क्या दूसरों के सौंपे गए कामों के प्रति निष्ठावान होना सही तरीका है?
यिन एन, चीनमेरे दादाजी हमारे गाँव के बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और वे हमेशा दूसरों की मदद करके खुश रहते थे। जब मैं छोटी थी तो वह और मेरी...
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जब मैं छोटा था तो अक्सर अपने पिता को दूसरे परिवारों के कामों में मदद करते हुए देखता था और उनके पास चाहे कोई भी जरूरत पड़ने पर आता, वह मदद करने के लिए हमेशा मान जाते थे। कभी-कभी तो जब वह घर के मामलों में व्यस्त होते थे, तब भी दूसरों को मना करने में बहुत ही ज्यादा शर्मिंदगी महसूस करते थे, इसलिए वह बहुत ही पसंद किए जाते थे। मैंने मन ही मन सोचा, “मुश्किल में पड़े लोगों की ओर मदद का हाथ बढ़ाने से सराहना और स्वीकृति मिलती है। बड़ा होने पर मैं अपने पिता जैसा एक अच्छा इंसान बनना चाहता हूँ।” बड़े होने पर चूँकि मुझे बिजली के उपकरणों के साथ जोड़-गाँठ करना पसंद था, जब भी किसी पड़ोसी घर में रेडियो, टीवी या लाइट खराब हो जाती थी तो पड़ोसी मदद के लिए मेरे पास आते थे और मैं उन्हें आसानी से मना नहीं करता था। मैंने सोचा कि जब दूसरे मुझसे मदद माँगते हैं तो इसका मतलब है कि वे मुझ पर भरोसा करते हैं और मुझे सम्मान देते हैं और मुझे उन्हें निराश नहीं करना चाहिए। परमेश्वर को पाने के बाद मैं कलीसिया में कर्तव्य निभाने लगा। चूँकि मैं कंप्यूटरों के बारे में थोड़ा-बहुत जानता था, मैं सबसे आम समस्याएँ संभाल सकता था और मैं चाहे कहीं भी जाता, भाई-बहन कंप्यूटर की समस्याओं में मुझसे मदद माँगते थे। मैं हर अनुरोध के लिए मान जाता था, मैं यह महसूस करता था कि चूँकि भाई-बहन मेरे पास आए हैं तो वे मुझ पर भरोसा करते हैं, इसलिए मुझे मदद करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए और उन्हें निराश नहीं करना चाहिए। बाद में मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए दूसरी जगह भेजा गया और कभी-कभार जब मैं घर आता था तो मेरी पत्नी मुझे बताती कि कई भाई-बहन चाहते हैं मैं उनके कंप्यूटर ठीक करने में मदद करूँ, वह कहती कि मेरा कौशल अच्छा है, इसलिए वे मेरे लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि मैं उन्हें ठीक कर सकूँ। यह सुनने के बाद, मुझे और भी ज़्यादा लगा कि भाई-बहन मुझ पर भरोसा करते हैं और भले ही मैं कर्तव्यों में व्यस्त होता, मैं कंप्यूटर की समस्याओं में उनकी मदद करने को प्राथमिकता देता था।
मार्च 2024 में मैं नवागंतुकों का सिंचन करने के लिए अपने गृहनगर लौटा। लेकिन चूँकि मैंने अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू किया था, मुझे नहीं पता था कि उनकी कुछ समस्याओं और कठिनाइयों को कैसे हल किया जाए और मुझे दर्शनों से संबंधित सत्यों से और लैस होने की जरूरत थी। भाई-बहनों को पता था कि मैं वापस आ गया हूँ, इसलिए जब उनके कंप्यूटर में समस्याएँ आती थीं तो वे सब मेरे पास समाधान के लिए आते रहते थे। एक दिन जब मैं नवागंतुकों के मसले समझने और खुद को सत्य से लैस करने की कोशिश कर रहा था और अगली सभा में नवागंतुकों के साथ संगति करने की तैयारी कर रहा था तो एक भाई मेरे पास आया और बोला कि उसके कंप्यूटर में कोई समस्या है और उसे ठीक करने में मेरी मदद चाहिए। मैं थोड़ा परेशान हुआ और मन ही मन सोचने लगा, “नवागंतुकों की समस्याओं का तुरंत समाधान करने की जरूरत है और मुझे अभी दर्शनों के बारे में सत्यों से लैस होने की जरूरत है। समय कम है, लेकिन अगर मैं सीधे मना कर दूँ तो क्या इससे भाई निराश नहीं हो जाएगा? क्या वह मेरे बारे में बुरा सोचेगा, यह कहेगा कि मुझमें प्रेम नहीं है?” इसलिए मैंने अपने कर्तव्य दरकिनार किए और भाई के कंप्यूटर का मसला हल करने के लिए उसके साथ चला गया, जिसे ठीक करने