सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करते समय मैंने क्या अनुभव किया

19 जुलाई, 2022

फ़्लॉरेन्स, इंडोनेशिया

बचपन से ही मैं अपने माता-पिता की तरह ही प्रभु में विश्वास रखने लगी थी। बाद में, मैं एक शिक्षक बन गई, और ईसाई और नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम पढ़ाने लगी। अब मैं उत्तर सुमात्रा में एक पब्लिक सेकंडरी स्कूल में पढ़ाती हूँ। मार्च 2020 में एक रात, मैं यूट्यूब देख रही थी, मैं धर्मसंदेश ढूँढ़ रही थी ताकि छात्रों को पढ़ाते समय मिसाल के तौर पर इस्तेमाल कर सकूँ। मैंने देर रात तक दर्जनों धर्मसंदेश देखे, लेकिन वे सब वही पुरानी बातें थीं, कोई नई रोशनी नहीं थी। इन्हें देखकर मैं बहुत बोर होने लगी। फिर, मैंने एक ईसाई फिल्म देखी, कितनी सुंदर वाणी। इस फिल्म ने मुझे उसी समय आकर्षित कर लिया। वीडियो में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन देखे, और प्रभु के वापस लौटने के बारे में थोड़ी संगति सुनी, जो पहले कभी नहीं सुनी थी। मैंने पहले कुछ आध्यात्मिक फिल्में जरूर देखी थीं, लेकिन इस तरह चौंका देने वाली कोई फिल्म मैंने कभी नहीं देखी थी। इसके बाद, मैंने परमेश्‍वर का नाम बदल गया है?! नामक एक और फिल्म देखी, नाम से ही जिज्ञासा बढ़ गई, तो मैंने इसे अंत तक देखा। उस रात, फिल्म में जो देखा उस बारे में सोचते हुए, मैं बिल्कुल नहीं सो पाई। क्या परमेश्वर का नाम सच में बदल गया है? मैं खास तौर पर जानना चाहती थी। क्या यह महज एक कहानी थी, या फिल्म में किया गया दावा सच था कि परमेश्वर वास्तव में वापस लौट आया है? क्या उन्होंने जो वचन पढ़े, वे सच में परमेश्वर के वचन थे? अगर परमेश्वर वापस लौट आया है, उसका नाम बदल गया है, पर मैं चूक गई, तो यह बुरा नहीं होगा? मैं इन सवालों के जवाब पाने को बहुत बेचैन थी।

बाद में, महामारी के कारण, मुझे घर से ही काम करना पड़ा, तो, ऑनलाइन फिल्में देखने के लिए मेरे पास बहुत सारा समय था। मैं बहुत खुश थी, क्योंकि मैंने ऐसी अच्छी ईसाई फिल्में पहले कभी नहीं देखी थीं। मैंने अपने फेसबुक टाइमलाइन में ये फिल्में साझा कीं, ताकि दूसरे भी इन्हें देख सकें। बहुत-से लोगों ने कमेंट किया कि उन्हें ये अच्छी लगीं, लेकिन कमेंट्स में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर हमला करने वाली कुछ बातें भी देखीं, एक पादरी ने तो मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में कुछ भी पोस्ट न करने की सलाह दी। पहले, मुझे नहीं मालूम था कि ये सारी फिल्में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की हैं। पादरी के बताने पर ही मेरा ध्यान गया। उत्सुकता में, मैंने इंटरनेट में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की खोज की, और एक वेबसाइट देखी जिसका नाम था "राज्य के अवरोहण का सुसमाचार।" मैं वेबसाइट में लिखी बातें पढ़ने लगी और मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन देखे। "राज्य में, सृष्टि की असंख्य चीज़ें पुनर्जीवित होना और अपनी जीवन शक्ति फिर से प्राप्त करना आरम्भ करती हैं। पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण, एक तथा दूसरी भूमि के बीच सीमाएँ भी खिसकने लगती हैं। मैं भविष्यवाणी कर चुका हूँ कि जब ज़मीन को ज़मीन से अलग किया जाता है, और जब ज़मीन ज़मीन से जुड़ती है, यही वह समय होगा जब मैं सारे राष्ट्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। इस समय, मैं सारी सृष्टि को फिर नया करूँगा और समस्त ब्रह्माण्ड को पुनर्विभाजित करूँगा, इस प्रकार पूरे ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित करूँगा, और पुराने को नए में रूपान्तरित कर दूँगा—यह मेरी योजना है और ये मेरे कार्य हैं। जब संसार के सभी राष्ट्र और लोग मेरे सिंहासन के सामने लौटेंगे, तब मैं स्वर्ग का सारी वदान्यता लेकर इसे मानव संसार को सौंप दूँगा, जिससे, मेरी बदौलत, वह संसार बेजोड़ वदान्यता से लबालब भर जाएगा। किन्तु जब तक पुराने संसार का अस्तित्व बना रहता है, मैं अपना प्रचण्ड रोष इसके राष्ट्रों के ऊपर पूरी ज़ोर से बरसाऊंगा, समूचे ब्रह्माण्ड में खुलेआम अपनी प्रशासनिक आज्ञाएँ लागू करूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करेगा, उनको ताड़ना दूँगा:

"जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 26')। इन वचनों को पढ़कर मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, और मुझे लगा जैसे मैं काँप रही हूँ। इन वचनों के अधिकार ने मुझे चौंका दिया। उनमें एक प्रताप था, जो कोई अपमान सहन नहीं करता था। मुझे लगा इन वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है, कोई भी इंसान ये वचन नहीं बोल सकता, इसलिए ये परमेश्वर से आए हुए लगे। यह एक ऐसी भावना थी, जो मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकी। पर इसके साथ ही, मुझे थोड़ी उलझन भी हुई। मैंने सोचा, "इन फिल्मों के ये सारे अभिनेता चीनी हैं, तो क्या ये फिल्में चीनियों ने बनाई थीं? चीन एक ऐसा देश है, जिसमें एक नास्तिक पार्टी का शासन है, और चीनी लोग तो अगरबत्ती जलाकर, बुद्ध और दूसरी प्रतिमाओं की आराधना करते हैं। क्या प्रभु चीन में वापस लौट सकता है? क्या ये वचन सच में परमेश्वर के वचन हैं?" मैं बहुत उलझन में पड़ गई। मुझे जितनी ज्यादा उलझन हुई, उतना ही मैंने समझना चाहा कि आखिर क्या चल रहा है। इसलिए, वेबसाइट पर दिखाई गई संपर्क सूचना के जरिए, मैं एक बहन के संपर्क में आई। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं एक बैठक में जाना पसंद करूँगी। मैंने कहा मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और सत्य के बारे में अधिक जानना चाहती हूँ, तो उसने एक ऑनलाइन बैठक समूह में शामिल होने में मेरी मदद की, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन भी मुझे पढ़कर सुनाए, और परमेश्वर के देहधारण और उसके कार्य के तीनों चरणों पर संगति भी की। मैंने उसकी संगति ध्यान से सुनी, और मुझे अपनी उलझनों के जवाब मिले, मुझे एक बहुत ही बढ़िया खबर भी मिली, कि प्रभु सच में वापस लौट आया है, और वह देहधारी होकर आया है। आपको बड़ा रोमांच हुआ होगा। लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद एक पादरी ने मुझे फिर से परेशान कर रुकावट पैदा की।

एक पादरी ने फेसबुक पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर हमला करते हुए कुछ लिख भेजा, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया विधर्म है। वे कहते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं, लेकिन वे वचन बाइबल में नहीं हैं। बतौर एक ईसाई, आपको जान लेना चाहिए कि बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई वचन नहीं है, उनसे अभी दूर हो जाएँ!" समूह के दूसरे भाई-बहनों को भी पादरी से संदेश मिले। कुछ लोगों ने, जिनके साथ पहले मेरे अच्छे रिश्ते थे, पादरी की बात सुनकर समूह छोड़ दिया, और मुझे भी छोड़ देने की सलाह दी। पहले-पहल में वाकई उलझन में पड़ गई। मैंने सोचा, "वह एक पादरी है और बाइबल के बारे में मुझसे ज्यादा जानता है। हो सकता है, उसकी बात सच हो?" इसलिए मैं जानना चाहती थी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया विधर्म थी या नहीं। पादरी की बात पर मैंने आसानी से यकीन नहीं किया, क्योंकि मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े थे, और महसूस किया था कि ये वचन वाकई सत्य थे। इन वचनों में अधिकार था और ये परमेश्वर की वाणी लग रहे थे। लेकिन ये वचन वाकई बाइबल से परे थे, तो आखिर माजरा क्या था? मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बहन एल्सा से जानना चाहा। उसने मुझे बाइबल का एक पद भेजा। यह यूहन्ना के सुसमाचार के अध्याय 21 का पद 25 था, "और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूँ कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे संसार में भी न समातीं।" बहन एल्सा ने यह कहकर मेरे साथ संगति की, "इस पद से हम समझ सकते हैं कि प्रभु यीशु के वचन और कार्य बाइबल में पूरी तरह से दर्ज नहीं हुए हैं। तब, नबी यूहन्ना प्रभु यीशु के साथ था, और उसने प्रभु यीशु के इतने सारे वचन सुने, जो बाइबल में लिखे हुए वचनों से बहुत ज्यादा थे। अब, आइए इस पर गौर करें। जब प्रभु यीशु कार्यरत था, तो उसने कम-से-कम तीन वर्ष तक धर्मोपदेश दिए। वह हर दिन एक घंटा भी बोला हो, तो तीन साल में कितना बोला होगा? कोई गिन सके, उससे बहुत ज्यादा। उसके वचन सिर्फ उतने ही कैसे हो सकते हैं, जितने बाइबल में लिखे गए? दरअसल, बाइबल में परमेश्वर के वचन बहुत सीमित हैं। यकीनन ये परमेश्वर द्वारा उस दौरान बोले हुए सारे वचन नहीं हैं। यह एक अकाट्य तथ्य है। पादरी कहते हैं, 'बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई भी वचन नहीं है' ऐसा वह किस आधार पर कहता है?" मैंने यह सुनकर सोचा, "हाँ, पादरी ने जो कहा वह तथ्यों से मेल नहीं खाता। यह एक गलती है।" मैंने बाइबल पढ़ी थी, लेकिन यूहन्ना के सुसमाचार में मैंने इस पद पर कभी ध्यान नहीं दिया था। तब जाकर मुझे एहसास हुआ, यह पद हमें पहले ही बताता है कि परमेश्वर के सभी वचन बाइबल में नहीं हैं। बहन एल्सा ने फिर मुझे बाइबल के कुछ और पद भेजे। उसने मुझे यूहन्ना अध्याय 16 से पद12-13 भेजे, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।" और उसने प्रकाशित वाक्य से कई पद भेजे। "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। "जो सिंहासन पर बैठा था, मैं ने उसके दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखी जो भीतर और बाहर लिखी हुई थी, और वह सात मुहर लगाकर बन्द की गई थी। फिर मैं ने एक बलवन्त स्वर्गदूत को देखा जो ऊँचे शब्द से यह प्रचार करता था, 'इस पुस्तक के खोलने और उसकी मुहरें तोड़ने के योग्य कौन है?' परन्तु न स्वर्ग में, न पृथ्वी पर, न पृथ्वी के नीचे कोई उस पुस्तक को खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य निकला। तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, 'मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है'" (प्रकाशितवाक्य 5:1-5)। बाइबल के पद पढ़ लेने के बाद, बहन एल्सा ने संगति की, "प्रभु यीशु के वचन बहुत स्पष्ट हैं : उसके पास हमें बताने को बहुत-कुछ बाकी है, लेकिन इसे स्वीकारने के लिए तब के लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था, इसलिए, सत्य का आत्मा, हमें समस्त सत्य में ले जाने के लिए, अंत के दिनों में आएगा, जिसका अर्थ है कि जब प्रभु यीशु वापस आएगा, तो वह ज्यादा सत्य व्यक्त करेगा, और हमें बताएगा कि और क्या आने वाला है। इससे साबित होता है कि परमेश्वर के पास बाइबल से बाहर नया कार्य और वचन हैं। तो लोग ऐसा कैसे कह सकते हैं, 'परमेश्वर के सभी वचन बाइबल में हैं, और इसके बाहर परमेश्वर का कोई भी वचन या कार्य नहीं है?' क्या यह परमेश्वर के वचन को नकारना नहीं है?" उसकी संगति के बाद, मैं समझ सकी कि पादरी का यह कहना कि परमेश्वर के वचनों और कार्य को बाइबल तक ही सीमित है, गलत था, परमेश्वर अंत के दिनों में ज्यादा वचन व्यक्त करेगा, बाइबल में लिखे वचनों से कहीं ज्यादा। प्रकाशितवाक्य में जिक्र है कि कोई भी बंद किताब को न तो खोल सकता है, न ही पढ़ सकता है, तो स्पष्ट रूप से वह किताब बाइबल नहीं है, क्योंकि हम बाइबल को हर दिन पढ़ सकते हैं। जब प्रभु यीशु वापस आएगा, तो वह किताब को खोलेगा, और हमें बताएगा उसमें क्या लिखा है। इससे मेरे मन में यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर बाइबल से परे नए वचन बोलेगा।

फिर, हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े। "बाइबिल में दर्ज की गई चीज़ें सीमित हैं; वे परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं। सुसमाचार की चारों पुस्तकों में कुल मिलाकर एक सौ से भी कम अध्याय हैं, जिनमें एक सीमित संख्या में घटनाएँ लिखी हैं, जैसे यीशु का अंजीर के वृक्ष को शाप देना, पतरस का तीन बार प्रभु को नकारना, सलीब पर चढ़ाए जाने और पुनरुत्थान के बाद यीशु का चेलों को दर्शन देना, उपवास के बारे में शिक्षा, प्रार्थना के बारे में शिक्षा, तलाक के बारे में शिक्षा, यीशु का जन्म और वंशावली, यीशु द्वारा चेलों की नियुक्ति, इत्यादि। फिर भी मनुष्य इन्हें ख़ज़ाने जैसा महत्व देता है, यहाँ तक कि उनसे आज के काम की जाँच तक करता है। यहाँ तक कि वे यह भी विश्वास करते हैं कि यीशु ने अपने जीवनकाल में सिर्फ इतना ही कार्य किया, मानो परमेश्वर केवल इतना ही कर सकता है, इससे अधिक नहीं। क्या यह बेतुका नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)')। "उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को इन विषयों पर बस उपदेशों की एक श्रृंखला दी, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे याचना करें, दूसरों से कैसा व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम निर्धारित किए, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें, कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें, कैसे अपने पापों को स्वीकार करें, सलीब को कैसे धारण करें और कैसे पीड़ा सहन करें; उसने कभी इस पर कुछ नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए या उसे परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना हास्यास्पद नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से देख सकता था?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?')। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से मैं समझ पाई कि बाइबल महज इतिहास की एक किताब है। इसमें परमेश्वर द्वारा व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में किया गया दो चरणों का कार्य दर्ज है, और पुराना नियम और नया नियम दोनों का ही संकलन, लोगों ने परमेश्वर के कार्य के कई साल बाद किया था। परमेश्वर के कार्य करने के बाद ही उसका रिकॉर्ड बाइबल में दर्ज हुआ। इसलिए, परमेश्वर के अंत के दिनों के वचन और कार्य बाइबल में पहले से दर्ज नहीं किए जा सकते थे। अगर हम परमेश्वर को बाइबल तक ही सीमित कर दें, और सोचें कि बाइबल के बाहर उसके वचन हैं ही नहीं, तो यह बेहद बेतुका नजरिया है। मैंने कई दशकों से प्रभु में विश्वास रखा था, लेकिन बाइबल क्या थी, यह मुझे तब समझ आया था! फिर, बहन एल्सा ने अपनी संगति जारी रखी। उसने