21. हटाए जाने के बाद

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसके वचनों के लहजे किस तरह के हो, उसका केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है: तुझे बचाना। तुझे बचाने के पहले, उसे तुझे रूपांतरित करने की आवश्यकता है, तो तू थोड़ी-सी पीड़ा कैसे सहन नहीं कर सकता है? तुझे पीड़ा सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हो। परमेश्वर तेरे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तू खुद को जान सके या फिर सीधे तेरे साथ निपटा जा सके, तेरी काट-छाँट और तुझे उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—तुझे अच्छे परिणाम के लिए कुछ दर्द सहना होगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए')। "असफल होना और कई बार नीचे गिरना कोई बुरी बात नहीं है; न ही उजागर किया जाना कोई बुरी बात है। चाहे तुम्हारा निपटारा किया गया हो, तुम्हें काटा-छाँटा गया हो या उजागर किया गया हो, तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए: उजागर होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी निंदा की जा रही है। उजागर किया जाना अच्छी बात है; यह तुम्हारे लिए वो सबसे अच्छा अवसर है जब तुम स्वयं को जान सकते हो। यह तुम्हारे जीवन अनुभव को गति दे सकता है। इसके बिना, तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न ही परिस्थिति, और न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ तक पहुँचने में सक्षम होने के लिए कोई प्रासंगिक आधार होगा। यदि तुम्हें तुम्हारे अंदर की चीज़ों के बारे में पता चल जाये, तुम्हारे भीतर छिपी उन गहरी बातों के हर पहलू का भी पता चल जाये, जिन्हें पहचानना मुश्किल है और जिनका पता लगाना कठिन है, तो यह अच्छी बात है। स्वयं को सही मायने में जानने में सक्षम होना, तुम्हारे लिए अपने तरीकों में बदलाव कर एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; तुम्हारे लिए यह नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लेते हो, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही एक अनमोल चीज़ है, और तुममें सत्य की प्यास जगेगी और तुम वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह कितनी बड़ी बात है! यदि तुम इस अवसर को थाम सकते हो और ईमानदारी से स्वयं पर मनन कर सकते हो, कभी भी असफल होने या नीचे गिरने पर स्वयं का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, तो नकारात्मकता और कमज़ोरी के बीच, तुम वापस खड़े होने में सक्षम होगे। एक बार जब तुम इस सीमा को लांघ लेते हो, तो फिर तुम एक बड़ा कदम उठा सकोगे और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए')। परमेश्वर के वचनों से मैंने जान लिया कि परमेश्वर किसी में कैसे भी कार्य क्यों न करे, फिर चाहे वो न्याय और शुद्धिकरण हो, काट-छाँट और निपटारा करना हो, या उसे उसके कर्तव्य से हटाना हो, ये सब इसलिए किया जाता है जिससे कि लोग आत्म-मंथन करके स्वयं को जानें, ताकि उनका स्वभाव बदल सके।

मुझे विश्वासी बने हुए कुछ ही महीने हुए थे, मुझे याद है एक अगुआ, बहन झाओ की संगति बहुत ही ज्ञानवर्धक और व्यवहारिक समस्याओं को सुलझाने वाली थी। मुझे सचमुच वो बहुत पसंद थी, मैंने सोचा, "कितना अच्छा हो अगर मैं भी बहन झाओ की तरह उस मुकाम पर पहुँच जाऊँ जहाँ मैं सत्य पर संगति करके भाई-बहनों की समस्याएँ सुलझा सकूँ!" जब कभी किसी को अगुआ या उपयाजक चुने जाने की बात सुनती, तो थोड़ी देर के लिए मैं बेचैन हो जाती थी, मैं उस दिन के लिए तरसने लगती जब मैं भी अगुआ बन जाऊँगी। उसके बाद, मैं परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और उन पर चिंतन करने में जुट गयी। मैंने भजनों की एक डायरी भी बना ली। मैं कलीसिया के हर काम में पूरे जोश से हिस्सा लेने लगी।

