मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 33. भ्रमित लोगों का उद्धार नहीं हो सकता

ऐसा कहा गया है “जो अंत तक साथ चलता है उसका उद्धार हो जाएगा,” लेकिन क्या इसे अमल करना आसान है? यह आसान नहीं है, और कुछ लोग अंत तक साथ नही चल पातें। संभवतः जब वे परीक्षा के समय का सामना करते हैं, अथवा दर्द का, अथवा प्रलोभन का, तब वे गिर सकते हैं, और इसके पश्चात आगे नही बढ़ सकते। जो चीजें हर दिन होती हैं, चाहे बड़ी हो या छोटी, आपके संकल्प को डगमगा सकती हैं, आपके हृदय को भर सकती हैं, आपके कर्तव्य करने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं, अथवा आपकी आगे की प्रगती पर अंकुश लगा सकती हैं—इन सब बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, सच्चाई जानने के लिए उनका ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए, और सभी बातें वह हैं जो अनुभव के दायरे के भीतर घटती हैं। कुछ लोग नकारात्मकता आ गिरने पर हार मान लेते हैं, और हर एक झटके के बाद उठने में असमर्थ हो जाते हैं। ये लोग बेवकूफ और साधारण व्यक्ति हैं, जो बिना सच्चाई जाने पूरा जीवन बिता देते हैं, तो फिर यह लोग अंत तक कैसे साथ दे पाएंगे? यदि एक ही बात आपके साथ दस बार होती है, लेकिन आपको इससे कोई लाभ नहीं होता है, तो आप एक साधारण और बेकार व्यक्ति हैं। दक्ष लोग और वे लोग जिनके पास सच में आध्यात्मिक मामलों को समझने की आंतरिक गुणवत्ता है, वे सच्चाई के साधक हैं, और दस में से आठ बार वें शायद कुछ प्रेरणा, पाठ, प्रबुद्धता और प्रगति हासिल करने में सक्षम हैं। जब एक ही चीज़ एक साधारण व्यक्ति के साथ दस बार होती है, वे एक बार भी कोई भी जीवन लाभ प्राप्त नहीं करेंगे, वे एक बार भी कोई बदलाव नहीं करेंगे और वह खत्म होने से पहले एक बार भी अपने प्रकृति को नहीं समझेंगे। जब भी ऐसा होता है, वे हर बार गिर जाते हैं, हर बार उन्हें खींचने के लिए या साथ घसीटने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की ज़रूरत होती है, और दूसरों को उनके साथ धैर्य रखना पड़ता है। अगर कोई भी उनके साथ धैर्य नही रखेगा, उन्हें खींचेगा, पीटेगा या घसीटेगा नहीं, तो उनका खेल खत्म हुआ और वे उठेंगे नहीं। हर बार ऐसा होता है, तब गिरने का खतरा होता है, और हर बार उनके बिगड़ने का खतरा रहता है। क्या यह इनके लिए अंत नहीं है? उनको बचाने के लिए क्या अभी भी कोई आधार बाकी हैं? किसी को बचाना याने उनका वह हिस्सा बचाना जो उनकी इच्छा और उनका संकल्प हैं, और उनके दिल के अन्दर का वह हिस्सा जो सत्य और धार्मिकता की इच्छा रखता है। ऐसा कहना कि किसी के पास संकल्प है का अर्थ है कि वे धर्म, भलाई और सच्चाई की आशा करते हैं, और उनके पास विवेक है। आपका यह हिस्सा परमेश्वर बचाकर रखते हैं, और इसके द्वारा वह आपके भ्रष्ट स्वभाव के पहलू में परिवर्तन करते हैं। यदि आपके पास ये चीजें नहीं हैं, तो आप को बचाया नहीं जा सकता, आपका उद्धार नहीं हो सकता। अगर आपको धार्मिकता की लालसा नहीं है या सच्चाई में आनन्दित नहीं हैं, बुरी चीजों को दूर करने की आपको चाह नहीं है, या कष्ट का सामना करने के लिए आपके पास संकल्प नहीं है, और यदि आपका विवेक सुन्न है, सत्य प्राप्त करने के लिए आपकी क्षमता भी सुन्न है, सच्चाई या होनेवाली चीजों के प्रति आप संवेदनशील नहीं हैं, कुछ भी भेद समझ नहीं कर पा रहे हैं, और चीजों को संभालने या हल करने की आपके पास कोई स्वतंत्र क्षमता नहीं है, तो फिर बचाव का कोई रास्ता नहीं है। इस तरह के व्यक्ति को सुझाव देने के लिए कुछ भी नहीं होता, काम करने के लिए कुछ भी नहीं होता। उनका विवेक सुन्न होता है, उनका दिमाग मैला होता है, वे सच्चाई में आनन्दित नहीं होते या अपने दिल की गहराई में धार्मिकता की इच्छा नहीं रखते और परमेश्वर चाहे कितने भी स्पष्ट रूप से अथवा पारदर्शिता से सत्य के बारे में बात करते हैं, वे प्रतिक्रिया नहीं देते, जैसे कि वे पहले से ही मर चुके हैं। क्या उनके लिए सब खत्म नहीं हो चुका है? जिसके पास सांस है उसे कृत्रिम श्वसन के द्वारा बचाया जा सकता है, और उनकी सांस को पुनर्जीवित किया जा सकता है। लेकिन अगर वे पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्मा जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ भी नहीं करेगा। एक बार जब आप पर कुछ आ गिरता है, आप सिकुड़ते हैं, और आप कोई गवाही नहीं