सिर्फ परमेश्‍वर का प्रेम ही वास्‍तविक है

25 सितम्बर, 2019

शियाओडॉन्ग, शिचुआन प्रांत

परमेश्‍वर ने कहा, "हज़ारों वर्षों से भ्रष्‍ट होता रहा चीनी राष्‍ट्र आज तक जीवित बचा रहा है, जिसमें हर तरह के 'विषाणु' निर्बाध गति से बढ़ते रहे और महामारी की तरह हर तरफ़ फैलते रहे; यह जानने के लिए कि लोगों के भीतर कितने 'रोगाणु' छिपे हुए हैं, उनके आपसी रिश्‍तों पर नज़र डालना भर पर्याप्‍त है। परमेश्‍वर के लिए इस तरह के अत्यंत अवरुद्ध और विषाणुओं से दूषित क्षेत्र में अपने कार्य को आगे बढ़ाना बेहद मुश्किल है। लोगों के व्‍यक्तित्‍व, आदतें, उनका काम करने का ढंग, अपने जीवन में उनकी हर अभिव्‍यक्ति और उनके पारस्‍परिक संबंध—वे सब जगह-जगह से इस क़दर कटे-फटे हैं..." ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मार्ग... (6)')। परमेश्‍वर के वचनों के प्रकाशन ने मुझे यह समझाया कि कैसे शैतान की दुष्टता, लोगों के बीच के सारे संबंधों को असामान्‍य बना देती है, क्‍योंकि वे सब शैतान के जीवन-दर्शन पर आधारित होते हैं, जिनमें यहाँ तक कि लेशमात्र भी सत्‍य का समावेश नहीं होता है। परमेश्‍वर से द्वारा उद्धार के बिना, मेरी आँखें अभी भी बंद और मैं अभी भी अपनी में भावनाओं में फंसा रहता, लेकिन परमेश्‍वर के कार्य के अनुभव ने मुझे यह समझाया कि "एक-दूसरे की सहायता" का अर्थ क्‍या होता है और मुझे मित्रता, प्रेम और पारिवारिक ममता का सच दिखाया। मैने देखा कि केवल परमेश्‍वर के वचन ही सत्य हैं और कि केवल परमेश्‍वर के वचनों के अनुसार जीवन जी कर ही हम शैतान के प्रभाव से बच कर निकल सकते हैं और कि केवल सत्य के अनुसार आचरण करके ही कोई व्‍यक्ति एक अर्थपूर्ण जीवन जी सकता है।

मेरे माता-पिता दोनों ईसाई थे, और उस समय प्रभु यीशु में हमारी श्रद्धा हमारे लिए बहुत सा अनुग्रह लायी थी। विशेषरूप से कारोबार में, परमेश्‍वर ने हमें भौतिक सुख-साधनों के मामले में बहुत आशीष दिए थे। हमारे अधिकतर रिश्‍तेदार उतने संपन्‍न नहीं थे जितना कि मेरा परिवार था, और मेरे माता-पिता आर्थिक और भौतिक रूप से उनकी अच्‍छी देखभाल करते थे। मेरे रिश्‍तेदार मेरे माता-पिता के प्रति काफी सम्‍मान का भाव रखते थे, और स्‍वाभाविक रूप से वे मुझे भी उसी दृष्टि से देखते थे। यह एक प्रकार का हितकारी माहौल था जिसमें मैं बड़ा हुआ था। मैं सोचता था कि मेरे मित्र और रिश्‍तेदार बहुत अच्‍छे थे, और चाहे हमारे परिवार को कोई भी आवश्यकता क्‍यों न हो। वे सहायता करने के लिए तैयार रहेंगे।

1998 में, मेरे पूरे परिवार ने परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार कर लिया और साथ ही क्योंकि यह एक कठिन क्षेत्र था, इसलिए हमने पारिवारिक कारोबार को बंद कर दिया। उस समय मुझे सत्य समझ नहीं आया, इसलिए मेरा हृदय अभी भी इस दुनिया के लिए तड़पता था। मै खाते, पीते और नज़दीकी दोस्‍तों एवं रिश्‍तेदारों के साथ दावतें करते हुए अपने दिन व्‍यतीत करता था और क्योंकि मैं उदारता से खर्च करता था, इसलिए ज्‍़यादा-से-ज्‍़यादा लोग मेरे दोस्‍त बनते गये थे और ज्‍़यादा-से-ज्‍़यादा सहपाठी मिलन समारोह, पार्टियाँ, सहपाठियों और दोस्तों के जन्मदिन और विवाह, और अन्य सुअवसर मुझे आमंत्रित किए बिना नहीं हो सकते, क्‍योंकि मैं बहुत "महत्‍वपूर्ण" था। इसके अलावा, हर रविवार को मुझे अपनी महिला-मित्र से मिलने और उसे विदा करने जाना होता था, और प्रायः हम एक साथ बाहर घूमने जाते थे। उस समय, भले ही मैं कलीसिया की सप्‍ताह में तीन बैठकों में से एक भी नहीं चूकता था, मुझे तब भी परमेश्‍वर के वचनों के बारे में बिल्‍कुल भी समझ नहीं थी, मेरा हृदय अभी भी बाहरी दुनिया में भटकता रहता था, और परमेश्‍वर में विश्वास करना नियमों की दासता जैसा महसूस होता था। लेकिन मुझे सच के बारे में समझाने के लिए परमेश्‍वर ने माहौलों का उपयोग किया। उसने मुझे दिखाया कि लोगों के बीचच संबंध और किसी अन्य चीज़ पर नहीं बल्कि पास्‍परिक हितों पर आधारित होते हैं, और यह कि उनमें सच्‍ची अनुभूति और प्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती है।