कुछ सालों के बाद, मुझे कलीसिया का अगुआ चुन लिया गया। मैं और बहन लियू कलीसिया के काम की ज़िम्मेदारी को मिलजुल कर निभाने लगे। अगर कभी कलीसिया के काम में कोई समस्या आती या भाई-‌बहनों को अपने काम में कोई मुश्किल पेश आती, तो उसका समाधान करने के लिए मैं बहन लियू से चर्चा करके सत्य खोजती। कुछ महीनों के बाद, हमें कलीसिया के काम में अच्छे परिणाम मिलने लगे। मेरी अगुआ ने मुझसे कहा कि मैं सहकर्मियों की सभाओं में सबको बताऊँ कि मैं क्या सीख रही हूँ। मुझे ये देखकर बड़ी खुशी हुई कि अगुआ मुझे इतना महत्व दे रही है, और भाई-बहन भी मुझे सम्मान से देख रहे हैं। मैं अनजाने में ही सभाओं में दिखावा करने लग गयी। मैं हमेशा संगति में बताने लगी कि किस तरह मैंने भाई-बहनों का सिंचन किया, उनकी मदद की, कैसे उनकी समस्याएँ दूर की, कैसे अपने कर्तव्य के निर्वहन में मैंने कष्ट उठाए, मैंने क्या कीमत चुकाई, और कैसे धीरे-धीरे कलीसिया के काम में कामयाबी मिलती गयी। इस वजह से कुछ भाई-बहन मुझे आदर और सम्मान से देखने लगे, जब भी उन्हें कोई समस्या आती, तो प्रार्थना करने या सत्य की खोज करने के बजाय, वे सीधे मेरे पास चले आते। मुझे लगातार यह लगता गया कि यही एक अगुआ के गुण होते हैं। मेरा अनुमान था कि कलीसिया की कामयाबी का अधिकतर श्रेय मुझे ही जाता है, तो मैं बहन लियू को थोड़ा हीन समझने लगी और उसके सुझावों की उपेक्षा करने लगी। कलीसिया के काम में आखिरी फैसला मेरा ही होता था। जब मुझे लगा कि बहन लियू मेरे सामने खुद को थोड़ा बेबस महसूस कर रही है, तो आत्म-मंथन करने के बजाय मैं सभा में डींगें हाँकने लगी। "हालाँकि बहन लियू और मैं, दोनों कलीसिया के काम के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन वो अपने काम में नकारात्मक और निष्क्रिय हो गयी है, लेकिन इसकी चिंता सिर्फ मुझे है और मैं ही सचमुच इसकी कीमत चुका रही हूँ। मुझे वाकई बहन लियू की चिंता है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचेगा।" भाई-बहनों का कहना था कि मैं अधिक ज़िम्मेदार हूँ और मैंने काम का बोझ भी अपने कंधों पर उठा रखा है। ये सुनकर मुझे सचमुच खुशी होती थी, मैं उनके समर्थन और सराहना का आनंद लेती थी।

कुछ दिनों के बाद, एक बहन ने मसले को समझकर मुझे सावधान किया, "बहन, आजकल मैं देख रही हूँ कि आप अपने व्यवहारिक अनुभवों पर ज़्यादा संगति नहीं कर रही हैं, जैसे कोई समस्या आने पर आपके अंदर किस तरह की भ्रष्टता या विद्रोहशीलता उजागर होती है, आप कैसे आत्म-मंथन करती हैं और कैसे खुद को जान पाती हैं, या समस्याओं को सुलझाने के लिए कैसे सत्य की खोज करती हैं और अंत में किस तरह स्वयं को बदलती हैं। मैंने कभी आपको इन बातों पर चर्चा करते नहीं सुना। ज़्यादातर, आप इस बात पर संगति करती हैं कि आपने लोगों की समस्याओं को कैसे हल किया और कैसे आपने कष्ट उठाया। इससे तो बाकी लोग आपको आदर से देखते हैं और आपकी चापलूसी करते हैं। आप सही राह पर नहीं हैं। आप वक्त बर्बाद करने के बजाय, आत्म-मंथन कीजिए!" लेकिन मैंने उसकी एक नहीं सुनी। मैंने सोचा, "मेरी सारी संगति मेरे वास्तविक निजी अनुभव पर आधारित है। भाई-बहन इसलिए मुझे स्वीकार करते हैं क्योंकि मैं सत्य के बल पर उनकी समस्याएँ सुलझा पाती हूँ। तुम कैसे कह सकती हो कि लोग मेरी चापलूसी करते हैं और मैं सही राह पर नहीं हूँ? तुम ऐसा इसलिए ऐसा कह रही हो, क्योंकि तुम मुझसे जलती हो, है न?" उस समय, मैं नाम और रुतबे के नशे में थी, मेरा दिल संवेदनशून्य और कठोर हो गया था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैं अपने अंदर ज़्यादा अंधकार महसूस करने लगी। अब मैं लोगों की स्थितियों और उनके काम में आने वाली मुश्किलों को न तो समझ पाती थी, न उन्हें सुलझा पाती थी। व्यवहारिक काम न पाने के कारण, आखिरकार, मुझे अगुआ के पद से हटा दिया गया।