में आखिरकार रात के ग्यारह या बारह बज गए। अगले दिन दोपहर होते-होते वह हड़बड़ी में फिर आ गया और कहने लगा कि उसके कंप्यूटर में फिर से समस्या आ गई है और उसने इसे एक बार और देखने को कहा। मैं शुरू में कहना चाहता था कि मेरे पास समय नहीं है और वह इसे ठीक करने के लिए किसी और को ढूँढ़ ले, लेकिन बात मेरे गले में ही अटक गई। मैंने सोचा, “वह कंप्यूटर ठीक करने के लिए मुझ पर भरोसा करता है। मैं उसे निराश होकर कैसे जाने दे सकता हूँ?” इसलिए मैंने कंप्यूटर की मरम्मत के लिए अपने कर्तव्य एक बार फिर दरकिनार कर दिए। पूरी जाँच और मरम्मत के बाद कंप्यूटर सामान्य रूप से इस्तेमाल करने लायक बन गया। भाई ने खुशी से कहा, “तुम्हारे यहाँ होने से मुझे बड़ी तसल्ली रहती है।” यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और मुझे लगा कि भाई-बहन मेरा बहुत सम्मान करते हैं और मैं उनके दिलों में एक भरोसेमंद व्यक्ति हूँ। लेकिन चूँकि मैंने भाई को कंप्यूटर की मरम्मत में मदद की थी, मैंने खुद को उन दर्शन सत्यों से लैस नहीं किया जो मेरे पास होने चाहिए थे, नवागंतुकों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं हुआ और मुझे कुछ अपराध बोध महसूस हुआ, मैंने सोचा, “यूँ तो मैंने भाई की जरूरतें पूरी कीं, लेकिन मैंने अपने कर्तव्यों में देरी कर दी। क्या मैंने जो किया वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था?” एक और बार की बात है, एक बहन सुबह-सुबह मेरे घर आई और कहने लगी कि उसका कंप्यूटर इंटरनेट से ठीक से नहीं जुड़ रहा है और मैं इसे देख लूँ। उसने यह भी कहा कि अब जब मैं वापस आ गया हूँ तो अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मुझसे कहना काफी अधिक सुविधाजनक हो गया है। मैं थोड़ा परेशान हुआ और सोचने लगा, “अगुआ इन दिनों काम की जाँच कर रहे हैं और देख चुके हैं कि मेरे पास जिन नवागंतुकों के सिंचन की जिम्मेदारी है उनमें से कइयों की कुछ धारणाएँ और समस्याएँ अनसुलझी हैं। वे मुझसे कहते जा रहे हैं कि मैं जल्दी से खुद को दर्शन के सत्यों से लैस कर लूँ और नवागंतुकों के मसले तुरंत हल करने की जरूरत है; आखिर मैं बहन का कंप्यूटर ठीक करने के लिए समय कैसे निकाल सकता हूँ? इसके अलावा, बहन के कंप्यूटर की तत्काल ज़रूरत नहीं है और इस मुद्दे को कंप्यूटर मरम्मत में माहिर भाई-बहनों को सौंपा जा सकता है।” मैं बहन को मना करना चाहता था, लेकिन मैं कह ही नहीं पाया, मैंने सोचा, “बहन खुशी-खुशी मुझे ढूँढ़ने आई है। अगर मैं मना कर दूँ तो क्या इससे वह सचमुच निराश नहीं हो जाएगी? तब वह मेरे बारे में क्या सोचेगी?” इसलिए मैं उसका कंप्यूटर ठीक करने में मदद करने चला गया और मरम्मत पूरी करने में आखिरकार रात के दस बज गए। चूँकि मैं बहन को उसके कंप्यूटर में मदद कर रहा था, मेरे पास नवागंतुकों के मुद्दों पर विचार करने का समय नहीं था, इसलिए सभा के बहुत अच्छे नतीजे नहीं मिले। इस तरह, हर बार जब भाई-बहन मदद के लिए मेरे पास आते, मैं हमेशा उनके कंप्यूटर की मरम्मत के लिए अपना मुख्य काम एक तरफ रख देता था। हालाँकि मैं जानता था कि इससे मेरे अपने कर्तव्यों में गंभीर रूप से देरी होती है, जब भी वे मेरे पास आते, मुझे मना करने में हमेशा बहुत शर्मिंदगी महसूस होती थी।