कहा, "परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और उसके वचन असीम और अनंत हैं। सृजन से वर्तमान तक, परमेश्वर हमेशा बोलता और कार्य करता रहा है, लोगों को आपूर्ति देने और बचाने के लिए अगुआई की है। परमेश्वर का कार्य, बाइबल से दबना तो दूर रहा, कभी किसी इंसान या चीज से भी नहीं दबा। परमेश्वर अपनी प्रबंधन योजना और इंसान की जरूरतों के आधार पर नए वचन बोलता है, नया कार्य करता है, और उसके वचन और कार्य दोहराए नहीं जाते। व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी पर लोगों के जीने की अगुआई करने के लिए व्यवस्था लागू की, और अनेक वचन बोले। लेकिन अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने प्रायश्चित के मार्ग का प्रचार किया, मनुष्य के छुटकारे के लिए काम किया और अनेक वचन बोले। ये वचन पुराने नियम में दर्ज नहीं हैं और पूरी तरह से उससे बाहर हैं। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रभु यीशु के कार्य के आधार पर सत्य व्यक्त करने आया है, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य करने आया है, जो मानवजाति को पाप और उसके बंधन से पूरी तरह शुद्ध करके बचाता है, और लोगों को परमेश्वर के राज्य में लाता है। यह कार्य का नवीनतम और ऊंचा चरण है, जिसे बाइबल में पहले से दर्ज करना नामुमकिन है। अगर हम आँखें बंद करके बाइबल द्वारा परमेश्वर के कार्य का आकलन कर उसे सीमित करें, तो हम परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग बन जाएँगे, बिल्कुल फरीसियों की तरह, जिन्होंने प्रभु यीशु का प्रतिरोध किया। वे अड़ियल बनकर धर्मग्रंथों से चिपके रहे, पुराने नियम से परे उसके वचनों और कार्य के लिए, उन्होंने प्रभु यीशु की पागलों की तरह निंदा की, उसका प्रतिरोध किया, और आखिरकार प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। यह बड़ी त्रासदी थी!" फिर, हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के दो और अंश पढ़े। "यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि सख्ती से पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए')। "आख़िरकार, कौन बड़ा है : परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुसार क्यों होना चाहिए? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे निकलने का कोई अधिकार न हो? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता और अन्य काम नहीं कर सकता? यीशु और उनके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त के प्रकाश में और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना था, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाय क्यों उसने पाँव धोए, सिर ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पीया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं में अनुपस्थित नहीं है? यदि यीशु पुराने विधान का सम्मान करता, तो उसने इन सिद्धांतों को क्यों तोड़ा? तुम्हें पता होना चाहिए कि पहले कौन आया, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'बाइबल के विषय में (1)')। उसने अपनी संगति जारी रखी, "पादरी और एल्डर फरीसियों की तरह ही हैं, जिन्होंने प्रभु यीशु का प्रतिरोध किया था। वे आँखें बंद करके बाइबल की आराधना करते हैं, और बाइबल को परमेश्वर मानते हैं। वे हमेशा ग्रंथ का बचाव करते हैं, लेकिन कभी परमेश्वर के पदचिह्न नहीं खोजते, कभी सुनने की कोशिश नहीं करते कि क्या यह परमेश्वर की वाणी है। वे देखते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य बाइबल में दर्ज नहीं हैं, इसलिए उसकी अंधाधुंध निंदा और प्रतिरोध करते हैं, सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने से लोगों को रोकते हैं। क्या वे सिर्फ आधुनिक फरीसी नहीं है? वे नहीं देख पाते कि बाइबल परमेश्वर के पुराने कार्य का सिर्फ एक रिकॉर्ड है, एक किताब, जो परमेश्वर के विश्वासियों को पढ़नी चाहिए, मगर बाइबल न परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है, न परमेश्वर के एवज में कार्य कर लोगों को बचा सकती है। अगर लोग परमेश्वर में विश्वास रखकर भी सिर्फ बाइबल और परमेश्वर के पुराने वचनों और कार्यों का अनुसरण करें, तो वे सत्य और जीवन हासिल नहीं कर सकते। सबसे अहम बात परमेश्वर के पदचिह्नों के साथ चलना है, पाप-मुक्त होने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय-कार्य को स्वीकार करना है। तभी हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त ये सभी सत्य पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को कहे वचन हैं। सिर्फ यही वचन लोगों को पूरी तरह से शुद्ध कर बचा सकते हैं, यही अनंत जीवन का मार्ग है, जो परमेश्वर अंत के दिनों में लोगों को देता है। अगर हम