मेरे अंदर ताकत नहीं बची थी, मैं सच्चाई का सामना नहीं करना चाहती थी। मैं इतनी निराश हो गयी थी कि मैं सभाओं में भी नहीं जाना चाहती थी। भाई-बहनों से नज़र मिलाने में भी मुझे शर्म आने लगी थी। जबकि पहले, मैं ही सभाओं की अगुआई करके, दूसरों के साथ संगति किया करती थी, लेकिन अब मेरी स्थिति बिल्कुल उल्टी हो गयी थी। मुझे इस बात की चिंता सताती थी कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे। मैं इन बातों पर जितना सोचती, उतनी ही और ज़्यादा परेशान और दुखी हो जाती। सभाओं में मेरा मन नहीं लगता था, कभी-कभी तो झपकी आ जाती थी। मैं बेहद कमज़ोर और निराश हो गयी थी, और मुझे लगता था कि परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है। मैं खुद को संभाल नहीं पायी, फूट-फूटकर रो पड़ी और परमेश्वर के आगे गिरकर प्रार्थना करने लगी : "हे परमेश्वर! मैं वाकई दुखी हूँ। मैं ऐसी स्थिति में जीना नहीं चाहती। परमेश्वर, मैं तेरे मार्गदर्शन और उद्धार की भीख माँगती हूँ। मैं पूरी सच्चाई से आत्म-मंथन करने और खुद को जानने के लिये तैयार हूँ।"

प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के पाठ की एक वीडियो देखी: "तुम लोगों की खोज में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व हैं। ... अब तुम लोग अनुयायी हो, और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ प्राप्त हो गयी है। हालाँकि, तुम लोगों ने अभी तक हैसियत के लिए अपनी अभिलाषा की उपेक्षा नहीं की है। जब तुम लोगों की हैसियत ऊँची होती है तो तुम लोग अच्छी तरह से खोज करते हो, किन्तु जब तुम्हारी हैसियत निम्न होती है तो तुम लोग अब और खोज नहीं करते हो। हैसियत के आशीष हमेशा तुम्हारे मन में होते हैं। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोग अपने आप को नकारात्मकता से नहीं हटा सकते हैं? क्या उत्तर हमेशा निराशाजनक संभावनाओं के कारण नहीं है? ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह के लोग व्यर्थ हैं! उसके द्वारा इन चीज़ों को पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह से अनुकरण करते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; बल्कि इसके बजाय तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')।