मैंने अपनी पत्नी को अपनी दशा के बारे में खुलकर बताया और बातचीत की और उसने मुझे एक अनुभवजन्य गवाही का वीडियो देखने को कहा। उसमें मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “‘जो तुम्हें सौंपा गया है, उसे निष्ठापूर्वक पूरा करो’—यह एक अनिवार्य नैतिक आचरण है जो हर किसी के मन में उसके परिवार या समाज द्वारा बिठाया जाता है। यदि तुममें यह नैतिक आचरण है, तो लोग कहेंगे कि तुम कुलीन, सम्माननीय और सत्यनिष्ठ हो और समाज में तुम्हें सम्मान दिया जाएगा और ऊँची नजर से देखा जाएगा। चूँकि यह वाक्यांश ‘जो तुम्हें सौंपा गया है, उसे निष्ठापूर्वक पूरा करो’ लोगों से, शैतान से आता है, इसलिए यह वह चीज है जिसका हमें गहन-विश्लेषण करना चाहिए और भेद पहचानना चाहिए और इससे भी बढ़कर वह चीज है जिसका हमें त्याग करना चाहिए। हमें इस वाक्यांश का भेद क्यों पहचानना चाहिए और इसे क्यों त्याग देना चाहिए? आओ, पहले जाँच करें कि क्या यह वाक्यांश सही है और क्या इस वाक्यांश को साकार करने वाला व्यक्ति बनना सही है। क्या ‘जो तुम्हें सौंपा गया है, उसे निष्ठापूर्वक पूरा करो’ इस वाक्यांश के अनुसार जीने वाला व्यक्ति बनना और इस तरह का नैतिक चरित्र रखना, वास्तव में कुलीन होना है? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य वास्तविकता होती है? क्या उसमें वह मानवता होती है जो सृजित प्राणियों में होनी चाहिए और क्या उसमें स्व-आचरण के वे सिद्धांत होते हैं जिनका पालन उन्हें करना चाहिए, जैसा कि परमेश्वर द्वारा कहा गया है? क्या तुम सभी ‘जो तुम्हें सौंपा गया है, उसे निष्ठापूर्वक पूरा करो’ वाक्यांश को समझते हो? पहले अपने शब्दों में समझाओ कि इस वाक्यांश का क्या अर्थ है। (इसका मतलब है कि जब कोई तुम्हें कोई काम सौंपता है, तो तुम्हें उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए।) तो क्या तुम्हें वास्तव में ऐसा ही करना चाहिए? ‘जो तुम्हें सौंपा गया है, उसे निष्ठापूर्वक पूरा करो’ वाक्यांश का अर्थ है कि यदि कोई तुम्हें कोई काम सौंपता है, तो इसका मतलब है कि वह तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचता है, तुम पर विश्वास करता है और तुम्हें भरोसेमंद समझता है; इसलिए, चाहे वह व्यक्ति तुमसे कुछ भी करने को कहे, तुम्हें सहमत होना चाहिए और उसे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अच्छी तरह और ठीक से करना चाहिए, उसे खुश और संतुष्ट करना चाहिए—तब तुम एक अच्छे व्यक्ति हो। इसका निहितार्थ यह है कि तुम एक अच्छे व्यक्ति हो या नहीं, यह निर्धारित करने का मानक यह है कि जिस व्यक्ति ने तुम्हें काम सौंपा था, वह संतुष्ट है या नहीं। क्या इसे इस प्रकार समझाया जा सकता है? (हाँ।) तो क्या दूसरों की नजरों में एक अच्छा इंसान होना और इस तरह समाज द्वारा मान्यता पाना आसान नहीं है? (हाँ।) इसका क्या मतलब है कि यह ‘आसान’ है? इसका मतलब है कि मानक अत्यंत निम्न है और बिल्कुल भी उत्तम नहीं है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (14))। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मैंने सोचा कि कैसे मैं बचपन से ही अपने पिता से प्रभावित रहा हूँ। मैंने देखा कि जब गाँव वाले मेरे पिता के पास मदद के लिए आते थे तो वह दूसरों के मामलों से ठीक से निपटने के लिए अपने घर के मामलों को दरकिनार कर देते थे, जिससे आखिरकार उन्होंने अपने आस-पास के लोगों का भरोसा जीत लिया। इसलिए मैं सोचता था कि “अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है, उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो” के विचार के अनुसार आचरण करना ही व्यक्ति को भरोसेमंद और नेक बनाता है। चूँकि मुझे बिजली के उपकरणों के साथ काम करना पसंद था, जब भी किसी की लाइट, रेडियो, टीवी या अन्य उपकरण खराब हो जाते, अगर वे मेरे पास आते तो मैं हमेशा इन चीजों की मरम्मत में मदद करने की पूरी कोशिश करता था। मेरा मानना था कि दूसरों के भरोसे पर खरा उतरने का यही एकमात्र तरीका है। हर बार जब मैं दूसरे लोगों की चीजें ठीक करता और उनकी प्रशंसा और धन्यवाद सुनता था तो मुझे बहुत खुशी होती और लगता कि उनके दिलों में मैं एक भरोसेमंद और अच्छा इंसान हूँ। परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद भी मैं इसी दृष्टिकोण से जीता रहा। मैं नवागंतुकों का सिंचन कर रहा था और चूँकि