कारोबार बंद होने को पश्चात्, मेरे माता-पिता ने हमारे मकान की मरम्मत करवाई और मेरी और मेरी बहन की ट्यूशन का भुगतान किया, इस प्रकार हमारे परिवार की बचत कुछ ही वर्षों में लगभग समाप्त हो गई। जैसा कि कहा जाता है "सागर में पानी कम हो तो नदी सूख जाती है"। चूँकि मैं उन पर निर्भर था, अत: मेरे स्वयं के खर्च में भी कमी आ गई। मैं विवाहों और छोटे या बड़े समारोहों में जाने से जब कभी भी बच सकता तो बचता था, इसलिए मेरे मित्रों का दायरा छोटा होने लगा, और मेरे मित्रों की निग़ाह में मेरी हैसियत कम और कम होती गई। जैसे-जैसे मेरे गरीब मित्रों और रिश्तेदारों की संपत्ति में सुधार होता गया उन्होंने भी हमसे नाता रखना कम कर दिया। यह मेरे लिए शुद्धि का समय था, क्योंकि मैंने यह महसूस किया था कि दूसरों के हृदयों में मेरी कोई हैसियत नहीं है। विशेषरूप से मेरी महिला मित्र, जिसने मुझसे अधिक दूरी बना ली थी क्योंकि मैं उतनी उदारता से पैसा खर्च नहीं करता था जितनी उदारता से मैं अतीत में करता था, और अंततः 2001 में वह मुझे छोड़ कर किसी और के साथ चली गई। जब मुझे इसके बारे में पता चला, तो मैं स्वीकार नहीं कर सका था कि यह एक वास्तविकता है। मैंने बाहरी तौर पर इसे प्रकट नहीं किया, किन्तु यह पता लगना मेरे हृदय में छुरी के चुभने जैसा था। मैं उसके प्रति वफ़ादार था, उसके प्रति मेरे प्रयास बहुत ईमानदार थे, तो मुझे बदले में उसका विश्वासघात क्यों मिला? इस तरह से हमारा पाँच साल का संबंध समाप्त हो गया। मैं नहीं जानता था कि उसे कैसे भुलाया जाए, इसलिए मैं इतना ही कर सकता था कि उस पीड़ा को अपने हृदय की गहराई में गाड़ दूँ। उसके बाद, जब दूसरे लोग इस घटना का उल्लेख करते थे तो मुझे इससे नफ़रत होती थी। मैं समझ में नहीं पाता था कि मेरे साथ ऐसा कुछ कैसे घटित हो सकता है। तब एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को देखा, "अधिकतर लोग शैतान के घृणित स्थान में रहते हैं और उसका उपहास सहते हैं; वह उन्हें अनेक प्रकार से तब तक कष्ट देता है जब तक वे केवल आधे ही जीवित बचते हैं, मानव-संसार का हर अन्याय, हर कष्ट सहते हैं। उनके साथ खेलने के बाद शैतान उनकी नियति ख़त्म कर देता है। और इसलिए लोग अपना पूरा जीवन उलझन में गुज़ार देते हैं, कभी भी उन अच्छी चीजों का आनंद नहीं ले पाते, जो परमेश्वर ने उनके लिए तैयार की हैं, बल्कि इसके बजाय शैतान द्वारा क्षति पहुँचाये जाते हुए फटेहाल छोड़ दिए जाते हैं। आज वे इतने निस्तेज और निरुत्साहित हो गए हैं कि उनमें परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने में कोई रुचि ही नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (1)')। परमेश्वर के वचनों में प्रकाशन मानव जीवन का सच्चा निरूपण है। इस बात पर पीछे विचार करता हूँ कि मैं कैसे अपने दिनों को "रुमानी प्यार" की एक काल्पनिक दुनिया में रहते हुए, गहरी लालसा की भावना में डूबकर बिताता था। मैं किस प्रकार बुरी तरह से फँस गया था और मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि ये चीज़ें लोगों को मूर्ख बनाने के लिए शैतान की चालें हैं और लोगों को फँसाने और उन्हें बिना किसी लक्ष्य के, और परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिए बिना जीने के लिए तैयार किए गए शैतान के फरेब हैं। यद्यपि मैं अपने आप को परमेश्वर का विश्वासी कहता था, किन्तु मैं अपने दिन मित्रता और प्यार पर चिन्ता करते हुए बिताता था, और यदि परिस्थितियाँ मेरे लिए बदली नहीं होती तो मैं अभी भी उन्हीं "शाश्वत प्यार के वादों" और "वफ़ादार दोस्तों" में विश्वास करता, और मैं कभी भी इससे मुक्त नहीं होता। मेरी महिला मित्र के साथ संबंध विच्छेद होने की वजह से मैंने अपने सहपाठियों के साथ अपने सभी संबंधों को काट लिया था; ऐसे शोरगुलयुक्त वातावरण के बिना में अपने ह़ृदय को स्थिर रख सका था और परमेश्वर में अपने विश्वास के प्रति स्वयं को समर्पित कर सका था। सभाओं में, सभाओं में, अपने भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचन पर संगति करने के द्वारा मुझे कुछ सत्य समझ आया, मैंने प्रेम और दोस्ती की बातों में कुछ गहराई पायी, मुझे ये समझ आया कि केवल सत्य समझने से ही लोगों का चीज़ों पर नजरिया बदल सकता है, और वे कभी शैतान द्वरा बेवकूफ़ नहीं बनाये जा सकेंगे। धीरे-धीरे मेरे घायल हृदय के घाव भरने लगे। मैं लंबे समय से भूले हुए आनंद को महसूस करता था, तथा अब और भटकता हुआ या पीड़ा में जीने वाला नहीं था। बाहरी दुनिया से कोई हस्तक्षेप न होने की वजह से, मैं अपने मन को स्थिर रख सकता था और सभाओं पर ध्यान दे सकता था। मैं परमेश्वर में विश्वास करने में अधिक से अधिक रुचि लेने लगा था, और तब से मैंने अपने कर्तव्यों को पूरा करना आरंभ कर दिया।

जब मेरे रिश्तेदारों को पता चला कि मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, तो उनके हंगामे का कोई अंत नहीं था। वे सोचते थे कि इतनी छोटी उम्र में परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा कोई सरोकार नहीं है। मेरी मामी प्रायः मुझसे सहायता के लिए कहती थी, मेरी बुआ अपने साथ कारोबार करने के लिए मुझसे कहती थी, यहाँ तक कि मेरी धात्रेय माँ भी यह कहते हुए मुझे विवाह करने की ओर धकेलती थी कि मेरे बच्चे के जन्म के बाद वह उसकी देखभाल करेगी (क्योंकि उसका अपना कोई बेटा नहीं था), और मेरी दादी यह कहते हुए रोती थी कि, "मुझे तेरे माता-पिता के परमेश्वर में विश्वास को लेकर कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी आधी जिंदगी काम करने में बिता दी है और अपना सर्वस्व तुम लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त करने हेतु दे दिया है, इसलिए यह समय उनको आराम करने देने का है। तुम्हे अपना एक परिवार और व्यवसाय आरंभ करने पर अपना ध्‍यान केन्द्रित करना चाहिए।" इसके बाद वह वर्णन करती रहती थी कि किस प्रकार मेरा पिता गरीबी में बड़ा हुआ, किस प्रकार उसने कुछ नहीं से आरंभ किया, उसने कितनी परेशानियाँ उठाई, उसने कितना कठिन परिश्रम किया, और कहती थी कि मैं इतने अच्छे माहौल में हूँ, और कि मेरे कोई आदर्श नहीं हैं। मेरे लिए उनकी यह आकस्मिक "चिंता" बहुत ही चापलूसी भरी थी। मैं भ्रमित था, क्योंकि ऐसा लगता था मानो कि उनमें से हर कोई जो भी कह रहा था वह सही था, वे सभी मेरे लिए सर्वोत्तम चाहते थे, और चूँकि वे मेरे करीबी रिश्तेदार थे तो निःसंदेह वे मुझे ठेस नहीं पहुँचाएँगे। मैं शुद्धिकरण में रह रहा था, और भले ही मैं जानता था कि यह एक आध्यात्मिक लड़ाई है, फिर भी मेरे पास और अधिक लड़ने की ताक़त नहीं थी। एक सभा में, एक अगुआ ने मुझे परमेश्वर के वचन में से इस अंश को दिखाया, "हजारों वर्षों से चीनी लोगों ने गुलामों का जीवन जीया है, और इसने उनके विचारों, धारणाओं, जीवन, भाषा, व्यवहार और कार्यों को इतना जकड़ दिया है कि उनके पास थोड़ी-सी भी स्वतंत्रता नहीं रही है। हजारों वर्षों के इतिहास ने महत्वपूर्ण लोगों को एक आत्मा के वश में कर दिया है और उन्हें आत्मा-विहीन शवों के समान जीर्ण-शीर्ण कर डाला है। कई लोग ऐसे हैं जो शैतान रूपी कसाई की छुरी के नीचे अपना जीवन जीते हैं...। बाहर से मनुष्य उच्चतर 'जानवरों' के समान प्रतीत होते हैं; वास्तव में, वे गंदे पिशाचों के साथ रहते और निवास करते हैं। बिना किसी की चौकसी के लोग शैतान की घात के भीतर रहते हैं, उसके चंगुल में फँसने के बाद उनके निकलने का कोई मार्ग नहीं होता। यह कहने के बजाय कि वे अपने प्रियजनों के साथ आरामदायक घरों में रहते हैं, सुखद और संतोषप्रद जीवन जीते हैं, यह कहना चाहिए कि मनुष्य नरक में रहते हैं, पिशाचों के साथ व्यवहार करते हैं और शैतान के साथ जुड़े हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (5)')। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और मेरे भाई-बहनों के साथ संगति के माध्यम से, मुझे एहसास हुआ कि यद्यपि वे बाहर से मेरे रिश्तेदार लगते हों, और उनके वचन मेरे देह की आवश्यकताओं के अनुसार हों, किन्तु उनके विचार, धारणाएँ, जीवन, भाषा, व्यवहार, और कार्यकलाप शैतान की भ्रष्‍टता की वजह से विवश हैं। वे सभी अविश्वासी हैं, उनके सभी दृष्टिकोण और वे जो कुछ भी चर्चा करते हैं सब शैतान से आते हैं। और वे जिनका अनुकरण करते हैं वे देह की दुष्ट वासनाएँ हैं, जिनमें से कोई भी सत्‍य के अनुरूप नहीं हैं। अगर मैंने उनकी सुनी, तो मैं शैतान की चाल में फंस जाउँगा।