अपनी आस्था में रुतबे के पीछे भागने वाले मेरे सारे मंसूबों और विचारों को परमेश्वर के वचनों ने पूरी तरह से उजागर कर दिया। मैंने उस समय के बारे में सोचा जब मैं विश्वासी बनी ही थी। अगुआओं के प्रति मेरे मन में सम्मान था, मैं उस दिन के लिए तरस रही थी जब मैं भी अगुआ बनकर आदर पा सकूँगी। जब मैं अगुआ बन गयी, तो सुबह से शाम तक काम में लगी रहती, भले ही मैं कितनी भी थक जाती, लेकिन मुझे खुशी मिलती। जब अगुआ और भाई-बहन मुझे आदर से देखते तो मैं खुद को महत्वपूर्ण समझती, मेरे अंदर और भी जोश आ जाता। सभाओं में, मैं हमेशा दिखावा करती, इस बात पर इतराती कि काम को लेकर मैंने कितनी भाग-दौड़ की है, कितना कष्ट उठाया है, मैं बहन लियू को नीचे गिराती और खुद को ऊँचा उठाती ताकि लोग मेरी चापलूसी करें। अगुआ के पद से हटाए जाने के बाद मेरी कोई हैसियत नहीं बची थी, मैं मायूसी में डूबती चली गयी जिससे मैं निकल नहीं पायी। जब सच से सामना हुआ, तो मैंने देखा कि मैं न तो सत्य का अनुसरण करती थी और न ही अपनी आस्था में अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी, मैं सिर्फ रुतबे के पीछे भाग रही थी। जब मेरे पास रुतबा था, तो मेरे अंदर जोश था, लेकिन उसके छिनते ही मैं निराशा में डूब गयी। यहाँ तक कि मैंने खुद को निकम्मा मान लिया। मैंने जाना कि रुतबा पाने की मेरी ख्वाहिश कितनी प्रबल थी। इन चीज़ों के पीछे भागने से भला सत्य और परमेश्वर का उद्धार कैसे पाया जा सकता है? मुझे लगता था कि मैं काफी अच्छी हूँ, मेरे अंदर सत्य की समझ है और मैं अगुआ बनने के काबिल हूँ। लेकिन मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि पद छिन जाने के बाद मैं इतनी निराश हो जाऊँगी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे अंदर न तो सत्य की वास्तविकता है और न ही मेरा कोई आध्यात्मिक कद है। मैं बस लोगों से खोखले शब्दों और सिद्धांतों पर बात करती थी। मैं तो खुद को जानती ही नहीं थी—मैंने अपने अंदर कभी झाँक कर ही नहीं देखा। अगर मुझे अपने पद से न हटाया गया होता, तो मैंने आत्म-मंथन भी नहीं किया होता, न ही मैंने खुद को जाना होता, बल्कि मैं रुतबे के पीछे भाग रही होती और परमेश्वर का विरोध कर रही होती। इससे परमेश्वर के घर का कार्य बाधित होता और मेरे भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश को नुकसान पहुँचता। आखिरकार मुझे एहसास हो गया कि मुझे अगुआ के पद से हटाना परमेश्वर का धार्मिक न्याय था और वो मेरी रक्षा कर रहा था। परमेश्वर रुतबा पाने की मेरी इच्छा का निपटारा कर रहा था, और मुझे दिखा रहा था कि मैं गलत राह पर हूँ ताकि उसके आगे प्रायश्चित कर सकूँ। इसका एहसास होने पर मुझे थोड़ा सुकून मिला।

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के ऐसे और भी वचन पढ़े जो नाम और रुतबे के पीछे भागने वाले लोगों को उजागर करते हैं। कुछ अंश तो मेरे मन में उतर गए। "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं: उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें आपस में मिलना और बोलना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें घेरे रहते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनकी छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')। "जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करनी है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर के ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने से बहुत अधिक डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I')।