मैंने अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू किया था, मुझमें कई कमियाँ थीं और मैं कुछ सत्यों पर स्पष्ट रूप से संगति नहीं कर पाता था, इसलिए मुझे दर्शन के संबंध में सत्य से और लैस होने की ज़रूरत थी, केवल तभी मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकता था। लेकिन मैंने अपने मुख्य कार्य में मेहनत नहीं झोंकी। जब भाई-बहन कंप्यूटर की समस्याओं में मदद के लिए मेरे पास आते थे तो उन्हें निराश करने से बचने और उनकी नजर में अपनी अच्छी छवि कायम रखने के लिए मैं उनके कंप्यूटर संबंधी मसलों में मदद करने के लिए अपने कर्तव्य तुरंत छोड़ देता था। नतीजतन, मैं नवागंतुकों की समस्याओं से संबंधित सत्यों को खोजता या उनसे खुद को लैस नहीं करता था और सभाओं के अच्छे नतीजे नहीं मिलते थे। मैं “अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है, उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो” वाले दृष्टिकोण से नियंत्रित था, हमेशा यह सोचता था कि भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे और अपने कर्तव्य से अधिक महत्व उन चीजों को देता था जो लोग मुझे सौंपते थे। मैं अपना ही कर्तव्य अच्छे से निभाने में असफल हो रहा था। मैं खुद को एक अच्छा इंसान कैसे कह सकता था?
बाद में मैंने सोचा, “मैं दूसरों के अनुरोधों को मना करने के बजाय अपने कर्तव्य में बाधा डालना क्यों पसंद करता हूँ? यह किस तरह की समस्या है?” फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग कहते हैं, ‘उन लोगों में से जो “अन्य लोगों ने उन्हें जो कुछ भी सौंपा है उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करते हैं,” ऐसे भी अनेक लोग हैं जो दूसरे लोगों की कीमत पर लाभ नहीं कमाना चाहते। उनका लक्ष्य बस चीजों को अच्छी तरह से संभालने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना होता है, इन लोगों में वास्तव में नैतिक आचरण होता है।’ यह कथन गलत है। भले ही वे धन, भौतिक चीजें या किसी भी प्रकार का लाभ न चाहते हों, वे प्रसिद्धि अवश्य चाहते हैं। यह ‘प्रसिद्धि’ क्या है? इसका अर्थ है, ‘मैंने वह काम स्वीकार लिया है जो उस व्यक्ति ने मुझे सौंपा था। वह व्यक्ति चाहे उपस्थित हो या नहीं, अगर मैं इसे ठीक से करने के लिए भरसक कोशिश करता हूँ और उसने मुझे जो सौंपा है उसे वफादारी से सँभालता हूँ तो मेरी अच्छी प्रतिष्ठा होगी। कम-से-कम कुछ लोग जान लेंगे कि मैं एक अच्छा, उच्च चरित्र वाला और अनुकरणीय व्यक्ति हूँ। मैं लोगों के बीच एक स्थान रख सकता हूँ और लोगों के समूह में एक अच्छी प्रतिष्ठा छोड़ सकता हूँ। यह सार्थक है!’ दूसरे लोग कहते हैं, ‘“अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो” और चूँकि लोगों ने हमें कार्य सौंपा है, तो चाहे वे मौजूद हों या नहीं, हमें उनके कार्यों को अच्छी तरह से संभालना चाहिए और अंत तक निभाना चाहिए। भले ही हम एक स्थायी विरासत न छोड़ पाएँ, कम-से-कम वे यह कहकर पीठ पीछे हमारी आलोचना तो नहीं कर सकते कि हमारी कोई विश्वसनीयता नहीं है। हम आने वाली पीढ़ियों के साथ भेदभाव नहीं होने देंगे और उन्हें ऐसा घोर अन्याय नहीं सहने देंगे।’ वे क्या चाह रहे हैं? वे अभी भी प्रसिद्धि खोज रहे हैं। कुछ लोग धन और संपत्ति को बहुत महत्व देते हैं, जबकि अन्य प्रसिद्धि और लाभ को महत्व देते हैं। ‘प्रसिद्धि’ का क्या मतलब है? लोगों में ‘प्रसिद्धि’ के लिए विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? इसका अर्थ है, एक अच्छा और उच्च चरित्र वाला व्यक्ति, एक आदर्श, सदाचारी व्यक्ति या संत कहलाना। बल्कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो केवल एक मामले में ‘अन्य लोगों ने उन्हें जो कुछ भी सौंपा उसे निष्ठापूर्वक सँभालने के लिए अपनी पूरी कोशिश करने’ में सफल