कार्य के इस चरण के साथ नहीं चल सकते, तो हम परमेश्वर हमें त्याग देगा और निकाल देगा, हम विपत्ति में डूब जाएँगे और दंडित किए जाएँगे।" मुझे लगा मैंने बहन की संगति से बहुत-कुछ हासिल किया। एक बार बाइबल की निष्पक्ष समझ हासिल कर लेने के बाद, मैं अब जरा भी परेशान नहीं थी। इससे मैंने समझा कि हर बार जब परमेश्वर प्रकट होकर कार्य करता है, तो धार्मिक अगुआ उसका प्रतिरोध करते हैं, उसके खिलाफ हो जाते हैं। अपने निजी हितों को बचाने के लिए वे परमेश्वर के कार्य की निंदा करने, और लोगों को सच्चा मार्ग स्वीकारने से रोकने के लिए तरह-तरह की भ्रांतियाँ रचते हैं। अगर आप सत्य को समझ या उसे परख नहीं सकते, तो उनके लांछन के झांसे में आ जाएँगे, उनके साथ मिलकर आप परमेश्वर का प्रतिरोध कर उसे ठुकरा देंगे, और परमेश्वर का उद्धार खो देंगे, जो बहुत बड़ी त्रासदी होगी। मैंने खुद से कहा, "मुझे सत्य से लैस होना होगा, परख करना सीखना होगा। मैं परमेश्वर को ठुकराना नहीं चाहती।"

करीब एक महीने बाद, एक और पादरी मेसेंजर और व्हाट्सऐप के जरिए संदेश भेजकर मुझे परेशान करने लगा। उसने कहा, "प्रभु यीशु दो हजार साल पहले जन्मे, जिससे बाइबल की भविष्यवाणी पूरी हुई। अब आप कहती हैं कि प्रभु स्त्री रूप में वापस लौट आया है। क्या बाइबल में ऐसी कोई भविष्यवाणी है कि प्रभु स्त्री रूप में आएगा? प्रभु के लिए देहधारी होकर आना नामुमकिन है, और स्त्री रूप में आना और भी मुमकिन नहीं। आप जिस सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखती हैं, वह एक इंसान है।" साथ ही, दो अन्य पादरियों ने साथ मिलकर मुझ पर हमला बोला। उन्होंने मेरी आलोचना की, निंदा की, कहा मेरा विश्वास गलत है। मैंने उनसे कहा कि हम परमेश्वर को परिभाषित नहीं कर सकते। परमेश्वर का सार आत्मा है, और उसका कोई लिंग नहीं है। अपने कार्य की जरूरत के कारण ही वह देहधारी बना और उसने एक मनुष्य का रूप धारण किया। हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में इसलिए विश्वास रखते हैं, क्योंकि उसमें परमेश्वर का दिव्य सार है, और वह सत्य व्यक्त कर सकता है, इसलिए नहीं कि वह देह रूप में है।

मैंने बहन एल्सा से भी जानना चाहा, और उसने मेरे साथ संगति की, "बाइबल की अनेक भविष्यवाणियों में, अंत के दिनों में मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर के देहधारण की बात कही गई है, जैसे कि 'मनुष्य के पुत्र का आना,' 'मनुष्य का पुत्र प्रगट हुआ,' और 'मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।' अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में, सत्य व्यक्त करने और न्याय-कार्य करने के लिए आया है, जो पूरी तरह से इन भविष्यवाणियों को साकार करता है। परमेश्वर अंत के दिनों में, एक स्त्री के रूप में आया है, जोकि इंसानी धारणाओं के विपरीत है, लेकिन परमेश्वर का कार्य हमारी धारणाओं के जितना विपरीत होता है, उतना ही उसमें रहस्य और महत्व होता है। एक स्त्री के रूप में परमेश्वर के देहधारण के सत्य और रहस्य क्या हैं? आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन पढ़ें और जानें।" बात पूरी कर लेने के बाद, बहन ने मुझे परमेश्वर का वचन भेजा। "परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यवहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, तो वह पुरुष रूप में आया, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर, स्त्री रूप में आता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री, दोनों का ही सृजन उसके काम के लिए उपयोगी हो सकता है, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करता है; चाहे पुरुष हो या स्त्री, दोनों ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, यदि यह उसका देहधारी शरीर है। ... परमेश्वर लिंग के बारे में कोई भेदभाव नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता, वह स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यवहारिक मायने होते हैं। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और यह स्वत: प्रमाणित है कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम है। वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के लिए देहधारण नहीं करता जिसे मनुष्य देख सके, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही धारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है, किसी स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने')। "यदि परमेश्वर केवल एक पुरुष के रूप में देह में आए, तो लोग उसे पुरुष के रूप में, पुरुषों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित करेंगे, और कभी विश्वास नहीं करेंगे कि वह महिलाओं का परमेश्वर है। तब पुरुष यह मानेंगे कि परमेश्वर