परमेश्वर के वचनों से मुझे पता चला कि लोग हमेशा नाम और रुतबे के पीछे भागते हैं, वे परमेश्वर का उत्कर्ष नहीं करते या उसकी गवाही नहीं देते। बल्कि वे लगातार दिखावा करके लोगों से अपनी चापलूसी करवाते हैं और अपने आस-पास भीड़ इकट्ठी करके रखते हैं, क्योंकि उनका शैतानी स्वभाव होता है और ऐसे स्वभाव वालों को परमेश्वर शाप और दंड देता है। क्या पौलुस इसका एकदम सटीक उदाहरण नहीं है? उसे अपने रुतबे और अधिकार से बेहद लगाव था, उसका पूरा ध्यान अपनी पद-प्रतिष्ठा पर था। अपने धर्मपत्र में, वो अक्सर इस बात की गवाही देता था कि वह कितना काम कर चुका है, प्रभु के लिए उसने कितने कष्ट उठाए हैं। उसका कहना था कि वो दूसरे प्रेरितों से कम नहीं है। उसने जो मेहनत की थी और जो कुछ भोगा था, वो सत्य का अनुसरण करने या एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए नहीं था, बल्कि अपनी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं की संतुष्टि के लिए था, दूसरों से खुद को पुजवाने के लिए था, और अंतत: पुरस्कार और मुकुट पाने के लिए था। यही वजह है कि बरसों की मेहनत के बाद भी उसके जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया था, आखिरकार अहंकार के कारण उसने अपना विवेक गँवा दिया, जिससे सिद्ध होता है कि उसके लिए, जीना ही मसीह था। वह प्रभु यीशु की जगह लेने का ख्याली पुलाव पका रहा था ताकि लोग उसका अनुसरण और अनुकरण करें। उसने परमेश्वर के स्वभाव का भयंकर अपमान कर दिया था। पौलुस की शैतानी प्रकृति बेहद अहंकारी और दंभी थी। वो हर काम अपनी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं की तुष्टि के लिए कर रहा था, और ये सब चीज़ें परमेश्वर की विरोधी थीं। वो परमेश्वर के खिलाफ मसीह-विरोधी राह पर चल रहा था, जिसकी परमेश्वर ने निंदा की थी और धिक्कारा था। जहाँ तक मेरी बात है, जब मैंने अपने कर्तव्य का थोड़ा-बहुत निर्वहन कर लिया, तो मैंने कहा कि मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद करती हूँ, लेकिन मन ही मन मैंने सारा श्रेय खुद ले लिया। मैं बड़ी ही बेशर्मी से परमेश्वर की महिमा चुरा रही थी, हर जगह दिखावा कर रही थी, इस बात की डींगें हाँक रही थी कि मैंने कितनी भाग-दौड़ की और कितना कष्ट उठाया, और मैंने कितनी समस्याएँ सुलझा दीं ताकि दूसरे लोग मेरी चापलूसी करें। जब मुझे बहन लियू निराश और कमज़ोर नज़र आयी, तो मैंने ऊपरी तौर पर उसकी मदद की और समर्थन दिया, लेकिन मन ही मन मैंने उसकी आलोचना की और उसे दुत्कारा। यहाँ तक कि सभाओं में उसे नीचा दिखाते हुए, मैंने खुद को ऊँचा उठाया, मैं चाहती थी कि भाई-बहन मेरा सम्मान करें और मेरी बात सुनें। एक बहन ने मेरी समस्या को पहचान लिया और प्यार से मेरी मदद करने के लिए मुझे खबरदार किया, लेकिन मैंने ढिठाई से उसे अस्वीकार कर दिया। मैंने तो यहाँ तक सोचा कि वो मेरा अपमान कर रही है, वो मुझसे जलती है। मैंने जाना कि मैं कितनी ज़्यादा विवेकशून्य हो गयी थी। परमेश्वर का उत्कर्ष करने और उसकी गवाही देने के लिए सत्य पर संगति करने को लेकर अपने काम पर मेरा कोई ध्यान नहीं था, बल्कि मैं दिखावा करने में लगी थी और हर बार अपने रुतबे को बचाने में लगी थी ताकि लोग मेरा सम्मान करें। मैं समझ गयी कि मैं प्रकृति से बेहद अहंकारी और दंभी हूँ। मैं पूरी तरह से शैतानी प्रकृति को जी रही थी, मैं भी पौलुस की तरह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले मसीह-विरोधी मार्ग पर ही चल रही थी। मैं जानती थी अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया, तो परमेश्वर मुझे तिरस्कृत करके हटा देगा। इस विचार से ही मैं डर गयी। मैं प्रार्थना के लिये भाग कर परमेश्वर के सामने पहुंची, मैं सत्य की खोज करके परमेश्वर के सामने पश्चाताप करना चाहती थी। उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाया और पिया, आत्म-मंथन किया और अपने बारे में जाना। मैंने अपने कार्यकलापों के पीछे की मंशाओं और इरादों की जाँच की। समस्याएँ आने पर, मैंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने पर ध्यान दिया, और धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा।