रहे, और चूँकि उनमें ऐसा चरित्र था, इसलिए उनकी हमेशा प्रशंसा की जाती है और उनके वंशजों को उनकी प्रसिद्धि से लाभ मिलता है। तुम देख लो, यह उन छोटे से लाभों से कहीं अधिक मूल्यवान है जो वे वर्तमान में प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए तथाकथित नैतिक मानक का पालन करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए ‘अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है उसे निष्ठापूर्वक सँभालने के लिए अपनी पूरी कोशिश करो’ का शुरुआती बिंदु इतना शुद्ध नहीं है। वह एक व्यक्ति के रूप में अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों को पूरा करने की कोशिश मात्र नहीं कर रहा है, बल्कि या तो व्यक्तिगत लाभ या प्रतिष्ठा के लिए, या फिर इस जीवन या अगले जीवन के लिए इसका अनुसरण कर रहा है। बेशक, ऐसे लोग भी हैं जो पीठ पीछे आलोचना और बदनामी से बचना चाहते हैं। संक्षेप में, लोगों के लिए इस तरह का काम करने का शुरुआती बिंदु सरल नहीं होता है, यह मानवता के दृष्टिकोण का शुरुआती बिंदु नहीं है, न ही यह मानवजाति की सामाजिक जिम्मेदारी वाला शुरुआती बिंदु है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (14))। “किसी भी सामाजिक समुदाय या समूह में, लोग चाहते हैं कि दूसरे कहें कि वे उच्च नैतिक चरित्र वाले व्यक्ति, अच्छे व्यक्ति, प्रतिष्ठित व्यक्ति, भरोसेमंद व्यक्ति हैं और जिन्हें काम सौंपे जा सकते हैं। वे सभी ऐसी छवि स्थापित करना चाहते हैं ताकि दूसरे उनका आदर करें और ताकि दूसरे यह मानें कि वे गरिमावान व्यक्ति हैं, वे भावनाओं और वफादारी वाले हाड़-मांस के लोग हैं, न कि निष्ठुर या दूसरी दुनिया के लोग हैं। यदि तुम समाज में एकीकृत होना चाहते हो और उनके द्वारा स्वीकृति और मान्यता प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उन्हें यह स्वीकार करवाना होगा कि तुम उच्च नैतिक चरित्र वाले, सत्यनिष्ठा और विश्वसनीयता वाले व्यक्ति हो। तो चाहे वे तुमसे किसी भी प्रकार का अनुरोध करें, तुम उन्हें संतुष्ट और खुश करने की पूरी कोशिश करते हो—तब, तुम्हें उनसे एक उच्च नैतिक चरित्र वाले भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में प्रशंसा मिलती है और हर कोई तुम्हारे साथ जुड़ने को तैयार होता है। इस तरह तुम अपने जीवन में आत्म-मूल्य की भावना महसूस करते हो। यदि तुम्हें समाज द्वारा, लोगों द्वारा और तुम्हारे आस-पास के सहकर्मियों और दोस्तों द्वारा मान्यता दी जा सकती है, तो तुम एक विशेष रूप से संतुष्ट और संतोषजनक जीवन जियोगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (14))। परमेश्वर के वचनों ने समस्या की जड़ को उजागर कर दिया। जब लोग “दूसरों के मामलों को निष्ठापूर्वक सँभाल” लेते हैं तो इसकी वजह यह नहीं है कि वे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना चाहते हैं, बल्कि इसकी वजह यह है कि वे एक अच्छी प्रतिष्ठा हासिल करना चाहते हैं। मैंने खुद पर विचार करते हुए देखा कि मैं बचपन से ही अपने पिता से प्रभावित था। जब भी किसी के उपकरण खराब होते और वह मुझसे मदद माँगता था तो मैं हमेशा मान जाता था। मैंने यह सब इसलिए किया ताकि गाँव में मेरी अच्छी प्रतिष्ठा हो और दूसरे मेरी प्रशंसा करें। अपना कर्तव्य निभाना शुरू करने के बाद मेरे पास जब कभी भाई-बहन कंप्यूटर की समस्याएँ लेकर आते थे तो मुझे लगता था कि मैं मना नहीं कर सकता, चाहे मैं अपने कर्तव्य में कितना भी व्यस्त क्यों न होऊँ। खासकर जब भाई-बहन कहते थे कि मेरे पास मरम्मत का अच्छा हुनर है तो मैं अत्यंत संतुष्ट महसूस करता था और सोचता था कि यह उनका मुझ पर भरोसा करना है। भाई-बहनों के दिलों में अपनी अच्छी छवि कायम रखने के लिए भले ही मैं अच्छी तरह से जानता था कि नवागंतुकों की समस्याएँ अभी भी