की धारणाओं से मेल खाती है, तो लोग कहते हैं कि परमेश्वर धर्मी है, जो कहीं अधिक आसान है, परन्तु यदि लोग इसे अपनी धारणाओं से मेल खाते हुए नहीं देखते हैं, यदि यह ऐसा कुछ है जिसे समझने में लोग असमर्थ हैं, तो इसे धार्मिकता के रूप में समझाने हेतु लोगों के भरसक प्रयास की आवश्यकता होगी। अगर उसने अय्यूब को उस समय समाप्त कर दिया होता, तो लोग यह ना कहते कि परमेश्वर धर्मी था। भले ही ऐसे लोग होते जो कहते कि परमेश्वर धर्मी था, फिर भी वे अनिच्छा से ऐसा कहते: “यहोवा परमेश्वर पूर्णत: सही है.......।” वास्तव में, यदि लोगों को परमेश्वर द्वारा समाप्त कर दिया जाता है, चाहे उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है या नहीं, तो क्या परमेश्वर को लोगों को समाप्त करने के कारणों को अवश्य समझाना चाहिए? क्या उसे लोगों को समाप्त करने के लिए अपने आधार को समझाना चाहिए? इसकी आवश्यकता नहीं होगी, सही है ना? क्या इसे उपयोगी लोगों को बचाने, और अनुपयोगी लोगों को समाप्त करने पर आधारित करने की आवश्यकता है? इसकी आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर की दृष्टि में भ्रष्ट व्यक्ति से वह अपनी इच्छा अनुसार निपट सकता है। वह जैसा भी किया जायेगा उपयुक्त ही होगा; सब कुछ उसकी योजना में है। यदि उसकी नज़रों को अप्रिय लगे, तो गवाही देने के बाद आप अनुपयोगी हैं और आपको निकाल दिया जाता है, तो क्या यह धार्मिकता है? यह धार्मिकता है। हालांकि वास्तविकता में यह समझना आसान नहीं है, आपके पास सिद्धांतों की समझ होनी चाहिए। मुझे बताइये, क्या परमेश्वर के द्वारा शैतान का विनाश धार्मिकता है? अगर वह शैतान को छोड़ देता तो? शायद आप कहने का साहस न करें? यह धार्मिकता कैसे है? परमेश्वर का सार-तत्व धार्मिकता है। हालांकि यह समझना आसान नहीं कि परमेश्वर क्या करता है, फिर भी जो कुछ वह करता है वह धार्मिकता है। लोग साधारणत: इसे समझ नहीं पाते, इसके विषय में कुछ गलत नहीं है। अपने देखा कि जब परमेश्वर ने पतरस को शैतान को सौंपा, पतरस ने किस प्रकार जवाब दिया “आप जो करते हैं इसका भेद मनुष्य नहीं जान सकता, परन्तु जो कुछ आप करते हैं उसमें आपकी भली इच्छा होती है। उन सब में धार्मिकता होती है। मैं आपकी बुद्धिमता के कार्यों के लिए स्तुति क्यों न करूँ?” अब आपको गौर करना चाहिए कि परमेश्वर ने शैतान को तुरन्त ही समाप्त नहीं किया, ताकि मनुष्य देख सके कि किस प्रकार शैतान ने लोगों को भ्रष्ट किया है, और किस प्रकार परमेश्वर ने लोगों को बचाया है। केवल तब जब मनुष्य देख पाता है कि किस सीमा तक शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट किया है, किस प्रकार उसके अपराधों की सूची स्वर्ग में पहुँचने पर अंततः परमेश्वर शैतान का नाश करता है, ताकि मनुष्य देख सके कि उसमें परमेश्वर की धार्मिकता और उसका स्वभाव है। जो कुछ परमेश्वर करता है उसमें वह धर्मी है। हालांकि आप उसे खोज पाने में असमर्थ हैं, फिर भी आपको अपनी इच्छानुसार दोष नहीं लगाना चाहिए। अगर आपको यह तर्कहीन प्रतीत होता है, या आपकी इस विषय में कोई धारणा है, और तब आप कहते हैं कि परमेश्वर धर्मी नहीं, तो यह बहुत ही तर्कहीन है। बस अभी मैंने अन्तर करने हेतु आप लोगों के लिए कुछ नकारात्मक उदाहरण दिये हैं, पर आप लोग बोलने का साहस नहीं करते हैं। आप देखें कि पतरस ने कुछ चीज़ों को समझ से बाहर पाया था, फिर भी उसे निश्चय था कि परमेश्वर की बुद्धि इसमें उपस्थित थी; यह कि इन सब में परमेश्वर की भली इच्छा है। मनुष्य सब बातों की थाह लेने में असमर्थ है। बहुत सी बातें अथाह हैं। परमेश्वर के स्वभाव को सचमुच में जानना आसान बात नहीं है।

कुछ लोगों ने किताबें जलाईं और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से सज़ा मिली। कुछ लोगों ने घोषणा की कि परमेश्वर दोषी है और उन्हें सज़ा मिली। इस प्रकार के कई उदाहरण हैं। जब नए विश्वासी ये बातें सुनते हैं तो वे उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते हैं, कि उनके पास धारणाएं हैं। परमेश्वर देखता है कि आप अनाड़ी हैं और आप पर कोई ध्यान नहीं देता है। क्या आप सोचते हैं कि वह पता नहीं लगा सकता है? अगर दीर्घकालिक विश्वासी ऐसे हैं, तो यह अस्वीकार्य है, इसके बावजूद कि वे कितने वर्षों से उसके साथ जुड़े हुए हों या उसका अनुसरण किया हो। नए विश्वासी अभिमानी और हठी होते हैं, अतः वह तुम पर ध्यान नहीं देता है। एक दिन ऐसा आयेगा जब आप खुद पता लगा लेंगे। यदि बहुत वर्षों से साथ आ रहे हैं और अभी भी आपके पास धारणाएं हैं जिन्हें आप छोड़ नहीं सकते हैं, अगर आप उपहास करते हैं, ताना मारते हैं, या उदासीनता दिखाते हैं, और हर जगह अवधारणाएं फैलाते हैं, तो दंडित किया जाएगा। कुछ बातों में मूर्ख और अज्ञानी मानकर आपको क्षमा कर दिया जाता है। परन्तु अगर आप जानते हैं और तब भी जान-बूझ कर ऐसा करते हैं, और चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए आप नहीं सुनते हैं, तो आपका सज़ा पाना तय है। आपने केवल लोगों के लिए परमेश्वर का उदार पक्ष जाना है। यह मत भूलिये कि परमेश्वर का एक ऐसा भी पहलू है जो लोगों के गुनाह को सहन नहीं करता है।