मेरे पास कोई सत्‍य नहीं है और कोई विवेक नहीं है, और इसलिए उनके साथ आगे संबंध रखना मुझे केवल और पतित ही करेगा। मुझे इससे कुछ भी लाभ नहीं होगा, वे केवल मेरे लिए विनाश ला सकते हैं। उस समय मुझे परमेश्वर के वचनों की कुछ समझ आ गई थी कि, "वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, दुष्टात्मा हैं", जिसके बारे में मेरे भाई-बहन प्रायः संगति करते थे, लेकिन तब भी यह पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आई थी। बाद में, परमेश्वर ने ऐसी परिस्थितयों की व्यवस्था की जिन्‍होंने मुझे पारिवारिक बंधनों का वास्तविक सार दिखाया।

हमारा परिवार हमेशा से एक मेज़बान परिवार रहा है, और 2005 में एक दिन, एक कुकर्मी की सूचना के कारण, मेरे माता-पिता और कर्इ भाई-बहनों को सीसीपी द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया था। मेरी सगी बहन जब भागी थी तो किस्‍मत से लगभग डूबते-डूबते बची थी, उसकी ज़िंदगी केवल इसलिए बची थी क्‍योंकि परमेश्‍वर ने उसकी रक्षा की थी। मेरे माता-पिता और मेरे परिवार के घर के भाई-बहनों को हवालात में डाल दिया गया था और उन पर जुर्माना लगाया गया था, और सभी को प्रताडि़त किया गया था, सभी घायल अवस्‍था में बाहर आए थे। जब मैंने यह समाचार सुना, तो मैं अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं सका। कर्तव्यों को पूरा करने का मेरा मन नहीं करता था। मैं सोचता था, "चाहे कुछ भी हो ऐसे समय में मुझे घर जाना चाहिए। मेरे माता-पिता ने पाल-पोस कर मुझे बड़ा किया है, और अब जबकि वे मुसीबत में हैं, भले ही मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ तब भी मुझे उनकी देखभाल करने और उन्हें सान्त्वना देने के लिए कम से कम वहाँ होना चाहिए।" इसलिए, मैंने घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ी और अपने माता-पिता को देखने के लिए सीधे अपनी बुआ के घर (वह भी परमेश्‍वर पर विश्‍वास करती थीं) गया। उस समय मैंने देखा कि उनके घाव भरे नहीं थे, मैंने अन्‍दर ही अंदर डरावना महसूस किया, और मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैंने ऐसा अनुभव किया मानो कि मेरे माता-पिता को अपमानित किया गया था। उस समय मेरे माता-पिता ने मुझे कहा: पुलिस से बच कर भागने के समय, मेरी सगी बहन नदी में कूद गई थी (यह घटना दिसम्‍बर में, अँधेरा होने के बाद घटी)। पानी उसकी गर्दन तक था, और नदी की धारा बहुत तेज थी, उसकी पतलून के पैर जंगली पौधों से जकड़े हुए पाए गए थे, उसके जूते कीचड़ में फँसे हुए थे, और उसे तैरना नहीं आता था, इसलिए यह एक अत्यंत रहस्य था की वह दूसरी तरफ कैसे पहुँची। परमेश्‍वर ने अवश्य चमत्कारिक रूप से उसे बचाया होगा, अन्यथा परिणाम के बारे में सोचना ही अत्‍यन्‍त डरावना रहा होता (गहरे पानी एवं तेज धारा ने कई दिन पहले 40 साल के एक व्‍यक्ति का जीवन ले लिया था)। बाद में, मेरी सगी बहन एक वृद्ध बहन के घर में छुप गई थी, जिसने रोती हुई मेरी बहन को बदलने के लिए कपड़े दिये और उसके गीले कपड़े को आग पर सुखाया, और अन्य प्रकार से भी उसका बहुत अच्‍छे तरीके से ख्‍याल रखा। कई दिनों के बाद उसे पता लगा कि इस वृद्ध बहन का घर ज्‍यादा दिनों के लिए अब और सुरक्षित नहीं है, तो मेरी सगी बहन मेरी मौसी के घर में जाकर छुप गई। वह मेरे परिवार की स्थिति के बारे में अगुआ को सूचित करने के लिए दिन के दौरान हमारे कलीसीया को एक पत्र पहुँचाने के लिए घर से बाहर आती थी, परन्‍तु जब वह वापस लौटती थी, तो मेरी मौसी की छोटी बेटी उससे कहती थी कि, "अरे बहन, तुम वापस क्‍यों आ गयी? मैं सोचती थी कि तुम चली गयी हो। हमने पहले से ही बिस्‍तर बाँध दिया है।" मेरी बहन ने अनुभव किया कि मेरी मौसी इसमें पड़ने से डरती थीं और उसे वहाँ ठहरने नहीं देना चाहती थी, इसलिए रोते हुए, उसने उनका घर छोड़ दिया, और गिरफ्तारी का खतरा