अनसुलझी हैं और मुझे खुद को और लैस करने की ज़रूरत है क्योंकि दर्शन के बारे में सत्य अभी भी मेरे लिए अस्पष्ट था, जब भाई-बहन कंप्यूटर की मदद के लिए मेरे पास आते, भले ही मैं मना करना चाहता था, मैं बस शब्द नहीं कह पाता था क्योंकि मुझे उन्हें निराश करने का डर था, जिससे वे सोचते कि मुझमें प्रेम नहीं है, और उन पर मेरी खराब छाप पड़ती। असल में अगर उन्हें अपने कंप्यूटरों की तत्काल जरूरत होती तो उनकी समस्याएँ हल करने के लिए मेरा कभी-कभार मदद करना ठीक रहता, लेकिन कुछ को अपने कंप्यूटरों की तत्काल जरूरत नहीं होती थी और वे उन्हें कंप्यूटर मरम्मत का कर्तव्य निभाने वाले भाई-बहनों को सौंप सकते थे। लेकिन चूँकि मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहता था, मैं हमेशा मान जाता था, इस बात की परवाह नहीं करता था कि इससे मेरे कर्तव्य पर असर पड़ता है और नतीजतन मेरे कर्तव्यों में अड़चन पैदा हो जाती थी। मैं अपनी प्रसिद्धि और लाभ को बहुत ही महत्व देता था और बस दूसरों के दिलों में एक अच्छी छवि कायम रखने के लिए अपने कर्तव्य में देरी करना पसंद करता था और दूसरों को यह महसूस कराता था कि मैं एक भरोसेमंद और प्रेम करने वाला व्यक्ति हूँ। मैं सचमुच स्वार्थी और नीच था! कर्तव्य परमेश्वर की ओर से लोगों को दिया गया एक आदेश है। यह वह जिम्मेदारी है जो एक सृजित प्राणी को सर्वोपरि निभानी होती है, लेकिन मैं लोगों द्वारा सौंपी गई चीजों को अपने कर्तव्य से अधिक महत्वपूर्ण मानता था। दूसरों द्वारा मुझे सौंपे गए मामले चाहे कितने ही कठिन या समय-खपाऊ क्यों न हों, मैं उन्हें अच्छी तरह से करने की भरसक कोशिश करता था, यह नहीं सोचता था कि अपना कर्तव्य कैसे उस तरह किया जाए जो परमेश्वर को संतुष्ट करे। मैंने लोगों के दिलों में एक अच्छी छवि बनाए रखी, लेकिन परमेश्वर की नजरों में मैं एक ऐसा व्यक्ति बन गया था जो अपने कर्तव्य को हल्के में लेता है, उसे बिना वफादारी या भरोसे के करता है। मैं वास्तव में अपनी प्राथमिकताओं को उलझा रहा था और गाड़ी को घोड़े के आगे जोत रहा था! परमेश्वर ने मुझे नवागंतुकों का सिंचन करने का अवसर देकर मुझ पर अनुग्रह किया, वह यह उम्मीद कर रहा था कि मैं उनकी विभिन्न धारणाओं और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य खोजूँगा, जिससे वे परमेश्वर के कार्य को जान सकें और सच्चे मार्ग में जल्दी ही जड़ें जमा सकें। मुझे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखानी चाहिए थी और परिस्थिति की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य अच्छे से निभाने चाहिए थे।
बाद में मैंने फिर से सोचा, “मुझे उन चीजों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जो दूसरे मुझे सौंपते हैं?” खोज के दौरान मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “यदि तुम्हें सौंपा गया कार्य तुम्हारा बहुत ज्यादा समय और ऊर्जा नहीं लेता है और तुम्हारी काबिलियत की सीमाओं में है या यदि तुम्हारे पास सही माहौल और परिस्थितियाँ हैं, तो मानवीय जमीर और विवेक से, तुम अपनी संभाल सकने की क्षमता के दायरे में रहकर दूसरों के लिए कुछ चीजें कर सकते हो और उनके कुछ तार्किक और उचित अनुरोधों को पूरा करने की कोशिश कर सकते हो। लेकिन, यदि तुम्हें सौंपा गया कार्य तुम्हारा बहुत अधिक समय और ऊर्जा लेता है और उसमें तुम्हारा बहुत सारा समय खप जाता है, इस हद तक कि तुम्हें अपने जीवन का बलिदान देना पड़ता है और इस जीवन में तुम्हारी जिम्मेदारियाँ व दायित्व और एक सृजित प्राणी के तौर पर तुम्हें जो कर्तव्य करने चाहिए—उन्हें घटाकर शून्य कर दिया जाएगा और बदल दिया जाएगा, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें मना कर देना चाहिए क्योंकि वह तुम्हारी जिम्मेदारी या दायित्व नहीं है। जहाँ तक किसी