पुरुषों के समान लिंग का है, कि परमेश्वर पुरुषों का प्रमुख है—लेकिन फिर महिलाओं का क्या? यह अनुचित है; क्या यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं है? यदि यही मामला होता, तो वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया, उसके समान पुरुष होते, और एक भी महिला नहीं बचाई गई होती। जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने आदम को बनाया और उसने हव्वा को बनाया। उसने न केवल आदम को बनाया, बल्कि पुरुष और महिला दोनों को अपनी छवि में बनाया। परमेश्वर केवल पुरुषों का ही परमेश्वर नहीं है—वह महिलाओं का भी परमेश्वर है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')। बहन एल्सा ने संगति जारी रखते हुए कहा, "परमेश्वर आत्मा है, निराकार और लिंग-विहीन, लेकिन वह मानवजाति को बचाना चाहता है, इसलिए वह इंसानी दुनिया में प्रकट होकर कार्य करने के लिए पुरुष या स्त्री के रूप में देहधारी होता है। पहली बार, परमेश्वर पुरुष के रूप में देहधारी हुआ, और अंत के दिनों में, एक स्त्री के रूप में। उसने ऐसा किया ताकि लोग परमेश्वर को बेहतर समझ सकें और जान लें कि उसे सीमित नहीं करना है। शुरू में, परमेश्वर ने इंसान को अपनी छवि में रचा, सिर्फ पुरुष नहीं, बल्कि स्त्री भी। इसलिए देहधारी परमेश्वर पुरुष और स्त्री दोनों हो सकता है। अगर देहधारी परमेश्वर हमेशा पुरुष हो, तो लोग तय कर देंगे कि परमेश्वर हमेशा पुरुष ही होगा, गलती से सोचेंगे कि परमेश्वर पुरुषों का परमेश्वर है, और परमेश्वर सिर्फ पुरुषों को बचाता है, स्त्रियों को नहीं। क्या यह परमेश्वर को गलत समझना नहीं है? परमेश्वर की नजरों में, पुरुष और स्त्री दोनों एक-समान हैं। परमेश्वर पुरुष और स्त्री दोनों को बचाता है, क्योंकि पुरुष और स्त्री, दोनों ही परमेश्वर द्वारा रचे गए हैं। परमेश्वर चाहे पुरुष रूप में देहधारी हो या स्त्री रूप में देहधारी हो, वह परमेश्वर ही रहेगा, परमेश्वर का सार कभी नहीं बदलेगा, वह अब भी सत्य व्यक्त कर सकता है, और मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा कर सकता है। सिर्फ इसलिए कि परमेश्वर एक स्त्री के रूप में देहधारी होता है, हम परमेश्वर के देहधारण, प्रकटन और कार्य को नकार नहीं सकते।"

बाद में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े, जिनसे मेरे दिल में उजाला भरगया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'असंभव' के बारे में अपनी राय जाने दो! लोग किसी चीज़ को जितना अधिक असंभव मानते हैं, उसके घटित होने की उतनी ही अधिक संभावना होती है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से ऊँची उड़ान भरती है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से ऊँचे हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमाओं के पार जाता है। जितना अधिक कुछ असंभव होता है, उतना ही अधिक उसमें सत्य होता है, जिसे खोजा जा सकता है; कोई चीज़ मनुष्य की धारणा और कल्पना से जितनी अधिक परे होती है, उसमें परमेश्वर की इच्छा उतनी ही अधिक होती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है')। "परमेश्वर के प्रकटन का समाधान मनुष्य की धारणाओं से नहीं किया जा सकता, और परमेश्वर मनुष्य के आदेश पर तो बिलकुल भी प्रकट नहीं हो सकता। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसके बारे में उसे मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और अपने कार्य के बारे में हर-एक व्यक्ति को सूचित करने की आवश्यकता तो उसे बिलकुल भी नहीं है। यह परमेश्वर का स्वभाव है, जिसे हर व्यक्ति को पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं को त्याग देना चाहिए। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ऐसा करे या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी धारणाओं तक सीमित तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को खुद से यह पूछना चाहिए कि तुम्हें परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश कैसे करनी चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए। मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और उसके पास भी सत्य नहीं है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना और आज्ञापालन करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है')। बहन एल्सा ने मुझे याद दिलाया, "पीछे देखें, तो परमेश्वर का कार्य अक्सर इंसानी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता। अगर लोग सत्य न खोजें, तो परमेश्वर का प्रतिरोध करना बहुत आसान होता है। मिसाल के तौर पर, जब प्रभु यीशु आया तो वह चरणी में पैदा हुआ। क्या यह इंसानी धारणाओं के अनुरूप था? प्रभु यीशु नाज़रथ से था, उसे मसीहा नहीं कहा जाता