एक महीने के बाद, एक अगुआ ने मेरे लिए घर में सभा आयोजित करने के काम की व्यवस्था कर दी। शुरू में तो मैं इसे लेकर बहुत खुश नहीं थी। जब मैं अगुआ थी, तो दूसरे लोग मेरे लिए यह काम किया करते थे, लेकिन अब मैं खुद ही दूसरों के लिए घर पर सभा आयोजन का काम करने वाली थी। कितना अंतर आ गया था! लेकिन फिर मैंने सोचा, "क्या मैं अभी भी नाम और रुतबे के पीछे नहीं भाग रही हूँ? भाई-बहनों के लिए आयोजन का काम भले ही कोई विशेष काम न लगे, लेकिन यह मेरा कर्तव्य है, मेरी ज़िम्मेदारी और दायित्व है। मेरी अपनी कोई पसंद या माँग नहीं होनी चाहिए, बल्कि मुझे परमेश्वर के शासन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए।" और इस तरह, मैं सहमत हो गयी। दो दिन के बाद, अगुआ कुछ बहनों को मेरे घर पर लेकर आयी। मैं देखते ही समझ गयी कि मैं इन दोनों बहनों के साथ पहले काम कर चुकी हूँ। मेरा चेहरा तुरंत लाल हो गया और मुझे बड़ा अजीब-सा लगा, जैसे मैं उनसे छोटे पायदान पर खड़ी हूँ। हमने एक-दूसरे का हालचाल पूछा, और फिर मैं खाना बनाने के लिए रसोई में चली गयी। खाना बनाते समय, मुझे वो वक्त याद आ गया जब मैं इन बहनों के साथ काम किया करती थी। मैं सभाओं की अगुआई करके इनके साथ संगति किया करती थी। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ये आज अगुआ बन जाएँगी और मैं घर पर सभाओं का आयोजन करूँगी। मैं वाकई बेचैन हो गयी। तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर नाम और रुतबे के पीछे भाग रही हूँ, मैं तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसे पुकारने के लिए दौड़ी, और तब मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश याद आया : "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, तो मुझे समझ आया कि परमेश्वर घमंडी और महान लोगों को नहीं, बल्कि सच्चे लोगों को चाहता है। चाहे उसके पास रुतबा हो या न हो, वह सिर्फ़ परमेश्वर के शासन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने लायक होना चाहिये, एक ईमानदार इंसान होना चाहिये और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले काम करने में सक्षम होना चाहिये। परमेश्वर ने मेरी नियति एक मामूली घास बनने के लिए निर्धारित की है, और मुझे विशाल वृक्ष बनने की कामना किए बिना समर्पण करना चाहिये, मुझे मामूली घास बनकर अच्छी तरह से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिये। मैंने उस समय को याद किया जब मैं अगुआ थी। उस काम में महिमा दिखती थी, लेकिन मैंने सत्य के अनुसरण पर ध्यान नहीं दिया। बल्कि मैं हमेशा नाम और रुतबे के पीछे भागी। मैं बेपरवाह थी, खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझकर अहंकारी होती चली गयी, शैतानी स्वभावों को जीते हुए, परमेश्वर को चिढ़ाती रही। अब मैं सभाओं के आयोजन का काम कर रही हूँ, जो कोई बहुत बड़ा काम नहीं लगता, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारियाँ उठाने और कर्तव्य का निर्वहन कर पाने के कारण मैं काफी शांति और सुकून महसूस कर रही थी। इस पर गंभीरता से विचार करने पर, मुझे अब ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मेजबान बनने से मेरा कद छोटा हुआ है। मैं तहेदिल से समर्पण करने में सक्षम थी।

खाना खाने के बाद, हम तीनों ने सभा की। मैंने संगति में खुलकर बताया कि अगुआ रहते हुए मैंने अपने काम के दौरान क्या-क्या सीखा, उन लोगों ने अपने अनुभवों पर भी संगति की। इस सभा ने मुझे सचमुच आज़ादी का एहसास कराया, अब मैं नाम और रुतबे के बंधन से खुद को आज़ाद महसूस कर रही थी। यही मेरे अगुआ बनने और हटाए जाने का अनुभव है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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