देते, तो आपका कभी भी उद्धार नहीं हो सकता और आपका पूरी तरह से काम तमाम हो चुका है। जब आप चीजों का सामना करते हैं, तो आपको एक विकल्प चुनने की ज़रूरत होती है, आपको उनका सही तरीके से सामना करना चाहिए, आपको शांत होना चाहिए और आपको समस्या का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग करना होगा। कुछ सत्यों के बारे में आपकी साधारण समझ का क्या उपयोग है? वे सिर्फ अपने पेट को भरने के लिए नहीं हैं और वे केवल बात करने के लिए वहां नहीं हैं और इसके अलावा और कुछ नहीं, न ही वे दूसरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए हैं; इसके बजाय वे अपनी खुद की समस्याओं का समाधान करने के लिए हैं, और आप अपनी खुद की समस्याओं को हल करने के बाद ही आप दूसरों की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उनके पास कुछ मूल्यवान चीज है, या ऐसा कुछ जो परिपूर्ण करने योग्य है, उनके पास सत्य जानने का एक संकल्प है और दृढ़ इच्छा है; उनके पास कारण है, कठिनाई का सामना करने के लिए तैयार है, और वह अपने दिल में सत्य में प्रसन्न है, और जब उनका किसी चीज से सामना होता है, तो वह उसे जाने नहीं देते। ये सभी मजबूत बिंदु हैं। यदि आपके पास इनमें से कोई भी मजबूत बिंदु नहीं है, तो यह मुसीबत की निशानी है और यह एक बुरी बात है। आप कोई भी चीज को कैसे अनुभव करना है इसका ज्ञान नहीं हैं, आपको कोई अनुभव नहीं है, और आपके नीचेवाले लोगों की कठिनाइयों को हल करने में आप सक्षम नहीं होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि आपको पता नहीं है कि आप प्रवेश कैसे करें, जब चीजें आप पर आ गिरती हैं, आप उलझन में पड़ जाते हैं, आप परेशान हो जाते हैं, आप रोते हैं, आप नकारात्मक हो जाते हैं, आप भाग जाते हैं, और किसी भी उचित प्रकार से उनसे संपर्क करने में आप असमर्थ हैं। लोगों को सत्य प्रदान करने का मतलब है सहभागिता में उन्हें एक सिद्धांत प्रदान करना, और यदि आपके पास मौन संवेदनशीलता है, तभी आप मनों के मिलने का अनुभव करेंगे। लेकिन अगर आप सुन्न हैं और सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो चीजों को इंगित करने में कोई फायदा नहीं होगा और उदाहरणों का उपयोग करने पर भी आप समझ नहीं पाएंगे। हमेशा हाथ पर हाथ रख़कर सिखाये जाने के बाद, एक बार जब आप हाथ छोड़ देते हैं, तो आप खत्म हो जाते हैं। चाहे बड़ी या छोटी चीजें आप पर गिर रही हों, आप हमेशा नकारात्मक, कमजोर होते हैं, और आप कोई गवाही नहीं देते हैं। आप को क्या करना चाहिए या किसके साथ सहयोग करना चाहिए, आप ऐसा करने में विफल होते हैं, यह साबित करते हैं कि आपके दिल में परमेश्वर या सत्य नहीं है। पवित्र आत्मा का कार्य किस तरह से लोगों को प्रेरित करता है इसके अलावा, अपने कई सालों के अनुभव पर निर्भर होकर, उन्होंने जो अनेक सत्य सुने हैं, थोड़े से विवक से, और संयम का पालन करने की अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हुए, लोग अब भी निम्नतम मानकों को प्राप्त कर सकते हैं; फिर भी आप अभी जितने सुस्त और कमजोर हैं, उसकी तुलना में बेहतर हैं। यह अकल्पनीय है। संभवतः आप इन दो वर्षों में लापरवाही से आए हैं, अन्यथा आप अभी जितने सुन्न और सुस्त हैं ऐसे कैसे हो सकते हैं? वास्तविक रूप में आपने खुद को नकार दिया है, ऐसा कहकर “मैं ठीक नहीं हूं, मैं भ्रष्ट हूँ, वह बस ऐसा ही है, और मैं भ्रष्ट ही रहूंगा!” आपने खुद पर ही दरवाजा बंद कर दिया है, और खुद परिश्रम नहीं किया है, यहां तक ​​कि ऐसा कहा, “यह मेरी कठिनाई है। बेहतर हैं आप मुझे बस घर भेज दें!” क्या आप बकवास नहीं कर रहे हैं? आप केवल जिम्मेदारी से बच रहे हैं और उसे टाल रहे हैं। यदि आपके पास थोड़ा सा भी विवेक और तर्क है, तो आप अपना कार्य ठीक से पूरा करेंगे; मैदान से भाग कर जाना एक भयानक बात है और यह परमेश्वर के साथ धोखा है। सत्य की खोज करने के लिए एक दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है, और जो लोग बहुत नकारात्मक या कमजोर हैं, वे कुछ भी हासिल नहीं करेंगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास करने में सक्षम नहीं होंगे, और सत्य प्राप्त करने में और स्वभाव में बदलाव लाने में, वे और अधिक निराशाजनक हो जाएंगे। केवल वे लोग जो सत्य की खोज संकल्प के साथ करते हैं, वे सत्य प्राप्त करेंगे और परमेश्वर द्वारा सिद्ध होंगे।