था। क्या यह इंसानी धारणाओं के अनुरूप था? प्रभु यीशु परमेश्वर था, लेकिन वह न आराधना-स्थल गया, न ही सब्त का पालन किया, उसका पीछा किया गया और उसे सूली पर चढ़ा दिया गया। क्या यह इंसानी धारणाओं के अनुरूप था? प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य की कई बातें लोगों की धारणाओं के अनुरूप नहीं थीं। क्या इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर नहीं है? नहीं। प्रभु यीशु परमेश्वर का प्रकटन था, मसीहा का आगमन था। तो फिर इतने लोग उसे क्यों नहीं जान सके, उन्होंने उसकी निंदा क्यों की, प्रतिरोध क्यों किया? क्या यह सिर्फ इसलिए नहीं कि लोग परमेश्वर को आंकने में अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ लगाते हैं? सभी फरीसियों ने कहा कि प्रभु यीशु एक नाज़री था, एक बढ़ई का बेटा, परमेश्वर नहीं। अंत में, उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया, और वे परमेश्वर द्वारा श्रापित और दंडित हुए। आज, धार्मिक पादरी और एल्डर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर को सीमित कर देते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को नकारते और उसका प्रतिरोध करते हैं, यह फरीसियों की गलतियाँ दोहराना और परमेश्वर को फिर से सूली पर चढ़ाना है। परमेश्वर सृजनकर्ता है, वह बिना किसी पाबंदी के अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है। परमेश्वर जो भी करे, उसमें उसकी अपनी बुद्धि होता है, परमेश्वर कहाँ कार्य करे या किस रूप में प्रकट हो, इसे हम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का इस्तेमाल कर सीमित नहीं कर सकते। परमेश्वर के प्रति हमारा रवैया आज्ञाकारिता का होना चाहिए। आज्ञाकारिता यानी परमेश्वर के वचनों और कार्य को स्वीकारना, साथ ही उसके वचनों और कार्य के जरिए उसे समझना, न कि अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से परमेश्वर को परिभाषित और सीमित करना और, यह कहनाय कि परमेश्वर फलाँ-फलाँ काम नहीं कर सकता, यह बहुत अतार्किक है।"

फिर, बहन एल्सा ने मुझे परमेश्वर के वचन के दो और अंश पढ़कर सुनाए। "अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। इसे ऐसे कहें, व्यक्ति को इस बात का निश्चय कि यह देहधारी परमेश्वर है या नहीं और कि यह सही मार्ग है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी कि यह देहधारी परमेश्वर की देह है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')। "जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो वह स्वर्ग से मात्र एक विशेष देह में अवरोहण करता है। यह उसका आत्मा है, जो देह में अवरोहण करता है, जिसके माध्यम से वह पवित्रात्मा का कार्य करता है। यह पवित्रात्मा ही है जो देह में व्यक्त होता है, और यह पवित्रात्मा ही है जो देह में अपना कार्य करता है। देह में किया गया कार्य पूरी तरह से पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है, और देह कार्य के वास्ते होता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देह की छवि स्वयं परमेश्वर की वास्तविक छवि का स्थानापन्न होती है; परमेश्वर के देह बनने का उद्देश्य और अर्थ यह नहीं है। वह केवल इसलिए देहधारी बनता है, ताकि पवित्रात्मा को रहने के लिए ऐसी जगह मिल सके, जो उसकी कार्य-प्रणाली के लिए उपयुक्त हो, जिससे देह में उसका कार्य बेहतर ढंग से हो सके, ताकि लोग उसके कर्म देख सकें, उसका स्वभाव समझ सकें, उसके वचन सुन सकें, और उसके कार्य का चमत्कार जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किंतु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसका प्रकटन उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करता है; यह केवल मनुष्य की एक धारणा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')। उसने अपनी संगति जारी रखी, "इससे फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर का देहधारण पुरुष रूप में है या स्त्री रूप में, न ही इससे पड़ता है कि वह देखने में कैसा लगता है। अहम बात यह है कि उसके वचन सत्य हैं या नहीं, क्या वह परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त करता है, और क्या वह मानवजाति को बचाने का कार्य करता है। बस यही महत्वपूर्ण है। मिसाल के तौर पर, बीमार होने पर जब हम डॉक्टर के पास जाते हैं, तो हमारा ध्यान इस पर होता है कि क्या डॉक्टर हमारी बीमारी ठीक कर सकता है, यह नहीं कि डॉक्टर पुरुष है या महिला। अगर हम कहें कि सिर्फ पुरुष डॉक्टर ही बीमारी का इलाज कर सकता है, महिला डॉक्टर नहीं, तो क्या यह हास्यास्पद नहीं है? इसलिए अगर वह सत्य व्यक्त कर मानवजाति को बचाने का कार्य कर सकता है, तो वह देहधारी परमेश्वर है।" लेकिन धार्मिक पादरी परमेश्वर की वाणी नहीं सुनते या सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल नहीं करते, यह सुनकर कि परमेश्वर स्त्री रूप में देहधारी हुआ है, वे उसे नकारते, उसकी निंदा करते हैं, लोगों को प्रभु का स्वागत करने से रोकने के लिए धारणाएँ फैलाते हैं। यह एक भयानक गलती है। उन्हें मुझे परेशान करने से रोकने के लिए, मैंने अपनी मूल कलीसिया के पादरी और एल्डर सहित उन तमाम लोगों को ब्लॉक कर दिया, जो मुझे रोकने की कोशिश कर रहे थे। मुझे अडिग विश्वास था कि मैं प्रभु का स्वागत कर रही थी, और पादरी और एल्डर मुझे जितना भी परेशान करें, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करूँगी।