व्यक्ति के जीवन की जिम्मेदारियों और दायित्वों का सवाल है, तो माता-पिता की देखभाल, बच्चों के पालन-पोषण और समाज में कानून के दायरे में रहते हुए सामाजिक जिम्मेदारियों को पूर्ण करने के अलावा, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी व्यक्ति की ऊर्जा, समय और जीवन, एक सृजित प्राणी के कर्तव्य करने में खर्च होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति द्वारा उसे सौंपे गए ऐसे कार्य में जो उसका समय और ऊर्जा ले लेता हो। ऐसा इसलिए कि परमेश्वर व्यक्ति का सृजन करता है, उसे जीवन प्रदान करता है और उसे इस दुनिया में लाता है, इसलिए नहीं कि वह दूसरों के लिए काम करे या किसी दूसरे इंसान की खातिर जिम्मेदारियों को पूरा करे। लोगों को जो सबसे पहले स्वीकारना चाहिए वह है परमेश्वर का आदेश। केवल परमेश्वर का आदेश ही सच्चा आदेश होता है; किसी दूसरे इंसान द्वारा तुम्हें सौंपा गया काम स्वीकारने का मतलब अपने समुचित कर्तव्यों की अनदेखी करना है। कोई भी तुमसे यह अपेक्षा करने के योग्य नहीं है कि तुम अपनी वफादारी, ऊर्जा, समय, या यहाँ तक कि अपनी युवावस्था और संपूर्ण जीवन उनके द्वारा सौंपे गए कार्यों को समर्पित करो। केवल परमेश्वर ही लोगों से एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने की अपेक्षा करने का अधिकारी है। ऐसा क्यों? यदि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तुम्हें सौंपे गए किसी भी कार्य में तुम्हें काफी समय और ऊर्जा खपानी पड़ती है, तो वह तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने में बाधक होगा और यहाँ तक कि तुम्हारे लिए जीवन में सही मार्ग पर चलने में भी रुकावट पैदा करेगा और तुम्हारे जीवन की दिशा और लक्ष्य बदल देगा। यह कोई अच्छी बात नहीं है, यह एक आपदा है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (14))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का एक मार्ग दिखाया। इस जीवन में हमें जो चीज सर्वाधिक स्वीकार करनी है वह है परमेश्वर का आदेश, जिसे हमें पूरे दिल और दिमाग से पूरा करना है। जहाँ तक दूसरों द्वारा हमें सौंपे गए मामलों की बात है, हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या वे हमारा बहुत ज़्यादा समय लेंगे और क्या वे हमारे मुख्य कर्तव्य में बाधा डालेंगे। अगर वे बहुत ज़्यादा समय नहीं लेते हैं और हम अपने कर्तव्य में बहुत व्यस्त नहीं हैं, तो मानवीय जमीर और विवेक के आधार पर हम उन्हें हल करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन अगर दूसरों की मदद करने से हमारे मुख्य कर्तव्य पर असर पड़ेगा तो हमें मना कर देना चाहिए और इस पारंपरिक सांस्कृतिक विचार से नहीं बँधना चाहिए कि “अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है, उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो”। लेकिन अतीत में मेरे पास इस बारे में कोई सिद्धांत नहीं था कि मुझे दूसरों द्वारा सौंपी गई चीजों से कैसे पेश आना है। चाहे जिसने भी मुझसे मदद माँगी, मैंने उसे कभी मना नहीं किया और नतीजतन अपने ही कर्तव्य में बाधा डाली। यूँ तो कंप्यूटरों की मरम्मत में भाई-बहनों की मदद करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसमें अगर बहुत समय लगता है और मेरे कर्तव्य में देरी होती है तो मुझे मना कर देना चाहिए और भाई-बहनों को स्थिति समझा देनी चाहिए; वे समझ जाएँगे। मुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर के वचनों और सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए।