उठाकर घर वापस आ गयी क्‍योंकि इसके अलावा उसके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं थी। मेरे माता-पिता के रिहा होने के बाद, जब उन्होंने मेरी बहन के लगभग डूबने से बचने एवं कैसे मेरी मौसी द्वारा उसे धक्‍के मार के बाहर निकालने के बारे में जाना तो, वे बहुत क्रोधित हुए, लेकिन मेरी मौसी ने उन्‍हें यह यकीन दिलाने वाले स्वर में कि वह सही थी यह कहते हुए जवाब दिया "यह सही है, हम शामिल होने से डरते हैं। तुम लोगों ने इन गिरफ्तारियों को खुद दावत दी थी। तुम लोगों की ज़िंदगी पूरी तरह से अच्छी थी, लेकिन तुम लोगों ने उसे स्वयं ही बिगाड़ दिया। और अब तुम लोगों ने किसी को लगभग मरवा ही डाला था!" मैंने कभी कल्‍पना भी न की थी कि मेरे सबसे नज़दीकी रिश्‍तेदार, वे लोग जो अतीत में मेरे सबसे करीब थे, ऐसे समय में जब कि पुलिस मेरे परिवार को गिरफ़्तार कर रही थी और उनके जीवन खतरे में थे, ऐसे समय में जब सभी को आश्‍वासन की सबसे ज्‍़यादा ज़रूरत थी, ऐसे अमानवीय शब्‍द कहेंगे और ऐसे निर्दयतापूर्ण कार्य करेंगे। यह जानने ने कि वे ऐसा कर सकते हैं, मुझे बहुत दुःखी किया। ऐसे लोग जिनकी अतीत में हमने सर्वाधिक सहायता की थी उनमें से कोई भी हमें देखने या हमें सांत्वना देने के लिए हमारे पास नहीं आया। वे लोग जिनके साथ हमारे संबंध सबसे अच्छे थे, मेरे माता-पिता से सड़क पर मिलने पर न सिर्फ उनसे बोलते नहीं थे बल्कि मेरे माता-पिता के मार्ग से दूर भी हट जाते थे। कुछ लोग जो हमारा अभिवादन किया करते थे और हमें नमस्कार किया करते थे उन्होंने अब हमरी ओर पीठ फेर ली थी और हमारी चुगली करते थे। केवल हमारे भाई-बहन हमसे मिलने और शाम को संगति करने के लिए आते थे। मैं कभी ऐसा नहीं मानता था कि हमारा परिवार ऐसी किसी घृणित अवस्था में आ सकता था। मैं अपने ह्दय में परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने वाले विचारों के साथ पुन: कष्ट में फँस गया था। बाद में, परमेश्वर से एक प्रकाशन प्राप्त करने के बाद, मैंने वह अनुभव किया जिसके बारे में मेरे भाई-बहनों ने संगति की थी, "लोगों के बीच संबंधों का आधार पारस्परिक हित के अलावा कुछ नहीं है, पारस्परिक उपयोग के आधार पर परिवार और मित्र मात्र एक-दूसरे की सहायता करते हैं।" मैं अपने माता-पिता की उन बातों के बारे में भी सोचता था जिनमें उन्‍होंने यह बताया था कि गिरफ़्तारी किए जाने पर उन्‍होंने क्‍या अनुभव प्राप्‍त किया था, उदाहरण के लिए: जब पुलिस ने मेरे पिता को मारने के लिए चमड़े के चाबुक का उपयोग किया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ज्‍़यादा दर्द महसूस नहीं हुआ था, और जब वे उन्‍हें मार रहे थे तो उस पट्टे के तीन टुकड़े हो गए थे। मेरी बहन ने कहा कि उसे भी उसके अनुभव के दौरान कोई भय महसूस नहीं हुआ था, उसने कहा कि भले ही यह दिसंबर का महीन था, फिर भी पानी से बाहर निकलते समय उसे बिल्‍कुल ठंड नहीं लगी थी। परमेश्‍वर ने उसे अतिरिक्‍त शक्ति और आत्‍मविश्‍वास प्रदान किया था। पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी ने दरअसल उनके विश्‍वास को और अटल बना दिया था। उसने उन्‍हें और अधिक मजबूत बना दिया था। मेरे पिता ने कहा कि वे अतीत में सीसीपी की दुष्टता और उसकी सत्य से नफ़रत को परमेश्वर कैसे उजागर करता है इससे संबंधित परमेश्‍वर के वचनों पर कभी विश्‍वास नहीं करते थे और वे दुष्टों के राजा के एक प्रशंसक थे, लेकिन इस घटना ने उन्‍हें दिखा दिया कि सीसीपीसिर्फ ठगों, डाकुओं का एक गिरोह मात्र है, वे हमारे घर से ऐसी किसी भी चीज़ को ले जाएँगे जिसकी बाज़ार में पैसे में कीमत हो और बल्कि वे हत्‍यारों और आगजनी करने वाले बदमाशों की जगह कानून का पालन करने वाले परमेश्वर के विश्‍वासियों को गिरफ़्तार कर लेंगे। मैं उस समय शर्मिंदा हुआ जब मैंने समझा कि हम सभी परमेश्वर की अगुआई के अधीन जीवन बिताते हैं, प्रत्येक चीज़ जिसका हम अनुभव करते हैं वह परमेश्वर की संप्रुभता और व्यवस्था का भाग है, किसी भी व्यक्ति के पास दूसरे की सहायता करने की सामर्थ्य नहीं है, पारिवारिक स्नेह हमें सिर्फ परमेश्वर से दूर ही ले जा सकता है, और यह कि वे वस्तुएँ जिनसे लोग एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं वे केवल देह के अनुरूप ही होती हैं, सत्य के अनुरूप नहीं। "अपने माता-पिता की देह को पीड़ा नहीं पहुँचाना चाहता" जैसे विचार न केवल जीवन को कोई लाभ नहीं पहुँचाएँगे, बल्कि ये उनके उद्धार के लिए भी कोई लाभ नहीं पहुँचाएँगे। केवल परमेश्वर ही जानता है कि मनुष्य को किस चीज़ की आवश्यकता है, और परमेश्वर मनुष्य को सर्वाधिक प्रेम करता है। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जिसमें कहा गया है, "जब से परमेश्वर ने संसार को रचा है, उसने जीवन की प्राणशक्ति से जुड़ा बहुत-सा कार्य किया है, बहुत-सा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है, और मनुष्य जीवन प्राप्त कर सके इसके लिए उसने भारी मूल्य चुकाया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर स्वयं अनंत जीवन है, और परमेश्वर स्वयं वह मार्ग है जिससे मनुष्य पुनर्जीवित होता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता, और हर समय मनुष्य के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवनयापन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के अस्तित्व का आधार, और जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए समृद्ध भंडार रहा है। वह मनुष्य के पुनः जन्म लेने का निमित्त है, और उसे प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिए समर्थ बनाता है। उसकी सामर्थ्य और उसकी कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति की बदौलत, मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है, इस दौरान परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व का मुख्य आधार रही है, और जिसके लिए परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो कभी किसी साधारण मनुष्य ने नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी अन्य शक्ति से जीत सकती है; इससे भी अधिक, यह किसी भी शक्ति से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसकी जीवन शक्ति को किसी भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है। समय और स्थान चाहे जो हो, परमेश्वर की जीवन शक्ति विद्यमान रहती है और अपने देदीप्यमान तेजस्व से चमकती है। स्वर्ग और पृथ्वी बड़े बदलावों से गजर सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक समान ही रहता है। हर चीज का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परंतु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा, क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। प्राणशक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर की प्रभुसत्ता से बाहर नहीं हो सकती, और ऊर्जा से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकती। इस प्रकार, वे चाहे कोई भी हों, सभी को परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पित होना ही होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा के अधीन रहना ही होगा, और कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')। परमेश्वर के वचनों और वास्तविकता के माध्यम से, मैंने परमेश्वर की जीवन शक्ति की उस असाधारणता और महानता को देखा, कि वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है, हर समय मानवजाति का मार्गदर्शन करता है और अपनी सामर्थ्‍य प्रदर्शित करता है, और प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर द्वारा संचालित व्यवस्थाओं में जीवन जीता है। परमेश्वर के वचनों का सामना करते हुए, मैंने देखा कि मैं कितना छोटा था और भावनात्मक संबंध कितने महत्वहीन हैं। मैं उन परेशानियों के विरुद्ध क्या कर सकता था जिनका मेरे परिवार ने सामना किया था? उनकी रक्षा करने वाला, उनका ख्याल रख्‍ने वाला, और उन्हें कठिनाइयों से पार निकालने वाला, क्या परमेश्वर नहीं था? क्या मनुष्य का दूसरे से प्रेम परमेश्वर के मनुष्य से प्रेम से अधिक हो सकता है? उसी समय, परमेश्वर के वचनों ने