अप्रैल 2020 से, मेरी बेटी और मैंने कलीसिया जाना बंद कर दिया। दो महीने बाद, कलीसिया के पादरी ने मुझ पर हमला करना शुरू कर दिया। पहले, वह मुझे मनाने मेरे घर आया, कहा कि उसकी कलीसिया की बैठकें ही काफी हैं, इसलिए मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बैठकों में भाग न लूँ। उसने मेरे पति से भी कहा कि मैंने गलत रास्ता चुना है और मुझे वापस आ जाना चाहिए। उसने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकने के लिए मेरे बेटे को भी उकसाया। मेरे पति और बच्चे पादरी के तरीके के खिलाफ थे। मेरे बच्चों ने कहा, मैं उन्हें सुसमाचार सुनाती थी, अक्सर उनसे परमेश्वर में विश्वास के मामलों पर बातें करती थी, इसलिए उनका ख्याल था कि मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में सोच-समझकर विश्वास किया है, यह फैसला करने के लिए मुझे परमेश्वर से आस्था मिली थी। बाद में, एल्डरों ने मुझे धमकाया, कहा कि कलीसिया न आई तो मुझे निष्कासित कर दिया जाएगा, और भाई-बहन मुझे ठुकरा देंगे। मैंने अडिग होकर कहा, "कलीसिया मुझे निष्कासित कर दे, तो भी मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखूँगी।" बाद में, इस उम्मीद से कि मेरा स्कूल ही मुझसे निपटेगा, उन्होंने मेरे स्कूल के अगुआओं को सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरे विश्वास के बारे में बताया, लेकिन प्रिंसिपल ने उन्हें अनदेखा किया। मुझे बहन एल्सा की कही हुई बात याद आई कि धार्मिक दुनिया सत्य को हमेशा ठुकराती है, उसकी निंदा करती है। दो हजार साल पहले, प्रभु यीशु ने मानवजाति के छुटकारे के लिए सत्य व्यक्त किया था, और यहूदी धर्म ने उसकी निंदा कर उसे ठुकराया था, खास तौर से धार्मिक अगुआओं, मुख्य याजकों, शास्त्रियों, और फरीसियों ने। उन्होंने अपना ओहदा और आमदनी बचाए रखने के लिए प्रभु यीशु पर हमला कर उसका तिरस्कार किया, लोगों से छल करके उन्हें प्रभु का अनुसरण करने से रोका। वे सभी मसीह-विरोधी थे, जिन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया, लोगों को तबाह किया। आज धार्मिक दुनिया के ज्यादातर पादरी और एल्डर यहूदी धर्म के फरीसियों जैसे ही हैं। अपने ओहदों और आमदनी को बचाने के लिए, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की अंधाधुंध निंदा और प्रतिरोध करते हैं, विश्वासियों को सच्चे मार्ग को जाँचने से रोकते हैं। वे भी मसीह-विरोधी हैं, जिनका खुलासा परमेश्वर ने किया है। फिर मुझे याद आया कि प्रभु यीशु ने फरीसियों को श्रापित करते समय क्या कहा था "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो" (मत्ती 23:13)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो" (मत्ती 23:15)। धार्मिक पादरी और एल्डर जानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य हैं, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं करते। वे लोगों की आराधना और चढ़ावों का आनंद उठाना चाहते हैं, इसलिए अपने ओहदे बनाए रखने के लिए वे हमें प्रभु का स्वागत करने और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से रोकते हैं। मसीह-विरोधी यही काम करते हैं। वे सब दानव हैं, जो लोगों की आत्माएँ निगल लेते हैं, उन सबको परमेश्वर श्रापित करेगा, उनका अनुसरण करने वाले लोग भी नरक जाएँगे और दंडित होंगे।

हालाँकि पादरी और एल्डर अभी भी मुझ पर हमले करते हैं, मुझे परेशान करते हैं, पर अब वे चाहे जो भी भ्रांतियाँ फैलाएँ, मुझ पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि मैं जानती हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन सत्य हैं, और लोगों को शुद्ध कर बचाने वाले अनंत जीवन का मार्ग हैं। जो भी सच्चाई से परमेश्वर के प्रकटन की लालसा करता है, उसे सिर्फ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने की जरूरत है, और वह परमेश्वर की वाणी पहचान कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सिंहासन के पास लौट आएगा। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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