एक रात मेरे घर दो भाई आए और कहने लगे कि एक नया कंप्यूटर चालू नहीं हो रहा है और उन्हें मेरी मदद चाहिए। मैं परेशान हो गया और सोचने लगा, “मेरे पास अभी भी कुछ ज़रूरी काम हैं जो मैंने पूरे नहीं किए हैं और अगर मैं उनका कंप्यूटर ठीक करने में मदद करने के लिए मान जाता हूँ, तो निश्चित रूप से मुझे काफी देर हो जाएगी, लेकिन अगर मैं सीधे मना कर दूँ, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? वे खुशी-खुशी आए थे, लेकिन निराश होकर लौटेंगे। क्या मैं उन पर अपनी खराब छाप नहीं छोड़ूँगा?” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से दूसरों के दिलों में अपने रुतबे और छवि के बारे में सोच रहा था, इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना की, उससे विनती की कि सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देने में वह मेरा मार्गदर्शन करे। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मैंने पढ़ा था : “यदि तुम्हें सौंपा गया कार्य तुम्हारा बहुत ज्यादा समय और ऊर्जा नहीं लेता है और तुम्हारी काबिलियत की सीमाओं में है या यदि तुम्हारे पास सही माहौल और परिस्थितियाँ हैं, तो मानवीय जमीर और विवेक से, तुम अपनी संभाल सकने की क्षमता के दायरे में रहकर दूसरों के लिए कुछ चीजें कर सकते हो और उनके कुछ तार्किक और उचित अनुरोधों को पूरा करने की कोशिश कर सकते हो। लेकिन, यदि तुम्हें सौंपा गया कार्य तुम्हारा बहुत अधिक समय और ऊर्जा लेता है और उसमें तुम्हारा बहुत सारा समय खप जाता है, इस हद तक कि तुम्हें अपने जीवन का बलिदान देना पड़ता है और इस जीवन में तुम्हारी जिम्मेदारियाँ व दायित्व और एक सृजित प्राणी के तौर पर तुम्हें जो कर्तव्य करने चाहिए—उन्हें घटाकर शून्य कर दिया जाएगा और बदल दिया जाएगा, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें मना कर देना चाहिए क्योंकि वह तुम्हारी जिम्मेदारी या दायित्व नहीं है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (14))। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला। मुझे पहले यह देखने की ज़रूरत थी कि कंप्यूटर में क्या समस्या है और अगर इसमें बहुत ज़्यादा समय नहीं लगता और यह एक साधारण मामला है, तो मैं इसे सँभालने में मदद करूँगा। लेकिन अगर यह एक बड़ी समस्या है जिसे ठीक करने में लंबा समय लगेगा, तो मैं उन्हें उन भाई-बहनों के पास भेज दूँगा जो कंप्यूटर की मरम्मत करते हैं। इसलिए मैंने समस्या की जाँच करने के लिए कंप्यूटर चालू किया और मैंने पाया कि सिस्टम में कोई समस्या है। यह ऐसी चीज नहीं थी जिसे जल्दी ठीक किया जा सके, इसलिए मैंने भाइयों से कहा कि मैं अपने कर्तव्य में व्यस्त हूँ और मेरे पास इसे ठीक करने का समय नहीं है और मैंने उन्हें मदद के लिए दूसरे भाई-बहनों के पास जाने के लिए कहा। यह सुनने के बाद वे मान गए। जब मैंने परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास किया तो भाइयों ने मेरे बारे में वैसा कोई नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं बनाया जैसा मैंने सोचा था और मैंने बहुत शर्मिंदा महसूस किया।
इस अनुभव के माध्यम से मैंने इस पारंपरिक सांस्कृतिक विचार के बारे में विवेकशीलता हासिल की कि “अन्य लोगों ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है, उसे निष्ठापूर्वक सँभालने की पूरी कोशिश करो” और मैं यह भी समझ गया कि केवल लोगों द्वारा सौंपे गए काम को ठीक से करने से कोई व्यक्ति वास्तव में अच्छा इंसान नहीं बन जाता। परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने पूरे दिल और ताकत से अपना कर्तव्य अच्छे से निभाकर ही व्यक्ति वास्तव में एक अच्छा इंसान होता है। मैं अब अपना चेहरा बचाने के चक्कर में दूसरों के हर काम के लिए हाँ कहकर अपने कर्तव्य में देरी नहीं करता। यह बदलाव और समझ मुझे परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से ही मिली है। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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