मेरा न्‍याय किया, "कौन वास्तव में पूरी तरह से मेरे लिए समर्पित हो सकता है और मेरे वास्ते अपना सब कुछ भेंट कर सकता है? तुम सभी अधूरे मन वाले हो; तुम्हारे विचार इधर-उधर घूमते हैं, तुम घर, बाहरी दुनिया, भोजन और कपड़ों के बारे में सोचते रहते हो। इस तथ्य के बावज़ूद कि तू मेरे सामने है, मेरे लिए चीज़ों को कर रहा है, अपने दिल में तू अभी भी घर पर उपस्थित अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बारे में सोच रहा है। क्या ये सभी चीज़ें तेरी संपत्ति हैं? तू उन्हें मेरे हाथों में क्यों नहीं सौंप देता है? क्या तू मुझ पर पर्याप्त विश्वास नहीं करता है? या क्या ऐसा है कि तुझे डर है कि मैं तेरे लिए अनुचित व्यवस्थाएँ करूँगा? तू हमेशा अपने देह के परिवार के बारे में चिंता क्यों महसूस करता है? तू हमेशा अपने प्रियजनों के लिए विलाप करता है! क्या तेरे दिल में मेरा कोई निश्चित स्थान है? और तू फिर भी मुझे तेरे भीतर प्रभुत्व करने देने और तेरे पूरे अस्तित्व पर कब्ज़ा करने देने के बारे में बात करता है—ये सभी कपटपूर्ण झूठ हैं! तुम में से कितने लोग कलीसिया के लिए पूरे दिल से समर्पित हो? और तुम में से कौन अपने बारे में नहीं सोचता है, बल्कि आज के राज्य के वास्ते कार्य कर रहा है? इस बारे में बहुत ध्यानपूर्वक सोचो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 59')। मैंने देखा कि मेरे ह्दय में जिसके लिए परवाह थी वह अभी भी मेरा परिवार था, क्योंकि मेरी परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं थी, मैं अभी भी उन्हें पूर्ण रूप से परमेश्वर के हाथों में नहीं सौंप सका था; मैंने देखा कि मैं सत्‍य में नहीं जीता था, और यद्यपि मैं परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य का निष्पादन कर रहा था, फिर भी अक्सर मैं अपने परिवार के बारे में चिंतित हो जाता था, और परेमश्वर को अपने हृदय में निवास नहीं करने देता था। मैं परेमश्वर को अन्य दूसरों से अधिक सम्मान नहीं दे सका था और निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का प्रदर्शन नहीं कर सका था। मुझे शैतान द्वारा मूर्ख बनाया गया था और यातनाएँ दी गईं थीं। यदि मेरे साथ ये "दुर्भाग्यपूर्ण" बातें नहीं हुई होतीं, तो मैंने कभी भी चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देखा होता। यह ठीक वैसा ही है जैसा परमेश्वर के वचनों का यह भजन कहता है, "जब मनुष्य के जीवन की स्थिति की बात आती है, तो मनुष्य को अभी भी वास्तविक जीवन को ढूँढ़ना शेष है, उसने अभी भी अन्याय, वीरानी और संसार की दयनीय स्थितियों का हल नहीं निकाला है—और इसलिए, अगर यह आपदा के आगमन के लिए न होता, तो अधिकतर लोग अभी भी प्रकृति माँ को गले से लगाते, और अभी भी अपने आपको 'जीवन' के स्वाद में तल्लीन कर देते। क्या यह संसार की सच्चाई नहीं है? क्या यह उस उद्धार की आवाज़ नहीं है, जिसे मैं मनुष्य से कहता हूँ? क्यों मानवजाति में से कभी भी किसी ने मुझसे सच में प्रेम नहीं किया है? क्यों मनुष्य केवल ताड़ना और परीक्षणों के बीच ही मुझसे प्रेम करता है, और कोई भी मेरी सुरक्षा के अधीन मुझसे प्रेम नहीं करता?" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'लोग परमेश्‍वर के उद्धार को नहीं जानते हैं')। इन परिस्थितियों ने मेरे सामने जो प्रकट किया अगर वह नहीं होता, तो मैं लोगों के बीच संबंधों को सच में समझ नहीं पाता, और मैं अब भी परिवार के बंधनों, प्रेम और मित्रता द्वारा नियंत्रित होता, इन चीज़ों की खोज में विकट रूप से फँसा होता, इनसे धोखा खाता और पीड़ित होता और अपनी अज्ञानता में खुश होता; इसके अलावा मैंने कभी भी सत्‍य को प्राप्त नहीं किया होता, कभी भी जीवन का सही मार्ग नहीं अपनाया होता, और यह परमेश्‍वर का उद्धार था जिसने मुझे फिर कभी "जीवन" का स्वाद नहीं चखने दिया। जब यह सब मेरी समझ में आ गया, तो मैंने निर्णय लिया कि मैं पूरे हृदय से परमेश्‍वर पर विश्वास करूँगा और अपने प्रति परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के लिए सत्‍य का अनुसरण करूँगा।

अब मैंने कई वर्षों तक परमेश्वर के परिवार में अपने कर्तव्यों का निष्पादन किया है, और परमेश्वर के परिवार में मैंने परमेश्वर के प्रेम का अनुभव किया है। मैं अपने कर्तव्यों का निष्पादन चाहे कहीं भी क्यों न करूँ, परमेश्वर सदैव वहाँ मेरी देखभाल करने के लिए है। मैं अपने भाइयों और बहनों के साथ मेल-जोल रखता हूँ मानो कि वे परिवार हों, हम एक दूसरे का उपयोग नहीं करते हैं, और लाभों की कोई अदला-बदली नहीं होती है। मेरे भाई-बहन इतने अधिक ईमानदार हैं कि यदि कभी-कभी हमारी भ्रष्टता एक दूसरे को दिखाई भी दे जाती है, तो अपने दिलों को खोलकर और स्वयं के बारे में अपनी समझ का संवाद करने के माध्यम से कोई भी असंतोष या संकोच नहीं रह जाता है। हम एक दूसरे की सहायता करते हैं, और एक दूसरे को प्रेम प्रदान करते हैं, सभी को समान दृष्टि से देखा जाता है, और किसी के साथ भी इस वजह से अलग व्यवहार नहीं किया जाता है कि वह गरीब या अमीर है। मुझे स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, इसलिए मैं अक्सर बीमार रहता हूँ, लेकिन मेरे भाई-बहन बहुत ही विचारशील हैं, और मेरा बहुत अच्छा ध्यान रखते हैं, जिसने मुझे महसूस करवाया कि मेरे भाई-बहनों के बीच रक्त संबंधों के बिना भी वे रिश्तेदारों से कहीं अधिक करीब हो सकते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ मेरी अच्छी तरह से निभती है और परमेश्वर के मार्गदर्शन के साथ, हम सभी सत्य का अनुसरण करते हैं और अपने कर्तव्यों को करने का प्रयास करते हैं।

इन वर्षों के दौरान के मेरे अनुभवों ने भी मुझे परमेश्वर की इच्छा को धीरे-धीरे समझने में, और साथ ही यह देखने मे भी मेरी सहायता की है, कि परमेश्वर का मुझ पर किया गया कार्य उद्धार और प्रेम का कार्य है, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन सत्य हैं, लेकिन इससे अधिक ये वे वचन हैं जो हमारे जीवन को बचाते हैं। ये सत्य मेरे लिए परमेश्वर की सर्वोत्तम देखभाल और सुरक्षा बन गए हैं। अगर मैं इन वचनों से हटता हूँ या इन वचनों द्वारा प्रदत्त आधार पर चीजों को नहीं देखता हूँ, तो मैं खुद को बर्बाद कर दूँगा। मैं शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किया गया था और परमेश्वर के वचनों का सीधा अर्थ समझने में असमर्थ था, इसलिए परमेश्वर ने मुझे लाभ देने और सिद्ध बनाने, और उसके वचनों को समझने में मेरी सहायता करने के लिए, मेरी आवश्यकताओं के अनुसार बनायी गई कई अलग-अलग परिस्थितियों, लोगों, मामलों, और चीज़ों की व्यवस्था की। अपनी कठिनाइयों और परीक्षणों के बीच, मैंने अनजाने में यह देखा कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए ये वचन पूर्ण सत्य हैं, और ये वे चीजें हैं जिनकी मानवजाति को आवश्यकता है। ये न केवल मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकते हैं और उसे एक सामान्य मनुष्य का जीवन जीने देते हैं, साथ ही वे जीवन की सही राह भी दिखाते हैं, क्योंकि परमेश्वर ही सत्‍य, मार्ग और जीवन है। यह परमेश्वर का वचन है जो मुझे आज तक लाता है। मैं उसके वचनों को अपना नीति-वाक्य मानने, आगे बढ़ने के लिए मार्ग का चिह्न मानने और कार्य करने के लिए मार्गदर्शक मानने के लिए तैयार हूँ। भले ही बहुत-से ऐसे सत्‍य हैं जो मेरी समझ में नहीं आते हैं, किन्तु सत्‍य की मेरी निरंतर खोज और मेरे कर्तव्यों को पूरा करने के माध्यम से, परमेश्वर मुझे प्रबुद्धता और रोशनी प्रदान करेगा ताकि मैं उसके वचनों समझ सकूँ। मेरे अंदर अब भी बहुत भ्रष्टता है जिसे अवश्य शुद्ध किया जाना चाहिए, और मुझे परमेश्वर के कार्य और साथ ही परमेश्वर के न्याय और ताड़ना और उसके साथ जुड़ी हुई कठिनाइयों और शुद्धिकरणों को और अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। मैं सत्य का अनुसरण करने के लिए कड़ा संघर्ष करूँगा। भविष्य में मुझ पर जो भी परेशानियाँ या कठिनाइयाँ पड़ें, मैं अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करूँगा!

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

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